Tuesday, July 17, 2012

भगवान पुस्तकालय के संरक्षण की दृष्टि से जिला प्रशासन को लिखा गया पत्र।


भागलपुर स्थित भगवान पुस्तकालय स्थानीय नहीं अपितु राष्ट्रीय धरोहर है। यह पत्र पुस्तकालय की स्थिति भी स्पष्ट करता है तथा इसके संरक्षण के लिये भागलपुर जिला प्रशासन से एक अपील भी है। अपेक्षा करता हूँ कि प्रसाशन की ओर से सकारात्मक पहल होगी। एक नागरिक के तौर पर जो मेरा दायित्व था उतना कार्य करने की मेरी कोशिश है।
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जिलाधिकारी
भागलपुर जिला
बिहार

विषय: भगवान पुस्तकालय के संरक्षण के सम्बन्ध में।

महोदय,

मैं एक लेखक हूँ तथा वर्तमान में देहरादून (उत्तराखण्ड) में अवस्थित हूँ। एक शोधकार्य के लिये पिछले दिनों आपके जिले में स्थित भगवान पुस्तकालय जाना हुआ। जितनी अपेक्षा और तैयारी के साथ मैं भागलपुर के प्राचीन भगवान पुस्तकालयपहुँचा था उतनी ही मायूसी इस बुनियादी सुविधा-विहीन पुस्तकालय को देख कर हुई। यहाँ पहुँचने की अभिरुचि उस जानकारी के कारण थी कि कुछ ही महीने पहले भगवान पुस्तकालय में पाण्डुलिपि संरक्षण केन्द्र के कुछ अधिकारियों को एक अलमारी में झोले में रखी हुई कुछ दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुई जिनकी संख्या छ सौ से अधिक थी। इसी दौरान प्राप्त दस्तावेजों में से एक भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की हस्तलिखित वह चिट्ठी भी है जिसमें उन्होंने भगवान पुस्तकालय की मरम्मत के लिये भागलपुर के धनाड्य लोगों से अपील की है। यह पत्र 1934 का है जब भागलपुर में आये भूकम्प के कारण पुस्तकालय को भी नुकसान हुआ था; तब राजेंद्र बाबू बिहार सेंट्रल रिलीफ कमेटी की ओर से भूकंप पीडि़तों की सेवा करने में जुट गये थे। भूकंप में भगवान पुस्तकालय के मुख्य भवन का गुंबद लटक गया था। इसकी मरम्मत के लिए तत्कालीन पुस्तकालयाध्यक्ष स्व. पंडित उग्र नारायण झा ने मुंगेर में उनसे मुलाकात कर मदद का अनुरोध किया। इस पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नें भागलपुर के धनाढ्य परिवारों के नाम पत्र लिखकर पुस्तकालय को आर्थिक सहायता करने का अनुरोध किया था। आज लगता है कि राजेन्द्र बाबू की अपील निरर्थक रह गयी है, यहाँ तक कि उनके हाँथों के लिखे कागज हमसे संभाले नहीं संभलते? यह स्थिति तब है जब कि रजत जयंती, स्वर्ण जयंती एवं हीरक जयंती मना चुके इस गौरवशाली पुस्तकालय मे आगामी 7 दिसम्बर 2013 को इसकी स्थापना की 100 वीं जयंती मनाया जाना है।

मुख्यद्वार से पुस्तकालय तक पहुँचते हुए ही बदहाली का अंदेशा हो जाता है। भीतर प्रवेश करता हूँ तो सन्नाटा पसरा हुआ है। तलाशने पर एक कर्मचारी मिलता है जो बेचारा उमस और गर्मी का मारा बनियान चढाये पुस्तकालय के पीछे बैठा हुआ है। इस पुस्तकालय सहायक को संदर्भ बताता हूँ जिनपर सामग्री की मुझे तलाश है तो वह पहले सोचने की गंभीर मुद्रा बनाता है फिर एक मोटा सा रजिस्टर ला कर सामने रख देता है जो कि उपलब्ध पुस्तकों का कैटलॉग है। मैं कुछ किताबें चुनता हूँ तो वह तलाश कर मुझे देने की बजाय एक अलमारी की ओर उंगली दिखाता है जिसपर एक पीला साकागज चिपका है ध्यान से देखने पर ही अंदाजा होगा कि भीतर इतिहास की पुस्तकें रखी हैं। अलमारी खोलने में ताकत लगानी पडी; शायद इन्हें महीनों या सालों से खोला ही नहीं गया है? किताबों की हालात भी शर्मसार करने वाली है। यह किस किस्म का पुस्तकालय चल रहा है? आज के दौर में जहाँ पुस्कालय प्रबन्धन को विज्ञान कहा जाता है वहाँ साहित्य, इतिहास, कला हर किस्म की किताबों की एसी दुर्दशा कि देखी भी नहीं जाती?        

मेरे चिन्हित संदर्भ तो मुझे नहीं मिले किंतु मैंने एक एक कर कई किताबें टटोली और आवाक रह गया इतने पुराने और दुर्लभ संकलनों को देख कर। हालात इतने खराब है कि बहुतायत पुस्तके न तो क्रम से व्यवस्थित हैं न ही सभी की कैटलॉगिंग ही पूरी हुई है। कई टेबलों पर किताबें गट्ठर की शक्ल में रखी हुई हैं और आप नीचे दबी हुई पुस्तकें तो निकाल ही नहीं सकते। कई हजार किताबें उपर की अलमारियों में इस तरह रखी गयी हैं कि उनतक पाठकों के हाँथ तो नहीं पहुँच सकते अलबत्ता दीमक और चूहों की उनको उपलब्धता हो सकती है। कई संदर्भ पुस्तकें जिन्हें मैने उठाया उनपर दीमक नें छेद कर दिये थे। मैंनें पुस्तकालय सहायक से इस पुस्तकालय के अध्यक्ष से संपर्क करने के लिये कहा जिससे कि यहाँ उपलब्ध उन पाण्डुलिपियों को देख सकूं जिनके विषय में हालिया जानकारी प्रात हुई है। थोडी ही देर में कोई महिला अधिकारी आती हैं किंतु वे गर्दन हिलाकर इन पाण्डुलिपियों को दिखा पाने में असमर्थता जाहिर कर देती हैं। मै इन्हे देखने का निर्धारित शुल्क देने के लिये प्रस्तुत हूँ फिर इनकार क्यों? तो पता चलता है कि चाबी सेक्रेटरी साहब से मिलेगी। सेक्रेटरी साहब से संपर्क की कोशिश होती है तो पता चलता है कि वे शहर से बाहर हैं इस लिये अब दो सप्ताह के बाद ही आना होगा; अगर इन पाण्डुलिपियों में रुचि है। मुझे देहरादून लौटना था और इतना समय नहीं था, मन मसोस कर रह गया। किंतु यही अवस्था तो प्रत्येक शोधार्थी की होती होगी जो एसे महत्वपूर्ण पुस्तकालयों में बडी ही अपेक्षा के साथ पहुँचते हैं?

मुझे इन पाण्डुलिपियों को न देख पाने का अफसोस क्यों नहीं होना चाहिये? लगभग दो सौ साल का इतिहास इनके भीतर छिपा हुआ है। एक पाण्डुलिपि एसी भी है जिससे पता चलता है कि औरंगजेब की बेटी जैबुन्निशा की तालीम व तरबियत (शिक्षा-दीक्षा) भागलपुर के कुतुबखाना पीर शाह दमड़िया बाबा शाह मंजिल, खलीफ़ाबाग में हुई थी। वे 1665 ई के आसपास यहाँ रहा करती थीं। इसी स्थल से सम्बन्धित बादशाह अकबर का एक फ़रमान पत्र पुस्तकालय में उपलब्ध है जिसमे उन्होंने आदेश दिया था कि दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले बादशाह यहाँ दुआ मांगने आयेंगे। एक अन्य प्राप्त जानकारी रोचक है अंगरेजी शासनकाल में हाकिम उसी दरख्वास्त के पिछले पृष्ठ पर फ़ैसला लिखा करते थे, जो उन्हें पीड़ितों के द्वारा सौंपा जाता था; 1824, 1865, 1903 1904 ई की मिली पांडुलिपि (हस्तलिखित) से इस तथ्य की जानकारी मिली है। कई दुर्लभ ग्रंथ और कविता संकलन भी यहाँ उपलब्ध हुए है इनमें श्यामसुंदर द्वारा अवधि में लिखी गयी चतुप्रिया ग्रथांतर्गत भूल वर्णन, मथुरा प्रसाद चौबे व रामकृष्ण भट्ट की कविता मिली है। कविता की पाण्डुलिपि 150 साल पुरानी है। सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा 1934 में लिखी गयी पुस्तकालय परिदर्शन टिप्पणी मिली है, जो अंगरेजी में लिखी गयी है। मानीदेव की रचना काशीवासी सिंहराज का युद्ध वर्णन भी मिली है। कवि रघुनाथ की लिखी वसंत ऋतु कविता भी मिली है। सौभाग्य से पांडुलिपियों का तैयार डाटा बेस पटना पहुंचा दिया गया है। कई पाण्डुलिपियाँ अच्छी हालत में नहीं बतायी जाती हैं। इनकी समुचित स्कैनिक आदि कर के आधुनिक तकनीकों के माध्यम से अध्येताओं तक पहुँचाने की व्यवस्था राज्य सरकार को करनी चाहिये।  

महोदय उपरोक्त बाते लिखने का मेरा मंतव्य भगवान पुस्तकालय के बहाने सरोकारों के प्रति हमारी उपेक्षा की ओर प्रशासन का ध्यान दिलाना मात्र है। भगवान पुस्तकालय की स्थापना 7 दिसम्बर 1913 को भागलपुर के जमींदार सह ऑनरेरी मजिस्ट्रेट पंडित भगवान प्रसाद चौबे  एवं उनके भतीजे पंडित अलोपी प्रसाद चौबे  ने संयुक्त रूप से अपनी निजी भूमि, भवन एवं संसाधनों को समाज को समर्पित कर के किया था। इस पुस्तकालय का उद्घाटन भागलपुर के तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर एच जे मेकेन्टोस ने किया था। पुस्तकालय की स्थापना का एक उद्देश्य हिन्दी के प्रचार-प्रसार के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन को गति देना भी था। भगवान पुस्तकालय से लम्बे अर्से तक पुरुषोत्तमदास टंडन, डा. रामचन्द्र शुक्ल, डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. जाकिर हुसैन, भागवत झा आजाद, डा. जगजीवन राम, डा. जगन्नाथ कौशल, डा. ए. आर. किदवई, राहुल सांकृत्यायन जैसे दिग्गज राजनेताओं और साहित्यकारों का जुड़ाव बना रहा है। वर्ष 1955 में बिहार सरकार द्वारा इसका अधिग्रहण करने के बाद इसे प्रतिवर्ष 25,000 रुपये अनुदान मिलना प्रारंभ हुआ, जो अब बढ़कर 49,740 रुपये हुआ है; सही मायनों में यह नितांत अपर्याप्त राशि है। तथापि क्या अपने गौरवशाली अतीतका संरक्षण केवल सरकार का ही दायित्व है? अगर एसा होता तो 1934 में इसी पुस्तकालय के पुनरुद्धार के लिये राजेन्द्र बाबू आम जनता से अपील नहीं करते। केवल समय बदला है किंतु उनकी वही अपील आज भी कायम है। यह पुस्तकालय भागलपुर वासियों की दृष्टि और पहल की प्रतीक्षा कर रहा है। एक पहलू यह भी देखें कि भागलपुर जिले की कुल आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 3,032,226 है। यह बिहार की कुल आबादी का 2.92 फीसदी है। मैने पुस्तकालय में वर्तमान सदस्य संख्या को जानना चाहा तो क्षोभ से भर उठा उत्तर मिला – “अब साठ लोग पुरने वाला है। मुझे कुछ पत्रकारों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि सदस्य संख्या बढाने के लिये कोई अभियान ही नहीं चलाया गया है। इस तरह तो यह धरोहर आत्महत्या की ओर बढ रही है। मैं जानता हूँ कि इतना संवेदनहीन शहर तो नहीं हो सकता भागलपुर। मुझे उम्मीद है कि प्रबुद्ध प्रशासन जानकारी प्राप्त होते ही इस विषय को प्राथमिकता से संज्ञान में लेगा तथा पुस्तकालय के संरक्षण एवं प्रबन्धन के लिये आवश्यक दिशा निर्देश जारी किये जायेंगे।

