Monday, May 26, 2008

बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ - साभार मोहल्ला।

संस्मरण (कडी-1)
जगदलपुर का सीरासार चौक, शाम के करीब सात बजे होंगे। अचानक एक जनसैलाब उमडा और चौंक से उस बेहद संकरी सडक में जैसे उमडता हुआ पुलिस थाने की ओर बढने लगा। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले बचने की कोशिश जरूरी थी। मैं अपने मित्र अफज़ल के घर की ओर भागा जो बिलकुल बस स्टैंड के करीब ही था। उसने मुझे बदहवास देख कर बिना कोई कारण पूछे पहले तो पानी का ग्लास थमाया। तब तक शोर तीखा हो गया था। हम बालकनी की ओर दौडे, एक जन सैलाब उमडा चला आ रहा था। और जैसे जैसे यह सैलाब नजदीक आया, हम चौंक गये। ब्रम्हदेव शर्मा?...हाँ वही हैं, और उन्हे जलील करती यह भीड कैसी है? आदिवासी लडकों का हुजूम और एक एक्टिविस्ट की एसी दुर्गति करता हुआ? यह माजरा हम देखते रहे.....भीड नें चंद कपडे ही उनके शरीर पर रहने दिये थे। गले में साईकल के टायर, जूते चप्पलों की माला और मुँह काला। बस्तर में यह नया सांस्कृतिक तत्व था। प्राय: शांत रहने वाले इस शहर में इस उफान को असाधारण घटना कहा जाना स्वाभाविक था। लेकिन असाधारण एक और बात थी और वह थी शिक्षित आदिवासी युवकों के हुजूम का इस तरह एकत्रित हो कर इस कृत्य में सम्मिलित होना। भीड इतनी अधिक थी कि पुलिस को मशक्कत करनी पडी ब्रह्मदेव शर्मा को मुक्त करा पाने में और देर शाम जब यह भीड छटी तो जगदलपुर अंतर्राष्ट्रीय खबरों में उछल गया। बी.बी.सी से उसी रात यह समाचार प्रसारित हुआ। एक नया हीरो पैदा हो चुका था....

