Monday, July 14, 2008

नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास (“बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” आलेख श्रंखला)



आई प्रबीर-द आदिवासी गॉड देर रात तक इस पुस्तक पर आँखें गडाये रहा, कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा। सीने पर पडी किताब से एक सपना आँखों के भीतर चू गया। मेरे सम्मुख देवताओं की तरह दिखने वाला व्यक्तित्व खडा था - चौडा ललाट, बोलती हुई आँखें और कंधे तक बिखरे हुए बाल। एक दिव्य मुस्कुराहट उनके व्यक्तित्व की शोभा थी और ललाट पर तिलक उनके आकर्षण को विस्तार दे रहा था। मुझे पहचानते देर न लगी कि मैं बस्तर अंचल के अंतिम शासक और माँ दंतेशवरी के अनन्यतम पुजारी के सम्मुख खडा हूँ। स्वपन में भी यह चेतना रही कि स्वप्न देख रहा हूँ। सपने में भी निश्चित ही मुस्कुराहट खिल उठी होगी कि मुन्नाभाई की गाँधीगिरि का सिनेमा, हाल ही में देखा था और स्मृतियों में ताजा था। लेकिन अवचेतन में यह खयाल कहाँ था?


महाराज के स्वाभाविक सम्मान में मेरा मस्तक स्वयं नत हो गया। चालीस साल से भी अधिक हो गये महाराज प्रबीरचंद भंजदेव काकतीय की नृशंस हत्या को।...। विशुद्ध सरकारी और पूर्णत: राजनीतिक हत्या? अब क्या है जिसकी तलाश में यह महान आत्मा मेरे स्वप्न को कुरेदती है? सवाल बहुत थे और उत्तर पाना भी चाहता था, कि एक आत्मीय सा साँथ मेरे कंधे पर रख कर उन्होने कहा - कहाँ जा सकता हूँ, कि इस मिट्टी के कण कण में मैं ही तो हूँ। मिट्टी में मिल कर भी कहाँ मिटा मैं?

मैं इस सच से वाकिफ था। बात आज-कल की ही है, मैं बिलकुल वटवृक्ष हो चुके उस आदिम से मिला और पूछ बैठा महाराज साहब के बारे में,....,फिर मेरी आँखे फटी रह गयीं। बाबा नें मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा, जैसे महाराज प्रबीर का नाम ले कर मने कोई गुनाह कर दिया हो और अनन्य श्रद्धा से वह भूमि पर इतनी बार नतमस्तक हुआ कि मुझे मेरा उत्तर मिल गया। आज के दौर का है कोई राजनीतिज्ञ एसा, जो जनमानस की आत्मा में बसता हो? जो अपनी मौत के बाद भी सहित-आत्मा जीवित हो कोटि-कोटि हृदय में?....? बचपन की मेरी धुंधली सी स्मृति में आज भी है कि एक साधुवेशी पाखंडी नें स्वयं को महाराज का पुनर्जन्म घोषित कर दिया था और आदिम जनता जैसे भावावेश में अंधी हो गयी थी। उस पाखंडी के मुर्गा न खाने के तुगलकी फरमान पर अंचल में मुर्गे बाजारों से उठ गये थे...यह मुझे आज के दौर की राजनीति में असाधारण घटना जान पडती है। (राजतंत्र और लोकतंत्र पर बहस मेरे आलेख का मकसद नहीं है अपितु सता के सम्मान की विवेचना भर प्रस्तुत करना चाहता हूँ)।


स्वप्न गहरा था और महाराज मुझसे मित्रवत गहरी गहरी बातें करने लगे। बात रात की तरह लम्बी हुई और हम इतिहास की परत उधेडने लगे।


आप भारत में बस्तर राज्य का विलय नहीं चाहते थे, अपितु इसे स्वाधीन राष्ट्र बनाना चाहते थे क्या यह सच नहीं? मैने बडा प्रश्नवाचक लगा कर पूछा।


इस पर महाराज मुस्कुरा दिये और मुझ पर ही प्रश्नशूचक दृष्टि डाल कर उन्होने पूछा क्या बस्तर आज भारत का हिस्सा है? मैं इस प्रश्न के लिये प्रस्तुत नहीं था इस लिये सकपका गया।