महोदय, भगवान पुस्तकालय से संबंधित अपने विचारों को मैने वेब माध्यम से उठाया था तथा इस दिशा में देश-विदेश से अनेकों साहित्यकारों एवं पुस्तक प्रेमियों की प्रतिक्रियायें प्राप्त हुई हैं। वाराणसी से दैनिक जागरण में कार्यरत वरिष्ठ साहित्यकार श्री श्यामबिहारी श्यामल नें लिखा है कि “भागलपुर के ऐतिहासक भगवान पुस्‍तकालय में अनेक दुर्लभ पुस्‍तकें और पांडुलिपियों का होना तो इसे महत्‍वपूर्ण बनाता ही है, इस तथ्‍य से यह और दुर्लभ हो जाता है कि‍ इसके साथ हमारी भाषा के महान साहित्‍यकारों की सम्‍बद्घता और स्‍मृतियां भी जुड़ी हुई हैं। इसके संरक्षण के लिए आगे आने वाली संस्‍था से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह यहां की दुर्लभ पांडुलिपियों को सबसे पहले तो वीडियो वर्जन में फिल्‍मीकृत करने जैसी समुचित पहल करे और ऐसा ही भरसक प्रयास पुरानी पुस्‍तकों को लेकर भी हो। इसके साथ ही पुस्‍तकालय विज्ञान के किसी योग्‍य जानकार से संपर्क कर तमाम पुस्‍तक-संपदा के सूचीकरण और नियमित संरक्षण-कार्य के लिए परामर्श ले। यह कार्य बिहार में भी पटना के खुदा बख्‍श लाइब्रेरी या सिन्‍हा पुस्‍तकालय जैसे ठोस संस्‍थानों से संपर्क कर पूरा किया जा सकता है। इस पुस्‍तकालय के साथ हमारे प्रथम राष्‍ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद का भी सीधे जुड़ाव रहा है। आवश्‍यकता केवल इस बात की है कि ढंग से पहल हो और जाहिरन यह अभियान भागलपुर की धरती से शुरू हो तो बात आगे बढ़ सकती है”। कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक तथा वरिष्ठ वामपंथी विचारक श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी नें राज्य सरकार से इस मामले में दखल देने की उम्मीद की है। बोधि प्रकाशन से साहित्यकार तथा प्रकाशक श्री माया मृग जी नें पुस्तकालयों के संरक्षण और संग्रहण को एक कौशल बताते हुए किसी भी तरह की सहायता के लिये प्रस्तुत होने की बात कही है। जयपुर से वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती सरस्वती माथुर नें टिप्पणी की है कि जागते को जगाया जाना अधिक कठिन कार्य है; उन्होंने पुस्तकालय की दुर्दशा पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। लंदन से वरिष्ठ कथाकार एवं प्रतिष्ठित हिन्दी सम्मान “कथा यू.के के समन्वयक श्री तेजेन्द्र शर्मा नें पुस्तकालय संरक्षण को महत्वपूर्ण सरोकार माना है। दिल्ली विश्वविद्यालय से संगीता कुमारी, फिल्म निर्माण क्षेत्र से जुडी पंखुडी पल्लवी, सुदूर बस्तर क्षेत्र के भोपालपट्टनम से श्री संदीप राज नें भगवान पुस्तकालय के वर्तमान हालात पर अपनी चिंता व्यक्त की है। पुस्तकालय क्षेत्र से जुडे श्री गणेश कुमार साहू नें लिखा है कि “आए दिन हमे पढ्ने और सुनने मे आता है कि पुस्तकालय मे आई टी और इससे जुड़े प्रयोगों पर देश भर मे ढेर सारे सेमिनार/अधिवेशन आयोजित किए जाते है पर क्या कभी इस देश के तथाकथित पुस्तकालय बुद्धिजीवी ने सोचा भी होगा कि असली सेमिनार/अधिवेशन तो पुस्तकालय को बचाने से शुरू होता है” शारजाह से अभिव्यक्ति-अनुभूति वेब पत्रिकाओं की सम्पादिका तथा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लेखिका श्रीमती पूर्णिमा वर्मन नें सुझाव दिया है कि “किसी डिग्रीधारी अनुभवी लायब्रेरियन का सहयोग लेना चाहिये। अवकाश प्राप्त लाइ्ब्रेरियन भी सहयोग कर सकते हैं”।  मुम्बई से वरिष्ठ लेखिका मधु अरोडा नें सुझाव दिया है कि “यह एक बड़ा काम है क्‍योंकि सारी पुस्‍तकों को खोजना और उनका रिकॉर्ड आदि करना होगा। इसके लिये विभिन्‍न पुस्‍तकालयों की सहायता लेना होगा। पुस्‍तकालयों को पत्र लिखकर उनसे वहां के प्रशिक्षित लोग बुलवाए जायें और काम को करने के प्रयास किये जायें”। इसी संदर्भ को आगे बढाते हुए रांची से वरिष्ठ रंगकर्मी एवं आदिवासी मामलों के जाने माने लेखक श्री अश्विनी कुमार पंकज नें लिखा है कि “पुस्तकों का रखरखाव और पुस्तकालय का संचालन बहुत मुश्किल काम है। इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जानी चाहिए। मुझे संदेह है कि कोई एनजीओ ऐसे पुस्तकालय का रख रखाव दीर्घकालीन समय तक कर सकेगा। बेहतर यही होगा कि स्थानीय प्रशासन और नागरिकों को इसके लिए जिम्मेदार और जवाबदेह बनाया जाए। जो इसके रखरखाव की पूरी योजना बनाएं, उसका ब्लूप्रिंट सामने रखें तभी जो मदद करना चाहते हैं उनकी भूमिका स्पष्टतः तय हो सकेगी और यह कारगर भी होगी। पुस्तकालय का कंप्यूटीकरण और रेयर पुस्तकों का डिजिटाइजेशन भी जरूरी है और यह कार्यसूची में शामिल रहे”पुणे से कवि तथा  गीतकार श्री विश्वदीपक तनहा नें पुस्तकालय की देख रेख के लिये अनुभवी लाईब्रेरियन की आवश्यकता पर जोर दिया तो रायपुर से श्रीमती नीलिमा गडकरी नें लिखा कि “पाण्डुलिपि प्रबंधन का काम बेहद गंभीर और जटिल विषय है तथा इस में किसी कुशल प्रबंधन और पुस्तकालय विशेषज्ञ का सामंजस्य होना जरुरी है. मुझे लगता है इसमें स्थानीय विश्वविद्यालय और स्थानीय प्रशासन की भी सहायता ली जा सकती है”| जयपुर से टीवी पत्रकार श्री आर्य मनु नें पुस्तकालयों की प्रत्येक शहर में हो रही दुर्दशाओं पर ध्यान दिलाते हुए भगवान पुस्तकालय के बेहतर प्रबन्धन की अपील की है। बिहार से ही फिल्म निर्माता तथा पत्रकार श्री भवेश नन्दन झा नें लिखा है कि “अपने धरोहरों से लोगों का ध्यान हटता जा रहा है। कमोबेश सभी जगहों के हालात एक जैसे हैं, मधुबनी के पुस्तकालय जहाँ हम घंटों सुकून से पढ़ा करते थे आज दुर्दशा का शिकार है। इन मामलों में सरकारी तंत्र से खराब रवैया आम लोगों का होता है, जिनके लिए ये बना है”। दंतेवाडा, छत्तीसगढ से श्री चन्द्र मण्डावी नें अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है कि “देश के कई हिस्सो मे हमारी प्राचीन धरोहरें आज इसी तरह उपेक्षा का दर्द झेलते हुये विलुप्ति के कगार तक पहुच गयी हैं”। रांची से लेखक श्री रवि बाजपेयी लिखते हैं कि “अपनी धरोहरों की देखरेख हमारी जिम्मेदारी है, सरकार की नहीं| यदि लोग चाहेंगे तो स्थानीय प्रशासन व सरकार अपना काम करेगी| भागलपुर के लोगों को इस कुव्यवस्था के बारे में बताना आवश्यक है, निश्चय ही स्थानीय लोग इस पुस्तकालय के बचाव के लिए आगे आयेंगे”। वरिष्ठ कथाकार श्री बलराम अग्रवाल नें पुस्तकों के प्रति संवेदनशीलता को अपने पूर्वजों के प्रति आदर की अभिव्यक्ति के साथ जोडा है। मास्को से वरिष्ठ लेखक श्री अनिल जनविजय नें इसके संरक्षण में सभी प्रकार के सहयोग की मनोभावना के साथ आगे आने की इच्छा अभिव्यक्त की है। दंतेवाडा से सामाजिक कार्यकर्ता श्री संजय महापात्र नें लिखा है कि “यह आनेवाली पीढी के साथ हमारा अन्याय है”। राँची से पत्रकार श्री पुष्य मित्र नें भगवान पुस्तकालय की स्थिति पर दु:ख जताते हुए यहाँ जारी कुप्रबन्धन की ओर ध्यान दिलाया है। उनके अनुसार सदस्य बनाने की प्रक्रिया से ले कर पुस्तकों का रख रखाव सभी कुछ चिंताजनक है। जगदलपुर से श्री हेमंत नाग लिखते हैं कि स्थानीय प्रशासन को इसके संरक्षण में आगे आना चाहिये। सिलचर, असाम से श्री आकाश वर्मा नें इस दिशा में कुछ शीघ्र किये जाने की अपील की है। अमेरिका से हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका “हिन्दी चेतना” की सम्पादिका श्रीमती सुधा ओम ढींगरा लिखती है कि “हम विदेशी लाइब्रेरियों में हिन्दी साहित्य को जुटाने और सुरक्षित करवाने की कोशिश कर रहे हैं और भारत में यह हाल है” 

महोदय यह कुछ प्रतिक्रियायें भर हैं तथापि इससे प्रसन्नता होती है कि पुस्तकालय और इसके संरक्षण को ले कर अभी भी हमारा समाज तथा लेखक वर्ग जागरूक एवं चिंतित है। यह भी महत्वपूर्ण है कि वे धरोहरें जो आने वाली पीढी की अमानत हैं अगर वर्तमान द्वारा उपेक्षित भी की जा रही हैं तो भी उनका समुचित संरक्षण दाहित्व बनता है। जैसा कि जानकारी प्राप्त हुई है कि राज्य सरकार द्वारा पुस्तकालय को अनुदान भी प्राप्त होता है अत: आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया स्वयं संज्ञान ले कर पुस्तकालय के समुचित प्रबन्धन के लिये दिशा निर्देश प्रदान करने का कष्ट करें। भागलपुर विश्वविद्यालय में पुस्तकालय प्रबंधन का अध्ययन कराया जाता है यदि उनकी सहभागिता प्राप्त हो जाये तो वैज्ञानिक तरीके से तीन लाख से अधिक पुस्तकों का रखरखाव, कैटलॉगिंग तथा आम पाठक/शोधार्थियों तक उनका पहुँचाना संभव हो सकेगा। भागलपुर से ही एक गैर सरकारी संगठब लकी महिला एवं युवा संघ नें भी इस दिशा में कार्य करने की रुचि दिखायी है। उनका पत्र भी मैं साथ ही संलग्न कर रहा हूँ।  

महोदय, यह कार्य बडा उद्देश्य अंतर्निहित रखता है। आपके कुशल निर्देशन/मार्गदर्शन में यदि कार्य सम्पन्न हो जाये तो यह सौगात न केवल भागलपुर शहर के लिये होगी अपितु देश-विदेश के सभी हिन्दी/पुस्तक प्रेमियों के लिये भी होगी। हम सभी साहित्यकार/कलाकार/हिन्दीप्रेमी/विद्यार्थी/शोधार्थी आपकी ओर अपेक्षा भरी निगाह से देख रहे है। हमें अपेक्षा है कि आने वाले वर्ष में जब इस पुस्तकालय के स्थापना की सौंवी वर्षगाँठ मनायी जायेगी तब तक यह एक बेहतर तरीके से प्रबंधित तथा संरक्षित होगा। मुझे अपेक्षा है कि आप इस दिशा में अवश्य कारगर कदम उठायेंगे।

सादर।


भवदीय

अनुलग्नक: -   अ) भगवान पुस्तकालय में खीचे गये कुछ फोटोग्राफ्स।
आ) पुस्तकालय प्रबन्धन पर एक संक्षिप्त नोट।
ई) गैर सरकारी संस्था “लकी युवा एवं महिला संघ” का एक पत्र।

राजीव रंजन प्रसाद
221/7, मोहित नगर
देहरादून (उत्तराखण्ड) – 248006
चलभाष – 07895624088
ई-पता – rajeevnhpc102@gmail.com   


प्रतिलिपि:
1.    कुलपति महोदय, भागलपुर विश्वविद्यालय को इस अनुरोध के साथ कि पुस्तकालय विभाग तथा इसके शोधार्थियों के माध्यम के आपकी पहल द्वारा भगवान पुस्तकालय के बेहतर तथा वैज्ञानिक तरीके से प्रबन्धन की योजना तैयार की जा सकती है।

2.    संचालक – गैर सरकारी संगठन लकी युवा एवं महिला संघ, भागलपुर को इस अपेक्षा के साथ कि स्थानीय सरोकारों को स्थानीय लोग ही बेहतर तरीके से उठा सकते हैं एवं जागृति प्रसारित कर सकते हैं।


 [भगवान पुस्तकालय के मुख्यद्वार की तस्वीर]

[इन पुस्तकों तक पहुँचना असंभव है ये इसी तरह नष्ट हो सकती हैं]