जगदलपुर से उन दिनों मैं ग्रेजुएशन कर रहा था। उन दिनों धरमपुरा लगभग आबादी रहित ही था, और यहाँ रहने का विकल्प केवल शासकीय आदिवासी छात्रावास ही था। विकलांग होने के कारण मुझे कॉलेज प्रशासन नें इस छात्रावास में रहने की अनुमति दे दी। यह मेरे जीवन के लिये सकारात्मक और बेहद अनुभवों से भरा समय रहा। आदिवासी युवकों को पहले पहल मेरे साथ समायोजन बनाना और मेरा उनके बीच घुलना मिलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं थी। लेकिन समयपर्यंत सब सहज होता गया। मैं बॉलीबॉल और बैडमिंटन का स्वाभाविक रैफरी हो गया था और यह हमारे पानी में चीनी की तरह घुल जाने का आरंभ थी। मरकाम मेरा रूमपार्टनर था। उसके साथ हॉस्टल में मेरी पहली रात भुलाये नहीं भूलती। मैं जब सामान के साथ प्रविष्ठ हुआ तो एक अजीब सी गंध कमरे में फैली हुई थी। रात का खाना खाने हम साथ साथ हॉस्टल की मेस में गये और.....इतना चावल? इतना मोटा चावल? सब की थाली में भात का पहाड था जिसके बीच मे सब्जी का भ्रम सा।...। मैं जितना खा सका वह....मेरी हिम्मत ही थी। हॉस्टल में ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट कर रहे आदिवासी युवको का स्वाभिमान और गर्व देखते ही बनता था। उन्हें यह आभास था कि शिक्षा के इस पडाव तक पहुँच कर उनमें एक विशिष्ठता आ गयी है जो इस वन प्रांतर में हर किसी के लिये न तो सहज थी न ही स्वाभाविक। अध्ययन जमीन के प्रति नयी सोच पैदा करता है और यह मैने तब जाना जब हॉस्टल का सांस्कृतिक सचिव बनाये जाने के बाद मैने एक वाद विवाद प्रतियोगिता आयोजित करवायी। बस्तर के पिछडेपन पर शोषण और सरकारी धन के दुरुपयोग की बहुत सी कहानियाँ सुनी और बहुत सा आक्रोश मन में भरा भी। एक बडी बात जो समझ सका वह थी विकास की ललक। विकास तेंदू पत्ते से बीडी बना कर तो होता नहीं, लुट जाने वाले दाम में इमली बेच कर भी नहीं होता और पढ लिख जाने के बाद इन युवको की सोच में सरकारी कार्यालय, मिलें और खदान भी आ गयी हैं। बस्तर में इनके लिये क्या है? लोहा, टिन, कोरंडम यहाँ तक कि हीरा जैसे खनिज यहाँ हैं और कुछ सरकारी कंपनियों द्वारा दोहित होते हैं तो कुछ स्मगल होने की चर्चायें यदा कदा कान में पडती रहती थीं। कुल मिला कर यह कि रोजगार की खटपट यहाँ भी पढी लिखी पीढी में आवाज बनने लगी थी। कश्यप सर (उन्हें मैं इसी नाम से बुलाता था) आई.ए.एस की तैयारी कर रहे थे। आजकुल सुना है कि दंतेवाडा में ही कहीं पोस्टेड हैं और अधिकारी हैं। अधिक जानकारी मुझे नहीं (यदि मेरी यह पोस्ट कश्यप सर आप पढ रहे हों, तो मुझसे संपर्क की कोशिश कीजियेगा)। उनसे मेरी लम्बी चर्चायें होती रही थीं। एक लम्बी चर्चा में उन्होने जब कहा कि विकसित होने का अधिकार केवल शहरियों को ही क्यों है? क्यों लोग चाहते हैं कि हम पत्ते पहने जीवन पर्यंत रहे?

मावली भाटा लगभग बंजर इलाका है। यहाँ एक स्टील प्लांट खुलने का प्रस्ताव आया। मैनें देखा कि छात्रावास में एक खुशी की लहर थी। सभी को एसा लगने लगा कि उनके भविष्य का द्वार अब खुलने पर ही है। भिलाई का रेखाचित्र सभी के मानस पर खिंच गया था। विकास की ललक सभी की आँखों की चमक में दिखती थी और इस चमक को वही समझ सकता था जो कई दिनों की भूख के बाद पहला निवाला खा रहा हो। छात्रावास में यह उत्साह इतना अधिक था कि लगभग हर कोई कॉमन रूम में अखबार पर सुबह ही टूट पडता और स्टील प्लांट से जुडी सारी खबरों को पढ जाना चाहता।..। उस सुबह जब मैं कॉमन रूम अखबार पढने पहुँचा तो वहाँ अजीब सी खलबली थी। ब्रम्हदेव शर्मा का नाम मैने पहली बार सुना था। बस्तर के पूर्व कलेक्टर अपनी रिटायरमेंट काटने बस्तर पहुँच गये थे। स्टील प्लांट का विरोध...एक सूत्रीय कार्यक्रम। ये शर्मा जी हैं कौन? छात्रावास में बहुत सी चर्चायें थी। कुछ का कहना था कि बहुत विवादास्पद व्यक्तित्व है, खैर मैं किसी भी आरोप पर यकीन नहीं करता, आज भी नहीं। संभव था कि सपनों के टूटने की आहट से युवकों की भडास निकल रही हो।....और एक सिलसिला आरंभ हो गया। अखबार शर्मा जी की स्टेटमेंट्स से रंगने लगे। बहुत से तर्क। दो बाते बहुत सहज हैं पत्रकार हो जाना और पर्यावरणविद हो जाना। कुछ भी बन रहा हो कहीं भी बन रहा हो खडे हो जाईये और चीखिये पर्यावरण नष्ट हो जायेगा, दुनिया खतम हो जायेगी बस इस प्लांट के बनते ही। आपको हाँथो हाँथ लिया जायेगा। कोई आपसे आपकी क्वालिफिकेशन पूछने थोडे ही आ रहा है कि भईया पर्यावरण की कौन सी डिग्री ली है जो आपको भूकंप से ले कर व्न्य प्रजातियों के जीवन चक्र की एसी जानकारी है। भूगर्भशास्त्री होने के कारण शर्मा जी के आरंभ्क लेखों से मैं प्रभावित हो गया और यह मान बैठा कि इस स्टील प्लांट का बनना विकास नहीं विनाश है। दादू की दुकान पर चाय पीते हुए मेरी छात्रावासी मित्रों से लम्बी बहस हो गयी। पर्यावरण मेरे लिये भी बहस का आकर्षक विषय था और जंगल काट कर स्टील प्लांट बनाये जाने के तर्क के विरोध में मैं खडा था। कश्यप सर बहुत देर तक मेरे तर्क सुनते रहे फिर मुझे पास बुलाया और पूछा – मावली भाटा गये हो? मेरे ना में सिर हिलाते ही मुस्कुरा दिये बोले - चलो।

