Thursday, May 24, 2007

तुम्हारा खत...


तुम्हारा खत पढा
फिर पढा
कितने ही टुकडे चाक कलेजे के
मुँह को आ पडे
थामा ज़िगर को
और बिलकुल बन चुका मोती भी चूने न दिया
फिर पढा तुमहारा खत
और शनैः-शनैः होम होता रहा स्वयमेव
एक एक शब्द होते रहे गुंजायित
व्योम में प्रतिध्वनि स्वाहा!
नेह स्वाहा!
भावुकता स्वाहा!
तुम स्वाहा!
मैं स्वाहा!
और हमारे बीच जो कुछ भी था....
स्वाहा!

आँखों को धुवाँ छील गया
गालों पर एक लम्बी लकीर खिंच पडी
जाने भीतर के वे कौन से तंतु
आर्तनाद कर उठे..
शांतिः शांतिः शांतिः

अपनी ही हथेली पर सर रख कर
पलकें मूंद ली
ठहरे हुए पानी पर हल्की सी आहट नें
भवरें बो दीं
झिलमिलाता रहा पानी
सिमट कर तुम्हारा चेहरा हो गया

लगा चीख कर उठूं
और एक एक खत
चीर चीर कर इतने इतने टुकडे कर दूं
जितनें इस दिल के हैं.....

हिम्मत क्यों नहीं होती मुझमे??


***राजीव रंजन प्रसाद

8 comments:

sifar said...

confluence of trichotomy -
the outer hard face... the real pragmatism ..... and the retaliatory ego...

rajeev jee, ek hi sath tin-tin bhavo ko lekar chalna aur unke wahab me na behkar ek nirlipt aur niskam si anubhuti ko swar de dena..... ek gahri paith ki jaroorat thi aur aap janab samandar math aaye....

suna tha jo jahan se aata hai, wahi chala jata hai..... !

dil ke chhupe kone se nikli aapki bat bhi wahi pahuch gayee...

regards,

shrawan

........ज़ालिम said...

urdu aur hindi ke kadin samjhe jane bale shabdon ka achha samjasta hai prantu bhashayon ka yeh milan bhavon ke sath anyaye kar gya hai

अभिषेक पाण्डेय said...

vaah raajiv jee, bahut behtar likha hai aapne...isko main kahta hun excellent..wakai, majaa aa gaya!! aaj ekaek aapka blog dekhne ka man kiya aur mera bhraman bilkul hi safal raha. waise, kavita ka shirshak "aartanaad" hona chahiye tha...majaak kar raha hun, anyatha mat lijiyega.

likhte rahiye!!
Abhisek.

आर्य मनु said...

वाह भाईजान॰॰॰॰
"व्योम में प्रतिध्वनि स्वाहा!
नेह स्वाहा!
भावुकता स्वाहा!
तुम स्वाहा!
मैं स्वाहा!
और हमारे बीच जो कुछ भी था....
स्वाहा!"

इतना दर्द की पाहुन के पर्वत भी पिघल जाये॰॰॰॰"
लगा चीख कर उठूं
और एक एक खत
चीर चीर कर इतने इतने टुकडे कर दूं
जितनें इस दिल के हैं.....
हिम्मत क्यों नहीं होती मुझमे??"

सही कहा आपने राजीव जी॰॰॰॰
मुझे यकीन नही हो रहा कि उस दिन मैने हिन्दी के इतने सशक्त हस्ताक्षर से बातचीत की थी॰॰॰॰और आप थे कि मुझे यू ही अच्छा कवि बताये जा रहे थे॰॰॰नही-नही राजीव भैया॰॰॰॰ मै तो आपके नख-तुल्य भी नही॰॰॰॰॰
ह्रदय बेध गयी आपकी रचना॰॰॰॰॰॰॰॰
हमेशा आशीर्वाद बनाये रखियेगा॰॰
आर्य मनु- 0 98290 32491

Ashok said...

बहुत ही अच्छा लिखा है राजीव जी।
कृपया ऐसी सुन्दर कवितायेँ लिखते रहिए।

आपका मित्र और प्रशंशक
- अशोक

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत सुन्दर रचना है राजीव जी... आसान नही है प्यार भरे.. या किसी प्यारे के खत को टुकडे टुकडे करना जा जला देना... मन की बातें हर एक से थोडे ही बतायी जाती हैं

कुछ गीत तो दुनिया की खातिर, सुरताल पर गाये जाते हैं
कुछ गीत मगर तन्हायी में, खुद को भी सुनाये जाते हैं

दीपक भारतदीप said...

स्वयं से अपरिचित हूँ, अपनी तलाश जारी है.
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राजीव
आपके मन की बात मेरे मन की बात है, आपकी रचनायें अच्छी हैं-दीपक भारतदीप

Seema Kumar said...

फिर पढा तुमहारा खत
और शनैः-शनैः होम होता रहा स्वयमेव
एक एक शब्द होते रहे गुंजायित
व्योम में प्रतिध्वनि स्वाहा!
नेह स्वाहा!
भावुकता स्वाहा!
तुम स्वाहा!
मैं स्वाहा!
और हमारे बीच जो कुछ भी था....
स्वाहा!

इतने उलझे हुए भावों को इतनी सरलता से व्यक्त कर देना, आप्की कविता की यह बात बहुत अच्छी लगी ।