Wednesday, January 29, 2014

अभिव्यक्ति के लिये नक्सलगढ में दुस्साहस भरी पदयात्रा


छब्बीस जनवरी का दिन जब राजपथ पर एक ओर जनजातीय क्रांति का सबसे बड़ा प्रतीक बस्तरिया नायक गुण्डाधुर उतरा हुआ था वहीं ओरछा के इस छोर पर छत्तीसगढ के अनेक पत्रकार और लेखक एकत्रित हो रहे थे। पत्रकारिता का मतलब बुद्धू बक्सा की चीख चिल्लाहट और क्रांति का अर्थ केजरीवाल वाला दृष्टिकोण इतना व्यापक हो गया है कि अखबार अपने ही पत्रकारों के दुस्साहस पर चुप्पी साधे बैठे हैं। जब पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या हुई थी तब भी एक तरह की खामोशी थी यह स्थानीय पत्रकारों का ही माओवादियों पर दबाव था जब उन्होंने जंगल के भीतर की रिपोर्टिंग बंद कर दी, जिसके फलस्वरूप नक्सली प्रवक्ताओं को घटना पर खेद जताना पड़ा। कुछ ही समय के पश्चात यही फिर दोहरा दिया गया जब दक्षिण बस्तर के पत्रकार साईं रेड्डी की बहुत ही निर्मम तरीके से हत्या की गयी। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उन क्षमा याचनाओं का क्या जो माओवादियों के जारी परचों की उद्घोषणायें थीं? छत्तीसगढ में कार्य कर रहा संगठन जिसका मुख्य प्रवक्ता गुडसा उसेंडी अपनी पत्नी के साथ बेहतर पुनर्वास की अपेक्षा में आत्मसमर्पण कर चुका हो वहाँ क्या वैचारिक तौर पर खलबली नहीं मची हुई होगी? जब आत्मसमर्पण के बाद स्वयं गुडसा उसेंडी यह बयान देता हो कि उसने जो कुछ कहा है उनमें से अधिकांश के साथ उसकी सहमति नहीं है और वह स्वयं अनावश्यक हिन्सा का विरोधी रहा है तब क्या जो कुछ बस्तर में होता रहा है उसपर बहुत गंभीरता से सोचे जाने की आवश्यकता नहीं है? और इस कारण से भी अबूझमाड में जारी पदयात्रा और अधिक प्रासंगिक नहीं हो जाती? 

ओरछा से बीजापुर तक अनेको पत्रकार और लेखक पैदल निकल चले हैं। यह यात्रा छब्बीस जनवरी से शुरु हुई है जो कि भारत के गणतंत्र हो जाने का दिवस है और तीस जनवरी को समाप्त होनी है जो अहिंसा के सबसे बडे प्रतीक महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि है। प्रतीकों के अपने मायने होते हैं और पैंसठ साल के हो चुके हमारे गणतंत्र को यह स्मरण ही नहीं कि जाने कैसे उसके मूलभूत सिद्धांतों पर धूल की परत चढती गयी है। यह पदयात्रा केवल पत्रकार साथियों की हत्या का विरोध भर नहीं है, यह संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार को कायम रखने के लिये उठाया गया जोखिम भी है। माओवाद यदि क्रांति की किसी अवधारणा के साथ कार्य करता है तो पत्रकार और लेखकों की निर्मम हत्यायें उसके दावों को झुठलाती हैं, खोखला बनाती हैं। किसी पत्रकार और लेखक की कलम वस्तुत: सच उजागर करने का कदम भर होते हैं वे लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे दृष्टिकोण के नहीं अपितु नीर-क्षीर विवेक के प्रस्तोता होते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखो तो जेलों में सडो, मुकदमों का सामना करो और नक्सलियों के विरुद्ध कलम चल गयी तो गला ही रेत दिया जायेगा। क्या इन परिस्थितियों के बीच काम करने वालों की स्थिति के विषय में हमारे अखबार चलाने वालों ने और उसके पाठकों ने ठहर कर कभी सोचा है? 

स्थानीय पत्रकार दोधारी तलवार पर चलते हैं। बेहतर तथा शीघ्रातिशीघ्र खबरें प्रस्तुत करने का दबाव रायपुर और दिल्ली से उनपर बना रहता है। वे अपना काम करें तो भी उनकी निष्पक्षताओं पर सवाल लिये खडे करने वालों की कोई कमी नहीं। इन्ही सवालों के कारण जंगल के भीतर का सच उजागर करने वाले पत्रकारों को कभी नक्सली होने का लेबल मिल जाता है तो कभी मुखबिर होने की लानत। हर किसी को कलम से ही शिकायत है और बंदूखें जंगल के भीतर और बाहर मुर्गा तोडने में व्यस्त हैं। इतना ही नहीं स्थानीय मुद्दों, इन पत्रकारों के वस्तविक हक-हुकूकों की जम कर अव्हेलना ही नहीं होती बल्कि दु:ख इस बात का भी है कि स्थानीय अखबारों और संचार माध्यमों तक ने अपने पत्रकार साथियों की दु:साहसी पदयात्रा को खबर बनाना जरूरी नहीं समझा? इन पत्रकारों को उनके अखबारों की ओर से न तो भविष्यनिधि हासिल है न ही बीमा लेकिन इतना तो हो सकता था कि इनके हौसलों को उनका हक और साहिल प्रदान किया जाता?

इस अभियान को सहमति स्वरूप वरिष्ठ लेखक गिरीश पंकज के साथ साथ अनेक पत्रकार जिनमे कमल शुक्ला, बाप्पी रे, रंजन दास, नितिन सिन्हा, लक्षमी नारायण लहरे, नील कमल वैष्णव, अशोक गभेल, लक्षमण चंद्रा आदि आदि के साथ साथ पटना से आये बिहार टुडे से दो पत्रकार भी सम्मिलित हैं। पदयात्रा में 26 जनवरी को पहला पड़ाव ओरछा से 13 किमी दूर जाटलूर में 27 जनवरी को दूसरा पड़ाव होगा, 28 को अगला पड़ाव लंका और 29 को कुटरू होगा, जहां पत्रकारों द्वारा सभा आयोजित होनी है। 30 जनवरी बीजापुर में पदयात्रा का समापन प्रस्तावित है। ओरछा से पदयात्रा के आगे बढने के पश्चात पिछले दो दिनों से इन साथियों की कोई भी खबर किसी भी स्त्रोत अथवा माध्यम से नहीं आ रही है। मैं यह मानता हूँ कि पंखों से नहीं अपितु हौसलों से उडान होती है और यही कारण है कि हमारे ये पत्रकार और लेखक साथी अपनी दुस्साहसी यात्रा अवश्य पूरी कर लेंगे तथा एक आवश्यक संदेश जंगल के भीतर छोड कर आने में सफल होंगे। संचार माध्यमों की इस महत्वपूर्ण खबर पर रहस्यमयी चुप्पी से मुझे कोई शिकायत नहीं उनके लिये दिल्ली है और दिल्ली की सरकार है खूब खबरें छापिये वहाँ की कानून व्यवस्था और वहाँ के कानून मंत्री की; बस्तर के पत्रकार अपनी अभिव्यक्ति का हक गुमनाम लडाईयों से भी हासिल करना जानते हैं। प्रतीक्षा है सथियों आपकी....।

- राजीव रंजन प्रसाद
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Tuesday, January 28, 2014

राजपथ पर गुण्डाधुर



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राजपथ पर गुण्डाधुर को देखना कोई साधारण घटना नहीं थी। भव्य गणतंत्र दिवस समारोह में महामहिम राष्ट्रपति सलामी ले रहे थे और उनके सामने से गुजर रही थी छत्तीसगढ की वह झांकी जिसमें वर्ष 1910 की बस्तर में हुई आदिवासी क्रांति – भूमकाल को प्रदर्शित किया गया था। झांकी के केन्द्र में महान आदिवासी नायक गुण्डाधुर थे जिनके एक कंधे पर तीर तथा दूसरे हाथ डालामिरी अर्थात आम की डाम और लाल मिर्च पकड़ाई गयी थी जो कि तत्कालीन क्रांति का प्रतीक चिन्ह थी। डालामिरी को तब गाँव गाँव घुमाया गया था जिसे स्वीकार करने वाले वस्तुत: उस विद्रोह में शामिल होने की समहति देते थे जो फरवरी 1910 को योजना बद्ध रूप से अचानक फैला और उसने ब्रिटिश प्रशासन को लगभग खदेड़ कर कुछ दिनों तक एक बडे क्षेत्र में मुरियाराज स्थापित करने में सफलता पायी थी। यह कहना आवश्यक हो जाता है कि गुण्डाधुर को आज भारत के ज्ञात आदिवासी नायकों के बीच जो स्थान मिलना चाहिये था वह अभी तक अप्राप्य है। 

छत्तीसगढ सरकार की झांकी ने गुण्डाधुर को राजपथ तक पहुँचा कर इस नायक को उसका वास्तविक सम्मान दिलाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मैं इस अद्भुत झांकी का पूरा श्रेय छत्तीसगढ के उन अधिकारियों को देना चाहता हूँ जिन्होंने गुण्डाधुर को इस तरह जीवंत करने का विचार किया। उन कलाकारों की भूरि भूरि प्रसंशा करना चाहता हूँ जिन्होंने अपनी संकल्पना से एक गुमनाम नायक को मूर्त रूप दिया। गुण्डाधुर और 1910 की आदिवासी क्रांति पर यह केवल झाँकी भर नहीं है बस्तर और बस्तरियों का सम्मान भी है। सुकून है कि बहुत थोडा योगदान इस झांकी की संकल्पना में मेरा भी है। मेरी दोनो पुस्तकें ‘आमचो बस्तर’ तथा ‘बस्तर के जननायक” से गुण्डाधुर के संदर्भ सम्बन्धित अधिकारियों ने प्राप्त किये साथ ही साथ पुस्तक लेखन के समय मैने जहाँ जहाँ से सम्बन्धित उद्धरण प्राप्त किये थे, अंग्रेजों के समय के गजट, रिपोर्त, पत्र आदि के संदर्भ भी मैने मुझसे संपर्क कर रहे अधिकारियों को उपलब्ध कराये थे। 

यह सही है कि गुण्डाधुर पर आज भी बहस जारी है। अंग्रेज कालीन जो भी दस्तावेज उपलब्ध हैं सभी गुण्डाधुर के होने की तस्दीक तो करते हैं किंतु वह कैसा था, वह रहस्यमय तरीके से गायब कैसे हो गया आदि आदि तथ्यों की पुष्टि नहीं हो पाती। जब कहानी का दूसरा सिरा न मिले तो तरह तरह की थ्योरियाँ जन्म लेती है जिसमे से एक के अनुसार राजपरिवार के सदस्य तथा राजा के सौतेले भाई लालकालेन्द्र सिंह भी गुण्डाधुर हो सकते हैं। जगदलपुर में आज भी खडा इमली का पेड उस याद को ताजा करता है जब गुण्डाधुर के साथी रहे डेबरीधुर और माड़िया माझी को भूमकाल (आदिवासी क्रांति) की समाप्ति पर यहाँ सरे-आम फाँसी दी गयी थी। सच तो यह है कि गुण्डाधुर आज भी बस्तर के आदिवासियों का जननायक है यह अलग बात है कि स्वयं को मुख्यधारा कहने वाली दुनियाँ इन कहानियों की अनपढ है। 

अपनी गुमनामी के सौ साल से अधिक बीत जाने के पश्चात राजपथ से गुजरने वाले गुण्डाधुर पर आज चर्चाओं को पुनर्जीवित करना अवश्यम्भावी हो जाता है। बात 1910 की है; अंग्रेजी प्रशासन निरंतर हावी होता जा रहा था जिसके दबाव में भांति भांति के वन कानून लागू किये जा रहे थे जो आदिवासी असंतोष को उकसा रहे थे। बस्तर राजपरिवार के भीतर भी फूट पडी हुई थी और उसका एक धडा भी आदिवासियों के साथ उस भूमकाल का हिस्सा बन गया जिसका उद्देश्य एसी क्रांति था जिसके द्वारा मुरियाराज की स्थापना की जाये। गुण्डाधुर को वर्ष-1910 की जनवरी में ताड़ोकी की एक जनसभा में लाल कालिन्द्र सिंह की उद्घोषणा के द्वारा सर्वमान्य नेता चुना गया (फॉरेन डिपार्टमेंट सीक्रेट, १.०८.१९११)। इसके साथ ही गुण्डाधुर ने अपने भीतर छिपी अद्भुत संगठन क्षमता का परिचय दिया और उसने सम्पूर्ण रियासत की यात्रा की। वह एक घोटुल से दूसरे घोटुल भूमकाल का संदेश प्रसारित करता घूमता रहा। डेबरीधूर उत्साही युवकों का संगठन तैयार करने में लग गया था। इतनी बड़ी योजना पर खामोशी से अमल हो रहा था। इसके पीछे गुण्डाधुर और लाल कालिन्द्रसिंह, दोनों का ही बेहतरीन नेतृत्व कार्य कर रहा था। 'आदिवासी और गैर-आदिवासी' जैसे शब्द मायनाहीन हो गये और "बाहरी" शब्द की परिभाषा ने स्पष्टाकार ले लिया। बाहरी अर्थात अंग्रेज, अंग्रेज अधिकारी, दीवान पण्डा बैजनाथ, पुलिस, डाक कर्मचारी, अध्यापक, मिशनरी। जन-जन तक उसकी अविश्वसनीय तरीके से पहुँच ने किंवदंती प्रसारित कर दी कि गुण्डाधुर को उड़ने की शक्ति प्राप्त है। गुण्डाधुर के पास पूँछ है। वह जादुई शक्तियों का स्वामी है। जब भूमकाल शुरु होगा और अंग्रेज बंदूक चलायेंगे तो गुण्डाधुर अपने मंतर से गोली को पानी बना देगा। आज यह बात आश्चर्य से भर देती है कि तब संचार के उन्नत साधन नहीं थे तब भी डालामिरी संकेत के साथ ही गुण्धाधुर ने इसतरह से भूमकाल आन्दोलन को जोडा था कि ठीक 2 फरवरी 1910 को एक साथ एक ही समय पर पूरी रियासत में विद्रोह प्रारम्भ हो गया और फिर देखते ही देखते इन्द्रावती नदी घाटी के अधिकांश हिस्सों पर दस दिनों में मुरियाराज का परचम बुलन्द हो गया। 