पत्थर और पत्थर, बंजर और वीराना। डिस्प्लेसमेंट बडा संदर्भ नहीं था, वृक्ष बडा सवाल नहीं थे....सच्चाई के सामने खडा कर कश्यप सर नें मुझसे कहा-मेरे कमर में पैंट देख रहे हो यह किसी को पचता नहीं है। हमें अजायबघर की चीज समझने वाले लोगों की साजिश है कि हम आदमी कभी बनें ही नहीं...हम नंगे हैं तो इन्हे सुकून है। क्यों हमारे बच्चों को स्कूल नसीब न हों? क्यों हमें बिजली न मिले? क्यों हम कमीज पतलून में टाई न लगा कर घूमें....क्यों हम जंगली रहें इस सदी में?.. मैं कश्यप सर की आँखों के आक्रोश को अपने भीतर गहरे महसूस कर रहा था। यहाँ स्टील प्लांट को बनना ही होगा, उनकी आँखों में अंगारे उग आये थे।

हँस्टल में हमेशा बासी अखबार ही पहुँचता था, एक दिन बाद की खबरे। उन दिनों टीवी-समाचार उतना पापुलर नहीं थे जितना कि रेडियो और समचार पत्र। ब्रम्हदेव शर्मा हाई प्रोफाईल आंदोलनकारी थे। उनकी बाते ही मीडिया को सच लगती थी और समझ में आती थी। मीडिया लोकतंत्र का पाँचवा स्तंभ है और अपने शेष चार स्तंभो की तरह प्रदूषण मुक्त नहीं। अखबारनवीसों को पता होता है कि कब, क्या और किसे छापना है। ब्रम्हदेव शर्मा की चर्चायें होने लगी, उनकी बातों को प्रमुखता प्राप्त होने से बहुत सी आवाजे दब गयी जो उनसे सहमत नहीं थीं।

