Tuesday, June 03, 2008

नक्सलवादी या उनके समर्थक - सुकारू के हत्यारे कौन? (बस्तर का हूँ इस लिए चुप रहूँ - संस्मरण, कडी-2)

तब एसी मनहूसियत हवाओं में नहीं थी। उससे मैं पहली बार पुरानी बचेली के बाजार में मिला था जहाँ मुर्गे लडाये जाते थे। बडा जबरदस्त माहौल हुआ करता था। उसने लाल अकडदार मुर्गे पर दाँव लगाया हुआ था, कम्बख्त मुर्गा केवल देखने का ही मोटा था। सामने वाला मुर्गा सख्त जान निकला कुडकुडा कर झपटा और बस बीस ही सेकेंड में उसके पैर में बँधा छोटा सा चाकू अपना काम कर गया। मैं जिस कोतूहल से भीड का हिस्सा बना था उतना ही मजा मुझे उसकी अठन्नी शहीद होते देख कर हुआ, उसने मुझे लडाई आरंभ होने से पहले इशारे ही एसे किये थे। मैंने उसकी पीठ पर धपाका मारा और खिलखिला दिया और जवाब में उसकी अल्हड सी हँसी...मेरी उससे यदाकदा मुलाकात होने लगी। उसके शरीर पर सफेद शर्ट हमेशा ही होती थी। समय के साथ सफेद पीला, मटमैला कुचैला सब हो गया लेकिन उसके बदन से उतरा नहीं। यही उसकी स्कूल ड्रेस भी थी और यही उसके घर से बाहर निकलने पर शरीर पर रहने वाला एक मात्र आवरण। पहले पहल कॉलर की बटन भी लगती थी, फिर एक दो बटन बचे इसपर भी उसकी शर्ट शान से टंगी थी और गर्व से लहराती थी, उसपर निकर का हाल-ए-बयाँ न ही करूं तो बेहतर...पुराने बजार के पास के सरकारी स्कूल में वह पढता है, यह बात उसने मुझे गर्व से बतायी थी।

मुझे ब्लड-ग्रुप टेस्ट करने का प्रोजेक्टवर्क स्कूल से मिला था और कोई भी मुझसे अपनी उंगली पर नीडिल लगवाने को तैयार नहीं होता। मेरा पहला शिकार वही लडका हुआ और तभी मैं उसका नाम जान सका –सुकारू। उसमें अनोखा आकर्षण था, उसके पक्के शरीर में बिल्ले जैसी आँखें थीं और उसकी मुस्कुराहट में मधुरता थी। यह हमारी एसी मित्रता की शुरुआत थी जो धीरे धीरे घनिष्टता बन गयी। सुकारू के साथ मैनें जंगल जाना, जंगल की जानी अंजानी बूटियों से परिचित हुआ, पहली बार सल्फी पी और जंगल के दर्द से भी परिचित हुआ।

जंगल का अपना कानून होता है। जंगल शहरियों की आँखों से बडा रोचक प्रतीत होता है लेकिन उसके खौफ, उसकी जीवंतता और उसकी आत्मा तक कोई शायद ही पहुँचा हो। बस्तर का शोषण करने वाले कौन लोग हैं यह बात गंभीर सवाल उठाती है और क्या शोषित इतने दबे कुचले हैं कि वे अपनी लडाई खुद नहीं लड सकते यह प्रश्न भी मायने रखता है। एक पत्रकार महोदय उसी दर्म्यान अबूझमाड के जंगलों से एक आदिवासी युवती की तस्वीर उतार कर ले गये थे। इस तस्वीर को एक ख्यातिनाम पत्रिका नें मुख्यपृष्ठ पर स्थान दिया जिससे पढे लिखे आदिम समाज के भीतर कुलबुलाहट उठी। अर्धनग्नता वस्तुत: जीवन का हिस्सा है उसे कैमरे ने अपनी काली निगाह दी थी। काली इस लिये कि अधिकतम तथाकथित पत्रकारों को बस्तर के इसी स्वरूप में रुचि है। मैने बहुधा पर्यटक और पत्रकार टाईप के नवागंतुकों से यह प्रश्न सुने हैं – “वो जगह कहाँ है जहाँ आदिवासी अभी भी पूरे नंगे रहते हैं?” इस सवाल में उन सारे कलम के धंधेबाजों का सच छिपा है जो बस्तर के दर्द को जानने का दावा करते हैं और दिल्ली जैसी जगहों से इस अंचल की खबरें खुरचते हैं। आदिवासी युवती की अर्धनग्न तस्वीर के छापे जाने के सवाल को ले कर अंचल के ही नेताओं नें अपनी लडाई विधान सभा से ले कर संसद भवन तक लडी और कैमरों पर बैन लगवा कर ही वे शांत हुए। अंचल के वरिष्ठ नेता श्री मानकू राम सोढी की इस अभियान में बडी भूमिका कही जाती है। सुकारू की यादों के साथ इस प्रकरण को जोडने का कोई खास मकसद नहीं केवल यही कि इस उपेक्षित अंचल के भीतर आग है लेकिन सुसुप्त।

सुकारू के साथ उसकी झोपडी में बिताई वह एक रात मुझसे नहीं भूलती। नेरली गाँव से कुछ भीतर चंद झोपडियों का झुरमुट और उसमें से एक घर सुकारू का..हम वहाँ पहुँचे तो रात होने को थी। मम्मी स्कूल के किसी टूर से बाहर गयी थीं और मैंने चुपचाप सुकारू के साथ उसके घर पर रात रुकने का कार्यक्रम बना लिया था। कार्यक्रम शब्द सही होगा चूंकि घने जंगल में रात रुकने का एक रोमांच मैं करना चाहता था। उसके घर के भीतर का अंधेरा मेरे लिये दमघोटू था। विकास इतना ही गाँव तक पहुँचा था कि मिट्टीतेल से जलने वाली डिबिया नें अंधेरे से लडायी जारी रखी थी। हमने बाहर ही सोना उचित समझा और रस्सी की बुनी खटिया मेरे लिये बाहर डाल दी गयी। सुकारू के साथ गाँव, उनके रिवाज, घोटुल और तिहारों की बहुत सी बातें सारी रात सुनता रहा जिनके विषय में अगले आलेखों में प्रकाश डालूंगा। अपनी बात सुकारू की उस तडप से आरंभ करना आवश्यक समझता हूँ जिसमें उसके मन में एसी जिन्दगी की तमन्ना थी जिसमें उसके पास सायकल, रेडियो और चटख लाल रंग की कमीज हो। इस सपने के लिये उसे पास की लोहे की खदान में मजदूर हो जाने की तमन्ना है। मैं चार-आने और आठ-आने से बाहर निकल कर रुपया पहचानने वाली इस पीढी के सपने रात भर सुनता और डरता भी रहा चूंकि यह वन्य प्रांतर तेंदुओं के लिये तो जाना ही जाता है और भालू के घायल आदिवासी हमेशा ही अस्पताल में मैने देखे थे। तेज झिंगुर की आवाज और तारों से भरे आसमान के नीचे कोने में सुलगती जरा सी आग के बीच रात कटी और सुबह जब मैं घर पहुँचा तो जैसे एक दुनिया से दूसरी दुनियाँ में था। क्या आज के इस दौर में पिछडा पन अभिशाप नहीं है? तरक्की क्या अडतालीसवी सदी में इनका जीवन बदलेगी? माना कि यह अंधेरी रात उनके सामान्य जीवन का हिस्सा है लेकिन उजाले उन्हे मिलें यह किसका दायित्व है? और ये मानव संग्रहालय बन कर क्यों रहें? ये मानव हैं तो मानव के सारे वे अधिकार और मूल भूत सुविधाओं से इन्हे परिचित और सम्पन्न कराने का दायित्व किनका है?

सुकारू नें मुझसे किताबें भी ली और गाहे बगाहे अपनी किताबे और सवाल ले कर मेरे पास आता भी रहा। घडी नें इस बीच कुछ टिक टिक और कर ली थी...मैं अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के लिये जगदलपुर चला गया। छुट्टियों में बचेली लौटा तो एक खबर सुन कर आश्चर्य और हर्ष से भर उठा – सुकारू पुलिस का रंगरूट हो गया था। मुझसे मिला तो पुलिसिया हो जाने का गर्व उसके चेहरे से झलक रहा था। खाकी वर्दी में वह अलग ही नज़र आता था, उसकी आँखों में उसका सपना सच हो जाने की चमक थी।
मैं जिन दिनों अपनी स्कूली पढाई के दौर में था, नक्सल महसूस की जा सकने वाली समस्या नहीं थी। गाहे-बगाहे जंगल में उनके होने और संघर्ष करने की कथायें सुनी जाती और मेरे जेहन में रॉबिनहुड की कहानियाँ जीवंत हो उठती। बस्तर के दंतेवाडा क्षेत्र में तब उनका प्रभाव कम ही था। नारायणपुर जैसे अंचलों से अखबारों में छुटपुट हिंसा या वारदात की खबर भी मिलती तो बडे आतंक का सबब नहीं मानी जाती थीं। यह भी जानकारी बहुधा चर्चाओं में होती कि नक्सली क्रांतिकारी हैं और शोषण के खिलाफ लड रहे हैं। बस्तर में सरकारी बहुचर्चित तेन्दूपत्ता नीति के बनाये जाने के पीछे नक्सली दबाव माना जाता था। बचेली कम्युनिस्ट प्रभाव वाला क्षेत्र होने के कारण शोषण और आन्दोलन जैसे बडे बडे शब्द मुझे प्रभावित करने लगे। दंतेवाडा क्षेत्र से उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी का विधानसभा चुनाव जीतना तय माना जाता था, कारण था लोहे की खदानों का होना और उसके साथ ही इन खदानों की मजदूर यूनियनों का सक्रिय होना। मार्क्स और लेनिन पर पुस्तके भी सहजता से मुझे उपलब्ध हुई और वामपंथी विचारधारा मेरी रचनाओं में झलकने लगी थी। उन्ही दिनों, पाश की कविताओं नें मेरे रक्त में गर्मी भरी साथ ही इप्टा से जुड कर सफदर के हल्ला-बोल जैसे नुक्कड नाटकों को चौराहों चौराहों किया। शंकर गुहा नियोगी की नृशंस हत्या नें मेरे भीतर एसी चिनगी पैदा की कि हसिया और हथौडा जैसे अपनी विचारधारा बन गयी और लाल रंग एसा सपना जो व्यवस्था बदल कर एक नया सवेरा लायेगा। वो सुबह कभी तो आयेगी...सुकारू को पुलिस की वर्दी में देख कर उस दिन मेरे रोंगटे खडे हो गये थे और महसूस होता था कि इस वन प्रांत में सुबह बस होने वाली है।
फिर नक्सली समस्या हो जाने का दौर आया। बारूदी सुरंगे फटने की खबरों से अखबार रंगने लगे। थानों में हमलों की खबरे और पुलिसियों पर हमले की खबर आम हो गयी। ठेकेदारों पर हमले या कि उनसे वसूली की खबरें भी हवा में तैरने लगीं। बीच में एक बार सुकारू से मुलाकात हुई, उसने मारे जा रहे पुलिस वालों की बहुत सी एसी नृशंस कहानियाँ सुनायी कि पहली बार क्रांति और नक्सल मैनें दो अलग अलग शब्द महसूस किये। तभी कमजोर सरकारों का दौर आ गया देवगौडा, गुजराल, चंद्रशेखर जैसे बिना व्यापक जनाधार के लोग प्रधानमंत्री बनाये और गिराये जाने लगे। इसी समय में वामपंथी दलों की भूमिका और अवसरपरस्ती नें इस दल पर मेरी आस्था और विश्वास समाप्त कर दिया। शनै: शनै: बस्तर के परिप्रेक्ष्य में माओ और लेनिन जैसे शब्दों की जैसे जैसे मैने पुनर्विवेचना की, महसूस होने लगा कि एक बडा सा गुबारा जब फूटता है तो भीतर केवल हवा ही होती है। जगदलपुर में साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हुआ और तभी प्रगतिशील और जाने कौन कौन से लेखक संघों से वास्ता पडा। मुझे गुरु मंत्र दिया गया कि मजदूर, पत्थर, पसीना, लहू, हसिया और हथौडा ही कविता और लेखन है। यह लिखते रहे तो बडे साहित्यकार बनने में देरी नहीं और इसके इतर तो साहित्य जगत में कुछ भी लिखते रहो......कोई स्थान नहीं। हाँ यही मेरे कई मिथकों के टूटने का वक्त था।


बस्तर को कैसी क्रांति चाहिये यह बात मेरे लिये बडा प्रश्न थी। उनकी सब्जियों, फलों और कंद-मूल को लूट के दाम बजार में बिकते पा कर हमेशा मुझे लगता था कि गलत है। उन्हे पूरे पूरे दिन पसीने में पत्थर तोडने की कीमत ग्यारह रुपये देख कर महसूस होता था कि शोषण है, उनकी इमली चंद आने में आन्ध्र के चतुर व्यापारी खरीद लेते तो लगता कि शोषण है......लेकिन शाम किसी बोदी के जूडे में नयी कंघी और मंद पी के मस्ती लेते किसी बुदरू को पाता तो लगता कि क्रांति क्या केवल फैशनेबल शब्द नहीं है। जगदलपुर में पढे लिखे आदिम तबके में भी राय बँटी हुई थी। इसी विषय पर कश्यप सर से हँस्टल में मेरी लम्बी चर्चा हुई। उन्होने मुझसे पूछा कि डाकू चंबल में ही क्यों और नक्सली जंगल में ही क्यों?....क्या बस्तर में सौ पचास पुलिस वालों को मार कर व्यवस्था बदल दी जायेगी? ये दिल्ली में या कि भोपाल में क्यों सक्रिय नहीं?...सवाल बेहद पेचीदा थे। मैं गहरे इस सवाल के उतरता गया। बस्तर के जंगल क्रांति की आड में केवल कुछ लोगों की पनाह या एशगाह तो नहीं? क्या नक्सली बस्तर के आदिम ही हैं या कि आयातित क्रांति है। आन्ध्रप्रदेश से भाग भाग कर बस्तर के जंगलों में छिपे नक्सली आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव इस क्षेत्र में बनाते जमाते रहे और समय के साथ इस अंचल के बहुत से युवक और युवतिया भी गुमराह हुई...क्या यह इस सारे संदर्भ का सच नहीं? जहाँ जहाँ वामपंथी सरकारे हैं क्या वहाँ एसी सुबह हो गयी है जिसकी झलक बस्तर के उन नौजवानों को जंगल के भीतर दिखायी जा रही है जो केवल सपना जीना चाहते हैं...नयी सुबह के साथ। जो इस तरह तो शायद कभी न आनी थी।

