Thursday, October 31, 2013

माफी की माओवादी पॉलिटिक्स


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किसी भी आन्दोलन का एक तेवर होता है, विचार होते हैं, दशा-दिशा होती है तथा कार्यशैली होती है। आप “हिट एण्ड ट्रायल” प्रक्रिया के अनुरूप कार्य करते हुए स्वयं को व्यवस्था परिवर्तन का स्वयंभू ठेकेदार तो निरूपित कर सकते हैं किंतु कोई क्रांति पैदा नहीं कर सकते। बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों को अस्सी के दशक से आधार क्षेत्र बना कर बैठे माओवादी भले ही अपनी सोच और कार्यान्वयन के फासीवादी तरीकों को सही बताने के लिये कथित प्रगतिशील शब्द तलाश लेते हों किंतु जनता की सोच ने ही उन्हें आतक़ंकवादियों की श्रेणी में रखा है। अब बहस विचारधारा से कहीं उपर जा चुकी है, सही मायनों में देखा जाये तो गोली के विरुद्ध गोली का संघर्ष भर रह गया है। बेचारा आदिवासी तो जानता ही नही कि उसे किस बात की सजा मिल रही है? क्या इस बात की कि उसके निवास उन पर्वतों पर अवस्थित हैं जहाँ भांति भांति के अयस्क और प्राकृतिक संसाधन हैं अथवा इस बात की कि वे उन प्राकृतिक स्थितियों में रह रहे हैं जो शेष दुनिया के लिये रहस्यमय और अबूझ हैं; जहाँ समुचित जानकारी के बिना परिन्दे भी पर मारने के लिये सहज नहीं हैं? 

माओवाद पर नये सिरे से बहस दो कारणों से आवश्यक है। पहला कि लाल-आतंकवाद की राजधानी बस्तर वाले राज्य छत्तीसगढ में चुनाव सामने है एसे में राजनीतिक सक्रियताओं के भोंपू का जंगल में भी बजना तय है। दूसरा कारण यह कि आम चुनावों के मद्देनजर आया कमाण्डर रमन्ना का साक्षात्कार शैली में बयान नक्सली राजनीति की कई परतें खोल रहा है। माओवादियों की बेबसाईट पर दस अक्टूबर को जारी किया गया यह साक्षात्कार वस्तुत: विवेचना की भी मांग करता हैं कि उनके पास व्यवस्था बदलने की कोई ठोस रणनीति वास्तव में है भी अथवा नहीं? इस संदेह के बीज तो इस वर्ष दक्षिण बस्तर में हुई पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या के समय ही पड़ गये थे। विरोधी विचार की इस निर्ममता से हत्या की जा सकती है इस बात से सजग पत्रकारों ने जब नक्सलियों का अभूतपूर्व विरोध किया जब ताल ठोंक कर मुखबिरी साबित करने वाले लाल-विचारकों को अपने हाथ से तोते उडते महसूस हुए। स्थानीय पत्रकारों ने अदम्य और सराहनीय साहस का परिचय देते हुए नक्सलियों से सम्बन्धित समाचारों का बहिष्कार कर दिया तथा उनकी प्रेस-विज्ञप्तियों, सूचनाओं, वक्तव्यों आदि से आंख मूंद ली। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल में लाख मोर नाचता रहे उसे देखेगा-दिखायेगा कौन? कथित क्रांति धरी न रह जाये इस बात से सशंकित नक्सली झुके और पत्रकारों से सम्बन्ध साधा गया। जंगल में हुई इस प्रेसवार्ता में पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी मेंबर कमलु कुंजाम एवं महिला कमांण्डर ज्योति ने यह सफाई दी कि नेमीचन्द्र की हत्या उच्च कमीटी को अंधेरे में रख कर की गयी है। घटना की उच्चस्तरीय माओवादी नेताओं द्वारा जांच किये जाने तथा दोषियों को सजा दिये जाने की बात भी कही गयी थी। पत्रकार बंधुओं ने इस अपील का सकारात्मक उत्तर दिया और समाचार में पहले की तरह ही माओवादी पक्ष को भी जगह मिलने लगी। यद्यपि पत्रकारों ने दुबारा यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनसे साथी नेमीचन्द्र जैन के मामले में क्या कार्यवाई हुई, किस तरह जांच हुई, कौन लोग दंडित किये गये, क्या सजा हुई या कि उन्हें भी आश्वासन की वैसी ही टॉफी चुसाई गयी जैसी मुख्यधारा की व्यवस्था उन्हें थमाया करती है? 

नेमीचन्द्र जैन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते; इस बात की झलख मुझे रमन्ना के हालिया साक्षात्कार से मिलती है। रमन्ना कहता है कि “जब नेमिचंद  जैन की हत्या हुई थी, थोड़ी  भ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। इस घटना को किसने और किसके निर्णय पर अंजाम दिया यह पता लगाने में काफी देरी हो गई। बाद में यह स्पष्ट हो गया कि हमारी एक निचली कमेटी के गलत आंकलन और संकीर्णतावादी निर्णय के चलते यह दुखद घटना घटी थी। हमें इस पर बेहद अफसोस है। मैं हमारी स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से नेमिचंद के परिजनों और दोस्तों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता हूँ। हमारी पार्टी इस पर पहले ही सार्वजनिक रूप से क्षमायाचना चुकी है। इस घटना ने हमें फिर एक बार यह सिखा दिया कि हमारे कतारों में जनदिशा और वर्गदिशा पर शिक्षा का स्तर ऊपर उठाने की सख़्त जरूरत है। मैं मीडिया के जरिए फिर एक बार जनता  को  यह  आश्वासन देता  हूँ कि आने वाले दिनों में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने पाए, हम पूरी एहतियात बरतेंगे”। कोई भी विवेचनावादी मुझे बताये कि इस क्षमायाचना में ठोस बात क्या कही गयी है? किसे सजा दी गयी है? जांच में जब निचले कैडर की गलती सामने आयी तो उनका क्या हुआ? जिस बात पर जोर है वह यही कि परिजनो और मित्रों भूल हुई माफ करो। क्या इस माफी से सर्वहारा पत्रकार नेमीचन्द्र जैन पुन: जीवित हो उठेगा और अपनी माँ के गले लग कर कहेगा देखा, मैं न कहता था कि सब ठीक हो जायेगा? यह हास्यास्पद बयान उन स्थानीय पत्रकारों के गले कैसे उतरा यह तो मैं नहीं जानता जिन्होंने इस प्रकरण का मुखर विरोध किया, साथ ही वे आज भी इन्ही परिस्थितियों में काम कर रहे है? यहाँ छोटे और बडे पत्रकार वाला बारीक अंतर भी देखना चाहिये। बीबीसी के पत्रकार रहे शुभ्रांशु चौधरी पर धमकी वाले मामले में रमन्ना ने जिस तरह मक्खन मल मल कर सफाई दी है वह बात समझने योग्य है। शुभ्रांशु पर धमकी की आलोचना अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ ने की इसके बाद तो उनपर सम्मानित पत्रकार जैसे सम्बोधन के साथ चर्चा होनी ही थी। वो कोई बस्तरिया नेमीचन्द्र जैन थोडे ही हैं। विरोध करने का अधिकार केवल नक्सलियों और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघों को ही तो है बाकी तो हवा हवाई बाते ही मानिये।  

बात गहरी है इसलिये यहाँ से थोडा और आगे बढते हैं। झीरमघाटी हमले पर चादर पडने लगी थी फिर रमन्ना का बयान क्यों आया? इससे पहले बयान क्या है इसकी चर्चा कर लेते हैं। अपने साक्षात्कार में रमन्ना कहता है कि “दिनेश पटेल को मारना हमारी एक बड़ी गलती थी क्योंकि उन्होंने हमारी पार्टी या आन्दोलन के खिलाफ कभी कोई काम नहीं किया था। उनका कोई जनविरोधी रिकार्ड  नहीं रहा”। रमन्ना आगे कहता है कि “यह बात सही है कि उन्होंने दस साल पहले गृहमंत्री रहते हुए हमारे आंदोलन का दमन करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। लेकिन चूंकि पिछले दस सालों से प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से दूर है और व्यक्तिगत रूप से नंदकुमार पटेल हमारे आन्दोलन के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से आगे नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्हें नहीं मारना चाहिए था”। अब झीरम घाटी की घटना के तुरंत बाद आया गुडसाउसेंडी का बयान देखिये जहाँ वह कहता है कि “राज्य के पूर्व गृहमंत्री और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल जनता पर ‘दमनचक्र चलाने में आगे रहे थे यही कारण है कि उन्हे मारा गया। यानी कि रमन्ना का साक्षात्कार वस्तुत: एक ‘यू टर्न’ है। नंद कुमार पटेल से अधिक उनके बेटे को मारने के लिये माओवादियों पर उंगली उठाई गयी है। एसा क्यों है कि श्री पटेल के बेटे को मारे जाने की घटना और उसके कारणों को चतुराई के साथ इस साक्षात्कार में गोल कर दिया गया है? क्या यह एक नयी साजिश या नये राजनीतिक-लाल गठबंधन की ओर इशारा है? एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिये कि यदि पटेल दस सालों ने नक्सलवाद का विरोध नहीं कर रहे थे तो क्या विपक्ष में उनकी भूमिका नक्सल समर्थक की थी? एक और बात कि रमन्ना ने अपने बयान में कहीं भी विद्याचरण शुक्ल को मारे जाने पर बात नहीं की है। स्मरण रहना चाहिये कि गुडसा उसेंडी नें झिरमघाटी में उन पर हलमा करने को जस्टीफाई करते हुए बयान दिया था कि “''ये भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालय संभालने वाले वीसी शुक्ल भी जनता के दुश्मन हैं, जो साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और ज़मींदारों के वफ़ादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियाँ बनाने और लागू करने में सक्रिय रहे।'' अब क्या यह सच नहीं कि वीसी शुक्ल भी पिछले दस साल से छत्तीसगढ़ या केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका नहीं निभा रहे थे तो फिर उनके लिये माफी क्यों नहीं मांगी गयी? अब तक मांगी गयी माफियों को गहराई से समझते ही आप भी माओवादियों की तारीफ करेंगे कि जबरदस्त पॉलिटिक्स है तुम्हारी बॉस; तुमने तो खादी वालों के भी कान काट दिये। 

माओवाद को क्यों आन्दोलन कहा जाये अगर उसके कैडर का बरताबव हमारी पुलिस से जरा भी भिन्न नहीं? बात बात पर लाठी-गोली ही चलाना है और बाद में मुह छिपाते भी घूमना है कि “हमसे भूल हो गई, हमका माफी दई दो” तो फिर यह कथित जनता का संघर्ष एक बडे गुब्बारे जैसा नहीं जिसमें अब तक पिन नहीं मारी गयी है? सच बात तो यह है कि रमन्ना ने अपने साक्षात्कार में जो बाते कहीं है वह चुनाव में माओवादियों की अदृश्य भागीदारी वाला ही पक्ष है; बस यह साफ नहीं किया गया है कि उनका वरदहस्त किनकी पीठ पर है। सलवाजुडुम का कभी भी स्थानीय पत्रकारों ने समर्थन नहीं किया यही कारण है कि महेन्द्र कर्मा की हत्या पर माओवादियों से भी अधिक सवाल नहीं पूछे गये। इसी बात को रमन्ना के सुप्रीमकोर्ट वाले बयान की ढाल से भी जोडना चाहता हूँ। अगर रमन्ना मानते हैं कि सलवाजुडुम पर सुप्रीमकोर्ट नें प्रतिबन्ध लगा दिया इस लिये यह गलत था, तो मान्यवर आप तो एक प्रतिबन्धित संगठन ही हो; आप अपने संगठन के अस्तित्व को और इसकी विचारधारा को कैसे जस्टीफाई कर पाते हो? कथनाशय है कि जिन कारणों से सलवाजुडुम गलत था बिलकुल उन्हीं कारणों के लिये माओवादी संगठनों को भी गलत ठहराया जाता है। रमन्ना का यह साक्षात्कार कच्चा प्रतीत होता है जिसमे अपनी चमडी बचाने की कवायद अधिक दिखाई देती है। हास्यास्पद यह कि अगर रमन्ना जोर दे कर यह बताना चाहते हैं कि जैसे वोट देना लोकतांत्रिक अधिकार है वैसे वोट न देना भी, तो उन्हें यह संज्ञान में रखा चाहिये कि धीरे धीरे परिपक्व होते लोकतंत्र ने बिना आपके हस्तक्षेप के ही ईवीएम मशीन पर किसी को भी न चुनने का अधिकार दे दिया है। रमन्ना का यह साक्षात्कार केवल ‘हमारे खिलाफ सेना हटाओ’, ‘हमारा सर्च बंद करो’, ‘हमारे खिलाफ कानूनी प्रक्रियायें बंद करो पर ही केन्द्रित है’। सरकार का विरोध भी उसने इतनी कच्ची बुनियाद पर किया है कि टिकता नहीं। 