समुचित सडक व्यवस्था का आज भी अभाव, रेल केवल लोहा ढोने भर के लिये, पानी के लिये त्राहि, बिजली तो आधा अंचल जानता ही नहीं कि क्या बला है, इस पर दिल्ली की जगमग में शेष देश मौन, कौन जानता है कि बस्तर है कहाँ और आदिवासी कैसे है, और हैं कौन? महाराज की ये बाते तार्किक थीं और व्यवस्था पर गंभीर प्रहार करती थीं। फिर वे स्वत: ही गंभीर हो गये और बोले यह भारत कि आजदी का ही वर्ष था यानी कि 1947, मेरा राज्याभिषेक अनुबंधों और प्रतिबंधों की कडी में हुआ और फिर समाप्त...सर्वेसर्वा का एकदम से अधिकारविहीन हो जाना एक प्रकार की मन: स्थिति है और राजनीतिक फैसले अपने समय का सच होते हैं जिन्हे आज के समय से जोड कर सही और गलत की कसौटी में नहीं कसा जा सकता। फिर भी यह प्रश्न मैं अवश्य करना चाहूँगा कि जिस लोकशाही की परिकल्पना हमारा संविधान करता है क्या आज इस अंचल में कहीं भी दृष्टिगोचर होती है? दारू पिलाओ वोट लो, कपडा बाँटो और वोट लो, क्या इसी सच पर आज इस अंचल का जनप्रतिनिधित्व नहीं टिका? मैं मौन ही रहा, चूँकि इस आक्षेप का उत्तर संभव है किसी के पास न हो"


बस्तर में नक्सलवादिता की भविष्यवाणी मैने अपनी पुस्तक में भी की है। मेरी पुस्तक आई प्रबीर द आदिवासी गॉड में मैने स्वयं को अपने ही लोगों से काटे जाने की सरकारी साजिश का विरोध करत हुए लिखा था कॉंग्रेस नें कभी भी यह अनुभव नहीं किया कि वे प्रचीन संवैधानिक शिक्षा की पाठशालायें, साम्यवाद के कुप्रभाव के लिये एक कारगर रोक बन सकती थीं। बस्तर भारत के अन्य प्रांतो की तरह न तो सुगम है न ही सहज। गहरी समझ चाहिये किसी प्रशासक को। मैने सहमति में सिर हिलाया। क्या आज जैसी तबाही और इस शांत अंचल में आतंकवाद के इस स्वरूप की किसी नें परिकल्पना की थी? क्यों एसी समस्याओं का निदान नहीं हो पाता जिसे कर पाना सरकारी इच्छाशक्ति पर ही निर्भर है? सच यह है कि इस अंचल की तबाही की कहानी लिखने वाली कलमें तो बहुत रही हैं इसके निर्माण को किसी नें दृष्टि कोण प्रदान नहीं किया।


तो क्या नक्सलवादी समस्या के बस्तर में पनपने का कारण सरकारी नीतियों की विफलता है और यह एक क्रांति है व्यवस्था के खिलाफ? मैने प्रश्न किया।


महाराज प्रबीर ठहाका लगा कर हँस पडे फिर गंभीर हो गये। क्रांति वह होती है जो भीतर से पनपती है, क्रांति प्रायोजित नहीं अपितु स्वत:स्फूर्त होती है। क्रांति विदेशी नहीं होती या कि विचारधारा का इश्तेहार ले कर नहीं जनमती। क्रांति एक घटना है जिसकी चिंगारी भीतर ही सुलगती है और फिर एसा दावानल हो जाती है जो बदल देती है एक पूरी की पूरी व्यवस्था। क्रांति नारों से नहीं आती, बल्कि क्रांति के दौरान नारे पैदा होते हैं। क्रांति किसी लाल-पीले झंडे की छाया में नहीं होती,..., क्रांति गुजरती है तब उसपर गीत बनते है, रंग भरे जाते हैं और पहचान दी जाती है।


आप सत्य कह रहे हैं राजा साहब किंतु यह आदिम समाज एसे ही तो नक्सलियों के प्रभाव में नहीं आया होगा? मैंने चर्चा को विस्तार दिया।