[पुस्तकें तो बहुत हैं तथा दुर्लभ संकलन है किंतु समुचित कैटलॉगिंग व वैज्ञानिक तरीके से रखरखाव का अभाव दिखाई पडता है]

[प्राचीन अलमारियाँ हैं तथा उनमें से अधिक खुलती ही नहीं हैं, किताबें भरी पडी हैं लेकिन उनमें क्रमिकता का अभाव है, यहाँ फुर्सत में केवल अखबार पढने वाले पाठक ही दिखे। सदस्य संख्या को 60 से आगे बढाने के लिये भी कुछ किया जाना दिखाई नहीं पडता।]

[गैर सरकारी संस्था का इस दिशा में पहल हेतु पत्र] 

Tuesday, July 10, 2012

बस्तर में प्रगतिशील समाज एक दृष्टिकोण


तूम्बा बस्तर में हर किसी कंधे पर शान से विराजमान हुआ करता था। विषय में उतरने से पहले तूम्बे को केन्द्र में रख कर विमर्श करते हैं। लौकी के जो फल बुढ़ा जाते हैं उसको तोडकर उसका शीर्ष भाग काट लिया जाता है। इसके बाद सावधानी से भीतरी अंश को निकाल कर इसे खोखला बना लेते हैं। अब खोखले भाग में पानी भर कर उसे एक जगह सुरक्षित रख दिया जाता है। आठ दस दिनों में लौकी का भीतरी भाग पूरी तरह सड़ जाता है। सडे हुए अंश को बाहर निकाल कर अच्छी तरह धो कर सुखा दो और तूम्बा तैयार। यह आदिवासियों का वाटर बोटल, पेज कैरियर या सल्फी होल्डर सब कुछ है। इतना ही नहीं अंचल के कई वाद्य हैं जैसे किंदरी, तोहेली, डुमिर, रामबाजा....इन सभी में तूम्बे का घट लगा होता है। घोटुल मुरिया तो अपने कई नृत्यों में तूम्बों से भयानक मुखौटे भी बना कर प्रयोग में लाते हैं। एक भतरी कहावत भी है कि ‘तूम्बा गेला फूटी, देवा गेला उठी’। तूम्बा का फूटना एक अपशकुन है। इन भूमिका के बाद वर्तमान हालात पर एक दृष्टि – तूम्बा अब धीरे धीरे परम्परा से उठने लगा है। बहुतायत स्थलों में तूम्बे की जगह प्लास्टिक की डिस्पोजेबल बोतलों आदि नें ले ली है। एसा क्यों है कि जिस तूम्बे का उपयोग आम था, जो परम्परा का हिस्सा था, जिससे शगुन अपशगुन जैसे मिथक जुडे हुए थे वह धीरे धीरे आम उपयोग से बाहर जाता जा रहा है? क्या यह सामान्य बदलाव हैं? क्या इसी तरह एक समाज पूरी तरह बदल जायेगा और उसे मुख्यधारा हासिल होगी? केवल तूम्बे का प्रश्न नहीं है? वस्तुत: बदलाव की इतनी तेज हवा अन्यत्र नहीं देखी जा रही जो कुछ बस्तर में पिछले दस सालों में हो रहा है। इस कथन के अन्वेषण से पहले अपनी अपनी राजनीतिक सोच का चश्मा हमें परे रखना होगा। यह समस्या राजनीतिक नही है तथा इसके विमर्श और समाधान के लिये की जाने वाली राजनीति नुकसानदेय ही सिद्ध होगी। तूम्बे के प्रयोग में हो रही निरंतर कमी को जानने के प्रयास में मैंने कुछ साक्षात्कार किये थे और यह प्रतीत हुआ जैसे जड सूख रही हो। जैसे अपनी परम्परा, अपनी सोच और अपनी जीवनशैली में लगातार आ रहे बदलाबों नें कहीं जो हो रहा है उसे सहज स्वीकार कर लो की प्रवृत्ति तो नहीं प्रदान की है?

इसके उलट एक और बदलाव का उदाहरण सोचने पर बाध्य करता है। एनएमडीसी में कार्यरत एक आदिवासी साथी अशोक कुमार नाग नें हाल ही में कुछ तस्वीरें दिखायी थी जहाँ वे अपने गाँव में किसी परम्परागत उत्सव में शामिल होने गये थे। नगर के जीवन में पूरी स्वाभाविकता से रचा बसा आदिवासी साथी भी जब गाँव पहुँचता है तो वह मिट्टी के रंग में रच बस जाता है, आनंद पाता है, वहाँ के जीवन का बिलकुल वैसा ही हिस्सा हो जाता है जैसे कोई शिशु अपनी माँ की गोद में पहुँचकर सुकून और आनंद की साँस ले रहा हो।

अब एक तीसरी कहानी। इस कहानी नें मेरी सोच पर बहुत असर किया था तथा इसका उपयोग मैने अपने उपन्यास में भी किया है। मंगलू से मैं दंतेवाड़ा में मिला था। तब वह किसी सलवाजुडुम कैम्प में रह रहा था। मैने पूछा कि अपना घर-बाड़ी छोड कर क्यों भाग आये? उसने बताया कि उसके गाँव में माओवादी लोगों का हुकुम चलता है इससे उसे शिकायत नहीं थी। समस्या शुरु हुई जब उसके दो मुर्गों में से एक मुर्गा उसके ही पड़ोसी को बटाई में मिल गया। यह सामान्य प्रक्रिया है कि किसी गाँव को अपने कब्जे में लेने के बाद माओवादी वहाँ अवस्थित जन-जानवर आदि की गणना करते है फिर उपलब्ध धन-पशुधन को बराबरी के आधार पर बाँट देते हैं। रोज आधा पेट सोने वाला मंगलू पूंजीपति हो गया था क्योंकि अपने खून-पसीने से उसने दो मुर्गे सम्पत्ति बना ली थी। मंगलू इस बटाई के लिये सहमत नहीं था। उसने विरोध किया लेकिन दो चार थप्पड खाने के बाद उसे समानता का सिद्धांत समझ में आ गया। मंगलू के कुछ दिन भीतर ही भीतर कुढ़ते हुए बीते। दुर्भाग्य से उसका मुर्गा मर गया। अब उसकी पीड़ा और बढ़ गयी थी। बटाई में चला गया मुर्गा वापस पाने के लिये वह पडोसी से रोज झगड़ने लगा। बात सरकार चलाने का दावा करने वालों तक भी पहुँची लेकिन मंगलू को मुर्गा वापस नहीं किया गया। मंगलू के लिये यह मुर्गा दिन की तड़प और रात का सपना बन गया था। एक दिन जब बर्दाश्त नें जवाब दे दिया तो वह उठा और अपने मुर्गे की गर्दन मरोड़ कर गाँव से भाग गया.....।“   
   
उपरोक्त तीनों उदाहरण काल्पनिक नहीं हैं तथा विषय को ठीक तरह से समझने में सहायक हो सकते हैं। पहला कि चाहे वह सरकारी प्रक्रियायें हों अथवा माओवादी पहल, आप न तो अपनी योजनाओं के प्रतिपादन में, अथवा, अपने विचार की स्वीकारोक्ति में तब तक सफल हो सकते हैं जब तक कि बात आम संवेदना से सीधे न जुडे। हो सकता है कि आपकी पहल बहुत वैज्ञानिक हो; हो सकता है कि आपके विचार अत्यधिक क्रांतिकारी हों किंतु अगर उनसे तूम्बा गुम हो जाता हो या मगलू को अपने मुर्गे की गर्दन मोड कर विस्थापित जीवन का चयन करना पडता है तो समझिये आपकी योजनायें धरी रह गयीं और आपकी क्रांति बह गयी इन्द्रावती में। रास्ता तो अशोक नाग का ही बनेगा जहाँ वह अपने लिये बेहतर जीवन की तलाश में पूरे संघर्ष के बाद सफल होते हैं, अपने बच्चों के लिये बेहतर भविष्य की नींव डालते हैं तथा जमीन की महक से भी जुडे रहते हैं। यही बदलाव की सही दिशा है और मेरी सोच किसी नारे या झंडे से बंधनें के लिये नहीं अपितु इसी दिशा की ओर इशारा करती है। नव निर्माण का श्रीगणेश और हम बस्तरिया करेंगे के जो भी आह्वाहन मेरे आलेखों में हैं वह आदिवासी साथियों के साथ इसी विमर्श और संवाद को बनाने की दिशा में हैं। मेरी निजी राय है कि आदिम समाज को आईसोलेट करने और मानवसंग्रहालय में बदलने की सोच दकियानूसी है। यद्यपि आधुनिकता से कई नकारात्मक बदलाव आते हैं; इसके अलावा माओवाद नें भी एक उपनिवेश बना कर बहुतायत गोंड बाहुल्य क्षेत्रों में जीवन का तरीका, परम्परा और संस्कृति पर प्रहार किया है। यह कोशिश मुझे किसी पौधे को जड से उखाडने के बाद नये बीज लगाने जैसी लगती है। यह बिलकुल अलग समाज का जन्म होगा जिसमें न तो बस्तरिया मिट्टी की महक होगी न पारम्परिक जीवंतता। जिसे इस कटुसत्य का अनुभव करना हो वे वीरान होते जंगलों, सिसकती देवगुडियों और मातागुडियों, बंद हो चुके घोटुलों, ले जाने वालों की राह तकते पाटदेवों के अवशेषों में उस बदलाव का आईना देख सकते हैं जो कैंसर की तरह शनै: शनै: बस्तर से बस्तरियापन खाये जा रहा है।

नक्सलबाडी से आरंभ हुआ आन्दोलन एक दिन वहीं दम तोड देता है। आन्ध्र के मुलुगु के जंगलों में पैर पसारने की कोशिश असफल होती है तो बंदूखे बस्तर का रुख कर लेती हैं। यह सबकुछ यहाँ से भी मिट जाने वाला है केवल समय की ही देरी है चूंकि यह इस धरती का स्वत: स्फूर्त आन्दोलन नहीं है, इस आन्दोलन नें इस मिट्टी के ‘सरोकारों से’ और यहाँ के ‘सरोकारों के लिये’ जन्म नहीं लिया अपितु यहाँ पाव धरने के बाद जमने और फैलने के लिये सरोकार तलाशे गये हैं। यह भूमकाल नहीं है। बस्तर में यह एक समस्या की तरह अवतरित हुआ तथा अनेक समस्याओं का जन्मदाता बन कर प्रसारित होता जा रहा है। हाँ इसका समाधान कोई जादू की छडी नहीं है लेकिन है तो बस्तरियों के पास ही। बस्तर का खून पीने वाले और भी कारक हैं जिसमें व्यवस्थागत दोषों से भी मुँह नहीं मोडा जा सकता। भ्रष्टाचार और शोषण कल भी बस्तर का सच था और आज भी है।

कुछ मोटे समाधानों पर पहले बात, नक्सलियों नें बहुत योजनाबद्ध तरीके से पटेल-माझी व्यवस्था द्वारा बस्तर के जंगल और शहर के बीच जारी संवाद को तोड दिया है। मुरिया दरबार अब केवल परम्परा रह गया है जबकि यह संवाद के पुनर्स्थापन की सबसे मजबूत कडी बन सकती है। यह समय बस्तर विश्वविद्यालय को अधिक अधिकार और स्वायत्तता देने का है जिससे न केवल आदिवासी भाषा, संस्कृति, इतिहास आदि पर शोधमूलक कार्य आरंभ हो सकें अपितु सीधे आदिवासी क्षेत्रों में संचालित महाविद्यालयों के माध्यम से रोजगार मूलक पाठ्यक्रम संचालित किये जा सकें। बस्तर में जब तक उच्च शिक्षा पर इस प्राथमिकता के साथ कार्य नहीं किया जायेगा कि यहाँ के बच्चे अंचल से बाहर निकल कर भी कार्य करने और देश की मुख्यधारा में सक्रिय योगदान देने जैसी क्षमता विकसित कर ले तब तक विकल्पहीनता की स्थिति तो बनी ही हुई है जो युवाओं को हताशा में गलत राह चुनने का अवसर प्रदान करती है। धार्मिक विश्वास को बहुत ही धैर्यपूर्वक आधुनीकीकरण से जोडा जा सकता है जो आदिवासी शिक्षित युवक बखूबी अंजाम दे सकते हैं - जहाँ हाशिये पर चले गये गुनिया, सिरहा और ओझा पारम्परिक चिकित्सा पद्यति के प्रशिक्षण के साथ असंभव क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधायें बन जायें। [दुर्भाग्य वश मैं उस औषधि का नाम नहीं जानता, बचपन में मेरी पैर की हड्डी टूट जाने की अवस्था में उस अर्क से मालिश की जाती थी जिसके आश्चर्यजनक परिणाम मैने स्वयं महसूस किये हैं।] सहकारिता को आन्दोलन बनाये जाने के सख्त आवश्यकता है, अपितु दूर सुदूर क्षेत्रों में किसी समझौते के तहत नक्सली भी सहकारिता के लाभों को ग्रामीणों तक पहुँचाने में सहभागी बने तो आपत्ति नहीं होनी चाहिये। वन विभाग तथा पुलिस विभाग की कार्यशैली में बहुत खामियाँ हैं तथा इनके बेहतर प्रशिक्षण व सुधार की आवश्यकता बहुत समय से है। मुझे इन दोनों ही विभागों में स्थानीय अधिकता आवश्यक लगती है। एक और बात कि घोटुल जैसी संस्थायें पुन: जीवित की जानी चाहिये संभव हो तो आदिवासी समाज स्वयं उनमें किये जाने वाले बदलावों पर विचार करे तथापि सामाजिक समरसता और युवा पीढी के मध्य भावनात्मक और वैचारिक आदानप्रदान का यह मंच ध्वस्त नही होना चाहिये, किसी भी हाल में।

