Saturday, September 13, 2014

एक अनकही कहानी है एर्राबोर

सुकमा से कोण्टा की ओर आगे बढते हुए यह अहसास रह ही नहीं गया था कि कभी यहाँ से हो कर सड़क भी गुजरती रही होगी। बड़े बड़े गड्ढों में सडक तलाशते हुए कोण्टा तक पहुँचने के एक मात्र रास्ते से हो कर गुजरना किसी प्रकृति प्रेमी के लिये सु:खद है, किसी जीव वैज्ञानिक के लिये रोमांचकारी, किसी इतिहासकार के लिये खोजपूर्ण तो किसी लेखक, पत्रकार के लिये अविस्मरणीय अनुभव। इस रास्ते से गुजरने की बचपन की कुछ यादे आज भी हैं मेरे पास लेकिन वर्तमान से उसकी कोई तुलना नहीं। देखते ही देखते कितना बदल गया बस्तर? जैसे सांस लेना भूल गया हो, जैसे रंग उड़ गये हों या कि कोई मधुर गीत गीत अब किसी बेसुरे साज पर बजने लगा हो। 

एक दौर था जब पहाडियाँ और गाँव अपने सौन्दर्य, देवी-देवता अथवा लोक-जीवन के लिये पहचाने जाते थे लेकिन आज वे दहशत का पर्याय हैं..........आप नाम ले कर देखिये चिंतलनार, श्यामगिरि, ताडमेटला, दरभाघाटी या कि एर्राबोर। इन स्थलों से अतीत के अनेक गौरवशाली जनसंघर्ष भी जुडे हुए हैं लेकिन उन्हें कौन याद रखना चाहता है आज? जहाँ से गुजर जाईये बस मौत ही मौत की आहट कि यहाँ ग्यारह मारे गये थे, यहाँ तैतीस बारूदी सुरंग में उडा दिये गये तो यहाँ एम्बूश लगा कर चार उडा दिये गये, यहाँ गाँव जला दिये गये थे, यहाँ गला रेत दिया गया था....उफ!!!

एर्राबोर क्या महज एक गाँव है? क्या एर्राबोर एक प्रतीक नहीं बन गया है लाल-आतंकवाद और सलवाजुडुम के खूनी धमाकों और आपसी रक्तपिपासाओं का? एर्राबोर पहुँच कर मैं ठिठक गया हूँ, स्तब्ध रह गया हूँ। वीरानी से स्वागत और कुछ देर बाद अविश्वास भरी अनेक निगाहों से सामना। ताड़ के पेडों की लम्बी लम्बी कतारें क्यों खूबसूरत नहीं लग रही हैं मुझे? यह केवल टूटी फूटी सडकों से गुजर कर यहाँ तक पहुँचने की थकान भर नहीं है, यह मेरे भीतर की संवेदनशीलता है शायद, जिसे इन जंगलों के भीतर हुई घटनायें इस समय दर्द भरी चिकोटियाँ काट रही हैं। सुकमा से एर्राबोर तक रास्ते भर हर किलोमीटर पर सीआरपीएफ के जवान सर्च करते हुए मिले। सडकें सुरक्षित नहीं हैं, जंगल की हर सरसराहट अब किसी हिरण या भालू होने की संभावना नहीं बताती बल्कि निश्चित करती है कि नक्सली होंगे या सेना के जवान। आम आदिवासी की स्थिति युद्धरत बस्तर में कहाँ है और कैसी है, यह सवाल अब अधिक महत्व का हो चला है। 

एर्राबोर पहली बार तब सुर्खियों में आया जब सत्रह जुलाई वर्ष-2006 की रात, एक बडा नक्सली हमला यहाँ अवस्थित सलवा जुडुम कैम्प में किया गया था। सलवा जुडुम के प्रारम्भ होने के पश्चात से यह नक्सलियों द्वारा प्रतिवाद किये जाने की प्रारम्भिक लेकिन दुर्दांत घटना थी। लगभग पाँच सौ झोपडियों को आग लगा दी गयी, सैंतीस आदिवासी मारे गये और कई तो जीवित ही स्वाहा हो गये थे जिसमें छ: साल की बच्ची से ले कर बुजुर्ग भी थे। इंटरनेट पर उपलब्ध नक्सलियों की त्रैमासिक पत्रिका “प्रभात” के जनवरी-मार्च 2007 के अंक में एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें लिखा है - “2006 जुलाई 19-17 की रात पीएलजीआई की अगुवाई में एक हजार ग्रामीण जनता ने एर्राबोर स्थित तथाकथित राहत शिविर पर हमला बोल दिया”। 

मैं आतंकवाद के परिप्रेक्ष्य में जनता शब्द के इस्तेमाल को सही नहीं मानता। आखिर जो मरे वे कौन थे? जो मार रहे थे वे कौन थे? और मारने के लिये उकसाने वाले कौन थे? जनता के इस तंत्र में अपनी बात सामने रखने का माध्यम जनता की हत्या हो तो क्या हम कहें कि लोकतंत्र की विफलता का यह दौर है? वस्तुत: विचारधारायें हत्यारी हो गयी हैं और वे अपने चेहरे पर जनता का मुखौटा लगा लेती हैं। प्रभात पत्रिका के इसी लेख में आगे लिखा गया है कि “एर्राबोर घटना में गलती से दो बच्चों और दो निर्दोष महिलाओं की हत्या होने पर हम पर कीचड उछालने वाले पुलिस प्रशासन क्या इस सवाल का जवाब देंगे कि किसके कहने पर मूक्कावेल्ली में डेढ साल के बच्चे के सिर पर नगा पुलिस ने गोली मारी थी।” सिहरन हो जाती है यह सब पढ कर कि किस संवेदनहीनता से बच्चों और महिलाओं की हत्या को जायज ठहराया जाता है फिर चाहे बंदूख किसी भी पक्ष की हो......।  
एर्राबोर ने पहली बार नक्सलवाद पर स्पष्ट रूप से आतंकवाद होने का लेबल बस्तर में चस्पा किया था। यह वह आरंभिक घटना थी जिसने बताया कि वह चाहे सलवा जुडुम की हो या कि माओवादी बंदूखें वस्तुत: आदिवासी के खिलाफ ही उठेंगी और एसी कोई सुबह नहीं आने वाली जो लाल सूरज ढकेल कर कभी भी ला सके। हमले लगातर जारी हैं और कभी सेना के जवान तो कभी नक्सली और बहुधा दोनो ओर की गोलीबारी में आम ग्रामीण मिटते जा रहे हैं। सलवा जुडुम जब तक जारी रहा तब तक विश्व मीडिया का ध्यान बस्तर के इस सुदूरतम कोने में बना हुआ था किंतु सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात से स्थितियों में आमूलचूक परिवर्तन आ गया। एसपीओ/ कोया कमाण्डो अब पुलिस सेवा का हिस्सा हो गये हैं, राहत शिविर अब लगभग बंद हो गये हैं तथा जिन्हें यहाँ रहने की मजबूरियाँ हैं वे राशन-पानी के लिये महरूम डर के साये में जीवन बिताने के लिये बाध्य दिखाई पड़ते हैं। 

शक्ति-साम्य वाली स्थितियाँ हटते ही सलवाजुडुम से जुडे कार्यकर्ता चुन चुन कर नक्सलियों द्वारा मारे जाने लगे। एसा ही भयावह हश्र कुछ ही समय पूर्व सलवा जुडुम के सक्रिय कार्यकर्ता और एर्राबोर के उपसरपंच सोयम मुका का हुआ जिसे कोण्टा से एराबोर लौटने के दौरान असीरगुडा के निकट पहले गोली मारी गयी फिर पीट पीट कर नक्सलियों ने मार डाला। इस घटना के कुछ दिनों बाद मैने कथित गाँधीवादी एक्टिविस्ट हिमांशु कुमार का जनज्वार वेबसाईट पर लेख पढा जिसमें उन्होंने लिखा था -  “.....नक्सलियों ने सोयम मुका को मार डाला। हांलाकि तो हम चाहते थे सोयम मुका को इस देश की अदालत दंड दे ताकि आदिवासियों की आस्था इस देश के कानून और व्यवस्था में और अधिक मज़बूत हो लेकिन अदालत और सरकार ने कानून को हरा दिया और नक्सलियों को जीता दिया। इससे अब आदिवासियों के मन में यह बात और मजबूती से बैठ गई होगी कि इस देश में उन्हें सिर्फ नक्सली ही न्याय दिला सकते हैं“। आतंकवाद के खुले समर्थन की ऐसी गाँधीवादी व्याख्या पढ कर मुझे एक्टिविज्म शब्द लिजलिजा प्रतीत होता है किंतु यही तो खूबसूरती है लोकतंत्र की जहाँ अपनी बात किसी भी तरह से कहने की सभी को स्वतंत्रता है। हाँ, यह एक कडुवी सच्चाई है कि जिस विदेशी मीडिया और कथित समाजसेवियों ने सलवा जुडुम और सरकार प्रायोजित आतंकवाद पर लम्बी लम्बी तकरीरें की, मानवाधिकार के बडे बडे संकेत चिन्ह गढे वही इनदिनों नक्सलियों द्वारा लगातार मारे जाने वाले सलवा जुडुम से जुडे आदिवासियों पर मुँह में लॉलीपॉप ठूस कर उनींदा पडा हुआ है। 

एर्राबोर का सुलगना अब बंद है। उसकी साँसें सीआरपीएफ के कैम्प ने रोक रखी हैं और पहचान बन बन गये हैं लाशों के स्मृति स्तम्भ। सड़क के दोनो ओर कतारबद्ध कोया कमांडो के स्मृति स्मारक। भले ही कोया कमाण्डो अतीत की बात हो गये लेकिन बस्तर की संस्कृति कुछ भी भूलने नहीं देती। पूरे बस्तर में पुरा पाषाण काल से आज तक के मृतक स्मृति अवशेष तलाशने पर आसानी से मिल जाते हैं जिन्हें स्थानीय मठ कह कर पुकारते हैं। कांकेर से कोण्टा तक मृतक स्मारकों के तरीकों में अनेक तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं लेकिन वे बनाये जाते हैं और इस तरह पीढियाँ अपने पूर्वजों से परिचित रहा करती हैं। लेकिन एर्राबोर में कैसी पीढियाँ और कौन सी स्मृतियाँ? जिनके हाथों में नक्सली बंदूखे हैं उनकी मौत पर अगर लाल स्मृति चिन्ह बनाया जाता है तो सेना के जवान उसे तहस नहस कर आते हैं और कोया कमाण्डो या कि कथित रूप से सलवा जुडुम से जुडे आदिवासियों के मृतक स्मारकों को नक्सली नहीं छोडते। हिसाब बराबर करने कराने के दौर में सडक के किनारे कतार बद्ध बंदूख थामें खडे रह गये कोया कमाण्डो और एसपीएफ आदि के मृतक स्मारक वस्तुत: बंदूख के साये में ही ज़िन्दा हैं।

तो प्रश्न यह है कि आदिवासी कौन है? जब कोई सुकारू, बुदरू या सोयम नक्सली हो जाता है तब आदिवासी रहता है और जब सलवा जुडुम की भीड में खडा दिखता है तो सत्ता का दला बन जाता है? सवाल यह है कि गुमराह कौन है वह जिसका हाट बाजार लुट गया, जिसके जीवन यापन का यही आसंरा बचा कि वह किसी न किसी ओर की बंदूख थाम ले या कि वे जिन्हें देश विदेश के बडे बडे अखबारों की स्याहियाँ नसीब हैं लेकिन दूर की नजर कमजोर है? सवाल यह भी है कि एराबोर का बचना किसके लिये जरूरी है जब यहाँ की बहुतायत आबादी का पता ठिकाना नामालूम हो चला है? एराबोर से थोडी ही आगे बढने पर बस्तर संभाग का आखिरी छोर कोण्टा पहुचा जा सकता है। कोण्टा से लग कर ही एक छोटा सा गाँव है मोटू जहाँ तीन नक्सलप्रभावित प्रदेशों की सीमायें मिलती है तेलांगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ। यह भूगोल भी एराबोर का दुर्भाग्य ही तो है। न जाने खामोशी का कितना पानी शबरी में बहता जायेगा और अनकहा ही रह जायेगा एर्राबोर? 

- राजीव रंजन प्रसाद 
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Wednesday, June 25, 2014

दिल्ली युनिवर्सिटी, जेएनयू और हू-तूतू


दिल्ली युनिवर्सिटी, जेएनयू और हू-तूतू
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एक नया समय सामने है। कोई आँटो चलाने वाले की लडकी चार्टर्ड एकाउंटेंसी की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ हो कर निकलती है तो किसी बस ड्राईवर का बच्चा भारतीय प्रशासनिक सेवा का देदीप्यमान सितारा बन जाता है। ये वे विद्यार्थी होते हैं जिन्होंने अपने माँ बाप के पेट की बोटियाँ काट कर और रोटियाँ छीन कर उन्हें अपनी पुस्तक बनाया है। उन्होंने दिल्ली युनिवर्सिटी के एडमिशन का कट ऑफ़ लिस्ट नहीं जाना है न ही वे जेएनयू की उच्च-फंतासीय बहसों में उलझते देखे गये हैं। ये एक अरब से अधिक की जनसंख्या वाले देश के लाख सवालाख क्रीमी लेयर वाले विद्यार्थियों का हिस्सा नहीं होते अपितु उन स्कूलों की लाजवाब प्रदर्शनियाँ हैं जिनकी दीवारों पर गोबर के उपले चिपके होते हैं और उन कॉलेजों के प्रतिफल हैं जिन्हे अपनी दीवारों तक को बचाने के लिये संघर्ष करते रहना होता है। 

ऐसे समय में दिल्ली युनिवर्सिटी में स्नातक के कोर्स को ले कर बडी मजेदार बहस जारी है। होनी भी चाहिये क्योंकि यह देश की राजधानी में खडी इमारत में चलने वाला संस्थान है और इसलिये यहाँ से पास होने की अहमियत बढ जाती है। यहाँ के विद्यार्थियों को किसी साक्षात्कार में धीमी आवाज में नहीं बोलना पडता कि श्रीमान मैं बस्तर युनिवर्सिटी का पास आउट हूँ या कि मणिपुर के किसी कॉलेज से पढ कर निकला हूँ। पढना तो छोडिये यहाँ नेतागिरी का भी अपना स्तर है। छात्रसंघ का चुनाव जीतने वाले, बडी बडी पार्टी के अध्यक्षों के साथ खडे हो कर अपने चौखटे पर फ्लैश चमकवाते हैं और फिर सीधे ही नेशनल पॉलिटिक्स का हिस्सा बन जाते हैं। इसीलिये अगर किसी छात्र ने अपने राज्य के स्कूल से पढ लिख कर अथवा येन-केन-प्रकारेण भी नब्बे प्रतिशत से अधिक अंक पा लिये हैं तो फिर उसका आगे पढने का ठिकाना दिल्ली ही होना चाहिये? अगर यही सही है तो फिर यह भी ठीक ही होगा कि डीयू-यूजीसी के बीच जारी अहं के टकराव का कोई सम्मानजनक रास्ता निकलते ही देश के शिक्षा बदहालता और नीतिगत अंधत्व से मुक्ति मिल जायेगी? 