तिथिवार भूमकाल को इस तरह समझा जा सकता है - "२५ जनवरी को यह तय हुआ कि विद्रोह करना है और २ फरवरी १९१० को पुसपाल बाजार की लूट से विद्रोह आरंभ हो गया। इस प्रकार केवल आठ दिनों में गुण्डाधुर और उसके साथियों ने इतना बड़ा संघर्ष प्रारंभ कर के एक चमत्कार कर दिखलाया। ७ फरवरी १९१० को बस्तर के तत्कालीन राजा रुद्रप्रताप देव ने सेंट्रल प्राविंस के चीफ कमिश्नर को तार भेज करविद्रोह प्रारंभ होने और तत्काल सहायता भेजने की माँग की। (स्टैण्डन की रिपोर्ट, २९.०३.१९१०)। विद्रोह इतना प्रबल था कि उसे दबाने के लिये सेंट्रल प्रोविंस के २०० सिपाही, मद्रास प्रेसिडेंसी के १५० सिपाही, पंजाब बटालियन के १७० सिपाही भेजे गये (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, १९११)। १६ फरवरी से ३ मई १९१० तक ये टुकड़ियाँ विद्रोह के दमन में लगी रहीं। ये ७५ दिन बस्तर के विद्रोही आदिवासियों के लिये तो भारी थे ही, जन साधारण को भी दमन का शिकार होना पड़ा। अंग्रेज टुकड़ी विद्रोह दबाने के लिये आयी, उसने सबसे पहला लक्ष्य जगदलपुर को घेरे से मुक्ति दिलाना निर्धारित किया। नेतानार के आसपास के ६५ गाँवों से आये बलवाइयों के शिविर को २६ फरवरी को प्रात: ४:४५ बजे घेरा गया; ५११ आदिवासी पकड़े गये जिन्हें बेंतों की सजा दी गयी (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, १९११)। नेतानार के पास स्थित अलनार के वन में हुए २६ मार्च के संघर्ष में २१ आदिवासी मारे गये। यहाँ आदिवासियों ने अंग्रेजी टुकड़ी पर इतने तीर चलाये कि सुबह देखा तो चारो ओर तीर ही तीर नज़र आये (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, १९११)। अलनार की इस लड़ाई के दौरान ही आदिवासियों ने अपने जननायक गुण्डाधुर को युद्ध क्षेत्र से हटा दिया, जिससे वह जीवित रह सके और भविष्य में पुन: विद्रोह का संगठन कर सके। ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं कि १९१२ के आसपास फिर सांकेतिक भाषा में संघर्ष के लिये तैयार करने का प्रयास किया गया (एंवल एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट ऑफ बस्तर फ़ोर द ईयर १९१२)। उल्लेखनीय है कि १९१० के विद्रोही नेताओं में गुण्डाधुर ही न तो मारा जा सका और न अंग्रेजों की पकड़ में आया। गुण्डाधुर के बारे में अंग्रेजी फाईल इस टिप्पणी के साथ बंद हो गयी कि "कोई यह बताने में समर्थ नहीं है कि गुण्डाधुर कौन था? कुछ के अनुसार पुचल परजा और कुछ के अनुसार कालिन्द्र सिंह ही गुण्डाधुर थे (फॉरेन पॉलिटिकल सीक्रेट, १.०८.१९१०) बस्तर का यह जन नायक अपनी विलक्षण प्रतिभा के कारण इतिहास में सदैव महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता रहेगा"। 

पूरे आन्दोलन को समग्रता से देखा जाये तो नेतानार का एक साधारण धुरवा आदिवासी अद्धभुत संगठनकर्ता सिद्ध हुआ था। भूमकाल एक बहुत बडा आन्दोलन था जिसने अनेक पक्षों पर विस्तार से किसी एक लेख में बात करना संभव नहीं है। यह समझने की अवश्य कोशिश की जा सकती है कि भूमकाल का अंतत: दमन कैसे हुआ। कहते हैं कि कोण्टा से ले कर कोण्डागाँव तक लड़ी गयी हर बड़ी लड़ाई में गुण्डाधुर स्वयं उपस्थित था। यहाँ तक कि सीधी लडाई में असफल हो रहे अंग्रेजों को इस विद्रोह का दमन करने के लिये षडयंत्र का रास्ता लेना पडा जब अंग्रेज अधिकारी गेयर और दि ब्रेट के साथ सेना की एक टुकडी जगदलपुर पहुँच गयी थी तब तक आदिवासी विद्रोही संख्या और ताकत में अधिक थे। समझौते का बहाना बना कर और आदिवासियों के सामने खुद मिट्टी की सौगंध खा कर गेयर ने मनोवैज्ञानिक अस्त्र साधा था। उसने आदिम समूहों को भी मिट्टी की कसम उठाने के किये बाध्य कर दिया कि जब तक बातचीत की प्रक्रिया चलेगी, विद्रोही आक्रमण नहीं करेंगे। यह चालाकी केवल समय गुजारने भर की थी जिससे कि बहु प्रतीक्षित पंजाबी बटालियन सहित जबलपुर, विजगापट्टनम, जैपोर और नागपुर से भी २५ फरवरी 1910 तक सशस्त्र सेनायें जगदलपुर पहुँच सकें। जैसे ही अंग्रेज शक्ति सम्पन्न हुए तुरंत ही राजधानी से विद्रोहियों को खदेडने की कार्यवाही प्रारंभ कर दी गयी। अब सरकारी सेना आगे बढ़ती जा रही थी और विद्रोही जगदलपुर से खदेड़े जा रहे थे। कई विद्रोही गिरफ्तार कर लिये गये और कई बस्तर की माटी के लिये शहीद हो गये। 

२५ मार्च २०१०; उलनार भाठा के निकट सरकारी सेना का पड़ाव था। गुण्डाधुर को जानकारी दी गयी कि गेयर भी उलनार के इस कैम्प में ठहरा हुआ है। डेबरीधुर, सोनू माझी, मुस्मी हड़मा, मुण्डी कलार, धानू धाकड, बुधरू, बुटलू जैसे राज्य के कोने कोने से आये गुण्डाधुर के विश्वस्त क्रांतिकारी साथियों ने अचानक हमला करने की योजना बनायी। विद्रोहियों ने भीषण आक्रमण किया। गेयर के होश उड़ गये। एक घंटे भी सरकारी सेना विद्रोहियों के सामने नहीं टिक सकी और भाग खड़ी हुई। उलनार भाठा पर अब गुण्डाधुर के विजयी वीर अपने हथियारों को लहराते उत्सव मना रहे थे। नगाडों ने आसमान गुंजायित कर दिया। मुरियाराज की कल्पना ने फिर पंख पहन लिये थे। 

इस विजयोन्माद में सबसे प्रसन्न गुण्डाधुर का एक साथी सोनू माझी लग रहा था। कोई संदेह भी नहीं कर सकता था कि वह अंग्रेजों से मिल गया है। महीने भर बाद मिली इस बड़ी जीत से सभी विद्रोही उत्साहित थे। सोनू माझी ने स्वयं आगे बढ़ बढ़ कर शराब परोसी। सभी ने छक कर शराब और लाँदा पिया। जब निद्रा और नशा विद्रोही दल पर हावी होने लगा तब सोनू माझी दबे पाँव बाहर निकला। वह जानता था कि इस समय गेयर कहाँ हो सकता है। उलनार से लगभग तीन किलोमीटर दूर एक खुली सी जगह पर गेयर सैन्यदल को एकत्रित करने में लगा था। सोनू माझी के यह बताते ही कि विद्रोही इस समय अचेत अवस्था में हैं तथा यही उनपर आक्रमण करने का सही समय है, गेयर को अपनी कायरता दिखाने का भरपूर मौका मिल गया। गेयर ने संगठित आक्रमण किया। गोलियों की आवाज ने अचेत गुण्डाधुर में चेतना का संचार किया। वह सँभला और आवाज़ें दे-दे कर विद्रोहीदल को सचेत करने लगा। नशा हर एक पर हावी था। कुछ अर्ध-अचेत विद्रोहियों में हलचल हुई भी किंतु उनमें धनुष बाण को उठाने की ताकत शेष नहीं थी। हर बीतते पल के साथ गेयर के सैनिक कदमताल करते हुए नज़दीक आ रहे थे। कहते हैं कि इस परिस्थिति को समझ कर गुण्डाधुर ने कमर में अपनी तलवार खोंसी और भारी मन तथा कदमों से घने जंगलों की ओर बढ़ गया। वह जानता था कि उसके पकड़े जाने से यह महान भूमकाल समाप्त हो जायेगा। अभी उम्मीद तो शेष है। कोई विरोध या प्रत्याक्रमण न होने के बाद भी क्रोध से भरे गेयर ने देखते ही गोली मार देने के आदेश दिये थे। सुबह इक्क्सीस लाशें माटी में शहीद होने के गर्व के साथ पड़ी हुई थी। 

छत्तीसगढ सरकार की झांकी वास्तव में गुण्डाधुर पर नयी बहस की शुरुआत बन सकती है। राजपथ पर गुण्डाधुर का सौ साल बाद लाया जाना एक आरम्भ होना चाहिये जहाँ से हम कोशिश करें कि आदिवासी नायक को उसका वस्तविक सम्मान मिल सके जो तीस से अधिक जनजातियों का ही नहीं अपितु गैर आदिवासियों का भी सर्वमान्य नायक था। जिसके प्रभाव का दायरा एक पूरी रियासत थी जो वर्तमान के कई राज्यों से भी बडी भूमि है। गुण्डाधुर भी उसी सम्मान का हकदार है जो झारखण्ड में बिरसा मुण्डा और बिहार में तिलका माझी को हसिल है। हमारा गणतंत्र उन्हीं गुमनाम शहादतों की बुनियाद पर मजबूती से खडा है जिसमें से एक नाम गुण्डाधुर का भी है।    

- राजीव रंजन प्रसाद 
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Friday, January 17, 2014

बस्तर की जीवंत संस्कृति का हिस्सा है - श्रृंगार


सुड़ी (चूड़ी) तो ले ले नूनी (लड़की)/ तीन तीन पएँसा (पैसा) चार चार आना/ सुड़ी तो ले ले नूनी/ री रेलो रेलाय रेलाय रे रेलो रे रे लोय। मधुर गीत है और मुरिया परिवेश में चूड़ी बेचने वाले और किसी युवती के बीच का वार्तालाप है। इस गीत में जब युवती अपने पास पर्याप्त पैसे न होने की दुहाई देती है तो अंत में फेरी वाला कहता है कि विचमा (फीता) तो ले ले नूनी...और लड़की फिर भारी मन से नकारती है कि मेरे पास चूड़ी तो क्या फीता खरीदने के लिये भी पैसे नहीं हैं। इस मुरिया-कविता के मर्म में सामाजिक अवस्थिति पर बात तो है ही किंतु आदिवासी युवतियों की श्रृंगार आसक्ति पर भी समुचित चर्चा है। बस्तर का आदिवासी समाज रंग-बिरंगा है, सजा-सजीला है और जीवंत है। उसके गीतों में ही देखिये कितनी श्रृंगारिकता है और श्रृंगार पर चर्चा है – “गुगे मारे वंजीते नावा एचाड़ पोयतू नावा इचाड़ पौयतू/ ओना बोना डेरा ते परंज ओवै डेल्टा परंज ओवै डेलटा”” अर्थात “धान खेत मे तितली सूखे, मेरा जूडा हिलता है, हिलता है मेरा जूडा/ उसके घर में मधुमक्खी रहती है, मधुमक्खी रहती””। इन प्राकृतिक और स्वाभाविक बिम्बों के अर्थ तलाशने के लिये बस्तरिया आदिवासी समाज में साज-सज्जा और श्रृंगार पर चर्चा आवश्यक है। 

श्रृंगार का तरीका तथा उसके साज-सामान सभी कुछ प्रकृति और कला की अनुपम युति से तैयार होते हैं। गुदना तो शरीर का प्राथमिक श्रृंगार है ही जिसे बड़े ही चाव से आदिवासी युवतियाँ अपने गाल, छाती, कलाईयों, हथेली के पिछले हिस्से, घुटने के उपर, पैर की उंगलियों पर, पिंडलियों पर अंकित कराती हैं। गुदनारी (गुदना करने वाली स्त्री) जब पत्तों के रस में डुबों डुबो कर किसी नवयुवती के शरीर पर कहीं सर्पाकार आकृतियाँ तो कहीं मोर, फूल या फिर मछली बना रही होती है तब उसे पीड़ा से अधिक सुखानुभूति होते है। युवतियाँ गुनगुनाती भी हैं कि – “ईली ओझिल गोदालि बांहां/ इज्जत गेली मरजद गेली/ घांड़ी दे महां रे अर्थात प्रेमी का नाम अपनी बाँह पर गुदवा कर वह जगहँसाई का पात्र तो बन जायेगी किंतु प्रेमपगा यह परिहास उसे स्वीकार है। आदिवासी युवतियाँ अपनी साफ सफाई और फिर स्वयं को सजाने में पर्याप्त श्रम और कल्पनाशीलता सन्निहित करती हैं। स्नान करते समय कवेलू के टुकड़ों और गोल पत्थरों से शरीर को मल-मल कर साफ किया जाता है। शरीर और हाथ पैरों की सफाई के लिये परम्परागत रूप से मिट्टी का भी प्रयोग किया जाता रहा है, यहाँ तक कि बाल धोने के लिये भी मिट्टी ही प्रयोग में लाई जाती थी। अब साबुन जन सामान्य की पहुँच और परिचय में है अत: मिट्टी से शरीर की साफ सफाई अतीत की बात होने लगी है। अब युवतियों की पहचान लिपस्टिक से हो गयी है और मैने यह पाया कि गाढ़ा लाल रंग होठों को रंगने के लिये पहली पसंद है। आदिवासी समाज में प्राकृतिक रूप से छींद की पत्तियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं जिन्हें चबा कर युवतियाँ अपने होंठ लाल करती रही हैं। आँखों में काजल लगाना भी श्रृंगार का अनिवार्य हिस्सा है। आज मुखड़ा देखने के लिये आईने तो सर्वत्र उपलब्ध हैं अन्यथा तो नदी का निर्मल पानी ही अरण्य के अनुपम श्रृंगार का प्रथम दर्शक हुआ करता था। 

सहभागिता और सामूहिकता बस्तर के आदिवासी समाज की पहचान रही है। एक अवधारणा की तरह पर्व-उत्सवों में, घोटुलों में अथवा नृत्य के अवसरों पर एक जैसा परिधान पहने युवक-युवतियों अथवा चेलक मोटियारियों को देखा जा सकता है। युवतियों के पहनावे बहुत चटखीले रंगों के होते हैं। युवतियाँ प्राय: घुटने तक ‘पाटा’ पहनती हैं किंतु समय के साथ आये बदलाव के कारण अब वे घुटने के नीचे तक ‘लूगे’ पहने लगी हैं। एक समय आदिवासी स्त्रियाँ कमर के उपर के वस्त्रों को ले कर अधिक सजग नहीं थी एवं उपरी भाग को मालाओं आदि से ही सज्जित किया करती थीं। घोटुल के संदर्भों में यह मान्यतायें भी प्राप्त होती हैं कि स्तन तो वो लड़कियाँ ढ़कती हैं जो प्रेम करना जानती ही नहीं; किंतु अब चोलियाँ स्त्रियों के सभी प्रकार के परिधानों का स्वत: ही स्वाभाविक हिस्सा बनने लगी हैं।  

आदिवासी स्त्रियों ने केश से ले कर नाखून तक अपने श्रृंगार के लिये कुछ न कुछ नियत कर रखा है। किसी पक्षी के रंग बिरंगे पंख, किसी जानवर की खाल, किसी हिंसक पशु का नाखून, भांति भांति और रंग रंग के पत्थर, कांच, लकड़ी, बाँस, पत्ते, कौड़ी, नकली मूंगा, मोती की सस्ती मालायें, लाख से बने अलंकार आदि आदि वह सब कुछ आदिवासी युवतियों की साज सज्जा का हिस्सा है जिसे अपनी जडों से कट चुका आधुनिक समाज अकल्पनातीत समझे। आभूषण धातुओं से भी बनाये हाते हैं तथा इनमें चाँदी और पीतल का बहुतायत प्रयोग देखा जा सकता है। सोना भी चलन में हैं जो विशेष रूप से कंठ में पहने जाने वाले आभूषणों में प्रयुक्त होता है। आभूषणों के लिये अन्य प्रयोग में आने वाली धातुओं में कासा, ताम्बा, गिलट आदि प्रमुख हैं। 