निश्चित ही प्रशासनिक विफलताये भी कारण है एक कारण यह भी है कि इतने बडे भौगोलोक क्षेत्र को बिलकुल नजरंदाज किया गया। फिर भी आतंकवाद को कैसे क्रांति का मुलम्मा चढा कर महिमामंडित किया जा सकता है? आज क्या हालात है?जो पिस रहा है वह यह गरीब अंचल और यहाँ के निरीह मुरिया-माडिया ही तो हैं? महाराज नें गंभीर स्वर में अपनी बात समाप्त की।


आप क्या यह नहीं मानते कि इन आदिमों को अपनी आवाज उठानी नहीं आती और एक तरह से नक्सली इनकी सहायता ही कर रहे हैं, शोषण के खिलाफ उनके संघर्ष में? मैंने जिज्ञासावश पूछा। मैं जानता था कि बस्तर की आत्मा से इस गंभीर प्रश्न का उत्तर मिलने वाला है। एक पल रुक कर उन्होंने दीर्घ नि:श्वास ली और फिर बोल पडे -

इन आदिवासियों को किसी आयातित सिद्धांतों या कि संघर्षकर्ताओं की आवश्यकता नहीं है, इनके ही भीतर एसी आग है जो प्रलयंकारी है किंतु ये आदिम एसे ही हैं जैसे इन्हे हनूमान वाला शाप मिला हुआ हो, इन्हें इनकी ताकत का इन्हे अहसास कराया जाये तो बस कयामत ही है। बहुत से उदाहरण इस अंचल का स्वर्णिम इतिहास हैं जो यह बताते हैं कि यदि नक्सलवाद स्वाभाविक होता तो तो किसी बंगाली, किसी तेलुगु लाल-आतंकी के कंधे पर चढ कर नहीं बल्कि किसी गुण्डाधुर के वाणों की नोंक से आरंभ होता।


यह गुँडाधुर कौन? मैने सहज जिज्ञासावश पूछा। महाराज अतीत में डूब गये फिर एक कहानी उन्होने आरंभ की जिस पर बहुत धूल जम गयी है।


यह घटना लगभग 1910 की है तब राजा रुद्र प्रताप देव का शासन था।....। आदिवासी अपनी परंपरओं को सहेज कर जीते हैं, और बस्तर अंचल पर अंगेजो के शासन के साथ ही एसे बदलाव का यह क्षेत्र गवाह होने लगा जिससे उनकी परंपरायें आहत हुईं। एक या दो नहीं लगभग दस बार संगठित या गैर संगठित विद्रोह अंग्रेजों, उनके नियुक्त दीवानों या कि राजा के विरुद्ध हुए। दरअसल इन विद्रोहों को ही क्रांति का नाम दिया जाना चाहिये। ये विद्रोह बताते हैं कि क्रांति परिस्थितिजन्य होती है तथा उन कारकों से पनपती है जो आंतरिक हैं।.....। भूमि पुत्र यदि अपने ही जंगलों, वनोत्पादों और भूमि पर कर-बोझ से लदे होंगे तो विद्रोह की चिनगी पैदा होगी ही। ततकालीन दीवान, पंडा बैजनाथ का बस्तर के प्रशासक होने के नाते भूमि से जुडा होना एवं उसकी सांस्कृतिक