Wednesday, April 23, 2008

हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...


मुझे शबनम के कतरे नें कहा, तुमने बुलाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

मुझे उस प्यार की सौं है, मुझे अंगार की सौं है
मेरे सीनें में जो जल कर, मुझे ही मोम करती है
मेरा सपना, मेरी हर कल्पना, हँसती है मुझ ही पर
मेरा संकल्प घायल है, उदासी व्योम करती है
कितना कुछ था करने को, न कर पाया, न हो पाया
लपट है वक्त की जिसपर, जवानी होम कर दी है

मैं आशा की किसी लौ को ही जलता देख तो पाता
तुम्हीं नें तो पलक मूंदी, हरेक दीपक बुझाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

वो बातें थीं, महज बातें, कि दुनियाँ को नया सूरज
हर इक आँख में चिडिया, वो हर इक हाँथ में कागज
क्षितिज दुनियाँ का हर कोना, जमीनों में उगा सोना
नहीं बरगद, न ही सरहद, न ये होना न वो रोना
हमारे मन के हाँथों में, लपट उँची मशालें थीं
मगर हम मेमने थे, हमपे शेरों की दुशालें थीं

गिरे जब हम धरातल पर, जमीं में हम समाते थे
न तुम थे, पर हमारे साथ सूरज था, ये साया है..
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...

तुम्हीं तो थे, जिसे जज़्बों पे मेरे प्यार आता था
तुम्हीं नें तो मुझे खत लिख के जोडा एक नाता था
जमीनों आसमा की बात, जन्मों की कहानी थी
मेरे कदमों तले तुमको कोई दुनियाँ बसानी थी
मगर जब नौकरी पानें में मेरी डिगरियाँ हारीं
किसी इंजीनियर से हो गयी थी फिर तेरी यारी

सभी बातें कहानी थी, तुम्हारी बात पानी थी
किताबों में पुरानी भी लिखा, जो सच है माया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...


मुझे आ कर मिले, आदर्श नें भोजन दिया जिसको
भजन तब है, अगर रोटी तुम्हारे पेट से बोले
जहाँ टाटा को, अंबानी को, सुनने भीड लगती हो
वहाँ ये डायरी ले कर कहाँ निकले कवि भोले
कोई भी साथ आ जाये, नहीं ये दौर है एसा
तुम्हारी चुप खरीदेगा, यहाँ बोलेगा बस पैसा

वो झूठे ख्वाब थे, कैसी नशीली थी बहुत दुनियाँ
तुम्हारा साथ हो तो दो जहाँ को हमने पाया है
हवा का डाकिया इस वक्त, तेरी याद लाया है...



*** राजीव रंजन प्रसाद
4.04.2007

9 comments:

Bhupendra Raghav said...

वाह .. बहुत ही सुन्दर लयबद्ध प्रवाही रचना है
बहुत अच्छा लगा, आपकी अन्य कविताओं से थोड़ा हटकर लगी

रिपुदमन पचौरी said...

प्रसाद जी,

इस सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई।

लिखते रहें।

रिपुदमन पचौरी

anuradha srivastav said...

मैं आशा की किसी लौ को ही जलता देख तो पाता
तुम्हीं नें तो पलक मूंदी, हरेक दीपक बुझाया है

सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई।

rakhshanda said...

sweet poem

mamta said...

बहुत ही सुन्दर रचना।

रंजू said...

तुम्हीं तो थे, जिसे जज़्बों पे मेरे प्यार आता था
तुम्हीं नें तो मुझे खत लिख के जोडा एक नाता था
जमीनों आसमा की बात, जन्मों की कहानी थी
मेरे कदमों तले तुमको कोई दुनियाँ बसानी थी

बहुत खूब राजीव जी ..आपकी कविता के यह तेवर मुझे बहुत भाते हैं ..सुंदर कविता के लिए बधाई :)

tanha kavi said...

राजीव जी, कविता निस्संदेह बहुत अच्छी है और दर्शाती भी है कि क्यों इस क्षेत्र में आप एक बढिया मुकाम रखते हैं। लेकिन मुझे एक बात जो खटकी( वैसे कोई बड़ी बात नहीं है, पर चूँकि आपसे perfection की उम्मीद रहती है,इसलिए कह रहा हूँ) कि आप्ने पहले वाले अंतरे में

१-२-३-२-४-२ का पालन किया है...

मुझे उस प्यार की सौं है, मुझे अंगार की सौं है
मेरे सीनें में जो जल कर, मुझे ही मोम करती है
मेरा सपना, मेरी हर कल्पना, हँसती है मुझ ही पर
मेरा संकल्प घायल है, उदासी व्योम करती है
कितना कुछ था करने को, न कर पाया, न हो पाया
लपट है वक्त की जिसपर, जवानी होम कर दी है।

इसमें देखिए आपने "मोम","व्योम" और "होम" के साथ तुकबंदी की है।

लेकिन आगे के दो अंतरों में आपने १-१-२-२-३-३ का पालन किया है , जैसे कि "सूरज,कागज़", "सोना, रोना", "मशालें,दुशालें" ।

ये दो अलग पैटर्न पढने समय मेरा ध्यान भंग कर रहे थे। इसलिए सोचा कि आपको भी तंग कर दूँ। वैसे यह कोई बड़ी कमी नहीं है, लेकिन मुझे लगी ..... ;)

बाकी कविता के क्या कहनें,
नख-शिख है चमत्कृत बिन गहने।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

राकेश खंडेलवाल said...

कितना कुछ था करने को, न कर पाया, न हो पाया
लपट है वक्त की जिसपर, जवानी होम कर दी है

सुन्दर रचना है आपकी. लिखते रहें

अजय यादव said...

राजीव जी!
काफी समय बाद एक बार फिर आपके इस सुंदर गीत को पढ़ना बहुत अच्छा लगा.