Tuesday, April 30, 2013

पुरुषोत्तमदेव, रथयात्रा तथा बस्तर का समाजशास्त्र



जनजातीय विकास के विभिन्न चरणों को वहाँ की राजनीति के क्रमबद्ध अध्ययन के बिना समझना कठिन प्रतीत होता है। जैसे बस्तर में अपने समय के साम्राज्यवादी शासकों की छाया पड़ी, धार्मिक आन्दोलनों का असर हुआ वैसे ही हर शासन व्यवस्था के उत्थान और पतन के साथ जनजातिगत समीकरणों में भी नई युतियाँ अथवा नव-समावेश देखे गये। यहाँ तक कि जब एक नया शासक वर्ग उदित हुआ तो दूसरे शासक वर्ग के वंशजो ने वनों के भीतर पलायन कर स्वयं को सुरक्षित करना उचित समझा। निश्चित ही यह प्रक्रिया नये तरीके के सांस्कृतिक समन्वयों को गढ़ती रही तथा नवीन परम्पराओं का भी समुद्भव होता रहा। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी किंतु राजा पुरुषोत्तम देव के शासन काल में बस्तर में नये सामाजिक समीकरण बने। इस संदर्भ को समझने के लिये काकतीय/चालुक्य नरेश पुरुषोत्तमदेव के शासन काल की कुछ प्रमुख विशेषताओं का अवलोकन किया जाना आवश्यक है। पुरुषोत्तमदेव के पूर्ववर्ती शासक भैरवदेव (1410-1468) के शासन काल के सम्बन्ध में ओड़िशा की प्राचीन साहित्यिक कृतियों में उल्लेख मिलता है कि उनके पिता हमीर देव (1369-1410) को पाटणा की सत्ता से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई। भैरवदेव पर निश्चित ही पाटणा नरेश का दामाद होने के पश्चात भी गंग शासकों का दबाव बना रहा होगा। यद्यपि बस्तर में उपलब्ध राजवंशावलियाँ ओड़िशा के इस दावे को पुख्ता नहीं करती। यहाँ उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार भैरमदेव का शासनकाल यद्यपि उथल-पुथल भरा रहा किंतु यह गंग शासकों का उपनिवेश हर्गिज नहीं था। भैरवदेव की दो रानियाँ थीं मेघई अरिचकेलिन तथा जानकी कुँवर। रानी मेघई शिकार की शौकीन थीं। उनकी कालबान नाम की बंदूख देखने योग्य है। इसे दो व्यक्ति मिल कर भी उठाने की क्षमता नहीं रखते हैं। मेघई अरिचकेलिन एक वीरांगना थी जिन्होंने स्वयं नाग सरदारों के विद्रोह का दमन कर बस्तर शासन को स्थायित्व व शांति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रो. वल्र्यानी तथा साहसी ने अपनी पुस्तक बस्तर का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहासमें लिखा है कि भैराजदेव नाम मात्र के शासक थे। उनके शासन का संचालन मेघावती द्वारा किया जाता था। रानी मेघावती (मेघई अरिचकेलिन) के शिकार की कथायें सदियों से चित्रकोट अंकल में प्रसिद्ध हैं। आगे चल कर रानी मेघावती की कालवान बंदूख को दशहरा अवसर पर अस्त्र-शस्त्र पूजा में सम्मिलित किया गया। कालवान बन्दूख की नली इस समय बची हुई है। यह भी माना जाता है कि एक समय प्रचलित चित्रकोट के मंधोता में गाड़ी में बैठ कर शिकार खेलने की परम्परा की जनक रानी मेघई अरिचकेलिन ही थीं। यही नहीं माना जाता है कि दंतेवाड़ा मंदिर की मेघी साड़ीभी मेघई रानी ने ही देवी को अर्पित की थी। इतनी विवेचना के पश्चात यह लिखना उचित ही होगा कि मेघई रानी वस्तुत: कोषकुण्ड (वर्तमान कुआकोण्डा) के महामेघवंशी जमीन्दार की पुत्री रही हैं। यदि बस्तर को चौहानो अथवा गंगो का उपनिवेश न भी स्वीकार किया जाये तब भी यह मानना ही होगा कि भैरवदेव का समय नाग-विद्रोहों के दमन का गंगो-चौहानों के दबावों से भरा तथा यदा-कदा रेड्डियों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा है। आर सुब्रमण्यम ने दि सूर्यवंशी गजपतिज ऑफ ओड़िशामें जिक्र किया है कि ओड़िशा के गजपति राजा कपिलेन्द्र (1435-1468 ई) से भैरवदेव का इन्द्रावती तथा गोदावरी के मध्य की उर्वरा भूमि पर स्वामित्व को ले कर संघर्ष हुआ जिसमें राजा भैरवदेव मारे गये। यह सूत्र भी बस्तर वंशावली गाथाओं से पुष्ट नहीं होता।

भैरवदेव के बाद बस्तर पर शासन करने वाले चौथे राजा हुए - पुरुषोत्तम देव (14681534 ई.)। राजा ने रायपुर के कलचुरी शासकों पर चढ़ाई कर दी। दुर्भाग्यवश पराजित हो गये। इधर बस्तर सेना ने रायपुर पर आक्रमण किया, उधर कलचुरी राजा ब्रम्हदेव ने रतनपुर रियासत से सहायता माँगी। रतनपुर के राजा जगन्नाथ सिंह ने सेना भेज दी। संयुक्त सेनाओं ने चौतरफा आक्रमण किया। भगदड़ मच गयी। राजा पुरुषोत्तम देव अपने हाथी को युद्धभूमि से भगा ले गये। कलचुरियों की सेना पीछे लगी हुई थी। इससे पहले कि पुरुषोत्तम देव शत्रु सैनिकों द्वारा पकड़े जाते, एक सेनापति ने अपने वस्त्र राजा को पहना दिये। राजा उस सेनापति के घोड़े पर सवार बस्तरकी ओर भाग निकले। इतिहासकार डॉ. के के झा बताते हैं कि प्रतिवर्ष सम्पन्न बस्तर दशहरा में रथ के उपर खड़े हो कर एक व्यक्ति द्वारा वस्त्र खण्ड को लगातार हाँथ से दूर करने तथा समेटने की जो क्रिया सम्पन्न की जाती है वह इसी घटना की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिये है। यहाँ यह भी जोड़ना आवश्यक होगा कि पुरुषोत्तम देव के पलायन के पश्चात भी कलचुरियों ने पलट कर बस्तर भूमि पर आक्रमण नहीं किया। जिससे यह सिद्ध होता है कि भले ही विजय अभियान असफल हो गया हो तथापि पुरुषोत्तम देव शक्तिशाली शासक थे। उनके शासनकाल में ही राजधानी को मंधोता से हटा कर बस्तर लाया गया था। 

राजा पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी की तीर्थयात्रा पेट के बल सरकते हुए की थी। जगन्नाथपुरी के राजा ने उनका भरपूर स्वागत किया तथा वहाँ उन्हें रथपतिकी उपाधि से विभूषित किया गया। पुरी के राजा ने मंदिर के पुजारी के माध्यम से 16 पहियों का रथ प्रदान किया। रथ के साथ सथ भगवान जगन्नाथ तथा सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियाँ भी बस्तर लायी गयीं। राजा ने बस्तर लौट कर दशहरे के अवसर पर रथयात्रा निकालने की परम्परा आरंभ की। राजा की जगन्नाथपुरी यात्रा की स्मृति को जीवित रखने के लिये बस्तर में गोंचापर्व भी मनाया जाता है। स्थानीय ग्रामीण बाँस की छोटी छोटी नलियाँ बनाती हैं। ये यह नलियाँ तुपकीकहलाती है। इसमें मालकांगनी का फल रख कर बाँस की लकड़ी के दबाव से गोली की तरह चलाया जाता हैं।

पुरुषोत्तमदेव के समय की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना है कालापहाड़ का आक्रमण। कालापहाड़ के सम्बन्ध में केदारनाथ ठाकुर ने विस्तार से जानकारी दी है कि काला पहाड़ का वास्तविक नाम संभवत: कालचन्द्र रहा होगा जो कि बंगाल के पठान सुल्तान बाबेकशाह की सेना में उच्च पद पर कार्यरत था। उसे सुल्तान की कन्या दुलीमा से प्रेम हो गया। अनेक अडचनों के बाद दुलीमा से उसका निकाह तो सम्पन्न हो गया किंतु तत्कालीम पंडितों ने उसे हिन्दू धर्म से बहिष्कृत कर दिया। एक सम्पन्न ब्राम्हण कुल में जन्मे तथा उच्च सैनिक पद पर आसीन इस व्यक्ति ने बहिष्कार को अपना घोर अपमान करार दिया। उसने इस्लाम ग्रहण किया तथा अपना नाम मोहम्मद कामूली रख लिया। दिल्ली के शासक बहलोल लोदी (1451-1488) से भी उसकी मित्रता थी अत: एक बड़ी सेना संग्रह कर वह अपने अपमान को क्रूरता से सहलाने लगा। उसने हजारो विधर्मियों का कत्लेआम किया; अनेक मंदिर व देव प्रतिमाओं को नष्ट किया।  उसके कुकृत्यो व दहशत ने उसे प्रचलित नाम दिया काला पहाड़। काला पहाड़ ने ओड़िशा, आन्ध्र, कामरूप, दीनाजपुर, रंगपुर, कूचबिहार, जौनपुर तथा देवबनारस के साथ साथ बस्तर पर भी आक्रमण किया था।       

डॉ. हीरालाल शुक्ल मानते हैं कि कलचुरियों से युद्ध में 1534 ई. में राजा पुरुषोत्तमदेव की मृत्यु हुई। यद्यपि कलचुरियों के बस्तर पर शासन करने अथवा किसी अन्य प्रकार के हस्तक्षेप की कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं होती। 1534 ई. में राजा पुरुषोत्तम देव मृत्यु के बाद जयसिंहदेव ने चौबीस वर्ष और फिर नरसिंह देव ने 1558 ई. से शासन किया। इन दोनों ही राजाओं के शासन आम तौर पर शांतिपूर्ण थे। यदि हम राजा पुरुषोत्तम देव के समय की महत्वपूर्ण घटनाओं की विवेचना करते हैं तो उनके समय की कई गतिविधियों, निर्णयों व कार्यों का आज भी असर पाते हैं। क्या बस्तर ग्राम एवं राजधानी को ले कर आना ही काकतीयों/चालिक्यों के शासित क्षेत्र का नाम बस्तर कर देता है? यह भी एक प्रबल संभावना है। बस्तर दशहरा की प्रसिद्ध रथयात्रा व कृष्ण-बलराम-सुभद्रा पूजन जैसी अन्य परम्परायें भी उनकी ही देन हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पुरुषोत्तम देव अपने साथ पुरी से अनेक ब्राम्हण, पंड़ा, शिक्षाशास्त्री तथा सबरा जाति के लोगों को ले कर लौटे थे जो बस्तर में ही बस गये। इतना ही नहीं राजा पुरुषोत्तमदेव की जगन्नाथपुरी यात्रा में उनके साथ बस्तर से जो आदिवासी गये थे उन्हें लौट कर राजा ने भद्र कह कर संबोधित किया तब से ही वे आदिवासी और उनके वंशज भतरा कहलाने लगे। जनजातीय समाज में ये बड़ी घटनायें थी जिनपर किसी समाजशास्त्री ने विवेचना प्रस्तुत नहीं की है। यह आगमन किसी आक्रांता का नहीं था। ये लोग जो राजा के साथ आये थे अपने साथ बिलकुल ही भिन्न सामाजिक परिवेश की पहचान ले कर पहुँचे थे। वे अपने साथ पूजा-पाठ-कर्म-काण्ड-पोथी-पतरी थामे हुए बस्तर पहुचे थे तथा उन्हे सीधे राजाश्रय भी प्राप्त हो गया था। इस दृष्टि से जनसंख्या में भले ही यह एक बहुत ही छोटा समूह जुड़ा किंतु प्रभाव की दृष्टि से एक वृहत घटना माना जाना चाहिये। यदि केवल दशहरा के ही पूजा अनुष्ठानों को ध्यान दे देखा जाये तो इसमे आदिवासी परम्पराओं और ब्राम्हण परम्पराओं का जबरदस्त घालमेल है। यहाँ पुजारी भी हैं तो सिरहा भी है; यहाँ अनुष्ठान हैं तो बलि भी है; यहाँ दंतेश्वरी और मावली माता हैं तो काछनदेवी भी है। एक आदिवासी समाज को भद्र कहे जाने और फिर भतरा के रूप में उन्हें एक पहचान मिलने की घटना के भी अनेक समाजशास्त्रीय दृष्टि से विवेच्य दूरगामी परिणाम हुए। पुरुषोत्तमदेव का समय बस्तर के समाज में बदलाव का एक बड़ा पड़ाव है जिसकी विस्तृत विवेचना से बस्तरिया सामाजिक संगठन की अनेक परतें खोली जा सकती हैं। समाजशास्त्र को भी इतिहास मे झांकना होगा अगर बस्तर की अबूझियत को पढ़ने की कोई इच्छाशक्ति किसी में है।      
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Thursday, April 25, 2013

