Saturday, September 28, 2013

कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?


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कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?
[केशकाल (उ. बस्तर) से एक वृतांत]
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दो तरह के देवताओं का फैशन है - आस्तिकों के देवता और नास्तिकों के देवता। दो तरह के कट्टरपंथी भी पाये जाते हैं – आस्तिक और नास्तिक। बडा विचित्र दौर है यह जहाँ भांति भांति के आस्तिक तलवार खींचे खड़े हैं और नस्तिकों ने भी अपने खंजर हथेलियाँ मोड़ कर पीठ की ओर छिपा रखे हैं। अब यह आप की ख्वाहिश है कि किस ओर खड़े हो कर मरना पसंद करेंगे? कोई आपके मुंह पर श्लोक या आयते दे मारेगा तो कोई मार्क्स की थ्योरी को परम सत्य बता कर आपकी छाती पर चढ जायेगा। विचारधाराओं के थोथेपन के इस दौर में मुझे बस्तर सुकून का ठंडा पानी उपलब्ध कराता रहा है। कथनाशय यह है कि धर्म, मान्यताओं और नास्तिकता के बीच भी सेतु बनाया जा सकता है; इस बात की प्रतीति पहली बार मुझे तब हुई थी जब मैं कांकेर (उत्तर बस्तर) में रिसेवाड़ा के पास कुछ प्रतिमाओं के अध्ययन के लिये गया था। एक स्थल पर ठिठक गया चूंकि वहाँ निकट ही गोबर की थप्पी पडी थी; पास ही इसे पूजे जाने के चिन्ह भी थे। मैने जब ग्रामीणों से इस सम्बन्ध में पूछा तो ज्ञात हुआ कि यह भीमादेव का स्थान है (भीमादेव पानी के देवता कहे जाते हैं)। देवता गोबर के भीतर पड़ा हुआ था। मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण ने भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार बस्तर में देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं, बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव ने बार बार याचना करने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण ने अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या? क्या इस उदाहरण के सामने हमारे मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों और कार्ल-मार्क्स की थ्योरियों के तोते नहीं उड जाते? आस्था क्या है, तर्क क्या है और मान्यताओं की क्या सीमा हो इसे प्रस्तुत उदाहरण से बेहतर कहाँ समझा जा सकता है?

इसी बात को बारीकी से समझने के लिये केशकाल (बस्तर) की रमणीक वादियों से होते हुए माता भंगाराम के मंदिर पहुँचा जा सकता है। उस दिन पोला त्यौहार मनाया जा रहा था; मैं सुबह सुबह ही पत्रकार मित्र कमल शुक्ला और कृष्ण दत्त उपाध्याय जी के साथ भंगाराम मंदिर आ पहुँचा। केशकाल नगर से लगभग चार किलोमीटर भीतर एक पर्वतीय टीले पर इस मंदिर की अवस्थिति है जिसके पीछे की ओर से घना वन और ढलान प्रारंभ होती है। इस स्थल के सम्बन्ध में बुनियादी जानकारी स्थानीय पत्रकार तथा शोधार्थी कृष्णदत्त उपाध्याय मुझे उपलब्ध कराते चल रहे थे। मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल दो पुजारी वहाँ उपस्थित थे जो कि पोला उत्सव होने के कारण माता भंगाराम को चढाने के लिये भोग बना रहे थे। खपरैल का यह मंदिर पुराने समय की संरचनाओं का स्मरण कराता है। बस्तर के देवी देवताओं का प्रकृति प्रेम भी जाहिर है और आम तौर पर जहाँ पेडों के झुरमुट हों, एकांत पर्वतीय टीले के निकट सघन वनों से घिरा कोई स्थल हो तो वहाँ आप किसी देवगुडी अथवा माता गुडी होने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। माता भंगाराम का मंदिर बस्तर भर की आस्था का केन्द्र है। रियासतकालीन बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने यहाँ एक चाँदी का छत्र भी चढाया था जिसे विशिष्ठ अवसरों पर तथा भादो जात्रा के दौरान निकाला जाता है। एक समय था जब यहाँ पशुबलि भी प्रथा थी जिसे सत्तर के दशक में आदिवासी समाज ने आपसी सलाह से बंद कर दिया। भादो जात्रा न केवल प्रसिद्ध है अपितु बस्तर के दूर दराज गाँवों से इसमें सम्मिलित होने अनेक गायता, सिरहा, माझी और पटेल पहुँचते है। भादो के छ: शनिवार सेवा पूजा होती है जबकि सातवे शनिवार जात्रा निकाली जाती है। 