बस्तर के लगभग सभी क्षेत्रों में केश-विन्यास में अनेक समानतायें देखने को मिल जाती हैं। आम तौर पर युवतियाँ अपने बालों को लम्बे लाल अथवा सफेद कपड़े में लपेट कर ढीला जूड़ा बनाती हैं। उनका यह जूड़ा दाहिने कंधे की ओर हल्का सा लटकता दिखाई पड़ता है। बाल बनाने की एक अन्य विधि यह भी है कि युवतियाँ लकड़ी का चौकोर किंतु नक्काशीदार टुकड़ा अपने बालों के बीच रख कर उसके चारो ओर लपेट कर अपना जूड़ा बना लेती है। प्राय: मांग बीच से काढी हुई होती है तथा बाल अधिकतम सिर से चिपके रहते हैं। आदिवासी स्त्रियाँ सिर में तेल बहुत अधिक डालती है तथा वे अपने बालों को खींच कर बाँधती है। पड़िया (लकड़ी की कंघी), प्लास्टिक की कंघी, लकड़ी के बने केशपिन, प्लास्टिक की क्लिप अथवा रिबन आदि का बहुतायत प्रयोग केशविन्यास में किया जाता है। सजावट के पश्चात यह संभव है कि अंतिम रूप देने के लिये किसी रंगीन पंख को, गेन्दे के फूल को, आम की पत्ती को, खजूर या ताड़ के पत्तों को ही जूड़े में खोंच दिया जाये। गैर गोंड आदिवासी समाज में केश विन्यास में आंशिक विविधता एवं बहुत हद तक आधुनिकता देखी जा सकती है। भतरा अथवा राजमुरिया आदिवासी समाज में युवतियाँ बहुत सी सजीले जूड़े बनाती हैं जिसे खोसा कहा जाता है। बालों को मनचाहा रूप देने के लिये ककई का प्रचनल रहा है जिसे कंघी का पर्याय मान सकते है। ककई वस्तुत: बाँस की सींकों और धागे के गुंथाव से बनती है। अब केशविन्यास मे भी बाजार का प्रभाव देखा जा सकता है और श्रृंगार में प्रयोग आने वाली वस्तुओं में भी शहरी चमकदमक की झलख घुलने लगी है एसे में आदिवासी समाज कब तक अपनी परम्परागत श्रृंगार की वस्तुओं अथवा केश सज्जा के विशिष्ठ तरीकों को बचा पायेगा कहा नहीं जा सकता। 

कौड़ियों का सिर की सज्जा में अपना ही स्थान है। न केवल जूड़े में कौड़ियों का प्रयोग देखा गया है अपितु माड़िया समाज का कौड़ियों के प्रति आकर्षण इतना अधिक है कि वे अपने मस्तक पर अनेक कड़ियों के रूप में इसे धारण करते हैं। यदि चेहरे की सज्जा को देखा जाये तो सभी आदिवासी जनजातियाँ कानों में बालियाँ पहनती हैं। दक्षिण बस्तर की ओर कान के उपरी हिस्से में कई-कई विभिन्न आकार की बालियाँ पहनने का चलन है जबकि निचले हिस्से में कर्णफूल अथवा खिलवाँ धारण किया जाता है। नाक की सज्जा भी विशिष्ठ होती है, जिसमे दोनो ओर फूली पहनी जाती है जो प्राय: गोल आकार की नक्काशीदार होती है तथा आम तौर पर पीतल या अन्य पीली धातु से निर्मित होती है। नथनी दोनो नाक छिद्रों के बीचोबीच नीचे की ओर धारण की जाती है। गले का श्रृंगार सभी आदिवासी समूहो में मुख्य आकर्षण का केन्द्र होता है। गले को जितनी विविधता और रंगों से भरा जाये उतना ही वह युवतियों की सौन्दर्याभिवृद्धि करता है इसे ध्यान में रखते हुए रंग बिरंगी लाल-सफेद घुंघचियों की माला, घास के बीज की माला, कौड़ियों की माला, मूंगा की माला, काँच-पत्थर और प्लास्टिक की मालायें आदि प्रमुखता से डाली जाती है जो उदर-भाग तक लटकती है। अनेक क्षेत्रों में सिक्कों से बनी “रुपया माला” बहुत चाव से पहनी जाती हैं। गले के अन्य श्रृंगारों में सूता अथवा हँसुली प्रमुख है जिसे प्राय: गिलट अथवा अन्य मिश्रित धातु से बनाया जाता है। गैर-गोंड आदिवासी समाज जैसे राज-मुरिया अथवा भतरा स्त्रियों में चापसरी पहनने का चलन है; पीतल की लगभग एक इंच चौड़ी पट्टी को चापसरी कहा जाता है। बस्तर के हलभी-भतरी क्षेत्रों में मालाओं-दानों से बनी चापसरी भी चलन में है। 

बाहों की साज सज्जा के लिये जो आभूषण हैं उनमें बाँहटा और नागमोरी अधिक चलन में हैं। कुछ समय पहले तक पत्थर के कड़े भी बाहों के श्रृंगार के रूप में दिखाई पड़ जाते थे किंतु अब उनका प्रचलन समाप्त हो गया है। युवतियाँ अधिक सुन्दर दिखने की लालसा में कभी कभी दो-दो बाहटे भी धारण करती हैं अथवा चांदी की नागमोरी पहनी जाती है। कलाईयों में गिलट, मिश्रित धातु अथवा चाँदी से बनाई गयी खाडू (कड़ा) और काँच की चूड़ियों को पहनने का चलन तो है ही। यदा-कदा कलाई में चाँदी के पटे भी पहने जाते हैं। जहाँ तक उंग्लियों का प्रश्न है उसका मुख्य श्रृंगार हैं मूंदियाँ (अंगूठियाँ)। हाथों में एक से अधिक अंगूठी पहनी जाती है यह भी ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि अंगूठी देना अथवा पहनाना न केवक प्रेमप्रदर्शन के लिये होता है अपितु कुछ आदिवासी समाजों में यह सगाई अथवा विवाह प्रथाओं की अनिवार्य शर्त भी है। श्रृंगार में कमर के हिस्से की भी अपनी उपादेयता है और इसके लिये पीतल के छोटे छोटे घुंघरू महति भूमिका अदा करते हैं। कमर में चाँदी की एक पट्टी पहहने का भी चलन रहा है। यदि पैरों की बात की जाये तो पायल उसका मुख्य आभूषण है जिसे पयँड़िया भी कहा जाता है। अपनी बजने वाली प्रवृत्ति के कारण बाजनी पयँड़ी और नहीं बजने के कारण बाकटी पयँड़ी, पहने जाने वाली पायल के दो मुख्य प्रकार है। पयँड़ी आवश्यक नहीं कि चाँदी की हो, यह किसी भी सफेद धातु की अथवा पीतल की भी हो सकती है। पैर की उंग्लियों में चुटकी (छल्ले) और झोटिया (बिछिया) पहनने का चलन है। अंगूठे के बगल वाली दोनो उँग्लियों पर चुटकी पहनी जाती है और शेष दो उंग्लियों में झोटिया पहनी जाती है। बजने वाली बिछिया को बाँजनी झोटिया कह कर सम्बोधित किया जाता है।  

केवल स्त्रियाँ ही क्यों, बस्तरिया पुरुष भी कम सजीले और छैल छबीले नहीं होते। मुख्य परिधान के रूप में इन दिनो युवक आधे बाँह की कमीज और घुटनों तक रंगीन अंगोछे या लुंगी पहनते देखे जा सकते हैं। युवकों आज भी पगड़ी पहनते हैं। भांति भांते के रंगबिरंगे पंख अपनी पगड़ी में खोंसते हैं तथा उसे यदा-कदा कौड़ियों से भी सजाते हैं। गोंड समाज में पुरुष भी अपने बालों को जूड़े का आकार देते हैं। पुरुष पीले धातु की बालियाँ कानो में पहनते हैं। गैर गोंड आदिवासी युवक अपने कानों के निचले भाग में लुड़की (कुण्डल) धारण करते हैं। गले में भी वे रंगीन मालायें पहनते हैं। युवक प्राय: अपनी ‘डगरपोल’ यानी कि माला, को घास के बीजों, मूंगों और मनकों से तैयार करते हैं यदा कदा उसमे साँप के दाँत की बनी मनखिया भी धारण करते हैं। आदिवासी युवक भी बाँहों में बाहँटा और कलाईयों में खाडू (कड़े) धारण करते हैं, इनकी उँगलियों को भी मूंदियाँ (अंगूठियाँ) सजाती हैं। 

बस्तर की जीवंत आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है श्रृंगार। समय के साथ बदलाव भी दृष्टिगोचर हो रहे हैं और शनै: शनै: कथित मुख्यधारा की पहुँच जैसे जैसे जंगल के भीतर तक हो रही है सारा कुछ परम्परागत और पुरातन नष्ट होने लगा है। एसी स्थिति में यह दायित्व अब जागरूक हो रहे आदिवासी समाज का भी है कि कैसे बदलाव और परम्परागतता के बीच सामंजस्य बिठाया जाये और अपनी ही पहचान का किस तरह संरक्षण किया जाये।

-राजीव रंजन प्रसाद
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Friday, January 10, 2014

बस्तर: कुछ समाधान विज्ञान के पास भी हैं



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[समेकित विकास की अवधारणा के लिये धारण क्षमता अध्ययन आवश्यक]
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समस्याओं की बात बहुत हो गयी है। बस्तर के संदर्भ में क्या हमारे पास समाधानों पर भी पर्याप्त विमर्श हैं? संसाधनों या कि जंगल और जमीन के लिये होने वाले संघर्षों का एक लम्बा सिलसिला होने के बाद भी बहुधा यह नहीं हुआ है कि सूखते हुए पत्तों के लिये कभी जड़ों की पड़ताल की गयी हो। यह बात इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है चूंकि हमें ज्ञात है कि यहाँ नक्सलवाद लगातार पाँव पसारती हुई समस्या है जिसके साथ साथ व्यवस्थागत खामियों के कारण आज भी यह वनांचल रोटी, कपडा और मकान जैसी बुनियादी आवश्यकातों की पूर्ति में ही लगा हुआ है। सड़क, बिजली और पानी यदि विकास के प्रतिमान हैं तो वे कभी ठेकेदारों की बंदरबाँट में तो कभी माओवादियों के हमलों-धमाकों से पिसते हुए बस्तर संभाग में मध्ययुगीन परिस्थितियाँ पैदा किये हुए हैं। सरकार के लिये भी इस क्षेत्र में कार्य करने के दृष्टिगत व्यावहारिक दिक्कते हैं। 

यह विचारणीय तथ्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात अनेकों परियोजनायें घोषित होने के बाद भी यदि उंगलियों पर गिना जाये तो केवल बैलाड़िला लौह अयस्क परियोजना ही अस्तित्व में है। भारत के अनेकों राज्यों से भी बडे भू-भाग बस्तर संभाग में कोई खनन परियोजना नहीं जबकि खनिजों की भरमार है; कोई पनबिजली अथवा सिचाई परियोजना नहीं जबकि विद्युत उत्पादन की क्षमता वाली नदी घाटियाँ यहाँ अवस्थित हैं और एक प्रतिशत भूमि ही सिचाई की सुविधा से युक्त है; कोई औद्योगिक परिक्षेत्र नहीं जब कि परती भूमि की उपलब्धता भी संभाग में अनेक स्थानों पर है। साथ ही साथ शिक्षित बेरोजगार आदिवासी-गैर आदिवासी युवक युवतियों की फौज खड़ी होती जा रही है।

यह सही है कि जल, जंगल और जमीन की लड़ाईयाँ बस्तर क्षेत्र में मुखर हैं। विकास परियोजनायें घोषित होती हैं और इसके साथ ही उनका व्यापक विरोध आरंभ हो जाता है। यह सिलसिला एक समय में बारसूर (दंतेवाड़ा) में अवस्थित बोधघाट जलविद्युत परियोजना के विरोध से आरंभ हुआ था और फिर नगरनार होता हुआ एसी परिस्थिति तक आ पहुँचा है कि संभाग में अब कोई निवेशक कार्य करने में शायद ही रुचि दिखाये। यह भी एक सत्य है कि परियोजनाओं की घोषणाओं का आधार आर्थिक अवश्य है किंतु पर्यावरणीय एवं सामाजिक अवस्थितियों पर इनकी संकल्पना के साथ साथ चर्चा नहीं होती। यह मान लिया जाये कि परियोजनायें अव्यावहारिक हैं तो भी उन कारकों पर कभी बातें नहीं होती जो उनके न निर्मित किये जाने से उत्पन्न हो सकती हैं। उदाहरण के लिये इन्द्रावती नदी बस्तर से बहती हुई जा कर आन्ध्र के गोदावरी में जलवृद्धि करती है। आन्ध्र को अपने किसानों के लिये पानी चाहिये, नहरों के जाल हैं वहाँ। ऐसा क्यों नहीं होता कि जिन वन क्षेत्रों में ‘पर्यावरण और विकास’ की बहसें सिचाई परियोजनायें नहीं बनने देती वहाँ अपने संसाधन न इस्तेमाल करने के एवज में मुआवजा मिले? हमने इन्द्रावती को बहने दिया लेकिन गोदावरी अगर रोक ली गयी तो आन्ध्र मुआवजा दे अथवा केन्द्र क्षतिपूर्ति निर्धारित करे? गोदावरी नदी की बात करें तो उसके जलागम का लगभग चालीस हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बस्तर के जंगलों से अबाध बहती सहायक नदियों के कारण है। बस्तर का हक है इस पानी पर। बस्तर ने अपनी नदियों से बिजली नहीं बनायी; अगर इन नदी-संसाधनों का उपयोग होता तो लगभग तीन हजार मेगावाट बिजली उत्पादित करने की क्षमता यहाँ की जलधाराओं में है। यह तर्क स्वीकार है कि वृहत भारत के हित में ये नदियाँ इन जंगलों से तो अबाध ही बहेंगी, लेकिन बिजली न बना पाने की क्षतिपूर्ति बस्तर को क्यों न मिले? इस दिशा में भी सोचा जाना आवश्यक है और इसके लिये हमें समेकित अध्ययन करने की आवश्यकता है। 

जब हम बस्तर जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की बात कर रहे होते हैं तो हमें यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यहाँ न केवल विशिष्ट इतिहास अपितु जटिल सांस्कृतिक स्थितियाँ भी मौजूद हैं। इसके साथ साथ खनिज भी इसी क्षेत्र में हैं, बहुमूल्य वनोत्पादों के लिये भी यही क्षेत्र पहचाने गये हैं या कि इमारती लकडियों के लिये भी इसी ओर सभी की दृष्टि टिकी होती है। यहाँ महात्मा गाँधी का वह चर्चित वाक्यांश सामने रखना आवश्यक हो जाता है कि धरती प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता तो पूरी कर सकती है किंतु उसके लालच को नहीं। इसे दृष्टिगत रखते हुए यह सोचना समझना आवश्यक है कि बस्तर संभाग क्षेत्र में विकास की क्या दिशा-दशा होनी चाहिये? यहाँ अवस्थित आदिवासी समाज को उनके ही संसाधनों के लिये क्या, कैसा और कितना हक मिलना चाहिये? किन संसाधनों का दोहन होना चाहिये और किनका बिलकुल भी नहीं। पर्यावरणविद होने के कारण मेरी दृष्टि पहले हरीतिमा पर ही जाती है और उसके बाद ही मैं किसी विकास की अवधारणा से सहमत हो पाता हूँ। इसलिये अपने समाधान पर बात करने से पूर्व थोडी चर्चा बैलाडिला की कर लेते हैं। 