बस्तर में शिक्षित आदिवासी युवकों से ही उम्मीद बंधती है कि वे अपनी जडों की तलाश करने का यत्न करें। दुनिया के सभी जागरूक समाजों में भीतर से ही बदलाव हुए हैं। झारखण्ड के भगवान बिरसा मुण्डा के आन्दोलन के विषय में पढने के बाद मैं रोमांचित हो उठा था साथ ही यह पीदा भी हुई कि बस्तर के अनेकों नर-देवताओं तथा  बिरसा-मुण्डाओं को यह देश जानता ही नहीं। स्वयं बस्तर में आदिवासी युवा अनभिज्ञ हैं कि उनके अतीत में ही वर्तमान पर गर्व करने के हजारो कारण छिपे हुए हैं। इस धरती के पास अपने भगतसिंह और अपने गाँधी भी हैं तथा अगर उनके विशय में बस्तर की वर्तमान एवं आने वाली पीढी भी जागरूक हो जाये तो वह आन्दोलनों के वास्तविक अर्थ समझ सकेगी तथा भटकाव उनके लिये सहज रास्ता नहीं रहेगा। बहुत आवश्यक है कि आदिवासी आन्दोलन के नायकों आजमेर सिंह (1775); गेन्दसिंह (1825); दलगंजनसिंह (1842); श्यामसुन्दर जिया (1850); धुर्वाराव, व्यंकुटराव (1857); रामभोई, जुग्गाराजू, नागुलदोरा, कुन्यादोरा (1859); जुगराज कुँअर (1878); हिडमा माझी (1876); गुण्डाधुर, डेबरीधुर, हिडमापेद्दा, डोडापेद्दा, मुकुन्ददेव माछमारा, मूरतसिंह, रोडापेद्दा, सुकू पनारा, चकरू मुरिया, जोगी परजा, हरि चालकी, मड़कामी मासा, बोकड़ा बोडी, कुंडी कोसा, कुराटी सोमा (1910)  आदि पर समौचित जानकारियाँ पुस्तकों-पाठ्यपुस्तकों से माध्यम से बस्तर के आदिवासी जनमानस तक पहुँचें। यह शिक्षित बस्तरियों को ही करना होगा कि अपने गाँवों से जुडे रह कर मौखिक इतिहास और वर्तमान के सरोकार के बीच लम्बे समय से टूट गयी कडी को जोडने की कोशिश करें। यह शिक्षित आदिवासी युवकों का ही दायित्व है कि उनके बच्चे एक बेहतर भविष्य का सपना भी बुनें और मांदर की थाप पर थिरकना भी नहीं भूलें। हम दिल्ली तक अपनी बात जब पहुँचाने पहुँचे तो ठसके से मिनरल वाटर को खोल कर पानी गटकना भी जानें तथा अपनी मिटटी पर पैर धरते ही यहाँ की स्पन्दन भी शिद्दत से महसूस कर सकें और तूम्बें से गट गट गला तर करने में गर्व हमारा साथ दे। हाँ बदलाव भीतर से ही आयेगा बस्तरियों को ही जुटना होगा और निर्मित करना होगा अपना प्रगतिशील समाज।    

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Thursday, July 05, 2012

यह मुलाकात एक अविस्मरणीय संस्मरण बन गयी। [यात्रा वृतांत, भाग - 2]




सुबह सुबह रिम झिम बरसती बरखा नें एक बार कार्यक्रम पर पुनर्विचार करने की स्थिति ला दी थी। साथी अनुज जी के साथ उनकी बाईक पर ही निकल पडा। पटना शहर से लगभग सौ किलोमीटर से कुछ अधिक की दूरी पर अवस्थित हैं नालंदा के खण्डहर। पटना वुमेंस कॉलिज की बिल्डिंग से कुछ आगे निकलते दुर्घटना हो गयी। एक बाईकसवार नें गलत साईड से ओवरटेक किया और टकराने की स्थिति से बचने की कोशिश में तथा बारिश के कारण गीली सडक होने के कारण अनुज जी का संतुलन बिगडा और हम दोनो मय-सामान के सड़क पर। हल्की चोटे हैं थोडा कमर में दर्द भी है लेकिन कपडे झाड कर हम आगे बढ गये।

बिहार शरीफ पहुँने से लगभग पाँच-छ: किलोमीटर पहले ही चाय पीने के लिये छोटी सी दूकान पर रुका जिसे एक वयोवृद्ध चला रहे थे। चाय पीते पीते गंगा नदी और उसकी पवित्रता से बात शुरु हुई। थोडी ही देर में एक अन्य बुजुर्ग श्रोता भी इस चर्चा में सम्मिलित हो गये तथा अब बात राजगीर के उस इतिहास की होने लगी जिसमें से अधिकांश को आप जनश्रुतियाँ कह् कर वर्गीकृत करेंगे। एक बार लाला जगदलपुरी जी नें किसी चर्चा के दौरान कहा था कि जनश्रुतियों और मौखिक इतिहास को अनदेखा मत करना अन्यथा सत्य तक पहुँचने की किसी महत्वपूर्ण कडी को छोड दोगे। आज भी यही बात सत्य सिद्ध हुई क्योंकि गंगा से चर्चा जरासंध तक पहुँची थी चूंकि राजगीर में उनका अखाडा और खजाना होने जैसी मान्यतायें भी विद्यमान हैं। फिर पुरानी जमीनदारी व्यवस्था पर बात चल निकली कि यह इतना उर्वरा क्षेत्र है कि एक समय चार जमीन्दारों में यहाँ से वसूल लगान का पैसा बटता था। एक एक और दो दो पैसों के चलन की अर्थव्यवस्था के युग में भी यहाँ से लाख रुपये से अधिक की आमद होती थी। बहुत सी बाते हुईं और इस बीच चर्चा को विराम न लगे इस लिये मैं तीन कप चाय भी पी गया था। यह पीढी अपने अनुभवों से भरी हुई है, वे मुक्त हृदय से हमें और हमारी संततियों को अपना अब तक का अर्जित दे देना चाहते हैं। आवश्यकता बस उन्हें अपनी ही धुन में बोलने देने भर की है फिर अगर आपमें क्षमता है तो बटोर लीजिये यह अमूल्य निधि। जब “आमचो बस्तर” पर काम कर रहा था तब बहुत से सवाल एसे थे जिनके उत्तर पाने की जिज्ञासा में जिस भी चेहरे की ओर देखता अधिकांश डरकर मुँह फेर लेते थे। मुझे वहाँ भी बुजुर्ग आदिवासी पीढी ने ही सबसे अधिक सहयोग दिया था। उनकी बातों से ही मेरे उपन्यास की बहुत सी लघुकथायें बन पडी हैं।.....।

जब चलने लगा तो बुजुर्ग दूकानदार नें पैसे लेने से इनकार कर दिया। बहुत मुश्किल से उनको पैसे थमाये तो कुछ क्षण वे मेरा हाँथ थाम कर खडे ही रहे। मैंने उनके नाम नहीं पूछे और वे मेरा नाम नहीं जानते; मैं यह भी जानता हूँ कि दुबारा हमारी मुलाकात शायद ही हो लेकिन आत्मीयता के उस स्पन्दन को कभी नहीं भूल पाउंगा। बहुत कुछ पाया मैंने इन पलों में।
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पाटलीपुत्र के पुरावशेषों से बस्तर की तलाश!! [यात्रा वृतांत, भाग - 1]




कुछ दिनों का अवकाश। अभी कुछ दिन पटना मे हूँ। एक छोटा सा शोध विषय ले कर आया हूँ - एक समय के समृद्ध शासकों का दौर और तत्कालीन बस्तर से उनके राजनीतिक सम्बन्ध पर हो सकता है कोई सूत्र, कोई संदर्भ या कोई एसी शिला ही मिल जाये जो मुझे देख कर कहे कि आओ मैं देती हूँ तुम्हारे सवालों के जवाब!! बस्तर पर बहुत काम हुआ है और मैं शायद ही उन संदर्भों में कुछ नया जोड सकूं लेकिन पंक्तियों के बीच पढते हुए कई सवाल कुलबुलाते रहे जिन्हें मैने अपनी डायरी में उतार लिया है। उनके जवाब तो तलाशूंगा ही और उसके लिये पाटलीपुत्र के पुरावशेषों से मिलने का कार्यक्रम है कल से - राजगीर, नालंदा, वैशाली और बोध गया तो निश्चित ही। पटना में हृषिकेश जी से भी मिलूंगा इसी दौरान..।

इस पोस्ट के साथ लगी हुई तस्वीर भागलपुर के निकट अवस्थित प्राचीन विश्वविद्यालय विक्रमशिला की है। यहाँ तक पहुँचने के मार्ग नें मायूस लिया था तथापि इस धरोहर के संरक्षण के प्रयासों से आंशिक संतोष मिला। दुर्भाग्य वश स्थानीय लोगों में इस धरोहर के प्रति बहुत ललक देखने को नहीं मिली। यहाँ अवस्थित मुख्य भवन, छात्रावास के अवशेष, कक्षायें आदि आदि के भग्नावशेषों को देख कर गर्व किया जा सकता है कि यह हमारी भारतभूमि की थाती रही है। जहाँ कभी विक्रमशिला का पुस्तकालय था वह स्थान मनोहारी है तथा आज के विश्वविद्यालयों को अभी भी शिक्षा के मायने सिखाने में सक्षम है। आम का एक वृहत बागीचा जहाँ स्थान स्थान पर अध्येताओं को बैठने, मनन-चिंतन और विमर्श करने के स्थल साथ ही संदर्भ एकत्रित रखने के भवन के अवशेष यह बताते हैं कि हमने अपनी अध्ययन परम्परा को खो कर शायद अपना ही सर्वाधिक नुकसान किया है और महज किताबी कीट हो गये हैं। हमने अपनी जडों से अपने पाँव खींच लिये हैं इस लिये ही अपनी धरोह्जरों को खंडहर कहते हैं और उनकी उपेक्षा पर ग्लानि भी महसूस नहीं करते।
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यात्रा समय जून 18 - 2जुलाई के मध्य।

Saturday, June 23, 2012

देवी शक्तियों का बस्तर

व्यवस्था में बदलाव वस्तुत: एक पूरी संस्कृति का पटाक्षेप भी है। बस्तर के संदर्भ में मुख्यत: दो कालखण्ड मायने रखते हैं जब इस तरह के बदलाव देखे गये। पहला समय था जब नाग राजाओं (760-1324 ई) की पराजय हुई तथा अन्नमदेव (1324-1369 ई.) सत्तासीन हुए तथा दूसरा कालखण्ड जब स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात न केवल अंगेज सत्ता द्वारा संचालित काकतीय शासन का समापन हुआ तथा इस घोर आदिवासी क्षेत्र में लोकतंत्र के चरण पडे। इन दोनो ही समयों में बदलाव को सहज स्वीकार किया गया हो एसा नहीं है; अपितु बदलने वालों नें धर्म और धार्मिक मान्यताओं की आड ले कर ही अपनी स्वीकार्यतायें सुनिश्चित की हैं। इतिहास तो राजाओं के होते हैं किंतु अपनी प्रकृति और प्रवृति में बदलाव आम जन का ही होता है तहापि उसकी कहानियाँ कभी भी दस्वावेजबद्ध नहीं की गयीं। इतिहास को धर्म मान्यताओं और आस्थाओं से समझने की कोशिश यदि नहीं की गयी तो वह तलवार बाजों की जीत हार के आँकडे भर रह जायेगा। राजा बदलता है तो प्रजा भी बदलती है।