बारूदी सुरंग फटने से 12 पुलिसकर्मी मारे गये थे। सुकारू भी उनमें से एक था। यह खबर मुझे मिली तो सुकारू का चेहरा मेरी आँखों के आगे कौंध गया। उसके सपने, उसकी बातें...उसका सिपाही हो जाना एक क्रांति थी और बस्तर एसी ही क्रांति की तलाश में है, एसी ही सुबह की तलाश में है। आदिम बढ रहे हैं, बढ रहे हैं। आज उनमें से कुछ नेता हैं तो कुछ मास्टर, कुछ पुलिसिये तो कुछ कलेक्टर। कौन हैं वह जो बस्तर में आदमता का पक्षधर है? एसी कौन सी क्रांति है जो इन आदिमों के सीने फाड कर आयेगी? आह!! कैसी होगी वह कम्बख्त सुबह...लाल ही होगी नासपीटी।
मुझे सुकारू भुलाये नहीं भूलता। बस्तर आज सुलग रहा है। पुलिस वालों की मौत पर तथाकथित क्रांति की नीव रखी जा रही है। दिल्ली-मुम्बई से बडे बडे खुजेली दाढी वाले तकरीरे लिख रहे हैं और लेनिन-मार्क्स की गीता पढी जा रही है। इनकी भौंक इतनी तीखी है कि दिल्ली को नींद नहीं आती है और बेचारे आदिम कटघरे में नजर आ रहे हैं। जंगल में नक्सली जीने नहीं देंगे और जंगल के बाहर प्रेस-फोटोग्राफर और एक्टिविस्ट। रिटायरमेंट काटो भाई दिल्ली में या कलकत्ता में, बहुत से मसले वहाँ अनसुलझे हैं। ये आदिम अपनी लडाई खुद लड लेंगे, कौन तुम? जिन्हे इनकी न तो समझ है न ही इन्हे समझ सकने का माद्दा। चले आते हैं खादी का कुर्ता पहने छद्म चेहरे लगाये भेडिये और पीछे पीछे एडवेंचर करने हाई प्रोफाईल कलमची...।

मेरे भीतर लाल सोच सिमटने लगी थी। इप्टा मैने छोड दी थी और वामपंथ का ढोल पीटते लेखक संघों से नाता यह मान कर तोड लिया था कि मेरी कलम किसी यूनियन की मोहताज नहीं।....। एक शाम जगदलपुर बस स्टेंड के पास से गुजरते हुए ठिठक गया। थाने के पास बहुत से आदिवासी हुजूम बनाये खडे थे..चीख पुकार मची हुई थी। एसा दर्दनाक मंजर कि मुझसे रहा न गया। एक और नक्सली हमला, कुछ और पुलिस वाले हताहत। मैने भीड में से जगह बना कर अहाते के भीतर झांक कर देखा..उफ!! बीसियों लाशें पडी थीं। हर लाश उस कफन में लपेटी हुई जो रक्त सोख सोख कर लाल हो गया था। नसे सुलग उठीं..एक लाश एसी भी जिसे साबुत समेटा न जा सका था और गठरी में बाँध कर रखा गया था...गठरी से लाल लहू फर्श लाल कर गया था। यही क्रांति है? क्या इसी की हिमायत करते फिरते हैं कलम थाम कर पत्रकार, कवितायें लिख कर कवि और दढियल लेखक। क्या कलम का ईमान होता है?

तब से बहुत पानी इन्द्रावती में बह गया है। हाल ही में घर गया था तो आस पास के वीरान होते गाँवों के बारे में सुना। आखिर कहाँ जायें ये आदिम? सरकारी संरक्षण में या नक्सली शरण में या खुद बंदूख थाम लें....उनकी डगर में काँटे बहुत हैं चूंकि उनके लिये सहानुभूति किसे है? बाहरी दुनिया जानती है कि बस्तर में क्रांति हो रही है। आह सुकारू तुम मारे गये चूंकि पत्ते छोड कर तुमने खाकी पतलून पहन ली थी। क्रांति के आडे आ गये थे। बहुत जल्द दुनिया बदलने वाली है...बस्तर को श्रद्धांजली देने वाले दिल्ली में रिहर्सल कर रहे है। अखबार चीख रहे हैं – माओवादियों के समर्थकों के समर्थन में। अंधे यही सच मानते भी हैं। दुर्भाग्य मेरे बस्तर.....

***राजीव रंजन प्रसाद
3.06.2008

Monday, June 02, 2008

ग़म को सहने के लिये...

ज़िन्दगी अब तेरे नाम पे हँस के देखा
और छल छल के भरी आँख का पानी मुझको
चुपचाप कान ही में कह गया देखो
होठ इतने भी न फैलाओ मेरे यार सुनो
ग़म को सहने के लिये दम न निकालो अपना
चीख कर रो भी लो
बहुत देर तक ए मेरे दोस्त..

राजीव रंजन प्रसाद
८.१२.१९९५

Sunday, June 01, 2008

पुनर्जन्म का यकीन हो चला है..

तुम्हारे इन्तज़ार में एक उम्र गुज़ार दी मैनें
मुझे अब पुनर्जन्म का यकीन हो चला है
क्योंकि न मैं जीता रहा
न जी सके हो तुम मुझसे दूर..

एक उम्र खामोशियों की जो गुजरती है अब
कभी तो हमें जिला जायेगी
तुम्हारे क़रीब ही मेरी रूह को साँस आयेगी..

***राजीव रंजन प्रसाद
२०.११.१९९६

Friday, May 30, 2008

तालाब नहीं भाते हैं..

मुझे तालाब नहीं भाते हैं
ठहर जाते हैं
और तुम इसीलिये उदास करती हो मुझे..

तुममें अपनी परछाई देखता हुआ
खीज कर फेंकता हूँ पत्थर
भँवरें मुझतक आती हैं
फिर ठहर जाती हैं..

शाम कूट कूट कर लाल मिर्च
झोंक देता है मेरी आँखों में
मैं पिघल पिघल कर बहा जाता हूँ
ठहर जाता हूँ... ठहर जाता हूँ

लेकिन जानम
मुझे तालाब नहीं भाते हैं..

*** राजीव रंजन प्रसाद
९.०३.१९९८

Monday, May 26, 2008

बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ - साभार मोहल्ला।

संस्मरण (कडी-1)
जगदलपुर का सीरासार चौक, शाम के करीब सात बजे होंगे। अचानक एक जनसैलाब उमडा और चौंक से उस बेहद संकरी सडक में जैसे उमडता हुआ पुलिस थाने की ओर बढने लगा। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले बचने की कोशिश जरूरी थी। मैं अपने मित्र अफज़ल के घर की ओर भागा जो बिलकुल बस स्टैंड के करीब ही था। उसने मुझे बदहवास देख कर बिना कोई कारण पूछे पहले तो पानी का ग्लास थमाया। तब तक शोर तीखा हो गया था। हम बालकनी की ओर दौडे, एक जन सैलाब उमडा चला आ रहा था। और जैसे जैसे यह सैलाब नजदीक आया, हम चौंक गये। ब्रम्हदेव शर्मा?...हाँ वही हैं, और उन्हे जलील करती यह भीड कैसी है? आदिवासी लडकों का हुजूम और एक एक्टिविस्ट की एसी दुर्गति करता हुआ? यह माजरा हम देखते रहे.....भीड नें चंद कपडे ही उनके शरीर पर रहने दिये थे। गले में साईकल के टायर, जूते चप्पलों की माला और मुँह काला। बस्तर में यह नया सांस्कृतिक तत्व था। प्राय: शांत रहने वाले इस शहर में इस उफान को असाधारण घटना कहा जाना स्वाभाविक था। लेकिन असाधारण एक और बात थी और वह थी शिक्षित आदिवासी युवकों के हुजूम का इस तरह एकत्रित हो कर इस कृत्य में सम्मिलित होना। भीड इतनी अधिक थी कि पुलिस को मशक्कत करनी पडी ब्रह्मदेव शर्मा को मुक्त करा पाने में और देर शाम जब यह भीड छटी तो जगदलपुर अंतर्राष्ट्रीय खबरों में उछल गया। बी.बी.सी से उसी रात यह समाचार प्रसारित हुआ। एक नया हीरो पैदा हो चुका था....

जगदलपुर से उन दिनों मैं ग्रेजुएशन कर रहा था। उन दिनों धरमपुरा लगभग आबादी रहित ही था, और यहाँ रहने का विकल्प केवल शासकीय आदिवासी छात्रावास ही था। विकलांग होने के कारण मुझे कॉलेज प्रशासन नें इस छात्रावास में रहने की अनुमति दे दी। यह मेरे जीवन के लिये सकारात्मक और बेहद अनुभवों से भरा समय रहा। आदिवासी युवकों को पहले पहल मेरे साथ समायोजन बनाना और मेरा उनके बीच घुलना मिलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी। लेकिन समयपर्यंत सब सहज होता गया। मैं बॉलीबॉल और बैडमिंटन का स्वाभाविक रैफरी हो गया था और यह हमारे पानी में चीनी की तरह घुल जाने का आरंभ थी। मरकाम मेरा रूमपार्टनर था। उसके साथ हॉस्टल में मेरी पहली रात भुलाये नहीं भूलती। मैं जब सामान के साथ प्रविष्ठ हुआ तो एक अजीब सी गंध कमरे में फैली हुई थी। रात का खाना खाने हम साथ साथ हॉस्टल की मेस में गये और.....इतना चावल? इतना मोटा चावल? सब की थाली में भात का पहाड था जिसके बीच मे सब्जी का भ्रम सा।...। मैं जितना खा सका वह....मेरी हिम्मत ही थी। हॉस्टल में ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट कर रहे आदिवासी युवको का स्वाभिमान और गर्व देखते ही बनता था। उन्हें यह आभास था कि शिक्षा के इस पडाव तक पहुँच कर उनमें एक विशिष्ठता आ गयी है जो इस वन प्रांतर में हर किसी के लिये न तो सहज थी न ही स्वाभाविक। अध्ययन जमीन के प्रति नयी सोच पैदा करता है और यह मैने तब जाना जब हॉस्टल का सांस्कृतिक सचिव बनाये जाने के बाद मैने एक वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित करवायी। बस्तर के पिछडेपन पर शोषण और सरकारी धन के दुरुपयोग की बहुत सी कहानियाँ सुनी और बहुत सा आक्रोश मन में भरा भी। एक बडी बात जो समझ सका वह थी विकास की ललक। विकास तेंदू पत्ते से बीडी बना कर तो होता नहीं, लुट जाने वाले दाम में इमली बेच कर भी नहीं होता और पढ लिख जाने के बाद इन युवको की सोच में सरकारी कार्यालय, मिलें और खदान भी आ गयी हैं। बस्तर में इनके लिये क्या है? लोहा, टिन, कोरंडम यहाँ तक कि हीरा जैसे खनिज यहाँ हैं और कुछ सरकारी कंपनियों द्वारा दोहित होते हैं तो कुछ स्मगल होने की चर्चायें यदा कदा कान में पडती रहती थीं। कुल मिला कर यह कि रोजगार की खटपट यहाँ भी पढी लिखी पीढी में आवाज बनने लगी थी। कश्यप सर (उन्हें मैं इसी नाम से बुलाता था) आई.ए.एस की तैयारी कर रहे थे। आजकुल सुना है कि दंतेवाडा में ही कहीं पोस्टेड हैं और अधिकारी हैं। अधिक जानकारी मुझे नहीं (यदि मेरी यह पोस्ट कश्यप सर आप पढ रहे हों, तो मुझसे संपर्क की कोशिश कीजियेगा)। उनसे मेरी लम्बी चर्चायें होती रही थीं। एक लम्बी चर्चा में उन्होने जब कहा कि विकसित होने का अधिकार केवल शहरियों को ही क्यों है? क्यों लोग चाहते हैं कि हम पत्ते पहने जीवन पर्यंत रहे?

मावली भाटा लगभग बंजर इलाका है। यहाँ एक स्टील प्लांट खुलने का प्रस्ताव आया। मैनें देखा कि छात्रावास में एक खुशी की लहर थी। सभी को एसा लगने लगा कि उनके भविष्य का द्वार अब खुलने पर ही है। भिलाई का रेखाचित्र सभी के मानस पर खिंच गया था। विकास की ललक सभी की आँखों की चमक में दिखती थी और इस चमक को वही समझ सकता था जो कई दिनों की भूख के बाद पहला निवाला खा रहा हो। छात्रावास में यह उत्साह इतना अधिक था कि लगभग हर कोई कॉमन रूम में अखबार पर सुबह ही टूट पडता और स्टील प्लांट से जुडी सारी खबरों को पढ जाना चाहता।..। उस सुबह जब मैं कॉमन रूम अखबार पढने पहुँचा तो वहाँ अजीब सी खलबली थी। ब्रम्हदेव शर्मा का नाम मैने पहली बार सुना था। बस्तर के पूर्व कलेक्टर अपनी रिटायरमेंट काटने बस्तर पहुँच गये थे। स्टील प्लांट का विरोध...एक सूत्रीय कार्यक्रम। ये शर्मा जी हैं कौन? छात्रावास में बहुत सी चर्चायें थी। कुछ का कहना था कि बहुत विवादास्पद व्यक्तित्व है, खैर मैं किसी भी आरोप पर यकीन नहीं करता, आज भी नहीं। संभव था कि सपनों के टूटने की आहट से युवकों की भडास निकल रही हो।....और एक सिलसिला आरंभ हो गया। अखबार शर्मा जी की स्टेटमेंट्स से रंगने लगे। बहुत से तर्क। दो बाते बहुत सहज हैं पत्रकार हो जाना और पर्यावरणविद हो जाना। कुछ भी बन रहा हो कहीं भी बन रहा हो खडे हो जाईये और चीखिये पर्यावरण नष्ट हो जायेगा, दुनिया खतम हो जायेगी बस इस प्लांट के बनते ही। आपको हाँथो हाँथ लिया जायेगा। कोई आपसे आपकी क्वालिफिकेशन पूछने थोडे ही आ रहा है कि भईया पर्यावरण की कौन सी डिग्री ली है जो आपको भूकंप से ले कर व्न्य प्रजातियों के जीवन चक्र की एसी जानकारी है। भूगर्भशास्त्री होने के कारण शर्मा जी के आरंभ्क लेखों से मैं प्रभावित हो गया और यह मान बैठा कि इस स्टील प्लांट का बनना विकास नहीं विनाश है। दादू की दुकान पर चाय पीते हुए मेरी छात्रावासी मित्रों से लम्बी बहस हो गयी। पर्यावरण मेरे लिये भी बहस का आकर्षक विषय था और जंगल काट कर स्टील प्लांट बनाये जाने के तर्क के विरोध में मैं खडा था। कश्यप सर बहुत देर तक मेरे तर्क सुनते रहे फिर मुझे पास बुलाया और पूछा – मावली भाटा गये हो? मेरे ना में सिर हिलाते ही मुस्कुरा दिये बोले - चलो।

पत्थर और पत्थर, बंजर और वीराना। डिस्प्लेसमेंट बडा संदर्भ नहीं था, वृक्ष बडा सवाल नहीं थे....सच्चाई के सामने खडा कर कश्यप सर नें मुझसे कहा-मेरे कमर में पैंट देख रहे हो यह किसी को पचता नहीं है। हमें अजायबघर की चीज समझने वाले लोगों की साजिश है कि हम आदमी कभी बनें ही नहीं...हम नंगे हैं तो इन्हे सुकून है। क्यों हमारे बच्चों को स्कूल नसीब न हों? क्यों हमें बिजली न मिले? क्यों हम कमीज पतलून में टाई न लगा कर घूमें....क्यों हम जंगली रहें इस सदी में?.. मैं कश्यप सर की आँखों के आक्रोश को अपने भीतर गहरे महसूस कर रहा था। यहाँ स्टील प्लांट को बनना ही होगा, उनकी आँखों में अंगारे उग आये थे।