मैने सुदूर संवेदन विषय में एमटेक करने के दौरान बैलाडिला लौह अयस्क खदानों की पर्यावरणीय परिस्थितियों पर अध्ययन किया था। यह बात वर्ष 1996 की है; उस दौरान के सेटेलाईट चित्रों का गंभीरता से अध्ययन करते हुए मलबा निस्तारण और लाल पानी की समस्या की ओर मेरा ध्यान विशेष रूप से गया था। सेटेलाईट चित्रों में यह स्पष्ट होता था कि वे स्त्रोत कौन से हैं जो बहते हुए पानी को निरंतर लाल कर रहे हैं। नदी-नालों की एक सामान्य वृत्ति होती है कि वे एक ओर से मिट्टी काटते हैं और दूसरी ओर अपर्दित सामग्री को जमा करते जाते हैं। चूंकि नदी नाले अपने साथ भारी लौह अयस्क का बुरादा अथवा चूर्ण निरंतर ढोते हुए आगे बढ रहे थे अत: जितना हेमेटाईट अयस्क चूर्ण अपनी रासायनिक अभिक्रियाओं से पानी को लाल रंग दे रहा था उतना ही खतरा नदी-नालों द्वारा उनके तटों पर जमा होने वाली नीली-मिट्टी से भी था। अयस्क धारिता होने के कारण मृदा की उर्वरता बहुत तेजी से नष्ट हो रही थी। परियोजना द्वारा अनेक उपाय किये गये हैं, अनेक चैकडैम आदि बनाये गये हैं जिसके कारण बहुत हद तक इस समस्या का निदान देखा गया है तथापि यदि हम सतत विकास की अवधारणा के साथ एक व्यावहारिक समाधान देखें तो जलागम क्षेत्र प्रबन्धन में इस विकराल और जटिल समस्या का समाधान सन्निहित है। परियोजना क्षेत्र और उसके दस किलोमीटर की परिधि में आने वाले सभी नाले वस्तुत: अनिवार्य उपचार मांगते हैं। इन स्त्रोंतों के उद्गम से ले कर मुख्य सरित में विलीन होने तक यदि स्थान स्थान पर अवरोध खडे किये जायें तो आरंभिक कुछ किलोमीटर में ही लालपानी को निर्मल प्राकृतिक रूप से ही किया जा सकता है। उपाय तो बहुत से हैं लेकिन केवल बोल्डर चैक डैम को उदाहरण की तरह लेते हैं। जैसे जैसे समान अंतराल पर बोल्डर चैक डैम पानी की प्राकृतिक गति के अवरोधक बनेंगे वैसे वैसे साथ बह आने वाली अयस्क मिश्रित अपर्दित सामग्री तल पर जमा होने लगेगी। जितनी पहले यह सामग्री जमा होगी उसे निकाल लेने पर उसके अयस्क तत्व उतने ही अधिक संरक्षित तथा पुनर्प्रयोग में आने योग्य मिलेंगे और इस तरह उपयोगी मृदा का अपरदन भी तत्क्षण ही रुक सकेगा, लाल पानी समस्या का निदान तो इससे होगा ही।

लाल पानी की समस्या का उल्लेख करने के पीछे यह बताना मेरा उद्देश्य है कि विज्ञान और समाजशास्त्र समाधानों के द्वार हैं; केवल उन्हें खटखटा कर देखने की आवश्यकता है। क्या एसा नहीं हो सकता कि हम पहले ज्ञान चक्षु खोलें और उसके पश्चात कोई एसी योजना बनायें जिससे कि बस्तर क्षेत्र का समेकित विकास हो सके? विज्ञान की भाषा में इस तरह के समेकित अध्ययन को धारण क्षमता अध्ययन (कैरिंग कैपेसिटी स्टडी) कहा जाता है। किसी क्षेत्र की धारण क्षमता का अर्थ है उसमे अवस्थित सभी प्रकार के प्राकृतिक, खनिज तथा मानव संसाधनों का समग्रता से अध्ययन कर यह जानना कि कोई भी योजना-परियोजना वहाँ कितनी उपयुक्त सिद्ध हो सकती है। एक एसा ही अध्ययन किया जा सकता है जिसमे क्षेत्र का भूविज्ञान, भू-आकृति, वानस्पतिकी, जीवजगत, समाजशास्त्र, इतिहास आदि आदि सम्मिलित हों। सबसे महत्वपूर्ण है यह कि समाजशास्त्र आधारित अध्ययन का महत्वपूर्ण हिस्सा जनजातीय समीकरण होने के साथ साथ आदिवासियों की आर्थिक अवस्थिति, जीविकोपार्जन के वर्तमान आधार, उनकी सांस्कृतिक विरासतें, उनके रहन-सहन-रिवाज, उनके देवी-देवता, उनके परम्परागत पर्व-तिहार, इलाज-उपचार आदि आदि भी बनेंगे। इस तरह क्षेत्रवार वे संसाधन जिसमे कि मानव भी सम्मिलित है उनके सतत विकास की अवधारना के अनुरूप उपयोग की एक रूप रेखा तैयार की जा सकेगी। इस आधार पर यह सोचा जा सकता है कि वे कौन कौन से खनिज हैं जिनका हमें दोहन करना है तथा कौन से एसे है जिन्हें आगामी पीढी की विरासत के रूप में संरक्षित रखना है। कहाँ परियोजनायें बनाना व्यावहारिक है और कहाँ इनका विरोध समुचित है। यदि कहीं परियोजनाओं को लगाये जाने की संस्तुति है तो उसके साथ साथ क्या क्या सुधारात्मक कार्य होने अवश्यंभावी हैं। विस्थापन और पुनर्वास जैसे संदर्भों को किस प्रकार पूरा किया जायेगा इसका खाका भी पहले ही अध्ययन के माध्यम से बना लिया जा सकता है जो कि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। 

सुदूर संवेदन तकनीक का विशेषज्ञ होने के कारण यह बात बहुत जोर दे कर कहना चाहूँगा कि क्षेत्र के वे हिस्से जो दुर्गम हैं, जहाँ लाल-आतंकवाद की समस्या मौजूद है तथा जहाँ सीधे तौर पर पहुँच कर वैज्ञानिक अन्वेषण करना संभव नहीं है वहाँ अंतरिक्ष से हमारे भेजे गये उपग्रहों की सजग निगाहें हैं। भांति भांति के उपग्रह आज भारत के पास हैं जिनके चित्र वनों के प्रकार, खनिजो के प्रकार, मृदा के भीतर की अवस्थितियाँ, भूजल की किसी क्षेत्र में स्थिति, जलागम क्षेत्र का घाटीवार विस्तार, प्राणीजगत आदि की जानकारी बखूबी प्रदान कर सकता है। कथनाशय यह है कि यदि परियोजनाओं की घोषणा अथवा बस्तर के विकास पर किसी निर्णय के प्रतिपादन से पहले एक विशेषज्ञ टीम गठित कर एक अथवा दो वर्ष का समय लगा कर व्यापक रूप से इन वनांचल की धारण क्षमता का अध्ययन करा लिया जाये तो सरकार एवं प्रशासन को एक सकारात्मक दिशा प्राप्त हो सकती है। इस अध्ययन में न केवल वनस्पति शास्त्री, जीव विज्ञानी, रसायन शास्त्री, भूगर्भ शास्त्री, सांख्यिकी विशेषज्ञ, समाजशास्त्री, पुरातत्वविद आदि विषय विशेषज्ञ सम्मिलित हों अपितु प्रशासनिक अधिकारियों के साथ साथ अंचल में कार्य करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं का भी सहयोग लिया जा सकता है। इस प्रकार के अध्ययनों में उन ख्यातिनाम संस्थाओं और व्यक्तियों से भी राय ली जा सकती है जो समाज से जुडे मुद्दों पर कार्य करते रहे हैं। 

इस तरह एक वैज्ञानिक तरीके से किया गया धारण क्षमता अध्ययन यह तथ्य बाहर लाने में सहायक हो सकता है कि किन स्थानों को हमें औद्योगिक विकास के लिये चुनना है, किस स्थानों पर खनन की स्वीकृति दी जा सकती है, किन स्थानों पर दुर्लभ प्रजाति के वन व जीव हैं और उन्हें किसी भी कीमत पर बचाना है, आदिवासी समाज के समेकित विकास के लिये किन स्थानों से उनके खेतों तक पानी पहुँचाया जा सकता है, भूजल का उत्थान कैसे हो सकता है, परम्परागत आजीविका के साधनो को कैसे बचाया और बेहतर बनाया जा सकता है, किस तरह आदिवासी संस्कृति का संरक्षण, प्रोत्साहन और उत्थान हो सकता है, आदिवासी नृत्य संगीत और कला को किस तरह दिशा और प्रसार प्रदान किया जा सकता है, आदिवासी उत्पादों को किस तरह समुचित मूल्य और बाजार उपलब्ध कराया जा सकता है। बस्तर एसा सवाल नहीं है जिसका उत्तर ही न हो; हमें अब समस्या नहीं समाधानों पर केन्द्रित होना होगा।

-राजीव रंजन प्रसाद
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Thursday, December 19, 2013

बस्तर के लोकजीवन में रचा बसा नशा


अक्टूबर 2012 की बात है। भाई अशोक कुमार नाग के साथ उनके गाँव गया था। वहाँ से आदिवासी जीवन की कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मैने एकत्रित की। यह कहना अनुचित न होगा कि महुआ, शराब और नशा लगभग हर घर की कहानी है। किसी न किसी तरह अपने दैनिक उपयोग का नशा आदिवासी परिवार अपने घर अथवा सामूहिक रूप से अपने गाँव में ही तैयार कर लेता है। घर में ही इसे तैयार करने योग्य वस्तुओं, पकाने योग्य हांडी-भट्टी की व्यवस्था रहती है। मैने महसूस किया कि महुआ और शराब सामाजिक सम्बन्धों की प्रगाढता के साथ भी घुल-मिल और रच बस गयी है। इतना ही नहीं यह उनके देवी-देवताओं की भी आवश्यकता है। इस कथन के साथ मैं यह नहीं कहना चाहता कि शराब उचित है अथवा नशा आदिवासी जीवन के लिये अभिशाप नहीं है। निश्चित ही नशा आदिवासी जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है किंतु यह उनका प्रसंशनीय पक्ष नहीं है। इस बातपर आलेख के उपसंहार में चर्चा करते हैं पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि कितने प्रकार का नशा बस्तर मे जगभग हर आदिवासी जनजाति के दैनिक जीवन का हिस्सा है।

सर्वप्रथम लांदा बनाने की विधि जान लें। चावल को धो कर पीस लिया जाता है। जरूरत समझी गयी तो चावल के साथ कोसरा और मंडिया को भी मिला कर तथा पीस कर इसे तैयार किया जाता है। एक बडे से घड़े में जिसमे नीचे पानी खौल रहा होता है तथा उसके उपर छिद्रों वाली जाली रखी होती है, इसमें इस मिश्रण को रख दिया जाता है। अब भांप सारी प्रक्रिया को अंजाम देता है जिसमे इसे सेंक कर उतार लिया जायेगा। फिर अंकुरित जोंदरा के पावडर से मिला कर इसमे थोडा पानी डाल कर छ:-सात दिनों के लिये रख दिया जायेगा। घडे में अब खमीर उठने लगेगी। यह लांदा बनने की प्रक्रिया का अंतिम चरण है। लांदा का नशा एकदम से नहीं चढ़ता कितु एक बार चढ जाये तो आदिवासी लम्बे समय तक इसके सुरूर के आनंद में झूमते रह्ते हैं। 

इसी तरह सुराम बनाने के लिये मुख्य आवश्यकता है महुवे की। महुवे को धो कर देर शाम तक उबाला जाता है तथा फिर उसे उतार कर ढक लिया जाता है। अब इसे छान कर दूसरी हांडी में डाल दिया जायेगा। इसमें कुछ लोग आम की फांक का भी कभी कभी प्रयोग करते हैं। जितनी देरी से इसका सेवन होगा उतना ही अधिक नशा सिर पर चढेगा।

मंद बनाने के लिये महुआ को पानी में डाल कर किसी हांडी में तीन चार दिनों के लिये रख दिया जाता है। अब यहाँ अपने घरेलू यंत्र में भाप के योगदान से आगे की प्रक्रिया कीजाती है। इस सम्मिश्रण को हल्की आंच दी जाती है तथा इससे निकलने वाली भाप को बर्तन में उपर उठते ही ठंडा कर दूसरे बर्तन में बूंद बूंद एकत्रित कर लिया जाता है। भाप से ठंडा हो कर एकत्रित हुआ तरल पदार्थ ही मंद कहा जाता है। 

इसके अलावा सल्फी और ताड़ी की चर्चा के बिना लोकजीवन मे नशे पर चर्चा अधूरी रहेगी। क्षेत्रवार यदि सल्फी के पेड की तलाश की जाये तो इसका वितरण उत्तर तथा मध्य बस्तर में अधिक हैं जबकि दक्षिण बस्तर में ये कम पाये जाते हैं। दक्षिण बस्तर में ताड़ के वृक्ष ज्यादा हैं और वहाँ के लोग सल्फी की अपेक्षा ताड़ी पीने के अधिक आदी हैं। यह भी जोडना होगा कि यद्यपि ताडी का वृक्ष सल्फी के वंश का ही है; तथापि ताडी सल्फी से कहीं अधिक मादक होती है। सल्फी का रस निकालने के लिये पेड के अग्रभाग को जिसे ‘कली’ कहते हैं को काट दिया जाता है। रस को एकत्रित करने के लिये रस्सी के सहारे नीचे एक घडा बाँध दिया जाता है जिसमे कली से बूंद बूंद टपक कर रस संग्रहित होता रहता है। सल्फी का रंग दूध की तरह सफेद होता है, थोडा पतला भी जैसे किसी ने दूध में पानी मिला दिया हो। पीने पर सल्फी थोडा खट्टापन लिये हुए मीठी सी होती है। लगभग इसी प्रक्रिया से ताडी भी प्राप्त की जाती है अर्थात ताड़ के पेड़ से निकाले गये दूध से बनी मदिरा को ताड़ी कहते हैं। ताजी सलफी अथवा ताड़ी में नशा नहीं होता और यह सुबह सुबह एक ऊर्जा दायक पेय के रूप में पी जाती है। जैसे जैसे दिन चढता है तथा रस में फरमंटेशन की प्रक्रिया जोर पकडने लगती है, रस कडुवा होने लगता है साथ ही अधिक नशीला भी। 

नशा किसी भी समाज की अवनति का ही कारक है तथा एक सीमा से अधिक इसका प्रयोग सर्वथानुकसानदेय ही होता है। यह बात तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज पर भी लागू होती है और हमारे आदिवासी भाईयों पर भी। बस्तर में शराब उन्मूलन के जितने भी सरकारी कार्यक्रम चले हैं वे गैर व्यवहारिक है तथा समाजशास्त्र को समझे बिना चलाये जाते रहे हैं। एक समय मे अंग्रेजों ने अपनी शराब को यहाँ खपाने के लिये इनकी परम्परागत शराब को बंद कराने की तमाम तरह की कोशिशे की थी। समय के साथ हमारा अपरिपक्व लोकतंत्र उसी ढर्रे पर चलने लगा तथा उसे नीयम, कानून और प्रतिपादन छोड कर बाकी सब नज़र आना बंद हो गया। परम्परा बन चुकी आदते कानूनो के मथ्थे मार कर नहीं छुडवायी जा सकती वह भी तब जब इसकी आवश्यकता आदमी को ही नहीं उनके बेजुबान देवी-देवताओं को भी रोज ही पडती हो? हम सोचते हैं कि एसी कमरों में बैठ कर आज निर्णय ले लिया कि कल से देसी बंद, शराब बंद और हो गया? होता यह है कि इससे खाकी की चाँदी हो जाती है और उनके रोज के ठर्रे का पुख्ता इंतजाम होने लगता है। आदिवासी समाज में नशा अवमुक्ति किसी कानून से नहीं अपितु समाज की समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भरे किसी अभियान से ही संभव है। हाँ, इसके साथ ही इस विषय पर जंगल के भीतर आदिवासी समाज की भलाई के स्वयंभू ठेकेदार अर्थात माओवादियों पर चर्चा भी कर ली जाये। माओवादियों ने समय समय पर शराब बंदी की घोषणाये उसी तरह की है जिस तरह व्यवस्था के पैरोकार करते रहते हैं। एक गाँव के पूर्व सरपंच ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर जानकारी दी थी कि असल में उनकी शराबबंदी का मायना सामाजिक बदलाव नहीं अपितु अपनी खुद की सुरक्षा है। एसी कई घटनाये हुई हैं जहाँ नशे में आदिवासियों नें जंगल के भीतर की जानकारियाँ पुलिस के हथ्थे चढते ही उन्हे प्रदान कर दी हैं। अत: नशा तो बंद कराना ही होगा वह भी सख्ती से? कथनाशय यह है कि बस्तर के आदिवासी समाज में नशे की उपलब्धता बहुत सहज है तथा प्रत्येक घर में है। नशा उनके त्यौहारों का हिस्सा है, पूजा-परम्परा का हिस्सा है नृत्य-गीत का हिस्सा है। जितना गहरा नशा यहाँ की सामाजिकता से जुडा हुआ है उतनी ही गहन सोचपूर्णता के साथ बदलाव लाये जाने की आवश्यकता है।