मैं इस बात से कत्तई प्रभावित नहीं हूँ कि चार साल के कोर्स से चमत्कारिक परिणाम होने वाले हैं जैसा कि दावा है और इस बात से भी अनभिग्य नहीं हूँ कि तीन साल पढ कर हुए ज्यादातर स्नातक सफेद हाथियों की कतार में इजाफा ही करते हैं। ग्लोबल कंपिटेबिलटी का जहाँ तक प्रश्न है तो क्या इस परमसत्य का केवल दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रतिपादन भारत को चीन, जापान और अमेरिका के बराबर खडा कर देगा और टिम्बकटू का विद्यार्थी होनालुलु के छात्र से आँख मिला कर कहेगा “इंडिया हेज चेंज्ड”। हद दर्जे की दकियानूसियत यह है कि ऑटोनॉमी का मतलब कुछ कुतुबमीनार खडे करना मान लिया गया हैं जिसके लिये मैदानों में गड्ढे खोद कर वहाँ के मिट्टी-पत्थर तक उखाड दिये जायेंगे। 

अगर कन्याकुमारी का छात्र वही सब कुछ, उसी श्रेष्ठता के साथ अपने पाठ्यक्रम के माध्यम से नहीं पढता अथवा उन सुविधाओं का हकदार नही हैं जो दिल्ली युनिवर्सिटी को राजधानी होंने के विशेषाधिकार के कारण उपलब्ध है तो शिक्षा बजट की अधिकांश राशि के वास्तविक हकदार छोटे छोटे विश्वविद्यालय ही हैं जहाँ मन मार कर विद्यार्थी प्रवेश लेते हैं और बेमन से पढाने वाले प्राध्यापकों के हवाले कर दिये जाते हैं, प्राथमिकता से ये स्थितियाँ बदलनी चाहिये। वस्तुत: जो विश्वविद्यालय मठ बन चुके हैं उन्होंने संस्थानों के भीतर चमचम चांदनी तो बहुत बटोर ली है लेकिन चराग तले अंधेरा ही है। रही पढाई की बात तो पास होने की शर्त पर डिग्री देने वाले विश्वविद्यालय अपने छात्रों की अध्ययन प्रणाली की विवेचना कर के देख लें। साल भर छात्र का डब्बा गोल रहता है और परीक्षा का टाईमटेबल आने के बाद रात दिन एक कर दिया जाता है। सेम्पल-पेपर, गैसपेपर छापने वालों यहाँ तक कि पेपर सेट करने वाले अध्यापकों के भी अच्छे दिन आ जाते हैं; परीक्षा खत्म तो फिर गया छात्र सात-आठ महीने की प्रसुप्तावस्था में। यही तीन साल की पढाई है और यही चार साल की भी। यही वार्षिक परीक्षाओं का भी हासिल था और यही सेमेस्टर सिस्टम का भी। यही रविशंकर विश्वविद्यालय का हाल है, यही सिक्किम मनिपाल का तो यही दिल्ली युनिवर्सिटी का भी, आप मानो या न मानो। 

मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूक परिवर्तन करने हैं तो सबसे पहले विशेषाधिकार प्राप्त संस्थानों को उनके ही हाल पर छोड देना होगा। नीति निर्धारकों तथा शिक्षाविदों को अपना ध्यान क्षेत्रीय संस्थानों को समुचित पंख प्रदान करने पर लगाना होगा। कोर्स के तीन और चार साल जैसी बहसों के खोखलेपन को राष्ट्रीय मीडिया के लिये छोड दिया जाना चाहिये लेकिन जमीन पर काम तो तभी माना जायेगा जब झारखण्ड का छात्र रांची को और ओडिसा का छात्र भुवनेशवर को भी दिल्ली जैसा मान दे और अपनी युनिवर्सिटी में भी नवीनतम मापदंड तथा श्रेष्ठतम सुविधायें हासिल करे। पटना से भाग कर दिल्ली जायेंगे और वहाँ के विश्वविद्यालय की हर शर्त पर जी हाँ कर के प्रवेश हासिल कर लेंगे तो आपका योगदान अपनी आंचलिकता के लिये क्या रहा? एक देश के मापदंड पर आंचलिकता की बात बौनी लग सकती है लेकिन यह एसा ही है जैसे सभी अपना-अपना घर साफ कर लें तो पूरा देश दमकने लगे। 

यह गलतफहमी भी दूर होनी चाहिये कि बडे शिक्षा संस्थान वास्तव में राष्ट्र निर्माण के आधारस्तंभ है। क्या देश भूल गया कि जब बस्तर में छियत्तर जवान नक्सलियों ने मार दिये थे तब नयी दिल्ली के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हर्ष प्रकट करने के लिये जाम से जाम  टकराये गये थे और इस कृत्य को बौद्धिकता और प्रगतिशीलता की चाशनी से पोता भी गया था। इन दिनो दिल्ली युनिवर्सिटी के कतिपय छात्र और अध्यापक एक दूसरे की नाक और माथा जिस तरह तोडने फोडने मे लगे हैं वह भी निंदनीय और शर्मनाक है। ये सभी कृत्य कथित रूप से देश की श्रेष्ठतम मानी जाने वाली शिक्षा संस्थाओं की एक अन्य हकीकत भी है जिस तथ्य को बहस के साथ ही रखना पडेगा। दिल्ली बहुत दूर है और यह बात इस देश को अब समझ आनी चाहिये। पहली बात तो शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूक परिवर्तन चाहिये और उसके लिये देश के शिक्षाविद एकजुट हो कर काम करें न कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी हिट एण्ड ट्रायल पॉलिसी का प्रयोग किया जाये। दूसरा यह कि वह चाहे 10+2+3 हो या 10+2+4 या कोई और फॉर्म्यूला लेकिन देश भर में एक ही तरह का मानकीकरण अवश्य होना चाहिये। फिलहाल तो एकरूपिता ही बहाल रखिये, वह दिन भी जल्दी ही आयेगा जब बस्तर का सोमारू दिल्ली के दिलबाग के साथ कंधा मिला कर खडा मिलेगा। सपना तो यही होना चाहिये बाकी सारी शिक्षा विषयक बहसें केवल हू-तूतू है। 

- राजीव रंजन प्रसाद 
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Wednesday, June 18, 2014

बस्तर, बंदूख और इन्द्रू केवट का रास्ता


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यह मुख्यधारा किस चिडिया का नाम है और कहाँ पायी जाती है? महानगरों को भी बहुत निकटता से देखा है जहाँ हमेशा रहने वाली बिजली, जगमग सडकें, मैट्रो और बसों के कॉरीडोर उस लुभावनी दुनिया का उदाहरण बने हुए हैं जिसको कथित तरक्की का प्रतिमान माना जाता है। ऐसे में आज भी ढिबरी युग में जी रहे हमारे गाँवों को, जिन्हें नक्शों तक में जगह नहीं मिलती उनके महत्व, उनके गौरव और योगदानों को भुला दिया जाना स्वाभाविक है। ठीक है कि सिविल सर्विसेज में सफलता पाने के लिये आपका यह जानना आवश्यक है कि महात्मा गाँधी कौन थे और इन्द्रू केवट का परिचय रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसीलिये यह भी कडुवा सत्य है कि गाँधीवाद का शाब्दिक अर्थ पकड कर बैठ जाने वाली हमारी पीढी उसके मर्म तक नहीं पहुँच सकी चूंकि उसने राजनेताओं को महात्मा गाँधी की समाधी पर फूल चढाते देखा है किंतु इन्द्रू केवट के मृतक स्मारक की उपेक्षा उसे ज्ञात ही नहीं है।

कौन है इन्द्रू केवट? इस प्रश्न का उत्तर जानने की इच्छा रखने वालों से यह अपेक्षा भी अवश्य है कि क्या और कहाँ है बस्तर? लाल-आतंकवाद के साये में पिसते बस्तरिया आदिवासी, शहरी विश्वविद्यालयों में पढने-पढाने वाले कथित बुद्धिजीवियों को बंदूख से क्रांति करते प्रतीत होते हैं। उनकी फंतासियाँ इस अंचल की पीडा को शब्दों की चिपचिपी चाशनी बना देती है जिसमे रेल्वे स्टेशन पर बैठ कर अंग्रेजी उपन्यास पढने वाला युवा चिपकता जरूर है। हमारी बुद्धिजीविता वस्तुत: क्रूर राजनीतिज्ञ है और उनसे किसी भी परिस्थिति की सही विवेचना पाने की अपेक्षा रखना वृथा है। अगर ऐसा न होता तो गणपति और रमन्ना की कहानियाँ क्रांति की परिचायक नहीं बना दी गयी होतीं। फिर तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कथित बहसों में इन्द्रू केवट के उस योगदान पर भी चर्चा हो गयी होती जो एक समय बंदूख से इतर क्रांति की मशाल जलाये आदिवासी समाज को जगाने पैदल पैदल भटकता रहा करता था।

इन्द्रू केवट की कहानी वर्तमान बस्तर संभाग के उत्तरी क्षेत्र से जुडी है जो कभी कांकेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। अविश्वसनीय किंतु सत्य है कि दुर्गू कोंदल जैसे छोटे से गाँव के निवासी इन्द्रू केवट ने महात्मा गाँधी के सत्याग्रही मार्ग को जीवन में उतार लिया तथा वे इस आदिवासी अंचल में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के सूत्रधार बने। साधारण सी धोती और हाँथ में डण्डा यही उनका वेश और सामान था जिसके सहारे वे गाँव गाँव घूमते तथा गाँधी के आदर्शों व स्वतंत्रता की आवश्यकता जैसी बातों से ग्रामीणों को परिचित कराया करते थे। बात वर्ष-1933 की है जब महात्मा गाँधी दुर्ग आये हुए थे। उस समय यह निर्धन, आदिवासी सत्याग्रही अपनी लाठी टेकता हुआ पैदल ही निकल पडा दुर्गू कोंदल से दुर्ग तक; वह भी नंगे पाँव। आदिवासी अंचल के सत्याग्रही इन्द्रू केवट की मुलाकात जब महात्मा गाँधी से हुई और वे उनके समर्पण भाव तथा ओजस्विता को देख कर अत्यधिक प्रभावित हुए थे। गाँधी जी से हुई इस मुलाकात के बाद इन्द्रू केवट बस्तर के गाँव-गाँव घूम कर आदिवासी समाज को स्वतंत्रता के मायने समझाने लगे। 

इन्द्रू केवट के कारण ही कांकेर रियासत ने राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ जाना और तिरंगे से परिचित हुए। वर्ष 1944-45 की बात है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों को धन, लकडी, अनाज आदि की आवश्यकता पडी। ऐसे में बस्तर और कांकेर रियासतें मुख्य रूप से उनके द्वारा शोषित हुईं। केवल कांकेर रियासत से ही अंग्रेज उस दौरान 41242 वर्गफुट उत्तम किस्म का सागवान कटवा कर ले गये थे। इसके अलावा आदिवासी किसानों से कम दाम में खरीद करवा कर लगभग अट्ठारह हजार मन धान और पच्चीस हजार रुपये राजस्व के रूप में वसूला गया था। वर्ष 1945 में नयी भू-राजस्व वयवस्था के तहत अनेक गाँवों को जोडा गया और हंटर के बल पर किसानों से उनकी फसल छीनी जाने लगी। इन्द्रू केवट ने तब लगान मत पटाओ का नारा दिया और राजा तथा अंग्रेजों के विरोध में जुट गये। खण्डी नदी के पास पातर बगीचा में सत्याग्रहियों की पहली बैठक हुई जिसमें पहली बार चरखा युक्त झंडा प्रतीक बना। इस बैठक में लगभग डेढ हजार आदिवासी प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे। अहिंसक आन्दोलन जोर पकडने लगा और इसमे गुलाब हल्बा, पातर हल्बा, कंगलू कुम्हार जैसे अनेक आदिवासी उनके साथ जुडने लगे। 

इस आदिवासी सत्याग्रही के गतिविधियों की जानकारी जैसे ही मिली तब अंग्रेजों का दबाव राजा पर पडा और इन्द्रू केवट की गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। जेल से बचने के लिये इस उन्होंने बडी ही युक्ति से काम लिया। धोती ही तो एकमात्र आवरण था उनका और बाकी शरीर पर उन्होंने ‘टोरा का तेल’ मल लिया। सिपाहियों ने उन्हे पकडा जरूर लेकिन वे फिसल कर उनकी पकड से छूट निकले और भाग गये। आन्दोलन बढा तो लगभग तीन सौ गाँवों के किसान सत्याग्रही हो गये और अब पूरी ताकत राजा को लगानी पडी जिसके पश्चात इन्द्रू केवट और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पैदल ही रियासत की राजधानी कांकेर तक लाया गया। इन्द्रूकेवट और उनके 429 किसान साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अब समय सत्याग्रह की ताकत से परिचित होने का था। गाँव गाँव से लगभग दो सौ बैलगाडियों में भर कर किसान इन्द्रू केवट और उनके साथियों को छुडाने कांकेर पहुँच गये। आन्दोलन को इस तरह फैलते देख अंग्रेज सकते में आ गये और उन्होंने आन्दोलनकारियों से समझौता कर लिया। राजद्रोह के मुकदमे वापस ले लिये गये तथा इन्द्रू केवट अपने साथियों के साथ रिहा कर दिये गये। 

इन्द्रू केवट जब तक जीवित रहे बस्तर के गाँधी बन कर स्वतंत्रता आन्दोलन को अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। इन्द्रू केवट के गाँव में आज भी पोते मौजूद हैं। मैं उनके घर पहुँचा तो इस बात को जान कर बहुत दु:ख हुआ कि परिजनों के पास इन्द्रू केवट का एक पेंसिल स्केच छोड कर कोई भी तस्वीर, दस्तावेज अथवा जानकारी मौजूद नहीं है। परिजनों को सरकार से मदद की अनेक अपेक्षायें हैं। गाँव की पहचान ही इन्द्रू केवट से है और इसी कारण गौरव ग्राम मानते हुए प्रवेश द्वार बनवाया जा रहा है। गाँव के बाहर नदी के किनारे इन्द्रू केवट का आदिवासी परम्परा के अनुरूप बनाया गया मृतक स्मृति स्मारक अभी ठीक ठाक हालत में नदी के किनारे अवस्थित है। 

काश कि इस मृतक स्मारक की महत्ता का अंदाजा हमारी पीढी को होता तो वे अंतर कर पाते कि क्रांति और सत्याग्रह के वास्तविक मायने क्या हैं? व्यवस्था परिवर्तन का सही रास्ता क्या है? मुद्दों और जनपक्षधरता की लडाई कैसे लडी जा सकती है तथा नक्सलवादी बंदूखें किसलिये अनुचित है। बस्तर की आत्मा और उसकी जिजीविषा को समझने के लिये इन्द्रू केवट के रास्ते से हो कर गुजरना ही होगा। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