अन्नमदेव एक किंवदंतियाँ अनेक

दिनांक 23.04.2013 को सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित 

यह समझने की कोशिश करनी चाहिये कि अन्नमदेव की उस व्यापक युद्ध विजय का क्या रहस्य था जिसमे वे प्रत्येक चरण पर सफलता का ध्वज बुलन्द करते जा रहे थे। भोपालपट्टनम में इन्द्रावती तथा गोदावरी नदी के पावन संगम पर अपना युद्धाभियान आरंभ करने से पूर्व अन्नमदेव के द्वारा शिव पूजा किये जाने का उल्लेख प्राप्त होता है जिसके पश्चात उसका विजय अभियान चक्रकोट मे अंतिम रूप से छिन्दक नाग राजा हरिश्चंददेव को पराजित किये जाने तक जारी रहता है। इतने शांतिपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का उदाहरण भारतीय इतिहास में तलाश करने से भी नहीं मिलेगा जहाँ धीरे धीरे आक्रांता ही प्रजाप्रिय होता गया और छ: सौ सालों से शासक रहे नाग सत्ताच्युत हो कर स्थानीय जनजातियों के भीतर ही अपने अस्तित्व को घुला बैठे। अन्नमदेव के पास वारंगल जैसे बडे राज्य के अधिपति का भाई होने के कारण वृहद प्रशासकीय अनुभव होना स्वाभाविक था जिसका कि लम्बे समय से विकेन्द्रित होते जा रहे छिन्दक नागों में अभाव होने लगा था। अन्नमदेव पतन देख कर आ रहे थे अत: पतनोमुख नागों की मनोवृति तथा अनेकता के दुष्परिणामों से भी वे वाकिफ थे।

क्या आरंभ से ही उन्होंने बस्तर की आत्मा को समझने का प्रयास किया था? देखा जाये तो एक केन्द्रीय सत्ता की स्थापना 1324 ई के लगभग हो जाती है लेकिन नाग शासकों द्वारा चले आ रहे सामंतवादी ढाँचे से आरंभ में बहुत ही कम छेड छाड की गयी। बस्तर राज वंशावली (अप्रकाशित; रिकॉर्ड रूम जगदलपुर; लोकनाथ ठाकुर 1853) के अनुसार अन्नमदेव के वे अस्त्र-शस्त्र दिव्य थे जिससे उसने बस्तर राज्य पर विजय पायी तथा राजा को दिल्लीश्वरी, भुवनेश्वरी, मणिकेश्वरी तथा दंतेश्वरी देवियों का आशीष प्राप्त था – “दिल्लीश्वरी श्री भुवनेश्वरी च, मणुक्यदेवी शुभदंतिकेश्वरी। बाणं त्रिशूलं त्वथ शक्तिखड़्गे, क्रमेण देव्या: प्रददुनृरपाय। युद्ध में पराजित होने वाले राजाओं के साथ कठोर व्यवहार का उल्लेख किसी इतिहासकार ने नहीं किया है अपितु सत्ता परिवर्तन के दौर में अधिकतम या तो स्वत: पलायन कर गये अथवा संधि के मार्ग पर चल निकले या कि आत्मसमर्पण कर दिया। अन्नमदेव नें व्यवस्था बनाने रखने के लिये स्थान स्थान पर तेलगा और हलबा जाति के सैनिकों की चौकियाँ स्थापित की एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों की जमीनदारी अपने विश्वासपात्रों को ही प्रदान की जैसे नाहर सिंह पामभोई को उन्होंने भोपालपट्टनम का जमीन्दार बनाया तो कुटरू की जमीन्दारी सामंत शाह को प्रदान की। एसे कुछ उदाहरणों के अतिरिक्त अन्नमदेव नें स्थानीयता का बेहद गहरे जा कर सम्मान किया तथा यहाँ की परम्पराओं के भीतर ही स्वयं को प्रतिस्थापित करने की कोशिश की। यही कारण है कि उनकी प्रसंशा में जो कुछ अतीत में लिखा जाता रहा वह उन्हें अद्भुत सिद्ध करता है।

स्वयं को सर्व-मान्य बनाने के लिये अन्नमदेव नें न केवल जनजातीय संतुलन को ध्यान में रखा अपितु अनेक धार्मिक मान्यताओं को राजकीय बना दिया। यह जानबूझ कर हुआ अथवा उनकी अविश्वसनीय विजय के फलस्वरूप हुआ किंतु वे स्वयं भी उन मिथकों का हिस्सा बन गये तो आज भी जनश्रुतियाँ है। वस्तुत: मणिकेश्वरी देवी तथा दंतेश्वरी देवी को ले कर इतिहासकारों में भ्रम की स्थिति आज भी है। डॉ. हीरालाल शुक्ल अपनी पुस्तक बस्तर के चालुक्य और गिरिजन में लिखते हैं कि कुछ लोगों का कहना है कि दंतेश्वरी की प्रतिमा दंतेवाड़ा में पहले से ही स्थापित थी तथा अन्नमदेव मणिकेश्वरी को वारंगल से ले कर आया था ( रसेल, 1908; दिब्रेट 1909)। स्मरणीय है कि नागवंशीय नरेशों की ईष्टदेवी भी मणिकेश्वरी थीं। एसा अनुमान किया जा सकता है कि कालांतर में मणिकेश्वरी देवी ही दंतेश्वरी नाम से परिणत हो गयीं।इसी बात को लाला जगदलुरी भाषा साम्यता से जोडते हुए आगे बढाते हैं। लाला जगदलपुरी लिखते हैं अन्नमदेव जब चक्रकोट की सीमा में प्रविष्ट हुए थे, तब उन दिनों छिन्दक नागवंशी राजाओं का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया था। अंतिम नागवंशी नदेश हरिश्चंद देव को अन्नमदेव ने पराजित किया और बीजापुर, भैरमगढ तथा बारसूर पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। थोडे समय तक बारसूर मे रह कर दंतेवाडा की ओर चल पड़े। दंतेवाड़ा में अन्नमदेव ने कुछ समय तक अपनी राजधानी चलाई। दंतेवाड़ा को उन दिनो तारलागुडा कहते थे। बारसूर की प्राचीन दंतेश्वरी गुडी को नागो के समय पेदाअम्मागुडी कहा करते थे। तेलुगू में बडी माँ को पेदाअम्मा कहा जाता है। तेलुगु भाषा नागवंशी नरेशों की मातृभाषा थी। वे दक्षिण भारतीय थे। बारसूर की पेदाअम्मागुडी से अन्नमदेव ने पेदाअम्मा को दंतेवाड़ा ले जा कर मंदिर में स्थापित कर दिया। तारलागुड़ा में जब देवी दन्तावला अपने मंदिर में स्थापित हो गयी तब तारलागुडा का नाम बदल कर दंतावाड़ा हो गया। उसे लोग दंतेवाडा भी कहने लगे” (बस्तर- लोक कला संस्कृति प्रसंग; लाला जगदलपुरी; 2003)

यद्यपि दंतेश्वरी देवी के मिथकों का अन्नमदेव के विजय अभियान के साथ जुडा होना एतिहासिक तथ्यों को किसी अंतिम निष्कर्श पर नहीं पहुँचने देता कि वास्तव में दंतेश्वरी देवी वारंगल से बस्तर लायी गयीं अथवा वे मणिकेश्वरी देवी का ही बदला हुआ स्वरूप है अथवा मे बस्तर में पहले से ही स्थापित रही कोई देवी हैं जिसे अन्नमदेव नें अपने विजय अभियान के साथ जोड कर स्वयं को इसी धरती का प्रतिनिधि बनाने की सफल कोशिश की। इस सम्बन्ध में एक ज्ञात विवरण है कि उस समय दंतेश्वरी माई नें उन्हें एक उत्तम वस्त्र दिया और आशीर्वाद दिया कि इस वस्त्र को पहनने से तू विजयी होगा।....इसी वस्त्र से मालूम होता है राज्य का नाम बस्तर पड़ा हो” (बस्तर भूषण, केदार नाथ ठाकुर; 1908)। इसी बात को अपने शब्दों में अंतिम काकतीय नरेश प्रवीर चन्द्र भंजदेव नें भी शब्द दिये हैं – “अन्नमदेव अपने बचपन में प्रतिदिन कागज में कुछ लिख कर देवी दंतेश्वरी को चढाते थे। देवी नें प्रसन्न हो कर उन्हें कोई वर माँगने को कहा। अन्नमदेव ने अपने पिता से पूछ कर देवी से राज्य की याचना की। देवी ने कहा राजा आगे आगे चले और देवी पीछे पीछे। राजा जहाँ तक पीछे मुड़ कर नहीं देखेगा, उसका राज्य वहाँ तक विस्तृत होगा। राजा आगे बढता गया किंतु पैरी नदी की रेत मे देवी के पैर धँस जाने पर पायल की आवाज़ रुक गयी। कौतूहलवश राजा ने पीछे मुड़ कर देख लिया (राजिम के निकट)। अत: राजा के राज्य की सीमा वहीं समाप्त हो गयी” (लौहण्डीगुड़ा तरंगिणी; प्रवीर चन्द्र भंजदेव; 1963)

वस्तुत: जनजीवन को उसकी नब्ज के साथ ही थामा जा सकता है इस दृष्टि से अन्नमदेव आक्रांता हो कर भी नायक बन गये। वारंगल से आ कर सत्ता स्थापित करने के बाद भी अन्नमदेव को आक्रांता की दृष्टि से कम और एक देवी-उपासक के रूप में अधिक देखा गया। उनकी विजय को स्वाभाविक मान लिया गया क्योंकि यही प्रचारित था कि विजय तो देवी की कृपा से प्राप्त हुई है तथा जहाँ जहाँ तक देवी के वस्त्र को फैलना अथवा बिना पीछे मुडे राजा को चलना था वहाँ तक स्वत: अन्नमदेव का अधिकार हो ही जाना था। जन श्रुतियों, जन परम्पराओं तथा लोक कथाओं का हिस्सा बनते बनते अन्नमदेव आसानी से एक जननायक बन गये जिसने बस्तर के इतिहास को एक नया आकार प्रदान किया। उपसंहार में एक लोकगीत (डॉ. हीरालाल शुक्ल की कृति बस्तर के चालुक्य और गिरिजन में संकलित) जिसका संबंध बस्तर के प्रथम काकतीय नरेश अन्नमदेव से है तथा जिसे आज भी दशहरा पर्व के अवसर पर सुना जा सकता है -

वरंगा हस्तना ले उतरै महाराज
मंधोता में डेरा लिहिन आज
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

आधा गढ, मंधोता, टीकागढ, डोंगर
छलेगढ, कोटपाड़, गुरुघर, माझीपाल
किलाघर बस्तर तुम्हार
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

गुड़ी दरबारा एबे बैठे महाराज
रंगीन के माहला लागै
आज होरे दरबार लागै
आज हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

नेगी असा बैठे, जोगी असा बैठे
बैठे सैदार बैदार वहाँ
बैठे नेगी कपडदार
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

यह गीत केवल अन्नमदेव के विजय की ही गाथा प्रस्तुत नहीं करता अपितु बाद में स्थापित राजकीय व्यवस्था और सामाजिक ताने बाने को अपने साथ जोडने की अन्नमदेव की वृत्ति को भी अपनी अंतिम पंक्तियों में प्रस्तुत करता है। किंवदंतिया केवल पढ कर भूल जाने के लिये नहीं होती अपितु अन्नमदेव के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि इनका प्रयोग किसी राजनीति को भी सफल कर सकता है, कोई इतना गहरे जुडे तो।