छात्रावास में उस रात बैठक हुई। यह तय किया गया कि अपने अपने स्तर से ब्रम्हदेव शर्मा का विरोध किया जाये। जगदलपुर शहर में लडकों नें रैलियों के माध्यम से अपना विरोध भी दर्ज कराया किंतु उनकी सोच और दृष्टिकोण खबर नहीं बने। कुछ लडकों नें फिर भी दीपक जलाने का निर्णय लिया। उसी जबान में विरोध करने का जैसे स्वर उठें...। पारिस्थितिकी तंत्र और मावली भाटा की बायोडाईवर्सिटी पर खूब छापा जा रहा था साथ में फोटो दी जाती थी सुदूर दंडकारण्य की। बॉटनी के छात्रों नें सेंपल इकट्ठे किये, भू विज्ञान के छात्रों नें पत्थरों का सच लिखा लेकिन इनके आलेखों तस्वीरों और सच को छापने कोई अखबार तैयार नहीं हुआ। बस्तर प्रभात और दंडकारण्य जैसे छोटे और क्षेत्रीय अखबारों नें छापा भी तो कवरेज इतनी कम दी कि इनकी बात आगे आ ही न सकी। ब्रम्हदेव शर्मा के खिलाफ बस्तर के शिक्षित युवाओं में असंतोष फैलता ही जा रहा था। लेकिन भीतर का सच बाहर कोई ले कर जाता भी तो कौन और कैसे? पत्रकार आते थे और इस संदर्भ का एकतरफा बयान ले कर शर्मा जी के साथ गाडियों में जंगल घूम कर मुर्गा-शुर्गा खा कर निकल लेते। बडे अखबारों के पत्रकार भी तो हाई-प्रोफाईल होते हैं। फिर उनकी बातों में वजन भी होता है। उन्होने कहा कि मुर्गे की एक टाँग है तो फिर है जिसे दो दिखती हो अपनी आँख दिखवा ले। पत्रकार हैं भाई सच का ठेका ले रखा है। सच कोई मुफ्त में थोडे ही बनता है....

लेकिन जनसमर्थन साधारण प्रयासों से तो मिलता नहीं। यह कुनैन की तरह कडवी सच्चाई थी कि शर्मा जी के आन्दोलन (तथाकथित) को जिस तबके का सहयोग प्राप्त था वह जमीनी नहीं था। अपने कथन को जमीनी बनाने के लिये इस अभियान के कर्ताधर्ताओं नें परियोजना स्थल पर माँ दंतेशवरी की मूर्ति रख दी और धार्मिक भावनाओं को उकेर कर अपने पक्ष का मजबूत हथियार बना लिया। यह कारगर अस्त्र था। बस्तर और माँ दंतेश्वरी जैसे एक दूसरे के पूरक नाम हैं। हर एक की आत्मा और प्राण में माँ दंतेशवरी बसी है और सुजान जानते हैं कि एसी भावनाओं को क्या दिशा दी जानी चाहिये।....। यही हुआ भी।

उस दिन छात्रावास में इसी नें खाना नहीं खाया, एसा प्रतीत होता था कि कोई मर गया है। अखबार में खबर थी कि बस्तर के भीतर विरोध के कारण स्टील प्लांट का प्रस्ताव खारिज हो गया है। अब यह विशाखापटनम में लगना तय हुआ था। बस्तर के बाहर कुछ भी, कहीं भी लग जाये पर्यावरण को नुकसान नही होता है।...। कश्यप सर नें मेरे कंधे पर हाँथ रख कर कहा था – झूठ जीतते हैं। साँच में आँच लग गयी थी और बहुत से सपने झुलस कर खाक हो गये थे। लेकिन अखबारों को ये सपने कभी नहीं दीखे, सभी इस आंदोलन की सफलता की दास्तान लिखने में व्यस्त थे। जिन्हें फर्क पडता था वे अपने बुझे हुए दिल लिये नये सपनों की तलाश में लग गये।

तभी अनायास ब्रम्हदेव शर्मा कुछ युवाओं की चपेट में आ गये। फिर जो कुछ हुआ वह मैं बयाँ कर चुका हूँ। जो हुआ वह विरोध भी एक आंदोलन था। हीरो कोई भी बन कर निकला हो, दुनिया जो भी सच जानती हो लेकिन बस्तर के आदिवासी युवकों की पीडा और प्रश्न अनुत्तरित ही रहे। मैं शर्मा जी पर हुए बर्ताव का समर्थन नहीं करता न ही उन युवकों के कृत्य को सही ठहराना मेरे इस संस्मरण का मकसद है। मैं उस दर्द की कहानी को शब्द दे रहा हूँ जो परदे में रही।