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Wednesday, October 30, 2013

गोदना कला में बस्तर की जनजातियों का परिचय छिपा है


बस्तर की स्त्रियाँ अपने श्रंग्रार में कलात्मकता को समुचित स्थान देती रही हैं वह चाहे उनके केशविन्यास का अनूठापन हो, बालों में खोंसी जा रही पड़िया पर उकेरी गयी रचनात्मकता हो अथवा उसके शरीर पर अंकित किये जाने वाले गोदने हों। आज गोदना विश्वप्रसिद्ध है, आधुनिक समाज में इसे टैटू का नाम मिला हुआ है। आधुनिकता समाविष्ठ होने के साथ ही गोदना चर्चित और प्रचारित तो हुआ किंतु उसकी कलात्मकता का बुनियादी आयाम अब खो गया है। गोदना कला का केनवास नारी का अपना शरीर होता है, उसमें अंकित होने वाले चित्र उसकी मनोभावना का परिचायक भी होते हैं और आजीवन उसके व्यक्तित्व के साथ जुड जाते हैं। एक मनमोहक आदिवासी गीत का अनुवाद है जहाँ गोदना करवा रही स्त्री अपनी पीड़ा को छिपाने के लिये गा रही है कि ओ रास्ते चलने वाले मेरे प्रेमी/ क्या तुझे मेरा गुदना दिखाई नहीं देता?/ देखो गुदने की पीड़ा से मेरी आँखें सलोनी हो गयी हैं/ क्या अब भी तुझे मेरा रूप नहीं भाता/ हे माँ हमारी प्रार्थना सुन लो/ तुमने वचन दिया था/ हे माँ पीडा हो रही है/ सूई की जलन मिटा दो.....। यह गीत गोदना प्रक्रिया में जो पीड़ा है वह तो प्रदर्शित करता ही है साथ ही साथ उस नवयुवती के मनोभावों को बताता है जो शरीर पर आजीवन रहने वाले श्रंगार को अंकित को अंकित करती हुई अपने प्रेमी को लुभाना भी चाहती है। बस्तर में घोटुल की मुटियारी का मुख्य आभूषण ही गुदना है। यहाँ लोक-मान्यता है कि गुदने के बिना जीवन का सौन्दर्य अधूरा रह जाता है। जो युवती लम्बे समय तक गुदना नहीं करवाती उसे समाज में बडी-बूढी महिलाओं के बीच लज्जित होना पडता है। किसी कारणवश शादी होने तक गोदना न हुआ हो तो लड़की के माता-पिता को इसका प्रायश्चित करना पड़ता है तथा इन्हें सगा खिलाने का दण्ड भुगतना होता है। गुदना स्थाई आभूषण माना जाता है और कहते हैं कि यह मृत्योपरांत भी शरीर पर रहता है; गुदना वस्तुत: आत्मा का आभूषण है तथा परमात्मा तक साथ ही जायेगा। अलौकिक मान्यता से इस लोक के मोहक सम्बन्धों पर यदि हम लौटें तो माना जाता है कि गुदवाने से प्रेमी युवक की दृष्टि हमेशा अपनी प्रेमिका पर रहती है। पीड़ा के पश्चात होने वाली आनंदानुभूति और प्रिय के प्रेम का अहसास गोदना करवा रही नवयुवतियों को होता है जिसकी अभिव्यक्ति करता एक गीत देखें कि इली ओझिल गोदलि बांहां/ इज्जत गेली मरजद गेली/घांडी दे महां रे; जिसका अर्थ है कि ओ गोदना करने वाली तू मेरी बाँह में मेरे प्रेमी का नाम लिख दे/ इससे सखियाँ और सगे-सम्बन्धी मेरी हँसी जरूर उडायेंगे/ लेकिन मेरे प्रिय मुझसे कभी भी छूट नहीं पायेंगे। नवयुवतियाँ सुन्दर और कलात्मक आकृतियाँ शरीर पर गुदवाना पसंद करती हैं चाहे इसके लिये शरीर को कितनी ही पीडा से गुजरना पडे। यह गीत देखें जिसमे मोटियारी गुदना हो जाने के पश्चात हो रहे दर्द से परेशान है और अंतत: देवी से प्रार्थना करती है कि पीडा समाप्त करो – अरजी बिनती हमार/उई दिनो बचन तुम्हार/सुजी का झारा उतार देउ/ उ, ऊ, इ, ई, मां!!!!उतार। 

गोदना को कला इसलिये कह रहा हूँ चूंकि आदिवासी जीवन की अपनी मौलिकता और कल्पनाशीलता इसमे झांकती है। बस्तर में तीस से अधिक जनजातियाँ अवस्थित हैं; गोदना हर किसी की परम्परा का हिस्सा है और उनकी एकता का साथी भी; साथ ही साथ उन्हें एक दूसरे से भिन्न पहचान प्रदान करने में भी यही गोदने सहायक होते हैं। दक्षिण बस्तर में बिन्दियाँ और आडी रेखायें मुख्य रूप से गोदना की आकृतियाँ बनती हैं। उदाहरण के लिये मस्तक के मध्य भाग में टीका, टीके के दोनो ओर सात सात खड़ी रेखायें; नाक पर भी खडी रेखायें तथा तीन तीन चार चार बिन्दियाँ। बाहों में, कलाईयों पर तथा हथेलियों के उपरी भाग पर भी बिन्दियों से श्रंगार। मुरिया लडकियों के माथे, ठोडी, बाहों और पैरों की पिंदलियों को गोदा जाता है। आम तौर चतुर्भुज, त्रिभुज, विषमकोण सम चतुर्भुज आकार में इनके शरीर पर गोदना किया जाता है। उत्तर बस्तर में छत्तीसगढी संस्कृति का प्रभाव भी गुदने में देखा जाता है जिस कारण माछी (मक्खी), बिच्छी, पौअँडी (पायल), खाडू (पग वलय) बाहाँ-चेघा (बाँहटा) और सिइता (हँसुली) आदि नामो के गोदने कांकेर और निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित हैं। आमतौर पर सभी क्षेत्रों में गुदने में अंकित की जाने वाई प्रमुख आकृतियाँ हैं - मोर, सांकल, पटली, बिछिया, मस्सी, पौधा, सर्प, फूल, पत्तियाँ, लाल चींटे, मछली, कण्ठहार, हाथी, कुम्हडा, सींकरी, चरूगा, भौंरा, चाउर आदि। मुख्य रूप से गोदने किसी लडकी के कपाल, छाती, बाहें, कलाई, हथेली का पृष्ठ भाग, घुटनों के उपर, गुप्तांगों पर, पैरों की उंग्लियों, पिंडलियों, हाथ, पैर, स्तन आदि पर अंकित किये जाते हैं।  

यदि हम बस्तर में गोदना कला की उत्पत्ति की बात करें तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। केवल यही मान सकते हैं कि आग, राख, रंग, चुभन और चित्रांकन के अंतर्सम्बन्ध को आदिमनुष्य से समझा होगा और उसने अपनी कपनाशीलता का केनवास अपने ही शरीर को बना लिया। यदि अतीत के संदर्भ तलाशें तो सबसे पुराने दो कथा संदर्भ वेरियर एल्विन द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं। दोनो की कहानिया कहती हैं कि ओझा औरते ही लम्बे समय से बस्तर में गोदना का कार्य सम्पन्न करती आ रही हैं। इन औरतों को गुदनारी भी कहा जाता है। ओझा औरतों और गोदना के अंतर्सम्बन्ध की पहली कहानी नारायणपुर से जुडती है जहाँ यह माना जाता है कि पहले आदिवासी समाज जातियों में नहीं बटा था। महापूरब विभिन्न जातियों को उपहार दे कर उन्हें बांटने का निर्णय लिया उदाहरण के लिये जिस व्यक्ति को जाल दिया गया वह मछुआरा बन गया, जिसे हल दिया गया वह गोंड बन गया। महापूरब ने देखा कि सब वस्तुओं का वितरण हो गया किंतु एक ढोल अब भी बचा हुआ है। बहुत से लोग उन्हें सड़क पर आते जाते दिखाई दिये। महापूरब ने ढोल उन्हीं में से एक व्यक्ति गले में लटका दिया और उसे ओझा नाम दिया। ओझा गाँव गाँव घूम कर भीख माँगता और कहानियाँ सुनाता हुआ अपना जीवन यापन करने लगा। एक शाम वह घर लौटा तो देखा खाना तैयार नहीं है। इसपर वह अपनी पत्नी पर बहुत नाराज हुआ। पत्नी भी बिफर गयी कि मैं तालाब से पानी लाती हूँ, जंगल से लकडी लाती हूँ, घर की सफाई करती हूँ, खाना बनाती हूँ और कितने काम की मुझसे उम्मीद रखते हो? गुस्से में ओझा की पत्नी ने निर्णय लिया कि अब वह खुद कमा कर खायेगी। आठ दिन तक उसने कुछ नहीं खाया। इस पर बूढी माताल का कालीन हिलने लगा; प्रसन्न हो कर बूढी माताल ने उस स्त्री से बात की और कहा कि मैं तुझे विशेष कार्य दूंगी किंतु इसके लिये तुझे मेरी पूजा करनी होगी। वह ओझा स्त्री को ले कर जंगल के एक सराई के पेड़ के पास पहुँची। उसने पेड़ से कुछ गोंद निकाल कर एक मिट्टी के टुकडे पर रखा। फिर गोंद के उपर आग में पकी मिट्टी का दूसरा टुकडा रखा। फिर उन्होंने दोनो टुकडों को गोबर से लीप कर आग में रख दिया। कुछ देर बाद ढक्कन खोला गया तो गोंद की जगह काला पदार्थ था। एक मिट्टी के टुकड़े से इसे खुरच कर बूढी माताल नें इस पदार्थ को टूटे हुए नारियल के टुकडे में रखा। तत्पश्चात पानी डाल कर इसे कुछ देर चलाया गया। अब उन्होंने तीन सूईयाँ एक बांस की गाँठ में बाँधी और ओझा स्त्री को लिटा दिया। पहला गोदना इस तरह बूढी माताल ने उस ओझा स्त्री के उपर किया। गोदना करने के पश्चात उन जगहों पर गोबर से लीप कर तेल और हल्दी लगा दी गयी। अब मताल ने कहा कि तुम आज से इसी तरह गोदाई का काम करोगी; गोदना करने के पश्चात उस स्थान को गोबर से लीप कर उस पर हल्दी का तेल छिडक कर, उस पर मेरे नाम से चावल बिखेर दोगी। कुछ सूईयाँ, हल्दी और दाल के दाने तुम हाथ में लेना और बायें हाथ से गोदी गयी स्त्री की उंगलियाँ पकड़ कर अपनी दाईं मुठ्ठी को तीन बार उसके शरीर के चारो ओर घुमाना। इसके बाद हल्दी और दाल उसकी साड़ी में रख देना और उसका हाथ छोड देना। इस उपाय से गोदने के निशानो पर जलन कम हो जायेगी। 