Thursday, April 11, 2013

वीरांगना चमेली बावी: एक अविस्मरणीय समर गाथा

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 9.04.2013 को प्रकाशित

रात बहुत हो चुकी थी लेकिन अन्नमदेव अभी सोये नहीं थे। उनकी आँखों के आगे रह रह कर उस वीरांगना की छवि उभर रही थी जिसनें आज के युद्ध का स्वयं नेतृत्व किया। नीले रंग का उत्तरीयांचल पहने हुए वह वीरांगना शरीर पर सभी युद्ध-आभूषण कसे हुए थी जिसमें भारी भरकम कवच एवं वह लौह मुकुट भी सम्मिलित था जिसमें शत्रु के तलवारों के प्रहार से बचने के लिये लोहे की ही अनेकों कडिया कंधे तक झूल रही थीं। वीरांगना नें अपने केश खुले छोड दिये थे तथा उसकी प्रत्येक हुंकार दर्शा रही थी जैसे साक्षात महाकाली ही युद्ध के मैदान में आज उपस्थित हुई हैं। अन्नमदेव हतप्रभ थे; वे तो आज ही अपनी विजय तय मान कर चल रहे थे फिर यह कैसा सुन्दर व्यवधान? उन्हें बताया गया था कि यह राजकन्या चमेली बावी है जो नाग राजा हरीश्चंद देव की पुत्री है। अन्नमदेव पुन: उस दृश्य को आँखों के आगे सजीव करने लगे जब युद्धक्षेत्र में राजकुमारी चमेली बावी अपनी दो अन्य सहयोगिनियों झालरमती नायकीन तथा घोघिया नायिका के साथ काकतीय सेना पर टूट पडी थीं। इतना सुव्यवस्थित युद्ध संचालन कि अपनी विजय को तय मान चुकी सेना घंटे भर के संघर्ष में ही तितर-बितर हो गयी और स्वयं अन्नमदेव पराजित तथा सैनिक सहायता के लिये प्रतीक्षारत तम्बू में ठहरे हुए यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बारसूर और किलेपाल से उनके सरदार अपनी अपनी सैन्य टुकडियों के साथ पहुँचे और पुन: एक जबरदस्त हमला चक्रकोटय के अंतिम नाग दुर्ग पर किया जा सके।

अगले दिन की सुबह का समय और विचित्र स्थिति थी। आक्रांता सेना अपने तम्बुओं में सिमटी हुई थी जबकि वीरांगना चमेली बावी अपने शस्त्र चमकाते हुए अपनी सेना के साथ आर या पार के संघर्ष के लिये आतुर दिख रही थी। वह अन्नमदेव जिसने अब तक गोदावरी से महानदी तक का अधिकांश भाग जीत लिया था एक वृक्ष की आड से मंत्रमुग्ध इस राजकन्या को देख रहा था। चक्रकोट्य में आश्चर्य की स्थिति निर्मित हो गयी चूंकि इस तरह काकतीय पलायन कर जायेगे सोचा नहीं जा सकता था। तभी एक घुडसवार सफेद ध्वज बुलंद किये तेजी से आता दिखाई दिया। उसे किले के मुख्यद्वार पर ही रोक लिया गया। यह दूत था जो कि अन्नमदेव के एक पत्र के साथ राजा हरिश्चन्द देव से मिलना चाहता था। राजा घायल थे अत: दूत को उनके विश्रामकक्ष में ही उपस्थित किया गया। चूंकि सेना का नेतृत्व स्वयं चमेली बावी कर रही थी अत: वे भी अपनी सहायिकाओं के साथ महल के भीतर आ गयी।

बाहर अन्नमदेव के दिन की धड़कने बढी हुई थीं। वे प्रेम-पाश में बँध गये थे। सारी रात हाँथ में तलवार चमकाती हुई चमेली बावी का वह आक्रामक-मोहक स्वरूप सामने आता रहा और वे बेचैन हो उठते। यह युवति ही उनकी नायिका होने के योग्य है....। केवल रूप ही क्यों वीरता एसी अप्रतिम कि जिस ओर तलवार लिये उनका अश्व बढ जाता मानो रक्त की होली खेली जा रही होती। राजकुमारी चमेली नें कई बार अन्नमदेव की ओर बढने का प्रयास भी किया था किंतु काकतीय सरदारों नें इसे विफल बना दिया। तथापि एक अवसर पर वे अन्नमदेव के अत्यधिक निकट पहुँच गयी थी। अन्नमदेव नें तलवार का वार रोकते हुए वीरांगना की आँखों में प्रसंशा भाव से क्या देखा कि बस उसी के हो कर रह गये। काजल लगी हुई जो बडी-बडी आखें आग्नेय हो गयी थीं वे अब बहुत देर तक अपलक ही रह गये अन्नमदेव की आखों का स्वप्न बन गयी थी।

महाराज! दूत आने की आज्ञा चाहता है।द्वारपाल नें तेलुगू में तेज स्वर से उद्घोषणा की। अन्नमदेव के शिविर से दूत को भीतर भेजने का ध्वनि संकेत दिया गया। अन्नमदेव आश्वस्त थे कि वे जो चाहते हैं वही होगा। हरिश्चंददेव के अधिकार मे केवल गढिया, धाराउर, करेकोट और गढचन्देला के इलाके ही रह गये थे; यह अवश्य था कि भ्रामरकोट मण्डल के जिनमें मरदापाल, मंधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजगढ, भेजरीपदर आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं; से कई पराजित नाग सरदार अपनी शेष सन्य क्षमताओं के साथ हरीश्चंद देव से मिल गये थे तथापि अब बराबरी की क्षमताओं का युद्ध नहीं रह गया था।

क्यों मौन हो पत्रवाहक?” अन्नमदेव नें बेचैनी से कहा। वे अपने मन का उत्तर सुनना चाहते थे आखिर प्रस्ताव ही मनमोहक बना कर भेजा गया था। हरिश्चंददेव से संधि की आकांक्षा के साथ अन्नमदेव नें कहलवाया था कि बस्तर राज्य की सीमा चक्रकोट से पहले ही समाप्त हो जायेगी तथा आपको काकतीय शासकों की ओर से हमेशा अभय प्राप्त होगा। चक्रकोट पर हुए किसी भी आक्रमण की स्थिति में भी आपको बस्तर राज्य से सहायता प्रदान की जायेगी.....राजा हरिश्चंददेव के साथ संधि की केवल एक शर्त है कि वे अपनी पुत्री राजकुमारी चमेली बावी का विवाह हमारे साथ करने के लिये सहमत हो जायें

क्या कहा राजा हरिश्चंद नें?” अन्नमदेव नें इस बार स्वर को उँचा कर बेचैन होते हुए पूछा।
जी राजा नें कहा कि अपनी बेटी के बदले उन्हें किसी राज्य की या जीवन की कामना नहीं है। पत्रवाहक नें दबे स्वर में कहा।

और कोई विशेष बात?” अन्नमदेव आवाक थे।

जी राजकुमारी नें अभद्रता का व्यवहार किया।

क्या कहा उन्होंने?”

“.....उन्होंने कहा कि स्त्री को संधि की वस्तु समझने वाले अन्नमदेव का विवाह प्रस्ताव मैं ठुकराती हूँ

ओहअन्नमदेव के केवल इतना ही कहा और मौन हो गये। यह तो एक कपोत का बाज को ललकारने भरा स्वर था; नागराजा का इतना दुस्साहस कि जली हुई रस्सी के बल पर अकड रहा है? “....और यह राजकुमारी स्वयं को आखिर क्या समझती हैं? अब आक्रमण होगा। विजय के चिन्ह स्वरूप बलात हरण किया जायेगा और मैं उस मृगनयनी-खड़्गधारिणी से विवाह करूंगा। अन्नमदेव की भँवे तनने लगीं थी।

सुबह होते ही युद्ध की दुंदुभि बजने लगी। दोनों ओर की सेनायें सुसजित खडी थीं। हरिश्चंददेव घायल होने के बाद भी अपने हाथी पर बैठ कर धनुष थामे अपने साथियों सैनिको का उत्साह बढा रहे थे। चमेली बावी नें सीधे उस सैन्यदल पर धावा बोलने का निश्चिय किया था किस ओर आक्रांता अन्नमदेव होंगे। यद्यपि आक्रांताओं नें भी भीषण तैयारी कर रखी थी। हरिश्चंद देव की कुल सैन्य क्षमता से कई गुना अधिक सैनिकों नें बारसूर, किलापाल और करंजकोट की ओर से चक्रकोट्य को चेर लिया था। भीषण संग्राम हुआ; नाग आहूतियाँ देते रहे और अन्नमदेव बेचैनी के साथ युद्ध के परिणाम तक पहुँचने की प्रतीक्षा करता रहा। आज कई बार आमने सामने के युद्ध में चमेली बावी नें उसे अपने तलवार चालन कौशल का परिचय दिया था। एसी प्रत्येक घटना अन्नमदेव के भीतर राजकुमारी चमेली के प्रति उसकी आसक्ति को बलवति करती जा रही थी। नहीं; अब युद्ध अधिक नहीं खीचा जाना चाहिये....अन्नमदेव अचूक धनुर्धर थे। धनुष मँगवाया गया तथा अब उन्होंने हरिश्चंददेव को निशाना बनाना आरंभ कर दिया। वाणों के आदान-प्रदान का दौर कुछ देर चला। तभी एक प्राणघातक वाण हरिश्चंद देव की छाती में आ धँसा। अन्नमदेव नें अब कि उस महावत को भी निशाना बनाया जो हरिश्चंद देव का हाथी युद्ध भूमि से लौटाने की कोशिश कर रहा था। नाग सेनाओं में हताशा और भगदड मच गयी। राजकुमारी नें स्थिति का अवलोकन किया और उन्हें पीछे हट कर नयी रणनीति बनाने के लिये बाध्य होना पड़ा। आनन फानन में राजकुमारी चमेली का तिलक कर उन्हें चक्रकोटय जी शासिका घोषित कर दिया गया यद्यपि इस समय केवल गिनती के सैनिक ही जयघोष करने के लिये शेष रह गये थे। बाहर युद्ध जारी था तथा अनेको वीर नाग सरदार अपनी नयी रानी तक अन्नमदेव की पहुँच को असंभव किये हुए थे। अपनी मनोकामना की पूर्ति में इस विलम्ब से कुपित अन्नमदेव नाग नें नाग सरदारो के पीछे अपने सैनिकों के कई कई जत्थे छोड़ दिये। भगदड मच गयी और अनेक सरदार व नाग सैनिक अबूझमाड़ की ओर खदेड दिये गये।

अब अन्नमदेव की विजयश्री का क्षण था। पत्थर निर्मित किले की पहले ही ढहा दी गयी दीवार से भीतर वे सज-धज कर तथा हाथी में बैठ कर प्रविष्ठ हुए। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। नगरवासी मौन आँखों से अपने नये शासक को देख रहे थे। सैनिक तेजी से आगे बढते हुए एक एक भवन और प्रतिष्ठान पर कब्जा करते जा रहे थे। राजकुमारी को गिरफ्तार कर प्रस्तुत करने के लिये एक दल को आगे भेजा गया था। अन्नमदेव चाहते थे कि राजकन्या का दर्पदमन किया जाये और तब वे उसके साथ सबके सम्मुख इसी समय विवाह करें।

क्या हुआ सामंत शाह, लौट आये?...कहाँ हैं राजकुमारी चमेली?”

“.....”

सबको साँप क्यों सूंघ गया है?क्या हुआ?” अन्नमदेव नें अपने सरदार सामंत शाह और उसके साथी सैनिकों के चेहरे के मनोभावों को पढने की कोशिश करते हुए कहा। 

“...जौहर राजा साहब। राजकुमारी अपनी दोनो मुख्य सहेलियों झालरमती और घोगिया के साथ मेरे सामने ही आग में कूद पडी और अपने प्राण दे दिये

तो तुमने बचाने की कोशिश नहीं की.....।बेचैनी में शब्दों नें अन्नमदेव का साथ छोड दिया था।

“...राजकुमारी आग में प्रवेश करने से पहले शांत थी, वे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने मुझे सम्बोधित किया और कहा कि मैं जा कर अपने राजा से कह दूं कि आक्रमणकारी बल से किसी की जमीन तो हथिया सकते हैं लेकिन मन और प्रेम हथियारों से हासिल नहीं होते....।

हाथी अब उस ओर मोड दिया गया जिस ओर से धुँआ उठ रहा था। राजा की नम आँखे कोई नहीं देख सका। एसी पराजय की कल्पना भी अन्नमदेव ने नहीं की थी।

रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं, मना लो माँ दंतेश्वरी

आलेख दिनांक 2.04.2013 को सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित

