पहाड से टकरा कर
लौट आता है तुम्हारा नाम
तुम से टकरा कर
लौट लौट आती है मेरी धडकन
कितनी कठोरता जानम
कि पर्बत हो गयी हो..
नमन बस्तर की माटी को जहाँ नदियों, पहाडों, पंछी और आदिम यारों की यारी नें जो कलम थमायी कि फिर रुकी ही नहीं....
पहाड से टकरा कर
लौट आता है तुम्हारा नाम
तुम से टकरा कर
लौट लौट आती है मेरी धडकन
कितनी कठोरता जानम
कि पर्बत हो गयी हो..
6 comments:
अच्छा है भाई.
सुंदरतम। चंद पंक्तियों में बहुत बड़ी बात वह भी बहुत ही खूबसूरती के साथ।
sundar
बहुत उम्दा, क्या बात है!आजकल दिख नहीं रहे हैं आप!!
बहुत अच्छा....
बहुत सुंदर ....
अच्छी रचना, बधाई हो
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