आवश्यकताओं को समझना आवश्यक था। तुगलकी फरमान जिनमें अनिवार्य शिक्षा और शराब बंदी जैसे आदेश भी सम्मिलित है दर-असल जबरन थोपे जाने के कारण गलत संदर्भ में देखे गये तथा आदिवासियों नें इसे अपनी परंपराओ के साथ खिलवाड माना और फिर संपूर्ण अंचल में उसी तरह की प्रतिक्रिया होने लगी जैसे कि गाय-सूअर की चरबी वाले कारतूस नें 1857 के पहले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सूत्रपात किया था।...। अंग्रेजो का अप्रत्यक्ष शासन होने के कारण बाहर से आने वाले लोगों की तादाद और उनके बढते प्रभाव नें भी आग में घी डालने का काम किया।...। यह भी सच है कि कुछ सुलगती हुई आग में घी डालने का काम राजपरिवार की आंतरिक राजनीति ने भी किया था। यह आंदोलन उग्र हो गया। एसी क्रांति घट गयी जिसकी कल्पना न राजा नें की थी, न ही राय बहादुर पंडा बैजनाथ नें और न ही इन कठपुतलियों के पीछे बैठी अंग्रेज हुकूमत नें। गुंडाधुर इस क्रांति का अगुआ था और उसके क्रांति का प्रतीक डारा मिरि (आम की डाल पर लाल मिर्च बाँध कर इस प्रतीक को बनाया गया था) का गाँव-गाँव में स्वागत हुआ, ज्योत से ज्योत जलने लगी। एकाएक बस्तर जाग गया। राजा, दीवान और अंग्रेजी हुकूमत की नींद हराम हो गयी कि एसे असाधारण आंदोलन परिवर्तन की ताकत रखते हैं।...। फिर वह सबकुछ हुआ जिसके लिये अंग्रेज जाने जाते हैं। राजा नें तार से अंग्रेज आकाओं को सूचित किया और आनन फानन में मदद पहुँची भी। क्रांतिकारी, दीवान पंडा बैजनाथ की तलाश में आकाश पाताल एक किये हुए थे और साथ ही साथ उनके निशाने पर थे सरकारी संस्थान, संचार के साधन, मुनाफाखोर व्यापारी और अंग्रेजी सरकार के प्रतिनिधि। गोलियाँ चलती रहीं, लाशें बिछती रहीं और यह आंदोलन उग्र से उग्रतर होता रहा। और तब तक सफलता पूर्वक इस आन्दोलन नें अंग्रेजों को यह पाठ पढाया कि आदिम होना नासमझ होना नहीं है या कि वे शोषित रहने के लिये कत्तई तैयार नहीं हैं जब तक अपनी प्रचलित फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत अंग्रेजो नें इस अंचल में जयचंद नहीं तलाश लिया। आन्दोलनकारियों में से एक सोनू माँझी को अंग्रेजो नें अपनी ओर मिला लिया जिसकी मुखबिरी पर एक बडा नर-संहार हुआ। कुचल दिया गया आन्दोलन, क्रांति की निर्मम हत्या कर दी गयी।