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Sunday, June 15, 2014

भोपालपट्टनम के विरासतों की नियति है नष्ट होना


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भोपालपट्टनम के विरासतों की नियति है नष्ट होना।
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भोपालपट्टनम का यह चहलपहल वाला क्षेत्र है। राजमहल बतायी गयी इमारत के सामने खडा हो कर लगा कि दुनिया को उलट-पुलट हो जाना चाहिये। जब हमें अपनी पहचान से, अपने अतीत और विरासत से ही लगाव नहीं तो एक बार को ही सबकुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाये, न बांसतरी में बांस रहे न बांसुरी ही बजे....। इतिहास को इस निर्ममता से ध्वस्त होते देख कर यही मेरे आरम्भिक मनोभाव थे। माना कि मैं लालकिले के सामने नहीं खड़ा था और यह किसी राजा-महाराजा का दुर्ग या भवन भी नहीं। यह भी माना कि कभी एक वन्य राज्य रहे बस्तर के गोंड जमींदार का भवन महत्व के मानक पर कभी परखा भी नहीं जायेगा किंतु यह कैसे मान सकता हूँ कि आने वाली पीढी भी अपने अतीत को हमारी तरह महत्वहीन ही मान कर चलेगी? मुख्यद्वार से भीतर प्रवेश करते हुए यह अहसास हो चला था कि भोपालपट्टनम में रियासत काल की यह निशानी निश्चित ही अत्यधिक भव्य रही होगी। इस विरासत के कर्णधारों ने क्यों इसका संरक्षण करना उचित नहीं समझा यह कहना कठिन है लेकिन इसकी महत्ता पर चर्चा की ही जा सकती है। 

भोपालपट्टनम में समृद्ध नाग कालीन विरासतें सर्वत्र बिखरी हुई हैं किंतु यहाँ का विधिवत राजनैतिक इतिहास वर्ष 1324 से प्रारंभ होता है जब वारंगल (वर्तमान तेलंगाना का हिस्सा) से चालुक्य राजकुमार अन्नमदेव तुगलकों के आक्रमण से परास्त शरणागत की तरह गोदावरी और इन्द्रावती नदी के संगम स्थल की ओर से नाग शासकों की भूमि में प्रविष्ठ हुए। एक समय समृद्ध रहा चक्रकोट अब एक सशक्त केन्द्रीय शक्ति के अभाव में इतना कमजोर हो गया था कि केवल दो सौ सैनिकों के साथ इस वन्यप्रांतर में प्रवेश करने वाले अन्नमदेव ने नागों को निर्णायक रूप से परास्त कर बस्तर राज्य की स्थापना की। कथनाशय यह है कि आज जिस भोपालपट्टनम का परिचय केवल और केवल लाल-आतंकवाद से निरूपित हो रहा है वस्तुत: यही भूमि उस राजैतिक व्यवस्था परिवर्तन की सूत्रधार रही है जिसके बाद स्थापित चालुक्य सत्ता का सम्पूर्ण बस्तर राज्य में वर्ष 1324 से वर्ष 1947 तक शासन रहा है। 

अन्नमदेव ने जब भोपालपट्टनम प्रवेश किया होगा तब यहाँ के भयावह जंगल तथा नागों से जुडे अनेक मिथकों को सुन कर उनकी क्या अवस्था हुई होगी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि नाग शासकों के विरुद्ध अपना युद्धाभियान प्रारम्भ करने से पूर्व उन्होंने संगम स्थल पर शिवलिंग स्थापित कर विधिवत पूजा-अर्चना की और उसके बाद ही आगे का विजय अभियान आरम्भ हुआ। भोपालपट्टनम का नाग राजा कभी यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कोई गोदावरी की ओर से प्रवेश कर उसकी छोटी सी शासित परिधि में आक्रमण कर सकता है। अप्रत्याशित हमले से घबरा कर उसने भोपालपट्टनम रिक्त कर दिया और बिना लडे ही भाग खडा हुआ। यह अन्नमदेव के बस्तर विजय अभियान की पहली विजय थी जिसके लिये उन्हें रक्त की एक बूंद भी नहीं बहानी पडी। नागों की सत्ता का अंत होते ही बस्तर में सामंतवादी व्यवस्था की जडें भी गहरी हुईं तथा अन्नमदेव ने अपने विजित क्षेत्रों पर अनेक जमींदार नियुक्त किये। 

भोपालपट्टनम के पहले जमींदार थे नाहर सिंह पामभोई। यह कहा जाता है कि भोई वस्तुत: अन्नमदेव के पालकीचालक हुआ करते थे। वारंगल से भोपालपट्टनम तक के प्रयाण में भोई समुदाय ने अपने नायक अन्नमदेव की जी-जान से सहायता की। इनाम स्वरूप अपनी पहली ही जीत को अन्नमदेव ने भोई नायक नाहर सिंह पामभोई के नाम कर दिया और उन्हें जमींदार नियुक्त किया गया। भोई के पामभोई कहे जाने के पीछे भी एक रोचक कहानी है। यह जनश्रुति है कि जब अन्नमदेव गोदावरी नदी पार कर रहे थे तब अचानक हवा के तेज बबण्डर के साथ एक बडा सा अजगर प्रकट हुआ। भोई ने बडी ही बहादुरी से इस अजगर को मार दिया। यह मिथककथा भोपालपट्तनम के जमींदार के लिये गाये जाने वाले विरुद का एक अंश “गालिवीर पामभोई” से भी स्पष्ट होती है जहाँ गालि का अर्थ है हवा, वीर अर्थात साहसी, पाम का अर्थ है अजगर तथा भोई का मतलब है पालकीचालक। इस विरुद को कालांतर में बदल कर “कृष्णपामभोई” कर दिया गया था। ब्लण्ट तथा दि ब्रेट जैसे अंग्रेज विवेचनाकर्ताओं ने यहाँ के जमींदार को गोंड जाति का माना है। बस्तर के पहले इतिहासकार कहे जाने वाले केदारनाथ ठाकुर (1908) ने इन्हें भोई जाति का माना है। यह कहा जा सकता है कि गोंडों की ही उपशाखा भोई है। भोई चालुक्य शासन में कितने शक्तिशाली थे इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 1901 तक जगदलपुर के निकट तक के अनेक गाँवों के अधिपति भोई ही थे। 

भोपालपट्टनम के राजनैतिक इतिहास और उसकी महत्ता को समझने की कोशिश किये जाने की आवश्यकता है। यदि भोपालपट्टनम का संधिविच्छेद किया जाये तो भूपाल अर्थात राजा तथा पत्तनम अर्थात बंदरगाह। इसके अतिरिक्त यह भी माना जाता है कि भूपाल (राजा) के चरण सबसे पहले इसी क्षेत्र में पडे इसीलिये भोपालपट्टनम नाम पड गया। सत्यता जो भी हो किंतु रियासतकालीन बस्तर और वर्तमान बस्तर संभाग का हिस्सा भोपालपट्टनम अभी रहस्य की चादर ओढे हुए है। 

उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों की दृष्टि से भोपालपट्तनम को समझने की कोशिश की जाये तो जो जानकारियाँ सामने आती हैं उनके अनुसार “भोपालपट्टनम जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 722 वर्गमील था जिसके अंतर्गत 139 गाँव थे जिसमे 14 जनशून्य थे। यहाँ की कुल जनसंख्या 9055 थी (दि ब्रेट, 1909)।” वर्ष 1918-19 में इस जमींदारी का अस्तित्व कोर्ट ऑफ वार्ड्स के आधीन था। वर्ष 1887 में हुए विद्रोह का तत्कालीन अंग्रेज शासकों के पक्ष में दमन करने में सहायता करने के कारण भोपालपट्टनम के जमींदार को मल्लमपल्ली परगना 1859 ई. मे उपहार स्वरूप दिया गया था। यद्यपि वर्ष 1908 में अंग्रेजों द्वारा प्रतिपादित नये नियम के तहत मल्लमपल्ली परगना पुन: अहीरी जमींदारी में मिला दिया गया किंतु भोपालपट्टम के जमींदार का वहाँ से भूमिकर (मालकानी) वसूलने का अधिकार बना रहा (केदारनाथ ठाकुर, 1908)। जमींदारी का मुख्यालय भोपालपट्टनम नगर था जहाँ वर्ष 1908 से पूर्व ही राजमहल, अस्पताल, स्कूल, पोस्टऑफिस, पुलिस कार्यालय, इन्जीनियर कार्यालय एवं तहसील कार्यालय बनाये गये थे। भोपालपट्टनम को सडक मार्ग से जगदलपुर से जोड दिया गया था (केदारनाथ ठाकुर, 1908)। वर्ष 1910 के विद्रोह (भूमकाल) के समय भोपालपट्तनम का जमींदार श्रीकृष्णा पामभोई था। अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें 1912 में जगदलपुर दशहरा दरबार में सम्मानित भी किया गया था। रिकॉर्ड बताते हैं कि जमींदार श्रीकृष्ण पामभोई के कारण जमींदारी मेनेजमेंट के तहत थी। उस दौरान 147 एकड बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित किया गया और 4300 रुपये तकाबी ऋण के रूप में किसानों मे वितरित किया गया (एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट 1954, अप्रकाशित)। वस्तुत: ब्रिटिश शासनकाल में भोपालपट्टनम जमींदारी नौ परगनों में विभक्त थी। इनमे से आठ माझी परगने थे और एक चालकी परगना था। भोपालपट्टनम जमींदारी का तीन चौथाई भाग जंगली और पहाड़ी था। यहाँ के जमींदार की आय का मुख्य स्त्रोत सागवान जैसी कीमती इमारती लकडिया एवं वनोपज ही थे। गोदावरी तथा इन्द्रावती नदी मार्ग से निर्यात किया जाता था। तीन नदियों (गोदावरी, इंद्रावती तथा चिंतावागु) एवं राज्यों की सीमा का संगम होने के कारण यह महत्वपूर्ण व्यापारिक एवं सामरिक महत्व का स्थल भी हुआ करता था। 

इतिहास बताता है कि अन्नमदेव ने अपने शासनकाल में बस्तर को एक रहस्यमय राज्य बना दिया था और इस तरह उसने लम्बे समय तक बाहरी राजनैतिक दखल से सुरक्षा बनाये रखी। अंग्रेज जासूस कैप्टन जे डी ब्लण्ट वर्ष 1795 में बस्तर सियासत के भीतर भोपालपट्टनम की ओर से घुसने की कोशिश मे था किंतु यहाँ के गोंड आदिवासियों ने अपने तीरों से उसके अनेक साथियो को घायल कर दिया और उसे गोदावरी के दूसरी ओर खदेड दिया था। भोपालपट्टनम में अंग्रेजों के विरुद्ध शौर्यगाथा लिखने में अनेक वीर आदिवासियों का योगदान रहा है जिसमें धुर्वाराव, यादोराव, वेंकुटराव तथा बाबूराव प्रमुख थे। यह सबकुछ अब भुला दिया गया है। 

भोपालपट्टनम नगर को यह सुध ही नहीं कि उनकी महानतम विरासत की निशानियाँ मटियामेट हो रही हैं। लम्बे समय तक रियासतकालीन राजनीति के केन्द्र मे रहा राजमहल भवन अभी पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है और यदि कोशिश की जाये तो इसे बचाया जा सकता है। भवन के भीतर के भवनों में कब्जा कर लिया गया है तथा पीछे अवस्थित मैदानों में भी लोग झोपडियाँ बना कर रहने लगे हैं। सामने की संरचना, भीतर का अहाता और उससे लग कर अनेक भवन अभी ठीक-ठाक अवस्था में हैं जबकि पिछली दीवारों पर बरगद का कब्जा है। अनेक बडे कमरे अब ईंटों का ढेर रह गये हैं। संभवत: समय की प्रतीक्षा की जा रही है जब अतीत का यह साक्ष्य धराशायी हो जाये। शायद इतिहास तो लालकिलों के ही होते हैं भोपालपट्टनम की इन विरासतों की नियति नष्ट होना ही है। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

Wednesday, June 11, 2014

हाँ भई!! राष्ट्रीय समस्या है दिल्ली की बिजली



हाँ भई!! राष्ट्रीय समस्या है दिल्ली की बिजली 
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अभी बहुत दिन नहीं हुए, नक्सलियों ने विद्युत व्यवस्था ठप्प कर दी थी और लगभग पंद्रह दिनों तक केरल राज्य से भी बड़े बस्तर संभाग के बहुतायत क्षेत्रों में घुप्प अंधेरा हो गया था। सभी त्रस्त थे, लालटेन युग लौट आया था, लोग गर्मी की रातों में सडकों पर नींद लेने के लिये विवश थे, अस्पतालों में ऑपरेशन तक नहीं हो सके थे। ठीक इसी समय राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली में गली मोहल्ले की लडाई को राष्ट्रीय समाचार बनाये हुए था। हम यह सोचने के लिये बाध्य थे कि क्या बस्तर भारत का ही हिस्सा है? और अगर हाँ तो यहाँ की दिक्कतें, समस्यायें और हालात राष्ट्रीय खबर क्यों नहीं बनते? दिल्ली से कैमरे तब ही बस्तर आते हैं जब उन्हें कोई सनसनीखेज खबर करनी हो। वे तब जंगल के भीतर जाते हैं, किसी नक्सली का इंटरव्यू ले आते हैं और फिर खबर बनती है कि फलाना चैनल ग्राउंड जीरो पहुँचा। क्षेत्रीय संवेदनाओं, समस्याओं और वास्तविकतओं को यह राष्ट्रीय मीडिया की श्रद्धांजलि होती है। 

आज दिल्ली में अस्थाई बिजली संकट है और कुछ इलाकों के हाल उत्तरप्रदेश के नगरों में सर्वदा रहने वाले हालात जैसे हो गये है। दिल्ली वालों को आठ से दस घंटे बिजली नहीं मिल रही यह खबर इतनी बडी है कि इसे कन्याकुमारी वाला भी झेले, कश्मीर वाला भी और बिहार के लोग भी। हाँ य़ह ठीक है कि देश की राजधानी होने का सुख दिल्ली को हमेशा मिलता रहता है और वहाँ के गली मुहल्लों की घटना भी राष्ट्रीय खबर हो जाती है। मीडिया के प्रोपागेंडा की वजह से एक बडे शहर में जिसे राज्य का दर्जा मिला है, वहाँ गाँवों जितनी बडी परिधियों वाले विधान सभाओं में बहुमत से कम सीटें हासिल करने के बाद बेमेल जोड से बनी एक सरकार की नौटंकियाँ दिन रात का राष्ट्रीय समाचार बनी रही। केजरीवाल ने क्या खाया, क्या बोला, कहाँ खांसे आदि आदि सुन कर अरुणाचल भी पकता रहा और कोच्चि भी। इस दौरान अनेक बडे बडे राज्यों मे भी नयी सरकारें आयीं, किसी ने नहीं जाना। 

