Monday, June 11, 2007

अगर आदमी नहीं होता


तुमने मुझको गलत तराशा है
मैं गुलाब की पंखुडी होता
या कि ताज के संगमरमर का टुकडा कोई
या कि बादल..
मोर का पंख हो गया होता
या कि उसकी पलकों में ठहरता मोती
या कि मेरी रूह किनारा होती
किसी दूर दीख पडते अंतहीन मझधार का..

तुमने पानी को आग से बांधा
तुमने पीडा को राग से बांधा
तुमने सागर भरा है सीने में
तुमने दिल मोम का बनाया है
तुमने मन से पतंग बांधी है
तुमने दरिया को दरख्त कर दिया है
तुमने सोचा ये किस किये
सागर सूख जाता तो बस हवा होता
मैं अगर आदमी नहीं होता
खुदा होता..

*** राजीव रंजन प्रसाद
९.०१.१९९६

7 comments:

manya said...

Bahut khoobsurat bhaaw ukere hain.. aur prawaah bhi behatreen hai.. komal kawita lagti hai.. mann ko chhuti hai..saaree panktiyon mein ek alag ehsaas hai..

आशीष said...

कविता के साथ आपने जो तस्वीर लगायी है काफी खूबसूरत है।
यह एक निहारिका है(हेलीक्स), ज्यादा जानकारी के लिये यहां पर देखें। इसे भगवान की आंख भी कहा जाता है।
किसी सीतारे की मृत्यु के बाद की अवस्था है यह। सितारे की मौत भी कितनी सूंदर है

maithily said...

"तुमने मुझको गलत तराशा है
मैं गुलाब की पंखुडी होता
या कि ताज के संगमरमर का टुकडा कोई
या कि बादल..
मोर का पंख हो गया होता
या कि उसकी पलकों में ठहरता मोती .."

राजीव जी, बहुत बहुत प्यारा लिखा है आपने!

Divine India said...

कविता में भाव की प्रवीणता सर्वोव्यक्त है जिस सहजता से बनया है आपने अपनी अनछुई तस्वीर वह कहीं न कहीं मेरे हृदय में भी उभर आई है।

राकेश खंडेलवाल said...

अच्छा लिख रहे हो. निरन्तर प्रगति करते रहो, यही कामना है

Anupama Chauhan said...

Rajeevji This is Small n Sweet.
तुमने मुझको गलत तराशा है...aapne yeh aachi baat kahi ishwar se....agar yeh sab hathkande ishwar nahi apnata to aadmi wakaai khuda hi ho gaya hota..
मैं अगर आदमी नहीं होता
खुदा होता..

tanha kavi said...

मैं अगर आदमी नहीं होता
खुदा होता..

अनुपम हैं आप। इसी तरह हमारा मार्गदर्शन करते रहिये।