राजीव रंजन प्रसाद 

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Thursday, December 12, 2013

बस्तर में वामपंथ की अवस्थिति पर एक बहस

बहस तो आवश्यक है किंतु वामपंथी नेता संजय पराते ने इसे व्यक्तिगत बना दिया। तथापि; मैं मूल आलेख जिसपर यह बहस आधारित है; उस आलेख पर संजय पराते का जवाब और फिर संजय पराते को मेरा जवाब एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आलेख पढते हुए साथ में प्रस्तुत किये गये आंकडे तालिका पर भी दृष्टि डाली जा सकती है। पहले पढे मेरा जवाब और फिर इसी श्रंखला में अन्य आलेख भी  - 

विफलताओं को छिपाने का श्रेष्ठ बहाना यही है “संजय पराते” जी 
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वामपंथ की बस्तर में जमीन नहीं यह बात तो चुनावी आंकडे सिद्ध कर रहे हैं लेकिन क्यों नहीं है इस बात के लिये आप आईना ले कर उन कथित नेताओं, विचारकों या प्रवक्ताओं के सामने आईये तो; गालिया दे दे कर आपका थोबडा न सुजा दें तो कहियेगा। क्या यही वामपंथ की जमीनी लडाई है और इसी व्यक्तिगत हमलों-झमलों के दम पर इन्हें सारी दुनियाँ चाहिये? इतनी तल्ख शुरूआत क्यों? यह इसलिये क्योंकि मैं व्यक्तिगत हमलों को सोचने समझने और विचारने के दिशा में बाधा मानता हूँ। व्यक्तिगत हमले करने वाले व्यक्तियों से आप जिन्दा विमर्शों की बात सोच ही नहीं सकते उनसे क्या व्यवस्था और अवस्था पर चर्चा होगी? संजय पराते को मैं नहीं जानता। कमल शुक्ला के माध्यम से ज्ञात हुआ था कि वे वामपंथी नेता हैं और बस्तर के चुनावों पर जो मैने आंकडे प्रस्तुत किये हैं उस पर अपनी बात रखेंगे। बात रखी भी गयी लेकिन जो मतदाता ने आईना दिखाया है उस पर नहीं बल्कि हकीकत को सामने लाने के कारण मुझ पर छीटा-कशी। ओह मेचारे मुक्तिबोध..छोडिये मुद्दों पर आते हैं। 

पहले व्यक्तिगत हमलों का जवाब दूंगा फिर तथ्य की बातें। वामपंथी नेता पराते लिखते हैं कि “अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृष्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं”। आभार पराते जी क्योंकि हम जैसे गिद्ध उस गंदगी को साफ कर रहे हैं जो समाज में घोषित “विचारधारायें” फैला रही हैं यह भी तो सही है न? आप फिर लिखते हैं कि “राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है”। यह आपने मेरे लेख को पढे बिना लिखा है या आप “झूठ” जान बूझ कर लिख रहे हैं। मेरा कहना है कि जमीनी वामपंथ कमजोर पडा है जबकि उसे मुखर और मजबूत होना चाहिये। मैं जमीनी लडाईयों का प्रखर समर्थक हूँ और इसीलिये अपने ही एक लेख में मैने टिप्पणी की थी कि मनीष कुंजाम की हार का मुझे दुख़ हुआ है। पर यह भी सच है कि मनीष कुंजाम केवल अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे थे। बस्तर में सभी जगह वामदल अपना दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। इस स्वीकारोक्ति से बचने के लिये अनावश्यक तेज आवाज क्यों? नेता होने का मतलब तो आप समझते हैं लेकिन क्या लेखक होने के मायने ज्ञात हैं आपको? मजेदार बात यह है कि बस्तर के कला-संस्कृति-समाज आदि आदि विषयों पर मैं लिखता रहा हूँ तो किसी को आपत्ति नहीं लेकिन जब जब राजनीतिक सच्चाईयों पर कलम चलाओं तो कई कलेजे सुलग जाते है। खैर, व्यक्तिगत हमले पर इतना ही अब तथ्य पर बात करते हैं। 

वामपंथ अपनी सतह खोता गया क्योंकि उसने लेखक तो पैदा किये, विचारक भी पैदा किये लेकिन जमीनी कार्यकर्ता कहाँ हैं? जमीनी कार्यकर्ता बस्तर में चुनावी अभियान के समय कहाँ थे? माना कि कॉग्रेस और भाजपा ने अपने धनबल से बडी बडी रैलियाँ की और परिवर्तन तथा विकास यात्रा के नाम पर चुनाव प्रचार किया लेकिन जनबल का दावा तो आपका है। कहाँ थी वे रैलियाँ? वे मुद्दे बाहर क्यों नहीं आये जिनको सामने रख कर जमीनी वामपंथ कहता कि हम ही विकल्प हैं काँग्रेस और भाजपा के? आपके देखते देखते “आम आदमी पार्टी” ने दिल्ली में वह कर दिखाया जिसकी अपेक्षा वामपंथियों से की जाती रही है। पराते जी आप लिखते हैं कि “वामपंथ पूरे देश में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है”। मेरा सवाल है कि अलग मुद्दा क्यों है? वाम की केरल पर हाल में भी चर्चा होनी चाहिये, वाम के बंगाल पराजय पर भी बात होनी चाहिये और तो और नेपाल का गढ ढहने पर भे विमर्श होना चाहिये और बस्तर की हार पर भी चर्चा होनी चाहिये। तिरुपति से पशुपति तक है क्या असलियत; केवल त्रिपुरा ही तो? इसका अर्थ यही है कि वाम राजनीति केवल कुछ एनजीओ और पत्र-पत्रिकाओं से चल रही है; जमीन पर आप हैं ही नहीं; इसलिये दिखते भी नहीं और जब कोई आईना दिखाता है तो फिर आपकी मुखरता के क्या कहने? 

आप लिखते हैं वामपंथी वैकल्पिक ताकत का निर्माण करना चाहते हैं मेरा प्रश्न है कि 1947 से 2013 आ गया और इस बीच मुख्य सत्ताधारी दल के कई विकल्प आ गये किंतु वामपंथी इस पंक्ति में कभी क्यों नहीं थे? मुद्दे की बात हो तो अरविन्द केजरेवाल भी शीला दीक्षित को हरा सकता है तो फिर टटोलिये न कहाँ हैं मुद्दे? या फिर कोई मुद्दे हैं ही नहीं हवा हवाई बहसे ही हैं? और काम हम जैसे अदना लेखकों को गरिया कर ही निकाला जा रहा है? मैने अपने आलेख में बस्तर से बात की थी और वही ले जाता हूँ अविभाजित मध्यप्रदेश से ले कर छत्तीसगढ-2013 तक बस्तर में जितने भी चुनाव हुए अधिकतम 5% से अधिक मत सम्मिलित रूप से बस्तर में कभी प्राप्त नहीं हुए क्यों? वह इस लिये क्योंकि वामपंथी जमीन बनाने की कोशिश ही नहीं करते पाये गये। जमीनी वामपंथ से बडी दुनिया तो बंदूखी-वामपंथ ने खडी कर ली और आप देखते रह गये? कभी आत्ममंथन नहीं हुआ, कभी दुबारा आन्दोलन खडा करने की कोशिश नहीं की गयी यहाँ तक कि मनीष कुंजाम को छोड कर कोई ठीक ठाक नेता भी बस्तर को वामपंथ ने अब तक नहीं दिया है। 

मुझे यह कहने में गुरेज नहीं है कि बस्तर का आदिवासी दो पाटों में पिस रहा है। यह बात मैने अपनी कवितओं-लेखों के माध्यम से कई बार कहीं हैं। किंतु इससे वामदलों की सक्रियता नहीं सिद्ध होती। वामपंथी राजनेता पूरे पाँच वर्ष परिदृश्य से बाहर रहते हैं और फिर चुनावों में उनसे अपेक्षा की जाये तो वही परिणाम होंगे जिसका की आंकडा मैने प्रस्तुत किया है। भाजपा और कांग्रेस को आप दोष इस लिये दे रहे हैं क्योंकि यह सबसे आसान तरीका है अपनी अवस्थिति छिपाने का। वामदल एक राजनैतिक पार्टी की हैसियत रखते हैं तो उसने अपेक्षायें भी उसी तरह की होंगी? या जो आपने कॉग्रेस-भाजपा पर टिप्पणी की है वही वामपंथियों की भी सच्चाई है अर्थात – हमप्याले, हमनिवाले?

आप लिखते हैं कि इस चुनाव में “वामपंथियों के पास वैकल्पिक नीतियाँ थीं, अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी” हो सकता है रही होंगी लेकिन न तो वे आपकी सभाओं से बाहर आयीं न ही आपके मुद्दों ने आन्दोलन का कोई रूप लिया। अगर इतना ही प्रभाव था जिसका कि आप दावा कर रहे हैं तो “नोटा” में पडे वोटों से भी दयनीय हालत आपकी पार्टी की क्यों हुई? जवाब में चाहें तो आप मुझे फिर दो चार गालियाँ दे सकते हैं क्योंकि न तो आत्ममंथन वामपंथियों का स्वभाव रहा है न ही अपने छद्म गुरूर से बाहर यह राजनैतिक दल आसानी से आयेगा। आप फिर लिखते हैं कि “चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है”। इस कथन पर क्या टिप्पणी करूं आप बस्तर के चुनाव परिणाम में वामदलों की हैसियत देखें, जनता को आप बेवकूफ समझते हैं तब तो कोई बात नहीं अन्यथा तो आप 365 दिन छोडिये 1950 के पहले चुनाव से अब तक केवल तीन सीट ही निकाल सके हैं। 

संजय पराते जी, आपकी मुझ पर नाराजगी उचित ही है क्योंकि यही वामपंथी दलों को बस्तर के चुनाव में मिली विफलताओं को छुपाने का श्रेष्ठ और सुलभ बहाना है। शुभकामनायें। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 
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[यह आलेख मेरे उस आलेख पर वामपंथी नेता श्री संजय पराते का मुझको जवाब है जिसे मैने इसी आलेख के नीचे हू-बहू प्रस्तुत किया है।] 


जब-जब वामपंथ पर हमले होंगे, हमलावरों को मुक्तिबोध के सवाल का जवाब देना ही होगा कि -‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’ अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृश्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं। ‘विचारधारा विहीन विचार’ आज की सबसे बड़ी विचारधारा है, क्योंकि प्रतिक्रियावादियों को ऐसे ही विचार रास आते हैं, जो मानवीय संवेदना से बहुत-बहुत दूर हो। ऐसे विचार किस विचारधारा की पुष्टि करते हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं हैं।

कुछ लोग होते हैं (और ऐसे सनकी-पागल लोग बहुत कम होते हैं) जो पहले अपनी विचारधारा और राजनीति तय करते हैं और बाद में वे इसे स्थापित करने का कठिन कार्य करते हैं। लेकिन ऐसे ’चतुर सयानों’ की कोई कमी नहीं होती, जो ‘स्थापित राजनीति’ के साथ चलने में ही अपनी भलाई देखते हैं। राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष  कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है। इस राजनीति में ही भाजपा का भला है और कांग्रेस का भी.....और राजीव रंजन का भी! तो राजीव रंजन से और तमाम मित्रों से मेरा पहला अनुरोध यही है कि संसदीय वामपंथ (भाकपा-माकपा) को नक्सलियों/माओवादियों से अलग करके देखें। ऐसा इसलिए कि संसदीय वामपंथ पूरे देश  में ही नक्सलवाद के निशाने पर रहा है....इसीलिए उत्तर बस्तर में भी रहा है और दक्षिण में भी। कारण स्पष्ट है--यदि संसदीय वामपंथ प्रगति करेगा, तो माओवादी कमजोर होंगे। संसदीय वामपंथ को माओवादी तो बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते, देश  और प्रदेश  की दोनों प्रमुख पार्टियां-- कांग्रेस और भाजपा-- भी नहीं चाहतीं। आखिर संसदीय वामपंथ ही तो कांग्रेस-भाजपा की नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ तनकर खड़ा है-- और एक वैकल्पिक नीतियों को सामने रखकर। वैष्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की जिन नीतियों पर कांग्रेस-भाजपा के बीच व्यापक सहमति है (चुनावी नूरा-कुष्ती को छोड़ दें तो), उनको तेजी से लागू करने के खिलाफ रोड़ा तो वामपंथ ही है। वही पूरे देश  में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश  में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है। निष्चित ही वामपंथ के शुभचिंतकों और ‘स्थापित राजनीति’ के सहचरों का विश्लेषण अलग-अलग ही होगा। 

पूंजीवाद शोषण पर आधारित व्यवस्था है। यह व्यवस्था पहले अस्तित्व में आती है--शोशक वर्ग के लिए इस व्यवस्था को बनाये रखने का औचित्य प्रतिपादित करने वाली विचारधारा का विस्तार बाद में होता है। यह काम आज भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। साम्यवाद उस विचारधारा को प्रतिपादित करती है, जो शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेती है। यहां विचारधारा पहले स्थापित होती है, व्यवस्था निर्माण का काम बाद में। इस विचारधारा के विस्तार का काम आसान नहीं है, लेकिन वामपंथ ने अपनी विचारधारा और राजनीति तय करली है और इस राजनीति को स्थापित करने के काम में वे अनथक/अविचल लगे हुए हैं। इस काम में कहीं वे जमते हैं, तो कहीं जमी-जमायी जगह से उखड़ते भी हैं। लेकिन वामपंथ के इस जमने-उखड़ने की तुलना कांग्रेस-भाजपा की हार-जीत की तरह नहीं की जा सकती। आखिर पूंजीवादी व्यवस्था का विकल्प षोशणहीन, वर्गहीन समाज व्यवस्था ही हो सकती है-- आखिर ऐसी व्यवस्था में ही समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा के बुनियादी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। और सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ नहीं है, तो फिर वे मानवता के बुनियादी लक्ष्यों के साथ कैसे हो सकते हैं? 