यह दिल्ली का विशेषाधिकार है कि वह खुद को ही दिखाये, खुद की परेशानियों पर ही छाती पीटे, अपनी सडकों के गड्ढों को तालाब बताये, अपने बिजली संकट को अंतर्राष्ट्रीय समस्या निरूपित कर दे। यह दिल्ली के मीडिया पर है कि उसके लिये देश सिमटता सिमटता स्टूडियो के भीतर घुस आया है। उसे क्यों फिक्र हो कि आज भी देश की बहुतायत आबादी लालटेन युग में ही है। उसे क्यों फिक्र हो कि आज भी देश के बहुतायत गाँव सडकों से नहीं जुडे और बरसात आते ही देश-दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं। उसे क्यों फिक्र हो कि इस देश में असम, अरुणाचल, सिक्किम मणिपुर जैसे राज्य भी हैं जिनकी भौगोलिक परिधि भी दिल्ली से अधिक बडी है और समस्यायें भी अनसुनी हैं। दिल्ली ही राष्ट्र है इसलिये हम बाध्य हैं कि अरविन्दर सिंह लवली, अरविन्द केजरीवाल और हर्षवर्धन के विद्युत प्रवचनों को इनवर्टर से हासिल बिजली में भी झेलें और इसपर बहसियायें। हम भारत के लोग दिल्ली के विकास से रोमांचित हैं और दिल्ली की परेशानी से बेचैन। हमारी मजबूरी है।

-राजीव रंजन प्रसाद 

Tuesday, June 10, 2014

बस्तर - प्राचीन स्त्री राज्य की विरासत है।


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स्त्री नें हमेशा बराबरी और सम्मान की लडाई लडी है। भारत भर में एसे उदाहरण कम ही देखने को मिले हैं जहाँ उसने यह अधिकार पाया है। इस आधी आबादी के पास अगर कोई उदाहरण है तो वह पाषाणकालीन अतीत की ओर इशारा करता है जब मातृसत्तात्मक जीवन शैलियों का चलन था। प्राचीन बस्तर क्षेत्र जिसे रामायण काल में “दण्डकारण्य”, महाभारत काल में “कांतार” तथा गुप्त काल में “महाकांतार” कहा गया एक एसे इतिहास की ओर इशारा करता है जहाँ लगभग तेरहवी शताब्दी के पूर्वार्ध (1335 ई.) तक स्त्रीसत्ता का ही प्रमुखता से उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारतकालीन वीरांगना प्रमिला से आरंभ हो कर यही विशिष्ठता नागकालीन राजकुमारी मासक देवी तक पहुँचती है; यद्यपि कालांतर में भी “रानी चो रिस (1878-1882 ई.)” जिसमें कि तत्कालीन रानी जुगराज कुँअर नें अपने ही पति राजा भैरमदेव के विरुद्ध सशस्त्र आन्दोलन का संचालन किया था; राजमाता सुबरन कुँअर जो कि 1910 के महान भूमकाल के सूत्रधारों में थीं तथा महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी (1921-1936 ई.) जिन्होंने बैलाडिला की खदानों को निजाम के हाँथो जाने से बचाने के लिये प्राणों की आहूति दे दी जैसे उदाहरण मिलते हैं। क्या एक लम्बे समय तक युद्ध में उलझ जाने और उसके पश्चात शांतिकाल में प्राचीन दण्डकारण्य एक स्त्री-शासित प्रदेश बन गया था? इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन बस्तर में रामायणकाल को दो संस्कृतियों के संघर्ष, मैत्री तथा सम्मिश्रण का समय माना जायेगा। इसके बाद का समय अपेक्षाकृत स्थायित्व दर्शाता है; बडी सभ्यताओं नें अपनी अपनी सुविधा के क्षेत्रों पर अब तक कब्जा हासिल कर लिया है तथा प्राचीन बस्तर अंचल पुन: अपने आप में सिमटता जाता प्रतीत होता है। 

इस काल खण्ड तथा इसकी विशेषताओं पर चर्चा करने से पूर्व उन तथ्यों पर बात करते हैं जो मूल महाभारत कथा के साथ “कांतार” अर्थात प्राचीन बस्तर का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। उत्तरापथ में आर्यों का समुचित विस्तार हो गया था अत: महाभारत की मूल कथा वहीं से अपना अधिक सम्बन्ध रखती है तथापि पाण्डवों के वनवास के कुछ प्रसंग कांतार की भूमि में घटित हुए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि वर्तमान बस्तर के कई गाँवों के नाम महाभारत में वर्णित पात्रों पर आधारित हैं, उदाहरण के लिये गीदम के समीप नकुलनार, नलनार; भोपालपट्टनम के समीप अर्जुन नली, पुजारी; कांकेर के पास धर्मराज गुडी; दंतेवाड़ा में पाण्डव गुडी नामक स्थलों प्रमुख हैं। कई आदिवासी देवता भी इस कालखण्ड का पुरातत्व अपने नामों में छुपाये हुए हैं जिनमें प्रमुख हैं - भीमुलदेव, पाण्डुरों, पाण्डुराजा आदि। बस्तर की परजा (घुरवा) जनजाति अपनी उत्पत्ति का सम्बन्ध पाण्डवों से जोड़ती है। बस्तर भूषण (1908) में पं केदारनाथ ठाकुर नें उसूर के पास किसी पहाड़ का उल्लेख किया है जिसमें एक सुरंग पायी गयी है। माना जाता है कि वनवास काल में पाण्डवों का यहाँ कुछ समय तक निवास रहा है। इस पहाड के उपर पाण्डवों के मंदिर हैं तथा धनुष-वाण आदि हथियार रखे हुए हैं जिनका पूजन किया जाता है। महाभारत के आदिपर्व में उल्लेख है कि बकासुर नाम का नरभक्षी राक्षस एकचक्रा नगरी से दो कोस की दूरी पर मंदाकिनी के किनारे वेत्रवन नामक घने जंगल की सँकरी गुफा में रहता था। वेत्रवन आज भी बकावण्ड क्षेत्र में मिलते हैं तथा यह नाम बकासुर से साम्यता दर्शाता भी प्रतीत होता है; अत: यही प्राचीन एकचक्रा नगरी अनुमानित की जा सकती है। बकासुर भीम युद्ध की कथा अत्यधिक चर्चित है जिसके अनुसार एकचक्रा नगर के लोगों नें बकासुर के प्रकोप से बचने के लिये नगर से प्रतिदिन एक व्यक्ति तथा भोजन देना निश्चित किया। जिस दिन उस गृहस्वामी की बारी आई जिनके घर पर पाण्डव वेश बदल कर माता कुंती के साथ छिपे हुए थे तब भीम नें स्वयं बकासुर का भोजन बनना स्वीकार किया। भीम-बकासुर का संग्राम हुआ अंतत: भीम नें उसे मार डाला। महाभारत में वर्णित सहदेव की दक्षिण यात्रा भी प्राचीन बस्तर से जुडती है। दो तथ्य रुचिकर लग सकते हैं पहला कि भीम शब्द का सम्बन्ध बस्तर क्षेत्र के अनेक देवताओं से जुडना सिद्ध होने के बाद भी विष्णु पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि कांतार निवासी, कौरवों की ओर से महाभारत महा-समर में सम्मिलित हुए थे। द्रौपदी के लिये सम्मान का भी जनजातियों में अभाव दिखता है विशेषरूप से दण्डामि माडिया ‘बोली’ में ‘पांचाली’ एक अपशब्द है।

कृष्ण का आगमन भी कांतार भूमि मे हुआ है। कांकेर (व धमतरी) के निकट सिहावा के सुदूर दक्षिण में मेचका (गंधमर्दन) पर्वत को मुचकुन्द ऋषि की तपस्या भूमि माना गया है। मुचकुन्द एक प्रतापी राजा माने गये हैं व उल्लेख मिलता है कि देव-असुर संग्राम में उन्होंने देवताओं की सहायता की। उन्हें समाधि निद्रा का वरदान प्राप्त हो गया अर्थात जो भी समाधि में बाधा पहुँचायेगा वह उनके नेत्रों की अग्नि से भस्म हो जायेगा। मुचकुन्द मेचका पर्वत पर एक गुफा में समाधि निन्द्रा में थे। इसी दौरान का कालयवन और कृष्ण का युद्ध चर्चित है। कृष्ण कालयवन को पीठ दिखा कर भाग खडे होते हैं जो कि उनकी योजना थी। कालयवन से बचने का स्वांग करते हुए वे उसी गुफा में प्रविष्ठ होते हैं तथा मुचकुन्द के उपर अपना पीताम्बर डाल कर छुप जाते हैं। कालयवन पीताम्बर से भ्रमित हो कर तथा कृष्ण समझ कर मुचकुन्द ऋषि के साथ धृष्टता कर बैठता है जिससे उनकी निद्राभंग हो जाती है। कालयवन भस्म हो जाता है। यही नहीं, कृष्ण के साथ बस्तर अंचल से जुडी एक अन्य प्रमुख कथा है जिसमें वे स्यमंतक मणि की तलाश में यहाँ आते हैं। ऋक्षराज से युद्ध कर वे न केवल मणि प्राप्त करते हैं अपितु उनकी पुत्री जाम्बवती से विवाह भी करते हैं। 

महाभारत में दक्षिण क्षेत्र के माल जनपद का उल्लेख मिलता है। कालिदास नें भी मेघदूत में माल क्षेत्र के भूगोल की विस्तृत व्याख्या की है जो इसे रामगिरि (ओडिशा) से उत्तर पश्चिम का क्षेत्र (कांतार) घोषित करते हैं। महाभारत में माल क्षेत्र को शाल वन से घिरा हुआ बताया गया है। इस आधार पर माल जनपद की मालदा अथवा मालवा के पठार से की जाने वाली तुलना तर्कपूर्ण नहीं प्रतीत होती व इसे कोरापुट तक विस्तृत प्राचीन बस्तर का क्षेत्र ही माना जाना चाहिये। बस्तर का वर्तमान में बहुचर्चित क्षेत्र माड़ वस्तुत: माल जनपद के अपभ्रंश के रूप में आज भी जाना जाता है एवं यहाँ के निवासी माडिया कहे जाते है। 

एक रोचक कथा का उल्लेख मिलता है। युधिष्ठिर नें जब अश्वमेध यज्ञ का घोडा छोडा था, तब उस घोडे की रक्षा में स्वयं अर्जुन सेना के साथ चला था। दक्षिण की ओर चलते चलते युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ का घोडा “स्त्री राज्य” में पहुँच गया। - “उवाच ताम महावीरान वयं स्त्रीमण्डले स्थिता:” (जैमिनी पुराण)। स्त्री राज्य (कांतार) की शासिका का नाम प्रमिला था। उल्लेखों से ज्ञात होता है वह बड़ी वीरांगना थी। प्रमिला देवी के आदेश से अश्वमेध यज्ञ के घोडे को बाँध कर रख लिया गया। घोडे को छुडाने के लिये अर्जुन नें रानी प्रमिला तथा उनकी सेना से घनघोर युद्ध किया; किन्तु आश्चर्य कि अर्जुन की सेना लगातार हारती चली गयी। स्त्रियाँ युद्ध कर रही थीं इसका अर्थ यह नहीं कि वे साधन सम्पन्न नहीं थी जैमिनी पुराण से ही यह उल्लेख देखिये कि किस तरह स्त्रियाँ रथों और हाँथियों पर सवार हो कर युद्धरत थीं – “रथमारुद्य नारीणाम लक्षम च पारित: स्थितम। गजकुम्भस्थितानाम हि लक्षेणापि वृता बभौ॥“; इसके बाद युद्ध का जो वर्णन है वह प्रमिला का रणकौशल बयान करता है। प्रमिला नें अपने वाणों से अर्जुन को घायल कर दिया। अब अर्जुन नें छ: वाण छोडे जिन्हें प्रमिला नें नष्ट कर दिया। विवश हो कर अर्जुन को ‘मोहनास्त्र’ का प्रयोग करना पड़ा जिसे प्रमिला नें अपने तीन सधे हुए वाणों से काट दिया। अब प्रमिला अर्जुन को ललकारते हुए बोली – “मूर्ख! तुझे इस छोटी सी लडाई में भी दिव्यास्त्रों का अपव्यय करना पड़ गया?” – [प्रमीला मोहनास्त्रं तत सगुणम सायकैस्त्रिभि:। छित्वा प्राहार्जुनं मूढ! मोहनास्त्रम न भाति ते॥] इस उलाहने नें अर्जुन के भीतर ग्लानि भर दी। अर्जुन नें रानी प्रमिला के समक्ष विनम्रता का परिचय दिया एवं संधि कर ली। इसके बाद ही यज्ञ के घोडे को मुक्त किया गया। 

अपने आलेख का प्रारंभ मैने स्त्री अस्मिता तथा उसके प्रतिमानों के उदाहरणों के तौर पर प्राचीन बस्तर को सामने रख कर किया था। इस कथन की पुष्टि मार्कण्डेयपुराण, वात्स्यायन के कामसूत्र, वाराहमिहिर की वृहत्संहिता तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों में वर्णित उल्लेखों से भी होती है। वस्तुत: कांतार के स्त्रीराज्य होने का विवरण सर्वप्रथम महाभारत में ही मिलता है जहाँ शांति पर्व में उल्लेख है कि कलिंग के राजा की पुत्री चित्रांगदा के स्वयंवर के अवसर पर स्त्री राज्य के अधिपति सुग्गल भी आये थे - सुग्गलश्च महाराज: स्त्री राज्याधिपतिश्च य:। यह स्त्री राज्य एक बडे विमर्श की पृष्ठभूमि बनता है। कौटिल्य नें जिस तरह से कांतार में स्त्री राज्य का उल्लेख किया है उसके अनुसार यह प्रतीत होता है कि दक्षिण से उत्तर की ओर लाये जाने वाले माणिक्यों को इस राज्य से हो कर गुजरना पडता था। साथ ही इस क्षेत्र के खनिजों की जानकारी व महत्ता का विवरण भी चाणक्य उपस्थित करते हैं। महाभारत काल से आगे बढ कर नाग युग के आगमन तथा उसके बहुत बाद भी स्त्री ही सामाजिक व्यवस्था की धुरी बनी रही है। वात्स्यायन का कामसूत्र स्त्री राज्य के अंत:पुर में पुरुषों के होने की व्यवस्था का वर्णन करता हैं – ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च युवानांअंतपुरसधर्माणा एकैकस्या: परिग्रहभूता:। वस्तुत: रामायणकाल तथा महाभारत काल के उल्लेख कालांतर में घटित हुई परिस्थितियों की भूमिका बने हैं। वर्तमान समय के स्त्री विमर्श को भी पुरा अतीत की पृष्ठभूमि में ही समझना होगा तभी हम आधुनिक सामाजिक संगठनों को समझ सकते हैं।

-राजीव रंजन प्रसाद

Monday, June 09, 2014

राजनीति में सनसनी की दुर्गति और सोनी सोरी


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आम आदमी पार्टी ने सनसनी की राजनीति का प्रसार करते हुए बस्तर में विवादित तथा बहुचर्चित सोनी सोरी को प्रत्याशी बनाया था। लोकतंत्र केवल विधारधाराओं का पंचवर्षीय शक्तिपरीक्षण भर नहीं है यह जमीनी आन्दोलनों को भी अपनी लोकप्रियता परखने की परिपाटी प्रदान करता है। पिछले कुछ दशकों से लोकसभा चुनावों के दृष्टिगत बस्तर सीट में मुख्य मुकाबला यदि कॉग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच बना हुआ है तो तीसरी ताकत वर्ष 1984 के बाद से यहाँ भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी बन कर उभरी है। कतिपय चुनावों में यहाँ बहुजन समाज पार्टी और नेशनलिस्ट कॉग्रेस पार्टी का प्रदर्शन भी बहुत अच्छा देखा गया है। ऐसे में आम आदमी पार्टी का बस्तर के चुनाव में उतरना और यहाँ से सोनी सोरी को टिकट दिया जाना कई राजनैतिक पंडितों को बडे बडे दावे करने के लिये बाध्य कर रहा था। चूंकि इस प्रत्याशी पर नक्सलवादी मामलों में संलिप्तता होने के कारण अदालत में मामला लम्बित है अत: स्वाभाविक था कि आम आदमी पार्टी के कदम से देश भर में नक्सलवाद और उसकी प्रासंगिकता पर बहस छिडी। यदि पार्टी के एकमेव चेहरा अरविन्द केजरीवाल बस्तर में चुनाव प्रचार करने के लिये आये होते तो माना जा सकता था कि कथित पुलिस प्रताडना की शिकार महिला सोनी सोरी को संसद की आवाज बनाने के लिये पार्टी संजीदा है। प्रशांत भूषण बस्तर में प्रचार करने पहुचे किंतु इस वकील का जनाधार नहीं तो वह अपने प्रत्याशी की क्या मदद कर सकता था, परिणाम सामने है।     
  
चुनावी नतीजों का बस्तर के परिप्रेक्ष्य मे विश्लेषण कई कारणों से आवश्यक है। पहला यह कि कोई गलतफहमी न पाले कि बस्तर का मतदाता गंभीर मामलों के प्रति संजीदा नहीं है या यह न समझ बैठे कि सोनी सोरी से पहले क्षेत्रीय मुद्दों पर प्रत्याशी खडे नहीं किये गये और वे सफल नहीं हुए। बहरहाल बस्तर के चुनावी इतिहास से पहले बात उस पार्टी की जिसके दावों के गुब्बारे में जनता ने पिन मार दिया है। आन्दोलन की जमीन तो अन्ना के हटते ही खसक गयी थी लेकिन उसके शेष बचे प्रभाव की परिणति थी कि केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में आम आदमी की सरकार बन सकी।   एक एक गाँव जितने बडे क्षेत्रफलों वाली विधानसभाओं वाले राज्य की सरकार जिनसे नहीं चल सकी उनकी महत्वाकांक्षाओं के हवाई किले दर्शनीय थे। “हम राजनीति को बदलने आये हैं” जैसे वाक्यांश का थोथापन आज उजागर हो चुका है किंतु इस दावे को बस्तर के परिप्रेक्ष्य में तौलता हूँ तो यह लगता है कि सोनी सोरी का इस्तेमाल हुआ है। यह जानकारी सार्वजनिक है कि पार्टी को सोनी सोरी के नाम पर बहुत अच्छा चन्दा मिला जिसमें विदेशों से भी लोगों ने मोटी मोटी धनराशि भेजी थी। इस राशि और उसके इस्तेमाल पर प्रश्नचिन्ह लगाना मेरे आलेख का उद्देश्य नहीं है अपितु जो महिला आन्दोलन की वैश्विक प्रतीक बना दी गयी हो उसका अपने ही निवास क्षेत्र में जनाधार क्यों नहीं पन सका, इसपर तो बात होनी ही चाहिये। 

इन चुनावों में बस्तर लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने पचास प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त कर अब तक की सबसे बडी जीत हासिल की किंतु ऐसा नहीं कि अन्य पार्टियाँ एकदम हाशिये पर ही चली गयी हों। कॉग्रेस के दीपक कर्मा को चौंतीस प्रतिशत मत प्राप्त हुए जबकि भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की बिमला सोरी को साढे चार प्रतिशत मत मिले। यद्यपि महेन्द्र कर्मा (1984 में मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के प्रत्याशी) तथा रामनाथ सर्फे ने कॉंग्रेस वर्चस्व के एक दौर (1984 – 1998 तक) में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करायी है तथापि तीसरे स्थान पर आज भी बस्तर में लाल चिनगारी की सुलगन देखी जा सकती है यदि राख को थोडा झाडा जाये। ऐसा क्यों हुआ कि बस्तर के आम मतदाता ने सोनी सोरी को वोट देने के स्थान पर उससे अधिक नोटा के बटन दबाये। बस्तर में कुल नोटा मत पडे 38772 अर्थात कुल प्राप्त मतों का पाँच प्रतिशत, जबकि आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी सोनी सोरी को केवल सोलह हजार नौ सौ तीन मत प्राप्त हुए अर्थात महज दो प्रतिशत। यदि आम आदमी पार्टी को प्राप्त मतो का विश्लेषण किया जाये तो ये मत किसी भी राजनीतिक दल के जनाधार में सेंध नहीं लगाते अपितु उससे भी कम हैं जितने कि बस्तर में अनेक निर्दलीय प्रत्याशी बिना प्रोपागेंडा के लड कर हासिल करते रहे हैं। 

अतीत के चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि डाली जा सकती है। लोकसभा चुनाव वर्ष-1952 में निर्दलीय प्रत्याशी मुचाकी कोसा कॉग्रेस को एक लाख से भी अधिक मतों से हरा कर विजयी हुए। वर्ष 1962 में पहले स्थान पर निर्दलीय प्रत्याशी लखमू भवानी (प्राप्त मत 87557) रहे तो दूसरा स्थान भी निर्दलीय लड रहे बोधा दादा (प्राप्त मत 61348 ) को मिला। 1971 के लोकसभा चुनाव में लम्बोदर बलिहार ने निर्दलीय लड कर जीत हासिल की जबकि निर्दलीय अनेक प्रत्याशी इस चुनाव में खडे हुए थे और एक दूसरे को बहुत अच्छी स्पर्धा दे रहे थे। 1977 का चुनाव एक बडे राष्ट्रीय आन्दोलन की भेंट चढा था और पूरे देश में जनता पार्टी की लहर देखी गयी थी। जनता पार्टी के तत्कालीन प्रभाव को वर्तमान की आम आदमी पार्टी के प्रादुर्भाव से जोड कर देखा जाता रहा है। इसका अनुमापन बस्तर के परिप्रेक्ष्य में करें तो भारतीय लोकदल के प्रत्याशी दृग्पाल शाह एक लाख से अधिक मत पा कर 1977 के चुनावों में विजयी हुए थे जबकि सोनी सोरी चुनाव में नाम मात्र की उपस्थिति भर दर्ज करा सकीं। महेन्द्र कर्मा 1996 का लोकसभा चुनाव निर्दलीय लडे थे और उन्हें 124322 मतों के साथ जबरदस्त जनसमर्थन प्राप्त हुआ था। महेन्द्र कर्मा की हत्या के पश्चात दंतेवाडा सीट पर भी जिस तरह देवती कर्मा के पक्ष में वोट पडे उससे भी इस आदिवासी नेता के जनाधार को खारिज नहीं किया जा सकता। तो क्या यह निष्कर्ष निकाला जाया कि सोनी सोरी भले ही बस्तर से हों, लेकिन वास्तव में वे जनाधार विहीन आम आदमी पार्टी के लेबल के साथ पैराशूट प्रत्याशी ही थीं। चुनावी इतिहास तो यही सिद्ध करता है अब चाहे दिल्ली-वर्धा-पुणे जो मर्जी आंकलन करे।

जो लोग नक्सलवाद पर पैनी दृष्टि रखते हैं वे स्वामी अग्निवेष की बस्तर में विशेष रुचि से अवश्य अवगत होंगे। अग्निवेश ने बाकायदा सोनी सोरी के पक्ष में चुनाव प्रचार किया और नक्सलियों से यह अपील भी की थी कि वे चुनाव जीतने में सोनी सोरी की मदद करें। नक्सलियों से मांगी गयी इस मदद के व्यापक मायने हैं, कोई गहरे इसे बूझने का यत्न तो करे। यद्यपि बीबीसी की हिन्दी बेबसाईट में इसी दौरान एक खबर छपी जिसमें बताया गया कि माओवादियों की दक्षिण रीज़नल कमेटी के सचिव गणेश उईके ने एक बयान जारी कर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और सोनी सोरी के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाये तथा चुनाव बहिष्कार की अपील जारी की। बस्तर में चल रहा यह पूरा प्रकरण चुनाव में गहरी अभिरुचि बढा रहा था। 

यह चुनाव यह स्पष्ट करता है कि नक्सलवाद के नाम पर बाहर से होने वाली चीख चिल्लाहट का कोई जमीनी आधार बस्तर में मौजूद नहीं है। अगर आम आदमी पार्टी की खाल सोनी सोरी ने न भी ओढी होती तो भी इतने वोट उन्हें आसानी से मिल जाते अपितु अधिक सम्मान से उन्हे देखा जाता तथा संभव है तब चुनाव लडे जाने को संघर्ष की संज्ञा भी दी जा सकती थी। आम आदमी पार्टी अपने इस प्रत्याशी को ले कर कितनी संजीदा थी इस बात का प्रमाण यह है कि जहाँ अमेठी, वाराणासी, गाजियाबाद जैसी हारी हुई सीटों पर माथाफुटौव्वल आज भी जारी है वही बस्तर सीट की इस पराजय का कोई नामलेवा पिछले तीन दिनो से चल रही पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी कोई नहीं था। वस्तुत: मुझे सोनी सोरी और विनायक सेन एक ही तराजू में झूलते नजर आते थे। वे जब तक जेल में थे तब तक कथित आन्दोलन और हवाई जिन्दाबाद-मुर्दाबाद वादियों के प्रतीक थे जेल से बाहर आने के बाद सेन नदारद हैं और सोरी भी भुला दी जायेंगी, झंदाबरदार जल्दी ही कोई न कोई नया प्रतीक तलाश लेंगे। सनसनी की राजनीति की यह स्वाभाविक परिणति है। रही आम आदमी पार्टी की बात तो बस्तर के परिप्रेक्ष्य में ये मौकापरस्त किसी सहानुभूति के भी हकदार नहीं है। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Sunday, May 25, 2014

लाल बुझक्कड बूझगे और न बूझो कोय!!



पिछले पृष्ठ से क्रमश: 

[झिरमघाटी नक्सली हमले पर एक संस्मरण]
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झिरमघाटी की निंदनीय तथा भयावह घटना को पूरा एक वर्ष हो गया। इस घटना की अनेक कोण से विवेचनायें होती रही हैं। केवल यह मान कर कि नक्सली हमला कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा की हत्या करने की साजिश भर थी और इस तरह सलवा जुडुम का बदला लिया गया, इसे बहुत उथला विश्लेषण कहा जा सकता है। इस घटना के स्पष्ट राजनीतिक मायने भी थे। नक्सलियों द्वारा कॉग्रेसी नेताओं की एक पूरी पीढी को समाप्त करने के पीछे की समग्र योजना और उसके कारणों का सामने आना अभी शेष है। घटना के तीन दिन बाद मैं तत्कालीन माहौल और प्रभावों को जानने समझने के लिये दरभा घाटी को जोडने वाले दो छोर पर अलग अलग दिशा से गया था। जो कुछ इस आलेख के माध्यम से मैं कहने की कोशिश कर रहा हूँ उसे केवल संस्मरण कहना न्यायोचित नहीं होगा, यह इतिहास बन चुकी घटना पर एक अलग दृष्टिकोण अवश्य है। 

28 मई 2013 की सुबह; सड़क एकदम सूनसान थी। बचेली से बारसूर की तरफ बढ़ते हुए बार बार ध्यान सड़क के दोनो ओर गिराये गये पेड़ों की तरफ जा रहा था। 25 मई को बस्तर की दरभा घाटी में हुई लाल-आतंकवादी घटना समय ही सुकमा से बचेली और गीदम पहुचने वाले दोनो ओर के मार्गों पर बड़े बड़े पेड़ काट कर गिराये गये थे। सरसरी निगाह से देखने पर ही यह समझा जा सकता है कि दरभा घाटी में हुआ मौत का भयानक ताण्डव अगर वहाँ नहीं होता तो भी टलता नहीं। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा के जाने के प्रत्येक मार्ग अवरुद्ध किये गये थे और पेडों को महेन्द्र कर्मा के गृहनगर ‘फरसपाल पहुँच मार्ग’ से कहीं आगे तक काट काट कर गिराया गया था जिससे कि वारदात के समय गाडियों के चक्के जाम रहें। 

जैसे ही हम कुछ और आगे बढे एक पेड पर चिपाकाया गया पोस्टर नज़र आया। पोस्टर में महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या के बाद अब सलवा जुडुम के नेताओं को जान से मारने की धमकी दी गयी थी साथ ही ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिये मुर्दाबाद था। ऑपरेशन लाल हंट वालों को हर तरफ से अपने ही हंट की चिंता है यह बात इस पोस्टर की विवेचना से स्पष्ट है। सलवा जुडुम भले ही अब समाप्त हो गया हो लेकिन उसके नेताओं से बदला लिया जाना है जिससे कि आदिवासी कभी भी माओवादियों के खिलाफ सिर न उठा सकें और दूसरी बात कि उनके खिलाफ चलाया जा रहा तथाकथित अभियान बंद हो जिससे कि वे निष्कंटक अपना आधार इलाका बढा सकें और समूचे बस्तर को सुरसा मुख में निमग्न कर उसका लाल-सलाम कर दें। 

हमारे यहाँ दिल्ली से नौटंकीबाज समाजसेवियों की खूब सुनी जाती है तो चलिये उनकी ही जनपक्षधरता के नारों का ग्राउंड जीरो में खोखलापन देखें। दंतेवाड़ा को बचेली से जोड़ने वाला शंखिनी नदी पर अवस्थित एक पुल दोनो ओर से चार स्थानों से लगभग काट दिया गया था जिससे कि आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाये। इस बात को सामान्य करार देते हैं, मान लेते हैं कि सड़क तो केवल पूंजीपति और मध्यमवर्तीय लोगों की थाती है आम आदिवासी तो सड़क का उपयोग ही नहीं करता होगा? हो सकता है दिल्ली से एसा ही दिखता हो तो परे कीजिये इस बात को और यहाँ से कुछ सौ मीटर और आगे बढते हैं जहाँ माओवादियों के घटना के एन दिन एक वनोपज जांच नाका गिरा दिया था। दिल्ली सही चीखती है कि वन अधिकारी शोषक हैं इस लिये माओवादियों ने न्याय किया होगा। लेकिन सड़क के दूसरी ओर जहाँ बरसात-धूप से बचने के लिये यात्री शेड बना हुआ था उसे क्यों ध्वस्त किया गया? कोई नवीन जिन्दल उसके नीचे नहीं रुकता, कोई मध्यमवर्गीय व्यापारी, सेठ या किसी शरीर में आत्मा घुसा कर कोई जमींदार भी पुनर्जीवित हो यहाँ नहीं ठहरता। यह तो बस्तर की दो अलग अलग घाटियों को जोडने वाला स्थान था और यहाँ आगे जाने वाले यात्री वाहन की प्रतीक्षा करने के लिये आदिवासी ही विपरीत मौसमों में ठहरते थे। इस क्षेत्र में जो भी इमारते थी, संकेत चिन्ह थे, तथा होल्डिंग्स लगे थे सभी को जैसे चूर चूर कर दिया गया है। किसी बात की खीझ निकाली जा रही हो या गुस्सा प्रदर्शित किया जा रहा हो संभवत: एसा ही कुछ वहाँ देखा जा सकता था। 

इस दृश्य पर ठहर कर दरभा घाटी की घटना की विवेचना करते हैं। कुछ दिनों पहले एक खबर नारायणपुर से आयी थी जिसमे बताया गया था कि माओवादियों ने ग्रामीणों पर पेड काटने के लिये जुर्माना लगाया है। यह बात कही गयी थी कि इस तरह जंगल बचेंगे। वस्तुत: हम एक घटना का दूसरी घटना से तार कभी जोडते ही नहीं। मेरी बात को सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर तीनो ही मार्गों पर जाने वाले लोग आसानी से समझ सकते हैं। सड़क को अवरोधित करने के लिये माओवादियों द्वारा पेड़ काट कर गिराया जाना एक आम घटना है। उल्लेखित सड़कों के किनारे किनारे आपको सैंकडो काटे गये पेडों के ढूंठ नज़र आ सकते हैं। मुझे आशंका है कि मार्ग अवरुद्ध करने के लिये पेड़ काटा जाना कोई क्रांतिकारी गतिविधि नहीं अपितु आदिवासियों के संसाधनों की लूट का एक नये तरह का जरिया है। दरभा घाटी की घटना के दिन अकेले ही सौ से अधिक बडे बडे पेड काट कर मार्ग में बिछा दिये गये थे। मुझे अधिकतम पेड सागवान के लग रहे थे। अंचल के एक वरिष्ठ पत्रकार से जब मैने इसकी तस्दीक की तो ज्ञात हुआ कि चुन चुन कर सागवान के ही पेडों को काटा गया था। इतना ही नहीं दूसरे दिन किसी चमत्कार की तरह काटे गये पेडों के मुख्य हिस्से सड़क से गायब भी हो गये। मुझे किसी की आई क्यू पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना है आप चाहें तो इस सच्चाई के पीछे के खेल को नजरंदाज कर जनपक्षधरता की तकरीरे जारी रख सकते हैं। 

‘पर्यावरण और माओवादी’ बडा ही मजेदार विषय है जिसे बस्तर में होने वाली “मौतों पर जाम टकराने वाले एक विश्वविद्यालय” के विशेषज्ञों द्वारा बार बार दुहाई की तरह उठाया जाता है। मैने कई बार आदिवासियों से इस बात को जानने की कोशिश की है और अपुष्ट सूत्रों से यह बता सकता हूँ कि बस्तर के कई दुर्लभ पक्षी बाशिंदे निरंतर भूने खाये जा रहे हैं। आपको आदिवासियों के शिकार पर आपत्ति है और भीतर कई निरीह प्राणी इस महान सो-काल्ड साईंटिफिक सोच वाली लाल-सेना के कैम्प फायर की शोभा होते हैं। एक कश्मीरी पंडित लेखक ने फौरी बस्तर भ्रमण (माओवादियों से मिल कर उनसे सोने-जागने-धोने-नहाने पर किताबें लिखने वाला परिभ्रमण) के बाद लिखा कि किस तरह माओवादी कैम्प के बाहर एक सांप दिखा और उसे तुरंत मार दिया गया। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि बस्तर की कई महत्वपूर्ण खदाने जो कि कोरंडम, टिन जैसे बहुमूल्य संसाधनों की है उनपर अब लाल-आतंकवादियों का कब्जा है और मैं उन पर स्मग्लिंग का आरोप लगाउं- तौबा तौबा, आप तो यूं कहिये कि आदिवासियों के लाल-हंट के लिये बस्तर के ये संसाधन अब साधन जुटाने का काम कर रहे हैं। ये सभी वे कहानियाँ हैं जिन पर आपको कोई युनिवर्सिटी बात करती नजर नहीं आयेगी, कोई लेखक अपनी किताब में छाप कर चर्चा नहीं करेगा, कोई जनपक्षधर लाल-सलामी लेखक इन तथ्यों पर निगाह भी नहीं डालेगा। बस्तर मरता है तो मरे इससे किसको सरोकार? 

सच्चाई तो यही है कि जब 75 जवान मरे थे तब भी दिल्ली में खिलखिलाहट थी और जब 31 जनप्रतिनिधि मारे गये तब भी दिल्ली के कई बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इसे तरह तरह से जस्टीफाई करने में लगे हैं। एक कविता कहती है कि जब नाजी कम्युनिष्टों के पीछे आये तब कोई नहीं बोला; तो बाद में सारे कम्युनिष्ट ही बंदूखें पकड कर बस्तर के जंगलों में नाजी बन गये; और खबरदार अब कोई मत बोलना? लाल-आतंकवादियों को साम्राज्यवादी कहने के पीछे मेरा तर्क वृथा भी नहीं है। यह बात तो सर्व-विदित है कि दरभा घाटी की घटना के पीछे आन्ध्र-ओडिशा-महाराष्ट्र-झारखण्ड के आतंकवादियों का हाथ था। एयरपोर्ट में मिलने वाला मंहगा पानी गटकने वाले आतंकवादी बस्तर को कैसा रखना चाहते हैं यदि इस बात को कोई प्रमाण के साथ समझना चाहता है तो आपको केवल इतना करना है कि सुकमा-कोण्टा मार्ग से हैदराबाद जाने वाली बस में बैठ जाईये। जबतक बस्तर है तब तक आपकी बस हिचकोले खाती हुई जायेगी। माओवादियों ने इस सड़क को इतनी जगह से काटा है कि अब गिनती करना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे ही कोण्टा की सीमा समाप्त होती है और आन्ध्र लगता है तो चमत्कार नजर आता है। भाई यह भी तो माओवादी इलाका ही है लेकिन यहाँ की सड़क इतनी बढिया और फोर लेन? मैं जानता हूँ कि मेरी बात को कोई नहीं बूझ सकता - “लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!”

-राजीव रंजन प्रसाद 

झिरम घाटी हमले की बरसी पर दैनिक पत्रिका (छ.ग) में टिप्पणी


Sunday, May 18, 2014

बस्तर में इतिहास और नक्सलवाद का प्रवेशद्वार

इतवारी अखबार मे प्रकाशित  - 


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बस्तर को बूझने की पहली कड़ी है उसकी प्राणदायिनी सरिता इन्द्रावती। यह असाधारण नदी है जिसके पाटों में इतिहास और समाजशास्त्र मिलकर अपनी बस्तियाँ बसाये बैठे हैं। ओडिशा के कालाहाण्डी जिले में रामपुर युआमल के निकट डोंगरमला पहाड़ी से निकल कर इन्द्रावती नदी लगभग तीनसौछियासी किलोमीटर की अपनी यात्रा में पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। बस्तर पठार की पश्चिमी सीमा में यह नदी दक्षिण की ओर मुड कर भद्रकाली (भोपालपट्टनम) के पास गोदावरी नदी में समाहित हो जाती है।

बहुत समय से भद्रकाली जाने की मन में इच्छा थी। अपनी पुस्तक “बस्तर इतिहास एवं संस्कृति” में लाला जगदलपुरी ने “भद्रकाली का नीला-गेरुआ जलसंगम” शीर्षक से एक संस्मरण लिखा है जिसे पढने के पश्चात इस क्षेत्र को देखने की इच्छा बलवती हो उठी थी। लाला जी का लिखा संस्मरण वर्ष-1986 की वसंतपंचमी का है जब भद्रकाली का क्षेत्र अपने घने जंगलों और नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों के लिये जाना जाता था किंतु फ़िजाओं में बारूद की गंध नहीं थी। समय के साथ यह क्षेत्र लाल आतंकवाद का प्रवेशद्वार बना। यहाँ के लुभाने वाले हरे भरे जंगल और मंत्रमुग्ध करने वाली पर्वत श्रंखला शनै: शनै: भय और आतंक का पर्याय कहे जाने लगे। यदि भौगोलिक दृष्टि से भद्रकाली की अवस्थिति को समझने की कोशिश की जाये तो यह भारत की दो पवित्रतम तथा प्राचीनतम नदियों की संगम स्थली है जो वस्तुत: तीन राज्यों की सीमा भी है। एक ओर आन्ध्रप्रदेश, दूसरी ओर महाराष्ट्र तथा तीसरे हिस्से की भूमि छत्तीसगढ राज्य है।

वातावरण में फरवरी की हल्की सी ठंडक विद्यमान थी। मेरे साथ सहयात्री थे मित्र कमल शुक्ला; रात्रि-विश्राम बीजापुर में करने के पश्चात हम सूरज की पहली किरण के प्रस्फुटन के साथ ही भोपालपट्टनम के लिये निकल गये थे। जीवंतता इन दिनो पूरे बस्तर से ही विलुप्तप्राय हो गयी है संभवत: इसी लिये बीजापुर से भोपालपट्टनम का सडकमार्ग एकदम सूनसान प्रतीत हो रहा था। भोपालपट्टनम प्रवेश कर पाते इससे पहले ही एक स्थान पर हम ठिठक गये। यहाँ लगभग दस से पंद्रह पेडों पर दर्जनों नक्सली पोस्टर लगाये गये थे। अनेक पोस्टरों में मुद्दे बैलाडिला से सम्बद्ध थे और उनमें लोहे की खदानों को बंद कराने की अपील थी। कुछ पोस्टर ऑपरेशन ग्रीन हंट को बंद करने, ग्रामीणों की हत्या रोकने, लुटेरी पार्टियों को गाँव में घुसने न देने आदि की चेतावनी भरे थे। नक्सलगढ में ऐसे स्वागत तोरण अपेक्षित ही थे। अब तक जितने भी नक्सली पोस्टर मैने पढे अथवा देखे है उसमें भाषा को ले कर जो भी त्रुटियाँ रहती हों मसलन “हत्या” की जगह “अत्या” अथवा “किनारे बसे” के स्थान पर “कीनारे बासे” आदि किंतु अपनी बात को नक्सली बहुत स्पष्टता से रखते हैं। प्राय: इन पोस्टरों की लिखावट मैंने इतनी सुंदर देखी है कि लगता ही नहीं कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों की परिधि में ये हिन्दी में लिखे गये पोस्टर लगाये गये हैं। 

हमने यह ठीक समझा कि स्थानीय मित्रों से भद्रकाली की ओर आगे बढने से पहले सहायता ले ली जाये। भोपालपट्टनम में अफ़ज़ल भाई को कौन नहीं जानता, एकदम निर्मोही और जीवट किस्म के पत्रकार। हम अफज़ल भाई के निवास पर पहुँचे तो वे केवल एकवस्त्र में भूमि पर विराजमान थे और सरसों के तेल से अपनी मालिश करवा रहे थे। हमने भी उनकी परमानंद की इस अवस्था में कोई दखल नहीं दिया अपितु उनके इशारे भर से हमारे लिये पानी और नाश्ते की व्यवस्था हो गयी थी। अफजल भाई हमारे साथ भद्रकाली तक चलने के लिये तैयार हो गये। तूम्बा भर कर पानी गाड़ी में रख लिया गया और हम तीनो ही आगे बढ चले थे। कुछ ही देर में मुख्यसड़क का साथ छूट गया और पथरीली उबड़-खाबड़ सडक ने हमारा स्वागत किया। एकाएक उँचाई से हमें तीव्र ढाल दिखाई पडी जो कि चिंतावागु नदी तक पहुँचती थी। रास्ता पूरी तरह रेतीला और उसपार जाने के लिये गाडी को इस नदी से हो कर ही निकलना था। यह भी किसी दक्ष वाहनचालक के बूते की ही बात थी क्योंकि एक निश्चित गति से चलाते हुए गाडी को नदी पार न करायी गयी तो पहियों के फँस जाने का अंदेशा था। नदी पार करते ही हमने राहत की सांस ली, हम किनारे उतर कर यहाँ के परिदृश्य का जायजा ले ही रहे थे कि सामने से स्थानीय युवा-आदिवासी पत्रकार सोमैया अपनी मोटरसायकल से आता दिखाई दिया। अफज़ल भाई ने उसकी मोटरसायकिल स्वयं के कर यहाँ हमसे विदा ली और सोमैय्या को हमारा आगे का मार्गदर्शक नियत कर दिया। 

आदिवासियों की बैद्धिकक्षमता, कार्यनिष्ठा और लगन का सजीव उदाहरण है सोमैया। चिंतावागु के तट से आगे बढते हुए भद्रकाली तक रास्ते के एक-एक मोड़ और उससे जुडी अनेकानेक घटनायें उसके माध्यम से सुनकर कभी हृदय रोमांचित होता तो कभी सिहरन मन में दौड़ जाती थी। इसमे कोई संदेह नहीं कि जिस रास्ते से हम अब गुजर रहे थे वह माओवादियों की सक्रिय कर्मभूमि है। सोमैया जब हमे रास्ते में बताता कि इस मोड पर गाडी उडा दी गयी थी, इस घाटी में मुठभेड हुई थी और ग्यारह लोग मर गये थे या कि यहाँ वाहनों को जला दिया गया था तो हर बार उसकी कम्पन रहित आवाज़ पर मुझे महसूस होता था कि इन वादियों और यहाँ के रहवासियों ने यह सब स्वाभाविक मान लिया है। 

रास्ता पूरी तरह उजाड़ और पथरीला था तथा भद्रकाली तक पहुँचना केवल उनके ही बूते की बात है तो यह कमर कस कर निकले हों कि अब चाहे जो हो वहाँ पहुँचना ही है। यह सडक मार्ग भोपालपट्टनम को आन्ध्र से भी जोडता है। यहाँ से गुजरने वाले इक्कादुक्का वाहन ग्रामीणों से खचाखच भरे हुए थे। इसमे कोई संदेह नहीं कि माओवादियों की सहमति और जानकारी के बिना यहाँ वाहन नहीं चल सकते थे। रास्ते में अनेक स्थानों पर सडकों को काटे जाने तथा जानबूझ कर बाधित किये जाने के चिन्ह स्पष्ट  देखे जा सकते हैं। समय समय पर माओवादियों द्वारा अपने किसी मिशन अथवा गतिविधि को अंजाम देने के लिये इन टूटी-फूटी सडकों को भी काट दिया जाता है और इस तरह आवागमन पूरी तरह बाधित कर दिया जाता है। ये काटी गयी सड़कें फिर किसी माससून में पानी के साथ बह आती मिट्टी से खुद ही भर जायें तो ही आवागमन के लिये पुन: खुल पाती हैं। मैं बहुत खामोशी से महसूस कर रहा था कि ये मध्ययुगीन दृश्य इक्कीसवीं सदी के भारत का हिस्सा हैं। पूरे रास्ते हमे इक्का दुक्का लोग ही मिले। सड़क के किनारे खडी कुछ युवतियों के जूडे में लगे फूलों के गजरे से यह बात मुझे स्पष्ट होने लगी थी कि इस क्षेत्र में बस्तर की संस्कृति पर आन्ध्र-महाराष्ट्र का संगम भी देखने को मिलने लगता है। कुछ आगे बढने पर मुझे बताया गया कि बस्तर में पचास के दशक में कलेक्टर रहे आर.एस.वी.पी नरोन्हा के नाम पर यहाँ एक गाँव और तालाब भी अवस्थित है।