आन्दोलन और आन्दोलनकर्ताओं के बहुत से सच होते हैं। अविनाश जी आपके चश्मे से ही मैं दुनिया देखूँ यह सोच गलत भी नहीं, आज की पत्रकारिता एसी ही है। आप सच कहते हैं बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ। लेकिन साधुवाद के पात्र हैं आप, कि मेरे मुख पर टेप लगाने की आपकी कोशिश में बहुत से संस्मरण जी उठे। एक एक कर भूली बिसरी दास्तां ले कर आता रहूँगा। सच पर भडास निकालिये...

***राजीव रंजन प्रसाद

7 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

राजीव जी,
आपने एक गंभीर प्रसंग को बडे ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है. राजनेताओं और कुर्सी से प्यार करने वालों का कोई दीन धर्म नहीं होता... वह परोक्ष में गरीबों के उत्थान के नारे लगा कर और असल में उन्हीं का गला काट रहे होते हैं... वोटों की राजनीति है और कुछ नहीं... जो सच्चाई जानते हैं उन्हें इसके विरुध आवाज उठानी ही चाहिये.
सारगर्भित लेख के लिये बधाई.. आशा है... आपकी आवाज दूर तलक पहुंचेगी

शोभा said...

राजीव जी
एक विशिष्ट अंचल से मिलवाने के लिए शुक्रिया। पढ़कर आनन्द आगया और उसके साथ ही बहुत गम्भीर संदेश भी दे दिया। बधाई स्वीकारें।

Suresh Chandra Gupta said...

राजीव जी, आपने जो अपनी आंखों से देखा वह कहा. दूसरों ने वह कहा जो उन्होंने दूसरों की आंखों से देखा. बहुत फर्क है दोनों में. रचा गया यथार्थ कह रहा है वास्तविक यथार्थ को चुप रहने के लिए. कहने दीजिये. आप अपनी बात कहते रहिये. उस में सच्चाई नजर आती है.

Bhupendra Raghav said...

राजीव जी,

सुदूर बस्तर और उसकी वह स्थिती जो अपने वर्णित की वास्तव में गौर करने लायक है..
दुमुहे नेता जो अपने आपको नायक सिद्ध करते घूमते हैं पर्दे के पीछे खलनायक होते है परंतु ये बात मानने वाली है कि दूरदर्शी होते है अपने स्वार्थ के लिये.. क्यूँकि अगर विकास होने दिया जायेगा तो उनका विकास रुकना लाजमी है..

बहुत ही उत्कृष्ट लेख लिखा है बहुत कुछ कहता हुआ..
उम्मीद है जन जन तक पहुचेगा और उनकी चेतना बनेगा..

Sanjeet Tripathi said...

बंधुवर,
चुप रहने के लिए कहने के बाद आप और भी मुखरित हुए इसके लिए बधाई।

बस्तर का दर्द बस्तरिहा ही सामने लाएंगे, हम रायपुर या दिल्ली वाले कोई और नही। इस बात को आप सच साबित कर रहे हैं।
शुभकामनाएं

yaksh said...

रजनीश,परसाई,महेश योगी की धरती से बस्तर की धरती को सलाम!

partialview said...

राजीव जी,
यह स्तम्भ पढ़ कर ऐसा लगा की यहाँ रायपुर में बस्तर से एक लहर सी आ गयी. बचपन से बहुत कुछ सुना है, बस्तर के बारे में. आशा करती हूँ की वहां जब आना हो, तो वहां के वासी खुश मिलें. आंदोलनों से क्या मिलता है यह नहीं कह सकती, पर सब का अधिकार मिलना सर्वप्रिय है. मैं अंग्रेजी में एक ब्लॉग लिखती हूँ और चाहूंगी की इस लेख का अंग्रेजी अनुवाद अपने दोस्तों के पढने के लिए लगाऊं. क्या ऐसा मुमकिन है?