हँस्टल में हमेशा बासी अखबार ही पहुँचता था, एक दिन बाद की खबरे। उन दिनों टीवी-समाचार उतना पापुलर नहीं थे जितना कि रेडियो और समचार पत्र। ब्रम्हदेव शर्मा हाई प्रोफाईल आंदोलनकारी थे। उनकी बाते ही मीडिया को सच लगती थी और समझ में आती थी। मीडिया लोकतंत्र का पाँचवा स्तंभ है और अपने शेष चार स्तंभो की तरह प्रदूषण मुक्त नहीं। अखबारनवीसों को पता होता है कि कब, क्या और किसे छापना है। ब्रम्हदेव शर्मा की चर्चायें होने लगी, उनकी बातों को प्रमुखता प्राप्त होने से बहुत सी आवाजे दब गयी जो उनसे सहमत नहीं थीं।

छात्रावास में उस रात बैठक हुई। यह तय किया गया कि अपने अपने स्तर से ब्रम्हदेव शर्मा का विरोध किया जाये। जगदलपुर शहर में लडकों नें रैलियों के माध्यम से अपना विरोध भी दर्ज कराया किंतु उनकी सोच और दृष्टिकोण खबर नहीं बने। कुछ लडकों नें फिर भी दीपक जलाने का निर्णय लिया। उसी जबान में विरोध करने का जैसे स्वर उठें...। पारिस्थितिकी तंत्र और मावली भाटा की बायोडाईवर्सिटी पर खूब छापा जा रहा था साथ में फोटो दी जाती थी सुदूर दंडकारण्य की। बॉटनी के छात्रों नें सेंपल इकट्ठे किये, भू विज्ञान के छात्रों नें पत्थरों का सच लिखा लेकिन इनके आलेखों तस्वीरों और सच को छापने कोई अखबार तैयार नहीं हुआ। बस्तर प्रभात और दंडकारण्य जैसे छोटे और क्षेत्रीय अखबारों नें छापा भी तो कवरेज इतनी कम दी कि इनकी बात आगे आ ही न सकी। ब्रम्हदेव शर्मा के खिलाफ बस्तर के शिक्षित युवाओं में असंतोष फैलता ही जा रहा था। लेकिन भीतर का सच बाहर कोई ले कर जाता भी तो कौन और कैसे? पत्रकार आते थे और इस संदर्भ का एकतरफा बयान ले कर शर्मा जी के साथ गाडियों में जंगल घूम कर मुर्गा-शुर्गा खा कर निकल लेते। बडे अखबारों के पत्रकार भी तो हाई-प्रोफाईल होते हैं। फिर उनकी बातों में वजन भी होता है। उन्होने कहा कि मुर्गे की एक टाँग है तो फिर है जिसे दो दिखती हो अपनी आँख दिखवा ले। पत्रकार हैं भाई सच का ठेका ले रखा है। सच कोई मुफ्त में थोडे ही बनता है....

लेकिन जनसमर्थन साधारण प्रयासों से तो मिलता नहीं। यह कुनैन की तरह कडवी सच्चाई थी कि शर्मा जी के आन्दोलन (तथाकथित) को जिस तबके का सहयोग प्राप्त था वह जमीनी नहीं था। अपने कथन को जमीनी बनाने के लिये इस अभियान के कर्ताधर्ताओं नें परियोजना स्थल पर माँ दंतेशवरी की मूर्ति रख दी और धार्मिक भावनाओं को उकेर कर अपने पक्ष का मजबूत हथियार बना लिया। यह कारगर अस्त्र था। बस्तर और माँ दंतेश्वरी जैसे एक दूसरे के पूरक नाम हैं। हर एक की आत्मा और प्राण में माँ दंतेशवरी बसी है और सुजान जानते हैं कि एसी भावनाओं को क्या दिशा दी जानी चाहिये।....। यही हुआ भी।

उस दिन छात्रावास में इसी नें खाना नहीं खाया, एसा प्रतीत होता था कि कोई मर गया है। अखबार में खबर थी कि बस्तर के भीतर विरोध के कारण स्टील प्लांट का प्रस्ताव खारिज हो गया है। अब यह विशाखापटनम में लगना तय हुआ था। बस्तर के बाहर कुछ भी, कहीं भी लग जाये पर्यावरण को नुकसान नही होता है।...। कश्यप सर नें मेरे कंधे पर हाँथ रख कर कहा था – झूठ जीतते हैं। साँच में आँच लग गयी थी और बहुत से सपने झुलस कर खाक हो गये थे। लेकिन अखबारों को ये सपने कभी नहीं दीखे, सभी इस आंदोलन की सफलता की दास्तान लिखने में व्यस्त थे। जिन्हें फर्क पडता था वे अपने बुझे हुए दिल लिये नये सपनों की तलाश में लग गये।

तभी अनायास ब्रम्हदेव शर्मा कुछ युवाओं की चपेट में आ गये। फिर जो कुछ हुआ वह मैं बयाँ कर चुका हूँ। जो हुआ वह विरोध भी एक आंदोलन था। हीरो कोई भी बन कर निकला हो, दुनिया जो भी सच जानती हो लेकिन बस्तर के आदिवासी युवकों की पीडा और प्रश्न अनुत्तरित ही रहे। मैं शर्मा जी पर हुए बर्ताव का समर्थन नहीं करता न ही उन युवकों के कृत्य को सही ठहराना मेरे इस संस्मरण का मकसद है। मैं उस दर्द की कहानी को शब्द दे रहा हूँ जो परदे में रही।

आन्दोलन और आन्दोलनकर्ताओं के बहुत से सच होते हैं। अविनाश जी आपके चश्मे से ही मैं दुनिया देखूँ यह सोच गलत भी नहीं, आज की पत्रकारिता एसी ही है। आप सच कहते हैं बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ। लेकिन साधुवाद के पात्र हैं आप, कि मेरे मुख पर टेप लगाने की आपकी कोशिश में बहुत से संस्मरण जी उठे। एक एक कर भूली बिसरी दास्तां ले कर आता रहूँगा। सच पर भडास निकालिये...

***राजीव रंजन प्रसाद

Saturday, May 24, 2008

राजस्थान की आग पर...पधारो म्हारे देस...

केसरिया बालमवा..पधारो म्हारे देस...

आदम ढूंढो, आदिम पाओ
रक्त पिपासु, प्यास बुझाओ
मेरी माँगें, तेरी माँगें
खींचें इसकी उसकी टाँगें
मेरा परिचय, मेरी जाती
छलनी कर दो दूजी छाती
नेताजी का ले कर नारा
गुंडागर्दी धर्म हमारा
हमें रोकने की जुर्ररत में
खिंचवाने क्या केस?
पधारो म्हारे देस..

किसका ज्यादा चौडा सीना
मैं गुज्जर हूँ, वो है मीणा
दोनों मिल कर आग लगायें
रेलें रोकें बस सुलगायें
कितना अपना भाईचारा
मिलकर हमने बाग उजाडा
बीन जला दो, धुन यह किसकी
भैंस उसी की लाठी जिसकी
मरे बिचारे आम दिहाडी
गोली के आदेस
पधारो म्हारे देस..

ईंट ईंट कर घर बनवाओ
जा कर उसमें आग लगाओ
और अगर एसा कर पाओ
हिम्मत वालों देश जलाओ
अपनी पीडा ही पीडा है
भीतर यह कैसा कीडा है
अपनी भी देखो परछाई
निश्चित डर जाओगे भाई
बारूदों में रेत बदल दी
इसी काज के क्लेस
पधारो म्हारे देस...

जाग जाग शैतान जाग रे
आग आग हर ओर आग रे
जला देश परिवेश नाच रे
झूम झूम आल्हे को बाँच रे
इंसानों की मौत हो गयी
सोच सोच की सौत हो गयी
होली रक्त चिता दीवाली
गुलशन में उल्लू हर डाली
हँसी सुनों, हैं सभी भेडिये
इंसानों के भेस
पधारो म्हारे देस...

केसरिया बालमवा.........!!!

*** राजीव रंजन प्रसाद

Friday, May 23, 2008

सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

पुरबा बता दे, कहाँ की हवा है
सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..


लहू जिसका पानी, है एसी जवानी
जो आँसू बिकेंगे, उन्ही में कहानी
जिसे दिखता सूरज, वो आशा दिवानी
जो पत्थर कभी थे, वो हैं पानी पानी..
वो लहरें उठी थीं, भंवर बन गयी हैं
जो उस पार पहुँचे, वो नौका कहाँ है
सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

बहुत मोड आये, तुम्ही मुड गये थे
जहाँ जोड पाये थे, तुम जुड गये थे
नमक जिसपे डाला, वो अंकुर नये थे
जो टूटे हैं, उन घोसलों में बये थे..
क्षितिज एक धोखा, झुके कैसे अंबर
चढे हौसला उसपे,जरिया कहाँ है
सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

कभी सात पर्दों को आँधी हटा कर
काटने वाले हाँथों की चाँदी हटा कर
जो मुर्दे जिला दे वो, एसी दवा कर
कि हर एक आँखों को पारस छुवा कर
कोई दीप बुझता हुआ आग धर ले
सांस लेती रहें चिनगियाँ ये दुआ है
सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

न नापो, बडी या कि छोटी मिलेगी
अगर सोच बाँटोगे, रोटी मिलेगी
जो पत्थर चलेंगे तो नीवें हिलेंगी
कलम गाड दोगे तो कलियाँ खिलेंगी
अंधेरे बहुत फैल जायें तो समझो
उठो अब कि अपना सवेरा हुआ है..
सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

*** राजीव रंजन प्रसाद
12.03.2007

Wednesday, May 21, 2008

अपनी शादी की सालगिरह पर..एक रचना दिल से...

दिन खास है तो सोचा दिल के करीब की कोई रचना प्रस्तुत करूं। जैसे डायरी में कोई पुराना गुलाब सहेज कर रखा जाता है बिलकुल वैसे ही सहेज कर रखी थी यह रचना।...।
शादी से पहले लिख कर यह कविता जिसे पत्र द्वारा भेजी थी वही आज मेरी ज़िन्दगी हैं, और आज हमारी शादी को पूरे छ: वर्ष भी हो गये।

सोचो जानम..

सोचो मेरा साथ
और कुछ सपने देखो
आँगन सोचो, जिसमें तुलसी का पौधा हो
जिसके आगे दीप जला कर
सूरज को तुम जगा रही हो
और ज़ुल्फ का सारा सावन
मेरे चेहरे पर बरसा कर कहा करोगी
चलो उठो ‘जी’, सुबह हो गयी
और चाय की प्याली मेरे सिरहाने रख
मेरे बिलकुल पास बैठ कर
कोई एसी चुहल करोगी
कि बरबस ही आँखें खोलूं
भरी भोर में चाँद देख लूँ...
सोचो जानम
भारी कोई बनारस वाली साडी पहने
और गाल तक झूम रहे कानों के गहने
और कोहनियों तक काँच की चूडी पहने
छम छम की पाजेब पहन कर, दबे पाँव तुम
आ कर मेरी पलकें ढाँपे यह पूछोगी
बतलाओ कैसी लगती हूँ?
और तुम्हारी बाँह थाम कर आँखों का आईना दूँगा
तुम शरमा कर दूर हटोगी
और हाँथ की कोई चूडी, मेरे हाँथों से टकरा कर
टूटेगी और गिर जायेगी
अब कि आँखों में ढेर सा गुस्सा भर कर
तुम जो मेरी आँखों में देखोगी
छुई-मुई सी हो जाओगी...


और कमर में साडी का ही पल्लू खोंचे
बेलन हाँथों में ले कर
मुझे रसोई ना आने की कडी नसीहत दे कर
तुम आँटे को थाली में डालोगी
मैं तुम्हे परेशां करने की नीयत रख कर
एक हाँथ से कमर तुम्हारी थाम
आँटे में पानी इतना डाल दूंगा, गीला हो जायेगा
मुझसे छूटने की नाकाम कोशिश कर
पानी में और आँटा डाल लेई बना लोगी
और चकले पर रख कर उसे
उस पर बेलन रख कर
और बेलन पर अपने हाँथ रख
उन हाँथों पर मेरा हाँथ पा कर भी
बेलोगी कि रोटी बन ही जाये
दिल बन जायेगा..
मेरी बेतरतीब चीजें सवाँर कर
और फिर फिर उसे बेतरतीब ही पा कर
झल्लाओगी
बडी बडी आँखें इस तरह दिखाओगी
कि बस अब काट ही खाओगी
मुझे दफ्तर भेज कर ही तुम्हें चैन आया करेगा
और शाम तुम्हारी बेकरार आँखें
बिलकुल दरवाजे पर होंगी
मेरे आते ही लड पडोगी रोज़ रोज़
कि देर से घर आना कोई अच्छी बात नहीं है
मैं चाय पी चुकने तक
सुनूंगा तुम्हारी सारी बक-बक
और फिर/तुम्हारे चुप के लिये
तुम्हें अपने करीब खींच कर
होठ सी दूंगा... दिन बेहद खूबसूरत होंगे
और रेशमी रातें जानम
सोचो और ज़िन्दगी सोचो
सोचो वह दिन भी आयेगा
जब सारा आराम तुम्हें दे
सारी जिम्मेदारी बाँटूंगा
मेरी हालत पर हँस हँस कर
छोटे छोटे मोजे स्वेटर
रंग बिरंगे से बुन बिन कर
बार बार सपनों में जा कर, यह सोचोगी
किस पर जायेगी
और निशानी मेरे प्यार की कैसी होगी...
सपनों से मत भागो चाँद
अंतहीन तुम सपने देखो
आओ जी लें एक ज़िन्दगी
सपनों में ही दुनियाँ कर लें
तुम मेरी आँखों में बैठो
खो जायें हम अंतहीन में...

***राजीव रंजन प्रसाद

तुम सिमट आतीं मेरे करीब....

काला जादू..

जब कि बादल नहीं होते
जी करता है खींच लूं चोटी तुम्हारी
और तुम झटक कर सिर
आँखों को तितलियाँ कर लो
अब कि जब मेरी हथेलियों में
तुम्हारा आंचल होता
तुम सिमट आती मेरे करीब
तुम्हारे केश मेरी उंगलियों पर
जाल बनाते जाते हैं
खुलते जाते हैं खुद ब खुद
घनघोर काली घटाओं का काला जादू
गुपचुप मुझमें खो जाता है
तुम में चुप सा बो जाता है..

*** राजीव रंजन प्रसाद
१७.११.९५

Tuesday, May 20, 2008

चरित्र और चेहरे..


एकांत
ध्यानमग्न बगुला
एकदम से ताल के ठहरे पानी पर झपटा
पानी भवरें बनानें लगा
उसकी परछाई लहरानें लगी
वह शांत हुआ
पंजे में कुछ न था
मछली या कि अपनी ही परछाई

फिर वही एकांत
वही ध्यानमग्न बगुला
वही ठहरा हुआ पानी
वही परछाई..

मछली तो फसेगी आखिरकार
क्योंकि उसे नहीं पता
चरित्र और चेहरे एक नहीं होते
और मैं हर बार देखता हूं
झपटते हुए बगुले को
अपनी ही परछाई पर..