कांकेर से कुछ ही दूर छोटा सा ग्रामीण परिवेश है सिदेसर। नाम से स्पष्ट है कि सिद्धेश्वर का नाम कालांतर में बदल कर सिदेसर हो गया है। यहाँ ग्रामीणों की सहायता से मैं और भाई कमल शुक्ला प्राचीन शिव मंदिर के अवलोकनार्थ पहुँचे थे। इस स्थल से आगे बढते हुए हम एक अन्य गाँव रिसेवाडा पहुँचे। रिसेवाडा नाम के भी दो भाग है जो रिस अर्थात क्रोध तथा वाडा अर्थात ग्राम का अर्थ बोधक है। जैसे ही हम वाडा की बात करते हैं हमें नाग युगीन प्रशासनिक व्यवस्था का अवलोकन करना आवश्यक हो जाता है जहाँ उनकी सम्पूर्ण शासित भूमि राष्ट्र अथवा देश कोट (राज्य) कहलाती थी। कोट के प्रशासनिक विभाजन थे नाडु (संभाग) तथा नाडु के वाडि (जिला)। वाडि के अंतर्गत नागरिक बसाहट के आधार पर महानगर, पुर तथा ग्राम हुआ करते थे। यदि हम केवल ग्रामीण व्यवस्था को ही बारीकी से समझने की कोशिश करें तो उसके भी दो प्रमुख प्रकार थे वाड़ा तथा नाड़ुया (नार)। समझने की दृष्टि से वाडा तथा नार का प्रमुख अंतर बसाहट के तरीकों में अंतर्निहित था। एसे सुनियोजित गाँव जहाँ घर पंक्तिबद्ध रूप में अवस्थित हों उन्हें वाडाकहा जाता था जबकि अव्यवस्थित बसाहट वाले गाँव नाग युग में नारकहलाते थे। बस्तर के नगरों गाँवों में कई गमावाडा अथवा नकुलनार जैसे नाम आज भी नागयुगीन प्रशासनिक व्यवस्था की स्मृतियाँ हैं। इसी प्रकाश में पुन: बात रिसेवाडा की।

रिसेवाडा निश्चित ही एक समय में सुनियोजित रूप से बसा ग्रामीण क्षेत्र रहा होगा जिसके बहुत ही निकट सिद्धेश्वर मंदिर की अपनी ख्याति रही होगी। सिद्धेश्वर मंदिर के पास से हमें एक बडा सा थानप्राप्त हुआ है जिसका आकार ही बताता है कि इससे बडी मात्रा में औषधि का निर्माण होता रहा होगा। यह पूरा क्षेत्र कई प्रकार की औषधि पादपों से पटा पडा है। पूरे रास्ते हमारे मार्गदर्शक ग्रामीण नें कई तरह के औषधि पादपों से हमारा परिचय भी कराया। मैं इन कडियों को जोड़ता हूँ तो लगता है कि इस प्राचीन सिद्ध क्षेत्र का महत्व ही पीडितों की व्याधि हरने के कारण रहा होगा तथा यहाँ न केवल धार्मिक कर्मकाण्ड, तांत्रिक विधियाँ ही पूरी जी जाती रही हैं जैसा कि सिद्धेश्वर मंदिर के सम्मुख माँ काली की प्रतिमा, भरवी की युद्ध मुद्रा में प्रतिमा आदि से ज्ञात होता है साथ ही यहाँ एक प्राचीन औषधालय भी रहा निश्चित रूप से रहा होगा। रिसेवाडा अब एक उपेक्षित गाँव है। सारे रास्ते ग्रामीण भीतरी स्थलों के लिये सड़क की आवश्यकता पर चर्चा करते रहे। दूर दूर तक जंगल और मध्यवर्ती क्षेत्रों में खेतिहर भूमि की लम्बी कतारें इसके साथ ही चारो ओर खिले मुस्कुराते भांति भांति के जंगली फूल यहाँ तक उबड-खाबड रास्ते से पहुँचने की सारी थकान को रह रह कर हवा कर देते थे।

एक प्राकृतिक गुफा के निकट पहुँच कर ग्रामीण नें बताया कि यह रिसेदेवी का स्थान है। यह तो समझ में आ गया कि रिसेवाडा और रिसेदेवी का आपस में क्या संबंध है तथापि जिज्ञासा बढ गयी थी। एक पहाडी नुमा स्थान जिसमे एक विशाल पत्थर को प्रकृति नें इस तरह लिटा दिया है कि उसके नीचे गुफानुमा संरचना बन गयी है। ग्रामीण नें बताया कि भीतर रिसेदेवी का निवास है। वस्तुत: रिसे देवी दंतेवाड़ा में अवस्थित माँ दंतेश्वरी की छोटी बहन हैं। दोनो बहनों में किसी बात पर झगडा हो गया और छोती बहन रूठ कर यहाँ चली आयी हैं। इसी लिये देवी का नाम रिसेदेवी हो गया। मुझे जनजातीय समाज के एसे देवी देवता भावुक कर देते हैं जो बिलकुल हमारे जैसे हैं। हमारी तरह झगडते हैं, रूठते हैं, मनाते हैं। ये देवी देवता आसमान पर नहीं उडते बल्कि जमीन के हैं....जमीन से जुडे। रिसेदेवी की गुफा में प्रवेश करने के पश्चात मुझे वहाँ एक छोटी की पाषाण प्रतिमा....नहीं प्रतिमा नहीं कहूँगा क्योंकि किसी तरह का मानुषिक आकार मैं तलाश नहीं सका तथापि बहुत सारे तिलक भभूत से लिप्त इस प्रस्तराकृति को ही रिसेदेवी का प्रतीक माना गया होगा यही समझ सका। आसपास मिट्टी के घोडे, दीपक तथा अनेको कुम्हार निर्मित आकृतियाँ। किसी तरह का कोई ताम-झाम नहीं कोई पाखण्ड नहीं। एक अत्यंत मनोरम स्थल जहाँ पहुँच कर स्वत: आपके भीतर की प्रवित्रतम भावनायें उभर आयेंगी और स्वत: आपको अपूर्व शांति का अनुभव होगा। यहाँ चमक दमक नहीं है, यहाँ पुजारी पंडे नहीं हैं, यहाँ कोई भव्य इमारत या चमचमाती प्रतिमा नहीं है। यहाँ महसूस होता है इतिहास; यहाँ महसूस होता है अपना पिछडा जा रहा वर्तमान और यहाँ मुझमे एक कोमल अनुभूति भी प्रार्थना कर उठती है कि रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं मना लो माँ दंतेश्वरी।

Wednesday, April 03, 2013

अन्नमदेव की बस्तर विजय।



व्यवस्था परिवर्तन कभी भी अ-कारण नहीं होता। शासक और शासित के बीच दूरियाँ जितनी बढती जाती हैं असंतोष का लावा मार्ग बनाने लगता है। एसे में कभी जनता ही आक्रामक हो उठती है तो कभी आक्रांता बेधड़क चला आता है और उसका कोई प्रतिवाद नहीं होता। छिंदक नाग शासकों नें प्राचीन बस्तर क्षेत्र पर लगभग 564 वर्ष (760 – 1324 ई. तक) तक शासन किया और उनकी अनेक उपलब्धियाँ रहीं जिससे इनकार नहीं किया जा सकता; तथापि धीरे धीरे केन्द्रीय शक्ति के अभाव में यह पूरा क्षेत्र अनेक नाग-शासकों/सरदारो व शक्तिशाली सामंतो नें हथिया लिया। प्रभाव क्षेत्र पाँच या दस कोस लेकिन उपाधि राजा। कुछ मजबूत गढ अवश्य थे किंतु आपसी लडाईयों के कारण उन्हें अब सुरक्षित नहीं कहा जा सकता था। अन्नमदेव का बस्तर प्रवेश परिस्थितिजन्य था न कि योजनाबद्ध। मुट्ठी भर सामंतो और गिनती के सैनिकों के साथ वारंगल से पलायन करने वाला एक सरदार एक वृहत जानजातीय आबादी वाले एसे भूभाग को बडी ही सहजता से अधिकृत कर लेता है जहाँ की प्रजा ही विद्रोही प्रवृत्ति की मानी जाती हो तो विषद विवेचना आवश्यक है। चक्रकोटय (प्राचीन बस्तर) में अनुकूल परिस्थितियाँ थीं; यह क्षेत्र नाग राजाओं और उनके सामंतो की आपसी लड़ाईयों से टूट चुका था। इतिहासकार नर्मदाप्रसाद श्रीवास्तव अपने एक आलेख में विवेचना करते हुए लिखते हैं कि नाग - एक एक गाँव, बगीचा या तालाब के लिये लड़ मरने वाले पंच कोसीराजा रह गये थे। प्रजा इनके आपसी विवादों से त्रस्त थी। वस्तुत: एसे में आम जन की साँप छुछुन्दर वाली गति हो जाती थी....किस सामंत का साथ दें और किसका न दें। यही हालात अन्नदेव के लिये लाभकारी हुए। स्थानीय ही उनके सहायक और मुखबिर बनते गये।

बस्तर पर कार्य करने वाले आरंभिक सभी इतिहासकारों नें अन्नमदेव तथा उसके वंशजों को काकतीयवर्गीकृत किया है जिनमे जेकिंसन (1827), इलियट (1856), टेम्पल (1862), ग्लसफर्ड (1862), रसेल (1908), दि ब्रेट (1909), ग्रिग्सन (1938) तथा एल्विन (1947) आदि प्रमुख हैं। यहाँ तक कि राजवंश के अंतिम शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव (1936-1947 ई.) भी राजवंशावली को काकतीयही निरूपित करते हैं जबकि डॉ. हीरालाल शुक्ल सहित अनेक इतिहासकारों नें नयी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसके आधार पर बस्तर पर 1324 ई. से शासन करने वाले राजपरिवार को चालुक्यमाना गया है। चालुक्य मानने के पीछे के तथ्य वारंगल से प्राप्त होते हैं। वारंगल के काकतीय राजा गणपति (1199-1261 ई.) की दो पुत्रियाँ थीं रुद्राम्बा और गणपाम्बा। उनके देहावसान के बाद उनकी बड़ी पुत्री रुद्राम्बा ने सत्ता संभाली। चालुक्य राजा वीरभद्रेश्वर से महारानी रुद्राम्बा का विवाह हुआ था। इस दम्पत्ति को कोई पुत्र नहीं था। उनकी एक मात्र संतति थी - पुत्री मम्मड़म्बा। राजकुमारी मम्मड़म्बा को विवाह के पश्चात दो पुत्र हुए - प्रतापरुद्र तथा अन्नमदेव। [यही विवाह सम्बन्ध इतिहासकारों को चालुक्य वंश के साथ अंतर्सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा देता है। इस विवाद में न पडते हुए प्रचलित मान्यता काकतीयको ही प्रस्तुत आलेख में लिया गया है।] तकनीकी रूप से तथा पितृसत्तात्मक समाज की व्याख्याओं के अनुरूत यह सत्य स्थापित होता है कि चालुक्य राजा से विवाह के पश्चात महारानी रुद्राम्बा का पिता की वंशावलि पर अधिकार समाप्त हो गया। तथापि भावनात्मक रूप से अथवा स्त्री अधिकारों पर विमर्श के तौर पर मुझे यह तथ्य रुचिकर प्रतीत होता है कि काकतीय वंशावली के रूप में यह राजवंश अधिक प्रमुखता से जाना गया है। यहाँ तक कि महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921 - 1936 ई.) जिनका विवाह भंज वंश से जुडे राजकुमार से किया गया था; तत्पश्चात के सभी वंशजों नें अपने नाम के साथ भंज अवश्य जोडा किंतु अंतिम महाराजा प्रवीर स्वयं को प्रवीर चंद्र भंजदेव काकतीयकहलाना ही पसंद करते थे। यह परम्परा मुझे स्तुत्य, महत्वपूर्ण तथा एक अनुकरणीय उदाहरण प्रतीत होती है। वंशावलियाँ और रक्तशुद्धतायें महज प्रतीक है तथा यह एक आवरण है जो पृथक्करण करता है। यहाँ वह कहावत उचित प्रतीत होती है कि नाम में क्या रखा है?’ साथ ही यह भी कि पिता और माता यदि सत्तायें न हो कर समान अधिकारी होते तो वंशावलियों पर पाथापच्चियों की आवश्यकता नहीं रही होती। अगर दत्तकपुत्र वंश परम्पराओं को जीवित रखते थे तो पुत्रियों के शासन से विभाजक रेखायें क्यों खींची जाये? अत: यह इतिहासकारों की बहस का विषय होगा कि प्रतापरुद्र एवं अन्नमदेव काकतीय थे अथवा चालुक्य; एक लेखक के तौर पर मुझे काकतीय ही इस राजवंश की अधिक सटीक पहचान लगती है। प्रतापरुद्र (1290 – 1324 ई.) ने दक्षिण के बड़े क्षेत्र को अपने आक्रामक सैन्य अभियान से वारंगल का हिस्सा बना लिया था। इन दिनों मुसलमान आक्रांताओं की गिद्धदृष्टि समृद्ध दक्षिण भारत पर थी। वारंगल पर लगातार हो रहे हमलों के बीच प्रतापरुद्र के छोटे भाई अन्नमदेव नें चक्रकोट्य का रुख किया जहाँ बिखरा हुआ नाग राजवंश आखिरी साँसे ले रहा था।