इस बदलाव और कशमकश को समझने के लिये बस्तर अंचल की दो देवियों दंतेश्वरी तथा मणिकेश्वरी का प्रसंग लेते हैं। बस्तर में देवी महात्म्य सर्वदा से स्थापित रहा है तथापि माँ दंतेश्वरी एवं मणिकेश्वरी देवी के स्थापना समयों को ले कर विद्वानों में मतभिन्नता रही है। बस्तर राज वंशावलि (1853) में एक श्लोक विशेषरूप से ध्यान खींचता है – नवलत्क्षनुर्धराधिनाथे पृथेवीं शासति काकतीयरूद्रे। अभवत्परमाग्रहारपीडाकुचकुम्भेषु कुरंगलोचनानाम। प्रतापदुर्ददेवस्य पुरकांचनवत्षणम। यामात्धमहरत्कालम पुरा वै यज्ञ हेतवे। प्रतापरुद्रनृपतिस्साक्षाद रुद्रांशसम्भव:। शिवार्चनपरो भक्तो माणिकीशक्ति सेवित:। यह श्लोक वस्तुत: वारंगल के राजा प्रतापरुद्र की स्तुति की तरह ही है जो बताता है कि काकतीयों के पास प्रबल सैन्यशक्ति थी जिसमे नौ लाख धनुर्धर थे। वे धनी थे। धर्माचरणी थे। इस श्लोक की अंतिम पंक्ति कहती है कि काकतीय मणिकेश्वरी देवी के अनन्य भक्त थे तथा शिव की उपासना/अर्चना भी करते थे।

वस्तुत: प्रतापरुद्र (राजा अन्नम देव जिन्होंने बस्तर में काकतीय वंश की स्थापना की) के बडे भाई थे तथा वारंगल पर मुस्लिम आक्रांताओं की विजय से पहले वे सर्वाधिक प्रतापी तथा धनाड्य राजाओं में गिने जाते थे। अत: यदि इस श्लोक के आधार पर माता मणिकेश्वरी देवी को काकतीय राजाओं के साथ वारंगल से बस्तर लाया जाना माना जाये तो फिर माता दंतेश्वरी का बस्तर में स्थान अधिक प्राचीन होगा। इस सम्बन्ध में लाला जगदलपुरी अपनी किताब “बस्तर – लोक कला संस्कृति प्रसंग” में लिखते हैं कि “बारसूर की प्राचीन दंतेश्वरी गुडी को नागों के समय में पेदम्मा गुडी कहा जाता था। तेलुगू में बडी माँ को पेदम्मा कहा जाता है। तेलिगु भाषा नागवंशी नरेशों की मातृ भाषा थी। वे दक्षिण भारतीय थे। बारसूर की पेदम्मा गुडी से अन्नमदेव नें पेदम्मा जी को दंतेवाडा ले जा कर मंदिर में स्थापित कर दिया। तारलागुडा में जब देवी दंतावला अपने मंदिर में स्थापित हो गयी तब तारलागुडा ग्राम का नाम बदल कर दंतावाडा हो गया, उसे लोग दंतेवाडा भी कहने लगे।“


छत्तीसगढ परिचय में प्रकाशित डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र का एक आलेख आलेख इस सम्बन्ध में बिलकुल अलग तथ्य सामने लाता है। वे लिखते हैं “काकतीय तथा दंतेश्वरी के नामो के पीछे कुछ रहस्य हैं कि इस घराने के आदि पुरुष महाभारतकालीन पाण्डव थे। दिल्ली की दुर्दशा के बाद उन्होंने दक्षिण की शरण ली। गुरु द्रोणाचार्य की शिष्य परम्परा के कारण उन्होंने अपने वंश का नाम काकतीय रखा। संस्कृत में काक को द्रोण भी कहते हैं। संस्कृत में हस्ती को दंती भी कहते हैं इस तरह हस्तिनापुर की अधिष्ठात्री देवी हस्तेश्वरे कहलाने के बदले दंतेश्वरी कही गयीं। इस कथन के समर्थन में ईतिहासकार हीरालाल (1916:289) लिखते हैं कि बस्तर के नागवंशी राजाओं की कुलदेवी मणिक्येश्वरी थीं। बस्तर के अनेको अभिलेखों में नागफण मणि की चर्चा की गयी है अत: यह आधार भी नाग राजाओं के मणिकेश्वरी देवी के उपासक होने की कडी की तरह जुडता है। इस कडी को जोडने का कुछ प्रयास डॉ. हीरालाल शुक्ल नें भी लिया है जहाँ अपनी किताब चक्रकोट के छिन्दक नाग (760 ई. से 1324 ई) में वे लिखते हैं कि “मणिकेश्वरी एक तांत्रिक देवी हैं। भैरवयामलमंत्र के अनुसार मणि एक चक्र है, तेज या ज्ञानसन्दोह का उपलक्षक है तथा मणिमण्डप पर विन्ध्यवासिनी देवी बैठती हैं।“ वे आगे लिखते हैं कि मणिकेश्वरी विन्ध्यवासिनी देवी का पर्याय हैं। इस सम्बन्ध में ध्यातव्य है कि सोमेश्वर प्रथम जैसा नाग शासक चक्रकोट पर पुन: साम्राज्य स्थापित करने में विन्ध्यवासिनी देवी का प्रसाद (ईपी. इंडिका 10:37) मानता है – विन्ध्यवासिनीदेविवर प्रसाद (तदेव 10:25) के अभिलेखीय सन्दर्भ मिलते हैं।

उपरोक्त सभी संदर्भ भ्रमित करते हैं क्योंकि कोई भी विद्वान एक स्पष्ट दिशा नहीं देते। यहाँ तक कि हर शिलालेख से अपने-अपने मायने निकल रहे हैं। यदि विन्ध्यवासिनी ही मणिकेश्वरी हैं तो यह नामपरिवर्तन किस लिये? यदि मणिकेश्वरी काकतीयों की आराध्य हैं तो नाग सत्ता की आराध्य देवी विन्ध्यवासिनी एक तीसरी देवी सत्ता होनी चाहिये? यदि अन्नमदेव के साथ मणिकेश्वरी देवी के पावन चरण बस्तर पर पडे तो दंतेश्वरी माता का अस्तित्व यहाँ और प्राचीन सिद्ध होता है जैसा कि लाला जगदलपुरी आदि विद्वान मानते हैं। क्या ये सभी देवी शक्तियाँ पर्याय मात्र हैं? क्या इन नामों के पर्याय होने के पीछे कोई दंतकथा उपलब्ध है? इस विषय पर विद्वानों ने कोई संदर्भ उपलब्ध नहीं कराये हैं। एक महत्वपूर्ण कथन जो इस विषय में सभी प्रसंगों का सामान्यीकरण करता है वह इलियट का है। ईलियट (1856:3) बताते हैं कि “वर्तमान राजाओं के पूर्वज बस्तर आने से पूर्व मणिकेश्वरी देवी के उपासक थे जब वे बस्तर आये तो मणिकेश्वरी देवी नें दंतेश्वरी देवी का रूप ले लिया।


तथ्य अभी और शोध की माँग करते हैं, तथापि वह चाहे नाग युग हो, काकतीय हो अथवा वर्तमान काल देवीपूजा के अनेकों विधान तथा शक्तिशाली देवियों के यहाँ अवस्थित होने के अनेकानेक प्रमाण उपलब्ध मिलते हैं। नारायणपुर से कुछ ही दूरी पर छींदपाल गाँव में महिषासुरमर्दिनी का नागयुगीन मंदिर आज भी उपलब्ध है तो कुरुषपाल के मंदिर में भी महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। नाग-काल से ही बस्तर में माँ दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी तथा कंकालीदेवी की पूजा की जाती रही है। इसके साथ ही सप्तमातृकाओं के पूजन की प्राचीनकालीन प्रथा (शुक्ल:1977) का भी उल्लेख यहाँ प्रासंगिक होगा। कहते हैं कि ये सप्तमातृकायें आदिम कबीलों के प्रभाव  से ही अवतरित हुई हैं – सा मातेव भविष्यत्वात तेनासौ मातृकोदिता (तंत्रलोक 4:15) ये सप्तमातृकायें - ब्राम्ही, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, एन्द्रानी तथा चामुण्डा कही जाती हैं। इन सप्तमातृकाओं के स्मारक बस्तर के सातगाँव (कोण्डागाँव), भगदेवा (कोण्डागाँव) तथा मातला (नारायणपुर) मे मिलते हैं। वृक्षों, नदी, नालों, टीलों, पर्वतों या किसी भी प्राकृतिक वस्तु में इनका आवास हो सकता है। इन देवियों को प्रसन्न करने के लिये बस्तर में आज भी ककसाड (देवी यात्रा) की परम्परा चल रही है (शुक्ल, 1986)।  


जब दंतेवाडा में अवस्थित माँ दंतेश्वरी तथा माँ मणिकेश्वरी की बात चल ही रही है तो कुछ बात शंखिनी और डंकिनी नदियों की पावनता और उसके मिथकीय इतिहास पर भी। डॉ. हीरालाल शुक्ल से प्राप्त संदर्भ से ही विषय आगे ले जाना चाहूंगा (चक्रकोट के छिन्दक नाग: 140) कि बैद्धग्रंथों में जिसे वज्रयोगिनी कहा गया है तथा तंत्रशास्त्र में जो वज्र या छिन्नमस्ता कही गयी है वह वज्रयान सम्प्रदाय की देवी प्रतीत होती हैं तथा उनकी प्राण प्रतिष्ठा बस्तर में उसकी सहचरियों शंखिनी तथा डंकिनी नाम से अनुमानित की जा सकती हैं। इन नामों की दो नदियाँ दंतेवाडा होते हुए आज भी प्रवाहित होती हैं। शंखिनी को योगिनी या वर्णिनी भी कहा गया है। वह रजोगुण प्रधान व मोक्षप्रदा हैं। यह छिन्नमस्ता की दाहिनी ओर योनिमुद्रा में रहती हैं। यह बडे वेग से उठती हुई रक्त की धारा अपनी स्वामिनी को पिलाती हैं। हड्डियाँ इस योगिनी के आभूषण हैं। इसके हाँथ में चमकता हुआ भयंकर खड्ग रहता है। इसका वर्ण, केश और नेत्र रक्तिम होते हैं। यह विवस्त्र रहती हैं। डंकिनी एक दिगम्बरी तांत्रिक देवी हैं। इसके केश खुके हैं। यह कृष्णवर्णा तमोगुणयुक्त हैं। यह प्रचंड हैं तथा प्रलयकालीन घोर घटाटोप की तरह इसका काला रूप है। विकराल दाँतों के कारण इनके मुख, उदरविवर तथा कण्ठ को नहीं देखा जा सकता। जिव्हा का अग्रभाग लपलपाता रहता है। इनकी दोनों आँखें बिजली की तरह चंचल हैं। ये दोनो देवियाँ बस्तर के जनजातीय गीतों में बार बार आती हैं।


यहाँ संदर्भ को विवेचना के बिना नहीं छोडा जा सकता। बस्तर में अपना मातृसत्तात्मक दिव्य आवरण है। यह एक समृद्ध क्षेत्र के शनै: शनै: पिछडते जाने को समझने की कडी भी है। रायबहादुर डॉ. हीरालाल नें अपनी किताब मध्यप्रदेश का इतिहास के दसवे अध्याय में उल्लेख किया है कि “नागवंशी काल में बस्तर में अच्छे विद्वान रहते थे। वह निरा मुरिया-माडिया पूर्ण जंगल नहीं था जैसा कि इन दिनो है। वहाँ की प्राचीन शिल्पकारी भी प्रसंशनीय है। बस्तर राज्य एसी जगह पर था जहाँ अन्य राजा जब चाहे आक्रमण कर बैठते थे, तिस पर भी नागवंशी अपने को सदैव संभालते रहे और चार-पाँच सौ वर्षों तक किसी की दाल नहीं गलने दी।“ यह पहलू तब बदला जब नाग साम्राज्य अनेकों शाखाओं और मण्डलों में विभाजित हो गया। अन्नमदेव को यहाँ आ कर एक दो नहीं कई लडाईयाँ जीतनी पडी क्योंकि नाग पंचकोशी राजा रह गये थे। प्रजा त्रस्त थी कि किसके प्रति प्रतिबद्ध रहें और किसका साथ दें उन्होंने अन्नमदेव का साथ दिया। अन्नमदेव नें स्थानीय मान्यताओं को अक्षुण्ण रखने का आश्वासन दिया था। उनकी लोकप्रियता इसी कारण बढी तथा कालांतर में वे स्वयं कई दंतकथाओं का हिस्सा बन गये। काकतीय शासन नें वारंगल में अपनी समृद्धि का एक बडा काल देखा था और उसके दुष्परिणाम भुगते थे अत: अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद यह आवश्यक था कि राज्य के दरवाजे मुसलमान आक्रांताओं के लिये बंद कर दिये जायें। इस बंद करने की प्रवृत्ति नें बस्तर को रहस्यमयी और गोपनीय बना दिया। अन्नमदेव नें धन संचय और समृद्धि बटोरने की जगह शांतिप्रिय तथा कम चर्चा में रहने वाली सत्ता का विकल्प चुना जिसे उसके बाद वाले शासको ने भी आगे बढाया। परिणाम यह हुआ कि आम जन पीछे जाते गये। आम जन जनजातियों में परिवर्तित होते चले गये तथा कुछ सौ सालों में ही हालात इतने बदतर हो गये कि जिन क्षेत्रों मे राजधानियाँ हुआ करती थी वहाँ के नागरिको पर आदिवासी होने का चोला चढ गया। वे अनोखे, विरक्त और अबूझ होते चले गये। यहाँ सत्ता और प्रजा के बीच जुडने की सबसे बडी कडी वही देवियाँ रही हैं जिन्होंने सत्ता परिवर्तन के साथ साथ अपनी मान्यताओं के परिवर्तन का दंश भी सहा है। राजा प्रजा तथा देवी का यह अंतर्सम्बन्ध स्वतंत्रता के पश्चात भी जारी रहा। राजा प्रवीर नें देवीमहात्म्य को गहराई से समझा था। वे जानते थे कि भले ही सत्ता की कडी उनसे टूट गयी है लेकिन वे देवी के माध्यम से आम जन तक अपनी पहुँच बनाये रख सकते हैं। उन्होंने स्वयं को देवी दंतेश्वरी का अनन्यतम पुजारी कहलाना अधिक पसंद किया। एक पुजारी बनने के कारण आदिवासी जनता नें अपने बीच एसा संत पाया जो ताज छिन जाने के बाद भी उनका ही है वह उनकी आस्थाओं के साथ खडा रहता है। प्रवीर की इस पुजारी भूषा नें भी उन्हें लोकतंत्र में एक स्वीकार्य नेता भी बनाया था। इतना सशक्त नेता कि 1961 में जब वे राजनीतिक शक्तिपरीक्षण करना चाहते थे तब भी उनके द्वारा दशहरा पर्व चुना गया। इस वर्ष का दशहरा बस्तर के इतिहास में दर्ज है जब इतनी भीड जगदलपुर में हो गयी थी कि सडकों पर चलने के लिये इंच मात्र भी जगह नहीं बची थी। प्रवीर की हत्या के बाद बाबा बिहारीदास प्रकरण भी आस्था नेता और प्रजा के अंतर्सम्बन्ध की ही अगली कडी था।
 

