Wednesday, August 20, 2008

गुनगुनाते हुए कुछ ही पल..



धूप भरी ज़िन्दगी में
निर्झर में पैर डाले
गुनगुनाते हुए कुछ ही पल
एसे नहीं हैं क्या
जैसे भूले हुए लम्हों में
बीती हुई बातों की चीरफाड
और छोटी छोटी बातों पर घंटों की उलझन
जैसे आपस में गुथे हुए हम...

फिर फिर याद आओगे आप हमें
स्मृतियों में महकेंगे ये पल
और डूब डूब जायेंगे हम
हल्के से मुस्कायेंगे
जैसे कि डूबी शाम में
दूर कहीं बज उठी "जगजीत" की गज़ल..

*** राजीव रंजन प्रसाद
२७.११.१९९५

9 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुन्दर लगी आपकी यह रचना

rakhshanda said...

फिर फिर याद आओगे आप हमें
स्मृतियों में महकेंगे ये पल
और डूब डूब जायेंगे हम
हल्के से मुस्कायेंगे
जैसे कि डूबी शाम में
दूर कहीं बज उठी "जगजीत" की गज़ल..

bahut sundar

Advocate Rashmi saurana said...

very very nice poem.

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

हम तो आपकी रचना के दीवाने हो गये!

राकेश जैन said...

सुन्दर रचना

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत सुन्दर.बहुत उम्दा,बधाई.

pallavi trivedi said...

फिर फिर याद आओगे आप हमें
स्मृतियों में महकेंगे ये पल
और डूब डूब जायेंगे हम
हल्के से मुस्कायेंगे
जैसे कि डूबी शाम में
दूर कहीं बज उठी "जगजीत" की गज़ल..

waah...bahut khoob.

Nitish Raj said...

वाह बहुत खूब तस्वीर भी इन शब्दों की तरह ही...

vipinkizindagi said...

बहुत मजेदार.... बहुत सुन्दर ..........