*** राजीव रंजन प्रसाद
७.०१.१९९५

Saturday, May 17, 2008

मैं कभी ज़िंदा नहीं था..(कहानी)


रोज देखता था उस लडकी को। सुबह हुई नहीं कि हाँस्टल की पिछली दीवार से लगे कूडे के ढेर में जानें क्या खोजती, ढूंढ़ती, बीनती मिलती। उसके घुटनों से लम्बा उसका बोरा पीठ पर लदा होता। अभी उम्र ही क्या होगी? ज्यादा से ज्यादा आठ वर्ष, किंतु जिन्दगी पीठ पर लदे पहाड़ से कम नहीं। उसका चेहरा उसके कपडो की तरह मटमैला नही था। हल्का गेहुँआपन लिये गोल, आँखें अंदर को धँसी-छोटी-छोटी। मैने अनुभव किया कि वह लडकी जानती ही नहीं हँसी किसे कहते हैं। टीन के ड़ब्बे, प्लास्टिक, पोलीथीन, कागज, अखबार यहाँ तक कि सिगरेट की डिबियों को वह उठा, झाड कर अपनें बोरे में भर लेती।....। हाँस्टल का ये कोना कभी साफ रहा हो मैने नही देखा। चपरासी हर कमरे का कचरा झाड कर यहीं पटक जाता है। उस लडकी के लिये कुबेर का खजाना था ये कोना।....।बचपन यानी कि तितली हो जाना, खिलखिलाना, कूदना, सपने बुनना और जगमग आँखों से आकाश के सारे तारे लूट लेना...पर एसा बचपन! सच, पहली बार देखा। नहीं, उसमें बचपन था ही कहाँ? वह लडकी आठ वर्ष की अधेड थी। कुछ दिनों से उसके साथ एक बच्ची आनें लगी थी, हाथ थामें। उसकी छोटी बहन होगी, शायद। पाँच साल की भी न थी। यहाँ पहुँचते ही वह एक कोने में खडी हो जाती और अपनी दीदी को कबाड बीनते देखा करती । नि:शब्द। बचपना उसके बचपन में भी नहीं दीखा।सुबह जल्दी उठ जाने के बावजूद स्ट्डी टेबल पर कभी नहीं बैठा। छ्त पर हवा सुहानी लगती थी और मै टूथब्रश मुँह में दबाये घंटे भर दाँतो में इधर उधर करता रहता। सुबह सुबह और सोचता भी क्या? फिर दिमाग खाली भी नहीं रहता शायद इसीलिये कई बार मैने उस लड्की को अपनी सोच में कुलबुलाते पाया था। मुझे बेचैन कर देती थीं उसकी बेहद खामोश आँखें।....और अब यह छोटी...मैं उनकी आँखों में बचपन तलाशता और पाता आँखों के कोरों पर कीचड और भीतर मुर्दनी। बचपन को यह कैसा लकवा? अब कल ही तो वह मशहूर गज़ल सुन रहा था – “ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कश्ती,वो बारिश का पानी”, मेरे तो सारे रोये जैसे रो उठे थे। दिल कोई कस कर दबा रहा हो जैसी स्थिति हो गई थी। सोचता हूँ क्या कभी ये लड़कियाँ समझ सकेंगी इस गजल का अर्थ?....। बोरा खचाखच भर चुका था। लडकी नें दोंनो हाथों से उठा कर वजन सा लिया, फिर एक झटका दोनो हाथों से बोरे को दिया और उसे कंधे से धकेल कर पीठ पर लाद लिया। छोटी नें बहन की फ्राक का एक सिरा थामा और दोनों चल पडीं।
सूरज से चिंगारिया निकलनी शुरू हो चुकी थीं और बीच कुछ नीला सा गोल गोल घूमने लगा था। मैनें दादू की चाय की दूकान पर नजर डाली, दादू व्यस्त था। सुबह पाँच बजे ही वह दूकान खोल लेता है और फिर रात्रि नौ बजे तक....पूरा कोल्हू का बैल है वह। मैं भी कुल्ला कर, पानी मुँह और आँखों में डाल, नीचे उतर आया। बाथरूम में अभी पानी नहीं आ रहा था सोचा तब तक एक कप चाय ही सही।
“गोपाल चाय पिला यार” मैने दादू के लडके से कहा। गोपाल यंत्रवत ले आया। इस बीच मैने दादू को ईशारा कर दिया था – “एक फुल, कडी, स्पेशल”। गोपाल के हाँथ से मैने पानी लिया और देखा वह फिर मशीन हो गया है। सामने की बैंच पर जूठन पडी थी, कही से कर्कश आवाज आयी - “कपडा मार’’ और गोपाल बेंच साफ करने लगा। दादू चिल्लाया- ‘’गोपाल पीछे लडका ‘मन’ को दो हाफ चाय दे के आ’’ गोपाल ने दादू के हाँथ से दो ग्लास ले लिये। मेरी चाय बनने में देर थी। दादू मुझसे बेहद परेशान रहता है। सुबह मै कड़ी चाय पीना पसंद करता हूँ, वह भी खालिस दूध की। दादू कई बार टिप्पणी कर चुका है ‘’इतना पत्ती में मै चार जन को चाय पिलाता’’ और कई बार दबा प्रतिरोध भी “इतना कडा चाय पीने से काला हो जायेगा’’।मै दादू की झल्लाहट पर मजाक जड देता हूँ ‘’कौन सा लडकी हूँ दादू कि काला हो जाने से फर्क पडेगा?’’। दादू को भी क्या फर्क पडता है, मेरी चाय का वैसे भी वह तीन रूपया चार्ज करता है। “गोपाल’’ दादू नें फिर आवाज दी, “राजू को चाय दे के आओ’’। गोपाल ने चाय मुझको थमा दी।आज सुबह से ही दिमाग जानें क्या क्या सोच रहा था और अब.....मैं सर झटक कर अपनी चेतना बटोरनें लगा कि अभी आखिर सोच क्या रहा था मैं...शायद गोपाल के बारे में..वही आठ वर्ष की उम्र, दादू का अपना बेटा....एक बाल मजदूर। “दादू!! तुम गोपाल को पढ़नें क्यों नहीं भेजते?’’ मैने पूछा। “जायेगा अभी टेम नही हुआ” दादू नें अपनी उफनती चाय को स्टोव से उतारते हुए कहा। हाँ! ग्यारह बजे से गोपाल दुकान में नहीं रहता, मुझे याद आया। तब तक चटर्जी काम करता है। दादू नें काम पर रखा है इसे। तपन नाम है पर चटर्जी ही सभी पुकारते हैं.....ये नही पढ़ता। पढेगा तो पैसे नहीं मिलेगे, पैसे नहीं मिलेंगे तो खायेगा क्या? इस तरह के उत्तर उसने मुझे कई बार दिये थे किंतु अपने घर के विषय में कभी नहीं बताया। चंचल है यह लडका। दादू के तो नाकों चने चबवाता रहता है। जब चटर्जी की जरूरत हो चटर्जी गायब। पता चला मैदान में पतंग उडा रहा है। दादू दुकान से चिल्लाता है, और भागता हुआ आता है चटर्जी-क्या काम है? सपाट सा उसका प्रश्न और दादू गालियों का भंडार उस पर खोल देता। मैनें चटर्जी को अपने बचपन के लिये लडते पाया है। उसे दादू की गालियों की परवाह नहीं वेतन कट जानें की परवाह नहीं। परवाह है तो पतंग की, जिसकी डोर में धार नहीं है। इसी कारण तो झबलू की पतंग को बार बार, उलझा कर भी काट नहीं पा रहा। उसे परवह है तो उन सारे कंचो की जिन्हें कल हार गया था। उसे परवह है तो गुल्ली और डंडे’ की क्योकी ‘गिल्ली में पर्याप्त उछाल नहीं है। उसने दादू की मिल्कियत को खुली चुनौती दे रखी है, पीटना है तो पीट लो...। मेरी चाय खत्म हो चुकी थी, गोपाल के हाँथों में ग्लास थमा मै अपने कक्ष की ओर लौटा। डर था कि पानी आ गया होगा, कहीं बाथरूम में भीड न हो गई हो।
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लडकी नें शराब की खाली बोतल उठाई और बोरे में डालने से पूर्व एसी निगाहों से देखा जैसे अभी पटक कर फोड डालेगी। किंतु...शराब भले ही जहर हो, ये बोतल तो उसकी रोटी है, लडकी नें बोतल को बोरे में डाल लिया। उसकी इस गतिविधी नें मेरी कल्पना पैनी कर दी थी...शायद बाप शराबी हो, बच्चियों को मारता पीटता हो, कमाई पी कर उडा देता हो...और..और...मैं अपनी कल्पना में स्वत:संवेदित होने लगा। छ्त से थोडा झुक कर देखा। छोटी, चुपचाप खडी थी। “ए लड़की!! तुम्हारा नाम क्या है” मैने पुकारा। बड़ी के हाँथ कुछ उठाते उठाते रूक गये, उसने झुके हुए ही उपर देखा। मुझे छोटी से मुखातिब देख वह पुन: कार्य में लग गई। “ए लडकी” मैने छोटी को पुन: पुकारा। छोटी ने उपर तो देखा लेकिन सहमी आँखों से। मुझे लगा जैसे मेरे शब्दों में मिठास नहीं और इसीलिये बच्ची सहम गई। “तुम्हारा नाम क्या है?” पूरी मृदुता मैनें आवाज में भरी। छोटी नि:शब्द रही। मैं.....मैं उसके सहम जानें का उत्तर स्वयं से पूछ रहा था। मुझे छोटी पर गुस्सा नहीं आया।......। अभी कुछ दिनों पूर्व ही किसी दोस्त से बहस में मैने दलीलों पर दलीलें दी थीं कि बचपन चाहे निम्न वर्ग का, मध्यम या उच्च वर्ग का, बचपन तो बचपन ही होता है। एक तर्क मुझे मिला “कभी अनाथालय गये हो?”। इस दलील पर यद्यपि मुझे निरुत्तर हो जाना चाहिये था, तथापि मैने जाने किन किन तर्कों से यह वाद- विवाद जीता था।....शायद अपने इसी खोखलेपन से डरा था मैं? दाँतों में घूमता ब्रश अनायास रुक गया। अनाथालय तो बहुत दूर है, मेरे सामने, मेरे रोज की अनुभव-ये दो लडकियाँ। किस बचपन से तुलना करुं और कैसे बचपन से? इनको तो किसी कुत्ते के पिल्ले के बचपन सा सुख भी प्राप्त नहीं...बेचारे....ब्रश दाँतों के इर्द गिर्द फिर घूमने लगा। बोरा भर चुका था और लडकियाँ जाने लगीं। मैं उन्हें जाते देखता रहा। बोझ कंधे पर लादे बडी, जिसकी फ्राक का एक सिरा पकडे छोटी..
मस्तिष्क इतना बोझिल हो गया था कि चाय पीना आवश्यक हो गया। दादू को मैने हाँथ से इशारा किया “एक फुल कडी स्पेशल”। लडकियाँ दादू की दूकान के सामने ही बोझा कंधे से उतार सुस्ता रही थीं। “गोपाल” मैंने आवाज दी। “जा दोनों को हाफ चाय दे कर आना” मैने इशारा किया। गोपाल मेरे चेहरे में दृष्टि टिका कर खडा रहा। “जा दे के आ” मैने आदेश के स्वर में कहा। गोपाल नें अब दादू की ओर देखा। दादू नें दो हाफ गोपाल को थमा दिये। गोपाल फिर भी झिझका, पर हार कर गया ही। “ले” गोपाल नें मोटे स्वर में बडी को कहा। बडी नें दादू की ओर देखा। दादू व्यस्त था। मैंने देखा एक आश्चर्य की रेखा उसके चेहरे पर उभरी, उसकी नज़र मुझपर पडी। “ले लो-ले लो” मैंने आग्रह सूचक शब्दों में कहा। बडी नें दोनों हाँथों में ग्लास थामें फिर छोटी को एक थमा दिया। उसने अजीब सी निगाहों से मुझे देखा, शायद कृतज्ञता थी।
जगदलपुर को पूरी तरह शहर तो नहीं कहा जा सकता। किंतु बस्तर जैसे क्षेत्र के लिये यह जिले का मुख्यालय, शहर से कम भी नहीं। अगरसिंह के साथ मैटिनी शो जा रहा था। अनुपमा चौक पर बहुत भीड थी। “क्या हुआ भाई साहब” मैंने वहीं खडे एक व्यक्ति से पूछा। “एक्सीडेंट” एक शब्द में उसने स्थिति स्पष्ट कर दी। जिज्ञासावश मैं भीड में अपने लिये जगह बनाने लगा। अचानक चौंक उठा...”अरे यह तो वही...वो....वही लडकी है”। “कौन” अगर सिंह नें प्रश्नवाचक निगाहों से घूरा। “अपने हॉस्टल के पास कबाड बीनने आती है रोज” मेरे स्वर में घबराहट थी और अगरसिंह की आँखों में अचरज। बडी, सडक पर पडी थी। सर फट गया था और खून बिखरा हुआ था। एक सफेद कार जिसके अगले हिस्से पर खून लगा था, वहाँ खडी थी। ड्राईवर कोई धन्नासेठ था जो रूमाल से अपना पसीना पोंछ रहा था।....। मैंने हमेशा देखा है दुर्घटनाओं में ड्राईवर भीड के हाँथ लगा तो भीड उसे अधमरा कर ही मानती है पर....धन्नासेठ के कपडे मँहगी सफारी के थे। टाईपिन भी सोने की नज़र आ रही थी, भला भीड उसे हाँथ कैसे लगा सकती थी? मेरे मन में गुस्से का गुबार सा उठा कि उसका मुँह ही नोंच डालूं या...या...या....मैंने आश्चर्य से देखा, उसनें नें एक निगाह लाश पर डाली फिर वापस अपनी कार में बैठा और चलता बना। मैने कार का नम्बर नोट किया। “चल न यार पिक्चर छूट जायेगी” अगर सिंह नें मेरा हाँथ पकड कर खींचा। “छोड मैं नहीं देखूंगा” मैंने जवाब दिया। मैं उस छोटी लडकी को देख रहा था जो रोये जा रही थी। मेरी पलकों के कोरों पर नमीं बैठने लगी। “तू भी यार छोटी छोटी बातों पर रो डालता है” अगर नें टिप्पणी की। मुझे महसूस हुआ शायद सचमुच.....। वर्ना क्या भीड इसी तरह खामोश रहती? हमें क्या लेना देना की मनोवृत्ति। किसी को भी क्या लेना देना? सडक दुर्घटना में एक मौत हुई बस। फिर ये कुत्ते से बदतर मौत? लाश लावारिस पडी रही। छोटी के रोने की आवाज मेरे कानों में सूईयाँ चुभाने लगी। मैं क्या करता? मैं क्या कर सकता था?...मुझे क्या करना चाहिये था?....?....? ये प्रश्न आज तक अपने आप से दोहराता रहा हूँ। उस क्षण मैं स्वयं को बिखरा बिखरा महसूस कर रहा था, सडक पर बिखरे कबाड की तरह।
****
मैं मुँह धोता टहल रहा था, जानता था, अब कबाड बीनने कोई नही आयेगा। फिर भी अनायास छत से झाँक लेता...। रात भर ठीक से सो नहीं सका था।....और सचमुच सप्ताह भर कोई नहीं आया। कबाड जमा होता रहा, होता रहा और आज......आज, छोटी कबाड बीन रही थी। मैंने देखा, फिर देखा, फिर देखा...उसके घुटनों से बडा उसका बोरा। पीठ पर वही सब कुछ - डब्बे, बोतल, सिगरेट के पैकेट, पोलीथीन...। शराब की बोतल उसके हाँथों में थी। छोटी नें बहुत शांत आँखों से देखा, फिर उसे बोरे में डाल लिया। मैं उसके चेहरे में आये हर भाव पढ जाना चाहता था, निराशा हुई मुझे। बोरा भर गया था। छोटी नें वजन लेने के लिये हाँथों से बोरे को खींचा...नहीं बहुत भारी था। उसने पुन: यत्न किया। उससे नहीं उठा। मैनें देखा छोटी नें बोरा खोल भीतर से शराब की बोतल निकाल निकाल फेंक दी। बोरा कंधे पर उठाया और चल पडी, बिलकुल भाव शून्य।....। तभी मैंने देखा वही सफेद कार सामने फर्राटे से निकली और आज खून के एक छींटे उस पर न थे। एक भी नहीं....। मैं देख रहा था एक लाश आहिस्ता आहिस्ता, कंधे पर पहाड़ ढोए जा रही है। फिर मैंने महसूस लिया कि मैं कभी ज़िन्दा था ही नहीं।


राजीव रंजन प्रसाद
27.05.1992

Friday, May 16, 2008

मेरे कतरे कतरे को चाहा था..



