Monday, June 09, 2008

बस्तर भारत का हिस्सा नहीं है?

क्रांति की एक चौराहे पर पुंगी बज रही थी “बोल मजूरे हल्ला बोल-हल्ला बोल, हल्ला बोल”। सूत्रधार चीख रहा था – दिल्ली बिजली से चमचमाती है और इधर बस्तर में जानवरों की तरह जीने के लिये विवश हैं लोग। सडक नहीं है, पीने का पानी हर गाँव नहीं पहुँचा, स्कूल नहीं हैं और अगर हैं भी तो उनमें मास्टर नहीं है......” नुक्कड पर खूब तालियाँ बजीं। तालियों का क्या है, परसों हमारे पडोसी के घर लडका हुआ, झुंड के झुंड तालियाँ बजाने वाले पहुँचे”। दिल्ली के पास “साउंड” है, “कैमरा” है और “एक्शन” है..नौकर ने मालिक का कत्ल किया- राष्ट्रीय खबर है। बाप नें बेटी का कत्ल कर दिया –सी.बी.आई जाँच करेगी। बीयर बार में कत्ल हुआ, समूचा राष्ट्र आंदोलन करेगा। ‘मानव’ केवल दिल्ली या कि नगरों-महा-नगरों में रहते हैं जिनके ‘अधिकार’ हैं। मेरे बस्तर क्या तुम इसी प्रजातांत्रिक, धर्मनिर्पेक्ष, समाजवादी लोकतंत्र का हिस्सा हो? बीते चार दिनों और चार रातों से बस्तर क्षेत्र में नक्सली आतंक वादियों नें अंधेरा कर रखा है। बिजली आपूर्ती ठप्प..काम-काज बंद, कल कारखाने (जो भी बचे खुचे हैं) बंद, जन जीवन स्थिर।.....और देश आराम से सो रहा है। जनवादी (तथाकथित) कलम और कैमरे, आरूषी को इंसाफ दिलाने के बाद फ्री होंगे। बस्तर में “क्या नहीं है” दुनिया जानती है, “क्या है” कोई नहीं देख पाता, चूंकि, अंधेरा आज मेरे बस्तर का चेहरा है।

जगदलपुर में तब गिने चुने होटल थे। एक फ्रांसीसी जोडा उडुपि होटल के एक कमरे में ठहरा हुआ था। उनसे मेरी मित्रता कोतूहल-वश हुई, और मुझसे मित्रता उन गोरों की मजबूरी थी। उडुपी रेस्टोरांट कॉलेज के दिनों में मेरा भी अड्डा था। वहीं इन झक्क-गोरे महोदय की मेम नें अबूझमाड के नंगे आदिवासियों के विषय में जानने के लिये समूह में बैठे हम स्टूडेंट्स से अंग्रेजी में वार्तारंभ किया। साथी आदिम दोस्तों के लिये ये गोरे अजूबे थे और वो गोरे तो बस्तर को अजायबघर समझ कर ही पहुँचे थे। उनके बहुत से मिथक मैने तोडे, वे वार्ता के बीच-बीच में अपने सवालों पर मेरे आक्रोश को ले कर हैरत में थे। उन्होने कहा भी, कि मिस्टर यही आपकी किताबों में बस्तर का चेहरा है। खैर, उन्होंने मुझे अपने साथ “कोटुमसर” चलने के लिये आमंत्रित किया। मैं उनके लिये गाईड बनने को तैयार भी हो गया। सुबह करीब दस बजे मैं होटल पहुँचा तो उनके सूजे हुए चेहरे और लाल आँखें देख कर घबरा गया? रात भर जगदलपुर के मोटे मोटे मच्छरों नें इन बिचारे विदेशियों का अभिनंदन किया था। पहले तो मैं पेट पकड कर हँसा जब मुझे समझ आया कि जिस “एनिमल” को ये अपनी गालियों से सम्मानित कर रहे हैं वे श्रीमान मच्छर जी हैं। रात किसी गडबडी के कारण दो घंटे बिजली चली गयी थी और उसकी दास्ताँ एसी थी कि मैं इनकी तकलीफ से पिघल गया। फ्रांस में मच्छर नहीं होते यह बात मेरे लिये इतने अचरज की नहीं थी जितना अचरज मुझे आधी नंगी फ्रांसीसी मेम साहब की उस जिज्ञासा से था जो बस्तर में नंगे आदिम तलाशते पहुँची थीं..वाह रे पर्यटक। कोटुमसर की स्टेलेक्टाईट और स्टेलेक्माईट की गुफा, जो कि चूने के पत्थर की पानी से क्रिया के कारण बनी हैं दर्शनीय है, वैज्ञानिक कारणों से भी और प्रकृतिप्रियता हो, तो भी। “गवरन्मेंट को इस गुफा में लाईटें लगवा कर टूरिस्ट को प्रमोट करना चाहिये” उस फ्रांसीसी नें पैट्रोमेक्स की रोशनी में उस गुफा की अद्भुतता से प्रभावित होते हुए कहा। मैं हँस पडा। मैं उसे क्या बताता कि यह अंचल घने अंधकार का ही साक्षी है और यही इसकी नियति भी है।