मैं इस कहानी में खो गया था। यह स्पष्ट था कि अदिवासी मोम के पुतले नहीं हैं अपितु स्वाभिमानी और जीवट हैं। मैं सोच में पड गया कि फिर नक्सलवादिता यहाँ के जंगलों का आज अभिशाप कैसे बन गयी। कैसे इन आदिमों का स्वाभिमान कुचल कर आतंकवादी समानांतर सरकार चला पाने में सफल हुए? माओवादी खाओवादी बन कर दीमक से चट कर रहे हैं बस्तर का सब कुछ सुख भी, शाँति भी और संपदा भी। मेरी निगाहों से यह प्रश्न स्वत: महाराज प्रबीर के पास पहुँच गया था। वे अब और भी गंभीर हो गये थे। महाराज नें इतिहास को कुरेदना जारी रखा।


व्यवस्था कोई भी हो उसका जनता से सीधा संवाद होना चाहिये। लोकतंत्र वहाँ तक तो ठीक है जहाँ जनता इतनी जागरुक है कि अपने अधिकार जानती हो। अधिकार समझ सकने और उपभोग करने वाली जनता ही कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक रहेगी। अन्यथा तो हम किसी क्षेत्र की बदहाली के दोषारोपण के लिये चेहरों और कारणों की तलाश करते रहेंगे, हासिल होगा शून्य। मैं आश्चर्य करता हूँ कि जो रिआया इतनी जागरुक थी कि उसमें अपने राजा का घेराव करने या उसकी लोक हित में अव्हेलना तक करने का साहस था वह भेड कैसे हो गयी या बना दी गयी? मैं 1876 में राजा भैरमदेव के शासनकाल की ओर ले कर चलता हूँ। घटना रोचक है। राजा भैरमदेव प्रिंस ऑफ वेल्स से मुलाकात करने मुम्बई जा रहे थे। रियासत को मंत्रियों के हाँथों छोड देने के विरोध में जनता का उग्र हो जाना क्या यह प्रमाणित नहीं करता कि आदिम जनता की तत्कालीन राजनीति पर कितनी गहरी पकड थी?......लेकिन अधिकार का नशा दीवानों से अधिक उनके चमचों और नौकरों को हुआ करता था। फैल रहे असंतोष की आपाधापी में दीवान के नौकरों/चमचों के हाँथों कुछ मुरिया आदिवासियों की हत्या हो गयी।....। जागरूक समाज उखड गया और प्रशासन कंदरायें तलाशने लगा। राजा के दीवान गोपीनाथ कपडदार, मुंशी अदित प्रसाद तथा राज्य के अन्य कुछ कर्मचारियों के अत्याचारों के विरुद्ध इस संग्राम में लगभग दस हजार से अधिक मुरिया और भतरा आदिवासियों की भीड नें बिना किसी हिंसा या रक्तपात के राजा भैरमदेव को जगदलपुर में हफ्तों घेरे रखा। सच कहूँ तो यह होता है आन्दोलन, जिसकी पृष्ठभूमि होती है, जो समाज पर गुजर रही पीडा की स्वाभाविक परिणति होते हैं। आन्दोलन, हत्या-कत्लेआम और बलात्कार के लिये नहीं होते, जैसा कि वर्तमान नक्सलवाद का स्वरूप है। आंदोलन का मक्सद बलपूर्वक अपनी बात मनवा कर अपनी मर्जी की व्यवस्था पाना नहीं होता। व्यवस्था में क्या और कैसे परिवर्तन होनें चाहिये, वस्तुत: एक स्वत: स्फूर्त आँदोलन इसकी दिशा निर्धारित करता है।...।आदिमों का यह आन्दोलन वार्ताओं और हस्तक्षेपों के कई दौर से गुजरा। पहले बिजगापट्टनम से साढे पाँच सौ सैनिकों की एक टुकडी आयी, उनसे वार्ता-विफलता के पश्चात बस्तर जिले के अंग्रेज सरकार नियुक्त पॉलिटिकल एजेंट तथा डिप्टी कमिश्नर को वार्ताकार होना पडा। आदिमों की राजनीतिक समझ की बानगी यह थी कि डिप्टी कमिश्नर को बिना किसी जाँच के उन मंत्रियों को बर्खास्त करने का हुक्म जारी करना पडा जो रिआया की राय में प्रशासन-निहित भ्रष्टाचार के जिम्मेदार थे। इसके पश्चात ही इस विद्रोह अथवा क्रांति की शांति संभव हो सकी।


मैं आवाक था। बस्तर का यह दूसरा ही चेहरा था। क्या बस्तर उस दौर के बाद तो नहीं पिछडा जब हम अपने लोकतांत्रिक गणतंत्र होने का दंभ दिल्ली में भर रहे थे? जिस बस्तर की रिआया इतनी जागरुक थी कि अपने राजा और दीवान का दंभ भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी, अंग्रेजी हुक्मरानों को भी मनमानी करने से रोक पाने की जिस जनता में ताकत थी, आज उसकी आवाज कहाँ है? आज तो जनता का, जनता के लिये, जनता के द्वारा शासन है? सारा भारत वर्ष तो यही जानता है कि बस्तर में पिछडे, नंगे, भूखे लोग रहते हैं और सारी सम्यता का ठेका इस प्रांत की परिधि के बाहर ही है। शायद सच यह है कि इस क्षेत्र की आवाज अब शासन तंत्र तक रही ही नहीं, ये जीते हैं तो इनकी किसमत मरते हैं तो माँ दंतेश्वरी की माया....कौन है इनका सुध लेवा?