नारायणपुर से कोण्डागाँव आते आते यही कहानी अपने स्वरूप में बदल जाती है। यहाँ मान्यता है कि बाड़ादेव टाल्लुरमुताई और काडतेंगल के पुत्र थे। उनके छ: भाई और सात बहने थी। एक दिन सातों बहने टाल्लुरमुताई के पास गयीं और उनसे वो गहने मांगे जो मृत्यु के उपरांत भी बने रहें; यहीं से गोदना की उत्पत्ति हुई। बाडादेव को दो पुत्र हुए; एक का नाम था मुरहा और एक का ओझा। मुरहा खेत जोतने वाले बने जब कि ओझा शिकार करने और घरों की दीवार रंगने वाले बने। टाल्लुरमुताई की बेटियों से ओझा की पत्नी को भी गोदना करना आ गया। साल में एक बार ओझा बाडादेव पर बकरी चढाते हैं यह कहते हुए कि देखिये हम गुदाई करते हुए पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं जो निशान हम बनायें उसमे कोई घाव न हो, कोई पस न पड़े, न ही कोई सूजन आये, कार्य करते हुए हम पर किसी तरह का काला जादू असर न करे। कार्य शुरु करने से पहले ओझा स्त्री बाडादेव की सात बहनों का नाम लेती है। अंत में चावल, हल्दी, तेल, मिर्च और नमक आदि के रूप में प्राप्त भेंट व मेहनताने को वह लडकी के चारो ओर घुमाती है। इसका कुछ भाग वह सात बहनों को भेंट करती है जिससे कि गोदे गये निशान जल्दी ठंडे पडते हैं और जलन नहीं करते। टाल्लुरमुताई द्वारा सिखाई गयी गोदने की विधि भी लगभग वैसी ही है जैसी कि बूढी माताल ने पहली ओझा स्त्री को सिखाई थी। आज भी गोदना करने का कार्य बस्तर में ओझा स्त्रियाँ; गाँव की सियान स्त्रियाँ; कंजर, बंजारा, बादी और देवार जातियों की स्त्रियाँ ही निबटाती हैं। रुक्ष सी सुई पीतल के तार से बना ली जाती है। गोदने की सूई को पहले विसंक्रमित करने के लिये गोबर से धोया और उबाला जाता है। तत्पश्चात सेमीरंग और कोयले के रंग का उपयोग करते हुए गोदने वाली तीन या पाँच सूईयाँ एक साथ चलती हैं। हलबी-भतरी और छत्तीसगढी बोली में प्रथम बार सूई चालन को मूँडी, दूसरी बार को दुसडा और तीसरी बार को छडिया कहा जाता है।  

आज आदिवासी समाज में गोदना के प्रति पहले जैसी ललक नहीं देखी जा रही है। यद्यपि गोदना की तकनीक और इस्तेमाल किये जाने वाले रंगों में अनेक तरह के बदलाव होने लगे हैं। छत्तीसगढ के ही जशपुर क्षेत्रों में महिलाओं ने गोदना कला को केनवास और कपडों पर उतार कर अपनी कल्पनाशीलता और डिजाईनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिलाई है;  दुर्भाग्य से बस्तर में अभी एसा नहीं हो सका है। गोदना आदिवासी संस्कारों की ही नहीं उनकी कला की भी थाती है और इसका संरक्षण दायित्व भी है। अभिनेत्रियों के टैटुओं पर शोर मचाने वाले संचार साधनों ने कभी इन कलाओं के सौन्दर्य शास्त्र को अपने कैमरे और विषयवस्तु के केन्द्र में रखा होता तो सभव था कि इनकी स्थिति विलुप्ति की ओर जाती न दीख पडती। 

 - राजीव रंजन प्रसाद

Tuesday, October 29, 2013

बस्तर के भित्तिचित्र कला भी हैं और इतिहास भी


पाषाणकाल से ही स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बस्तर के आदिवासी समाज के पास उपलब्ध रहा है। अपनी अनुपम शैली तथा कलात्मक भाषा से बस्तर के आदिवासी समाज ने मनुष्य सभ्यता और उसके विकास के विभिन्न चरणों को लिपिबद्ध किया है। आप चित्रलिपि नाम देना चाहें अथवा शैलचित्र नामित करें किंतु मैं इसे लेखन कला के आरंभ, किसी भी लिपि के उद्भव के साथ साथ एसा अमरकंटक मानता हूँ जहाँ चित्रकला की विशाल नर्मदा का उद्गम स्थल है। दक्षिण बस्तर में अवस्थित अनेक पाषाणकालीन गुफायें यह बताती हैं कि वे ही आदि-मनुष्य का प्रारंभिक निवास थे। 

चित्रकला और गुफाचित्रों पर चर्चा से पहले बस्तर में अवस्थित आदिमनुष्य के आरंभिक हथियारों तथा औजारों की एक झलख देखें। निम्न पुरापाषाण काल के मूठदार छुरे जिसकी नोक चोंच के आकार की है, इन्द्रावती, नारंगी और कांगेर नदियों के किनारे मिले हैं। मध्यपाषाण काल में फ्लिट, चार्ट, जैस्पर, अगेट जैसे पत्थरों से बनाये गये तेज धार वाले हथियार इन्द्रावती नदी के किनारों पर खास कर खड़क घाट, कालीपुर, भाटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चंदेला, घाटलोहंगा के पास मिले हैं; इन जगहों से अब भी कई तरह के खुरचन के यंत्र, अंडाकार मूठ वाला छुरा और छेद करने वाले औजार मिल रहे हैं। उत्तर-पाषाणकाल का आदमी छोटे और प्रयोग करने में आसान हथियार बनाने लगा था; इनको लकड़ी, हड्डी या मिट्टी की मूठों में फँसा कर बाँधा जाता था, यद्यपि हथियार व औजार चर्ट, जैस्पर या क्वार्ट्ज जैसे मजबूत पत्थरों से ही बनाए जाते थे। इस समय के अवशेष इन्द्रावती नदी के किनारों पर विशेष रूप से चित्रकोट, गढ़चंदेला तथा लोहांगा के आसपास प्राप्त होते हैं। उत्तर-पाषाण युग के समानांतर तथा उसके पश्चात धातुओं ने पत्थर के हथियारों और औजारों का स्थान ले लिया। यदि हथियारों और औजारों के प्रकार ध्यान से विवेचित किये जाये तों उनकी उत्पत्ति और विकास के चरणों में न केवल शिकार, आत्मरक्षा, खेती-बागानी अपितु कलात्मकता का भी बराबर योगदान रहा है। खुरचन के लिये प्रयोग में आने वाले मूठदार हथियार आदिमनुष्य की अभिव्यक्ति का साध्य भी बने और उसने शनै: शनै: अपनी मौखिक और सांकेतिक भाषा को पत्थरों, पर्वतों और गुफाओं पर अंकित करना आरंभ कर दिया।

आड़ी टेढी खुरचनों से आरंभ हो कर परिष्कृत गुफाचित्रों तक कला की प्रारंभिक यात्रा बहुत रुचिकर जान पड़ती है। आदि-मनुष्य तब अपनी जिज्ञासाओं का परिष्कार तथा नित नये आविष्कार कर रहा था जिन्हें वह अचरज से देखता तथा उसकी कोशिश होती कि अपने साथियों और संततियों को भी वह इस नव-ज्ञान से अवगत करा सके। वस्तुत: बस्तर में प्राप्त गुफाचित्रों में दैनिक जीवन विषयक संदर्भों का आलेखन गुफा की छत और दीवारों पर किया गया है। इन चित्रों में आखेट, मधुसंचय, नृत्य, पशुयुद्ध, अग्निपूजा, वनस्पति इत्यादि से सम्बन्धित दृश्य प्रस्तुत किये गये हैं। दक्षिण बस्तर में लगभग चार हजार फुट ऊँची नड़पल्ली पहाड़ी के ऊपर चित्रित गुफा प्राप्त हुई है जिसमें हिरणों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। मटनार गाँव के पास इन्द्रावती नदी के तट पर चित्रित पशु-पक्षियों तथा मनुष्य की हथेलियों के चित्रन से यहाँ किसी अलौकिक शक्ति की पूजा का संकेत मिलता है। अपनी खुरचन कला मे प्रवीणता हासिल करने के पश्चात उसे प्रकृति ने ही रंगों का आरंभिक ज्ञान भी दिया होगा। फरसगाँव के समीप आलोर के निकट की पहाडी पर अनेक शैल चित्र बने हुए मिले हैं जो लाल रंग के हैं तथा मृदा वर्णों से चित्रित हैं; इन चित्रों को क्षरण के कारण स्पष्ट नहीं देखा जा सकता किंतु इनमे मानव और पशुओं की आकृति को आसानी से पहचाना जा सकता है।    

अब यदि इन आरंभिक चित्रों का बारीकी से प्रेक्षण निरीक्षण करें तो यह ज्ञात होता है कि रेखांकन से चित्र तक पहुँचने के पश्चात आदि-मनुष्य ने इनमे रंग भरने की भी कोशिश की होती। भांति भांति के प्रयोगों के पश्चात उसे गेरू मिट्टी के रूप में एक एसा रंग मिल गया होगा जो न केवल लम्बे समय तक स्थायी रह सकता था अपितु उसकी चटखीली लाल तथा भूरे रंग की आभा भी प्रभावित करती थी। गेरू-मिट्टी की कृतियों ने गुफाचित्रों को सजीव करना प्रारंभ किया तथा  कालांतर में अन्य प्राकृतिक रंगों का भी आविष्कार व प्रयोग होने लगा। उदाहरण के लिये पत्तियों के रस से हरा रंग निकाला गया होगा तो भांति भांति के फूलों ने लाल, नीले, बैंगनी, पीले आदि रंग प्रदान किये होंगे; काले रंग के लिये गाय के गोबर का प्रयोग किये जाने के भी संकेत प्राप्त होते हैं। 

समय बदलता गया और चित्रों के विषय भी बदलते चले गये। अब इन चित्रों में मनुष्य का सामाजिक जीवन प्रविष्ठ हो गया; उसका जन्म, उसकी मृत्यु, उसका बालपन, उसका बुढापा, उसका प्रेम उसके यौन सम्बन्ध, उसकी वितृष्णा, उसकी नफरत, उसके युद्ध, उसके वाद्य, उसके नृत्य, उसके देव, उसकी देवी, उसकी जिज्ञासायें उसके सपने.....यह सूची लगातार लम्बी होती चली गयी और ये भित्तिचित्र बस्तर की एक परिष्कृत और विश्व भर में सराही जाने वाली कला के रूप में अब हमारे सामने है। भित्तिचित्रों में बस्तर के लोक जीवन ही नहीं लोक काव्यों को भी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त किया है, जनश्रुतियों और कथाओं को मूर्तरूप दे कर पीढियों के लिये सुरक्षित करने का महति कार्य इन चित्रों के माध्यम से आज भी हो रहा है। बस्तर में भित्तिचित्र कला को गढ लिखना अथवा गढ लेखन करना भी कहा जाता रहा है। इन भित्तिचित्रों के केवल विषय ही नहीं बदले अपितु समय के साथ चित्र उकेरने और रंग भरने के माध्यम भी बदलते चले गये। गेरु मिट्टी, प्राकृतिक रंगों के साथ साथ अब चावल का आंटा जिसे स्थानीय बोली में बाना कहा जाता है; फर्श और दीवार के चित्रों को रंग व स्वरूप देने के कार्य में लिया जाने लगा। इस माध्यम से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी को बाना लिखना कहते हैं। चावल के आँटे को पानी में घोल लिया जाता है फिर कपडे के टुकडे की पोतनी बना कर उसी से मिट्ती अथवा लिपे हुए फर्श और दीवारों पर चित्रकारी करने की परम्परा बस्तर की थाती है। 

