तुम्हारे अंतरद्वन्द्व नें प्याज काटी हो जैसेतुम्हारे आँसू बेमानी थे कितने
बहुत थे लकिन कि मेरे जज़बातों को नाँव बना दो
और तैर जाने दो तुम्हारे भीतर
हर बार डूब गया हूँ मैं
अगर वो आँसू रहे होते
जल न गया होता अब तलक..
*** राजीव रंजन प्रसाद
१९.११.१९९५
नमन बस्तर की माटी को जहाँ नदियों, पहाडों, पंछी और आदिम यारों की यारी नें जो कलम थमायी कि फिर रुकी ही नहीं....
तुम्हारे अंतरद्वन्द्व नें प्याज काटी हो जैसे
6 comments:
हर बार डूब गया हूँ मैं
अगर वो आँसू रहे होते
जल न गया होता अब तलक..
अच्छी लिखी है राजीव जी
आप की ये अदा भी खूब है कम शब्दो में गहरी बात कहना..
सुंदर और बेहतरीन प्रस्तुति.
बहुत अच्छा लिखा आपने.
बधाई.
क्या बात है भाई. बहुत सुंदर.
बढ़िया.
wah bahut khub
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