उसने मुझको छोड
मेरे कतरे कतरे को चाहा था
उसने कतरा कतरा ले कर
मुझको छोड दिया जीने..

मैं कहता हूँ सागर से
मुझमे डूब मरो कम्बख्त
कलेजा भर जायेगा
मेरी आँखों से तो
सारा झर जायेगा
उसने तो मन की गागर में
ठूस ठूस कर सागर भर कर
मुझको छोड दिया पीने...

मेरा लहू निकाला मुझसे
मेरी आँखें छीन ले गया
मेरे मन की जीभ काट ली
मेरे पंख कुतर डाले
मैं कहता था दिल चिरता है
और कलेजा फट पडता है
कुछ मकडी के जाले दे कर
मुझको छोड दिया सीने...

*** राजीव रंजन प्रसाद
१७.०१.१९९६

Thursday, May 15, 2008

समाजवाद बबुआ.. (तिब्बत की पराधीनता क्या लाल-झंडा बरदारों का असली चेहरा नहीं है?)


ल्हासा लाल हो गया है
साम्यवाद नें
खीसें निपोड कर कहा है
’धम्मम शरणम गच्छामि’
और पकड पकड कर तिब्बतियों के
फोडे जा रहे हैं सर
कील लगे बूटों के सेलूट
खामोश होती गलियों, सडकों और मठों पर
हुंकार रहे हैं – लाल सलाम।
अफ़ज़लों को पोसने वाले
इस देश की सधी प्रतिक्रिया है
दूसरों के फटे में अपनी टाँग क्योंकर?
वैसे भी यहाँ आज़ादी का अर्थ आखिर
दीवारों पर पिच्च से थूकना
या कि सडकों पर
अनबुझे सिगरेट के ठुड्डे फेंकना ही तो है?
फिर सरकार की बैसाखियों का रंग लाल है
लेनिन के अंधे को लाल-लाल दिखता है
मजबूरी है भैया
जय गाँधी बाबा की।
घुप्प अंधकार में
जुगनू की चुनौती
कुचल तो दी जायेगी, तय है
और मेरी नपुंसक कलम
आवाज़ नहीं बन सकती, जानता हूँ।
दूर बहरा कर देने की हद तक
पीटा जा रहा है ढोल
नुक्कड में क्रांति के ठेकेदार जुटे हैं
देखो भीड नें ताली बजाई
समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई...।

*** राजीव रंजन प्रसाद
16.03.2008

Wednesday, May 14, 2008

जयपुर में मौत के तांडव पर एक श्रद्धांजलि - मर गये आदमी, एक खबर बन गयी



मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

जल गयी लाश थी कोई पत्थर हुआ
क्या संभाले उसे, क्या करेंगे दुआ
ज़िंदगी आँख में रुक गयी काँच बन
और हाँथों की हर फूटती चूडियाँ

इसमें भी है खबर, कैमरे की नज़र
चीखती अधमरी की तरफ तन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

जिसने फोडा था बम उसका ईमान क्या
उफ पिशाचों से बदतर वो हैवान था
हो कि हूजी, सिमि या कि लश्कर कोई
कैसे खुफिया हैं क्यों तंत्र अंजान था

लोकशाही में आलू तो मँहगा हुआ
आदमी की रही कोई कीमत नहीं
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

वो पहन कर के खादी निकल आयेंगे
उंगलियों को उठा कर के चिल्लायेंगे
चुप हैं घडियाल सूखी नदी देख लो
उनकी आँखों से आँसू निकल आयेंगे

जो बचाते हैं अफज़ल को इस देश में
वो हैं कारण अमन की कबर बन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

मुझको अफसोस मेरे गुलाबी शहर
तेरे सीने में नश्तर, लहू का कहर
अब सियासी बिसातों की सौगात बन
फैलता जायेगा हर डगर एक ज़हर

हादसे पर सिकेंगी बहुत रोटियाँ
देख गिद्धों की कैसी नज़र बन गयी
मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

***राजीव रंजन प्रसाद
14.05.2008

Tuesday, May 13, 2008

ज़ुल्फ और क्षणिकायें


ज़ुल्फ -१

उसनें कहा था हवाओं में खुश्बू भरी होगी
मुझसे दूर
मेरे ज़ुल्फों के खत पुरबा सुनायेगी तुम्हे
ये क्या कि ज़हर घुला है हवाओं में
एक तो जुदाई का मौसम
उसपर तुम्हारी तनहाई का दर्द हवाए कहती हैं मुझसे..

ज़ुल्फ -२

तुमने ज़ुल्फें नहीं सवारी हैं
घटायें कहती हैं मुझसे
बेतरतीब चाँद भला सा नहीं लगता
बादलों में उलझा उलझा सा
हल्की सी बारिश से नहा कर निकला
उँघता, अनमना, डूबा सा
झटक कर ज़ुल्फें
खुद से खींच निकालो खुद को
सम्भालो खुद को..

ज़ुल्फ -३


ज़ुल्फों के मौसम फिर कब आयेंगे?
बिलकुल भीगी ज़ुल्फें
एकदम से मेरे चेहरे पर झटक कर
चाँद छुपा लेती थी अपना ही
मैं चेहरे पर की फुहारों को मन की आँखों से छू कर
दिल के कानों से सूंघ कर
और रूह की गुदगुदी से सम्भालता खुद को
फिर तुम्हे ज़ुल्फों से खीच कर
हथेलियों में भर लिया करता था…
तुमने ज़ुल्फें मेरी आँखों में ठूंस दी हैं
अब तो पल महसूस भी न होंगे, गुजर जायेंगे
ज़ुल्फों के मौसम फिर कब आयेंगे..

ज़ुल्फ -४


ज़ुल्फों के तार तार खींचो
उलझन उलझन को सुलझाओ
तुम खीझ उठो तो ज़ुल्फों को
मेरी बाहों में भर जाओ
मेरी उंगली से बज सितार
बुझ जायेंगे मन के अंगार
मैं उलझ उलझ सा जाउंगा
खो जाउंगा भीतर भीतर
हो जाउंगा गहरा सागर..

ज़ुल्फ -५


बांध कर न रखा करो ज़ुल्फें अपनी
नदी पर का बाँध ढहता है
तबाही मचा देता है
एसा ही होता है
जब तुम
एकाएक झटकती हो खोल कर ज़ुल्फें..

ज़ुल्फ -६


टूट गया
बिखर गया
सपनों की तरह मैं
कुचल गया
पिघल गया
मोम हो गया जैसे
फैल गया
अंतहीन समंदर की तरह मैं
खो गया
खामोश था
रात हो गया जैसे
और तार तार था
उलझी सी गुत्थी बन
ज़ुल्फ हो गया तेरी..

ज़ुल्फ -७


मुर्दा चाँदनी का कफन
जला देता है
कफन तो कफन है
ज़ुल्फ ढांप दो..


*** राजीव रंजन प्रसाद
७.०१.१९९६

Monday, May 12, 2008

मछली की आँखें


मेरी अमावस्या इस लिये है
कि मेरा चाँद
मेरी आँखों की बाहों में लिपट गया है
और कुछ दीख नहीं पडता
सिर्फ मछली की आँखें..

*** राजीव रंजन प्रसाद
२१.०२.१९९७

Sunday, May 11, 2008

माँ तुम्हारा खत

(यह रचना छात्रावास के दिनों में मैंने लिखी थी और आज भी पढता हूँ तो हर शब्द सामयिक पाता हूँ। तस्वीर मेरी पूजनीय माताजी की है अपनी पोती के साथ...)

माँ
अब तुम्हारा खत
मुझे वो उष्मा नहीं देता
जब पहले पहल तुम्हारे आँचल से दूर
अनजानी हवाओं में तनहा हुआ था
पहले पहल जब मेरे पैरों के पास
ज़मीन हुई थी
और मेरे पंख कुतर गये थे
माँ तभी पहले पहल
जब तुम्हारा खत मिला था
तो उसे पढ पाना मुश्किल हो गया था
मेरे बेसब्र अनपढ आँसुओ के उतावलेपन में
और माँ
उस दिन सितारे फीके नहीं लगे
चाँद से दोस्ती हो गयी
और उस दिन मैं गुनगुनाता ही रहा घंटों

माँ!
जैसे जैसे सूरज मेरी छाती पर चढता जाता है
जैसे जैसे ज़िन्दगी मरुस्थल होती जाती है
मैं अपनें जले पाँव और छिली छाती लिये
किताबें ओढ लेता हूँ
दिमाग का भारीपन भुला ही देता है तुम्हे
मैं काश कि तुम्हारी गोद में सिर रख
आखें बंद करता
और वक्त की सांसें थम जाती
और माँ जब भी एसा सपना आता है न
तब मुझे अपना रूआसापन भला नहीं लगता
मेरे रोनें पर तुम्हे दुख होता होगा है न माँ...
क्या समय बीतता है तो अतीत पर
जम जाती है मोम की परत
तुम्हारे खत अब भी तो आते हैं
वैसे ही खत
वे ही नसीहतें
वे ही चिंतायें
जैसे कि तुम्हारे लिये वक्त ठहरा हुआ हो..

माँ तुम बहुत भोली हो
और भागती हुई दुनियाँ तुमसे बहुत आगे निकल चुकी है
मैं भी बदल गया हूं माँ
बडा हो गया हूं शायद
कि अब तुम्हारे खत
मुझे वो उष्मा नहीं देते
जबकि तुम्हारे खत की खुश्बू वैसी ही है
तुम्हारे खत पढ कर मन मोर नहीं होता लेकिन
बादल हो जाता है माँ
और माँ लगता है
भट्टी में तप कर कुन्दन बन निकलूं
क्योंकि दुनिया की सबसे अच्छी माँ मेरी माँ है..
लेकिन माँ
एसा भी होता है
जब दिनों तक तुम्हारे खत नहीं आते
तो दिनों तक कुछ भी अच्छा नहीं लगता
सितारे उदास हो जाते हैं
चाँद गुमसुम
एसा अब भी होता है लेकिन..

*** राजीव रंजन प्रसाद
८.१२.१९९५

Saturday, May 10, 2008

बम


उसे भूख लग आयी थी..और जब भूख लगी होती है, तो ज़िन्दा होता है सिर्फ पेट। रोज़ रोज़ यह देश जाने कितने ज़िन्दा पेटों वाले मुर्दे ढोता है और आहिस्ता-आहिस्ता मर रहा है खुद भी। भूखा पेट, इंकलाब नहीं होता, बहुत से भूखे पेट सैलाब होते हैं लेकिन।...।ज़िन्दा पेट गुमराह हो जाता है, फट पडता है। इसी लिये तो कभी बम्बई में धमाका होता है और कोई बाजार राख हो जाता है, या कभी कलकत्ता की कोई सडक, या मद्रास की इमारत.....।

भूख जब उसकी आँखों में उतरने लगी, पानी से निकाली गयी मछली हो गया वह। एक दम से दौडा और सामने की दूकान से समोसे उठा कर जितनी तेज हो सकता था भागा। तेज..और तेज..और तेज। चोर! चोर!! चिल्लाते दौड पडे लोग। जब भीड के हाँथ लगा तो अधमरा हो गया।

तीन दिन से खाली था पेट। स्टेशन पर, बस अड्डे, घर-घर जा कर.....लोग तो भीख भी नहीं देते आज कल। लंगडा, लूल्हा, अंधा, कोढी हर मुद्रा आजमा आया था। धत्! किसमत ही साली......उसने सडक पर पडे पत्थर को भरपूर लात मारी। हवा उसे डरा रही थी और पेट भीतर ही भीतर उमेठा जा रहा था। वह खामोश था, सोच शून्य। निगाहें हर ओर कि कहीं कुछ मिल जाये, जूठा पत्तल ही सही। धूप तेज थी, सिर चकराने लगा। वह पेड के नीचे आ खडा हुआ। फिर दूर दीख पडते हैंडपंप से जैसे उसमे रक्त फिर चल पडा हो। वह तेजी से हेंड पंप की ओर लपका। हैंडल दबाई, उठाई...ओं..आँ...खटर..पटर...और गट गट गट....जितना पी सकता था, पी गया। थोडा सुकून मिला उसे।

”कल भी कुछ न मिला तो मर जायेगा वह” उसने सोचा। उसे कुछ न कुछ तो करना ही था। फिर अंधा, लंगडा, लूल्हा बन कर स्टेशन हो आये या फिर भीड भाड वाली सडक....उहूं, उसे बहुत जोर की भूख लगी थी और क्या पता कल भी किसमत खराब हुई तो? “चोरी???” एक दम से विचार कौंधा, फिर हाल ही में हुई पिटाई का दर्द महसूस होने लगा उसे, जिसे भूख नें जैसे भुला ही दिया था। नहीं नहीं चोरी नहीं...घबरा कर अपना विचार बदल देना चाहा उसने। लेकिन भूख!!!!....।

सामने ही कोई सरकारी कार्यालय था। शाम लगभग ढल चुकी थी इस लिये सुनसान भी। एक बूढा सा चौकीदार गेट के पास स्टूल लगाये तम्बाकू मल रहा था। उसने बहुत ही नीरस निगाह इस इमारत पर डाली। निगाहें इससे पूर्व कि सिमटतीं, इमारत पर ही ठहर गयीं, एक चमक थी अब उनमें। थोडी देर में रात हो जायेगी। चौकीदार कौन सा जाग कर रात भर ड्युटी देगा। उसने देखा घिरी हुई दीवार ज्यादा उँची न थी।.....।रात हुई। घुप्प संन्नाटे में झिंगुर चीख रहे थे। वह दीवार फाँद कर भीतर प्रविष्ठ हुआ। बहुत सधे पाँव। खिडकी से हो कर बडी ही सावधानी से लडकते हुए कुछ लाल-पीले तार नोच लिये, बल्ब निकाल लिया, होल्डर खोल लिया, और भी...काली रंग की उस पोलीथीन में जो कुछ डाल सका। रामदरस दस रुपये तो देगा ही इतने के, उसने सोचा। वह उतर ही रहा था कि.....”धप्प!!!!!”। पॉलीथीन हाँथ से छूटा और फिर जोर की आवाज़...कौन?? कौन है वहाँ?? चौकीदार के जूतों की आवाज नें सन्नाटा चीर दिया था। जब तक चौकीदार आता, दीवार फाँद चुका था वह। दीवार के उस ओर बहुत हार कर बैठा वह हाँफ रहा था...“किसमत ही साली....”।