बस्तर का दर्द आवाज़ क्यों नहीं बनता यह प्रश्न गंभीर है। बहुत से बुद्धिजीवी लोगों नें विनायक सेन को रिहा कराने के लिये अभियान छेड रखा है। मैं सेन को नहीं जानता और इस लिये उन पर टिप्पणी करना मेरे लिये संभव नहीं। वो जेल में हैं तो भी बस्तर में कुछ नहीं बदला और वो रिहा हो जायेंगे तो भी कुछ नहीं बदलेगा। हाँ बस्तर के दर्द पर रायपुर या कि दिल्ली में जब चर्चायें होती हैं तो बहुत से सामाजिक आर्थिक कारणों की बाते की जाती हैं (सामाजिक कार्यकर्ता हैं, सामाजिक बातें ही करेंगे)। किसने बस्तर को देखा, समझा या जाना है, किसे दीखता है उसका दर्द। जो लडाईयों की घोषणायें कर जेल में बैठे हैं उन्हें या कि माओवादियों के समर्थन में लाल-पीले हो कर लिख रहे हैं और “लडाई जारी रहेगी” की घोषणाये कर रहे है उन्हें?, दुर्भाग्यवश इन सभी के लिये लडाई एक फैशन है। लडाई बस्तर के भीतर चल रही है और बहुत लम्बे समय से चल रही है। गुपचुप सुलगता हुआ यह अंचल जब भीतर से जागेगा उस दिन सैलाब आ जायेगा, मैं जानता हूँ। आज मेरे आदिम अंचल, तेरा शोषण जायज है चूंकि तेरे भीतर आयातित सोच तेरी अंतरात्मा कोंच रही है।

बस्तर अंचल का नक्शा उठा कर देखने की आवश्यकता है। उत्तर की ओर संभ्रांत छतीसगढ, दक्षिण की ओर आन्ध्रप्रदेश (वारंगल जैसे नक्सल प्रभावी क्षेत्र से जुडा), पश्चिम की ओर महाराष्ट और पूरब की ओर उडीसा। सभी निकटस्थ स्थान, विशिष्ट संस्कृति से जुडे हुए और बस्तर अंचल को सभी से कोई न कोई सौगात मिली है। मैं हल्बी भाषा सीखने का यत्न कर रहा था। बहुत कोशिश कर मैने उनकी गिनती के उच्चारण कॉपी में नोट कर लिये – वक्टी (एक), रंड (दो), मूडु (तीन), नालु (चार), आयदु (पाँच), आरू (छ:), चप्पु (सात), यमिदी (आठ), तमिदी (नौं) और पदि (दस)। जब बातो बातों में अपने एक दक्षिण भारतीय मित्र से इसका मैने जिक्र किया तो ज्ञात हुआ कि यही उच्चारण तेलुगु भाषा में भी गिनती के लिये प्रयुक्त होते हैं। एसी ही बहुत सी समानताये हैं - कुछ भाषा, तो कुछ पहनावे, तो कुछ त्योहारों में, जिनसे निकटवर्ती राज्यों की संस्कृति झलकती है। यही कारण भी है कि आसानी से माओवादियों (आतंकवादियों) को भी बस्तर अपनी आसान शरणस्थली लगता है, चूंकि यह क्षेत्र बिलकुल वैसा ही है जैसा कि यहाँ का मशहूर लोकगीत – आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर, किमचो भोले भाले रे (मेरा बस्तर कितना सुन्दर, कितना भोला भाला है)।