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Saturday, June 16, 2012

बस्तर का एक एसा नायक जिसे किसी नें कभी याद नहीं किया


[प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव (1908 – 1960)]


एक किताब के बारे में जानकारी मिली जिसका शीर्षक है - Financial Position of Govt. of India (How decay has set in); लेखक थे प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव। बहुत तलाश किया किंतु दुर्भाग्यवश यह किताब अब विलुप्त हो गयी है, बिलकुल वैसे ही जैसे इसके लेखक को कोई नहीं जानता, उसके संघर्ष को शत-प्रतिशत भुला दिया गया है। यह परिचय देना आवश्यक है कि प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव बस्तर की महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921-1936) के पति थे। यह एक पंक्ति का परिचय केवल उनका बस्तर से सम्बन्ध निरूपित करता है वस्तुत: प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव का जन्म मई 1908 में मयूरभंज (उड़ीसा) में हुआ था। वे राजा दामचंद्र भंजदेव के पुत्र थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा राजकुमार कॉलिज, रायपुर में हुई थी। प्रफुल्ल कुमार भंजदेव की कथा एक एसे संघर्षशील व्यक्ति की कहानी है जिसने केवल अपने सिद्धांतो के लिये मिटना ही जाना किंतु वह समझौते करना और झुकना जानता ही नहीं था। 

1921 में सत्यकेतु पत्रिका (हिन्दी पाक्षिक) में प्रकाशित श्रीसत्यनाथन के एक आलेख ‘बस्तर राज पर विपत्ति’ से यह जानकारी मिलती है कि अंग्रेजों नें जबरदस्ती महारानी प्रफुल्ल कुमारी का विवाह प्रफुल्लचंद्र भंजदेव से करवाने की साजिश रची थी। ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटर ‘टकर’ तथा तत्कालीन पॉलिटिकल एजेंट ‘ली’ नें जबरदस्ती यह रिश्ता महारानी प्रफुल्ला पर थोपा था किसके पीछे ब्रिटिश राजभक्ति के तहत निर्णय को मानने का अतिरिक्त दबाव भी डाला गया था। उस दौर में “प्रस्तावित बस्तर-मयूरभंज सम्बन्ध का रहस्योद्घाटन” शीर्षक से 33 पृष्ठ की एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसमें इस विवाह का मुखर विरोध किया गया था। स्वयं महारानी प्रफुल्ल नें अपनी सगाई की सामग्री फेंक दी थी। जबरन विवाह की यह राजनीति राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी जिसके उल्लेख तत्कालीन समाचार पत्रों - आज (वाराणसी, 15.04.1924); अमृतबाजा पत्रिका (कलकत्ता, 18.04.1924); दैनिक फॉरवर्ड (कलकत्ता, 25.04.1924), भविष्य (कानपुर, 15.05.1924); महिलासुधार (कानपुर, 28.06.1924); प्रणवीर (नागपुर, 16.06.1924); ताज (उर्दू दैनिक – दिल्ली, 3.04.1924); एशिया (उर्दू दैनिक – दिल्ली, 4.04.1924) आदि में मिलता है। अंग्रेजों का यह सारा प्रक्रम संभवत: उनकी जड खोदने के लिये ही था क्योंकि महारानी की सहमति के बिना राजनीतिक दबाव डाल कर कराया गया यह विवाह वर्ष 1927 में सम्पन्न हुआ जो कालांतर में एक चिरस्मरणीय प्रेमकहानी में परिवर्तित हो गया। यह मिलन केवल काकतीय-भंज राजवंशों का मिलन नहीं था, यह केवल बस्तर-मयूरभंज मिलन ही नहीं था अपितु यह एक आदिवासी राजनीति के साथ राष्टीय संवेदनाओं और मुख्यधारा का सम्मिलन भी था। 

बस्तर रियासत के भीतर राष्ट्रीय भावना का सूत्रपात करने का श्रेय वस्तुत: प्रफुल्ल चंद्र भंजदेव को जाना चाहिये। प्रफुल्ल एक प्रगतिशील रियासत से बस्तर आये थे तथा उनकी अपनी सोच महारानी के फैसलों के साथ प्रतिपादित होने लगीं। बस्तर की राजनीति को एक एसा सलाहकार मिल गया था जो शनै: शनै: ब्रिटिश आँख का काँटा बनने लगा। महारानी के दौर में निजाम शासन की दृष्टि बस्तर पर पड गयी थी तथा इसके लिये सर्वप्रथम प्रफुल्ल को सहमत कराने की कोशिश की गयी। उन्हें धन सम्पत्ति के साथ साथ एक बडी जमीन्दारी प्रदान करने का भी प्रलोभन दिया गया था। प्रफुल्ल बस्तर रियासत के पक्ष में खडे दिखे तब जा कर अंग्रेजों की समझ में आया राजनीतिक समझौते के तहत जबरन विवाह का तो पासा फेका गया था वह उलटा पड गया है; प्रफुल्ल कृतज्ञ नहीं अपितु अंतरात्मा से जागरूक व्यक्ति थे। बाध्य हो कर अंग्रेजी सरकार के दबाव में उच्च शिक्षा के लिये उन्हें इंग्लैंड भेजा गया जहाँ उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में बीए ऑनर्स की पढाई के लिये दाखिला लिया। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की तथा वकालत भी प्रारंभ की तथापि वे अपनी पी एच डी पूरी नहीं कर पाये। जब विश्वयुद्ध की परिस्थितियाँ बनीं तब प्रफुल्ल नें मानवता का फर्ज भी निभाया और अंग्रेजी एम्बुलेंस में भरती हो कर जरमनी, फ्रांस, बेल्जियम आदि राष्ट्रों के जख्मी सैनिकों की सेवा करने लगे। अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान वे श्री कृष्ण मेनन के संपर्क में आये तथा भारतीय स्वतंत्रा आन्दोलन के एक सिपाही की हैसियत से उनके साथ कदम से कदम मिला कर सक्रिय हो गये। आपके आलेखों और व्याख्यानों नें भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग में तथा अंग्रेजी सत्ता प्रतिष्ठानों में खलबली मचा दी थी। एक एसा समय जब अंग्रेजी सरकार रियासतों को पंगु बनाने की कोशिश में एडी चोटी एक किये रहती थी उसी दौर में सितम्बर 1934 में प्रफुल्ल हन्द्र भंजदेव ने वीकर्ड़ रिव्यु पत्रिका, लंदन में “द न्यु स्टेस्ट्समैन एण्ड़ नेशन” नाम से आलेख लिखा था जिसमें खुलासा किया था कि “ब्रिटिश शासन के चलते भारतीय राजकुमार और राजा किस प्रकार नपुंसक हो गये हैं। उनकी इस प्रकार की नपुंसकता के पीछे वह मूर्खतापूर्ण शिक्षा भी थी जो उन्हें दी जा रही है।” प्रफुल्ल को इस लेख की बहुत बडी कीमत चुकानी पडी और अंग्रेजों की सीधी नाराजगी झेलनी पड़ी थी। इस आलेख के प्रकाशित किये जाने के तुरंत बाद ही प्रफुल्ल का चरित्र हनन करने की साजिश रची गयी। उन्हें ड़रपोक, व्यसनी तथा सिफिलिस से संक्रमित तक घोषित किया गया। प्रफुल्ल को बस्तर राज्य की ओर से दो हजार रुपये महीना खर्च दिया जाता था। स्वतंत्रता आन्दोलन में उनकी सक्रियता तथा निजाम राज के साथ बस्तर विलय की कोशिशों में सहयोग न दिये जाने के उनके निर्णय से नाराज अंग्रेजों नें यह राशि भी घटा कर आधी कर दी। महारानी की मृत्यु के बाद उन्हें यह राशि मिलना भी बंद कर दिया गया।

बैलाडिला क्षेत्र का बस्तर अथवा छत्तीसगढ में बना रहना वस्तुत: प्रफुल्ल की भी देन माना जाना चाहिये अन्यथा हो सकता था कि यह क्षेत्र निजामशाही के आधीन हो कर आज आन्ध्र का हिस्सा होता। महारानी प्रफुल्ला के समक्ष जब इस तरह का प्रस्ताव वायसराय लॉर्ड लिनथिनगो नें रखा था तब उन्होंने बहुत ही शालीनता और विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था। अंग्रेज मानते थे कि महारानी का यह कदम वस्तुत: उनके पति प्रफुल्ल की सोच की परिणति है। कुछ दस्तावेज और प्रमाण इस ओर इशारा करते हैं कि महारानी प्रफुल्ला की एपेंडिक्स के ऑपरेशन के नाम पर हत्या की गयी थी जिसके पीछे बैलाडिला के लौह खदानों के कारण पैदा हुए नये राजनीतिक समीकरण ही जिम्मेदार थे। प्रफुल्ल की मुखरता देखिये कि यह जानते हुए भी कि अंग्रेजी सता उन्हें गुमनामी की सौगात देगी, वे चुप नहीं बैठे। अपने पुत्र प्रवीरचन्द्र भंजदेव के राज्याभिषेक के तुरंत बाद ही उन्होंने महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी की अंग्रेजों द्वारा किये हत्या के षडयंत्र का रियासत की जनता के सामने पर्दाफाश कर दिया। भयानक परिणाम हुए उनके इस कृत्य के। उनसे अपने ही बच्चों के अभिभावक होने का नैसर्गिक अधिकार छीन लिया गया तथा बस्तर रियासत से निकाला दे दिया गया। बस्तर में प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव की वापसी तब हुई जब देश में अपना पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया। दो लाख से अधिक उपस्थित भीड नें प्रफुल्ल का हृदय खोल कर स्वागत किया था। प्रफुल्ल कुछ समय तक बस्तर में रहे फिर राष्ट्रीय ध्वज को लेकर किसी प्रसंग में उनका अपने पुत्र तथा महाराजा प्रवीर से मनमुटाव हो गया और फिर वे बस्तर छोड कर हमेशा के लिये चले गये। 

निराला व्यक्तित्व था प्रफुल्ल का। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि प्रफुल्ल को सिगरेट और शराब जैसे व्यसन भी नहीं थे। वे सोच से भरे और मृदु मुस्कान लिये जीवंत व्यक्ति थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात वे ओडिशा में आ कर रहने लगे तथा कुछ समय तक राज्य सरकार में रह कर कार्य भी लिया। ओडिशा सरकार की आदिवासियों को ले कर नीति से वे असहमत थे तथा इसी कारण उन्होंने राज्य की राजनीति से अपने हाथ भी खींच लिये थे। इसके पश्चात प्रफुल्ल लगभग गुमनामी का ही जीवन जीते रहे। वे मयूरभंज, कलकत्ता तथा दिल्ली में भी कुछ समयों के लिये रहे तथा इस गुमनाम संघर्शशील व्यक्ति में कब आखिरी स्वांस ली इसकी समुचित जानकारी उपलब्ध नहीं होती है, संभवत: 1960 के आसपास। 

उपसंहार में यही कहना चाहूंगा कि कई गुमनाम नायक हैं जिनके योगदानों को विस्मृत कर के हम बस्तर की विरासत की सही तस्वीर सामने नहीं ला सकते, प्रफुल्ल चंद भंजदेव भी उनमें से एक हैं।

Friday, June 15, 2012

विरोध व्यवस्था का अथवा बस्तर का?