******
ऑफिस में हो हल्ला मचा हुआ था।
“अजी साहब वो तो मैंने देख लिया कहिये, वर्ना आज हम सब...” शर्मा जी गर्व से बता रहे थे।
” क्या हो गया है हमारे देश को शर्मा जी, एवरीवेयर आतंकवाद है। आपने पुलिस को फोन तो कर दिया न?” घबराये अंदाज़ में मिसेज मिश्रा बोलीं।”
मैनें बम को देखते ही कर दिया था जी, वो जी अब पुलिस तो आती ही होगी जी”। सुब्रमण्यम नें नाक का चश्मा ठीक करते हुए कहा।
“हाऊ स्वीट सुब्रमण्यम” मिस लिलि नें भरपूर मुस्कान दी और सुब्रमण्यम जी, घोडा हिनहिनाये सी हँसी हँस कर रह गये।
काले रंग की प्लास्टिक एक कोनें में देखी गयी थी, जिसमें से झाँकते कई तरह के तार उसे संदिग्घ बना रहे थे। ऑफिस में बम होनें की दहशत थी। कर्मचारी भीड बनाये सडक पर खडे थे। सारे बाज़ार में बम होने का तहलका, गर्मागर्म खबरों और अफवाहों से बाज़ार गर्म।
“आपने सुना मिर्जा साहब, क्या ज़माना आ गया है” पान लगाते हुए बनवारी बोला।”एक हमारा ज़माना था बनवारी, हमारे बाप-दादाओं का ज़माना था, अमन और सुकून की दुनियाँ थी और आज....”
“आदमी की तो कीमत ही नहीं रही। इतना खौफ फैला है कि जान तो हवा में लटकी होती है। सुबह घर से निकले तो क्या पता शाम तक घर लौट पायें भी या नहीं।“
“अजब अंधेरगर्दी है मियां। गलती हमारी गवरन्मेंट की है कि रोजगार तो देते नहीं ये लडकों को। अब लडके बंदूख न चलायें, बम न चलायें तो क्या करें?”
”वैसे मिर्जा साहब कितने बच्चे हैं आपके” बनवारी नें चुहुल से पूछा।
“खुदा के फज़ल से नौं लडकें हैं तीन लडकियाँ।“
“मिर्जा साहब, छ: घरों की संतान अकेले अपने घर में पालोगे तो क्या करेगी गवर्नमेंट”
”अमां बनवारी तुम मज़ाक न किया करो हमसे, अच्छा लाओ, एक पान और बनाओ। वैसे पता कैसे लगा कि बम रखा है” मिर्जा साहब बिगड गये।
”वो किरानी हैं शर्मा जी। इमानदार इतने कि भले कोई काम न करें आधा घंटे पहले ऑफिस आ जाते हैं। उन्होंने ही देखा।“
”क्या कहें बनवारी लगता है पतन होता जा रहा है दुनियाँ का। जहाँ देखो वही लूटमार, छीना झपटी, बम धमाके। अमां दहशत का आलम ये है कि हमने सुना था कि एक केला और दो सेव थैले में रख कर, बम और पिस्तौल बता कर हवाई जहाज का अपहरण कर लिया था किसी नें”। मिर्जा साहब नें गहरी स्वांस छोडते हुए कहा।
सायरन की आती हुई आवाज़ ने माहौल को और गंभीर बना दिया।
”लीजिये पुलिस आ गयी लगता है” बनवारी नें पान मिर्जा साहब को थमाते हुए कहा।पुलिस की दसियों गाडियाँ आ कर रुकीं। धडाधड पुलिस वाले उतरने लगे। बम को निष्कृय करने के लिये एक पूरा दस्ता आया हुआ था। चारों ओर मोर्चा बँधा। अंतरिक्ष यात्रियों जैसी पोशाकें पहने दो लोग धीरे धीरे बढने लगे पॉलीथीन में लिपटे उस बम की ओर।...। माहौल जिज्ञासु, शांत। चारों ओर से आँखें पुलिस कार्यवाही की ओर।...। निकलता क्या? तार के लाल पीले टुकडे, होल्डर और वही सब कुछ जो पिछली रात...।
“शर्मा जी पूरे अंधे हैं आप, बेकार में....” मिसेज मिश्रा नें नाराजगी जाहिर की।
”और आप सुब्रमण्यम जी, कौवा कान ले कर जा रहा है सुना तो कौवे के पीछे भागने लगे। देख तो लेते आपके कान सलामत हैं या नहीं” मिस लिली बोलीं।
“बनवारी ये नौबत है देश की” एक दीर्ध नि:स्वांस भरी मिर्जा जी नें और जाने लगे।..।


*** राजीव रंजन प्रसाद
25.08.1993

Friday, May 09, 2008

क्या उपहार दूँ तुम्हें...


सोचता रहा क्या उपहार दूं तुम्हें
तुमने मुझे इतना कुछ दिया है
जिंदगी दी है
और शाम का गुलाबी आसमान
सूरज चाँद, धूप और चाँदनी
नदी और पंछी, गुंजन और हवा
अंबर की फुनगी के उपर का सपना
सागर के तल के भी भीतर सब अपना
तुम जा कर जीवन से अब रात भी देते हो
गिरती हुई दामिनी और बरसात भी देते हो

मैनें जो बंद सीप में धडकन निकाल कर
तुमको दिया था प्राण! लौटा रहे हो तुम
मैं सुर्ख उस गुलाब के काँटों को देख कर
अब सोचता हूँ दर्द जो तुमने दिया उसे
सीने में चुभा कर हो जानें दूं लहू
फिर वक्त के केनवास पर
अपनी लाल तस्वीर बना कर
सुर्ख गुलाब की एक माला डाल दूं उस पर...

*** राजीव रंजन प्रसाद
२७.०३.१९९८

Thursday, May 08, 2008

या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी, अधरा न धरौंगी..


कोमल श्वेत हाँथ पग मेरे, मैं सिमटी उस उदर अंधेरे
अभिमन्यु को चक्रव्यूह था, मुझको तू तू तेरे मेरे
माँ तूने तस्वीर निकाली, फिर की तय, टूटेगी डाली
मुझे लहू करने को बेबस दिल पत्थर कर गोली खा ली

जा दूध में बतासा, हो भैया, करे तमासा, आह दिलासा
मैं होती बिटिया, गाली थी, ना हो बेचैन, मरौंगी
या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी अधरा न धरौंगी

मैं बढती थी तो गडती थी, अफसोस रहा मैं मरी नहीं
भाई की आया, करमजली, मैं तितली या जलपरी नहीं
घर दरवाजों पर साँकल थे, पैरों की बेडी पायल थे
मैं तनहा थी, कमजोर नहीं, मैं बेबस थी पर डरी नहीं

भैया की पुस्तक पढती थी, था एकलव्य बन कर जीना
फिर धोना बुनना सीना मैं, वर कर दर से जो टरौंगी
या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी अधरा न धरौंगी

पी पी करे पपीहा रोये, बिना कार पी चढे न घोडी
रात पिया पी घर आये, मोडा मुख फिर बहिंया मोडी
हिय मिलते जब, ससुर भरे घर, या धर नयना अंबर
तनहा ताने सुनती कहती, माँ यह कैसी किसमत मोरी

जीवन परबत, अंगना कारा, जलता सूरज, चुभता तारा
टूटी खटिया, हाँथ, दाँत रे, दरपन क्या सिंगार करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी अधरा न धरौंगी

नारी नारी चीख चीख कर संसद में बंदर नें बाँटा
इसकी सीटें, उसकी सीटें, मेरा तराजू उसका काँटा
एक विधेयक, सदियों लटके, चौराहे पर रोता पाया
नारी के हक की बातों को, नारी के जायों ने खाया

अंबर सुन लो फँट जाओगे, अगर गिरेबाँ पकडा मैने
यह इलाज कडुवा है जो, मैं ठान निबौरी, अगर फरौंगी
या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी अधरा न धरौंगी।

*** राजीव रंजन प्रसाद
7.04.2008

Wednesday, May 07, 2008

तुमसे मोहब्बत होगी....


और भी लोग है
जिन्हे तुमसे मोहब्बत होगी
और भी दिल है,
जिन्हे तेरा दर्द भाता है
और भी आह
तेरे ज़ख्म से उभरती है
और भी टीस तुझे देख कर उतरती है...

मै फिर भी ईस बियाबां मे
पत्थर तराशता फिरता हूं
मुझे, सिर्फ मुझे ही आस्था है तुम पर..

कि मन्दिर बना कर ही दम लूंगा
जिसमे तुम्हारा एक बुत रख
प्राण-प्रतिष्ठा कर दूंगा उसमें..
बोलो क्या तब तुम
सारी दुनिया से सिमट कर
एक पत्थर की मूरत नहीं हो जाओगी?

*** राजीव रंजन प्रसाद
२९.०५.१९९७

Tuesday, May 06, 2008

तुम्हारा खत पढा...


तुम्हारा खत पढा
फिर पढा
कितने ही टुकडे चाक कलेजे के
मुँह को आ पडे
थामा ज़िगर को
और बिलकुल बन चुका मोती भी चूने न दिया
फिर पढा तुमहारा खत
और शनैः-शनैः होम होता रहा स्वयमेव
एक एक शब्द होते रहे गुंजायित
व्योम में प्रतिध्वनि स्वाहा!
नेह स्वाहा!
भावुकता स्वाहा!
तुम स्वाहा!
मैं स्वाहा!
और हमारे बीच जो कुछ भी था....स्वाहा!

आँखों को धुवाँ छील गया
गालों पर एक लम्बी लकीर खिंच पडी
जाने भीतर के वे कौन से तंतु
आर्तनाद कर उठे..शांतिः शांतिः शांतिः
अपनी ही हथेली पर सर रख कर
पलकें मूंद ली
ठहरे हुए पानी पर हल्की सी आहट नें
भवरें बो दीं
झिलमिलाता रहा पानी
सिमट कर तुम्हारा चेहरा हो गया
लगा चीख कर उठूं और एक एक खत
चीर चीर कर इतने इतने टुकडे कर दूं
जितनें इस दिल के हैं.....

हिम्मत क्यों नहीं होती मुझमे??

***राजीव रंजन प्रसाद
२३.०४.१९९५

Monday, May 05, 2008

अस्तित्व..


कितनी शरारती आँखें बना कर
तुमनें पूछा था मुझसे
कितना प्यार करते हो मुझसे?
और अपनी बाहें पूरी फैला कर
तुमने पूछा था क्या इतना?
और मैं मुस्कुरा भर गया था
कि तुम्हारी फैली बाहों के भीतर
सारा आकाश सिमट सकता था
सारी की सारी सृष्टि
सभी कुछ..
मैं भी और मेरा हृदय भी
मेरी तपन भी और मेरा स्नेह भी
और तुम भी
जो मेरे ही भीतर मेरा ही अस्तित्व हो..

*** राजीव रंजन प्रसाद
६.१२.१९९६

Friday, May 02, 2008

बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..


बरसाती नदी हो गये गीत मेरे
कहीं खो गये अर्थ हैं मीत मेरे..

बहुत सोचता हूँ कि लय ही में लिक्खूं
तय हैं जो मीटर तो तय ही में लिक्खूं
हरेक शब्द नापूं , हरेक भाव तोलूं
कठिन लिक्खूं भाषा, मैं विद्वान हो लूं

मगर माफ करना यही लिख सकूंगा
बहुत बेसुरे से हैं, संगीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..

माँ शारदा से, लडा भी बहुत मैं
ये क्या लिख रहा हूँ अडा भी बहुत मैं
मुझे भी तो जुल्फों में बादल दिखा है
मेरे भी तो खाबों में संदल दिखा है

तो ये दर्द क्यों, क्यों मुझे आह लिखना
तेरे आँख के अश्क क्यों रीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..

मेरा शब्द बन कर मचलती हैं चीखें
तेरी ही घुटन है तू देखे न दीखें
कलम एक चिनगी, कलम जिम्मेदारी
कलम शंख है, फूंकता मैं पुजारी
मेरे शब्द गर तुझमें उम्मीद भर दें
तू फिर उठ खडा हो तो है जीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..

मैं लिक्खूं मजूरा, मैं हल्ला ही बोलूं
न सहमत हुआ तो मैं झल्ला ही बोलूं
मैं अपशब्द लिक्खूं, मेरे शब्द पत्थर
मेरे शब्द में नीम, आँगन का गोबर
मेरे शब्द रौशन, अगर है अंधेरा
निराशा में ये शब्द उम्मीद मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..

कहीं एक रोडा, कोई ईंट जोडा
सच है री कविता कहीं का न छोडा
मेरी लेखनी में नहीं बात कोई
मगर साफ कहता हूँ है साफगोई

कहीं से शुरू फिर कहीं बेतुके
बहुत सिरचढे शब्द मनमीत मेरे
बरसाती नदी हो गये गीत मेरे..

*** राजीव रंजन प्रसाद
15.04.2007

Thursday, May 01, 2008

कारण क्या था?


नारज़गी हद से बढी
और हो गयी पर्बत
आँखों से पिघल गया ग्लेशियर
जैसे मोम नदी हो जाता है
पत्थर की तरह पिघल पिघल कर..

पीठ से पीठ किये
युगों तक खमोश दो बुत
इस तरह बैठै रहे
तोड तोड कर चबाते हुए घास के तिनके
जैसे गरमी की दोपहर ढलती नहीं..

और जब नदी न रही
पिघल चुका पत्थर
बुत "मै" और "तुम" हो गये
बहुत सोच कर भी
याद न रहा, न रहा
कि मुह फुलाये ठहर गये कितने ही पल

...कारण क्या था?

*** राजीव रंजन प्रसाद
२३.११.१९९५

Wednesday, April 30, 2008

एक संवाद सूरज से..


कई भोर बीते, सुबह न आई
तो सूरज से पूछा
हुआ क्या है भाई?
पिघलती हुई एक गज़ल बन गये हो
ये पीली उदासी है या चाँदनी है
वो अहसास गुम क्यों
वो गर्मी कहाँ है?
अगर रोशनी है,कहाँ है छुपाई?
कई भोर बीते, सुबह न आई..

तो सूरज ने मुझको
हिकारत से देखा
आँखें दबा कर
शरारत से देखा
कहा अपने जाले से
निकला है कोई
तुम्हारे ही भीतर
तुम्हारी है दुनिया
तुम्हीं पलकें मूंदे अंधेरा किये हो
तुम्हें देती किसकी हैं बातें सुनाई
कई भोर बीते, सुबह न आई..

तुमसे है रोशन
अगर सारी दुनिया
तो मेरी ही दुनिया में
कैसा अंधेरा?
ये कैसा बहाना
कि इलजाम मुझपर
ये कैसी कहानी
कि बेनाम हो कर
मुझे ही मेरा दोष
बतला रहे हो?
मुझे दो उजाला तुम्हे है दुहाई
कई भोर बीते, सुबह न आई..