अन्नमदेव जब बस्तर की ओर बढ रहे होंगे तो बहुत सा मंथन उनका विमर्श बना होगा। अब तक वे दक्षिण भारत के उस राजवंश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो समृद्ध था, शक्तिशाली था और इसी कारण से तुगलकों नें उन्हें रौंद दिया। हाथियों, घोड़ों व ऊंटों पर लाद कर वारंगल का खजाना दिल्ली ले जाया गया। कहते हैं कोहिनूर हीरा इसी लूट का हिस्सा था जिसे नुमाईश के बाद सुलतान को भेट किया गया। एक धनी राज्य क्या सुरक्षित नहीं हैं? इस दौर में प्रत्येक धनाड्य व शक्तिशाली साम्राज्यों पर मुसलमान आक्रांताओं की दृष्टि थी तथा अन्नम देव के बड़े भाई प्रतापरुद्र की सत्ता का वारंगल में पतन इन्ही कारणों से हुआ था। इतिहासकार नर्मदा प्रसाद श्रीवास्तव नें नाग-काकतीय संघर्ष की जो बानगी अपने आलेखों के द्वारा प्रस्तुत की है उससे बेहतर विवरण इस सम्बन्ध में किसी इतिहासकार नें प्रस्तुत नहीं किया है। उनके आलेखों (बस्तर एक अध्ययन; 1992) के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अपनी बिखरी हुई शक्ति का संचय कर अन्नमदेव नें लगभग 1330 ई. के आसपास गोदावरी एवं इन्द्रावती नदियों के संगम पर भद्रकाली के निकट अपना पड़ाव डाला।

अन्नमदेव का विजय अभियान भोपालपट्टनम से आरंभ हुआ। अन-अपेक्षित आक्रमण से घबरा कर भोपालपट्टनम का राजा बिना लडे ही पलायन कर गया। नाहरसिंह पामभोई को अन्नमदेव नें यहाँ का सामंत नियुक्त किया तथा यहाँ से वे बीजापुर की ओर बढ गये; थोडे से ही संघर्ष के बाद यह क्षेत्र भी हथिया लिया गया। ठीक इसी समय अन्नमदेव के एक अन्य वफादार सामंत सन्यासी शाह नें महाराष्ट्र के अहेरी-सूरजगढ की ओर से चक्रकोटय के पश्चिमी भाग पर आक्रमण किया तथा कांडला पर्ती के नाग राजा को पराजित कर उसने पासेबाड़ा, फरसेगढ, गुदमा, तोयनार आदि गढ हथिया लिये। इसी सम्बन्ध में अतीत से एक रोचक कथा का उल्लेख प्राप्त होता है। संयासी शाह नें कांडला पर्ती के स्थान पर कुटरू को अपनी राजधानी के तौर पर चुना। कहते हैं कि विजयोपरांत वह एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था और वहाँ निरंतर किसी पक्षी का मोहक स्वर कुट-कुट-कुटरसुनाई पड़ रहा था। इस ध्वनि से संयासी शाह इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने विजित राज्य का नाम ही कुटरू रख दिया। संयासी शाह नें इन विजित क्षेत्रों को अन्नमदेव को समर्पित कर दिया। कहते हैं कि वारंगल में तुलगकों से मिली पराजय से हताश सामंत एक एक कर अन्नम देव से अपने सैनिकों-संसाधनो सहित इसी प्रकार मिलते रहे जिससे उनका विजय अभियान सफलताओं के साथ संचालित होता रहे। एसे ही कुछ सामंतो नें चेरला की ओर से बीजापुर तथा निकटवर्ती क्षेत्रों कोतापल्ली, पामेड़, फोतकेल तथा गंगालूरपर अधिकार कर ये इलाके नाग राजाओं से हथिया लिये और इन्हें अपने नेता अन्नमदेव को समर्पित कर दिया। कोतापल्ली और पामेड़ में गोंड जाति के सामंत तथा फोतकेल में राउत जाति का सामंत नियुक्त कर प्रशासन को जनजातिगत प्रतिनिधित्व देने और किसी भी स्थिति मे जन-असंतोष न पनपने देने की वृत्ति सम्मिलित थी। दंतेवाडा के भी नाग राजाओं नें अल्पकालिक प्रतिरोध के पश्चात अन्नमदेव को अपना राजा मान लिया। इसके साथ ही गढमिरी कटेकल्याण तथा किलेपाल पर अधिकार हो गया। वहाँ के नाग शासकों को ही सामंत घोषित कर दिया गया। अन्नमदेव नें इन क्षेत्रों से पुन: किसी युद्ध की संभावना को टालने के लिये तेलंगा और हलबा जाति के सैनिक नियुक्त किये थे। यहाँ से विजय अभियान हमीरगढ पहुँचा; इस समय तक अन्नमदेव एक बडे क्षेत्र के शासित तथा समुचित रूप से शक्तिशाली हो गये थे। मौके की नज़ाकत को समझते हुए हमीरगढ के राजा रामचन्द्र देव नें तीरथगढ, चन्द्ररगिरि, मुण्डागढ, छिंदगढ तथा सुकमा के अपने मित्र राजाओं के साथ मिल कर अन्नमदेव का स्वागत किया व उनकी आधीनता स्वीकार कर ली। एसी स्थिति में किसी तरह की नयी व्यवस्था को थोपने की आवश्यकता नहीं रह गयी थी; तथापि अपने एक सम्बन्धी को सुकमा का सामंत नियुक्त कर सभी गढ यथावत रहने दिये गये। स्थान स्थान पर प्रबंधन को कसने की दृष्टि से इन क्षेत्रों में धुरवा जाति के सैनिकों की चौकियाँ स्थापित की गयीं। केशलूर के अंतर्गत एर्राकोट, पाराकोट, मठकोट, रैकोट और मुरुमगढ आते थे जिनपर अधिकार करने के लिये किसी युद्ध की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। माडपाडगढ तथा बागराउडगढ विजय अभियान के अगले हिस्से थे जिनपर अधिकार कर उन्हें कोरामी जाति के सरदारों को सौंप दिया गया। कोटपाड़ (वर्तमान ओडिशा में सम्मिलित) इलाके के लिये सैन्य अभियान चलाया गया तथा वहाँ के राजा विक्रमदेव को ही पराजय स्वीकार करने के पश्चात कुछ शर्तों के साथ सामंत का दर्जा दे दिया गया। छुटपुट संघर्ष तो पोड़ागढ, शालमीगढ, उमरकोट रायगढा में भी हुए किंतु अन्नमदेव के विजय अभियान को रोका जाना संभव नहीं हो सका था। अन्नमदेव के राज्य की उत्तरी सीमा पैरी नदी नें निर्धारित की इधर कांकेर के राजाओं से भी संधि हो गयी थी एवं उनसे अन्नमदेव को देव-डोंगरी परगना भेंट स्वरूप प्राप्त हुआ था। कांकेर से लगा दादरगढ इलाका भी बिना युद्ध के ही अन्नमदेव के राज्य विस्तार का हिस्सा बन गया। अब अन्नमदेव के लिये अपने अभियान को एक राज्य का स्वरूप देने का समय आ गया था। बडे-डोंगर को उन्होंने अपनी पहली राजधानी बनाया। यहाँ अन्नमदेव नें अपनी आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी का मंदिर बनवाया तथा राजधानी में 147 तालाब भी खुदवाये थे। इसी मंदिर के सम्मुख एक पत्थर पर बैठ कर अपना उन्होंने अपना विधिवत राजतिलक सम्पन्न करवाया। स्वाभाविक है कि इस समय उनके पास न राजमहल रहा होगा न ही सिंहासन। डोंगर के इसी पत्थर पर राजतिलक एक परम्परा बन गयी जिसका निर्वाह अंतिम शासक प्रवीर तक निरंतर होता रहा एवं इस प्रथा को पखनागादी कहा जाता था। अन्नमदेव के राज्य का नाम बस्तर प्रचलित हुआ।

राजतिलक के पश्चात भी अन्नमदेव का युद्धाभियान समाप्त नहीं हुआ था। उनकी शासन परिधि के भीतर अब भी अनेक नाग शासित क्षेत्र थे जिनमें से भ्रमरकोट तथा चक्रकोट शक्तिशाली सत्तायें थीं। भ्रमरकोट को हासिल करने में बड़ा युद्ध नहीं करना पडा अपितु शीघ्र ही इसके आधीन मरदापाल, मधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजनगर, भेजरीपदर, भ्रामरकोट आदि पर अन्नमदेव का अधिकार हो गया। गढिया, धाराउर, करेकोट, गढ-चंदेला आदि चक्रकोट के आधीन क्षेत्र थे जिन पर नाग राजा हरिश्चंद देव का शासन था। भीषण युद्ध हुआ और प्रथम चरण में अन्नमदेव को पीछे हटना पड गया। बारसूर तथा किलेपाल से सैनिक सहायता मँगा कर पुन: धावा बोला गया जिसमें हरिश्चंददेव वीरगति को प्राप्त हुए एवं इसके साथ ही अन्नमदेव का सैनिक अभियान पूरा हो सका। इस तरह काकतीय/चालुक्य शासित बस्तर राज्य 1324 में अस्तित्व में आया। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल के अनुसार (बस्तर के चालुक्य एवं गिरिजन, 2007) अन्नमदेव के राज्य में बारह जमींदारियाँ, अढ़तालीस गढ़, बारह मुकासा, बत्तीस चालकी और चौरासी परगने थे। जिन प्रमुख गढ़ों या किलों पर अधिकार कर बस्तर राज्य की स्थापना की गयी वो हैं - मांधोता, राजपुर, गढ़-बोदरा, करेकोट, गढ़-चन्देला, चितरकोट, धाराउर, गढ़िया, मुण्डागढ़, माड़पालगढ़, केसरपाल, राजनगर, चीतापुर, किलेपाल, केशलूर, पाराकोट, रेकोट, हमीरगढ़, तीरथगढ़, छिन्दगढ़, कटेकल्याण, गढ़मीरी, कुँआकोण्ड़ा, दंतेवाड़ा, बाल-सूर्य गढ़, भैरमगढ़, कुटरू, गंगालूर, कोटापल्ली, पामेंड, फोतकेल, भोपालपट्टनम, तारलागुड़ा, सुकमा, माकड़ी, उदयगढ़, चेरला, बंगरू, राकापल्ली, आलबाका, तारलागुड़ा, जगरगुण्ड़ा, उमरकोट, रायगड़ा, पोटगुड़ा, शालिनीगढ़, चुरचुंगागढ़, कोटपाड़.......।

सभी विवरणों को गंभीरता पूर्वक देखने पर यह महसूस होता है कि नाग युगीन बस्तर एक विभाजित सत्ताओं का केन्द्र था तथा आपसी मतभेद इतने अधिक व्यापक थे कि एक जुट हो कर आक्रांता से लडने का प्रयास ही नहीं किया गया। अन्नमदेव जिस दिशा में गये वहाँ की सत्ता जैसे झोली में आ गिरी। स्थानीय जनजातियों का भी कोई विरोध न होना यह स्पष्ट करता है कि शासक और जनता के बीच के संबंध मधुर नहीं थे। इसके साथ ही अन्नमदेव समझदारी के साथ अधिकृत क्षेत्रों पर वैसे सामंतो की ही नियुक्ति कर रहे थे जिनसे स्थानीय समर्थन बना रहे एवं युद्धकाल में नये मोर्चे न खुलें। यह वारंगल के शासकों का शासनानुभव था जिसके फलस्वरूप युद्ध और विजित क्षेत्रों में प्रशासन प्रबंधन साथ साथ किया जाता रहा। अन्नमदेव की दूरदर्शिता इस मायने में प्रसंशनीय कही जायेगी कि उन्होंने जहाँ तक संभव हुआ प्राचीन स्थापनाओं को मजबूत ही किया तथा स्थानीयता को उसी स्वरूप में मान्यता देने की कोशिश की। किसी क्रूर आक्रांता होने के स्थान पर वे सहिष्णु विजेता की छवि प्रस्तुत कर रहे थे तहाअधिकतम पुराने सामंतो अथवा जनजाति के सरदारों को ही प्रशासन में ओहदे प्रदान करते चल रहे थे। बस्तर का जो वर्तमान स्वरूप है उसे बहुत हद तक प्रशासन के नीचे आकार देने का श्रेय अन्नमदेव को ही जाता है।

प्रवीर चन्द्र भंजदेव - बस्तर का शापित नायक

दैनिक छत्तीसगढ में 26.03.2013 को प्रकाशित 



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सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में 26.03.2013 को प्रकाशित 


Tuesday, March 26, 2013

प्रवीरचन्द्र भंजदेव – बस्तर के आदिवासियो का शापित नायक



आज 23 मार्च को प्रवीर की सैंतालीसवी पुण्यतिथि है। इसी अवसर पर एक आलेख उनके जीवन संघर्ष पर केन्द्रित - 