महाराज प्रबीर जैसे मेरी सारी मन:स्थिति समझ रहे थे। उन्होने अपनी बात जारी रखी मेरी मौत जागरुक बस्तर की मौत थी। मुझे गोलियों से भून दिया गया और यह सब केवल इस लिये कि मैं अपने राज्य के भारत गणराज्य में विलय के बाद भी मान्य जनप्रतिनिधि था। मुझे तत्कालीन सरकार नें पागल करार दिया, गिरफ्तार किया, मेरे अधिकार सीमित किये और फिर वह सबकुछ हुआ जिसके लिये यह अंचल जाना जाता है एक जागरूक जनता द्वारा क्रांति का स्वर बुलंद किया जाना। मेरी मौत क्यों हुई यह दास्ता फिर कभी, आज तुमसे चर्चा इस संदर्भ तक ही कि क्या बस्तर को अपनी आवाज उठाने के लिये नस्कली आतंकवादियों की आवश्यकता है?.....क्षेत्र की जनता आदिम है किंतु निरीह नहीं। बुस्शर्ट और पैंट नहीं पहनती लेकिन सभ्य समाज को आईना दिखा पाने की क्षमता इनमें है। लौहंडीगुडा का गोलीकांड जलियावाला बाग कांड की तरह ही नृशंस था क्या शेष भारत यह तथ्य जानता है? बात भी तब की जब भारत को आजाद हुए चौदह वर्ष होने को थे यानी कि वर्ष 1961। मेरी गिरफ्तारी का विरोध कर रही आम जनता उग्र नहीं थी, हत्यारी नहीं थी, आतंकवादी नहीं थी। उसे फिक्र केवल अपने उस जनप्रतिनिधि की थी जो नयी सरकार द्वारा इस अंचल की की जा रही उपेक्षा के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद किया करता था और उसे अकारण गिरफ्तार कर लिया गया था। क्या अभिव्यति की सचमुच स्वतंत्रता इस राष्ट्र में है? मैं राजा नहीं था, अपितु पूर्व विधायक होने के साथ साथ जनता का एसा प्रतिनिधि था जिसे पूरा बस्तर अपना मानता था, स्नेह देता था और जिसके लिये कुरबान हो जाने को तत्पर था।....। हाँ यही मेरा दोष था। नक्सलसमर्थक ध्यान पूर्वक अपनी स्मृति पैनी करें जिन्हें ये लगता है कि वे मानसिक कोढी कोई बडी लडाई लड रहे हैं, यह बस्तर उनके मुख पर थूकना ही चाहता है।....। जब जब लडना चाहता था बस्तर, एक साथ उठ खडा हुआ और जब लडना चाहेगा बस्तर तो बन्दूक नहीं अपने तीखे वाण ले कर ही उतरेगा।......।


