Friday, June 15, 2007

ज़ुल्फ और क्षणिकायें

ज़ुल्फ -१


उसनें कहा था
हवाओं में खुश्बू भरी होगी मुझसे दूर
मेरे ज़ुल्फों के खत पुरबा सुनायेगी तुम्हे
ये क्या कि ज़हर घुला है हवाओं में
एक तो जुदाई का मौसम
उसपर तुम्हारी तनहाई का दर्द
हवाए कहती हैं मुझसे..



ज़ुल्फ -२



तुमने ज़ुल्फें नहीं सवारी हैं
घटायें कहती हैं मुझसे
बेतरतीब चाँद भला सा नहीं लगता
बादलों में उलझा उलझा सा
हल्की सी बारिश से नहा कर निकला
उँघता, अनमना, डूबा सा
झटक कर ज़ुल्फें
खुद से खींच निकालो खुद को
सम्भालो खुद को..



ज़ुल्फ -३



ज़ुल्फों के मौसम फिर कब आयेंगे?
बिलकुल भीगी ज़ुल्फें
एकदम से मेरे चेहरे पर झटक कर
चाँद छुपा लेती थी अपना ही
मैं चेहरे पर की फुहारों को मन की आँखों से छू कर
दिल के कानों से सूंघ कर
और रूह की गुदगुदी से सम्भालता खुद को
फिर तुम्हे ज़ुल्फों से खीच कर
हथेलियों में भर लिया करता था…



तुमने ज़ुल्फें मेरी आँखों में ठूंस दी हैं
अब तो पल महसूस भी न होंगे, गुजर जायेंगे
ज़ुल्फों के मौसम फिर कब आयेंगे..



ज़ुल्फ -४



ज़ुल्फों के तार तार खींचो
उलझन उलझन को सुलझाओ
तुम खीझ उठो तो ज़ुल्फों को
मेरी बाहों में भर जाओ
मेरी उंगली से बज सितार
बुझ जायेंगे मन के अंगार
मैं उलझ उलझ सा जाउंगा
खो जाउंगा भीतर भीतर
हो जाउंगा गहरा सागर..



ज़ुल्फ -५



बांध कर न रखा करो ज़ुल्फें अपनी
नदी पर का बाँध ढहता है
तबाही मचा देता है
एसा ही होता है
जब तुम एकाएक झटकती हो
खोल कर ज़ुल्फें..



ज़ुल्फ -६



टूट गया
बिखर गया
सपनों की तरह मैं
कुचल गया
पिघल गया
मोम हो गया जैसे
फैल गया
अंतहीन समंदर की तरह मैं
खो गया
खामोश था
रात हो गया जैसे
और तार तार था
उलझी सी गुत्थी बन
ज़ुल्फ हो गया तेरी..



ज़ुल्फ -७



मुर्दा चाँदनी का कफन
जला देता है
कफन तो कफन है
ज़ुल्फ ढांप दो..



*** राजीव रंजन प्रसाद
७.०१.१९९६

7 comments:

tanha kavi said...

सभी क्षणिकाएँ खुद में अद्भुत हैं।

तुमने ज़ुल्फें नहीं सवारी हैं
घटायें कहती हैं मुझसे
बेतरतीब चाँद भला सा नहीं लगता
बादलों में उलझा उलझा सा
हल्की सी बारिश से नहा कर निकला
उँघता, अनमना, डूबा सा
झटक कर ज़ुल्फें
खुद से खींच निकालो खुद को
सम्भालो खुद को..

राजीव जी, कोई जवाब नही है आपका।

बांध कर न रखा करो ज़ुल्फें अपनी
नदी पर का बाँध ढहता है
तबाही मचा देता है
एसा ही होता है
जब तुम एकाएक झटकती हो
खोल कर ज़ुल्फें..

प्रेम को इन शब्दों के माध्यम से बडी खुबसूरती से लिखा है आपने।
आपसे एक आग्रह है , मुझ मूढ को आपकी सबसे अंतिम क्षणिका समझ नही आई। कृप्या मेरी सहायता करें।

Divine India said...

क्या बात है राजीव जी…पहले सीमा अब जुल्फ मन की उर्वर भूमि किसे निहारने का प्रयास कर रही आपकी अगली क्षणिका मेरे हिसाब से नयनों पर…का इंतजार रहेगा…। बहुत उम्दा लिखा है…यहा अंधकार भी मिला और नमी भी…।

रंजू said...

कमाल का लिखा है ...बहुत ही सुंदर

Udan Tashtari said...

सुंदर सुंदर कवितायें पेश की गई. मन आनन्दित हुआ और आपको बधाई.

आप बहुत अच्छा लिख रहें. इसी कलेवर में कुछ और भी उठाया जाये पाठकों की मांग पर. :)

somen said...

kya baat hai. bahut khoob!!! rajivji, agar aapko yaad ho to hum orkut pe bhi mile hain. aur aapke comment ke liye shukriya.

महावीर said...

आपकी ख़ूबसूरत तहरीरों ने ज़ुल्फ़ों को चंद सतरों में पिरो दिया। बेहद ख़ूशनुमा लिखने पर दिली मुबारिकबाद क़बूल कीजिए।

manya said...

Kya khoobsoorat chhadikaayen hain.. itni khoobsurat to wo julfen bhi na hongi jinhe dekh kar ye likhi gayi hain.. kahane ko ye chhadikayen hain par .. der tak rahti h mann mein.. sach mein waah!!!!..