ये उजले सवरे उन्हें ही मिलेंगे
जो आंखों को मन की खोला करेंगे
यादों की पट्टी पलक से हटाओ
कसक के सभी द्वार खोलो
खुली स्वास लो तुम
अपने ही में गुम
न रह कर उठो तुम
तो देखो हरएक फूल में
वो है तुमनें
पलक मूंद कर जिसको
मोती बनाया
नई मंज़िलों को तलाशो तो भाई
कई भोर बीते, सुबह न आई..

*** राजीव रंजन प्रसाद
२.०१.२००७

Tuesday, April 29, 2008

राधिका गवांर हो गयी...


बाँसुरी गिटार हो गयी
राधिका गँवार हो गयी..

पीने का पानी काला है
कालिन्दी गंदा नाला है
कंकरीट के जंगल में
पीपल की छैंया रोती है
कल यह मुन्नी पूछ रही थी
तितली कैसी होती है
खेतीहर फैक्ट्री चले
रोजी अब पगार हो गयी
राधिका गँवार हो गयी...
बीमारियों में घर साफ हो गये
ओझा “झोला-छाप” हो गये
पग्गड लंगोट हो गयी है
बकरियाँ “गोट” हो गयी हैं
चौपाल पर कबूतर हैं
शराब जब वोट हो गयी है
अंगूठे हस्ताक्षर हो गये
आमदनी उधार हो गयी
राधिका गँवार हो गयी...

*** राजीव रंजन प्रसाद
9.03.2007

Monday, April 28, 2008

देखता रहा करता था तुम्हें...


तुम्हारी बोलती हुई आँखें
तुम्हारे सिले होठों से
बगावत कर जाया करती थीं
शाम शरारत से मुस्कुराती थी
और हवा गुदगुदा जाती थी कि "मना लो अब"
और मैं हलकी सी मुस्कान लिये
बस देखता रहा करता था तुम्हें
जब तलक गुस्से से मुठ्ठियाँ भींचे
टूट न पडती थीं तुम मुझ पर...

राजीव रंजन प्रसाद
२३.११.९५

Sunday, April 27, 2008

कहानी - ढीली गाँठ (बस्तर के आदिवासी महिलाओं के शोषण की एक दास्तां....)


फूल फूल गये थे। जंगल के जंगली फूल। बोदी के जूडे में जैसे तैसे उलझे और उसकी चाल से फुदकते थे फूल। वसंत आ गया है। बोदी भी गदरा गयी है। फूलों के बोझ से झुकी डाल सा उसका यौवन..। सुकारू सच कहता है, महुवा का रस है बोदी।


“बोदी” सुकारू नें आवाज़ दी।
”काय आय?” (क्या है?)
”कहाँ जासीत?” (कहाँ जा रही हो?)
”मोहा बिनुक” (महुवा बीनने)
”मैं बले आयेंदे” (मैं भी आता हूँ)। सुकारू नें आँखों में शरारत भर कर कहा।
”तुम एउन काय करू आस?” (तुम आ कर क्या करोगे?)
”मैं बल तुचो संग गोठियाते गोठियाते मोहा बीनेंदे” (मैं भी तुम्हारे साथ बातें करते हुए महुवा बीनूंगा)
”हत बईहा नहीं तो” (हट पागल)


बोदी शरमाती, मुस्काती, इठलाती पगडंडियों के संग हो ली। बार बार पीछे मुडती कि कहीं सुकारू देख तो नहीं रहा। उसे अपनी ओर देखता पा खुद में सिमट जाती।
ज़िंदगी यहीं तो है। हवाओं की तरह निश्चिंत, फज़ाओं की तरह विस्तृत...और बोदी की तरह चंचल। असभ्यता का आँचल ओढा बस्तर अंचल कितना सभ्य है यह बताता है इस मिट्टी का आदम और उसकी अपार सादगी। प्रकृति नें इनके लिये कोई कसर नहीं छोडी। कोदो, कुटकी, कोसरा, हिरवाँ सब कुछ तो है, उसपर सुहागा यह कि इनके तीरों का जवाब न किसी परिंदे के पास है, न किसी चौपाये के पास।....। इसको बाहर की दुनियाँ से इस लिये लगाव है कि वह भीतर की परिधि में आश्चर्यजनक मनोरंजन भर सकें। उनके गाँवों के आसपास कुछ नगर उँग आये हैं जो उनके पहाडों को फोड कर लोहा, टिन और कोरंडम निकाल रहे हैं। खैर, उन्हें क्या? रमता जोगी बहता पानी। यह बाहर की चकाचौँध है जो इन्हें अपनी ओर खींचती है। रुपयों से नया परिचय है उनका। बाजार में चमकते नये सपने उनकी आँखों में बुनने लगे हैं। खदानों नें इन्हें आकर्षित भी किया है। इतने सस्ते और मेहनती मजदूर मिलते भी कहाँ? रुपया इनके लिये सेतु बना है जुडने का, असभ्य-बर्बर उस सभ्यता से जो उन्ही के घर, उन्ही के जंगलों, उन्ही के पहाडों को तरक्की के झांसे में झोंक रहे हैं वह भी उनके अपने ही हाँथो। हाँ, इसके एवज में उन्हे हासिल हैं कुछ रुपये। ये रुपया इन्हें क्यों चाहिये?.. बुदरू को इस लिये चाहिये कि वह रेडियो खरीदेगा, सोमारू सायकल। सुकारू को तो बोदी के लिये जाने क्या क्या खरीदना है...भूख इनकी समस्या नहीं है।

सुकारू बचेली जा रहा है। लोहे का पहाड खोदने वालों का बसाया नगर है यह। वहाँ उसे पत्थर तोडने का काम मिला है। बहुत खुश है, कि खरीदेगा रंग रंग की चूडियाँ, झुमके और हार..कितनी खुश हो जायेगी बोदी और.....और आगे उसके अपने ही सुनहले सपने हैं। बोदी से बिहाव के सपने। पगडंडियों में धीरे धीरे चलता वह, जाने किस दुनियाँ में था। कुहू..कुहू...कोयल चहकी और जैसे मंत्र मुग्ध सा सुकारू, चैतन्य हुआ। जंगल के बीच से पक्की सडक जाती थी। वह सडक पर चलने लगा। उसके नंगे पाँव जलने तो लगे थे, किंतु चल वह एसे रहा था मानों तपिश का अहसास नहीं। ठेकेदार नें दूर से उसे आते देखा। और भी मज़दूर वहाँ थे। सुकारू भी अब मज़दूर हो जायेगा।
“इधर आ बे” मुंशी का रूखा स्वर था यह।
सुकारू सिमटता पास चला आया।
“नाम क्या है तेरा”
”सुकारू”
मुंशी नें और कुछ नहीं पूछा। सुकारू अपने साथियों के पास जा कर खडा हो गया। उसने काम समझा, फिर उसके हाँथों में हथौडा आ गया। ठक...ठक...धडाक..उसके हाँथ पत्थरों पर कस कर प्रहार करने लगे। चट्टानों को पत्थर और पत्थरों को निश्चित आकार की गिट्टी करना उसका काम था। टुकडे टुकटे इन गिट्टियों को रेजाए बीनतीं, तगाड़ी में बटोर कर एक जगह ढेर करती जाती। उसमें जोश अधिक था, पत्थरों पर किये जा रहे अपने हर प्रहार में जैसे जान झोंक दी थी। सुकारू को परवाह श्रम की नहीं थी, उसे तो अपने सपनों की परवाह है। पसीने पसीने हो गया वह, थकने भी लगा है। थक कर बैठता नहीं। वह देख रहा है कि उसके साथी जैसे अपने अपने सपनों के लिये जुटे हैं। वह फिर चलाता है हथौडा और धडाक...पत्थर उसकी हिम्मत सा बिखर जाता है। आज उसका पहला दिन है।

“एक बज गये हैं” मुंशी नें चिल्ला कर कहा “अभी छुट्टी, सब डेढ बजे आना”। सुकारू की जान में जान आयी। हथौडा पत्थरों के ढेर में ही पटक, वह वहीं पसर गया। भूख उसे लग आयी थी। क्या खाता? दूसरे साथी तो कुछ न कुछ पोटली में बाँध लाये थे किंतु सुकारू...


“सुकारू...” किसी नें पीछे से आवाज़ दी। सुकारू मुडा।
”मैं मँगती” रेजा नें अपना परिचय दिया। सुकारू नें नि:शब्द प्रश्न सूचक आँखें मंगती पर डाली।
”खाना नहीं लाया?”
सुकारू का मौन जैसे उत्तर था।
”आ साथ में खायेंगे”।
प्रतिवाद करने का साहस सुकारू में न था।

डेढ बजने में कुछ समय रहा होगा। मुंशी की मोटर सायकल साईट पर आ कर रुकी। मजदूर आराम कर रहे थे। मुंशी वहीं से चिल्लाया “ सालों, हराम की रोटी तोडते हो..डेढ बज गये..”
सुकारू हराम की रोटी का मतलब नहीं समझता। शायद उसके वे साथी समझते थे जिन्होने मुंशी की इस बात पर एसा मुँह बनाया जैसे कच्ची इमली बिना नोन, खा ली हो। उसने तो औरों की तरह हथौडा उठाया और झोंक दिया खुद को। साढे पाँच बजे पसीना पोंछते हुए सुकारू नें हथौडा मुंशी के सामने पटका और वहीं खडा हो गया। मुंशी हिसाब कर रहा था। उसने नाम पुकारा “सुकारू”। सुकारू यंत्रवत पास आया। मुंशी नें जाने क्या जोडा, क्या घटाया। सुकारू के हाँथ में उसने आठ रुपये दिये और.....
अब सुकारू के हाँथ में उसके सपने थे। उसके पैरों में पंख। वह बाज़ार की ओर जैसे दौड पडा। चम चम करता बाज़ार और उसकी मुट्टी में बंद आठ रुपयों नें उसके लहू को नदी बना दिया था। इस दुकान से उस दुकान, घंटो जैसे फुदकता रहा वह। उसने लाल लाल काँच की चूडियाँ खरीदी, आँठ आने की माला, एक कंघी और.....


**********

“ए बोदी, ए बाट देख तो” (ए बोदी, इधर देखो तो)
“काय आय” (क्या है)
”देख मैं तुचो काजे काय काय आनले से” (देख मैं तेरे लिये क्या क्या लाया हूँ)। बोदी की लाज से दोहरी हुई आँखों नें सुकारू को साहस दे दिया था। उसने बोदी का हाँथ पकड लिया। बोदी नें बहुत नाजुक सा प्रतिवाद किया, जिसमे एक गहरा समर्पण ही परिलक्षित होता था। सुकारू नें बोदी के हाँथों में चूडियाँ डाल दीं। बोदी लजा कर पीछे मुड गयी। सुकारू नें बोदी का कंधा थाम अपनी ओर खींचना चाहा। बोदी खुद में सिमटती हुई बोली “मोचो काजे जे सब काय काजे आनलीसीत तेबे?” ( मेरे लिये यह सब तुम किस लिये लाये हो?)। सुकारू कुछ क्षण तो मौन रहा, फिर घबराहट और लज्जा के भाव चेहरे पर लिये उसने हिम्मत की “तुमी मोचो संग बिहाव करसे?” ( तुम मेरे साथ शादी करोगी?”)। एकाएक जैसे बहुत से रस भरे महुवे टप-टप बरस पडे। हवा खिलखिला उठी और फूल नाचने लगे। बोदी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। तिरछी आँखों से उसने जाने क्या कहा...और सुकारू, उसे तो जैसे सारी खुशियाँ मिल गयीं। भावावेश में उसने बोदी को अपनी ओर खींचा और नौरंगी माला उसके गले में डाल दी। बोदी किसी तरह खुद को छुडा कर हिरणी हो गयी। सुकारू के सपनों को धरातल मिल गया था। उसके चेहरे पर संतोष, आँखों में चमक और दिल में अनजानी गुदगुदी हो रही थी। सुकारू का प्रफुल्लित हृदय झूमती हवा के साथ गा उठा “ तुचो माया चो मोहरी बजायेंदे कसन, तुचो पिरीत चो रागीन गायेंदे कसन”
पैसा सुकारू के लिये अब महत्वपूर्ण हो गया है। पैसा जिसने उसकी भावना को अभिव्यक्ति दी। अपने काम को ले कर वह दुगुना उत्साहित हो गया। उसका श्रम उसे पैसा देगा। पैसा खुशियों को पैदा करेगा। वह घर बनायेगा। घर में वह और वो...फिर..वह बोदी को नयी साडी खरीद कर देगा। सपने हसीनतर होते जा रहे थे और इसी उधेडबुन में सुकारू के कदम नाले से लगे तेंदु के पेड की ओर अनायास बढ गये। वह जानता था कि बोदी वहाँ होगी। बोदी वहाँ थी भी। आँचल में तेंदू बीनती जाने क्या गुनगुना रही थी, सुकारू की आहट से चुप हो गयी। चुराती हुई निगाहों से उसने सुकारू की ओर देखा, सुकारू मुस्कुरा दिया। बोदी नें मुस्कुराहट छुपा लेने की चेष्टा की किंतु उसके लाल हो चुके गालो में उसके मनोभावनाओं की अनेको तितलियों को उडते देखा जा सकता था।
”सुकारू, तेंदू खासे?” (सुकारू तेंदु खायेगा?) बोदी नें निमंत्रण दिया।
”तुय तुचो हाँथ में खवासे तो खायेंदे” (तू अपने हाँथों से खिलायेगी तो खाउंगा) सुकारू मुस्कुराया।
प्रेम जीवन की एक आवश्यक भावना है जिसकी नियति आकर्षण है और अंत समर्पण। सुकारु अब पूंजीपति है। वह बोदी के रंग बिरंगे सपनों को सच कर सकता है किंतु क्या बोदी को कुछ नही करना चाहिये। बोदी के मन में भी तो वैसी ही भावनायें थीं जो सुकारू एक हृदय में पोषित होती हैं। बोदी सुकारू को लाल रंग का सुन्दर गमछा देना चाहती है। सुकारू की बनियान में कितने छेद हो गये हैं और रंग भी भूरा.. वह झक्क सफेद बनियान खरीद कर देगी। लेकिन कैसे? बोदी नें इन्ही भावनाओं में बह कर सुकारू से कहा “सुकारू, मैं बल तुचो संग काम करुक आयेंदे” (मैं भी तुम्हारे साथ काम करने आउंगी)। सुनते ही जैसे सुकारू के मन की उडती चिडिया पास की ही डाल पर बैठ गयी।
”रेजा काम तुय करुक नी सकसे बही, हुता बडे बडे पखना मन के उठाउक पडेसे” (रेजा का काम तुम नहीं कर सकोगी। वहाँ बड़े बड़े पत्थरों को उठाना पडता है) सुकारू नें टालना चाहा। उसनें यह तो नहीं चाहा था।
”तुय बल तो पखना फोडसीत काय?” (तुम भी तो पत्थर तोडते हो?)
बोदी के स्वर में ज़िद थी।
”मोचो गोठ अलग आय” (मेरी बात अलग है)
”ये सुकारू, हम दुनों झने संगे कमाउक जावा” (ए सुकारू, हम दोनो लोग साथ में कमाने जायेंगे) बोदी नें मक्खन लगाना चाहा। सुकारू किंकर्तव्यविमूढ हो गया था। वह जानता था कि किस परिश्रम से उसने सपनों को जीवन दिया है। वह बोदी के हाँथों मे छाले नहीं देखना चाहता था। लेकिन बोदी के चेहरे के भावों में एक पक्कापन था। सुकारू जानता था कि बोदी नें इरादा कर लिया है।
“ठीक आय! तुय बलसीत उसन जाले काले संगे जावाँ। मैं तुके ठेकेदार जागा धरुन नयंदे” (ठीक है कल तुम भी वहाँ मेरे साथ ही चलना, मैं ठेकेदार से मिलवा दूंगा), सुकारू विवश हो गया। वह आग में ठंडा पानी भला कैसे डालता। बोदी खुश हो गयी और आपने हाँथों से उसे तेंदू खिलाने लगी।


