Wednesday, January 20, 2010

मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ [वसंत पंचमी पर - वंदना]


वीणा के तार से गीत बजें
मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ


मेरे आँसू, मेरी आहें,
मेरे अपने हैं रहने दो
पलकों के गुल पर ठहर
कभी बहते हैं, बहने दो

सुख की थाती का क्या करना
करने दो दुख को क्रीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीडा माँ

देखो बिखरी है भूख वहाँ,
परती हैं खेत बारूद भरे
हर लाश है मेरी, कत्ल हुई
मेरे ही नयना झरे झरे

पीड़ा पीड़ा की क्रीड़ा है
हर लूँ, मुझको दो बीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीड़ा माँ

(विद्यालय काल के एक मित्र के अनुरोध पर यह रचना पाठको के सम्मुख रख रहा हूँ। रचना लगभग 18 वर्ष पुरानी है, तथापि अपेक्षा है पाठक निराश नहीं होंगे)

6 comments:

निर्मला कपिला said...

बिलकुल निराश नहीं हुये । बहुत सुन्दर रचना है 18 वर्ष पहले इतना कमाल का लिखा है बसंत पंचमी की बधाई माँ शारदे का आशीर्वाद बना रहे ।

रंजना said...

सुख की थाती का क्या करना
करने दो दुख को क्रीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीडा माँ


Man mugdh aur nihshabd kar diya aapne....
Aaah..apratim prarthna...

Aapki lekhni ko naman !!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

माँ सरस्वती ,
बसंत पर्व पर आज आपके जाल घर पर पूर्ण रूपें अवतरित हुईं हैं और कृपा वर्षा बरसा रहीं हैं
सुन्दर कविता और माँ सरस्वती का चित्र
मन भावन लगे
सभी को वसंत पर्व पर मंगल कामनाएं
स स्नेह,
- लावण्या

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इतनी सुन्दर रचना पढके कौन निराश होगा? आपके लिये पुरानी है, हमारे लिये तो एकदम नई है, इसी वसन्त की तरह.

शहरोज़ said...

बहुत ही प्रभावी रचना.यही कहने का मन होता है, बरबस:
इतनी शक्ति इन्हें दे न दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न !.

Rahul Singh said...

सरस्‍वती की वीणा के जिन सुरों का भाव आपने लिखा है, उसमें आपके परिवेश की घनी छाया है.