Thursday, April 24, 2008

संवेदना..


तुम संवेदित नहीं होते?
मेरे मन नें मुझे झकझोरना चाहा
वह बच्चा जिसे भीख न देने की मंशा से
अपनी गाडी का काँच मेंने चढा लिया था
अब भी गिडगिडा रहा था।
उसके पैर में पट्टियाँ लगी थी
लंगडा कर चलते हुए
अपने भूखे होने का ईशारा करता हुआ
ट्रैफिक पर हरी बत्ती होने तक
चुभती हुई निगाहों से, मुझे देखता ही रहा।
मैं मन के सवाल से आहत था
मेरे स्वाभिमान की नज़रें झुकी हुई थीं
और बहुत देर तक, मेरी आत्मा का अनबोला रहा मुझसे।

बाज़ार से लौटते हुए फिर वही चौक
फिर वही बच्चा...
पेड की छाँव में खडा बीडी पीता हुआ
मेरी निगाह से बेपरवाह।
आखिरी कश की राहत के बाद
उसके सधे कदम फिर मुड गये
चेहरे पर फिर छा गयी मुर्दनी
और फिर वह हाँथ फैलाये, मेरे ही सामने था।

मन बगलें झाँक रहा था
स्वाभिमान नें एक गहरी स्वांस ली
लेकिन आत्मा मेरे कंधे पर हाँथ रख सिसक उठी
बोझिल कदमों नें गाडी बढा ली..

*** राजीव रंजन प्रसाद
15.08.2007

1 comment:

रचना सागर said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता..