Wednesday, April 11, 2007

प्यासा और पानी...

प्यासा समंदर के किनारे मर गया
पानी के नमक हैं, युवक मेरे देश के
प्यासे की चिता पर फट पडे बादल
तेजस्वी घनघोर हैं, युवक मेरे देश के
प्यासे की राख तैरती रही, बहती रही..
पानी पानी भी नहीं हैं
रवानी की बात करते हैं
किसी बोतल में बंद
शाम सुहानी की बात करते हैं
प्यासा अब है ही नहीं..

दुनिया में कितनी है चमक
जो लडखडा के गिर पडा
वो सलीम है इस युग का
तकदीर मुल्क की
पानी के छींटे मुख पर
छिडक भी दो अनारकली
खोल देगा पलक
मरा नहीं है युवक..

*** राजीव रंजन प्रसाद
10.04.2007

3 comments:

मोहिन्दर कुमार said...

राजीव जी

आजकल के युवाओ‍ं पर आपने सुन्दर व्यंग किया है

yogesh samdarshi said...

मैं आपकी पंक्तियों से ईत्तेफाक रखता हूं
पानी के छींटे मुख पर
छिडक भी दो अनारकली
खोल देगा पलक
मरा नहीं है युवक..

सुंदर रचना है

अभिषेक पाण्डेय said...

Naye tarah ki kavita hai!! sundar prayaas!