महाराज कुछ पल रुके अब जब वे बोले तो उनके स्वर से वेदना गहरी प्रतीत होती थी यह दास्तान 1965 की है, बस्तर अकाल की चपेट में था और सरकारी तंत्र चरमरा गया था। बस्तर भी कालाहाण्डी हो जाता अगर मैं मंहगाई और अकाल की दोहरी मार झेल रही जनता के बीच नहीं जाता। आपसी सामंजस्य और एकता प्रदर्शित कर इन आदिमों नें चमत्कार कर दिया। जमाखोरों से अवमुक्त हो कर ये आदिम साप्ताहिक बाजार की परिकल्पना के साथ और दुर्भिक्ष से बिना सरकारी मदद लिये लडने के संकल्प के साथ उतरे और सरकारी मूल्य से आधे दाम में अपने सामान, उपज और उत्पाद बाजार को उपलब्ध कराने लगे। यह एक सरकार की हार और उस जनता की जीत थी जिसका विकास कराये जाने का दावा यह विकाशशील, आर्थिक प्रगतिशील राष्ट्र करता है।.....। मेरे नेतृत्व में हजारो आदिम महिलायें नीली साडी में और युवक नीली पगडी में बस्तर की अस्मिता के लिये और उस सरकार के खिलाफ एकत्रित हुए जिसे बस्तर नक्शे पर देखते ही मोतियाबिन्द हो जाता था। आदिमों का एकत्र होना एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी क्यों नहीं माना गया और इनकी माँगे और उद्देश्य जानने के बाद भी ये बागी क्यों करार दिये गये इसका जबाब इस कृतघ्न राष्ट्र नें कभी नहीं दिया। इसका जवाब उन कम्बख्तों के पास भी नहीं है जो नक्सलियों के महिमामंडन में मानवाधिकार की मनगढंत कहानियाँ गढते हैं। कहाँ गया था उन आदिमों का मानवाधिकार जो सरकार से सवाली थे। उनके सिर, सीने और आँखों को निशाना बना बना कर उस दिन गोलियाँ चलायी गयी जब इन्होने समझौते की पेशकश की थी। ये आदिम किसी उद्देश्य के लिये अथवा व्यक्ति के समर्थन में एकत्रित भी हो जाते और अपना विरोध बुलंद भी कर लेते तो क्या भारत की सत्ता पर काबिज हो जाते या व्यवस्था बदल देते? यह केवल क्षेत्र विशेष का संघर्ष था क्षेत्रीय प्रशासन के ही विरुद्ध अपनी अस्मिता और उन अधिकारों के लिये जिससे वे वंछित होने या किये जाने लगे थे।....। 25 मार्च 1966 को सुरक्षा बलो नें आदिमों पर निर्मम होना प्रारंभ किया जो राजमहल परिसर में एकत्रित थे। लाठीचार्ज, अश्रुगैस और गोलीबारी...यह आजाद भारत की घटना है। जिन आदिमों नें आत्मसमर्पण भी किया उन्हे भी इस कदर पीटा गया जैसे ये आदम जानवर ही हों जैसा कि तथाकथित सभ्य समाज समझता है। मैने स्वयं कई आदिम साथियों को महल से बाहर निकलने में मदद की जिनमें महिलायें और बच्चे भी थे। मैं निहत्थों पर होने वाले लाठीचार्ज से विचलित हो गया था और आक्रोशित भी। अपने कक्ष की ओर बढते हुए पोर्च की सीढियों पर मैने कदम रखा ही था कि मुझे निशाना कर दागी गयी एक गोली.....आह!! मैं गोली लगने की पीडा से छटपता हुआ किसी तरह अपने कक्ष तक पहुँचा और बिस्तर पर लेट गया। अपने अर्दली को मैने चाय लाने का इशारा किया...कमरे में अश्रुगैस भरने लगी थी। गोली का दर्द और अश्रुगैस की जलन..मेरी चेतना मेरा साथ छोड रही थी को मैं अपने आसपास होने वाली हलचल से सावधान हुआ। मुझे चारो ओर से सशस्त्र सिपाहियों नें घेर रखा था...मैं निहत्था था, अकेला भी उस वक्त, लेकिन मैं उन आदिमों के साथ था जो आदमी नहीं कहाते तो मेरे पास ही मानवाधिकार क्या होते...एक या दो नहीं....मुझे गोलियों से छलनी कर दिया गया था।....। अलविदा मेरे बस्तर मैं आखिरी साँस तक तेरा ही था, तेरे लिये लडा, तेरे लिये मरा...अलविदा बस्तर कि अब तेरी भी आखिरी साँसे ही हैं महाराज की आँखे नम हो थी और मुँदने लगी थी और मेरी आँखे खुल गयीं। यह केवल स्वप्न नहीं था।


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मैंने उठ कर अपनी मातृभूमि बस्तर की माटी का नमन किया जहाँ के शासक महाराज प्रबीर जैसे क्रांतिकारी रहे हैं। प्रबीर हमेशा जिन्दा रहेंगे, पूजे जाते रहेंगे...मन बोझिल हो गया था कि तभी अखबार वाले नें खिडकी को निशाना लगा कर जो अखबार फेंका था वह बिलकुल मेरे सामने आ गिरा। एक समाचार पर निगाह ठहर गयी सलवा जुडुम एक विफल प्रयोग। मैने बहुत गहरी स्वांस ली और एक सवाल खुद से ही पूछा नक्सलवाद से आधा भारत प्रभावित है लेकिन क्या बस्तर के आदिमों को छोड कर किसी और प्रांत के लोग इन आतंकवादियों के खिलाफ कहीं भी और किसी भी तरह लामबंद हुए? उत्तर था - नहीं। यह साहस केवल बस्तर में ही संभव है, मेरे बस्तर के जाँबाज आदिम अपनी लडाई खुद लड सकते हैं। नक्सलवादियों तुम्हें ये आदिम निरीह लगते होंगे कि अभी कोई गुंडाधुर उठ खडा नहीं हुआ वरना बिल में दुबके चूहे भगाने के लिये धनुष की टंकार की काफी है। सावधान!! अब बहुत हो चुका, माओ...जाओ...


***राजीव रंजन प्रसाद

14.07.08


8 comments:

शोभा said...

