
पहाडों के आगे
बैठा हुआ मैं सोचता हूँ
अगर तुम्हारा गम न रहा होता
तो आज
कितना बौना पाता मैं अपनें आप को
और अब देखता हूँ
इतना सख्त भी नहीं पहाड
जितना मेरा दिल हो गया है..
*** राजीव रंजन प्रसाद
नमन बस्तर की माटी को जहाँ नदियों, पहाडों, पंछी और आदिम यारों की यारी नें जो कलम थमायी कि फिर रुकी ही नहीं....

पहाडों के आगे
बैठा हुआ मैं सोचता हूँ
अगर तुम्हारा गम न रहा होता
तो आज
कितना बौना पाता मैं अपनें आप को
और अब देखता हूँ
इतना सख्त भी नहीं पहाड
जितना मेरा दिल हो गया है..
*** राजीव रंजन प्रसाद
2 comments:
सचमुच...सही अभिव्यक्ति
बहुत जबरदस्त!!
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