जनपक्षधरता हमेशा व्यवस्था में सुधार अथवा बदलाव की दिशा में इंगित होती है। आप संवेदनशील व्यक्ति हैं तो निश्चित रूप से आपको अपने परिवेश के इर्द-गिर्द की घटनायें कुरेदेंगी, झकझोरेंगी तथा उद्वेलित भी करेंगी। बुनियादी सवाल कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिलकुल एक जैसे हैं और कहीं न कहीं हमारे लोकतंत्र को कोई बडा सरिया आरपार कर गया है, अवस्था गंभीर है। हर तरह की राजनीति और प्रत्येक राजनीतिक दल आकंठ आरोपों में डूबा, भ्रष्टाचारी तथा जनविरोधी होता जा रहा है। सत्ता और माया नें लोकतंत्र की मर्यादा और उसके हर खम्बे को खोखला कर दिया है। किसपर विश्वास की निगाह से देखा जाये? व्यव्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा मीडिया सभी नें अपनी विश्वस्वनीयता खो दी है। इस प्रश्न पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि आमूलचूक परिवर्तन होने चाहिये और हो कर रहेंगे। आम आदमी अपनी जब शक्ति की अभिव्यक्ति करता है तो कोई भी बदलाव असंभव नहीं रह जाते। यहाँ जनपक्षधरता शब्द का कृपया वामपंथीकरण न किया जाये, बुनियादी तौर पर मेरा मानना है कि विचार महत्वपूर्ण होते हैं वे आपको उडनें, सोचने, समझने का मुक्ताकाश देते हैं जबकि विचारधारायें बेडियाँ हैं जो आपके दायरे निश्चित कर देती हैं, इलाके तय कर देती हैं।.....। 

विरोध लोकतंत्र का स्वाभाविक स्वर है। दमन और प्रतिकार की हजारों हजार कोशिशों के बाद भी विरोध की धार जिन्दा है। अभी नाउम्मीदी के आगे नतमस्तक नहीं हुआ गया तथा कई दीपक टिमटिमाते हुए भी जल रहे हैं। दुर्भाग्यवश जिस तरह राजनीतीति की प्रकृति विश्लेषण से परे हो गयी है ठीक उसी तरह आन्दोलनों की विश्वस्वनीयता भी कलंकित हुई है। बहुतायत आन्दोलन छद्म है तथा उनके पीछे या तो कोई दूसरा राजनीतिक समीकरण काम कर रहा होता है या एसी कुछ गैर सरकारी संस्थायें जिनके चन्दे का हिसाब ठीक उसी तरह प्राप्त नहीं हो सकता जैसे कि हमारे नेताओं के स्विसबैक के खातों की जानकारियाँ। बस्तर के परिप्रेक्ष्य में विरोध के तेवरों को समझने की आवश्यकता महसूस होती है। कुछ पत्रकार मित्रों को जानता हूँ जो इमानदार हैं तथा सच के साथ खडे हो कर काम कर रहे हैं। उन्होंने सच की कीमत भी चुकाई है और यह कहने में हिचक नहीं कि आगे भी चुकानी पडेगी। यह राह ही एसी है बंधु और आग पर हर कोई नहीं चल सकता। इमानदार कोशिशे अपना असर भी दिखाती हैं और अनेकों बार जब आपकी व्यवस्था से सीधे सीधे ठन जाती है तब भी, अपना दमन झेल कर भी, अपनी पराजय के बिलकुल किनारे पर आप पाते हैं कि नहीं उम्मीद अभी है। जो दीपक आपने जलाया था उसने कई और रोशन कर दिये तथा धीरे धीरे आप फैल रहे हैं। सच्चाई और वास्तविक मुद्दे ही जनसरोकार बनते हैं, जनमत बनते हैं तथा बदलाव लाते हैं। तथापि बहुत गंभीरता से सोचता हूँ कि आज एसा क्या हुआ कि पूरा देश केवल बस्तर देखता है? मैं याद करता हूँ जब स्नात्कोत्तर के लिये मैने भोपाल में एडमिशन लिया था, वहाँ मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय के गोखले छात्रावास में रैगिंग के दौरान जब मैने बताया कि बस्तर से हूँ तो सभी की निगाह मेरे चेहरे पर गड गयी थी। बस्तर नाम बहुतायत के लिये अनसुना था, एक जो जानता था उसने मुझे उपर से नीचे तक देखा फिर बोला अच्छा!! बस्तर से? लेकिन तुम तो कपडे पहने हो? इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता। 

यह शोषित मिट्टी इन 10-15 वर्षों से ही उपेक्षित नहीं रही जबसे नक्सलवाद के दैत्याकार स्वरूप का साक्षात्कार होने लगा है अपितु काल दर काल यहाँ की उर्वरता, वनोपज, आदिम शालीनता तथा इनने पर्यावास का अतिक्रमण हुआ है। इस अंचल के किसी आन्दोलन में देश भर से आवाज़ नहीं उठी। यहाँ का शोषण जब तक बिकने वाली खबर नहीं बन गया तब तक यहाँ की मांसलता पर ही लिखा जाता रहा। जब बांग्लादेशी रिफ्यूजी बस्तर में बसाये जा रहे थे उस दौर में बोधघाट बंद करो विस्थापन होगा का शोर मचाने वाले समाजसेवी या मानवाधिकारवादी क्या भांग का गोला निगले रहते थे? उस दौर में किसी को दण्डकारण्य परियोजना और उसके तहत बहुत बडी मात्रा में बांग्लादेशी विस्थापितों को बसाना यहाँ की अबूझता, यहाँ की संस्कृति, यहाँ की जनजातियों, यहाँ की लोककला, यहाँ की परम्पराओं पर आघात क्यों नहीं लगा? बस्तर ही क्यों? क्या कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक के भूभाग को छोड कर बस्तर का इस बसाहट के लिये चयन तब एक सांस्कृतिक हमला नहीं था? बस्तर के भीतर से तब आवाजें उठी थीं किंतु वह इस देश का स्वर क्यों नहीं बन सकीं? 

दण्डकारण्य परियोजना के नाम पर उस दौर में लूट-खसोट का एक लम्बा सिलसिला चला। श्री गोरेलाल झा के 1968 में प्रकाशित एक आलेख से उद्धरण है कि “करीब चालीस हजार एकड भूमि जो कि सुरक्षित वन में स्थित थी इस योजना के लिये दी गयी। आदिवासियों को भूमि देने का उतना दुख नहीं है जितनी कि इस नीति से कि भूमिहीन आदिवासियों को तो कोई इस सुरक्षित वन में एक एकड भूमि देने के लिये भी तैयार नहीं है”। एक उदाहरण महाराजा प्रवीर की डायरी में मिलता है कि दण्डकारण्य परियोजना पर युक्ति व बुद्धि बंगाल की ब्युरोक्रेसी लगा रही थी। एक राय आयी कि वहाँ बंगाल में होने वाली बाँस की प्रजाति का रोपण किया जाये क्योंकि उससे रिफ्यूजियों का कुटीर उद्योग संचालित हो सकता था। प्रवीर नें विरोध किया कि बस्तर में अपनी ही तरह के बाँस होते हैं तथा उसी से यहाँ की जनजातियाँ टोकनी सूपा या अन्य कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करती हैं। लाखो रुपये फूंके गये और नतीजा सिफर निकला। यहाँ पाईन रोपण परियोजना के परिणाम भी बांस रोपण जैसे ही भयानक थे। बस्तर में जब मालिक मकबूजा की लूट चल रही थी तब राष्ट्रीय मीडिया का मौन और यहाँ पर दिल्ली के आन्दोलनकारियों का अकाल क्यों था? आज जिनकी यहाँ के शोषण से आह!! निकल आती है; अमेरिका तक से यहाँ के दर्द को गीत बना बना कर गाते है तब इन बीनों को फूंक मारने की फुरसत क्यों नहीं रही थी? लेव्ही को ले कर तथा धान के मूल्य निर्धारण को ले कर प्रवीर नें व्यापक आन्दोलन चलाया था तब उनके समर्थन में मौन क्यों था वह भी एसा मौन कि उनकी नृशंस हत्या के लगभग पचास साल बाद उनके लिये पहली श्रद्धांजली सभा कुछ वर्षों पूर्व ही जगदलपुर में सम्पन्न हो सकी। 1961 का लौहण्डीगुडा गोली काण्ड, 1966 का राजमहल गोली काण्ड अंचल की भीषणतम घटनायें हैं जिनके विषय में आज तक केवल मौन ही पसरा हुआ है। जब बीबीसी के कैमरे बस्तर के घोटुलों में पूरी बेशर्मी के साथ घुसे थे और अधकचरी जानकारियाँ एकत्रित कर उसे यौन फिल्म की तरह विश्वभर में परोस दिया था तब भी केवल और केवल स्थानीय साहित्यकारों और लेखकों नें ही आवाज उठाई थी। मई 1981 में दण्डकारण्य समाचार में प्रकाशित श्री राम सिंह ठाकुर के आलेख का अंतिम पैरा “आज जब कि बस्तर के मूल निवासियों के संस्कृति पर विदेशी अपनी मनमानी कर के फिल्म बना सके वहाँ उस देश के अन्य मूल निवासियों का क्या होगा? उचित तो यही होगा कि बीबीसी द्वारा बनाये गये फिल्मप्रदर्शन पर विश्वस्तरीय रोक लगा दिया जाये और फिल्म को भारत ला कर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाये”। प्रश्न यह है कि इन आवाजों को सुनने वाला कोई क्यों नहीं था? क्या तब देश भर में एक्टिविस्टों का अकाल था? आज भी नक्सली बीबीसी प्रसारणों का ही अनुसरण जानकारी बटोरने के लिये करते हैं जिसका उल्लेख कई बार नक्सल समर्थक लेखकों नें अपने आलेखों में किया है। आज भी बीबीसी के संवाददाताओं के पास ही नक्सली अपने मध्यस्तों के नाम तय करने के लिये एसएमएस भेजते हैं, यह तो सर्वविदित है चूंकि ताजा घटना है। बडी बडी राष्ट्रीय खबरों से बडी घटना थी किरंदुल गोली कांड चूंकि यह 20,000 असंगठित मजदूरों का मसला था। यह उस दौर की घटना है जब नक्सलियों की आमद भी बस्तर में हो चुकी थी। इन मजदूरों से एसी क्या खता हुई थी कि यह घटना केवल स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन कर रह गयी तथा वाम आन्दोलन के नाम पर दादा बन कर घुसे नक्सलियों नें भी घटना पर मौन ही साधे रखा था। दिल्ली का एक्टिविज्म तो हमेशा ही पहले की तरह चुप रहा - नक्सलियों की आमद पर मौन उनकी नृशंसताओं पर मौन.....। 

अचानक बस्तर में क्या हुआ कि सारे एक्टिविस्ट दिल्ली में “ले अंगडाई हिल उठी धरा..” एक साथ जाग गये; वस्तुत: जिन मुद्धों पर बस्तर का दुष्प्रचार करने वाले लोग दिल्ली में सक्रिय हैं उनकी मानसिकताओं और राजनीति को समझना आवश्यक है। उनका निशाना व्यवस्था नहीं है वह तो केवल चदरिया झीनी झीनी है अन्यथा तो खेल विचारधारा के बस्तर में जारी युद्ध के लिये समर्थन बनाने और बचाने का है। जायज आवाजें हाशिये पर हैं तथा वे स्वर राष्ट्रीय भोंपू बनते जा रहे हैं जिनमें यहाँ के भूगोल और अतीत तो छोडिये वर्तमान तक की समुचित समझ नहीं है। बस्तर के मुद्दों का राष्ट्रीयकरण नक्सलियों के प्रभावी होने के साथ साथ हुआ है किंतु क्या वास्तविक सरोकार विषयवस्तु बन रहे हैं? देश-विदेश में सलवाजुडुम का विरोध किया और अब बस्तर में इस आन्दोलन से जुडे आदिवासी एक एक कर नक्सलियों द्वारा मारे भी जा रहे हैं। किस सामाजिक तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता नें इस विषय को खुल कर उठाया है और अब भी जारी इस अनावश्यक हत्या श्रंखला का विरोध किया है? इन घटनाओं का विरोध असल में उस माहौल को बनाये जाने की कोशिश का हिस्सा नहीं है जिसे विश्व भर में दिखा कर इस क्षेत्र को निरंतर उपनिवेश बना रही विचारधारा की बंदूखों को जायज ठहराया जाना है। उसने पेड काट दिया, उसने बलात्कार कर दिया, उसने प्रताडित कर दिया, वह नंगा है, वह भूखा है, उसके घर में बिजली नहीं है, वहाँ अभी भी स्कूल नहीं है, पुलिसिया दमन हो रहा है आदि आदि केवल बस्तर का चेहरा नहीं है यह पूरे भारत का एक जैसा सच है और एक जैसा ही कडुवा। पत्रकार भाईयों को इन तथ्यों-सत्यों को उजागर करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिये। मेरा इशारा उन समाचारों की खदानों की,ओर है जो समाचार चुनते है और चुने हुए समाचारों के साथ बौद्धिक विलास करते हैं। मेरे पास इसी तरह के प्रचार का हिस्सा एक ईमेल निरंतर आता है जिसमें कई प्रकाशित आलेखों के लिंक होते हैं [बहुतायत कहानियाँ छत्तीसगढ के नाम पर कभी झारखण्ड की होती हैं कभी महाराष्ट्र की तो कभी आन्ध्र की। इसके अलावा देश भर में कुछ चुने हुए लोगों की गतिविधियों का ब्यौरा कि कहाँ-कहाँ दिल्ली में बस्तर के नाम पर हाय तौबा की]। इन चुनी हुई कहानियों पर अगाध श्रम किया जाता है। ये कहानियाँ वह मील का पत्थर बनायी जाती हैं जिन्हें लहरा लहरा कर बस्तर को दुनिया की सबसे डरावनी जगह बनाये जाने की कोशिश लगातार की जा रही है। ये समाचार बस्तर के वास्तविक सरोकार भी नहीं अपितु सरोकार के करीब की घटनायें मात्र हैं। उदाहरण के तौर पर एक सप्ताह में नक्सलियों नें चार सडकें फोडी, दो स्कूल विध्वंस कर दिये एक बाजार में हमला किया आदि आदि तो यह सामान्य घटना लेकिन इसकी प्रतिक्रिया राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समाचार। ये समाचार पोर्टल, समाजसेवी और विचारक बस्तर की समस्याओं का कोई समाधान ले कर आज तक क्यों उपस्थ्ति नहीं हुए? 