रियासत काल के अंतिम शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव आधुनिक बस्तर को दिशा प्रदान करने वाले पहले युगपुरुषों में से एक हैं। महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी तथा प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव की द्वितीय संतान प्रवीरचन्द्र भंजदेव का जन्म शिलांग में 12.6.1929 को हुआ था। उनकी माता तथा बस्तर की महिला शासिका महारानी प्रफुलकुमारी देवी के असमय और रहस्यमय निधन के पश्चात लंदन में ही ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों ने अंत्येष्टि से पहले उनके छ: वर्षीय ज्येष्ठ पुत्र प्रवीरचन्द्र भंजदेव (19361947 ई.) का औपचारिक राजतिलक कर दिया। प्रवीर अट्ठारह वर्ष के हुए और जुलाई 1947 में उन्हें पूर्ण राज्याधिकार दे दिये गये। 15.12.1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में छत्तीसगढ़ की सभी चौदह रियासतों के शासकों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने के आग्रह के साथ आमंत्रित किया। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने अपनी रियासत के विलयन की स्वीकृति देते हुए स्टेटमेंट ऑफ सबसेशन पर हस्ताक्षर कर दिये। बस्तर रियासत को इसके साथ ही भारतीय संघ का हिस्सा बनाये जाने की स्वीकृति हो गयी। 15.08.1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तथा 1.01.1948 को बस्तर रियासत का भारतीय संघ में औपचारिक विलय हो गया। 9.01.1948 को यह क्षेत्र मध्यप्रांत में मिला लिया गया।

यह स्वाभाविक था कि सत्ता छिन जाने तथा महाराजा से प्रजा हो जाने की पीडा उनकी वृत्तियों से झांकती रही तथा इसकी खीझ वे एश्वर्य प्रदर्शनों, लोगों में पैसे बाटने जैसे कार्यों से निकालते भी रहे। तथापि उम्र के साथ आती परिपक्वता तथा राजनीति के थपेडों नें उन्हें एक संघर्षशील इंसान भी बनाया तथा धीरे धीरे वे अंचल में आदिम समाज के वास्तविक स्वर और प्रतिनिधि बन कर भी उभरे। उनके जनसंघर्षों की यदि बानगी देखी जाये तो यह समय शुरु होता है जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी थी। प्रवीर नें 1955 में “बस्तर जिला आदिवासी किसान मजदूर सेवा संघ” की स्थापना की थी। 1957 में प्रवीर बस्तर जिला काँग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए; आमचुनाव के बाद भारी मतो से विजयी हो कर विधानसभा भी पहुँचे। 1959 को प्रवीर ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। मालिक मकबूजा की लूट आधुनिक बस्तर में हुए सबसे बडे भ्रष्टाचारों में से एक है जिसकी बारीकियों को सबसे पहले उजागर तथा उसका विरोध भी प्रवीर ने ही किया था। 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप में प्रवीर धनपूँजी गाँव में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके तुरंत बाद फरवरी-1961 में “प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट” के तहत प्रवीर को गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से 12.02.1961 को प्रवीर के बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त कर दी गयी इसके साथ ही प्रवीर के छोटे भाई विजयचन्द्र भंजदेव को भूतपूर्व शासक होने के अधिकर दिये गये। इसके विरोध में लौहण्डीगुडा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा व्यापक प्रदर्शन किया गया था। जिला प्रशासन की जिद और प्रवीर पर हो रही ज्यादतियों का परिणाम 31.03.1961 का लौहंडीगुड़ा गोली काण्ड़ था, जहाँ बीस हजार की संख्या में उपस्थित विरोध कर रहे आदिवासियों पर निर्ममता से गोली चलाई गयी थी। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; ये कुछ नाम हैं जो लौहण्डीगुड़ा गोलीकाण्ड के शिकार बने।

फरवरी 1962 को कांकेर तथा बीजापुर को छोड पर सम्पूर्ण बस्तर में महाराजा पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे तथा यह तत्कालीन सरकार को प्रवीर का लोकतांत्रिक उत्तर था। 30 जुलाई 1963 को प्रवीर की सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स से मुक्त कर दी गयी। प्रवीर पर बहुधा बस्तर को नागालैंड बनाने तथा हिंसक प्रवृत्तियों को भडकाने के आरोप लगते रहे हैं तथापि गंभीर विवेचना करने पर ज्ञात होता है कि उनके अधिकतम आन्दोलन शांतिप्रिय तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परिधि में ही थे। 1964 ई. में प्रवीर ने पीपुल्स वेल्फेयर एसोशियेशन की स्थापना की। 12 जनवरी 1965 को प्रवीर ने बस्तर की समस्याओं को ले कर दिल्ली के शांतिवन में अनशन किया था। गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा द्वारा समस्याओं का निराकरण करने के आश्वासन के बाद ही प्रवीर ने अपना अनशन तोडा था। 6 नवम्बर 1965 को आदिवासी महिलाओं द्वारा कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया गया जहाँ उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके विरोध में प्रवीर, विजय भवन में धरने पर बैठ गये। 16 दिसम्बर 1965 को आयुक्त वीरभद्र ने जब उनकी माँगों को माने जाने का आश्वासन दिया तब जा कर यह अनशन टूट सका। 8 फरवरी 1966 को पुन: जबरन लेव्ही वसूलने की समस्या को ले कर प्रवीर द्वारा विजय भवन में अनशन किया गया। 12 मार्च 1966 को नारायणपुर इलाके में भुखमरी और इलाज की कमी को ले कर प्रवीर द्वारा पुन: अनशन किया गया। प्रवीर के आन्दोलन व्यवस्था के लिये प्रश्नचिन्ह बने हुए थे जिनका दमन करने के लिये आदिवासी और भूतपूर्व राजा के बीच के बंध को तोडना आवश्यक था।

इस बीच एक बडी घटना घट गयी। तारीख 18.03.66, शाम के साढे तीन बजे थे। चैत पूजा के लिये लकड़ी का बड़ा सा सिन्दूर-तिलक लगा हुआ लठ्ठा महल के भीतर ले जाया जा रहा था। कंकालिन गुड़ी के सामने परम्परानुसार इस स्तम्भ को लगाया जाना था। इस समय कहीं किसी तरह की अशांति नहीं और न ही कोई उत्तेजना। महिलाओं की संख्या चार सौ से अधिक होंगी; इस समूह में पुरुष भी थे, पूरी तरह नि:शस्त्र, जो संख्या में डेढ़ सौ से अधिक नहीं थे। महिलाओं में अधिकांश के वदन पर नीली साड़ी थी और पुरुषों के सिर नीली पगडियाँ; यह भूषा प्रवीर नें अपने समर्थकों को दी थी जिन्हें वे मेम्बर तथा मेम्ब्रीन कहते थे; इस समय इस समूह का प्रवीर से केवल इतना ही सम्बन्ध भर था। यह जुलूस महल के प्रमुख प्रवेश सिंह द्वार के निकट पहुँचा ही था कि एकाएक उस पर लाठीचार्ज हो गया। इसके बाद स्थिति विस्फोटक हो गयी तथा उत्तेजित ग्रामीणों नें तीर-कमान निकाल लिये थे। इस अप्रिय स्थिति को प्रवीर के हस्तक्षेप के बाद ही टाला जा सका था। स्थिति यही नहीं थमी। 25 मार्च 1966 के दिन राजमहल में सामने का मैदान आदिम परिवारों से अटा पड़ा था। कोंटा, उसूर, सुकमा, छिंदगढ, कटे कल्याण, बीजापुर, भोपालपटनम, कुँआकोंडा, भैरमगढ, गीदम, दंतेवाडा, बास्तानार, दरभा, बकावण्ड, तोकापाल लौहण्डीगुडा, बस्तर, जगदलपुर, कोण्डागाँव, माकडी, फरसगाँव, नारायनपुर.....जिले के कोने कोने से या कहें कि विलुप्त हो गयी बस्तर रियासत के हर हिस्से से लोग अपनी समस्या, पीड़ा और उपज के साथ महल के भीतर आ कर बैठे हुए थे। भीड़ की इतनी बड़ी संख्या का एक कारण यह भी था कि अनेकों गाँवों के माझी आखेट की स्वीकृतिअपने राजा से लेने आये थे। चैत की नवदुर्गा में आदिवासी कुछ बीज राजा को देते और फिर वही बीज उनसे ले कर अपने खेतों में बो देते थे। चैत और बैसाख महीनों में आदिवासी शिकार के लिये निकलते हैं जिसके लिये राजाज्ञा लेने की परम्परा रही है। यह भी एक कारण था कि भीड़ में धनुष-वाण बहुत बड़ी संख्या में दिखाई पड़ रहे थे, यद्यपि वाणों को युद्ध करने के लिये नहीं बनाया गया था। ज्यादातर वाण वो थे जिनसे चिडिया मारने का काम लिया जाना था। इसी बीच आदिवासियों और पुलिस में एक विचाराधीन कैदी को जेल ले जाते समय झड़प हुई जिसमे एक सूबेदार सरदार अवतार सिंह की मौत हो गयी। इसके बाद पुलिस नें आनन-फानन में राजमहल परिसर को घेर लिया; आँसूगैस छोडी गयी तथा फिर बिना चेतावनी के ही फायरिंग होने लगी। दोपहर बारह बजे तक अधिकतम आदिवासी मैदानों से हट कर महल के भीतर शरण ले चुके थे। धनुषों पर वाण चढ़ गये और जहाँ-तहाँ से गोलियों का जवाब भी दिया जाने लगा। दोपहर के दो बजे गोलियों की आवाज़े कुछ थमीं। सिपाहियों के लिये खाने का पैकेट पहुँचाया गया था। छुटपुट धमाके फिर भी जारी रहे। कोई सिर या छाती नजर आयी नहीं कि बंदूखें गरजने लगती थीं। दोपहर के ढ़ाई बजे; लाउडस्पीकर से घोषणा की गयी – “ सभी आदिवासी महल से बाहर आ कर आत्मसमर्पण कर दें। जो लोग निहत्थे होंगे उनपर गोलियाँ नहीं चलायी जायेंगी।प्रवीर ने औरतों और बच्चों को आत्मसमर्पण करने के लिये प्रेरित किया। लगभग डेढ़ सौ औरतें अपने बच्चों के साथ बाहर आयीं। जैसे ही वे सिंहद्वार की ओर आत्मसमर्पण के लिये बढीं, मैदान में सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया। यह जुनून था अथवा आदेश...बेदर्दी से लाठियाँ बरसाई जाने लगीं। क्या इसके बाद किसी की हिम्मत हो सकती थी कि वो आत्मसमर्पण करे? शाम साढे चार बजे एक काले रंग की कार प्रवीर के निवास महल के निकट पहुँची। प्रवीर और उसके आश्रितों को आत्मसमर्पण के लिये आवाज़ दी गयी। आवाज सुन कर प्रवीर पोर्चे से लगे बरामदे तक आये किंतु अचानक ही उनपर गोली चला दी गयी, गोली जांघ में जा धँसी थी। इसके बाद महल के भीतरी हिस्सों में जहाँ तहाँ से गोली चलने की आवाज़े आने लगी थीं। आदिम वाणों ने बहुत वीरता से देर तक गोलियों को अपने देवता के शयनकक्ष तक पहुँचने से रोके रखा। एक प्रत्यक्षदर्शी अर्दली के अनुसार बहुत से सिपाही राजा के कमरे के भीतर घुस आये थे। जब वह सीढियों से नीचे उतर कर भाग रहा था उसे गोलियाँ चलने की कई आवाजें सुनाई दीं...वह जान गया था कि उनके महाराज प्रवीर चंद्र भंजदेव मार डाले गये हैं। शाम के साढे चार बजे इस आदिवासी ईश्वर का अवसान हो गया था। प्रवीर की मृत्यु के साथ ही राजमहल की चारदीवारी के भीतर चल रहे संघर्ष ने उग्र रूप ले लिया। अब यह प्रतिक्रिया का युद्ध था जिसमें मरने या मारने का जुनून सन्निहित था। रात्रि के लगभग 11.30 तक निरंतर संघर्ष जारी रहा और गोली चलाने की आवाजें भी लगातार महल की ओर से आती रहीं थीं। इसके बाद रुक रुक कर गोली चलाये जाने का सिलसिला अलगे दिन की सुबह चार बजे तक जारी रहा। 26.03.1966; सुबह के ग्यारह बजे; जिलाधीश तथा अनेकों पुलिस अधिकारी महल के भीतर प्रविष्ठ हो सके। इसी शाम प्रवीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। प्रवीर बस्तर की आत्मा थे वे नष्ट नहीं किये जा सके। आज भी वे बस्तर के लगभग हर घर में और हर दिल मे उपस्थित हैं।
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Friday, March 01, 2013