तो वामपंथी ताकतें वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहती हैं, वो इसके लिए वैकल्पिक नीतियां पेष कर रही है, उन ताकतों की प्रगति कौन चाहेगा? सही वामपंथ को कुचलने के लिए कांग्रेस-भाजपा को छद्म वामपंथ से भी हाथ मिलाने में कभी गुरेज नहीं रहा। कौन नहीं जानता कि बस्तर में भाकपा-माकपा के नेता/कार्यकर्ता ही नक्सलियों/माओवादियों के सबसे ज्यादा षिकार हुए हैं। कौन नहीं जानता कि इन माओवादियों के लिए आर्थिक संसाधन इनके नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों, ठेकेदारों की दहलीजों से ही निकलते हैं और कौन नहीं जानता कि चुनाव में लेन-देन करके इन्हीं छद्म वामपंथियों का उपयोग कांग्रेस-भाजपा अपने हित में करती है। तो कांग्रेस-भाजपा वाकई चाहेगी कि माओवाद/नक्सलवाद खत्म हो, इनको कुचलने के नाम से आ रहे आर्थिक संसाधनों में भ्रष्टाचार खत्म हो और ‘स्थापित राजनीति’ के खिलाफ सही वामपंथ को पनपने का मौका मिले? इन दोनों पार्टियों इनकी सरकारों ने नक्सलियों को कुचलने के नाम पर वामपंथी कार्यकर्ताओं को ही अपने दमन का षिकार बनाया है। नक्सलियों/माओवादियों की ‘अघोषित/असंवैधानिक’ सप्ताह को स्थापित करने का काम इन दोनों पार्टियों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया है। 

वामपंथी ताकतों ने इस देष में आजादी की लड़ाई लड़ी है। आज भी वे साम्राज्यावदी संघर्षों  और विचारों की वाहक है। अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवाद आज भी अपनी लूट-खसोट की नीति को जारी रखना चाहता है और इसके लिए नये-नये उपनिवेष स्थापित करना चाहता है। इसके लिए विष्व-अर्थव्यवस्था पर वह अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। उदारीकरण-निजीकरण-वैष्वीकरण की नीतियां इसी लूट-खसोट और शोषण की मुहिम का ही अंग है। स्पश्ट है कि जो इन नीतियों के साथ है, वह आम जनता का दुष्मन है। उसे अमेरिकी हितों और पूंजीपतियों के स्वार्थों की तो चिंता सताती है, लेकिन आम जनता के दुख-दर्दों से वह न केवल आंखें मूंदे रहता है, बल्कि उसके बुनियादी मानवीय अधिकारों को भी कुचलने में भी उसे कोई हिचक नहीं होती। 

राजीव रंजन जी, आप भी जानते हैं कि मानव विकास सूचकांक के पैमानों पर छत्तीसगढ़ की क्या स्थिति है? चुनावी दावों और प्रतिदावों को छोड़ दिया जाये तो सरकारी हकीकत यही है कि छत्तीसगढ़ देष के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। तो छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े इलाके बस्तर की स्थिति का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सबसे निर्मम शिकार वंचित वर्ग हो रहा है और छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों पर ही इन नीतियों की बर्बर मार पड़ रही है। बस्तर देशी -विदेशी  कंपनियों की ‘लूट का चारागाह’ बन गया है। नागरिकों को उनके घरों में सुरक्षा देने की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकारों की है, लेकिन बस्तर के आदिवासियों को इससे महरुम कर दिया गया। नक्सलियों/माओवादियों से तो निपटने में इन सरकारों की नानी मरती है, लेकिन राज्य प्रायोजित सलवा जुडूम (ध्यान रहे, सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया है) के नाम पर घरों को जलाने, महिलाओं से बलात्कार करने, उनकी हत्यायें करने और उन्हें गांव से विस्थापित करने और एसपीओ के नाम पर अवयस्क बच्चे के हाथों में बंदूकें थमाने का ‘बहादुरीपूर्ण’ काम ये करते रहे हैं। आदिवासियों को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचलने में इन्हें जरा भी शर्म महसूस नहीं होती। ऐसा करते हुए ‘राज्य’ नामक संवैधानिक सत्ता को मानवाधिकारों की कभी याद नहीं आयी।

नक्सलियों/माओवादियों का तो मानवाधिकारों से कोई लेना-देना ही नहीं है, लेकिन ‘राज्य के संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन का अधिकार’ भाजपा सरकार को किसने दिया? माओवादियों द्वारा राज्य के कानूनों का उल्लंघन किसी भी आपराधिक कार्य की तरह निष्चित ही निंदनीय और दण्डनीय है, लेकिन भाजपा द्वारा संचालित ‘राज्य की संवैधानिक सत्ता’ को किसने ये अधिकार दिया है कि वह सोनी सोरी नामक नक्सली महिला (यदि वह नक्सली है!- और याद रखें, इस महिला पर सरकार के तमाम आरोप फर्जी साबित हो रहे हैं) के गुप्तांगों में पत्थर भर दें (मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो चुका है) और ऐसी बहादुरी के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी को राश्ट्रपति के ‘वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाये? राजीव रंजन जी, लिंगा कोड़ोपी की पत्रकारिता को आपकी पत्रकारिता की तरह भाजपा सरकार ने सामान्य दृश्टि से न देखकर ‘खतरनाक’ क्यों माना और नक्सली करार दे दिया? हिमांशु कुमार के दंतेवाड़ा के आश्रम को गैर कानूनी रुप से ध्वस्त करने का अधिकार भाजपा सरकार को किस संविधान ने दिया था? असलियत यही है कि आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन नक्सली भी कर रहे हैं और भाजपा सरकार भी। 

लेकिन आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन कोई आज की बात नहीं है। मध्यप्रदेष में कांग्रेस राज में भी यही सब हो रहा था। कांकेर के आमाबेड़ा थाने में मेहतरराम नामक आदिवासी को नक्सली कहकर मार दिया गया। अंतागढ़ थाने में मोहन गोंड नामक आदिवासी को नक्सली वर्दी पहनाकर फोटो खींची गयी और कांकेर थाने में कई दिनों तक उसे बंधक बनाकर रखा गया। केशकाल के पास धनोरा थाने में एक आदिवासी अविवाहित युवती को नक्सली कहकर कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया, उसके साथ बलात्कार किया गया और हाथ पैरों में जंजीर बांधकर ‘नक्सलियों को पहचानने’ के लिए बाजार में घुमवाया गया। ये सब इस गरीब बस्तर के गरीब आदिवासियों की ‘सत्यकथायें’ हैं। ये नक्सली थे कि नहीं, यह तय करने काम अदालतों की जगह पुलिस को किसने दिया?-- और यदि ये नक्सली थे भी, तो इनके मानवाधिकारों के हनन का अधिकार पुलिस और राज्य सरकार को किसने दे दिया था? ये सभी मामले माकपा नेता की हैसियत से मैंने स्वयं मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराये थे। मानवाधिकार आयोग ने इन मामलों की छानबीन का आदेश  भी दिया था। तत्कालीन एसडीएम संजीव बख्शी की अदालत में तमाम पीडि़तों और संबंधित गवाहों को मयशपथ पत्र मैंने पेश  किया था-- पुलिस द्वारा एनकाउंटर करने की धमकी की परवाह न करते हुए भी। लेकिन पूरा आयोग इसके बाद चुप बैठ गया। इतनी कसरत करवाने के बाद आयोग ने इन मामलों में फैसला देने की जहमत नहीं उठायी। आयोग की आलमारियों के किसी अंधेरे कोने में पड़े ये दस्तावेज आज भी सड़ रहे होंगे। पार्टनर, आपकी पहुंच तो काफी है- थोड़ा इन दस्तावेजों को सामने लाने की उठा-पटक करोगे? थोड़ा पता करोगे कि मानवाधिकार आयोग के अधिकारों का हनन करने में किसकी दिलचस्पी थी? थोड़ा पता करोगे कि बस्तर के तत्कालीन कमिष्नर सुदीप बैनर्जी ने नक्सलवाद से निपटने के लिए जो रिपोर्ट मध्यप्रदेश सरकार को दी थी और जिसे विधानसभा के पटल पर रखा गया था, उस सार्वजनिक रिपोर्ट का क्या हुआ? ‘सूचना का अधिकार’ के तहत मांगने पर सरकार ने उसे गुप्त (?) दस्तावेज बताते हुए मुझे देने से इंकार कर दिया है। इसे हासिल करने में आप मेरी मदद करोगे? 

तो राजीव जी, माकपा-भाकपा पर सरकार और दोनों पार्टियों के हमलों की तुलना भाजपा राज में कांग्रेस पर दमन से न करें। कांग्रेस ने यदि सशक्त विपक्ष की भूमिका निभायी होती, तो आज वह सत्ता से दूर नहीं रहती और यदि उस पर वर्गीय दमन होता, तो वह इतनी सीटें नहीं ले पाती। सत्ता पर कब्जा किसका रहे और मलाई का हिस्सा ज्यादा किसको मिले, इसे तय करने के लिए दमन-दमन का खेल खेला जाता है। मत भूलिये कि जोगीराज में भाजपा भी ऐसे ही कांग्रेसी दमन का शिकार होती थी। लेकिन रात के अंधेरे में हम-प्याले, हम-निवाले। 

वामपंथ की कमजोरी यही है कि अपनी सही वैकल्पिक राजनीति को आम जनता के बीच स्थापित नहीं कर पायी। इस दिषा में उसे एक लंबा रास्ता तय करना है इस विकल्प के अभाव में कांग्रेस-भाजपा के बीच ही धु्रवीकरण बना हुआ है। नीतिगत रुप से दोनों पार्टियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यही कारण है कि दोनों पार्टियों के बीच वोटों का प्रतिषत अंतर सिमटकर 0.77 प्रतिशत  रह गया है। पिछले बार यह पौने दो प्रतिशत से अधिक था। यदि भाजपा की नीतियां छत्तीसगढ़ की गरीब जनता के जीवन को सकारात्मक रुप से प्रभावित करती, तो यह अंतर बढ़ता--लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नोटा के रुप में तीन प्रतिशत  से अधिक-- 4 लाख से ऊपर-- मतदाताओं ने निर्णायक रुप से दोनों ही पार्टियों को ठुकराया है। यदि इनके पास तीसरे विकल्प के रुप में वामपंथी-जनवादी विकल्प होता, तो न भाजपा को सत्ता मिलती, न कांग्रेस को बहुमत।

चुनाव में वामपंथ के पास लाल झंडा था, तो उसने अपना झंडा लहराया-- ठीक वैसे ही जैसे भाजपा ने भगवा और कांग्रेस ने बहुरंगा झंडा लहराया। लेकिन वामपंथ के पास वैकल्पिक नीतियां थीं-- अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी। उसने कांग्रेस-भाजपा की कथनी-करनी और लफ्फाजियों को पर्दाफाष भी किया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, रोजगार गांरटी, वनाधिकार कानून, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, महंगाई, बेरोजगार, भ्रश्टाचार, प्रदेष का पिछड़ापन.........सभी मुद्दों पर वामंपथ ने आम जनता के बीच अपनी बातों को रखने का प्रयास किया। अवश्य ही साधन सीमित थे। चुनाव आयोग द्वारा गठित ‘गणमान्य’ व्यक्तियों की स्क्रीनिंग कमेटी ने आकाश वाणी और दूरदर्षन से प्रसारित होने वाले मेरे पार्टी संबोधन को दिशा -निर्देष और आचार संहिता के नाम पर मनमाने तरीके से कांट-छांट की कोशीश  की। भाजपा सरकार की तरह ही इन बेचारों का जिंदल प्रेम अपने पूरे उफान पर था। माकपा ने उनकी हर कोशीश को नाकाम करते हुए अपनी नीतिगत बातें रखीं प्रदेश  में प्राकृतिक संसाधनों की हो रही लूट के मामलों में माकपा ने हीं जिंदल को निषाने पर रखा-- कांग्रेस-भाजपाईयों की तो घिग्घी बंधी थी! वामपंथ ने अपना पूरा चुनाव प्रचार नीतियों पर केन्द्रित किया। 

लेकिन क्या कांग्रेस-भाजपा ने भी ऐसा ही किया? दोनों के पास केवल लोकलुभावन घोशणाएं हीं थीं। नीतियों पर तो उन्हें बहस से ही परहेज है। कांग्रेस के पास धान का समर्थन मूल्य 2 हजार रुपये क्ंिवटल देने तथा राषन दुकानों से मुफ्त अनाज देने का वादा था (क्या इसके लिए राज्य में कांग्रेस सरकार की जरूरत है?) , तो भाजपा के अपनी तथाकथित उपलब्धियों की भरमार। लेकिन वादों और उपलब्धियों के बावजूद सच्चाई क्या है? कांग्रेस के मौजूदा 35 विधायकों में से नेता प्रतिपक्ष सहित 27 हार गये। भाजपा के 5 धाकड़ मंत्री सहित विधानसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और 5 संसदीय सचिव तथा 18 विधायक हार गये। और ये इसके बावजूद हुआ है कि दोनों ही पार्टियों ने खुलकर षराब, मुर्गा, पैसा, साड़ी, कंबल का सहारा लिया। तो क्या आम जनता ने कांग्रेस-भाजपा की नीतियों व उनकी कथनी-करनी पर टिप्पणी नहीं की हैं? यदि इनकी उपलब्धियां और कथनी-करनी सकारात्मक होती, तो इन पार्टियों को लोकतंत्र को स्वाहा करने की जरूरत नहीं पड़ती। 

इसलिए चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है। आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने की टाटा की नीति के खिलाफ भाकपा ही आगे रही है, कांग्रेस नहीं। आदिवासियों के मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ वामपंथ ही लड़ाई लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। वनाधिकार कानून व रोजगार गारंटी कानून के क्रियान्वयन के लिए वामपंथ ही लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। यही कारण है कि भले ही वामपंथ अपने संघर्शों व प्रभावों को सीटों में बदलने में सफल न हो पा रहा हो, लेकिन वामपंथ की मारक शक्ति से इस देष की राजनीति में उसकी प्रभावषाली भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि अलेक्स पाल मेनन के अपहरण के मामले में मनीष कुंजाम मध्यस्थ के रुप में स्वीकार किये जाते हैं। वे सरकार और माओवादी दोनों के बीच मध्यस्थ थे और भाजपा सरकार ने ही उन्हें हेलिकाप्टर उपलब्ध करवाया था। लेकिन इस मामले से आदिवासियों पर मुकदमों की समीक्षा के लिए जो समिति गठित की गयी, उसका काम फिसड्डी साबित हुआ तो इसमें भाजपा सरकार दोशी नहीं है? निदोश आदिवासी आज भी जेलों में हैं। तो मानवाधिकारों का हनन कौन कर रहा है? असलियत तो यही है कि नक्सल समस्या को बढ़ाने में भाजपा सरकार का बड़ा हाथ है। यदि नक्सली नहीं रहेंगे, तो भाजपा कहां रहेगी? 

राजीव रंजन को वेब पोर्टल और फेसबुक पर कांग्रेस-भाजपा का प्रचार नहीं दिखता, लेकिन उन्हें यहां वामपंथ का ‘हवाई’ प्रचार जरूर दिख गया। वामपंथ को इस मीडिया पर आने के लिए क्या षर्मिंदा होना चाहिए? सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा राज की कृपा मीडियाकर्मियों पर भले ही न हुयी हो, लेकिन मीडिया माफिया पर यह कृपा जमकर बरस रही है। मीडिया में चाटुकार पत्रकारों की एक ऐसी फौज तैयार हो गयी है, जो सच्चाई लाने के बजाय सत्ता पक्ष की बगलगीर रहने में अपनी भलाई देखती है। सत्ता की पक्षधरता अपना प्रभाव बढ़ाने और सुविधायें जुटाने का साधन बन गयी है। सामान्य मीडियाकर्मियों को उचित वेतनमान भी नहीं मिलेगा। साईं रेड्डी की नक्सली हत्या करेंगे, तो कमल शुक्ल को सत्ता जनसुरक्षा कानून की धौंस दिखायेगी। राजीव रंजन जी, अपने मित्रों के लिए कुछ तो कीजिए।

तो पार्टनर, वामपंथ अपनी जमीन तलाषने की कोषिष कर रहा है, इस तलाष में उसकी राजनीति की दिषा स्पश्ट है। यदि आप वामपंथ को गरियाना चाहते हैं तो उसके लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन जब हम बहस कर रहे हैं, तो आपको यह जवाब तो देना ही होगा--‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’

---संजय पराते

मूल आलेख जिस पर केन्द्रित है बहस: 

बस्तर में वामपंथ की कोई जमीन है भी? 
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बस्तर पर सर्वाधिक चर्चा वामपंथी ही करते हैं। माओवाद की आलोचना करने पर सबसे तल्ख प्रतिवाद वामपंथियों से ही प्राप्त होता है। बस्तर क्षेत्र में इस बार हुए चुनाव यह तो स्पष्ट कर रहे हैं कि माओवाद अपनी जमीन खो चुका और अधिकाधिक मतदाताओं ने बाहर आ कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। अब उस वामपंथ पर बात की जाये जिसने बैलेट से अपना शक्तिप्रदर्शन किया है। चुनावों से पहले ही कोण्टा, दंतेवाडा और बीजापुर सीट पर वामपंथी उम्मीदवारों के विजय की भविष्य़वाणी अनेको अतिउत्साही वाम-विचारधारापरक पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों में की जा रही थीं। यह समझने के लिये मैने स्थानीय पत्रकार दोस्तों से लगातार यह जानने की कोशिश की कि विशेषरूप से दक्षिण बस्तर में वामपंथी दल किन मुद्दों के साथ बाहर आये हैं, उनकी घोषणायें क्या हैं, तथा चुनावस प्रचार में अपनी बात किस तरह रख रहे हैं। अधिकतर जानकारियाँ यही प्रतीत हुईं कि कोण्टा में मनीष कुंजाम अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे हैं लेकिन सभी जगह वामदल अपनी दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। 