बात अंधकार की है और मैं हर बार उसके कारण गिनने लगता हूँ। आज बस्तर और उसके दर्द से उपर एक सवाल ले कर उपस्थित हुआ हूँ – क्या बस्तर भारत का ही हिस्सा है?.......केरल राज्य से बडा और दुनिया के कई देशों से बडी भौगोलिक भूमि रखने वाला यह क्षेत्र क्या भारत का भूभाग है? एक समय में भारत में आई.ए.एस बनने के इच्छुक छात्र रटा करते थे कि “बस्तर” भारत का सबसे बडा जिला है, विभाजित होने के साथ विलोपित तो नहीं हो गया? एसा सोचने के कई गंभीर कारण भी हैं।.....।तब छतीसगढ मध्य-प्रदेश का ही हिस्सा था। स्नातकोत्तर के लिये मैं भोपाल पहुँचा। रैगिंग के दौरान जब मुझसे सवाल किया जाता – कहाँ से आये हो? मेरा उत्तर “बस्तर” सुनते ही दूसरा प्रश्न होता “यह कहाँ है?”। एक और वाकया रैगिंग का ही, मुझे बुलाया गया। सवाल फिर वही-कहाँ से आये हो? और बस्तर सुनते ही एक इंटेलिजेंट कमेंट – बस्तर, लेकिन तुम तो कपडे पहने हो? और पीछे एक सामूहिक हँसी। यही हँसी मेरे बस्तर का सच है। जो बात मैने तब कही थी दोहरा रहा हूँ – “इसी मिट्टी में मैने होश संभाले, इसी मिट्टी नें कपडे पहनना भी सिखाया और बस्तर की यही मिट्टी मेरा परिचय है”। मैंनें दो थप्पड खाये थे उस रात...हाँ मेरे बस्तर, तेरी माटी की केवल वही पूजा करते हैं, जिन्होंने चखा है तुझे, जिन्होंने तेरा मातृत्व महसूस किया है। भरत के वंशजो का यह देश शेरों के अब दाँत नहीं गिनता उन्हें चिडियाघर में देखने जाता है वह तुझसे क्या परिचित होगा? वह तो पूछेगा ही कि भारत के नक्शे में यह अजायबघर कहाँ है? अंधकार से डरने वालों का देश है भारत, वरना आरूषी के कत्ल के हथियार ढूंढ रहे कलमकार तेरे सपनों के कातिलों को पकड न लाते? कौन बस्तर, कहाँ बस्तर, कैसा बस्तर करने वाले इस देश के लोग जब उनके पीछे कैमरे और डायरियाँ लिये भागते हैं जिन्होने इस भूमि को अपनी दूकान चमकाने का सॉफ्ट टारगेट समझा है तो आत्मा सुलगती है। किताबों की दूकान, पचासों साल के बडे से बडे अखबार और टीवी की रिपोर्टिंग पर शोध कर लो, बस्तर पर तब ही लिखा गया है जब नक्सलियों ने वारदात की है, किसी हाई-प्रोफाईल एक्टिविस्ट जो मीडिया को रखैल की तरह लिये फिरते हैं वहाँ अपने ब्रम्ह-वाक्य कहने पहुँचे हैं या कि बस्तर में दशहरा हो।

मैं नक्सल समस्या को बस्तर की प्राथमिक समस्या मानने से गुरेज नहीं करता जिससे यह अंचल सौ साल और पिछड गया। क्या डाकू कभी चाहेगा कि उसके अड्डे तक सडक पहुँचे? उसके दरवाजे तक शिक्षा? दिल्हीराजरा से किरंदुल तक रेल्वे लाईन सुनते सुनते अधेड हो गया हूँ पता नहीं कब अंचल के बच्चे रेल देख कर नाचेंगे, तालियाँ बचायेंगे? कैसे आयेगी रेल? जो एक धुकधुकिया चलती भी है और भारत का खजाना भरती है, बस्तर से लौह अयस्क को विशाखापटनम तक पहुँचा कर...अब भगवान भरोसे सेवा हो गयी है। जो शिमला तक छोटी रेल में गये हैं वे इस रेल में किरंदुल से अरकू तक का सफर कर लें, मेरा दावा है कि धरती पर स्वर्ग उन्होने देख लिया, शिमला से कही अधिक नैसर्गिक।...लेकिन आज स्वर्गवासी हो जाने का खतरा है इस रेल की यात्रा में। कभी पटरी उखाडी जाती है कभी इंजन जलाया जाता है और उसके बाद विकास-विकास और क्रांति-क्रांति का नारा लगा कर किसे बेवकूफ बनाया जाता है? सरकार को कोसना तो फैशन है और इस फैशन का बखूबी पालन होता है। दिल्ली के खबरचियों की बस्तर पर लाई गयी खबरों को खरोंच कर देख लीजिये। नहीं, अभी सरकार कटघरे में नहीं, अभी सरकार की नाक में दम करने वाले पहले दोषी हैं। हाँ, उनपर काबू न पाया जाना सरकार की कमजोरी कही जा सकती है। यहाँ भी वामपंथी विचारधारा द्वारा पोषित आतंकवाद को ही दोषी माना जाना चाहिए चूंकि इस प्रकार के आतंकवाद में सभी कुछ प्रायोजित होता है, इसका समर्थन भी दर-असल कत्लेआम और बरबादी को सुन्दर शब्दों में ढकने का ही प्रायोजित कार्य हैं जिससे दुनिया को अंधेरे में रखा जा सके। हाँ वैसा ही अंधेरा फैलाया जा रहा है खबरों द्वारा, माओवादियों के समर्थकों द्वारा, जो बस्तर के भीतर गहरे पसरा हुआ है। बस्तर इस सबसे निजात चाहता है, यह कितने जानते है? बाहरी दुनिया नें जब बस्तर का नाम ही नहीं सुना तो वह इस अंचल के जख्म क्या जानेगी?