राजीव जी
काफी विचारोत्तेजक लेख लिखा है। अनेक स्थलों ने दिल को छुआ है। प्रभावशाली भाषा से लेख अन्त तक रोचक रहा है।

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत ही सुन्दर सधे शव्दों में समसामयिक व विचारोत्तेजक प्रस्तुति के लिये बस्तरिहा भाई को बहुत बहुत धन्यवाद ।
यह सत्य है कि अब प्रत्येक गूंडाधूर को उठकर खडा होना होगा पर इनमें से ही किसी को जामवंत जैसे इनके सोये हुए आन को जगाना होगा ।
स्वतंत्र रूप से वैचारिक क्रांति लाने के लिए ऐसे लेखों को स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित भी होना चाहिए ताकि लोग किसी स्वतंत्र ब्यक्ति के अभिमत को स्वीकारें ।

महाराज प्रवीर चंद्र के जिस पुस्तक का आपने उल्लेख किया है उसका हिन्दी अनुवाद दो तीन अनुवादकों नें बाजार में प्रस्तुत किया है जिसमें से एक अनुवादक जिसको मैं पढा हूं, की प्रस्तुति तो केवल प्रायोजित जान पढती है, आप बस्तर के हैं इस कारण, मुझे विश्वास है कि आपने इन पुस्तकों से सच को ही चुन कर आत्मसाध किया होगा । यह आपके इस प्रस्तुति में स्पष्ट दृष्टिगत हो रहा है, पुन: धन्यवाद ।

नीरज गोस्वामी said...

बस्तर और उसकी विस्तृत जानकारी देने के लिए साधुवाद....
नीरज

सजीव सारथी said...

मात्रभूमि के प्रति आपका स्नेह और चिंता सराहनिए है आपकी संवेदनाओं को नमन

राजीव रंजन प्रसाद said...

संजीव जी,

आभार कि आपने इस आलेख को सराहा। यह आलेख केवल महाराज के पुस्तक पर आधारित नहीं है। साम्यवाद पर उनकी टिप्पणी यद्यपि उनकी पुस्तक से हूबहू मैने उद्धरित की है। मेरा सौभाग्य रहा है कि आदरणीय लाला जगदलपुरी जी का अपार स्नेह मुझे अपने छात्र जीवन में प्राप्त हुआ साथ ही साथ श्री राम कुमार बेहार जी जगदलपुर में ही इतिहास के प्राध्यापक थे जहाँ उनका सान्निध्य प्राप्त रहा। बहुत से नोट्स मैनें उसी दौरान बना कर रखे थे जो निजी अनुभवों और शोध के शब्द पा कर यह आलेख बने हैं। आदरणीय के. के. झा जी के शोधप्रबंध से भी मैने प्रेरणा प्राप्त की है। यथा संभव मेरा यत्न रहा है कि मैं इतिहास से छेड खानी न करते हुए अपनी बात रख सकूँ...इन सभी विद्वानों के शोध को इस आलेख के मूल में पाया जा सकता है।

***राजीव रंजन प्रसाद

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

राजीव जी,
ऐसा आभास होता की एपी स्वयम भी राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं.. आपकी भावनाएं सम्मान योग्य ही नहीं बल्कि प्रेरणास्पद हैं. साथ ही उन्मुक्त लेखन प्रशंशनीय है. यह लेख न सिर्फ पात्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होना चाहिए बल्कि अनिवार्य रूप से पठनीय भी होना चाहिए..
आपकी मातृभक्ति को प्रणाम.

अंगूठा छाप said...

राजीव जी बधाई स्वीकारें इस विचारोत्तेजक लेख के लिए...

ऐसी संजीदगी आजकल मिलती नहीं देखने को...


अंगूठा छाप का नमन स्वीकार करें...

अजय यादव said...

राजीव जी!
स्वतंत्रता-पूर्व के आदिवासी विद्रोहों का ज़िक्र इतिहास में बहुत संक्षेप में ही मिलता है, पर उतना भी इन तथाकथित असभ्य लोगों के बलिदान व जागरूकता का सशक्त प्रमाण देता है. हाँ, आज़ादी के बाद की इन दु:स्वप्नवत घटनाओं स मैं अब तक अनजान ही था जिनका उल्लेख आपने अपने लेख में किया है.
बस्तर की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत की झलक दिखाते इस प्रभावशाली आलेख के लिये आप सचमुच बधाई के पात्र हैं.