Thursday, June 12, 2008

सडक, आदमी और आसमान..


खाली सडक पर
बडी दूर से एक पत्थर को मारता हुआ ठोकर
सोचता रहा कि आसमान में सूराख
क्या रोशनी की नदी धरती पर उतार देगा?

अपने बौनेपन को उँट की टाँगों के पैमाने से नापा
पहाड मुझे देख कर मुस्कुराता रहा
जिसकी फुनगी पर आसमान टंगा था
आसमान में डैने फैला कर उडती हुई चील
गोरैया हुई जाती थी
मैनें अपनी कल्पना को उसके पंखों में बाँध दिया
फिर अपनी तलाश की
तो चींटी की तरह रेंगता मिला

आसमान से देखो तो आदमी कीडे नज़र आते हैं
मैनें मुस्कुरा कर तबीयत से पत्थर उछाला
”छपाक” आवाज़ आयी दो पल बाद
और मेरे पाँव सडक पर बढने लगे...

*** राजीव रंजन प्रसाद

11 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

सुंदर अभिव्यक्ति.. बहुत बढ़िया

mamta said...

अच्छा लिखा है।

बाल किशन said...

"मैनें अपनी कल्पना को उसके पंखों में बाँध दिया
फिर अपनी तलाश की
तो चींटी की तरह रेंगता मिला"

बहुत ही उम्दा.
बेहतरीन.
बधाई.

Lovely kumari said...

aap to hamesa hi badhiya likhte hain.jari rakhen

रंजू ranju said...

आसमान में डैने फैला कर उडती हुई चील
गोरैया हुई जाती थी
मैनें अपनी कल्पना को उसके पंखों में बाँध दिया

सुंदर अभिव्यक्ति

mehek said...

bahut khub,aasman to bahut dur hai insaan se,magar man ke bhav bahut achhe,vichar jitne paripakva utni hi chapak se pathat uchalne wali kruti nanhe balman ki aur ishara karti hai,sundar.

congratulations for new layout of blog,its beautiful

नीरज गोस्वामी said...

राजीव जी
भाई वाह...कमाल का लिखा है आप ने इस बार. खूबसूरत अभिव्यक्ति पर ढेरों बधईयाँ.
नीरज

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत कमाल का लिखा है, बधाई.

दीपक भारतदीप said...

आपकी यह कविता बहुत अच्छी लगी। इस पर मुझे इस तरह विचार आया जो मैंने कविता के रूप में दर्ज कर लिया
दीपक भारतदीप

आसमान से जो देखा धरती पर
तो इंसान चींटियों की तरह
रेंगता नजर आया
वैसे भी धरती पर इंसान
कब इंसान की तरह चल पाया
चींटियों की रानी लेती है
अपनी प्रजा से सेवा
पर इंसान ढूंढता है
अपने आराम से रहने के लिये कोई राजा
जो उसे खिलाये मुफ्त में मेवा
दौड़ सकता है अपनी टांगो के सहारे
पर फिर भी रैंगना उसे पसंद है
करता है पहाड़ जैसी बातें पर
इंसान का चरित्र हमेशा बौना नजर आया
..............................

Anonymous said...

Excellent.

Sandeep Aggarwal

Jyoti said...

सोचता रहा कि आसमान में सूराख
क्या रोशनी की नदी धरती पर उतार देगा?
bahut khoob!