किसी मोहल्ले की बिजली भी चौबीस घंटे काट दी जाये तो तो लोग उग्र हो उठते हैं। बिजली विभाग में आ धमकते हैं, सरकार की हाय हाय होने लगती है, पुतले जलने लगते हैं यहाँ तक कि मोहल्ले की इस समस्या को राष्ट्रीय समस्या बना कर चौबीसो घंटे न्यूज चैनलों में दिखाया जाता है। आज मेरे अंचल में एसे चार चौबीस घंटे बीत चुके, पूरा दंतेवाडा जिला कुछ हद कर नारायणपुर और जगदलपुर में बिजली सप्लाई नक्सलियों नें ठप्प कर घुप्प अंधेरा कर दिया है। अंचल में पहले से व्याप्त अंधकार में यह अंधेरा किसी को नहीं दीखा? क्यों दीखे? जब बस्तर से ही भारत परिचित नहीं तो क्या खाक मीडिया उसका दर्द बेच सकेगी? बस्तर के हालात और सच्चाई दिखा कर न तो विजुअल मीडिया अपनी टी.आर.पी बढा सकते हैं न अखबार अपनी सर्कुलेशन, तो किसे फुर्सत है? यही आज की पत्रकारिता का लिटमस पेपर टेस्ट है जिसमें बडा सा “फेल” पत्रकारिता की अंकसूची में अंकित होता है। पत्रकारिता और साफसुथरी?, पत्रकारिता और अभियान?, पत्रकारिता और सोच?...जाने दो भाई इन कलमघसीटों की दुकानों पर ये लेबल केवल इश्तिहारी हैं। किसी पत्रकार को पुलिस पीट दे फिर देखिये इनकी “राष्ट्रीय एकता” खबरे रंग देंगे “पत्रकारिता पर हमला....”। मैं पत्रकारों को दूर से नमस्कार करता हूँ कि महोदय आप लोकतंत्र के स्तंभ हैं सनसनी दिखाईये, भविष्य बताईये, स्वर्ग का रास्ता खोज लाईये, सास-बहू के झगडे सुनाईये...बस्तर आपकी ओर उम्मीद से देखता भी नहीं है। मैं उस भारत से हाँथ जोड कर विनती करता हूँ जो जागा हुआ है या जाग सकता है, संवेदनशील है या सोच सकता है, मानव है या कि मानवता अभी शेष है उसमें, कि मेरे बस्तर को कैंसर हो गया है, बचा लो उसे। मैं नम आँखों से फरियाद करता हूँ कि एक मोमबत्ती इधर भी, इस नैसर्गिक और ममतामयी अंचल की आखिरी साँसों से पहले...
***राजीव रंजन प्रसाद
8.06.2008

6 comments:

रचना सागर said...

बस्तर के लिये बहुत ज्वलंत प्रशनो के साथ.... आधुनिक समाज पर बहुत सुंदर कटाक्ष के लिये बधाई

शोभा said...

rajiv ji
bastar ke bare main ityni vistrit jaankari dene ke liye dhanywad. padhkar bastar ke bare main kafi jaankari prapt hui. ssneh.

Udan Tashtari said...

हल्बी भाषा तेलगु और उड़िया से बहुत प्रभावित है, इसका आभास था. आप लेख जबरदस्त है और अंत बहुत भावपूर्ण. बहुत उम्दा-ऐसे ही सार्थक आलेखों की आपसे अपेक्षा है.

Suresh Chiplunkar said...

मर्मस्पर्शी लेख और मीडिया की परतें उधेड़ता हुआ, धधकता हुआ, जन्मभूमि के लिये तड़पता हुआ… बेहतरीन आलेख है सर जी…

महेन said...

बहुत खूबी से जानकारी में अपने भावों का समावेश किया है आपने। मुझे बस्तर के बारे में अधिक ज्ञान नहीं है, मगर मैं बस्तर को अपने सामने देख सकता हूँ आपका लेख पढ़ने के बाद।

शुभकामनाएँ।

princcess said...

appealing,,,