एक मुकम्मल कला बनने के साथ ही गढलेखन अथवा भित्तिचित्र निर्माण को न केवल सम्मान ही प्राप्त हुआ अपितु उसके आयामों मे भी परिवर्तन देखने को मिले। अब इन भित्तिचित्रों ने देवगुडियों को सजाया, घोटुलों के दरवाजों, फर्श और दीवारों को संवारा, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के निवास की शोभा बनी। वेरियर एल्विन की पुस्तक “दि डोर एण्ड वॉल डेकोरेशन” में बस्तर के भित्तिचित्रों की महान कलायात्रा का सुन्दर वर्णन उपस्थित है। आधुनिक समय ने बस्तर की इस कला को दीवार और भूमि जैसे केनवास के अलावा कागज और कपडे के माध्यम भी प्रदान किये हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर फेब्रिक रंग, पोस्टल कलर या ऑयल पेंट का उपयोग भी किया जाने लगा है। यद्यपि इस कला में अब भी परम्परागत विषयवस्तु को ही उकेरा जाता है किंतु समय के साथ आधुनिक बिम्बों के प्रयोग भी होने लगे हैं। जगदलपुर के मानवविज्ञान संग्रहालय में मेरी मुलाकात दो चित्रकारों महारूराम नेताम और बुधराम मरकाम से हुई। ये दोनो ही कोण्डागाँव से आये हुए कलाकार थे तथा आधुनिक माध्यमों और रंगों से अपनी विरासत कला का प्रदर्शन कर रहे थे। बस्तर की भित्तिचित्र कला के एक बडे साधक हैं कोण्डागाँव निवासी श्री खेम वैष्णव जिन्होंने न केवल इसे अपनी साधना बनाया अपितु देश-विदेश में इस कला की ख्याति को पहुँचाया है। इस वर्ष आईपीएल-2013 में देहली देयर डेविल्स की क्रिकेट टीम का सांकेतिक बल्ला श्री खेम वैष्णव द्वारा ही डिजाईन किया गया था जिसमे उन्होंने बस्तर की भित्ति चित्र कला की अनेक बारीकियाँ प्रस्तुत की थीं; यह इस कला की अनंत यात्रा का एक महत्वपूर्ण पडाव भर है। यहाँ हमें ठहर कर सोचना होगा कि कुछ विवादास्पद कलाकृतियों के लिये लाखों-करोडो की कीमत अदा करने वाले लोग क्यों इस महति कला की ओर उपेक्षा की दृष्टि रखते हैं?

 – राजीव रंजन प्रसाद


Friday, October 25, 2013

बस्तर में बांस की कलात्मक दुनियाँ


तेरहवी शताब्दी का पूर्वार्द्ध जब अन्नमदेव ने चक्रकोट के नाग शासकों को अंतिम रूप से परास्त कर अपना शासन स्थापित किया तब कोंटा से कांकेर तक उनके द्वारा शासित क्षेत्र का नाम बस्तर रखा गया। इस नामकरण के पीछे अनेक कहानियाँ हैं जिसमे से प्रमुख मान्यता है कि वारंगल से निष्काषित होने के पश्चात बस्तर में अपने विजय अभियान का आरंभ करने के दौरान अन्नमदेव को अनेक बार बांसतरी में विश्राम करना पड़ा; बांस से शासक के इसी सम्बन्ध ने संभवत: बस्तर शब्द की उत्पत्ति की होगी। आदिवासी जीवन में वही वस्तुएं कला का माध्यम भी बनी हैं जो उनके आम जीवन की संगिनी रही हैं। वह चाहे पाषाण हो, धातु हो, मृदा हो, काष्ठ हो अथवा बांस। जहाँ तक बांस का प्रश्न है, यह आदिवासी जीवन का अभिन्न है तथा मृत्यु पर्यंत तक उसकी किसी न किसी दैनिक गतिविधि का हिस्सा बना रहता है।



लोकजीवन से आगे बढ कर लोक संस्कृति का हिस्सा बनते हुए बांस कभी आदिवासियों की पूजा परम्परा में इस्तेमाल होते हैं तो कभी लोकनृत्य और लोक वाद्य का भाग भी बनते हैं। इसका महत्वपूर्ण उदाहरण डंगईयाँ को कहा जा सकता है। एक मोटे मजबूत साबुत बाँस को डंगई कहते हैं जिसके शिखर पर चाँदी, कासा, या पीतल का बना सम्बन्धित देवी या देवता का एक कलापूर्ण प्रतीक लगा होता है; इस प्रतीक को हलबी-भतरी में गुबा कहते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पर्व के दौरान जगदलपुर के सीरासार चौक में तुपकी खूब चलाई जाती है। वस्तुत: तुपकी बाँस से बनी एक तिकोनी नली होती है जिसकी प्रक्रिया किसी पिचकारी सदृश्य मानी जा सकती है। इसके मूल में मलकांगिनी के फल रख कर किसी भी आगंतुक अथवा मित्र पर उसे सधान कर मारा जाता है। मोहरी, नांगड और तुडबुडी बस्तर अंचल के लोक वाद्यों में प्रमुख माने जाते हैं तथा सभी के निर्माण में बांस किसी न किसी तरह सहयोगी होता है। धनकुल बस्तर की ही एक अद्भुत वाध्य रचना है जिसमें एक आम वनवासी की गृहस्थी में रोज काम आने वाली कई वस्तुओं का प्रयोग होता है जैसे हंडी सूप, धनुष और बाँस की कमची। वाद्य ही क्यों गेडी नृत्य, डंडारी नृत्य आदि में भी प्रमुखता से बाँस ही प्रयोग में लाया जाता है।

बांस बस्तर में विवाद के केन्द्र में भी रहा जब बांग्लादेश से आये विस्थापितों को अरण्य क्षेत्रों में बसाया जाने लगा था। उस दौरान बंगाल से लायी गयी बांस की कुछ किस्मों के बस्तर में रोपण की योजनायें बनी तथा उनका क्रियान्वयन हुआ। अनेक तरह के विरोध तब सामने आये एवं विशेषज्ञों ने सिद्ध किया कि कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में भी बस्तर का नैसर्गिक बांस उच्च कोटि की गुणवत्ता रखता है। अपनी पुस्तक ‘बस्तर – इतिहास एवं संस्कृति’ में लाला लगदलपुरी लिखते हैं कि “आदिवासियों की दृष्टि में बस्तर अंचल में कुल नौ प्रकार के बांस होते हैं। घर बावँस, बरहा बावँस, पानी बावँस, डोंगर बावँस, पोड़सी बावँस, रान बावँस, माल बावँस, सुन्दर कोया और बोंगू। इनमे से केवल डोंगर बावँस, पोडसी बावँस, माल बावँस और रान बावँस ही टट्टे, टोकने, सूप और छतूडी आदि बनाने के काम में लाये जाते हैं और शेष से मोटे काम निबटाये जाते हैं। पानी बाँस पतला होता है जिससे बाँसुरी बनती है और शहनाई का मुख्य भाग तैयार किया जाता है। बोगू बाँस एक मोटा बांस होता है, इतना मोटा कि उससे बने पात्र दक्षिण बस्तर में ताडी उतारने और पानी पीने के काम आते हैं”।

इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि विस्थापित बंगालियों के साथ आयी बांस कला का बस्तर में अवस्थित परम्परागत शिल्प के साथ बखूबी संगम हुआ तथा उसमें आधुनिकता के तत्व सम्मिलित होने लगे। बस्तर के आदि-बांस शिल्पियों को नयी तकनीक और नये प्रयोगों से प्रशिक्षित किया गया तथा वे अब कुछ एसी वस्तुओं का भी निर्माण करने लगे जो उपभोक्तावादी संस्कृति अपने बाजार के लिये चाहती थी। मुख्य रूप से बांस से बने सोफा सेट, डायनिंग टेबल, टेबल लैम्प, गुलदस्ते, मोर, मछली, टोकनी, परदे आदि तैयार किये जाने लगे। छत्तीसगढ हस्त शिल्प विकास निगम, राष्ट्रीय शिल्प बोर्ड आदि सरकारी संस्थायें तथा अनेक गैर सरकारी संस्थायें सामने आयीं जिन्होंने आदिवासियों की परम्परागत बांस-कला तथा उनके द्वारा निर्मित नये दौर के उत्पादों को बाजार देना आरंभ किया। नारायणपुर, अंतागढ, पखांजुर तथा ओरछा आदि क्षेत्रों में बांस से विभिन्न वस्तुए तैयार करने के लिये प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन केन्द्र स्थापित किये गये। मृगनयनी एम्पोरियम के माध्यम से यहाँ निर्मित उत्पादों के लिये अनेक विक्रय केन्द्र उपलब्ध कराये गये।   

मुझे बहुत निकटता से नारायणपुर के बाँस कला केन्द्र को देखने का अवसर मिला है। यह भी बताना चाहूंगा कि यहाँ का केन्द्र उन आदिवासी परिवारों के लिये पुनर्वास की तरह भी कार्य कर रहा है जो नक्सलवाद की विभीषिका के कारण अबूझमाड़ से पलायन कर यहाँ पहुँचे हैं तथा आजीविका के लिये उनके ही साधन उन्हे थमाये गये हैं। यहाँ मेरी मुलाकात बांस कला के अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्पी पंडी राम मंडावी से हुई जो अबूझमाड़ के प्रवेशद्वार गढबंगाल से हैं। उन्होंने अपनी अनेक बाँस की निर्मित कलाकृतियाँ मुझे दिखाई तथा भारत के बाहर उनके हाँथ का किन किन देशों में क्या क्या बना हुआ है इससे भी मुझे परिचित कराया। घुटने के उपर वाली लुंगी और कमीज में वे आधी दुनिया घूम चुके हैं तथा प्रशंसाये बटोरी हैं। पंडी राम मंडावी में प्रसिद्धी और पैसे ने कुछ नहीं बदला यहाँ तक कि उसके नंगे पैर में जूता नहीं आया; उनके सिर का साफा नहीं बदला; हाँथ का झोला नहीं बदला। मुझे प्रसन्नता होती है कि कलाकार नहीं बदलते क्योंकि उनके हाथों की महारत का मर्म उनकी अंतरात्मा में अंतर्निहित होता है।   

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Wednesday, October 23, 2013

शोभन सरकार, बिहारी दास और इतिहास

नये दौर की तिलिस्मी कहानियाँ अब प्रस्तुत हैं। एक बाबा सपना देखता है और इसके साथ ही सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगते हैं। वैज्ञानिक, इतिहासकार और सरकारी मशीनरी एक सपने के सच की खोज में जुट जाती है। बाबा बैठे बिठाये ग्लोबल हो गये हैं। चुनावी मौसम है इसलिये उन पर कदाचित सीधे हमले नहीं किये जा सकेंगे इसलिये वे ठसक में भी हैं और अपनी महत्वाकांक्षा की आड में आने वाले लोगों से निबट भी लेना चाहते हैं। वे अपनी आलोचना का जवाब विशुद्ध राजनैतिक चिठ्ठी से देते हैं जिसपर देश का मीडिया गरमागरम बहस भी करता है। यही नहीं इस पर भी चर्चा होने लगती है कि इस कथित सोने पर हक किसका होगा – राज्य का कि केन्द्र का? सपना देखने वाले बाबा किसी प्रखर समाजसेवी की तरह बयान देते हैं कि इस सोने से इलाके का विकास होना चाहिये। बडे वालों की तो छोडिये डोंडिया खेडा के प्रधान साहब तो बल्लियों उछलते हुए मांग करते हैं कि हमारे इलाके में हवाई पट्टी बननी चाहिये आखिर हमारी जमीन से सोना निकल रहा है। ‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ को चरितार्थ करते हुए अर्थव्यवस्था पर बात करने वाले चैनल इस सोने की कीमत का आंकलन करने लगे हैं और इससे यह गणना तक कर ली गयी कि प्रतिव्यक्ति कर्जे से हर हिन्दुस्तानी को कितनी राहत मिल सकती है, डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या स्थिति हो सकती है। 