बोलेरो जैसी कठिन रास्तों में चलने के लिये सक्षम जीप में यात्रा करते हुए भी कमर में दर्द हो चला था। हमारी आगे बढने की गति दस किलोमीटर प्रतिघंटा के आसपास रही होगी और यह लग गया था कि भद्रकाली पहुँचने-लौटने में ही आज पूरा दिन लग जायेगा। भद्रकाली गाँव के करीब पहुँचने पर हमे एक पुलिसकैम्प दिखाई पड़ा जिसके निकट से आगे बढते ही अब ग्रामीण बसाहट दिखने लगी थी। यहाँ एक पहाडी टेकरी पर भद्रकाली का मंदिर अवस्थित है जिसके नाम से ही गाँव को पहचान मिली है। मुझे स्थानीय पुजारी ने बताया कि प्रतिमा यहाँ पर बाद में स्थापित की गयी है और मंदिर किसी तहसीलदार द्वारा बनवाया गया है। पहले पहाडी टीले को ही देवी भद्रकाली का सांकेतक मान पर प्रार्थना-जात्रा संपन्न की जाती रही है। लाला जगदलपुरी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि “मंदिर के तत्वाधान में प्रतिवर्ष त्रिदिवसीय मेला लगता है। वसंतपंचमी के एक दिन पहले मेला भरता है और दूसरे दिन मेले का समापन बोनालू होता है। बोनालू के अंतर्गत हल्दी-कुमकुम से सजे हुए तीन घड़े रखे जाते हैं। एक के उपर एक। नीचे के घट में खीर रखी होती है। बीच के घडे में खिचडी रखते हैं और उपर वाले घडे में रहती है सब्जी। उपर वाले घट पर एक दीपक जलता रहता है। कई महिलायें अपने तीनों घडों को सिर पर रख कर मंदिर की परिक्रमा करती हैं। प्रदक्षिणा पूरी हो जाने के बाद हंडियों में रखी खीर, खिचडी और सब्जी का प्रसाद दर्शनार्थियों में बांटा जाता है। इसके अतिरिक्त तीन तीन साल में यहाँ अग्निप्रज्वलन समारोह भी श्रद्धालु शैव भक्तों द्वारा आयोजित होता रहता है। अग्निकुण्डों में अग्नि समयानुसार प्रज्ज्वलित रखी जाती है। मनौतियाँ मानने वाले लोग उपवास रखते हैं और आस्थापूर्वक अग्निकुण्डों में प्रवेश करते हैं और अंगारों पर चल निकलते हैं। भद्रकाली मंदिर में दर्शन करने के पश्चात हम अब उस जगह की ओर बढ चले थे जो दो महान सरिताओं की आलिंगन स्थली है और जहाँ गोदावरी नदी में बस्तर की प्राणदायिनी नदी इन्द्रावती समा कर अपना अस्तित्व विसर्जित कर देती है। आगे बढते हुए यहाँ ताड़ के पेडों की कतारें और खपरैल के बने तीस-पैंतीस मकानों की बसाहट दिखाई पड़ी।

इतिहास मेरे सामने उपस्थित हो गया था। यही वह स्थान है जहाँ से वर्ष-1324 में अन्नमदेव ने नागों के शासित क्षेत्रों में प्रवेश किया और बस्तर राज्य की स्थापना जी। इसी संगम स्थली पर प्रार्थना करने के पश्चात ही अन्नम्मदेव ने अपना बस्तर विजय युद्धाभियान आरम्भ किया था। यही वह स्थान है जहाँ से अस्सी के दशक में नक्सलवादी भोपालपट्टनम में प्रविष्ठ हुए और धीरे धीरे अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए सम्पूर्ण अबूझमाड को अपना आधार क्षेत्र बना लिया। आज यही संगम स्थली न केवल तीन राज्यों के बीच संस्कृतियों का आदान-प्रदान कर रही है अपितु दु:खद यह कि दुर्दांत आतंक भी इसी स्थल को धुरी बना कर तीन राज्यों के लिये चुनौती बना हुआ है। 

एक पहाडी टीले से नीचे उतरने के बाद दूर दूर तक रेत का विस्तार दिखाई पड़ा। यह प्रतीत हो रहा था कि लगभग दो किलोमीटर इसी रेतीली भूमि पर चलने के पश्चात ही हम संगम तक पहुँच सकते हैं। गर्मी थी तथा यह दूरी देख कर एक बार के लिये हिम्मत जवाब देने लगी। दूर इन्द्रावती दिखाई पड रही थी और निगाह दौडाने पर गोदावरी नदी क्षितिज बनी हुई थी। लगभग आधा किलोमीटर ही आगे बढने के बाद लगा जैसे दूसरी दुनिया सामने प्रकट हो गयी है। दूर दूर तक बैगनी और काले रंग के पत्थरों के अनेक तरह की आकृतियाँ जो नदी की विपरीत दिशा में झुकी हुई दिखाई पड़ रही थीं। हम इन्द्रावती की दिशा से संगम की ओर बढ रहे थे और यह स्पष्ट था कि नदी ने पूर्ण विश्राम से पहले राह में मिलने वाले सभी अवरोधों को बारीक रेत बना दिया है। वे चट्टाने जिन्हें स्वयं पर फौलादी होने का दंभ रहा होगा अब भी शनै: शनै: अस्तित्व खो रहे हैं। नदी निर्मित स्थलाकृतियों का एसा अद्भुत सौन्दर्य मैने अन्यत्र नहीं नहीं देखा है। यह किसी चित्रकार की कल्पना जैसा लगता है जहाँ केनवास पर रेतीला रंग बिखेर कर फिर करीने से उभरे-तराशे हुए पत्थरों की छटा उकेरी गयी हो।

संगम निकट आ गया था। इन्द्रावती नदी की रफ्तार बहुत धीमी हो चली थी जबकि सामने से बह आती गोदावरी में गहराई और वेग साफ देखा जा सकता था। बहुत लम्बे समय की साध साक्षात देख मैं रोमांचित हो उठा। गोदावरी की ओर कोई मछुवारा अपनी नाव से जाल नीचे डाले मछली के फसने की प्रतीक्षा में बगुले की तरह स्थिर खडा दिखाई पड रहा था। कमल शुक्ला राज्यों की सीमा पार करने को उद्यत थे और बस्तर की ओर से तैर कर वे महाराष्ट्र के गढचिरौली पहुँच गये। मैंने संगम का जल अपने सिर पर डाल कर स्वयं को पवित्र हुआ महसूस किया। संगम के दूसरी ओर गढचिरौली की तरफ ऐतिहासिक शिवलिंग अवस्थित है जो संरक्षण के अभाव में बहुत हद तक खण्डित हो चुका है।

इन्द्रावती नदी किनारे की ओर बहुत उथली थी। मैं पैर डुबो कर वहीं किनारे बैठ गया और प्रकृति निर्मित अनुपम सौन्दर्य को अपलक निहारता रहा। अचानक मुझे अपने पैरों में गुदगुदी सी महसूस हुई। मैने ध्यान दिया कि सैंकडों छोटी मछलियाँ मेरे पैरों के चारो ओर एकत्रित हो गयी हैं। मैने अपना पैर नहीं हटाया और धीरे धीरे महसूस करने लगा कि किस आराम से मेरे तलुओ पर के बाहरी चमडे को वे धीरे धीरे निकाल रही हैं। मुझे आराम मिल रहा था साथ ही इन्द्रावती का ठंडा पानी मुझे सुकून और ध्यान की किसी दूसरी दुनिया की ओर ले चला था। 

यह स्थल न केवल पर्यटन की दृष्टि से बस्तर को उपलब्ध एक अद्वितीय जगह है अपितु धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसकी महत्ता है। यह दु:खद है कि तीन राज्यों की सीमा होने का लाभ होने के स्थान पर हानि ही बस्तर का यह अंतिम छोर भुगतने के लिये बाध्य है। बहुत आसान है कि नावों से गोदावरी के रास्ते कोई भी बस्तर के अनछुवे सघन जंगलों और महानतम संस्कृति तक अपनी पैठ बना सकता है या कि तैर कर ही गढचिरौली से भद्रकाली तक पहुँच सकता है किंतु क्यों व्यापार इस रास्ते नहीं आता? प्रगति और समृद्धि को ये रास्ते दिखाई नहीं पडते लेकिन बारूद बेखौफ इन्द्रावती के तटों तक पहुँच रहा है। 

मैं भारी मन से दो महान सरिताओं की संगमस्थली से उठा था। अगाध सौन्दर्य जो बहुत ही कम निगाहों से गुजरा है, मेरे मानसपटल पर अंकित हो गया था। मैं कभी यह दृश्य नहीं भूल सकता और कामना भी है कि बस्तर की यह थाती हर किसी के लिये सुलभतम हो सके। इन्द्रावती बहुत खामोशी से गोदावरी का हिस्सा बन जाती है लेकिन बहुत दूर तक दोनो ही नदियों के जल को अलग अलग महसूस किया जा सकता है। बैलाडिला से चल कर अयस्क चूर्ण शंखिनी-डंकिनी नदियों के माध्यम से इन्द्रावती में मिल कर इस संगम स्थल तक भी पहुँच रहा है और इसे दूर दूर तक फैली रेत में घुले मिले भी देखा जा सकता है। अब तक दोपहर ढलने लगी थी। हम लौट रहे थे जबकि मन यहीं ठहरा रहना चाहता था। 

-राजीव रंजन प्रसाद            

Saturday, March 22, 2014

नाग हैं शहीद गेंदसिंह की विरासत के पहरेदार।



बात सितरम गाँव की है जिसके निकट एक पहाड़ी टीले पर बस्तर की एक चर्चित प्राचीन परलकोट जमींदारी का किला अवस्थित था। यह स्थान वीर गेन्दसिंह की शहादत स्थली के रूप में भी जाना जाता है चूंकि यहीं एक इमली के पेड़ पर लटका कर आंग्ल-मराठा शासन (1819 से 1842 ई.) के दौरान आदिवासी विद्रोह का दमन करते हुए कैप्टन पेव ने उन्हें 20 जनवरी 1825 को फाँसी पर चढा दिया था। हमारा अपनी विरासतों के प्रति नजरिया बहुत ही निन्दनीय है चूंकि अगर एसा न होता तो कदाचित परलकोट किले के भग्नावशेषों को संरक्षित रखने के प्रयास किये गये होते। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस इमली के पेड पर गेंद सिंह को फाँसी दी गयी थी वह सदियों जीता रहा लेकिन हाल ही में जंगल की आग की भेंट चढ गया। यथार्थ यही है कि सितरम गाँव तक मैं इसी इमली के पेड़ को छूने और महसूस करने आया था। 

केवल इमली का पेड़ ही क्यो? गेंदसिंह के नाम पर हम आज बस्तर में अनेक प्रतिमाओं और स्मारकों का निर्माण कर रहे हैं। कुछ स्कूल कॉलिज के नाम भी शहीद गेंदसिंह कर केन्द्रित रखे गये हैं किंतु इन कोशिशों में एक खोखलापन है चूंकि ये तुष्टीकरण के प्रयास सदृश्य ही प्रतीत होते हैं। यदि हमारी नीयत में विरासत का संरक्षण करने की इच्छा भी होती तो जो कुछ उस कालखण्ड का बचा हुआ है कमसेकम उसे तो आज हम बचाने का यत्न करते? 

सौभाग्य से परलकोट में गेंदसिंह के समय की एक इमारत आज भी शेष है। मुझे गेन्दसिंह के ही वंशजों ने बताया कि लगभग ध्वस्त होने की स्थिति में खड़ा प्राचीन मंदिर माँ दंतेश्वरी का है। मंदिर के ठीक सामने गेंदसिंह के स्मृति स्मारक अवस्थित हैं किंतु किसी के भी ध्यान-संज्ञान में भी नहीं आया कि उनके समय के इस मंदिर को बचाने की कोई कोशिश ही कर ली जाये। मैं मंदिर को देखने के लिये उत्सुक हो उठा था और जैसे ही मुख्यद्वार तक पहुँचा चौंक उठा। मंदिर का मुख्यद्वार बहुत छोटा था जिसमे से झुक कर ही भीतर जाया जा सकता था। दरवाजे के निकट की दीवारों में दरारें ही दरारें थी और मुझे एकाएक बडा सा नाग दिखाई पडा जो बहुत इत्मीनान से दरार छिद्र में बाहर की ओर अपना मुँह निकाले विश्राम की मुद्रा में था। मेरे साथकम इस समय पत्रकार मित्र कमल शुक्ला भी थे और हम दोनो ही इस दृश्य को देख कर अत्यधिक रोमांचित से हो गये थे। हमारे गाईड बने शहीद गेंदसिंह के परिजनों ने बताया कि मंदिर में बहुत साँप हैं। कई बार तो छ: से सात साँप तक मंदिर के अंदर कभी दीवार पर चढते तो कभी दरवाजे पर लटके दिखाई पड़ते हैं। मेरे भीतर भय प्रवेश कर गया था और अब मंदिर के भीतर घुसने में हिचकिचाहट हो रही थी। 

हमें बताया गया कि ये साँप किसी को काटते नहीं हैं बल्कि बहुत आराम से और बहुत लम्बे समय से यहीं रह रहे हैं। कई बार शिवरात्री में स्थानीयों ने निकटस्थ मंदिरों में भी इन साँपो को देखा है तथा उनकी पूजा अर्चना की है। मैने एक बार पुन: दीवार की दरार से झांकते उस साँप की ओर देखा और एसा प्रतीत हुआ जैसे उसे मेरी उपस्थिति से कोई मतलब नहीं। वह निश्चित रूप से मेरी ओर देख रहा था लेकिन संभवत: मैं उसके लिये कोई अस्वाभाविक अथवा खतरा तत्व नहीं था। इस बात से मुझमें साहस बढा और मैं दरवाजे से भीतर आ गया। भीतर अंधेरा था और इस बात को सत्यापित किया जा सकता था कि भीतर अनेक नागों ने अपना घर बना लिया है। मंदिर दो हिस्सों में विभक्त है जिसमे सामने का कक्ष अपेक्षाकृत छोटा है। 

