ज़िन्दगी अब तेरे नाम पे हँस के देखाऔर छल छल के भरी आँख का पानी मुझको
चुपचाप कान ही में कह गया देखो
होठ इतने भी न फैलाओ मेरे यार सुनो
ग़म को सहने के लिये दम न निकालो अपना
चीख कर रो भी लो
बहुत देर तक ए मेरे दोस्त..
राजीव रंजन प्रसाद
८.१२.१९९५
नमन बस्तर की माटी को जहाँ नदियों, पहाडों, पंछी और आदिम यारों की यारी नें जो कलम थमायी कि फिर रुकी ही नहीं....
ज़िन्दगी अब तेरे नाम पे हँस के देखा
2 comments:
आप अच्छा लिखते हैं। अपनी धरती, अपने परिवेश, अपने पर्यावरण से लगाव बहुत अच्छी बात है।
बढ़िया लिखा है.
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