यह तमाशा देख कर सवाल उठता है कि क्या सचमुच हम एक परिपक्व लोकतंत्र होने की दिशा में बढ रहे हैं? क्या इस प्रकरण में हम धर्म और राजनीति का विज्ञान की सीमेंट से गठजोड नहीं कर रहे? प्रकरण यह भी बता रहा है कि अपने इतिहास को ले कर हम कितने संजीदा हैं तथा उसे जानने की हमारी उत्कंठा कितनी है? महज बीस वर्ग किलोमीटर के दायरेवाली डौड़ियाखेड़ा रियासत में हजार टन सोना मिलने की आशा चमत्कार ही प्रतीत होती है। हाँ इस बहाने भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक पर चर्चा होने लगी इसे उपलब्धि कहा जाना चाहिये; राजा रामराव बक्श जिनके किले में यह खुदाई चल रही है उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत में सम्मिलित होने के अपराध में 28 दिसंबर 1859 को बक्सर के पास फांसी दे दी गयी थी। बहरहाल आनंद उठाईये इस तिलिस्म कथा का जहाँ बाबा शोभन सरकार के एक चेले ओम बाबा कहते हैं ‘बस इतना बता दीजिये कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए कितना सोना चाहिए; बाबा शोभन सरकार उतना सोना पैदा कर देंगे’। इस प्रकरण को धार्मिक चश्मा चढा कर देख रेहे लोगों को भी बताना चाहूंगा कि एसे ही कारणों से आस्था और विश्वास जैसे शब्द मायना हीन हुए हैं तथा धर्म की परिभाषाओं को हास्यास्पद विवेचनाओं से गुजरना पड़ा है। 

इस विमर्श को आगे बढाने से पूर्व बाबा बिहारीदास पर बात करते हैं जिनका सत्तर के दशक में बस्तर के क्षेत्रों में बोलबाला था। बस्तर रियासतकाल के अंतिम महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की 1966 में हुई हत्या के बाद आदिवासी नेतृत्व और प्रतिनिधित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया। वर्ष -1971 में बाबा बिहारीदास प्रकट हुए। उनके प्रवीर होने के उसके दावे की पुष्टि खुसरू और बाली नाम के दो भतरा कार्यकर्ताओं ने की जो पहले भी प्रवीर के साथ काम कर चुके थे। बाबा के काले रंग के लिये यह तर्क दिया गया कि गोलियों की बौछार सहने के कारण प्रवीर का रंग काला पड़ गया है। उनके अनुयाईयों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। बाबा को कंठी वाले बाबा या गुरु महाराज कह कर संबोधित किया जाता था। बाबा ने अपने अनुयाईयों को सलाह दी कि वे माँस खाना और शराब पीना छोड़ दें तथा तुलसी की माला जिसे कंठी कहा गया धारण करें। यह कहा गया कि महाराजा प्रवीर का आदेश है कि सभी ग्रामवासियों को कंठी बाँधनी होगी। जो कंठी नहीं बाँधेगा उसकी जायदाद छीन ली जायेगी, वह मर जायेगा, उसको राक्षस खायेंगे। बिहारीदास के इस धर्मप्रचार और तथाकथित सुधारवादी आन्दोलन को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली। हरे राम हरे कृष्ण और रघुपति राघव राजा राम आदि भी लोक गीतों में शामिल होने लगे। इस आन्दोलन को वाद, पंथ और अंजाम से तौले बिना अगर देखा जाये तो इसकी स्वीकार्यता का पैमाना बहुत विशाल था, लगभग सम्पूर्ण बस्तर। बाबा बिहारी ने प्रवीर के नाम को आन्दोलन बनाया। उसने प्रवीर के बाद की उस शून्यता का इस्तेमाल किया जिसमे आदिवासी स्वयं को नेतृत्वविहीन तथा असहाय समझ रहे थे। ब्रम्हदेव शर्मा जो उन दिनों कलेक्टर थे इस धार्मिक आन्दोलन को तोडने के लिये मुखर दिखे। बाबा बिहारीदास को समानान्तर सरकार न बनने देने के लिये जिला बदर का आदेश दिया गया। ठीक दशहरे से पहले ब्रम्हदेव शर्मा ने बाबा बिहारीदास को बस्तर से बाहर कर दिया था। बाबा ने अपनी लोकप्रियता भुनाई। कहते हैं कि राजनीतिक दखल पर वे वापस लौटे और इसके बाद ब्रम्हदेव शर्मा का स्थानांतरण कर दिया गया। वर्ष-1975 में उसे मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। वर्ष-1981 में एक आदिवासी लड़की से बलात्कार के जुर्म में वह गिरफ्तार हुआ। इसके बाद बाबा बिहारीदास का पतन हो गया।

शोभन सरकार और बाबा बिहारी दास की कहानी में एक प्रकार की साम्यता है। दोनो ने ही इतिहास की उस टूटन को अपनी प्रसिद्धि का हथियार बनाया जहाँ सत्य दफन किये जाते हैं और मिथक पैदा होते हैं। ध्यान से देखा जाये तो राजनीति शोभन सरकार से भी सोना ही खीच रही है, अब संचार माध्यम मंहगाई पर चुप हैं, रुपये के अवमूल्यन पर खामोश हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार पर कोई वाद-विवाद नहीं हो रहे। बाबा शोभन सरकार ने वह ढाल दी है जो राजनीति के हिस्से सोना ही उगलेगी भले ही आपको दिखे अथवा नहीं। इसे समझने के लिये आप बाबा बिहारी दास के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकते हैं। वर्ष 1972 में विधानसभा चुनाव हुए; बाबा ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। मेरा इशारा किसी राजनीतिक दल विशेष की ओर नहीं अपितु मंतव्य समग्र राजनीति से है। हाँ यह दु:ख जरूर व्यक्त कर सकता हूँ कि काश बिहारीदास भी सपना देखा करते। काश बाबा ने सपना देखा होता कि दक्षिण बस्तर के बारसूर में सोना गडा है या कि केशकाल घाटी के गोबरहीन में नलों की सम्पदा छुपी हुई है तो शायद इन क्षेत्रों की किस्मत बदल जाती। यहाँ से सोना निकलता अथवा नहीं लेकिन उस स्वर्णिम अतीत का सच जरूर बाहर निकल आता जिसकी निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इतिहास खोजने वाले अगर सोना खोदने मे व्यस्त रहेंगे तो बस्तर जैसे क्षेत्र के अतीत पर अंधेरा गहरा ही होता रहेगा। 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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Monday, October 14, 2013

फतेहपुर सीकरी के लपके और चुल्लू भर पानी


“लपका” शब्द रोचक लगा था मुझे। फतेहपुर सीकरी पहुँचने के बाद जब कई हमारी ओर लपके तब समझा कि इस शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई और इसके निहितार्थ क्या हैं। वैसे लपके सभी एतिहासिक स्थलों पर पाये जाते है; मूल रूप से ये गैर-प्रशिक्षित गाईड होते हैं जिनका कार्य होता है बस स्टेंड, टैक्सी स्टैंड, रेल्वे स्टेशन आदि आदि से अपने शिकार को फांसना। पर्यटक के लिये शिकार शब्द का प्रयोग करना एसा लगता जरूर है कि हलाली को कत्ल लिखा गया है, लेकिन ज़नाब किसी लपके की चपेट मे आ कर तो देखिये अगर अपने इतिहास ज्ञान और भूगोल की समझ पर आपको संदेह न हो जाये तो कहियेगा। गजब का आत्मविश्वास होता है इनमे और ये आपकी अनेक समस्याओं का एकमेव इलाज बन कर प्रकट होते हैं। अब उनके स्वयं को प्रस्तुत करने के तरीके को भी सराहिये ज़रा – ‘साहब आपको लाईन में नहीं लगना पड़ेगा’, ‘टिकट खरीदने के पैसे हमारी सर्विस में इंक्लूड हैं’, ‘आपको सबसे छोटे रास्ते से ले जाउंगा, कम सीढियाँ चढनी पड़ेंगी’, एकदम मॉन्यूमेंट के सामने ही पार्किंग करवा दूंगा’...यह सूची बहुत लम्बी भी हो सकती है यदि आपने त्वरित निर्णय नहीं ले किया। आपके चेहरे के भाव से वो जान जाते हैं कि आप फसने वाला मुर्गा हैं भी या नहीं। अगर आपने सलीके से झिडका तो इधर आपका पलक झपका और नदारद हुआ लपका, नहीं तो वह धीरे धीरे भूख और गरीबी की परिभाषाओं का डिमोंस्ट्रेशन आपके सामने आरंभ कर देगा। बोहनी का टाईम है, कल से कुछ खाया नहीं है, घर में माताजी भगवान के पास जाने ही वाली है और पिताजी टुन्न पडे हैं.....। आप देसी हैं तो संभव है इनके मनोविज्ञान को भांप सकते हैं; इनकी नुक्कड़ नाट्य प्रतिभा को सराह सकते हैं लेकिन सोचिये ज़रा उन विदेशियों के हालात जिन्हें देखते ही एक साथ उनकी ओर लपकते हैं लपके। यह बेचारा जर्मन हो या कि अमेरिकन, नाईजीरियन हो या कि ईरानी तय है जनाब की शामत आनी। इन्हें तो सलीम चिश्ती की दरगाह को कोई अलाउद्दीन खिलजी की समाधी भी बता दे तो येस येस में ही सिर हिलना है। 

मित्र शक्तिप्रकाश जी के साथ उनकी बाईक में फतेहपुर सीकरी पहुँचा। पार्किंग स्थल से ही हमपर एक सत्रह अठारह वर्ष के लपके ने डोरे डालने आरंभ कर दिये थे। सौ रुपये में वह फ्रेंड-फिलोसोफर और गाईड बनने की पेशकश किये जा रहा था। स्थानीय होने के कारण शक्ति जी के चेहरे पर संत वाले भाव थे और अनसुना करते हुए आगे बढते जा रहे थे किंतु मेरे भीतर के कवि मन ने ठगे जाने की सभी आशंकाओं के बाद भी इस लपके के प्रस्ताव को लपक लिया। पार्किंग से स्मारक स्थल तक जाने के लिये बस की व्यवस्था की गयी है। एक दिन पहले हुई बरसात के बाद भी मौसम में सुहानापन नहीं था और प्यास बेहाल कर रही थी। हम बुलंद दरवाजे से दूसरी और थे और इस स्थल से बमुश्किल पंद्रह सीढियाँ चढ कर ही स्मारक में प्रवेश किया जा सकता था। मैने लपका महोदय को अपना कैमरा दिया और उसने पहली तस्वीर जो निकाली उसके लिये नीचे बैठ कर एसी एसी मुद्रायें बनायी कि लगा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर को इनसे ही प्रशिक्षण लेना चाहिये; और जो तस्वीर खींची गयी उसे देख कर बस मैने सिर ही पीट लिया। खुद ही खुजा कर दर्द मोल लिया था तो भुगतना ही था। इस स्थल के आगे हमारे पास ‘खुद देखिये और आप ही बूझिये’ वाला विकल्प रह गया था। सही मायनो में न इस नवयुवक को स्मारक स्थल के विषय में कुछ पता था और न ही बताने में कोई अभिरुचि ही। उसका ध्यान केवल उन सौ रुपयों की तरफ था जो आधे घंटे की माथापच्ची के पश्चात उसकी जेब में जाने वाले थे। एक प्रशिक्षित गाईड स्मारक के संबंध में जानकारी रखता है, स्थल के इतिहास को पढना और समझाना उसका दायित्व होता है, उसके पास उन प्रश्नों के उत्तर होते हैं जो साथ चलने वाले पर्यटकों मे मन में उठते हैं चाहे वे सवाल कितने ही बचकाना हों अथवा कितने ही शास्त्रीय। इधर लपका का दिया पूरा विवरण उसकी कल्पना शीलता पर आधारित होता है। वह किसी गोल आकृति की कलाकृति को बादशाह की रसोई का हिस्सा बता सकता है तो दीवान-ए-आम को आम का बगीचा भी सिद्ध कर सकता है। बहरहाल बुलंद दरवाजे पर लपके ने मेरी तस्वीर खींचने के लिये कैमरे के कुछ तकनीकी बटनों पर अपना ज्ञान और हाथ आजमाया। इसके बाद कैमरे ने जवाब दे दिया। किसी भी दृश्य पर फोकस करना संभव नहीं हो रहा था। अंतत: मैंने छांव में बैठ कर कैमरे की बैटरी आदि निकाल कर फिर से उसे फिर से लगाया और इस तरह जुगाड तकनीक ने साथ दिया; तभी आगे की फोटोग्राफी संभव हो सकी। मैं आसपास से पर्यटकों को ले कर गुजरते लपकों की बातों पर ध्यान दे रहा था। सभी के पास एक जैसी जानकारी और रटे हुए वाक्यांश। अकबर को कोई संतान नहीं हो रही थी; शेख सलीम चिश्ती की दुआओं से एक हिन्दू रानी जोधा बाई के द्वारा उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। लपकाओं की कहानियों में आपको रस आ सकता है क्योंकि तथ्य के स्थान पर वे उन्ही कथ्यों तक खुद को रखना पसंद करते हैं जिनमे आम तौर पर लोगों की अभिरुचि होती है। आपको स्मारकों के भीतर की एसी एसी सास-बहू की कहानियाँ जानने को मिल जायेंगी जो कि एकता कपूर अपने सीरियलों में भी नहीं ला सकी। 