यहाँ समस्या है कृषि का आधुनिकीकरण किये जाने की, यहाँ आवश्यकता है सिंचाई के साधन विकसित किये जाने की, यहाँ आवश्यकता है शिक्षा के बेहतर माहौल की, यहाँ आवश्यकता है उच्च शिक्षा के मौजूदा संस्थानों को दुरुस्त करने तथा उनमे आदिवासी छात्रों को विशेष वरीयता तथा आर्थिक मदद दिये जाने की, यहाँ आवश्यकता है रोजगार मूलक उपायों की, यहाँ आवश्यकता है साफ पानी की, बिजली की, सडक की। पिछले बीस-सालों में इन विषयों पर न तो विमर्श हो रहा है न ही आन्दोलन। वस्तुत: अगर इनके समाधानों की बात और कोशिश की पहल होगी तो नक्सलवाद की प्रासंगिकता क्या बचेगी; इस बात को पूरी तरह जान कर और समझ कर जनसरोकारों की नये किस्म की परिभाषा गढी गयी है जिसमें दो ही किरदार हैं नक्सली जो क्रांतिकारी हैं और पुलिस जो विलेन है। इस पृष्ठभूमि के लेखो में ड्रामा है, फिक्शन है.....समाधान नहीं हैं। जिन्हे बस्तर का ‘ब’ पता नहीं उनसे हम समाधान की उम्मीद रखें यह तो हमारी ही सोच में कमी हुई न? 

समाधान ‘केवल और केवल’ पढी लिखी आदिवासी पीढी के पास ही है। आप ही उर्वरा बीज हो और आप ही अपना स्वर। दिल्ली में बहुत से लोग भगतसिंह का मुखौटा लगाकर आपकी क्रांति करने की जुगत में हैं; उनके भरम में आये बिना अपने चेहरे के साथ अपनी मुट्ठी बाँधिये। अपने अधिकार के लिये लडाई आपकी अपनी है। फिर वह वयवस्था के खिलाफ हो अथवा आपकी आड में वयवस्था बदलने वाली बदूखों के खिलाफ.....आपको अपनी बुद्धिजीविता के साथ अपना स्वर बनना ही होगा। आपकी अपनी कोई आवाज नहीं है इस लिये दिल्ली के पास भोंपू है। आदिवासी मित्रों, शिक्षा सोच देती है तथा अपनी समस्याओं को स्वयं अनुभव कर निराकरण की समझ भी स्वयं में विकसित कर देती है। गहराई से उन समस्याओं की विवेचना कीजिये जो आपके सरोकारों को स्पर्श करते हों। यह समय आपकी सक्रियता का है क्योंकि ‘चलता है’ कि प्रवृत्ति ही आपको हाशिये पर धकेल रही है। अपनी अभिव्यक्ति के अवसर तलाशिये और अपनी बात सकारात्मकता से कहिये क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ खडे होना आपका अधिकार है तथा बस्तर के खिलाफ चल रहे दुष्प्रचार के विरुद्ध लामबंद होना आपका कर्तव्य। जड ही महत्वपूर्ण होती है तथा आपकी जडें हजारों सालों का गौरवशाली अतीत आपके साथ जोडती हैं। आप गेन्दसिंह, झाडा सिरहा, आयतु माहरा, यादव राव, व्यंकट राव, डेबरी धुर और गुण्डाधुर की संततियाँ हो। आपका नेतृत्व सुबरन कुँवर जैसी वीरांगना और प्रवीर जैसे विचारक नें किया है फिर एसा क्यों कि आप बस्तर के दुष्प्रचार तंत्र के प्रति नाराज नहीं होते। मित्रों यह जाहिर करना ही होगा कि हम किसी ओर की बंदूख के साथ नहीं है और किसी दुष्प्रचार का हिस्सा भी नहीं है। बस्तर हमारा है और अब बहुत हो चुका इसका नवनिर्माण भी हम बस्तरिया ही करेंगे।

Monday, November 29, 2010

अच्छा तो तुम वामपंथी नहीं हो? यानी कि दक्षिण पंथी हो? - राजीव रंजन प्रसाद



इस बात को साल भर से अधिक हो गया। मैंने बस्तर में जारी नक्सलवाद के खिलाफ किसी लेख में टिप्पणी की थी। उस दिन मेरे नाम को इंगित करते हुए एक पोस्ट “मोहल्ला” ब्लॉग पर डाली जिसका शीर्षक था – “बस्तर के हो तो क्या कुछ भी कहोगे?” और लिंक - http://mohalla.blogspot.com/2008/05/blog-post_24.html इस पोस्ट नें मुझे झकझोर दिया। मैं माओवाद को ले कर हो रहे प्रचार की ताकत जानता हूँ और चूंकि मेरा अपना घर जल रहा हैं इस लिये आतंकवाद और क्रांति जैसे शब्दों के मायने भी समझने लगा हूँ। मैंनें निश्चित किया कि बस्तर का एक और चेहरा है जो माओवाद और सलवाजुडुम की धाय धमक में कहीं छुप गया है। बस्तर की और भी तस्वीरें हैं जो लाल नहीं हैं और बस्तर वैसा तो हर्गिज नहीं जो अरुन्धति के आउटलुक से दिखाया गया। अपनी मातृभूमि बस्तर के लिये कहानियाँ, आलेख और संस्मरण लिखते हुए अचानक ही एक उपन्यास लिखने का विचार कौंधा। बस्तर के इतिहास और वर्तमान पर काम करने का फिर मुझमें जुनून सा सवार हुआ। मैंने केवल शोध के कार्य के लिये बस्तर भर की कई यात्रायें कीं और उन जगहों पर विशेष रूप से गया जहाँ जाना इन दिनों दुस्साहस कहा जाता है। यानि कि हम अपने ही घर, अपनी ही मिट्टी में निर्भीक नहीं घूम सकते?

मेरे बस्तर विषयक आलेख जब पत्र-पत्रिकाओं और ब्ळोग में प्रकाशित होने लगे तो मेरा दो तरह के स्वर से सामना हुआ। पहला स्वर जो मुझसे सहमत था और दूसरा जो असहमत। असहमति भी स्वाभाविक है, मैं उम्मीद नहीं कर सकता कि मेरी तरह ही सभी सोचें। सब एक तरह ही सोचते तो भी समाजवाद होता? लेकिन जो बात सबसे अधिक विचारणीय है वह है सोच की खेमेबाजी, सोच का रंग और सोच का झंडा। कोई तर्क करे तो समझ में आता है, कोई विचार रखे और उद्धरण दे तो भी समझ में आता है यहाँ तक कि किसी के अनुभव सामने आयें वह विरोधाभासी भी हों तो भी सोच को जमीन देते हैं। लेकिन “खास तरह के खेमेबाजों का” एक मजेदार विश्लेषण है – आप वामपंथी नहीं हो तो आप संघी हो या दक्षिणपंथी हो?

मैं बहुत सोचता हूँ कि आखिर क्या हूँ मैं? उम्र के पन्द्रह साल से ले कर लगभग सत्ताईस साल तक अपने नाम के आगे कामरेड सुनना अच्छा लगता था। इप्टा से जुड कर में नुक्कड भी किये, गली गली जनगीत भी गाये,  हल्ला भी बोला इतना ही नहीं उस दौर के लिखे हुए मेरे अनेकों नाटक लाल सुबह ही उगाते हैं जिनमें प्रमुख हैं – किसके हाँथ लगाम, खबरदार एक दिन, और सुबह हो गयी आदि आदि। किसके हाँथ लगाम की एक प्रस्तुति ‘भारत-भवन’ में तथा मेरे नाटकों की कई प्रस्तुतियाँ भोपाल के रवीन्द्र भवन में भी हुई हैं। तब की लिखी मेरी कहानियों के अंत में हमेशा ही लाल सुबह होती रही थी। लेकिन बहुत कुछ तब दरका जब तू चल मैं आया वाले प्रधानमंत्रियों का दौर आया और वामपंथी दलों की अवसरवादिता नें मेरे सिद्धांतों की कट्टरता को झकझोर दिया। धर्म को जनता की अफीम मानने वाले एक दिवंगत कामरेड की पहचान हमेशा उनकी पगडी से ही रही। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडने वाले कई छत्रप अपने बेटों के लिये लाल कालीन की जुगाड में ही दिखे। उनका श्रम भी रंग लाया और कुछ फैक्ट्री मालिक है तो कुछ सी.ई.ओ। मैं धीरे धीरे प्रायोजित विरोध और स्वाभाविक विरोध के अंतर को समझने लगा हूँ।

एसे ही एक दिन जब मैं अपने घर बचेली पहुँचा तो अपनी डायरी ले कर जंगल जाने लगा। जंगल में सिम्प्लेक्स नाले पर एक पत्थर मेरी टेबल-कुर्सी दसियों साल से ‘था’। यहाँ पानी में पैर डाले घंटों अपनी किताबों के साथ मैं समय गुजारा करता था। दसवी और बारहवी में अपने प्रिपरेशन लीव के दौरान भी मैं यहीं सारे सारे दिन बैठ कर पढा करता था। यहीं मैने कई वो कहानियाँ और नाटक भी लिखे जिनके अंत में मुक्के तन जाने के बाद धरती समतल हो गयी और एक सी धूप फैल गयी। इस बार जब मम्मी नें जंगल में उस ओर जाने से रोक दिया। कारण था नक्सलवाद। एसा प्रतीत हुआ जैसे किसी नें मुझे मेरे ही घर में घुसने से रोक दिया। उस दिन मैने गहरे सोचा कि एसा क्यों है कि मैं उदास हूँ? मुझे तो खुश होना चाहिये था कि वैसा ही हो रहा है जैसा मेरी कहानियों में होता था कि क्रांतिकारी बंदूख ले कर उग आये हैं और ढकेल कर लाल सवेरा के कर आने ही वाले हैं? मैंने अपनी कहानियों को टटोला लेकिन उनमें कहीं बारूदी सुरंग फाड कर सुकारू और हिडमाओं की ही लाशों के अनगिनत टुकडे किये जाने की कल्पना नहीं थी। मैंने जब भी क्रांतिकारी सोचे तो वो भगतसिंह थे। उनकी नैतिकता एसी थी कि असेम्बली में भी बम फेंके तो यह देख कर कि कोई आहत न हो लेकिन बात पहुँच जाये। बस्तर के इन जंगलों में जो धमाके रात दिन हो रहे हैं क्या ये बहरों को सुनाने के लिये हैं? नहीं ये अंधों की लगायी आग है और दावानल बन गयी हैं। ये सब कुछ जला देगी खेत-खलिहान भी, महुआ-सागवान भी, आदिम किसान भी।              
                           
नहीं मैं लाल नहीं सोचता, हरा नहीं सोचता, भगवा नहीं सोचता, नीला पीला या काला कुछ नहीं सोचता। मेरी सोच को मेरी लिये बख्श दो भाई। चूल्हे में जायें सारे झंडे और सारे नारे। तुम उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, साम, दाम, वाम जो भी हो मुझे ये गालिया न दो। मैने बहुत सी कहानिया जला दी हैं बहुत से नाटक अलमारी में दफन कर दिये हैं और अब मैं वही लिखता हूँ जो मैं खुद सोचता हूँ अपने बस्तर के लिये।