भीतर कुछ दुर्लभ व अनूठी प्रतिमाओं की तस्वीरों को फ्लैश के माध्यम से कैमरे में कैद करने का अवसर प्राप्त हुआ। एक काले पत्थर पर निर्मित प्राचीन देवी प्रतिमा थी जबकि दो सफेद ग्रेनाईट पर गढी गयी प्रतिमायें थीं। चूंकि स्थानीय मान्यतायें इन प्रतिमाओं को माँ दंतेश्वरी का निरूपित करती थी अत: इनका समुचित अंवेषण होने तक ग्रामीण मान्यताओं के ही साथ चलना उचित होगा। मंदिर के बाहर एक पुरुष प्रतिमा है जिसे शीतला माता के रूप में मान्यता मिली हुई है। इन प्रतिमाओं पर विस्तार से अलगे लेख में चर्चा करूंगा। अभी यह कहना अधिक प्रासंगिक होगा कि ग्रामीण परम्पराओं ने अपने ही तरीके से इतिहास के कुछ हिस्सों को सुरक्षित तो रखा ही हुआ है। 

यह प्राचीन मंदिर बहुत लम्बे समय तक सुरक्षित नहीं रहेगा और जाहिर है किसी बरसात ढह कर अपना अस्तित्व खो देगा। क्या इस बात से हमको कोई फर्क पड़ने वाला है? लगभग नष्ट हो चुके इस मंदिर को देख-महसूस कर एक प्राचीन किंवदंति से सहमत हो गया हूँ कि जहाँ खजाना होता है वहाँ उसकी रक्षा के लिये नाग अवश्य होते हैं। हम आज यह समझ सकें अथवा नहीं कि हमारी विरासतें हमारी सम्पदा है लेकिन शायद ये नाग इस बात को जानते समझते हैं इसीलिये वे न तो आगंतुक को डराते डसते हैं न ही इस स्थल को छोड कर सदियों से किसी अन्य स्थान पर जा रहे हैं। हाँ ये नाग सितरम की विरासत के पहरुए हैं।

-राजीव रंजन प्रसाद

Tuesday, March 04, 2014

बस्तर समस्या का एक समाधान कृषि भी है



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बस्तर के गजट की तरह लिखी गयी किताब “बस्तर भूषण” (प्रकाशन वर्ष - 1908) में पं. केदारनाथ ठाकुर ने तत्कालीन खेती के तौर तरीकों का एक रेखचित्र खींचा है। उल्लेख मिलता है कि “राज्य का सोलहवां हिस्सा या उससे कम खेती के योग्य भूमि है। यहाँ के निवासियों को खेती की चाह जैसी होनी चाहिये नहीं है, उसका कारण यह है कि जंगल में कंदमूल इतने हैं जिससे लोग अपना गुजर कर लेते हैं।” इस दृष्टिकोण के पीछे तत्कालीन वन सम्पदा, राजनीति और आदिवासी जीवन शैली सम्मिलित थी; इसके अतिरिक्त शिकार उनकी भोजन शैली का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। आदिवासी चूंकि जूम कल्टिवेशन करते थे अत: स्थाई खेती अथवा फसलों पर उनका वास्तविक नियंत्रण न हो कर उनका सामना हर कुछ साल में नयी भूमि, नये परिवेश, नयी परिस्थितियों और मौसम के परिवर्तनों से होता था। धान उन दिनो बहुत कम बोये जाते थे अथवा छोटा धान जिसने लिये एक दो बरसात ही पर्याप्त है लगाये जाते थे। जुँवारी, जोंधरा, सांवा, कोसरा, मडिया, जुवार, भुट्टा, झुंडगा आदि ही लोक जीवन की प्रमुख फसलें थीं। डांडा अथवा ईख नदी के किनारे जहाँ जंगल कम थे वहाँ बोई जाती थी और उससे गुड बनाया जाता था। सब्जी लगाने के लिये जहाँ जंगल कम हैं वहीं पर बाड़ी लगा कर आवश्यकतानुरूप सेम, बरबट्टी, साग आदि लगा लिया जाता था। फलों की खेती की कोई विशेष परम्परा तो नहीं थी यद्यपि छोटे केले या जिसे हम जंगली केला कहते हैं उसे उपजाया जाता था। 

समय की आहट ने बहुत कुछ बदला तथा खेती के आयाम बदलने लगे। जूम कल्टिवेशन के स्थान पर स्थाई खेती की दिशा भी आदिवासियों को मिली। इसके साथ ही जो समस्या सामने आने लगी वह थी कि सारी पैदावार “काले मेघा पानी दे” के सिद्धांत पर निर्भर थी। बस्तर में आज भी राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का केवल एक प्रतिशत ही अवस्थित है जबकि यहाँ की मुख्य नदियों को देखें तो उत्तर की ओर महानदीम, दक्षिण की ओर शबरी, पूर्व की ओर से आरंभ कर संभाग के पश्चिमी भाग तक अपनी सहायक नदियों का जाल बनाती जीवनरेखा सरित इंद्रावती प्रवाहित है जबकि पश्चिम में बीजापुर जिले के एक बडे हिस्से को छू कर गोदावरी नदी प्रवाहित होती है। वास्तविकता देखी जाये तो इनही नदियों का समुचित उपयोग बस्तर संभाग से लगे निकटवर्ती राज्यों ने भरपूर किया है जबकि हम अब भी सिंचाई को ले कर किसी ठोस रणनीति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह भी सत्य है कि छत्तीसगढ राज्य में भी सिंचाई क्षेत्र का औसत असामान्य है। सिंचित क्षेत्र को भी आनुपातिक दृष्टि से परखा जाये तो राज्य का पच्चीस प्रतिशत से अधिक सिंचित क्षेत्र रायपुर, दुर्ग, धमतरी, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा आदि जिलों में है जिन स्थानों को गंगरेल, दुधावा, खारंग, मिनीमाता, खुड़िया, तांदुला, खरखरा, सीकासेर आदि जलाशयों से पानी उपलब्ध हो रहा है। राज्य के राजनांदगाँव, कबीरधाम, महासमुन्द, और रायगढ जिलों में सिंचाई पंद्रह से बीस प्रतिशत भूमि में हो रही है जबकि शेष जिलों में यह अनुपात दस प्रतिशत के लगभग है। अर्थात बस्तर अभी समुचित और व्यावहारिक रूप से खेती के लिये किसी बडे कायाकल्प की प्रतीक्षा कर रहा है। इस अंचल के बाँध काजगी विरोध में ध्वस्त हों, विकासोन्मुखी परियोजनायें दिल्ली की एनजीओ आधारित राजनीति में पिस जायें और सारे ग्लोब को यह तस्वीर दिखती रहे कि कितना शोषित पीडित है बस्तर....यही वर्तमान की सत्यता है।

बस्तर के किसान बहुत समय से टमाटर और बैंगन की फसल लेने के लिये संघर्ष कर रहे थे। बस्तर की मिट्टी में कुछ एसे बैक्टीरिया पाये जाते हैं जो इन पौधों की जडों को नुकसान पहुँचाते थे। इस तरह अच्छी पैदावार लेना संभव ही नहीं था। पिछले दिनो बस्तर के कृषि परिदृश्य पर शोध करने के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि इन दिनों किसान ग्राफ्टेड बैंगन तथा टमाटर के पौधे लगा रहे हैं और इसकी भरपूर फसल ले रहे हैं। यह चमत्कार कर दिखाया था रायपुर के निकट गोमची जैसे छोटे से गाँव में अवस्थित कृषि वैज्ञानिक डॉ. नायारण चावड़ा ने। उन्होंने बस्तर के किसानों की समस्या का एक बेहतरीन समाधान प्रस्तुत करते हुए उन जंगली बैंगन पादपों को चुना जिनमे बैक्टीरियल विल्ड नहीं लगते और उनके तनों के उपर बैंगन के उन पौधों के तनों को आरोपित कर दिया जो उन्नत फसलें प्रदान कर सकते हैं। मैं इन ग्राफटेड पौधों को मिली सफलता को देख कर हैरान हो उठा हूँ। जब मैं बकावंड के निकट ग्राफ्टेड पौधों से बैंगन की खेती कर रहे किसानों से बात करने के लिये पहुँचा उस समय फसल तोडी जा रही थी। सीमित आकार के खेत से अपार फसल तोडी और बोरों में भरी जाती देख कर मन हरा-भरा हो आया कि यदि सोच को खेती के साथ जोड दिया जाये तो बस्तर को इसी से विकास और सम्पन्नता की नयी दिशा दी जा सकती है। 

अपने सवालों के साथ मैं गोमची गाँव में डॉ. नारायण चावड़ा से मिला। उन्होंने बताया कि बस्तर में खेती की जो संभावनायें और परिवेश समुपस्थित है वह तो रायपुर, दुर्ग, धमतरी या कि राजनांदगाँव जैसे मध्य छत्तीसगढ जैसे इलाकों में भी नहीं है। बस्तर की जलवायु खेती के लिये राज्य के किसी भी अन्य क्षेत्र की अपेक्षा सबसे उपयुक्त है तथा गर्मी के समय में भी वहाँ मौजूद आद्रता किसानो के लिये किसी वरदान से कम सिद्ध नहीं होगी यदि वैज्ञानिक सोच के साथ यहाँ खेती की जाये। यह वास्तविकता है कि ग्रीष्मकाल में जब सारा छत्तीसगढ झुलसता रहता है उन समयों में भी बस्तर में तापमान नियंत्रित रहता है। यहीं से मुझे जानकारी मिली की बस्तर में कोण्डागाँव और जगदलपुर के किसान हाईब्रिड बीजों की खेती भी कर रहे हैं और इसमें उन्हें बहुत अच्छा मुनाफा हो रहा है। “वी.एन.आर सीड्स” यह उस कम्पनी का नाम है जिसे डॉ. नारायण चावडा के पुत्र श्री विनय चावडा संचालित कर रहे हैं और बस्तर में भी बीज की खेती के लिये किसानों को जोडने के पीछे उनका उद्देश्य यहाँ की जलवायु का लाभ उठा कर अधिक उत्पादन लेना तो है ही स्थानीय किसानों को भी इसका भरपूर लाभ हो रहा है। इसी बात के दृष्टिगत मैं कोण्डागाँव और जगदलपुर के किसानों से मिला जो हाईब्रिड बीज की खेती कर रहे हैं। यह देख कर सु:खद आश्चर्य हुआ कि न केवल छोटी छोटी भूमि में उन्नत बीज की खेती से अपनी लागत का दुगुने से अधिक किसान लाभ ले रहे हैं अपितु कृषि तकनीक के उन तक सीधे पहुँच जाने के कारण आधुनिक खेती का लाभ उठा कर अनेक किस्म की सब्जियों जिसमे करेला, तोरई, कुम्हडा, बैंगन, मिर्ची, सेम आदि सम्मिलित है इसका व्यावसायिक रूप से उत्पादन भी स्थानीय किसान कर रहे हैं।  बहुत अच्छा लगा यह देख कर कि छोटे छोटे किसानों ने अपने “नेट हाउस” बाँस और लकडी जैसी सहज उपलब्ध वस्तुओं के उपयोग से बनाये हैं। बडे किसान ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग जैसी तकनीक का भी प्रयोग कर रहे हैं। हाईब्रिड बीजों को सीधे बाजार उपलब्ध होने के कारण किसानों के लिये यह कैश क्रोप जैसा है जबकि जगदलपुर, कोण्डागाँव, नायारणपुर, दंतेवाडा आदि नगरीय बसाहटों तक सब्जी उत्पादन को भी अब बाजार मिल रहा है। यह देख कर और भी आश्चर्य हुआ कि कोण्डागाँव में लगभग सौ छोटे किसान बीज और उन्नत तरीके से सब्जी उत्पादन करने में लगे हैं जबकि जगदलपुर में बडे किसान भी उन्नत बीज उत्पादन में हाथ आजमा रहे हैं। यह बदलते हुए बस्तर की एक बानगी है। 

इसका अर्थ यह नहीं कि बदलाव आ ही गया है। खेती पर अध्ययन करने की दृष्टि से मैने सुकमा को छोड कर बीजापुर, दंतेवाडा, बस्तर, नारायणपुर, कोण्डागाँव और कांकेर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग दो हजार किलोमीटर का अध्ययन दौरा किया। कुछ मोटे मोटे अनुभव साझा करूं तो भोपालपट्तनम के निकट भद्रकाली के किसान सेम को अपनी बाडी में फैंसिंग करने की तरह लगाते हैं और बहुत अच्छा उत्पादन हो रहा है किंतु बाजार के अभाव में निजी उपयोग के अलावा यह फसल ग्रामीणों के किसी काम की नहीं है। इन दिनों परम्परागत फसलों का उत्पादन ग्रामीण कम कर रहे हैं जबकि धान, मक्का या अन्य वे फसलें जो सीधे लाभ पहुँचा सकती हों उसकी ओर आदिवासी किसानों का ध्यान भी गया है किंतु सिंचाई की समुचित व्यवस्था न होना उनकी सम्पन्नता के मार्ग का सबसे बडा अवरोधक है। पखांजुर में चूंकि लम्बे  समय से विस्थापित बंगाली बसे हुए हैं और वे अपने साथ उन्नत कृषि तकनीक भी लाये थे अत: वहाँ लहलहाती फसलें दूर दूर तक देखी जा सकती हैं। इस अवस्था से अधिक खुश नहीं हुआ जा सकता चूंकि बहुत कम आदिवासी किसान ऐसे हैं जिन्होंने बंगालियों से तकनीक सीख कर उसका प्रयोग अपनी खेती में किया हो। परलकोट और आसपास का क्षेत्र लाल-आतंकवाद से भी प्रभावित है अत: खेती को दो व्यवस्थाओं के अलग अलग दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। परलकोट से आगे जाने पर किसी संघम गाँव में मुझे वेजिटेटिव चेकडेम भी दिखाई दिया इसे स्थानीय प्रयोग तो कहा जा सकता है किंतु बडे स्तर पर इस तरह का उपयोग खेती के लिये देखा भी नहीं गया न ही फसलों को ले कर इन गावों में कोई अलग सोच दृष्टिगोचर हुई। यही लगता है जैसे बारिश ही किसानों की भाग्यविधाता संपूर्ण बस्तर में है। 

आज आवश्यकता है कि बस्तर के किसान ड्रिप इरिगेशन जैसी सिंचाई की उन्नत तकनीक का प्रयोग करने लगें जिससे कि कम पानी की उपलब्धता में भी अच्छा उत्पादन वे प्राप्त कर सकें। यह आवश्यक है कि उन्नत तकनीक और खेती के नये नये उपकरण इन किसानों को व्यवस्थित और योजनाबद्ध रूप से उपलब्ध कराये जायें साथ ही उत्पादों को सीधे बाजार से जोडने की योजना पर कार्य किया जाये। यदि केवल इतना भी हम कर सके तो बस्तर में प्रगति और विकास के नये आयाम खुल सकते हैं। क्या पता इस अंचल में विद्यमान “बंदूख” जैसे सवाल का जवाब “हल” से ही मिल जाये? 

-राजीव रंजन प्रसाद

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मेरे उपन्यास "ढोलकल" पर दंतेवाड़ा में विमर्श