इस स्मारक के बारे में जिन बुनियादी जानकारियों के साथ मैं वहाँ गया था कमसेकम उतना भी मैं लपके से सुन लेता तो उनकी उपादेयता को दस प्रतिशत भी सार्थक पाता। आगरा से लगभग अडतीस किलोमीटर दूर अवस्थित यह स्मारक स्थल वस्तुत: दो हिस्सों में बटा हुआ है। पहले हिस्से में बुलंद दरवाज़ा और उससे लग कर परिधि है, जिसके भीतर विस्तृत अहाता और उसके बीचोबीच शेख सलीम चिश्ती की सफेद संगमरमर से निर्मित दरगाह अवस्थित है। मुझे जानकारी थी कि फतेहपुर सीकरी की दरगाह अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के पौत्र सलीम चिश्ती के सम्मान में निर्मित की गयी है जिनकी दुआओं के असर से बादशाह अकबर (1542-1605 ई.) को अपना वारिस प्राप्त हुआ था। यह दरगाह और समाधि स्थल उन गुने चुने संगमरमर के भवनो तथा निर्मितियों मे आता है जिसे आप बार बार निहारना चाहेंगे और भारत में इनके होने पर गर्व करेंगे। समाधि स्थल पर निर्मित मुख्यद्वार पर चार संगमरमर से तराशे हुए खम्बे निर्मित हैं जिसपर उकेरा गया सर्पाकार गुजराती शैली में निर्मित शिल्प विशेष दर्शनीय है। समाधि स्थल के चारो ओर संगमरमर का बारीक काम विशेषरूप से इसकी जालियाँ मनमोह लेती हैं। संगमरमर पर इतना महीन काम ताजमहल में भी देखने को नहीं मिलता अपितु यदि यहाँ किये गये कार्य की किसी दूसरे निर्माण से तुलना हो सकती है तो वे माउंट आबू में अवस्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिर ही हैं। यहाँ दरगाह पर चादर चढाने का रिवाज़ है साथ ही मन्नत का धागा भी बाँधा जाता है। बुलंद दरवाजे से बाहर निकलते हुए मेरी निगाह उपर उसके गुम्बद का निरीक्षण करने लगी उफ..पूरे गुम्बद पर मधुमक्खियों के अनेक छत्ते लगे हुए हैं। यहाँ दीवारों पर के भित्तिचित्रों और नक्काशियों का भी संरक्षण बहुत दयनीय स्थिति में हो रहा है। बुलंद दरवाजे का निर्माण अकबर द्वारा गुजरात विजय के पश्चात करवाया गया और इसके साथ ही सीकरी नाम के साथ फतेहपुर भी जोडा गया था। परिसर के दूसरे हिस्से में अनेक प्रशासकीय तथा रिहायशी भवन बने हुए हैं जिनमे दीवान-ए-खास (विशेष प्रशासकीय मंत्रणा का कक्ष), दीवान-ए-आम (जनता के सम्मुख बादशाह के उपस्थित होने का स्थान), मरियम का निवास, जोधा बाई का निवास, बीरबल का आवास, पंचमहल आदि शामिल हैं। सम्पूर्ण परिसर में स्थित अनेक भवनों में से जामी मस्जिद को फतेहपुर सीकरी के प्रारम्भिक निर्माणों में गिना जाता है जिसके पश्चात महल परिसर की निर्मिति 1569 – 1574 ई. के मध्य की गयी। फतेहपुर सीकरी को बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने 1571-1585 ई. तक अपने सल्तनत की राजधानी नियत किया था।

मैं सलीम चिश्ती की समाधि पर चादर चढाना चाहता था। साथ आये ‘लपका’ ने हमे दरगाह के पिछले हिस्से की ओर आने का इशारा किया जहाँ सैंकडो समाधियाँ बनी हुई हैं। ये सभी समाधियाँ सलीम चिश्ती के खानदान से सम्बन्धित हैं। यहाँ पुरुषों की समाधियाँ बाहर खुले स्थलों पर तथा महिलाओं की भीतरी परिधियों में बनी हुई है। नक्काशीदार जालियों से छन छन कर आती रोशनी जब इन समाधियों पर पडती है तो एक रूहानी दृश्य उपस्थित करती है। यद्यपि यहाँ के अधिकांश स्थलों पर चादर-फूल और संगमरमर के सामान बेचने वालों का कब्जा है। मैं समझ नहीं पाता कि स्मारक स्थल पर किसी भी विक्रय के लिये समुचित स्थल क्यों नियत नहीं किये जाते? कहीं भी सामान रख कर बेचने लगना अथवा फेरी लगाना वस्तुत: सर्वत्र भीड भाड को ही आमंत्रित करता है तथा इससे अव्यवस्था अधिक होती है। विदेशी पर्यटकों का एसे विक्रेता जो हश्र करते हैं वह भी एक दर्शनीय मनोरंजन बन जाता है; आखिर यह सब रुके इसका दायित्व किसका है? यहीं मेरी निगाह एक ‘लपके’ पर पड़ी जिसकी उम्र बमुश्किल नौ-दस वर्ष रही होगी। जिस आत्मविश्वास के साथ वह अपने साथ खडी भीड को सम्बोधित कर रहा था यह नज़ारा देखने योग्य था। एक सुरंगनुमा संरचना प्रतीत हो रही थी जिसका द्वार साधारण किंतु काष्ठनिर्मित था और उसपर ताला लगा हुआ था। इस स्थल पर खड़ा हो कर वह बालक जिसे उसके साथ खडे पर्यटक छोटू कह कर सम्बोधित कर रहे थे बहुत ही नाटकीय शैली मे अभिनय पूर्वक सलीम और अनारकली की कहानी प्रस्तुत कर रहा था। वह पर्यटकों को बता रहा था कि कैसे अकबर ने अनारकली को दीवारों मे चुनवाने का आदेश देने के बाद भी इसी गुफा से उसे फरार करवा दिया। मुझे इस लड़के की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं है और मैं उसकी अभिनय शैली से प्रभावित भी हूँ लेकिन क्या यह स्थिति भी बाल श्रम की नहीं है? बच्चे की असाधारण मेधा उससे इतिहास को तोड मरोड कर रोचकता के साथ प्रस्तुत तो करवा रही है किंतु क्या यह भी सही नहीं कि इन्ही बातों को पर्यटक अपने साथ गाँठ बांध कर ले जायेंगे? विदेशी इस बच्चे की तस्वीर लगातार खींच रहे थे, क्या आपको लगता है कि वे अपने देश जा कर लोगों को यह बतायेंगे कि बच्चे में कितनी प्रतिभा है? भोजन की गारंटी और शिक्षा की गारंती वाले देश मे छोटे छोटे बच्चे अगर लपका बने दीख पडते हैं तो हमारे नीति-निर्धारकों को चुल्लू भर पानी की ही आवश्यकता है। 
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Friday, October 11, 2013

महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?


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महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?
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धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाईयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है इसका उदाहरण है इन दिनो महिषासुर पर चलाई जा रही कुछ चर्चायें। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में कुछ वर्षों से ‘महिषासुर डे’ मनाये जाने के नाम पर उन अदृश्य हथियारों से तनाव फैलाने का सिलसिला जारी है जिनका संधान निरुद्देश्य नहीं किया गया। इन दिनो विचारधारा की पटाखा-लड़ियाँ किसी भी गली के कुत्ते की पूंछ पर बाँध कर सुलगा दी जाती हैं फिर तमाशा चालू आहे। क्या आदिवासी समाज को अपने गर्व के लिये अब कुछ गढी जाने वाली कहानियों पर निर्भर रहना पड़ेगा? संघर्ष की वे गाथायें जो एकलव्य से लेकर गुण्डाधुर तक फैली हुई हैं क्या वास्तविक आदिवासी विमर्श नहीं हैं? प्रश्न यह नहीं कि महिषासुर कौन था अथवा दुर्गा बहुसंख्यक समाज की आराध्य देवी हैं; प्रश्न यह भी नहीं कि महिषासुरमर्दिनी की आलोचना होनी चाहिये अथवा नहीं चूंकि हमने राम पर हमेशा ही सीता का परित्याग करने के लिये प्रश्न उठाये हैं, हमने कृष्ण को सदैव से छलिया ही माना है, हमारे अतीत के विमर्शों ने सृष्टि निर्माता कहे जाने वाले ब्रम्हा, पालनकर्ता माने जाने वाले विष्णु यहाँ तक कि संहार करने वाले शिव के कृत्यों पर भी अनेक प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों पर सार्थक बहसें हमेशा से होती रही हैं। इसी बात को आगे बढाते हुए महिषासुर के नाम पर हो रही जहरीली बहसों के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि किसी भी मिथक को इतिहास के साथ जोडने के आधारों पर चतुराई पूर्ण मौन क्यों फैला हुआ है? वस्तुत: हम एसे युग में रह रहे हैं जहाँ अध्ययन कम है लेकिन बात बात पर नाक मुँह फुलाने वालों की जमात बढती जा रही है। अब किसी संदर्भ पर तथा उसकी गहराई को समझने के लिये संवाद नहीं होते अपितु नारों के पीछे ही दौड लगाना सभी प्रकार के आन्दोलनों की नियति बन गयी है। संघर्ष का अर्थ कलात्मक पोस्टर किसी ‘विशेष विचारधारा परक कैम्पस’ में लगाना अथवा मोमबत्ती जलाना भर रह गया है।

संदर्भों पर आने से पहले महिषासुर को ले कर फैलाई जाने वाली आज की कहानियों की चीर फाड़ करते हैं। जो कहानी सबसे ज्यादा फैलाई जा रही है उसके अनुसार महिषासुर पश्चिमी भारत के बंग प्रदेश का प्रतापी राजा था। दुर्गा को राजा महिषासुर की हत्या करने में नौ दिन लगे। इन दिनों में देवता महिषासुर के किले के चारों तरफ जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। जिसके कारण दुर्गा को मानने वाले लोगों में आठ दिनों के व्रत-उपवास का प्रचलन है। आठ दिनों तक दुर्गा महिषासुर के किला में रही और और नौवे दिन उसने द्वार खोल दिये और महिषासुर की हत्या हुई। कहानी कहती है कि सवर्णो (?) की बर्बर कार्रवाईयों में बड़ी संख्या मेँ असुर (?) बस्तियाँ जला दी गयी; असुर नागरिकों को निशाना बनाया गया, औरतों का बलात्कार किया गया और बड़े पैमाने पर बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इन बर्बर कार्रवाहियों से घृणा और आत्मग्लानि से व्यथित, उस स्त्री जिसे दुर्गा कहा गया था..नदी मेँ कूदकर आत्महत्या कर ली.. जिसे विसर्जन का रूप देकर सवर्णो द्वारा महिमामंडित कर दिया गया। मैं यह प्रशन खडा नहीं करना चाहता कि आर्य और सवर्ण क्या पर्यायवाची हैं। हास्यास्पद विवरणों को इतिहास बताने की साजिशों पर प्रतिवाद केवल इस लिये नहीं होते क्योंकि एसे लेखकों से कोई तथ्य की मांग नहीं करता, इनसे किसी को संदर्भ पूछने की फुर्सत नहीं। विर्जन तो गणेश प्रतिमाओं के भी होते हैं तो क्या वह भी आत्महत्या का प्रतीक प्रदर्शन है? 