चुनाव परिणाम वामदलों के दिवास्वप्नों पर कुठाराघात था। यह ठीक है कि पूरा चुनाव ही दो बडी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच का हो गया था लेकिन वामदल तो हमेशा ही अपनी उपस्थिति और प्रभाव का बस्तर में दावा करते रहे हैं। आज यह सवाल उठता ही है कि पिछले पाँच सालों में वाम दलों ने कितनी बार जमीनी मुद्दों को सडक तक लाने का श्रम किया? मनीष कुंजाम भी चार साल की गुमनामी बिता कर एकाएक चुनाव के समय सक्रिय हुए। यह बस्तर हो या दिल्ली जमीन पर अपनी ठोस उपस्थिति दिखाये बिना आप एक सीट पर भी अपनी जीत का दावा नहीं रख सकते। बस्तर वाम दलों ने खुल कर कभी वाम चरमपंथ का विरोध भी नहीं किया तथा स्पष्ट रूप से उनसे अपनी दूरी भी दिखाने मे वे नाकामयाब रहे हैं। जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण किया गया था तब मनीष कुंजाम का माओवादियों द्वारा नाम मध्यस्त के रूप में आगे किया जाना उनके खिलाफ ही गया लगता है। वामपंथी दल बस्तर की बारह में से नौं सीटों पर लडे और उन्हें तीसरे से ले कर दसवे स्थान तक की प्राप्ति हुई और वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं थे। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सडक पर भी अपनी ठोस उपस्थिति नहीं दर्ज कराई बल्कि उनके जमीनी प्रचार से अधिक हवाई प्रचार तो बेवपोर्टल और फेसबुक पर सक्रिय वामपंथी करते दिखे। 

तो बस्तर में जमीनी वामपंथ की क्या हैसियत है इसपर बात करने के लिये नतीजों पर एक दृष्टि डालते है। कोंटा में कवासी लकमा फिर एक बार अपनी सीट समुचित बहुमत से निकाल ले गये जबकि दूसरा स्थान भाजपा को मिला है। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे वामपंथी इस बार पुन: मनीष कुंजाम के नेतृत्व में थे किंतु तीसरे स्थान पर खिसक गये और हार भी लगभग आठ हजार मतो से हुई है। दंतेवाडा (12954) और चित्रकोट (11099) छोड कर वामदलों को अन्य सभी सीटों में गिनती के वोट ही हासिल हुए हैं। अधिकतम सीटों पर तो इस वैकल्पिक राजनीतिक दल से अधिक मत बस्तर के मतदाताओं नें “नोटा” को दिया है। वामदल एकता के साथ भी नहीं लडे यहाँ तक कि जगदलपुर में तो सीपीआई और सीपीआई (एम-एल) एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड रही थी और दोनो को मिलाकर भी गिनती के वोट (3321) मिले। वाम दलों को न्यूनतम 655 मत (जगदलपुर में शंभु प्रसाद सोनी) तो अधिकतम 19384 मत (कोण्टा में मनीष कुंजाम) को प्राप्त हुए जो इस दल की क्षेत्र में बेहद पतली हालत का प्रदर्शन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वामपंथ अब बस्तर में कोई जमीनी हैसियत नहीं रखता। 

-राजीव रंजन प्रसाद

बस्तर में वामपंथ की कोई जमीन है भी?

बस्तर पर सर्वाधिक चर्चा वामपंथी ही करते हैं। माओवाद की आलोचना करने पर सबसे तल्ख प्रतिवाद वामपंथियों से ही प्राप्त होता है। बस्तर क्षेत्र में इस बार हुए चुनाव यह तो स्पष्ट कर रहे हैं कि माओवाद अपनी जमीन खो चुका और अधिकाधिक मतदाताओं ने बाहर आ कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। अब उस वामपंथ पर बात की जाये जिसने बैलेट से अपना शक्तिप्रदर्शन किया है। चुनावों से पहले ही कोण्टा, दंतेवाडा और बीजापुर सीट पर वामपंथी उम्मीदवारों के विजय की भविष्य़वाणी अनेको अतिउत्साही वाम-विचारधारापरक पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों में की जा रही थीं। यह समझने के लिये मैने स्थानीय पत्रकार दोस्तों से लगातार यह जानने की कोशिश की कि विशेषरूप से दक्षिण बस्तर में वामपंथी दल किन मुद्दों के साथ बाहर आये हैं, उनकी घोषणायें क्या हैं, तथा चुनावस प्रचार में अपनी बात किस तरह रख रहे हैं। अधिकतर जानकारियाँ यही प्रतीत हुईं कि कोण्टा में मनीष कुंजाम अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे हैं लेकिन सभी जगह वामदल अपनी दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। 

चुनाव परिणाम वामदलों के दिवास्वप्नों पर कुठाराघात था। यह ठीक है कि पूरा चुनाव ही दो बडी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच का हो गया था लेकिन वामदल तो हमेशा ही अपनी उपस्थिति और प्रभाव का बस्तर में दावा करते रहे हैं। आज यह सवाल उठता ही है कि पिछले पाँच सालों में वाम दलों ने कितनी बार जमीनी मुद्दों को सडक तक लाने का श्रम किया? मनीष कुंजाम भी चार साल की गुमनामी बिता कर एकाएक चुनाव के समय सक्रिय हुए। यह बस्तर हो या दिल्ली जमीन पर अपनी ठोस उपस्थिति दिखाये बिना आप एक सीट पर भी अपनी जीत का दावा नहीं रख सकते। बस्तर वाम दलों ने खुल कर कभी वाम चरमपंथ का विरोध भी नहीं किया तथा स्पष्ट रूप से उनसे अपनी दूरी भी दिखाने मे वे नाकामयाब रहे हैं। जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण किया गया था तब मनीष कुंजाम का माओवादियों द्वारा नाम मध्यस्त के रूप में आगे किया जाना उनके खिलाफ ही गया लगता है। वामपंथी दल बस्तर की बारह में से नौं सीटों पर लडे और उन्हें तीसरे से ले कर दसवे स्थान तक की प्राप्ति हुई और वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं थे। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सडक पर भी अपनी ठोस उपस्थिति नहीं दर्ज कराई बल्कि उनके जमीनी प्रचार से अधिक हवाई प्रचार तो बेवपोर्टल और फेसबुक पर सक्रिय वामपंथी करते दिखे। 

तो बस्तर में जमीनी वामपंथ की क्या हैसियत है इसपर बात करने के लिये नतीजों पर एक दृष्टि डालते है। कोंटा में कवासी लकमा फिर एक बार अपनी सीट समुचित बहुमत से निकाल ले गये जबकि दूसरा स्थान भाजपा को मिला है। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे वामपंथी इस बार पुन: मनीष कुंजाम के नेतृत्व में थे किंतु तीसरे स्थान पर खिसक गये और हार भी लगभग आठ हजार मतो से हुई है। दंतेवाडा (12954) और चित्रकोट (11099) छोड कर वामदलों को अन्य सभी सीटों में गिनती के वोट ही हासिल हुए हैं। अधिकतम सीटों पर तो इस वैकल्पिक राजनीतिक दल से अधिक मत बस्तर के मतदाताओं नें “नोटा” को दिया है। वामदल एकता के साथ भी नहीं लडे यहाँ तक कि जगदलपुर में तो सीपीआई और सीपीआई (एम-एल) एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड रही थी और दोनो को मिलाकर भी गिनती के वोट (3321) मिले। वाम दलों को न्यूनतम 655 मत (जगदलपुर में शंभु प्रसाद सोनी) तो अधिकतम 19384 मत (कोण्टा में मनीष कुंजाम) को प्राप्त हुए जो इस दल की क्षेत्र में बेहद पतली हालत का प्रदर्शन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वामपंथ अब बस्तर में कोई जमीनी हैसियत नहीं रखता।

-राजीव रंजन प्रसाद 

नोटा ने कईयों के अरमानो को लूटा – संदर्भ बस्तर

बहुत हद तक यह लग रहा था कि बस्तर इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिये विपरीत परिणाम देने वसला है। जानकारों ने कोंटा और दंतेवाड़ा पर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के पक्ष में अपने अनुमान (एग्जिट पोल) व्यक्त किये थे जबकि यह माना जा रहा था कि सात सीट कॉग्रेस को, तीन भाजपा और दो कम्युनिष्ट पार्टियों को मिलेंगे। परिणाम चार सीट भाजपा तथा आठ कॉग्रेस के पक्ष मे था। वामपंथी प्रत्याशियों की करारी हार यह बताती है कि बंदूख के साये से यदि वे बाहर न आये तो उनकी जमीनी लडाईयाँ भी असरकारक नहीं होंगी। सभी विश्लेषकों ने महेन्द्र कर्मा फैक्टर को बहुत हल्के में लिया और देवती कर्मा को कम कर के आंका गया। यह स्पष्ट है कि बस्तर में महेन्द्र कर्मा के प्रति सहानुभूति थी दंतेवाड़ा विधाससभा सीट पर 77% मतदान के रूप में आदिवासियों ने अभिव्यक्त भी कर दी। यह इतना बड़ा मतप्रतिशत है जितना कि देश के सभ्यतम माने जाने वाले क्षेत्रों में वोट भी नहीं पड़ते।

आज बात करते हैं नोटा पर। पूरे छत्तीसगढ में 3% लोगों ने नोटा का बटन दबाया और किसी भी पार्टी के पक्ष में मतदान नहीं किया। यह इतना बड़ा वोटों का हिस्सा था जिसने निश्चित ही कहीं कॉग्रेस का गणित बिगाड़ा तो कहीं भाजपा का। आश्चर्य की बात यह कि देर शाम तक नोटा के जो आंकडे बस्तर की बारह सीटों में सामने आये वह बताते हैं कि यह दोनो ही राजनीतिक पार्टियों के लिये खतरे की घंटी है और बहुतायत आदिवासी जनता ने लोकतंत्र पर तो भरोसा दिखाया किंतु प्रत्याशियों को नकार दिया। यदि नोटा मे पडे मत प्रत्याशियों के साथ जुडे होते तो परिणामों में और भी उठापटक देखी जा सकती थी। कांकेर (5208 मत), कोण्डागाँव (6773 मत), भानुप्रतापपुर (5680 मत), केशकाल (8381 मत), नारायणपुर (6731 मत), जगदलपुर (3469 मत), चित्रकोट (10848 मत), अंतागढ (4710 मत), बस्तर (5529 मत), दंतेवाडा (9677 मत), कोण्टा (4001 मत), बीजापुर (7179 मत) में नोटा का बटन बहुत अच्छी मात्रा में दबाया गया। इसका अर्थ यह है कि बस्तर में नोटा के लिये न्यूनतम 3469 मत (जगदलपुर) से ले कर अधिकतम 10848 मत (चित्रकोट) प्राप्त हुए। मतप्रतिशत के हिसाब से अधिकतम बीजापुर मे 10.15% मतदाताओं ने अपने 7179% मतो का प्रयोग नोटा के रूप में किया। अनेक प्रत्याशियों की जीत का अंतर भी नोटा में पडे मतों से कम था (नोट: अंतिम आंकडे अभी विश्लेषित किये जाने हैं।)। नोटा यह बताता है कि बस्तर का जागरूक मतदाता यह जानता है कि उसे किसको वोट देना है और अगर किसी को भी नहीं देना तो भी लोकतंत्र को बचाने का अपना दायित्व उसने निर्वहन किया है; इस तरह प्रत्याशियों से नाराजगी भी दिखाई गयी और नक्सलियों को अंगूठा भी।

-राजीव रंजन प्रसाद 


Saturday, December 07, 2013

“बस्तर से विलुप्त होती उसकी पहचान – तूम्बा”


यह प्रश्न अब प्रासंगिक है कि क्या तूम्बा बस्तर में अप्रासंगिक होता जा रहा है? तूम्बा और बस्तरिया आदिवासी बहुत लम्बे समय से एक दूसरे की पहचान सदृश्य हैं। एक समय लगभग हर आदिवासी कंधे की शान हुआ करता था तूम्बा। संदर्भ पर विस्तार से बात की जाये इससे पहले यह बताना आवश्यक है कि तूम्बा है क्या और यह किस तरह निर्मित होता है?

लौकी के फल से तूम्बे का निर्माण किया जाता है। प्राय: लौकी के पुराने अथवा बुढ़ा गये फल ही तूम्बा निर्माण के लिये चुने जाते हैं। आवश्यकतानुसार समुचित आकार और प्रकार का फल तोड़ कर सर्वप्रथम उसका शीर्ष भाग काट कर निकाल लिया जाता है। अब इसी काटे गये हिस्से की ओर से बहुत सावधानी पूर्वक लौकी के भीतरी अंश को किसी नुकीली वस्तु से धीरे धीरे निकाल कर खोखला बनाया जाता है। खोखला हो जाने के पश्चात भीतर पानी भर कर इस खोल अथवा ढांचा मात्र रह गये लौकी के फल को किसी कोने में यूं ही छोड दिया जाता है। स्वाभाविक है कि अगले आठ दस दिनों मे भीतरी भाग पूरी तरह सड़ जायेगा जिससे भीतर जो कुछ भी अंश है उसे आसानी से बाहर निकाला जा सकेगा। अब सड़े हुए अंश को सावधानी पूर्वक निकालने के पश्चात लौकी के फल का केवल एक आवरण भर रह जाता है जिसे भली भांति सुखा कर ठोस बना लिया जाता है। ठोस हो जाने के पश्चात तूम्बा अपने आप में एक मजबूत संरचना होती है जो किसी बर्तन, घट अथवा पात्र का विकल्प बन सकती है। इस तरह तैयार होता है एक तूम्बा जो वस्तुत: आदिवासियों का वाटरबोटल, सल्फीहोल्डर, पेज कैरियर आदि आदि का काम बखूबी करता है। तरह तरह की वस्तुवों को संरक्षित रखने योग्य भांति भांति के आकार वाले पात्र यहाँ तक कि छिंदरस या शराब परोसने के लिये ओरकी (चम्मच) बनाना भी तूम्बे से किया जाता है। अब पेड़ से सल्फी, छींद या ताड़ का रस उतारना हो तो भी तूम्बा ही आदिवासी समाज का प्रमुख सहयोगी है।

