Tuesday, August 05, 2008

आ कर कहीं से तुम तभी...


आप तो जाते रहे

फिर नींद भी जाती रही

आसमां की चांदनी

हमको जलाती भी रही


वो एक ख्वाब जो आँखें खुले

देखा किये हम रात भर

जलती रही अपनी चिता

जैसे जला करते अभी

जब बुझ गये बस राख थे

आ कर कहीं से तुम तभी

ले चुटकियों में राख

माथे पर सजा ली

फिर जी गये हम


पलक झपकी

रात काली...


*** राजीव रंजन प्रसाद

६.११.२०००

7 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वो एक ख्वाब जो आँखें खुले

देखा किये हम रात भर


बहुत खूब राजीव् जी

Anil Pusadkar said...

aap to jaate rahe,phir neend bhi jaati rahi.... kya kehne Rajeev bhai

vipinkizindagi said...

वो एक ख्वाब जो आँखें खुले
देखा किये हम रात भर.....


achchi likhi hai....

Parul said...

bahut badhiyaa

vineeta said...

बहुत खूबसूरत, बार बार पढने लायक

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत सुन्दर.बहुत बधाई.

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर कविता।
घुघूती बासूती