अब कोई पूछे कि किस साक्ष्य को इस कथन का आधार बनाया गया है और कहानी को बंगाल से जोड कर प्रस्तुत किया गया है? क्या केवल इसलिये कि दुर्गा पूजा बंगाल की सबसे समृद्ध परम्पराओं में से एक है। वे कौन सी श्रुतियाँ अथवा तथ्य हैं जो बताते हैं कि महिषासुर वध के बाद बलात्कार हुए और बच्चों की हत्यायें हुईं। किसी भी घटना को कारुणिक और उत्तेजक बनाने के विचारधारापरक प्रचलित ‘शब्द हथियार’ हैं - बलात्कार और हत्या। आईये बंगाल से इतर कुछ स्थलों पर चलते हैं जहाँ यह माना जाता है कि वही वास्तविक स्थल है जिसका कि सम्बन्ध महिषासुर से है। सारे दावे उत्तर-भारत से ही हों क्या जरूरी है? दक्षिण भारत का भव्य एतिहासिक शहर है मैसूर। मैसूर शब्द पर ध्यान दीजिये क्योंकि प्रचलित मान्यता है कि एक समय में मैसूर ही महिषासुर की राजधानी ‘महिसुर’ हुआ करती थी; तर्कपूर्ण लगता है कि महिसुर बदल कर मैसूर हो गया हो। मैसूर के निकट की चामुण्डा पर्वत की अवस्थिति है जहाँ यह माना जाता है कि महिषासुर का वध भी यहीं हुआ था। अब समस्या आती है कि क्या सही है; जो दक्षिण की मान्यता है अथवा दिल्ली और झारखण्ड में ताजा-ताजा जो कहानी बुनी हुई है। अगर इन दोनो ही कहानियों से आगे बढें तो हमें पूर्वी भारत अर्थात हिमांचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में नैना देवी शक्तिपीठ तक पहुँचना होगा। पुराणों के अनुसार देवी सती के नैन गिरने के कारण यह शक्तिपीठ स्थापित हुआ किंतु महिषासुर की कथा भी इसी स्थल से जुडी हुई मानी जाती है तथा उसका वध-स्थल भी यहीं पर माना जाता है। कहानियाँ और भी हैं; झारखण्ड के चतरा जिले का भी यह दावा है कि महिषासुर का वध वहीं हुआ। इसके तर्क में तमासीन जलप्रपात के निकट क्षेत्रों में प्रचलित कथा है कि नवरात्र के समय आज भी यहाँ तलवारों की खनक सुनाई देती है तथा यत्र-तत्र सिंदूर बिखरा हुआ देखा जा सकता है।

जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय के कथित विद्वानों द्वारा फैलाई जा रही इन सभी कहानियों से अधिक प्रामाणिक मुझे वह संदर्भ लगता है जो बस्तर की मान्यताओं में अवस्थित है। ज्ञानी विश्वविद्यालय के गुणीजन यह जान लें कि बस्तर के जिस क्षेत्र का संदर्भ मैं प्रस्तुत करने जा रहा हूँ वह हमेशा से ही जंगली भैंसो के लिये विख्यात रहा है; पुनश्च भैंस अर्थात महिष। अपने विशाल स्वरूप और बलिष्ठ काठी के कारण बस्तर के महिष को कभी दैत्याकार लिखा गया तो कभी उसका विवरण भयावहतम शब्दों में प्राचीन पुस्तकों में प्रस्तुत किया गया है। बस्तर के इन महिषों/जंगली भैंसों पर गल्सफर्ड की डायरी (1860) से लिया गया यह एक विवरण देखें – “इसकी एक सींग साढे अठहत्तर इंच लम्बी होती है। यदि हम मस्तक की खोपड़ी एक फुट चौड़ी माने तो यह सिर से पैर तक चौदह फुट ऊँचा होता है”। फैलाई जा रही नई कहानी के अनुसार महिषासुर पशुपालक समाज का राजा था। यदि इस कहानी का बस्तर से उद्गम माना जाये तो यहाँ के महिष पालतू नहीं थे तथा उनका शिकार किया जाता रहा है। क्या यह संभावना नहीं बनती कि एसे ही किसी आक्रामक महिष के किसी स्त्री द्वारा किये गये शिकार को रोचक काव्य-कथा का रूप दे दिया गया हो? वस्तुत: महिषासुर के वध से जुडी कहानी बस्तर के बड़े डोंगर क्षेत्र से मानी जाती है। इस सम्बन्ध में क्षेत्र के दो वरिष्ठ विद्वानों श्री घनश्याम नाग और श्री जयराम पात्र की पुस्तक ‘बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर – देवलोक बड़े डोंगर”’ से उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। बस्तर में प्रचलित जन  मान्यताओं के अनुसार बडे डोंगर के मध्य में स्थित महिषाद्वन्द्व पहाड़ (बोलचाल की भाषा में भैंसादोंद डोंगरी) में दुर्गा और महिषासुर के मध्य अंतिम युद्ध हुआ। इस किंवदंती को अपने क्षेत्र की विरासत मानते हुए स्थानीय आदिवासी भैंसादोंद डोंगरी पर स्थित सिंह के पंजों के अनेक चिन्ह, आक्रामक महिष के अनेक पग चिन्ह, दुर्गा के पद चिन्ह, युद्ध के कारण पत्थरों पर पड़े निशान एवं महिषासुर का वध स्थल सहर्ष दिखाते हैं। इस सभी कहानियों में मिथक और सत्य जिस तरह घुले मिले हैं क्या उन्हें अलग करने का प्रयास किसी विद्वान ने किया है? 

हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। नाग जनजातियों (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) को भी  इसी प्रकार का संघर्ष और युद्ध करते हुए भारत भूमि में प्रविष्ठ होना पड़ा। तुर्क-मुगल भी इसी तरह मध्यकालीन भारत की राजनीति में पैठ बना सके और आज भारतीय अल्पसंख्यक समाज का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। यही कारण है कि हर समाज एक दूसरे से जुडा हुआ है, एक दूसरे के साथ मिल कर अथवा उससे संघर्ष करता हुआ आगे बढा है। विजयी होने पर एक समाज ने दूसरे पर अत्याचार किये तो पराजित का पलायन होता रहा। साथ ही साथ उसके जीवन संघर्ष की कहानियाँ कभी किंवदंति बन कर तो कभी शिलालेख बन कर सामने आती रही हैं। हर कहानी हम सभी की है तथा उसमे अनावश्यक रूप से काल्पनिक जातीय पहचान को प्रविष्ठ करा कर विद्यमान सामाजिक खाई को चौडा करना मैं बौद्धिजीविक षडयंत्र मानता हूँ, इसे विचारधारा के खास लक्ष्य को हासिल करने के लिये जान बूझ कर फैलाया जा रहा है।  

मेरा एसा मानने के कई कारण हैं। इतिहास में दर्ज प्राचीन संदर्भ बताते हैं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य ही आरंभिक आर्य राजा इक्ष्वाकु के पुत्र दण्ड के गुरु भी थे, राम ने केवट जनजाति, शबर जनजाति, वानर, भालू तथा गीध टोटेम रखने वाली आदिवासी जनजातियों के सरदारों से मित्रता स्थापित की तथा रावण के विरुद्ध युद्ध लिया। इन आर्येतर जनजातियों में भी आपसी संघर्ष विद्यमान थे अन्यथा सुग्रीव को बाली का वध करने के लिये राम की आवश्यकता ही नहीं थी? इधर राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण ने इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। उपरोक्त उद्धरण यह बताते हैं कि इतिहास पर बचकानी टिप्पणियों से बचना चाहिये। भारत के इतिहासकार इस आओचना के योग्य हैं कि उन्होंने वाद-विचार में उलझे रह कर तथ्यों और सत्यों का मानकीकरण नहीं किया इसी कारण अपनी अपनी व्याक्याओं से किसी भी संदर्भ को आरी बना कर समाज को काटने-बांटने का खेल खेला जाता है। असुर केवल झारखंड की ही विरासत नहीं अपितु सम्पूर्ण दक्षिण भारत की सत्ता का एक समय केन्द्र रहे हैं। महिषासुर पर जेएनयू की अनाप-शनाप बहसों को बस्तर और मैसूर से पहले गुजरना चाहिये। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालय उस मध्यकालीन मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ यह माना जाता था कि राजधानी से कही गयी बात ही परम सत्य है। इन विश्वविध्यालय के इतिहास विभाग पर कोई दबाव बनाये कि अतीत पर पूर्वाग्रह रहित दृष्टि यदि आपके शोध दे सकते हैं तो ठीक; अन्यथा आपकी उपादेयतायें क्या हैं? 

– राजीव रंजन प्रसाद
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Tuesday, October 01, 2013

बस्तर की पहचान है उसकी काष्ठ कला


महापाषाण कालीन संस्कृति की भव्यतम झांकी दक्षिण बस्तर में देखने को मिलती है। मृतकों अथवा उनके अवशेषों को बड़े बड़े पत्थर खड़ा कर दफनाये जाने की प्रथा के उदाहरण पुरा-अतीत से ले कर वर्तमान तक के उदाहरणों के साथ अनेक स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इन्ही मृतक स्तम्भों के बीच अनेक स्थानो पर काष्ठ के विशाल स्तम्भ भी नजर आये जिनकी न केवल कलात्मकता ही दर्शनीय थी अपितु कुछ तो हजारो साल पुराने स्मृति अवशेष हैं। बस्तर जहाँ जन्म से ले कर मृत्यु तक हर परम्परा में किसी न किसी तरह उनकी कलाधर्मिता झांकती रही है वहाँ स्वाभाविक था कि मृतक स्तंभों में भी कल्पनाशीलता का प्रादुर्भाव होता। इसका कारण है कि काष्ठ बहुत आसानी से शिल्पकार की कल्पना को आकार देने में सक्षम होता है। प्राचीन समय से ही कलात्मकताओं ने मनुष्य़ को आकर्षित किया है। साल वनो के द्वीप मे एसे काष्ठ की सहज उपलब्धता थी जो न केवल शिल्प निर्माण की दृष्टि से श्रेष्ठ है अपितु वह न तो जल्दी खराब होता है न ही अपनी आभा खोता है। आदिवासी समाज को कई स्थानो पर काष्ठ उस पाषाण का विकल्प प्रतीत हुआ होगा जिस पर आसानी से कलात्मकता का प्रदर्शन संभव नहीं था। समय के साथ बदलते मृतक स्तंभों में भी कई स्थानो पर मुझे पाषाण और काष्ठ की युति देखने को मिली जहाँ किसी अवसादी चट्टान (विशेष तौर पर चूना पत्थर की फर्सी) को मुख्य आधार बनाया गया है किंतु उसके शीर्ष पर काष्ठ के पशु-पक्षी अंकित किये गये हैं अथवा एक सम्पूर्ण कलाकृति निर्मित कर रखी गयी है। 