गोबर के भीतर पडा देवता [प्रसंग: बस्तर में धार्मिक मान्यतायें]



यह पंक्ति गहरी है – “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा। जनजातीय समाज में देवता इतनी विनम्रता की अपेक्षा नहीं रखते। देवता वह जो बात सुने; देवता वह जो माँग पूरी करे; देवता वह भी जिसकी डिमांड पूरी की जाये लेकिन सशर्त। यह बात कांकेर के निकट रिसेवाड़ा गाँव के पास की है। कांकेर से मेरे मार्गदर्शक थे पत्रकार-मित्र कमल शुक्ला हमने दो ग्रामीणों से रिसेवाड़ा के निकट सहायता माँगी थी और वे भी हमारे साथ चल पड़े थे। यहाँ की रिसेदेवी से भी आपका परिचय जल्दी ही कराउंगा तथा इस स्थल के कई चौकांने वाले तथ्यों से भी। आज बात भीमा देवता की। वस्तुत: रिसेदेवी की गुफा देख कर आगे बढते हुए एक जगह ग्रामीणों ने हमे छोडा और एक पेड के नीचे नत मस्तक हो गये। मैं जिज्ञासा वश वहाँ चला गया। छोटा सा पेड पौधों का झुरमुट जहाँ दो गोबर के थप्पे रखे हुए थे। 

यह क्या है?” मैने जिज्ञासा वश पूछा।

भीमादेव हैएक ग्रामीण ने बताया।

भीमादेव क्या गोबर की थप्पियाँ हैं? यह बात और जिज्ञासा से भर रही थी। भीमादेव तो पानी का देवता है न?” मैने अपना ज्ञान बघारा। हम तथाकथित सभ्य लोग हैं ज्ञान बघारना हमारा अधिकार है।

हौ पानी का देवता है।ग्रामीण ने अपनी सादगी से कहा।

.....लेकिन गोबर की थप्पिया? भीमादेवता की मेरी कल्पना बडी भव्य थी। भीमा साधारण देवता हर्गिज नहीं है; प्रचलित कहावत है कि नांगर धरला भीम पानी देला इन्दर। मैं बात आगे बढाने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि बस्तर का जनजातीय समाज उस चश्मे से देखा पढा ही नहीं जा सकता जिसका कि हम देश के अन्य भाग से तुलनात्मक सूत्र जोड सकें। बहुत से लोग आईसोलेशन थ्योरीकी वकालत करते हैं जिसके दुष्परिणाम समझने के लिये बस्तर सबसे बेहतरीन जगह है। 1324 में अन्नमदेव ने बस्तर राज्य के विधिवत गठन के बाद उसने अपनी सीमाओं को लगभग सील कर दिया था; भीतर और बाहर में कोई संवाद नहीं। यदि अंग्रेज जासूस ब्लंट की डायरी कोई पढे तो यह समझ सकता है कि तत्कालीन बस्तर की निकटवर्ती रियासत कांकेर और बस्तर के बीच भी अबोले-अबूझे की स्थिति थी। इसका परिणाम हुआ कि यहाँ शासक-शासित; मूल संस्कृति/परंपरायें तथा आयातित; विद्यमान देवी देवता तथा आयातित सभी आपस में घुल मिल गये। कभी जनजातीय समाज का चलन शाशक वर्ग नें ओढ लिया तो कभी शासकों की मान्यतायें शासित वर्ग नें अपना लीं। इसे बिना किसी विद्वेश के हुआ सामाजिक-धार्मिक बदलाव भी कहा जा सकता है और फिर शेष दुनिया से कटे रहने के कारण नये तर्क बस्तर की सीमाओं के भीतर आसानी से प्रविष्ठ नहीं हो सकते थे अत: उपलब्ध विकल्प ही गुत्थम-गुत्था हो गये। आईसोलेशन थ्योरी के कारण बाहर से आने वाले बंजारों को शोषण करने व वनोपज की लूट का अवसर प्राप्त हुआ। (स्वतंत्रता पश्चात भी एक ब्यूरोक्रेट नें अबूझमाड को आईसोलेशन के अभिशाप से ग्रसित कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप नक्सलवाद नें इन क्षेत्रो में सहजता से पैर जमाये।)। यह लम्बी चर्चा का विषय है अत: न भटकते हुए गोबर की थप्पियों पर लौटते हैं।

यहाँ भीमा और इन्दर हमें भ्रमित करते हैं। इन्द्र पूजा को हिन्दू समाज में वर्षा से जोडा जाता है अत: यह भ्रम स्वाभाविक भी है। डॉ. के के झा नें चर्चा के दौरान इसी विषय पर अपनी थीसिस मुझे दिखाई थी जहाँ वे जनजातीय समाज की धार्मिक मान्यताओं में इतिहास की समय समय पर हुई दखलंदाजी की पूरी व्याख्या करते हुए इस अवगुण्ठन की क्रमबद्धता तथा कारणों पर बात करते हैं। डॉ. झा एसा साधिकार इस लिये कह पाते हैं चूंकि बस्तरिया जीवन को इस इतिहासकार नें इसी मिट्टी में जी कर समझा है। वरना तो दिल्ली में बैठे कई विचारक इन बदलावों को कॉफी पीते पीते ही खारिज कर देते हैं; एक आध तो गुडसा उसेंडी के अवतार वाले गुण्डाधुरकी तलाश करने वाले आगंतुक शोधार्थी बस्तरिया देवी दंतेश्वरी को शोषकबता कर अपनी थीसिस पूरी भी कर लेते हैं। भीमादेव को गोबर में लिपटा देख कर मेरा ठिठकना स्वाभाविक था चूंकि प्रचलित मान्यता के अनुसार - भीमादेव बस्तर के खेतीहर देवता हैं। भीमादेव को मनाने के लिये देवगुड़ी में पूजापाठ होता है, मन्नत माँगी जाती है। भीमादेव का पूरा श्रंगार साँप ही हैं। उनके सिर पर महामण्डलसाँप की पगड़ी बँधी है। टोकी-बोंडकीसाँप का जनेऊ पहना हुआ है। दूध-नागसाँप का कौपीन और बंदूक-मानासाँप का कमरपट्टा पहनते हैं। सुपलीसाँप भीमादेव के पैरों के कडे हैं।

बस्तर की जनजातीय मान्यताओं का यह भीमादेव हिन्दू मान्यता के किसी भी प्रचलन से साम्यता नहीं रखता तथापि जनजीवन में नल-नाग-काकतीय शासनकाल की मान्यताओं का प्रभाव ही न पडा हो क्या यह संभव था? आज कुछ देवगुडियों की जगह पक्के मंदिरो की भी झलक मिलती है यह भी समय का लाया परिवर्तन ही तो है। पूरे बस्तर में शिव-गणेश की असंख्य प्रतिमायें बिखरी मिलती हैं वह चाहे कोंटा हो, बीजापुर हो, भोपालपट्टनम हो, नारायणपुर हो या कि कांकेर। शिव के मान्य स्वरूप की हल्की सी झलख भीमादेव के स्वरूप में भी दिखाई पडती है। इन्ही नाम साम्यो के कारण जान बूझ कर विचारधारा-विशेष के द्वारा वैमनस्य प्रसारित करने की कोशिश है, या कहें सामाजिक खाई जो कि इन अवगुण्ठनों को अलग अलग करना चाहती है वह भी बिना इसके अतीत का पक्ष समझे हुए।

देवता वह नहीं जिसके आगे सिर झुका कर रहो और प्रतीक्षा करो कि वह तुम्हारी बात कभी सुनेगा। ग्रामीणों से चर्चा के दौरान ही मैं देवता और भक्त के बीच पुजारी या ओझा के माध्यम से होने वाली बातचीत या मोलभाव के मायने समझने का यत्न कर रहा था। यहाँ देवता बात करता है चाहे माध्यम कोई भी बने। देवता बात माने जाने से पहले अपने चढावे को ले कर भक्त और पुजारी से मोलभाव भी करता है कि पिछली बार तूने मुर्गा दिया था इस बार बकरा लूंगा। लेकिन भक्त के पास भी छूट है वह भी अपने देवता से उसी तरह झगड सकता है कि नहीं मैं तो मुर्गा ही दूंगा लेना हो तो लो वरना जाओ। इतना ही नहीं नाराज होने का अधिकार केवल देवता को ही नहीं है याचक या भक्त हो भी है। देवता के साथ झूमा झटकी भी हो सकती है और देवता को बैरंग लौटाया भी जा सकता है। इतना ही नहीं देवता बदल भी दिये जाते है, उपेक्षित भी कर दिये जाते हैं तथा मृत भी घोषित किये जाते हैं। बस्तर के देवी-देवता अकड नहीं सकते और सर्वे सर्वा नहीं बन पाते क्योंकि वे जन आवश्यकता से पनपते हैं उनकी सोच के अनुसार आकार लेते हैं उनकी जीवन शैली के अनुसार खाते पीते हैं और उसी प्रकार पूजे भी जाते हैं। इस विषय को अभी विस्तार न दे कर बात पुन: भीमादेव की।

ये गोबर जो रखा है उसीको आप भीमादेव मानते हो?” मुझे सही शब्द नहीं मिल रहे थे। काम करते हुए मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे मुख से निकले किसी भी शब्द से किसी की भी मान्यता आहत न हो। मुझे जो उत्तर मिला संभवत: धर्म और आस्था को ले कर बडी बडी बहसों के लिये सीख हो सकता है।

मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण नें भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव नें बार बार कहने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण नें अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या

कमल भैया नें पूछा कि क्या गोबर के नीचे रखी भीमादेव की मूर्ति को हम देख सकते हैं? यह स्वाभाविक प्रश्न था और हम यह उत्तर मान कर चल रहे थे कि हमे ना में उत्तर मिलेगा। हो सकता है हमे कहा जाये कि एसा करने पर देवता नुकसान पहुँचा सकता है....। अपेक्षा से विपरीत ग्रामीण ने कहा कि देवता है तो नुकसान क्यों पहुँचायेगा। यद्यपि हमने जानबूझ कर मूर्ति देखने की तत्परता नहीं दिखाई। मैं भाविक व्यक्ति हूँ और गोबर के भीतर पडे देवता ने मुझे अभिभूत कर दिया है।
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Thursday, February 14, 2013