किसी वस्तु की समाज में उपादेयता जानने का पैमाना है कि क्या मिथक कथाओं और लोकगीतों में भी उसका उल्लेख मिलता है? तूम्बा आपको हर कहीं मिलेगा यहाँ तक कि मुहावरों और पहेलियों में भी। एक गोंडी मिथक कथा तो तूम्बे को संसार की उत्पत्ति के साथ जोड़ती है क्योंकि एसा मानना है कि जब कुछ भी कहीं नहीं था तब भी तूम्बा था। बस्तर का पालनार गाँव ही वह स्थल है जहाँ से धरती के उत्पन्न होने की आदिवासी संकल्पना जुडती है। गोंडी मिथक कथा मानती है कि सर्वत्र पानी ही पानी था बस एक तूम्बा पानी के उपर तैर रहा था। इस तूम्बे में गोंडों का आदिपुरुष, डड्डे बुरका कवासी, अपनी पत्नी के साथ बैठा हुआ था। तभी कहीं से भीमादेव अर्थात कृषि का देवता प्रकट हुआ और हल चलाने लगा। जहाँ जहाँ वह नागर (हल) चलाता धरती प्रकट होने लगती। जब दुनिया की आवश्यकता जितनी धरती बन गयी तब भीमादेव ने हल चलाना बंद कर दिया। अब उसने पहली बार धरती पर अनाज, पेड-पौधे, लता-फूल, जड़ी -बूटियाँ, घास-फूस उगा दिये। जहाँ जहाँ मिट्टी हल चलाने से खूब उपर उठ गयी थी, वहाँ पहाड़ बन गये। इसके बाद डड्डे बुरका कवासी ने धरती पर अपनी गृहस्थी चलाई। उसको दस लड़के और दस लडकियाँ हुईं। आपस में उनकी शादियाँ कर दी गयी। इस तरह दस गोत्र – मडकामी, मिडियामी, माडवी, मुचाकी, कवासी, कुंजामी, कच्चिन, चिच्चोंड, लेकामी और पुन्नेम बन गये। इन्ही गोत्रों में किसी के पेट से बकरा तो किसी के उल्लू तो किसी के साँप आदि पैदा हुए। इसी तरह पूरी सृष्टि बन गयी। ‘डड्डे बुरका कवासी’ ने अपने बेटों को आदेशित कर दिया कि एक ही गोत्र में विवाह वर्जित है।“ यह कथा वस्तुत: आज आदिवासी समाज के विस्तार को समझने का बहुत ही उपयुक्त माध्यम है किन्तु यह समझना भी आवश्यक है कि तूम्बा इस सृष्टि उत्पत्ति कथा के केन्द्र में है। यही कारण है कि आदिवासी समाज बहुत आदर और सम्मान के साथ तूम्बे को अपने साथ रखता है। एक भतरी कहावत है कि ‘तूम्बा गेला फूटी, देवा गेला उठी’ अर्थात तूम्बा का फूटना एक अपशकुन है।“

तूम्बा केवल दैनिक उपयोग की वस्तु नहीं है। इसे आदिवासी समाज ने अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनाया है। प्राय: मंद या सल्फी के सुरूर में थिरकने वाले कदमों के बाद भी आदिववासी अपने कंधे पर एक लकडी जिससे लटकता हुआ तूम्बा थामे मिलेंगे। ये तूम्बे किसी तैलीय पदार्थ लेपन के कारण चमकते हुए अथवा किसी भित्तिचित्र के उसपर उकेरे जाने के कारण सुन्दर दीख पडते हैं। तूम्बे पर उकेरे जाने वाले भित्तिचित्रों में आदिवासी जीवन, भांति भांति की मानवआकृतियाँ जिसमे गौर सींग माडिया और तिरहुड्डी बजाती नृत्यांगनायें, पेड-पौधे, पशु पक्षी आदि प्रमुख हैं। कई आदिवासी तो तूम्बे को सुरक्षा और सुन्दरता प्रदान करने के लिये उसे गुथी हुई रस्सी से पूरी तरह गाथ देते हैं। इतना ही नहीं अंचल के कई वाद्य हैं जैसे किंदरी, तोहेली, डुमिर, रामबाजा....इन सभी में तूम्बे का घट लगा होता है। घोटुल मुरिया तो अपने कई नृत्यों में तूम्बों से भयानक मुखौटे भी बना कर प्रयोग में लाते हैं। तूम्बे से बने मुखौटों का यदि आज भी भव्य प्रदर्शन देखना है तो माँ दंतेश्वरी के सम्मान मे दंतेवाड़ा में प्रतिवर्ष लगने वाली फागुन मड़ई में इसे देखा जा सकता है। फागुन मडई में आदिवासी गँवर, चीतल, कोड़री, खरगोश जैसे जानवरों का स्वांग रच कर नृत्य करते हैं जिसके लिये तूम्बे से बने मुखौटों का प्रयोग किया जाता है।

बदलाव अवश्यम्भावी हैं किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि किसी संस्कृति को अपनी पहचान से ही हाथ धो बैठना पड़े। यह होगा कि बाजार धीरे धीरे बस्तर को अपने आगोश में जकड़ लेगा। देखते ही देखते लकडी की पड़िया के स्थान पर प्लास्टिंक की कंघिया आ गयीं बिलकुल उसी तर्ज में मिनरल वाटर की खाली बोतलों ने तूम्बे का स्थान लेना आरंभ कर दिया है। प्रयोग करो और फेंको की बाजार प्रदत्त सुविधा ने आदिवासियों को जाने-अनजाने ही तूम्बों से दूर कर दिया है। पहले जहाँ तूम्बा हर कंधे की शोभा बढाता था अब दसियों मे से किसी एक के पास आपको नजर आयेगा; यहाँ तक कि मेले मड़ईयों में भी बहुत तलाश के बाद ही दृष्टिगोचर होता है। हालात यह हैं कि अब इसके संरक्षण की आवश्यकता महसूस होने लगी है। यह सामाजिकता का स्वाभाविक नियम है कि जो वस्तु चलन मे नहीं रहती वह विलुप्त होने लगती है। बस्तर की कितनी ही दुर्लभ वस्तुवे, प्रथायें और रिवाज अब अस्तित्व में नहीं हैं, क्या यही हश्र तूम्बे का भी होने जा रहा है? क्या तूम्बे को कलात्मक वस्तुओं की श्रेणी मे सम्मिलित कर संरक्षित नहीं किया जा सकता? क्या तूम्बे को पेनस्टेंड बना कर स्ट्डी रूम में, चम्मच आदि रखने के लिय किचन में अथवा भित्तिचित्रों से सुसज्जित कर ड्राईंगरूमों में जगह नहीं दी जा सकती? बाजार जिसे छीन रहा है उसे ही आज बाजार मिल जाये तो क्या संरक्षण को नयी दिशा नहीं मिलेगी? बस्तर में शिक्षित आदिवासी अब लगातार बढ रहे हैं और आवश्यकता यह भी है कि वे अपनी संस्कृति का मोल समझें और स्वयं इसके संरक्षण के लिये आगे आयें। तूम्बे के बिना बस्तर अर्थात जल बिन मछली की कल्पना करना है।

- राजीव रंजन प्रसाद
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Thursday, December 05, 2013

बस्तर में जीवन और कला के सहचर हैं घाँस और पत्ते


साधारण तत्वों की असाधारण प्रस्तुति को कला कहते है। कलात्मकता लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है जिसे मिट्टी से ले कर पत्थर तक और पेड की छाल से ले कर घाँस-पत्तों तक के दैनिक प्रयोग मे देखा जा सकता है। कला और आदिवासी समाज का इतना गहन सम्बन्ध है कि आप घास-पात में भी कल्पनातत्वों की उडान देख सकते हैं और दैनिक आवश्यकताओं के अनुरूप उनके प्रयोग का तरीका अचरज में डालता है। पत्ते दैनिक आवश्यकता हैं और साल वनो के द्वीप में सर्वत्र उपलब्ध हैं। इनका भोजन-पेय अथवा पदार्थों के संरक्षण के लिये प्रयोग होता ही है, पहनावे और सजावटी वस्तुओं में भी पत्तो का समुचित उपयोग देखा गया है। पत्ते श्रंगार की वस्तु भी हैं, वे कभी जूडों-खोंपों में खोंसे हुए नजर आ सकते हैं, कभी आभूषण या परिधान बने गले अथवा कमर में लटके देखे जा सकते हैं; खैर अथवा छींद की पत्तियाँ चबा कर युवतियाँ अपने होठों का श्रंगार भी करती हैं तथा उन्हें रंग प्रदान करती हैं। यही नहीं पत्ते लोक-चिकित्सा का हिस्सा भी हैं और औषधि भी। पतों पर कई लोककथायें हैं, ये लोकगीतों में बसे हैं कहावतों और पहेलियों में छिपे हैं। 

पहेलियाँ न बुझाते हुए घास-पत्तों की कलात्मक प्रस्तुतियों पर आते हैं। आवश्यकता आविष्कार को जन्म देती है; पत्तों के विभिन्न प्रयोग यही चरितार्थ करते हैं। बडे आकार अथवा विशिष्ठ आकार के पत्ते आदिवासियों की प्रमुख उपादेयता होते हैं और इसमें सियाड़ी के पत्तों की मुख्य भूमिका मानी जा सकती है। बस्तर में जिन पत्तों को उपयोगी माना जाता है उनमे सियाड़ी के अलावा सरगी, फरसा (पलाश), तेदू, आम इत्यादि प्रमुख हैं। इन्ही पत्तों की बदौलत बस्तर में यह कहानी गर्व से सुनाई जाती है कि प्रकृति ने आदिवासी को इतनी समृद्धि दी है कि वह नित्य नये बर्तन में खाता है; सही भी है, पत्तल और दोने ही आदिवासियों का थाली-ग्लास-कटोरा हैं। बांस की सींक इन पत्तों को जोडने का माध्यम बनती है और फिर सियाड़ी, सरगी या फरसा के पत्ते इस तरह गूंथ दिये जाते हैं कि वे पत्तल और दोनों का आकार ले लेते हैं।  

बस्तर में सरगी, पलाश, सियाड़ी, आम और तेन्दू के पत्ते विशेष उपयोगी प्रमाणित होते आ रहे हैं। तेन्दू पत्तों ने व्यवसाय और मजदूरी को अधिक प्रभावित किया है। सरगी, सियाड़ी और फरसा (पलाश) के पत्ते ग्रामीण जीवन में सर्वोपरि माने जाते रहे हैं इनसे पत्तल और दोने बनाये जाते हैं, इन्हें बांस की सींकों से सीते हैं। पत्तलों और दोनों के लिये फरसा और महुआ पत्तों का उपयोग कभी कभार ही होता है, अधिकतम सरगी और सियाड़ी के पत्तों से ही दोने साकार होते आ रहे हैं। सरगी की तुलना में सियाड़ी के पत्तों की उपयोगिता अधिक व्याप्त है। सियाड़ी के पत्ते बहुआयामी सृजन को आधार देते रहे हैं। इसी तरह तेन्दू पत्ता बीडी व्यवसाय के लिये कच्चा माल है और इसीलिये लम्बे समय से बस्तर में यह राजनीति के केन्द्र मे भी रहा है। माओवादियों ने बस्तर मे पैर जमाने के लिये जिस मुद्दे को अपनी घुसपैठ के आरंभिक दिनो में उठाया था वह तेन्दूपत्ता के संग्रहण और उसके मूल्य पर नियंत्रण के लिये ही था, वर्तमान में तेन्दूपत्ता संकलन और विक्रय पर सरकारी नीति उपलब्ध है।

आप दोना-पत्तल को बहुत सहजता से नहीं ले सकते। उपयोगिता के अनुसार दोनों और पत्तलों के कई आकार-प्रकार उपलब्ध हैं। भात रखने के लिये बडे आकार का दोना चाहिये जिसे डोबला या खोलडा भी कहा जाता है; सरगी अथवा सियाड़ी के बीस-पच्चीस पत्ते लगते हैं एक खोलडा बनाने के लिये जो अंतत: बांस की सीकियों से गुथ कर एक बडे पात्र का आकार ले लेता है। अगला प्रकार है मूंडी दोने; संरचना में इन मूंडी दोनों में बायें-दायें कुल चार मोड आते हैं और देखने पर किसी डोंगी या नाव की अनुभूति होती है। छोटे आकार की मूंडी को आमतौर पर पेज पीने में खूब प्रयोग में लाया जाता है; पेज पीने के उद्देश्य से ही दोनो का एक अन्य प्रकार है पुतकी जबकि चौकोनी तो नाम से ही स्पष्ट है कि इन प्रकार के दोनों में चार कोने होते हैं। शराब पीने के लिये जिन दोनों का इस्तेमाल होता है उन्हें चिपडी कहा जाता है; देखने में चिपडी भी एक नाव की तरह ही होती है। यदि पत्तल की बात की जाये तो मूल रूप से इसे गोलाकार दिया जाता है जिसके लिये दस बारह सरगी अथवा सियाड़ी के पत्तों को करीने से बिछा कर बांस की सींक से सिला जाता है। केवल उपयोगिता ही नहीं अपितु दोना-पत्तल आदिवासी प्रथाओं का भी हिस्सा हैं। पतरी उलटना वस्तुत: एसी ही प्रथा है जिसमे कि हलबा जनजाति के वर-वधु को पत्तल उलट कर उस पर बिठाया जाता है। पनारा जाति के लोग छींद के कोमल पत्तों का कलात्मक उपयोग दूल्हे और दुल्हन के विवाह-मौड बनाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। वैसे ‘दोनों’ की रोचक उपादेयता जाननी हो तो कभी लाल-चींटी को एकत्रित करने की विधि को ध्यान देखिये जिसकी की चटनी बस्तर में खूब प्रचलित है। हाट-मडई में कतारों से सजे वनोत्पादों को थामने वाले दोना-पत्तल आज भी एक आम दृश्य हैं।            

कई दैनिक उपयोग के उत्पादों में पत्तों का स्वाभाविक रूप से उपयोग होता है उदाहरण के लिये धूप और छाया से बचने के लिये सिर पर पहनी जाने वाली छतूडी यद्यपि बाँस से बनायी जाती है किंतु इसमे छिद्र भरने का कार्य मुख्य रूप से सियाड़ी के पत्ते करते हैं। इन दिनो ‘सनहा’ का प्रयोग देखने में नहीं मिलता जबकि सियाड़ी के पत्तों से निर्मित एक समय यह प्रचलित रेनकोट हुआ करता था। बरसात में एक आदिवासी के सिर से पाँव तक का आवरण होता था सनहा और छतूडी। चिपटा भी अब चलन से बाहर हो गया है; सियाड़ी के पत्तों और सियाड़ी की ही रस्सी से चिपटा बनाया जाता था जिसने भीतर विभिन्न खाद्य उत्पाद खास कर अरहर, मूंग, उडद, सरसो आदि सुरक्षित रखे जाते थे। बाजार के आदिवासी घरों के भीतर तक पैठ होने के बाद ये प्राकृतिक पहनावे तथा संग्राहक अब चलन से दूर हो गये हैं। 

चर्चा पत्तों पर है तो घांस की लोकजीवन मे उपादेयता और उसकी कलात्मकता पर चर्चा के बिना बात अधूरी रह जायेगी। दक्षिण बस्तर विशेषकर भैरमगढ, भोपालपट्टनम, बीजापुर आदि क्षेत्रों में बोथा घास बहुतायत में पायी जाती हैं इस घास से चटाई अथवा मसनी तैयार की जाती है जो अपनी मजबूती के लिये जानी जाती हैं। चटाई के अलावा ऊसरी जैसी घास या कि धान के पुआल से रस्सी बनाने का काम भी आदिवासी समाज का कुटीर उद्योग है। पुआल से बनाई गयी रस्सी को बेठ कहते हैं। इस बेठ का कलात्मक उपयोग देखिये कि इसे ही गोल गोल घुमा कर धान आदि के संग्रहण के लिये कोठा तैयार कर लिया जाता है जिसे ‘पुटका’ कहा जाता है।

घास-पात की उपादेयता को आदिवासी सामाजिकता में भी खूब देखा-समझा जा सकता है। बस्तरिया जीवन में तम्बाकू देना परस्पर सौहार्द और प्रेम का प्रतीक माना गया है। एक दूसरे का मन जीतने के लिये धुंगिया दिया जाना आम बात है किसके लिये प्राय: पत्ते की चोंगी बनाई जाती है जिसके भीतर तम्बाकू भरा जाता है। ये चोंगी मुख्य रूप से सरगी या तेन्दू के पत्तों की ही बनाई जाती है। समग्र रूप से देखा जाये तो जन्म से ले कर अवसान तक, पर्व से ले कर प्रार्थना तक और दैनिक उपयोग से ले कर बाजार तक घास-पात बस्तरिया जीवन के सहचर हैं।  

 -राजीव रंजन प्रसाद 
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