मंदिर परिसर के पीछे एक पर्वतीय ढलान आरंभ होती है; ठीक वहीं पर कई आंगा देव जमीन पर पडे हुए थे। उनका सामान यहाँ तक कि उनके चाँदी से किये गये श्रंगार, उनके चढावे आदि आदि इस ढलाने में यत्र तत्र बिखरे पडे थे। आंगादेव को मूलत: वंश का देवता कहा जाता हैं। तीन साजा, बेल या इरा लकड़ी की डंडियाँ जमीन में समानांतर गाड़ी जाती हैं। बीच की लकड़ी देवता का प्रतीक होती है जिसमें किसी साँप या चिडिया जैसी आकृति बनी होती है। दो सिर वाली आकृति यदि बनी हो तो आंगा पति और पत्नी दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोरपंख, चाँदी के गहनों आदि से इसे सजाया जाता है।“ देवता तो देवता है और उसका मान करने की परम्परा भी है। देवता को प्रसन्न रखने के हर जतन किये जाते हैं तथा सिरहाओं के माध्यम से देवताओं द्वारा रखी गयी हर मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती है। देवता है तो कुछ भी मांग ले एसा भी नहीं। बहुत सख्त मोल-भाव देवताओं और भक्त के बीच में होता है। बकरे की मांग से शुरु हुई बहस भक्त के इनकार और चीख चिल्लाहट भरी तकरार से घटते घटते मुर्गे तक भी पहुँच सकती है। यहाँ चूंकि देवता और उसपर आस्था रखने वालों के बीच सांकेतिक ही सही एक संवाद स्थापित है अत: बात चढावे लेने देने तक ही नहीं ठहरती अपितु भक्त की मांग भी पूरा करना देवता का ही दायित्व है। भक्त को परेशानी है, वह कर्जे में डूब गया है, घर में बीमारियों ने घर बना लिया है, पति-पत्नी के बीच झगडे होते रहते हैं और एसे में देवता मूकदर्शक नहीं रह सकता। उसे हर व्यक्तिगत समस्या बताई जाती है तथा उससे समाधान भी मांगे जाते हैं। यह सब कुछ भक्त की बर्दाश्त की पराकाष्ठा तक ही होता है। जिस दिन भक्त को लगा कि वह देवता किसी काम का नहीं, जिसके रहते हुए भी उसका जीवन उलझनों भरा है, उसके तनावों का निदान नहीं मिल रहा है, खेतों को बरसात नहीं मिल पा रही है तो समझ लीजिये कि अब इस आंगा की शामत आ गयी। देवता को अस्वीकार करना बस्तर के आदिवासी समाज की आस्था का सबसे सबल और अनुकरणीय पक्ष है।

कुछ अविश्वसनीय किंतु सत्य जान लें। भंगाराम ही वह स्थल है जहाँ किसी देवता को मान्यता मिलती है तो किसी देवता की मान्यता समाप्त भी की जाती है। एक ही नाम के दो देवता होने पर वास्तविक कौन के विवाद का निबटारा भी यहीं होता है। सबसे बडी बात कि पीडित भक्त अपने देवता के बरताव के प्रति यहाँ अपनी नाखुशी व्यक्त करता है तथा उसके लिये सजा की मांग भी कर सकता है। वह अपने देवता का तिरस्कार भी कर सकता है अथवा उसे सजा दिलाने की पात्रता भी रखता है। एसा भी नहीं कि देवता को अपनी सफाई देने का मौका नहीं मिलता। देवता भी यहाँ अपने तर्क रखता है; वह भक्त की उन भूलों को उजागर कर सकता है जिसके कारण उसने समस्याओं का समाधान नहीं किया। भंगाराम की यह अदालत नीर-क्षीर विवेक करती है; वह कभी समझाईश से भक्त और देवता के बीच विवाद को समाप्त करती है तो कभी किसी देवता को कैद करने अथवा नष्ट करने का भी निर्देश दे सकती है। यही कारण भी है कि भादो जात्रा में महिलाओं का प्रवेश यहाँ तक कि प्रसाद ग्रहण करना वर्जित रखा गया है। इसका कारण उनके कोमल मन को माना गया है चूंकि देवताओं को कैद किया जाना अथवा नष्ट किया जाना एक भावुक क्षण होता है। पुजारी ने इस जानकारी में आगे जोडा कि कभी कभी कुछ साल बीत जाने के पश्चात भक्त को अपने कैद देवता की याद आती है अथवा उसे लगता है कि सजा पर्याप्त हो चुकी। अब देवता को छुडा कर लाने और सम्मान देने से उसकी बात सुनी जायेगी और समाधान भी उसे मिलने लगेंगे तो वह इसकी अपील भी भंगाराम में आ कर कर सकता है। यह प्रक्रिया वर्तमान न्याय प्रणाली में मिलने वाली जमानत की तरह होती है। वह निर्धारित शुल्क अदा कर अपने देवता को पुन: घर ले जा सकता है। 

क्या यह प्रक्रिया एक विमर्श नहीं मांगती? क्या देवताओं को मिलने वाली सजायें मुख्यधारा के उस समाज को आईना नहीं दिखाती जिन्होंने अपनी कट्टर आस्थाओं के लिये पाखण्ड की चादर ओढ रखी है? क्या यह समाजशास्त्र के लिये एक अनूठा विषय नहीं है जो तमाम नास्तिकता की दलीलों को जीभ चिढा कर उन्हें आस्थावान होने की अपनी ही परिभाषा सौंप देता है? यहाँ देवता असल में व्यक्ति के मनोविज्ञान से ही जन्म लेते हैं और उसके अपने तर्क द्वारा कभी भी नष्ट किये जा सकते हैं। भंगाराम मंदिर के पीछे की ओर जहाँ अनेको देवता कैद हैं अथवा उनके सामान, श्रंगार, चढावे आदि बिखरे हुए हैं; उन्हें देख कर मैं भी स्तब्ध रह गया हूँ और अपने तर्क को कुरेद रहा हूँ कि आदिवासी समाज की इस प्रगतिशीलता को हमारी मुख्यधारा की दकियानूसियत कभी हासिल भी कर पायेगी? 

- राजीव रंजन प्रसाद
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1 comment:

पंकज कुमार झा. said...

सुन्दर...अद्भुत...रोचक.