नागयुगीन बस्तर (760 - 1324 ई.) का समाज और वर्तमान का वैचारिक प्रदूषण



अभी हिन्दी दिवस के अवसर पर एक चर्चा से सामना हुआ। मूल रूप से यह कहे जाने की कोशिश थी कि हिन्दी एक सामंतवादी भाषा है तथा हमें अपनी स्थानीयताओं के स्तर पर उतरना चाहिये अथवा निज मातृभाषा को ही प्रबलता से अपना चाहिये। बस्तर क्षेत्र के अतीत में तो एसी आवाज़ कभी नहीं उठी किंतु पिछले कुछ वर्षों से वाम विचारधारा नें गोंडी का प्रश्न आगे किया है तथा माओवादी स्त्रोतों से एवं कुछ बस्तर के भ्रमणार्थी लेखकों/समाजशास्त्रियों/पत्रकारों नें यही बात बारम्बार राष्ट्रीय मंचों से आगे की है। किसी नें कहा शिक्षा का माध्यम गोंडी होना चाहिये तो कोई बताता है कि जंगल के भीतर माओवादी एसी पाठ्यपुस्तकें तैयार कर रहे हैं जो मूल गोण्डी में ही हैं। केवल गोण्डी ही क्यों बस्तर की अन्य अकेकानेक बोलियाँ भी समान आदरणीय हैं तथा मुझे लगता है कि भाषा-बोली का प्रश्न एक पंक्ति में विश्लेषित होने वाला नहीं है। नाग कालीन बस्तर के समाजशास्त्र पर चर्चा को इसी विन्दु के प्रारंभ करने के पीछे मेरा मंतव्य उस साजिश को उजागर करना है जिसके परोक्ष में जनजातियों को अलग थलग करने की कोशिश पुन: होने लगी है। बस्तर रियासत के अंतिम काकतीय राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव नें मध्य प्रादेशिक हिन्दी साहिय्त सम्मेलन (1950 ई.) के अवसर पर भाषा-बोली के सवालों को उठाते हुए अपने वक्तव्य में नागयुगीन इतिहास को कुरेदते हुए भाषा के सवाल को उठाया था - शिलालेखों से यह भली भाँति सिद्ध होता है कि गोंडों की अवनति लड़ाई में हार जाने के कारण नहीं हुई है परंतु प्रस्तुत प्रश्न के प्रति उदासीनता दिखाने के कारण हुई है। एक ही समय में जब उन्हें मुसलमान और आन्ध्र राजाओं से खतरा मालूम हुआ तो वे अपने अपने जंगलों में जा कर रहने लगे और शेष संसार से स्वयं को अलग कर लिया। संसार की कोई भी जाति अपने को अलग कर के उन्नति नहीं कर सकती।.....अमेरिका के रेड़ इंडियनों का समूल नाश गोलियों से नहीं हुआ। पर उनको रिजर्व यानि बाकी संसार से पृथक रखने से हुआ। हमारे देश के आदिवासी यदि पृथक रखे गये तो उनकी जाति ही नष्ट नहीं हो जायेगी पर उनका नैतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी विकास भी नहीं हो पायेगा। महाराजा प्रवीर नें एक बहु-भाषी अध्यापन का सिद्धांत दिया था व कहा था कि हिन्दी में पढाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, उनके स्थान पर हमें चित्रों की आवश्यकता है। जिसमें प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर दिखा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हलबी और गोंडी में लिख दिया जाये। यह प्रवीर ही थे जिन्होंने सबसे पहले आदिवासी आईसोलेशन के खतरे को भांपा और इसे रोकने के लिये एक एक्टिविस्ट की तरह प्रयास भी किये उन्होंने अजेर (हल्बी बोली में अजेर का अर्थ है उजाला) नाम का पत्र निकाला जो हिन्दी भाषा तथा आदिवासी बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होता था। लाला जगदलपुरी नें भी बाद में इस बात की अहमियत को समझते हुए हिन्दी भाषा व जनजाति बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होने वाला पत्र बस्तरियाप्रारंभ किया था जिनमें वे देश के ख्यातिनाम साहित्यकारों की रचनाओं का जनजातीय बोलियों में अनुवाद प्रस्तुत कर एक पुल बनाने का कार्य कर रहे थे। शायद यही सर्वश्रेष्ठ तरीका है समन्वय का क्योंकि जब आप बस्तर के जनजातीय क्षेत्रों की बात करते हैं तो केवल गोंडी कह कर स्पष्ट विभाजन नहीं किया जा सकता लेकिन इस सवाल पर उनका आईसोलेशन अवश्य किया जा सकता है चूंकि भाषा-बोली के सौहार्द वाले इस जनजाति क्षेत्र में तीस से अधिक बोलियाँ अवस्थित हैं। हलबी बोली नें सभी जनजातियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य नागयुगीन बस्तर से ही आरंभ कर दिया था यही कारण है कि यहाँ दो गोंड जनजातियाँ आपस में बात करते हुए अपनी अपनी बोली में जब गूंगी हो जाती हैं तो हल्बी उनकी ज़ुबान बनती रही है।

आलेख के उपसंहार में इस विषय पर पुन: लौटेंगे पहले नागयुगीन जनजातिगत जटिलताओं पर दृष्टिपात करते हैं। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल बहुत बारीकी से जनजातियों की संरचना का वर्गीकरण करते हैं। उन्होंने दो स्पष्ट विभेद किये हैं। हलबा प्रजाति (यूरोपाईट) जिनका उद्भव आर्य जातियों से हुआ वे नाग युग में पुरोहित, व्यवसायी एवं कृषक तीनों वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। जब कि नाग प्रजाति (वेद्दोआउड) का स्पष्ट विभाजन उनकी कनिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक मधुरांतक देव) के आधार पर धुरवा जनजाति (धुरवा, परजा) तथा वरिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक सोमेश्वर देव) के आधार पर गोंड जनजाति (दोर्ला, माड़िया) आदि में हुआ है। नाग प्रजाति प्रशासन से जुड़ कर योद्धा बन गयी जबकि हलबा - हलवाहक।

नागयुग में पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय होने लगा। संयुक्त परिवार चलन में थे एवं ग्राम संरचना इस तरह थी कि दूर के सम्बन्धी भी एक पक्ति में बने मकानों में रहा करते थे। स्त्री को अब तक प्राप्त अधिकार सीमित होने लगे थे; तथापि धनाड्य परिवारों में स्त्रियाँ बराबरी का हक रखती थी तथा पर्दा प्रथा विद्यमान नहीं थी। नवसाहसांकचरित ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि स्त्रियाँ पुरुषों से हाँथ मिलाती थीं – “रुक्मागतं करग्राहसौहाद्रे पात्रतां नयततथा पुरुषों के साथ मदिरापान भी करती थीं – “मधु कापि पाटलकपोतलरलकलधौतकुण्डला। लोलनिजमुखतुषारकरबिम्बगर्भमधिकार्पिते। जगदलपुर के निकट चपका ग्राम से प्राप्त टेमरा सती अभिलेख तद्युगीन व्याप्त सतिप्रथा की ओर भी इशारा करता है। इस अभिलेख के अनुसार माणिक्यदेवी अपने पति नागराजा हरिश्चंददेव की चिता पर सति हो गयी थी। अब तक प्राप्त किसी भी अभिलेख व साहित्य से जनजातियों की वेषभूषा पर जानकारी नहीं मिलती किंतु उस युग में एलीट क्लास के पुरुष उत्तरीय व अंकुश पहनते थे, गले में हार, मणिकुण्डल तथा यज्ञोपवीत भी धारण करते थे। स्त्रियो के श्रंगारप्रिय होने की जानकारी मिलती है तथा वे अनेक प्रकार की केश-सज्जायें के साथ कण्ठ मे हार, कानो में रक्तकुण्डल व कर्णपुर, हाँथों में मणिकंकण,केयुर, नूपुर, मेखला और रत्नजटित पादुकाओं को धारण करती थीं। श्रंगार प्रसाधन के रूप में आखों में अंजन, होठों में लाली, शरीर में चन्दनलेप तथा पैरों में आलता लगाने के अनेक विवरण नवसाहसांकचरित ग्रंथ से प्राप्त होते हैं। विवाह को ले कर जनजातियों के बीच नीयम जटिल नहीं थे और तब पाँच प्रकार के विवाह प्रचलित थे आर्ष विवाह (वर से शुल्क लिया जाता था), आसुर विवाह (वर कन्या के माता पिता को धन दे कर कन्या को खरीदता है), राक्षस विवाह (वधू का अपहरण किया जाता है), पैशाच विवाह (बलात पतित्व का अधिकार पाया जाता है) तथा गान्धर्व विवाह (माता पिता की अनुमति से प्रेम विवाह)। एक ही गोत्र में विवाह करना निषिद्ध था। उपरोक्त में से बहुतायत विवाह प्रकार बदले हुए स्वरूपों में आज भी चलन में हैं।

नागयुग तक जैन धर्म-बौद्ध धर्म की पैठ चक्रकोट्य (बस्तर) में बनी हुई थी। यही वह समय है जब हिन्दू मान्यताओं और पूजा-परम्पराओं नें जनजातिगत मान्यतों के भीतर भी जगह बनाना आरंभ किया। शिव एक प्रमुख आराध्य देवता के रूप में उभरने लगे तथा तंत्रमंत्र के माहौल में शाक्त देवियों व सप्तमातृकाओं की भी आराधना व्यापक रूप से की जाने लगी। नागराजाओं की कुलदेवी माणिकेश्वरी थीं। नागयुगीन मंदिरों नें नृत्य-संगीत को समुचित प्राश्रय दिया तथा राजा सोमेश्वर देव के गढिया अभिलेख के अनुसार नृत्यांगनाओं को समुचित दान की वयवस्था शासन की ओर से थी।

नागयुग के शिल्पकार स्तुत्य हैं जिन्होंने एसी अनुपम धरोहरें बस्तर को सौंप दी हैं जो अलगी कई शताब्दियों तक इतिहास को जीवित रखेंगी। नारायणपाल का विष्णु मंदिर, बस्तर का शिव मंदिर, कुरुषपाल, भैरमगढ, चित्रकोट, गढधनोरा, केसरपाल, चपका, मटनार, छोटे-डोंगर, दंतेवाड़ा, कोईलीबेड़ा, कटगाव आदि में अवस्थित मंदिर तथा भग्नावशेष नागयुगीन वास्तुकला की आज भी गवाही देते हैं। बारसूर का बत्तीस स्तम्भों वाला मंदिर तो अनुपम है। अंग्रेज प्रशासक दि ब्रेत (1909) नें उल्लेख किया है कि एक ज़माने में बारसूर के मंदिर अपनी मिथुन मूर्तियों के कारण खजुराहो के मंदिरों से भी भव्य थे। किंतु अज्ञानता के कारण राजा महिपाल देव नें उन्नीसवीं सदी में इन्हें नष्ट करवा दिया था। आज भी मूर्तियों का बारीक अन्वेषण उनमें छिपे आदिम अभिव्यक्ति के छिपे कई दृश्य सामने लाता है जिसमें कहीं आदिवासी जीवन की पीडा है तो कहीं प्रेम भी है।

अब पुन: भाषा से प्रारंभ हुई चर्चा पर लौटते हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल नें अपनी पुस्तक चक्रकोट के छिन्दक नाग में उल्लेख किया है कि उन्होंने नागयुगीन बस्तर के कुल तैतीस अभिलेखों की खोज की है जिसमें से 16 अभिलेख तेलिगु में एवं 17 अभिलेख संस्कृत में हैं। डॉ. शुक्ल का मंतव्य है कि इन्द्रावती नदी एक स्पष्ट विभाज्य देखा है जिसके उत्तर का क्षेत्र संकर संस्कृत का तथा दक्षिण का अंचल संकर तेलुगु का रहा है। नागयुगीन राजा भाषा को ले कर स्पष्ट सोच रखते थे तथा समय समय पर उन्होंने एक भाषा नीति बनायी थी। नागयुगीन बस्तर की प्रथम राजभाषा (925-1062 ई.) तेलुगु थी चूंकि तब नाग दक्षिण से बस्तर आ कर स्थापित हुए थे एवं स्वयं का विस्तार करने के लिये अपनी भाषा को माध्यम बनाना उन्हें उचित लगा होगा। मधुरांतक देव (1062-1069 ई.) नें भाषानीति को बदल कर संस्कृत को राजभाषा घोषित किया। संभवत: इसका कारण सोमवंशी, कलचुरी, ओडिशा तथा चोल शासकों से सहसम्बन्ध बढाना रहा होगा। इसके बाद तीसरी राजभाषा नीति का काल 1069-1218 के मध्य का है जहाँ तेलुगू एवं संस्कृत दोनो को ही राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। सोमेश्वर देव (1069-1111ई.) नें कुल नौ आज्ञा पत्र जारी किये जिनमें से पाँच संस्कृत में तथा चार तेलुगु में थे। इस अवधि के विषय में डॉ. शुक्ल लिखते हैं कि भाषा-बोलियों का सम्मिश्रण जनजातियों में इसी प्रकार नागयुग में होता रहा। आन्ध्र के प्रभाव वाले क्षेत्रों में तेलुगु नें माड़िया तथा धुर्वी के साथ मिल कर द्विभाषिकता की स्थिति को निर्मित किया तथा हलबाओं के संपर्क में ओडिया भाषा आई। अबूझमाडिया कबीले तब शक्तिशाली थे तथा एकभाषीय बने रहे। कालांतर में द्विभाषी स्थिति तो यथावत बनी रही लेकिन एकलिपि (1218 -1224 ई.) का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इस काल में संस्कृत तथा तेलुगु दोनो ही भाषाओं के अभिलेख नागरी लिपि में लिखे जाने लगे। शनै: शनै: तेलुगु भाषा की परम्परा समाप्त हो गयी तथा संकर संस्कृत (1224-1324 ई.) का विकास हुआ जिसमें स्थानीयता का तेजी से सम्मिश्रण भी होने लगा। एक एसी भाषा में संस्कृत बदलने लगी जिसके बहुत निकट आज की हलबी प्रतीत होती है। इस कारण को प्रमुखता से पहडना होगा कि क्यों हलबी सभी जनजातियों के बीच बोली जाती है जाहे वे गोंड हो या हलबा।

नागयुग में विभिन्न जनजातियों का सहसंयोजन भी हुआ तथा जिन जनजातियों की शासन में सहभागिता नहीं रही वे उपेक्षित व पिछडते भी चले गये। नाग शासन में जनजातियों के बीच आपसी संघर्ष के कोई दस्तावेज़ अथवा प्रमाण नहीं मिलते साथ ही यह सु:खद प्रतीति होती है कि बस्तर में अनेक धर्म, अनेक जातियाँ, अनेक बोली-भाषा बोध के बाद भी आधुनिक तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा विद्वेष फैलाये जाने की साजिश से पहले तक कभी भी इन सवालों पर अनेकता या अलगाववाद की स्थितियाँ निर्मित नहीं हुई हैं। अत: वही दोषी हैं जो बस्तरिया समाज को इस दृष्टि से देख रहे हैं, प्रदूषक-विचारों का विरोध अवश्य होना चाहिये।
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