**********


”तेरा नाम क्या है?” मुंशी नें बेहद मीठे स्वर में प्रश्न किया।
”बोदी” संक्षिप्त उत्तर।
मुंशी नें रजिस्टर में क्या लिखा यह बोदी नहीं जानती, हाँ मुंशी के व्यवहार से वह खुश थी। सुकारू को मुंशी का यह मीठा स्वर खटक गया। मन में हुई इस चुभन का कारण वह नहीं जानता किंतु उसका चेहरा जैसे उतर गया था। सुकारू इस तरह पलट कर अपने काम में जुट गया कि कोई उसके मन की पढ न ले। मुंशी नें बोदी के साथ बेहद सहृदयता दर्शायी थी, हल्का-फुल्का काम दिया और...और रह रह कर उसे देख अपने पीले दाँतों की प्रदर्शनी लगाता रहा था। और सुकारू गुस्से को पीने की कोशिश करता हथौडा हर बार पत्थर पर पूरी तकत से मारता और.. धडाक।
बोदी। उसपर मुंशी की मेहरबानियाँ बढती गयी। मुंशी अब दिन भर साईट पर बैठा रहता और बोदी को अटपटे इशारे किया करता। ये इशारे सुकारू को समझ में तो न आते किंतु बोदी के मनोभाव वह जरूर पढ सकता था। शोषण शब्द से उसका परिचय तो नहीं था किंतु उसकी भावनाओं के इस शोषण नें उसके मन-वदन में आग लगा दी थी। सुकारू की विवशता यह थी कि अपना गुस्सा वह केवल उन बेजान पत्थरों पर ही निकाल पाता, टूट जाना ही जिनकी नियति है। टूटने लगा था सुकारू भी। क्या कहता वह बोदी को? कैसे समझाता। उसके प्रति बोदी का व्यवहार नहीं बदला था। अब भी बोदी तेंदू बीनती तो सुकारू के साथ ही बाँटती। जूडे में फूल सुकारू से ही लगवाती। कल सुकारू के लिये लाल चींटे की चटनी बनांने की जिद में वह सारी शाम जुटी रही और जाने क्या सोचती काम करती रही थी कि चींटियों नें पिसने से पहले बोदी के हाँथों को जगह जगह लाल कर दिया था। सुकारू के लिये उसने जो बनियान खरीदा था वह सुकारू नें खजाने की तरह सहेज रखा था कि केवल तिहार में ही पहनेगा और....उसे पहना-पहना कर देखने की जिद में दोनों का घंटो अनबोला रहता। सब कुछ तो ठीक है दोनों के बीच फिर सुकारू को एसा क्यों लगता है? सुकारू खुद नहीं जानता। उसे शक है....बोदी पर नहीं।
एक बज गया था, बोदी नें तुम्बे से पेज, दो दोनों में निकाला, एक सुकारू के हाँथ में दिया और दूसरा दोना खुद उठा कर गट गट पी गयी। अब तक सुकारू भी पी चुका था। बोदी नें दोनो दोनों को फिर भरा...तभी मोटरसायकल की आवाज़ सुन कर बोदी पलटी। यह मुंशी था। बोदी मुस्कुरा दी। सुकारू के अंदर एक गहरी टीस उठी, किंतु वह खामोश रहा। मुंशी नें इशारे से बोदी को बुलाया और वह इतराती पास चली आयी। मुंशी के लिये आँखों में नफरत भर कर सुकारू सिर्फ इतना ही देख सका कि बोदी मुंशी के साथ...क्रोध में भर कर सुकारू नें तूम्बे को उठा कर पटक दिया। लाल आँखों को, जाती मोटरसायकल की धूल तिलमिलाने लगी थी।...। शाम को बोदी बहुत खुश थी। मोटरसायकल की सैर उसके लिये अनूठा अनुभव था। वह रह रह कर सुकारू को मोटरसायकल, उसकी आवाज़, उसकी रफ्तार...और भी जाने क्या क्या बताती रही। सुकारू अनमना ही बना रहा। सुकारू के साथ चलते हुए भी बोदी सुकारू के साथ नहीं थी। सुकारू जानता था कि वह मोटरसायकल तो कभी नहीं खरीद सकता लेकिन सायकल तो खरीद ही सकता है? सुकारू नें यह नया सपना अपनी फेरहिस्त में जोड लिया। ठीक भी तो है, सायकल की डंडी पर बोदी को बिठा कर जब वह घुमायेगा....उसके चेदरे में चमक उभरी तो थी किंतु फिर बोदी को देख उदासी की नयी परत नें उसे सहारा दिया। बोदी अब भी मोटरसायकिल की उसी कहानी में थी जिसका एक शब्द भी सुकारू नें नहीं सुना था। उसकी आँखों में एक नयी चमक देख कर सुकारू नें पूछना चाहा तो था कि क्या बोदी अब उसे प्यार नहीं करती। कैसे पूछता? सुकारू चुप ही रहा।


**********


मुंशी आज सुबह से गायब था..और बोदी भी। शाम हो गयी थी, फिर शाम लम्बी होने लगी। अब साईट पर भी कोई नहीं था। सुकारू बोदी को चीख चीख कर आवाज़ देने लगा। आवाज़ उन्हीं पत्थरों में टकरा कर लौट आती, जिन पत्थरों के वह टुकटे टुकडे करता रहा है। वह हाँफने लगा था।..बोदी चली तो नहीं गयी? वह निश्चिंत हो जाना चाहता था, किंतु एक अज्ञात आशंका से उसका दिल धडक रहा था। एकाएक मंगती दौडती हुई आयी और जो कुछ उसने कहा वह उसके कलेजे पर पत्थर के गिरने जैसा ही था। दौड पडा वह मंगती के साथ ही। मंगती नें ग्रेनाईट के बडे से सफेद पहाड के एक ओर इशारा किया और सुकारू की आँखें उस विंदु पर स्थिर हो गयीं। बोदी.......। बदहवास वह उस तक पहुँचा। बिखरे हुए बाल..फटे हुए वस्त्र...देख कर ही समझा जा सकता था कि कई भेडियों नें मिल कर नोचा है।..बोदी..बोदी..सुकारू नें उसे पकड कर जोर से हिलाया। बोदी की आँखें खुली ही रहीं...।
सुकारू की आँखें दहकने लगी थीं उसने झुक कर एक पत्थर उठाया और दौड पडा किसी दिशा में...एक आँधी उसके जीवन में, एक आँधी उसके मन में और एक आँधी उसके कदमों को खींचे जाती थी। ठोकर लगी और वह गिर पडा। पहाड का सीना चाह कर भी मोम न हो सका। सुकारू चीखा नहीं लेकिन एक छटपटाती हुई विवशता उसकी डूबती आँखों से झाँक रही थीं। सिर फट गया था..बुझती हुई चेतना में उसके हाँथ का वह पत्थर छूट गया जिसे अब तक कस कर पकडे हुए था सुकारू। अब शाम नें परछाईया बनानी भी बंद कर दी थी। धूल के साथ उस हवा नें सुकारू के बेतरतीब हो गये गमछे की ढीली गाँठ सुलझा दी थी। एक मुडा-तुडा नोट था जो उडा नहीं....


*** राजीव रंजन प्रसाद

7.06.1992

Saturday, April 26, 2008

अरमान आँख ही को, पत्थर थमा गये


पंछी थे डाल डाल के, जाने कहाँ गये
अरमान आँख ही को पत्थर थमा गये॥

तेरी ज़ुल्फ के अंधेरे, सागर को ढक न पाये
दो बूंद, पलक ही के, कोरों पे छलक आये
वो शाम मन में बैठी, अंगार हो गया तन
आँहों के कदम धीमें, पायल न झनक जाये

दिल रबर की चादर, तुम खींचते हो रहबर
मुझे तोड जो न पाये, अंबर बना गये।
पंछी थे डाल डाल के, जाने कहाँ गये
अरमान आँख ही को, पत्थर थमा गये॥

कोई मेरा हाल पूछे, तेरे दर का मैं पता दूं
दरवेश वो है सब कुछ, उसे किस तरह लुटा दूँ
जिसे नंगे पाँव चल कर परबत पे रख के आया
उसे मंदिरों में पूजो, मैं आत्मा घुटा दूं

सजदा है मेरी तनहा आँखों की बेबसी
अब क्या तलाश होगी, तुम हो खुदा गये।
पंछी थे डाल डाल के, जाने कहाँ गये
अरमान आँख ही को, पत्थर थमा गये॥

तुम्हें क्या पता कि मेरे भीतर ही मेरा मैं है
मेरी मौत मुझपे परदा ना डाल सकी जानम
तेरा नाम सुबहो शाम बन कर अज़ान गूँजा
आँख में गया कुछ, जो गुल पे खिली शबनम

मेरे गम में तेरा दम ना, घुट जाये मेरे हमदम
जो तुम गये तो मेरे, दोनों जहाँ गये।
पंछी थे डाल डाल के, जाने कहाँ गये
अरमान आँख ही को, पत्थर थमा गये॥

*** राजीव रंजन प्रसाद
3.10.2007

Friday, April 25, 2008

और झलक भर.....


आँसू नें कहा मुझको ठहरने दो पलक पर
आँखों को तेरी देख सकूं और झलक भर
मैं जानता हूँ तुमको कोई जख्म बडा है
फूटेगा किसी रोज तो हर एक घडा है
लेकिन तडप किताब के भीतर का फूल है
किसने सहेज कर रखा कोई भी शूल है
आसान है हर गम के पन्नों को पलट दो
फिर जीस्त पर रंगीन सा एक नया कवर दो
गुल की कलम लगाओ, तोता खरीद लाओ
तारों को फूल जैसे सारे बिखेर डालो
मुस्कान की चाभी से घर चाँद का भी खोलो
चाहो तो सूखी आँखों से मन के पास रो लो
लेकिन जो मर गये हैं, वो सपने सहेजते हो
फिर ताजमहल बन कर जीने की हसरते हैं
अपने लहू से गुल को रंगीन कर रहे हो
सुकरात जैसा प्याला पीने की हसरते हैं
तुम मुस्कुरा रहे हो, मैं हो रहा हूँ आतुर
मैं कीमती हूँ कितना, तुमको पता नहीं है
लेकिन कि ठहरता हूँ, पारस है आँख तेरी
बुझती नहीं है सागर, क्योंकर के प्यास मेरी
मैं चाहता हूँ ठहरूं, उस कोर...वहीं पर
आँखों को तेरी देख सकूं, और झलक भर.....

*** राजीव रंजन प्रसाद
11.02.2007

Thursday, April 24, 2008

संवेदना..


तुम संवेदित नहीं होते?
मेरे मन नें मुझे झकझोरना चाहा
वह बच्चा जिसे भीख न देने की मंशा से
अपनी गाडी का काँच मेंने चढा लिया था
अब भी गिडगिडा रहा था।
उसके पैर में पट्टियाँ लगी थी
लंगडा कर चलते हुए
अपने भूखे होने का ईशारा करता हुआ
ट्रैफिक पर हरी बत्ती होने तक
चुभती हुई निगाहों से, मुझे देखता ही रहा।
मैं मन के सवाल से आहत था
मेरे स्वाभिमान की नज़रें झुकी हुई थीं
और बहुत देर तक, मेरी आत्मा का अनबोला रहा मुझसे।

बाज़ार से लौटते हुए फिर वही चौक
फिर वही बच्चा...
पेड की छाँव में खडा बीडी पीता हुआ
मेरी निगाह से बेपरवाह।
आखिरी कश की राहत के बाद
उसके सधे कदम फिर मुड गये
चेहरे पर फिर छा गयी मुर्दनी
और फिर वह हाँथ फैलाये, मेरे ही सामने था।

मन बगलें झाँक रहा था
स्वाभिमान नें एक गहरी स्वांस ली
लेकिन आत्मा मेरे कंधे पर हाँथ रख सिसक उठी
बोझिल कदमों नें गाडी बढा ली..

*** राजीव रंजन प्रसाद
15.08.2007

Wednesday, April 23, 2008

हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...


मुझे शबनम के कतरे नें कहा, तुमने बुलाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

मुझे उस प्यार की सौं है, मुझे अंगार की सौं है
मेरे सीनें में जो जल कर, मुझे ही मोम करती है
मेरा सपना, मेरी हर कल्पना, हँसती है मुझ ही पर
मेरा संकल्प घायल है, उदासी व्योम करती है
कितना कुछ था करने को, न कर पाया, न हो पाया
लपट है वक्त की जिसपर, जवानी होम कर दी है

मैं आशा की किसी लौ को ही जलता देख तो पाता
तुम्हीं नें तो पलक मूंदी, हरेक दीपक बुझाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

वो बातें थीं, महज बातें, कि दुनियाँ को नया सूरज
हर इक आँख में चिडिया, वो हर इक हाँथ में कागज
क्षितिज दुनियाँ का हर कोना, जमीनों में उगा सोना
नहीं बरगद, न ही सरहद, न ये होना न वो रोना
हमारे मन के हाँथों में, लपट उँची मशालें थीं
मगर हम मेमने थे, हमपे शेरों की दुशालें थीं

गिरे जब हम धरातल पर, जमीं में हम समाते थे
न तुम थे, पर हमारे साथ सूरज था, ये साया है..
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

तुम्हीं तो थे, जिसे जज़्बों पे मेरे प्यार आता था
तुम्हीं नें तो मुझे खत लिख के जोडा एक नाता था
जमीनों आसमा की बात, जन्मों की कहानी थी
मेरे कदमों तले तुमको कोई दुनियाँ बसानी थी
मगर जब नौकरी पानें में मेरी डिगरियाँ हारीं
किसी इंजीनियर से हो गयी थी फिर तेरी यारी

सभी बातें कहानी थी, तुम्हारी बात पानी थी
किताबों में पुरानी भी लिखा, जो सच है माया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...


मुझे आ कर मिले, आदर्श नें भोजन दिया जिसको
भजन तब है, अगर रोटी तुम्हारे पेट से बोले
जहाँ टाटा को, अंबानी को, सुनने भीड लगती हो
वहाँ ये डायरी ले कर कहाँ निकले कवि भोले
कोई भी साथ आ जाये, नहीं ये दौर है एसा
तुम्हारी चुप खरीदेगा, यहाँ बोलेगा बस पैसा

वो झूठे ख्वाब थे, कैसी नशीली थी बहुत दुनियाँ
तुम्हारा साथ हो तो दो जहाँ को हमने पाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...



*** राजीव रंजन प्रसाद
4.04.2007