मनुष्य का विकास भी पत्थरों और लकडी के साथ साथ हुआ है। पत्थर से जलाने, काटने और धारदार हथियार बनाने की विधि में मिली दक्षता के बाद उसके यही आविष्कार लकडी के साथ मिल कर अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बने। उदाहरण के लिये धारधार पत्थर और लकडी की युति ने ही आरंभिक कुल्हाडी का स्वरूप प्राप्त किया था। आविष्कारों के साथ ही आदि-मनुष्य लकडी से हल, कुदाल, बैलगाडी के पहिये आदि वस्तुएं निर्मित करने लगा। मनुष्य के आरंभिक औजारों से प्रारंभ हो कर लकडी ने उसकी अभिव्यक्ति में स्थान पाने तक सभ्यताओं का एक लम्बा सफर तय किया है और आज एक परिपक्व कला बन कर बस्तर के आदिवासी समाज की पहचान में शामिल है। दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लकडी की अनेक वस्तुएं निर्मित की गयीं। इन्हीं निर्मितियों को सजाने के दृष्टिकोण से इसे बनाने वाले कलाकार अपनी कल्पनाशीलता को जोड देते थे जिससे कि उपयोग की वस्तुओ मे कलात्मकता ने अपने पैर पसारे। शनै: शनै: तराशे हुए स्वरूप में नागर, खोटला, टेंडा, मचान, पीढा, माची, घाना, नाव, पतवार, मयाल, कलात्मक खम्बे, फाटक, चौखट, खिडकिया आदि आदि निर्मित होने लगे। इन निर्माणों में बहुत खूबसूरती से काष्ठ शिल्पकारों ने भांति भांति के बेलबूटे तथा फूलपत्तियाँ तराशीं।

लकड़ी बस्तर के आदिवासी समाज में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये उसी तरह सहायक बनी जैसे कि आज हम गुलाब के फूल का सहारा लेते हैं। कई तरह की सुन्दर कंघियाँ बनायी जाने लगीं चूंकि इनके माध्यम से ही प्रेमी चेलक अपनी प्रेमिका मोटियारियों से प्रेम का इजहार करते थे। इन काष्ठ निर्मित कंघियों को पडिया कहा जाता है। किसी घोटुल में मोटियारियाँ श्रंगार करती हुई अपने बालों में मांग निकाल कर सजती रही हैं और अपने खोंपों में भांति भांति की पड़िया खोसती रही हैं। अपने खोंपे अथवा जूडे बनाने के लिये भी मोटियारियाँ लकडी के नक्काशीदार चौकोर टुकडों का प्रयोग करती रही हैं। इन काष्ठ टुकडों को बीच में रख कर उनके चारो ओर बालों को लपेट कर एक सुन्दर जूडा तैयार होता है। बालों को स्थिर रखने के लिये मोटियारियाँ जिन पिनों का प्रयोग करती हैं वे आम तौर पर तिकोनी होती हैं और उनपर बहुत बारीक काष्ठ शिल्प का कार्य किया जाता है। स्वाभाविक भी था कि हर चेलक अपनी मोटियारी के लिये सुन्दर से सुन्दर पडिया बनवाने के यत्न में रहता था। काष्ठ पड़ियों की परिधि को बारीक नक्काशी से सजाये जाने की प्रथा रही है। कुछ पडिया मैने एसी भी देखी है जिनके शीर्ष पर अलग से आकृतियाँ जैसे चिडिया आदि उकेरी हुई प्राप्त होती है। मोटियारियाँ एकाधिक पडिया अपने बालों में खोसा करती थीं और इसका सांकेतिक अर्थ था कि उसके पास उसे बहुत प्यार करने वाला प्रेमी है। आज घोटुल लगभग समाप्त हो गये हैं तथा जहाँ हैं वहाँ भी ये औपचारिकता भर रह गये हैं। एसे में कलात्मक पडिया अब आसानी से देखने को नहीं मिलती। इस सम्बन्ध में घोटुल के बीच में गडने वाले खम्बे मे अंकित देवी देवताओं की आकृति भी समान उल्लेखनीय है। घोटुल के दरवाजों और उनकी चौखटों पर भी बारीक नक्काशी करने का चलन रहा है। 

आज भी आदिवासी तम्बाखू रखने के लिये विभिन्न प्रकार की चुनैटी बनाते हैं। इन चुनौटियों पर काष्ठ कला के कई प्रयोग देखे जा सकते हैं। प्राय: ये चुनौटियाँ शंखाकार होती हैं किंतु अन्य भी आकार प्रकार बनाये जाते रहे हैं। प्रयोग तथा रखने के स्थान के अनुरूप इन चुनैटियों में वैसी सुविधायें भी होती हैं उदाहरण के लिये यदि पगडी में फसाने योग्य चुनैटा बनाना है तो उसकी आकृति के नीचे पिन नुमा संरचना भी बना दी जाती है जिससे उसे खोंसने में सुविधा हो। वेरियर एल्विन ने अपनी पुस्तक “मुरिया और उनका घोटुल” में उन दिनो प्रचलित कुछ चुनैटिया बतायी हैं (भाग-2, पृ-165) जिन्हें उन्होंने गोटा कह कर उल्लेखित किया है; इनमे प्रमुख हैं हुदौंद गोटा (मोटियारी के स्तनो की भांति गोल), चक्का गोटा (पहिये के आकार का), मारका बट्टा गोटा (आम की आकृति का), कलारी गोटा (मछली की हड्डियों जैसी आकृति), तुमुर गोटा (आबनूस के फूलों के समान) आदि आदि। 

आदिवासियों की काष्ठ कला ने इतिहास के साथ कदम मिलाये और आज उसकी एक झांकी बस्तर के दशहरे के अवसर पर तथा गोंचा पर्व पर निकलने वाली रथ यात्राओं में देखी जा सकती है। बस्तर के दशहरे के लिए बनाए जाने वाले रथ में आदिवासियों की काष्ठ कला का अद्भुत प्रदर्शन होता है। रथ के आगे तथा पीछे रखे जाने वाले काष्ठ निर्मित दो दो घुडसवार पुतले आज भी रथ की सज्जा का प्रमुख हिस्सा होते हैं। आदिवासी देवी देवताओं का काष्ठ स्वरूप में निर्माण भी प्राचीन समय से ही होता आ रहा है। बस्तर के सम्पूर्ण क्षेत्र में आंगादेव, पाटदेव, भीमादेव आदि प्रमुखता से काष्ठ निर्मित ही होते हैं। आदिवासी काष्ठकला का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप है मुखौटे। भाति भातिं के स्वरूप वाले मुखौटे काष्ठ शिल्प के माध्यम से बनाये जाते हैं तथा कुछ तो इनमे बेहद डरावने भी होते हैं। इन मुखौटों का प्रदशन आज भी दंतेवाड़ा की फागुन मडई में दर्शनीय होता है। 

लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है बस्तर की काष्ठ शिल्प कला जिसका कि अब व्यावसायीकरण भी हो गया है। अनेक संस्थायें आगे आयी हैं जिन्होंने इस आदिवासी कला के न केवल संरक्षण के लिये कार्य किया है अपितु बस्तर के काष्ठ शिल्प को समुचित बाजार भी मिल रहा है। दंतेवाड़ा, जगदलपुर, कोण्डागाँव जैसे नगरों में आपको एसी अनेक दुकाने मिल जायेंगी जहाँ काष्ठ शिल्प कलाकारों द्वारा बनायी गयी कई कलाकृतियाँ आपको देखने तथा खरीदने के लिये उपलब्ध मिलेंगीं। बदले समय की मांग के अनुसार इन दिनो काष्ठ शिल्प में गणेश प्रतिमा, महापुरुषों की प्रतिमायें, महाभारत में कृष्ण का अर्जुन को गीताउपदेश प्रदर्शित करती प्रतिमा, बस्तर दशहरे के दृश्य, दण्डामी माडिया युगल, आदिवासी नृत्य, सलफी के पेड की आकृति आदि सहजता से उपलब्ध हो जायेगी। आदिवासी काष्ठ कला अब मध्यम और उच्च वर्ग के घरों में केवल सजावट की वस्तुओं के रूप में ही नही अपितु फर्नीचर में भी दृष्टव्य है। बस्तर में निर्मित दीवान, सोफे, दरवाजे और चौखटों आदि पर की गयी काष्ठ कला इन दिनो चलन में है। यह अलग बात है कि कलाकार और उपभोक्ता के बीच इतने बिचौलिये काम करते है कि हमेशा ही निर्माता को उसका वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। आवश्यकता है कि कला को सहकारिता के साथ जोडे जाने की जिससे कि कलाकार को सही मूल्य मिल सके तथा काष्ठ कला एक कुटीर उद्योग बन कर बस्तर की पहचान बनी रहे। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Saturday, September 28, 2013

कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?


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कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?
[केशकाल (उ. बस्तर) से एक वृतांत]
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दो तरह के देवताओं का फैशन है - आस्तिकों के देवता और नास्तिकों के देवता। दो तरह के कट्टरपंथी भी पाये जाते हैं – आस्तिक और नास्तिक। बडा विचित्र दौर है यह जहाँ भांति भांति के आस्तिक तलवार खींचे खड़े हैं और नस्तिकों ने भी अपने खंजर हथेलियाँ मोड़ कर पीठ की ओर छिपा रखे हैं। अब यह आप की ख्वाहिश है कि किस ओर खड़े हो कर मरना पसंद करेंगे? कोई आपके मुंह पर श्लोक या आयते दे मारेगा तो कोई मार्क्स की थ्योरी को परम सत्य बता कर आपकी छाती पर चढ जायेगा। विचारधाराओं के थोथेपन के इस दौर में मुझे बस्तर सुकून का ठंडा पानी उपलब्ध कराता रहा है। कथनाशय यह है कि धर्म, मान्यताओं और नास्तिकता के बीच भी सेतु बनाया जा सकता है; इस बात की प्रतीति पहली बार मुझे तब हुई थी जब मैं कांकेर (उत्तर बस्तर) में रिसेवाड़ा के पास कुछ प्रतिमाओं के अध्ययन के लिये गया था। एक स्थल पर ठिठक गया चूंकि वहाँ निकट ही गोबर की थप्पी पडी थी; पास ही इसे पूजे जाने के चिन्ह भी थे। मैने जब ग्रामीणों से इस सम्बन्ध में पूछा तो ज्ञात हुआ कि यह भीमादेव का स्थान है (भीमादेव पानी के देवता कहे जाते हैं)। देवता गोबर के भीतर पड़ा हुआ था। मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण ने भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार बस्तर में देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं, बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव ने बार बार याचना करने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण ने अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या? क्या इस उदाहरण के सामने हमारे मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों और कार्ल-मार्क्स की थ्योरियों के तोते नहीं उड जाते? आस्था क्या है, तर्क क्या है और मान्यताओं की क्या सीमा हो इसे प्रस्तुत उदाहरण से बेहतर कहाँ समझा जा सकता है?

इसी बात को बारीकी से समझने के लिये केशकाल (बस्तर) की रमणीक वादियों से होते हुए माता भंगाराम के मंदिर पहुँचा जा सकता है। उस दिन पोला त्यौहार मनाया जा रहा था; मैं सुबह सुबह ही पत्रकार मित्र कमल शुक्ला और कृष्ण दत्त उपाध्याय जी के साथ भंगाराम मंदिर आ पहुँचा। केशकाल नगर से लगभग चार किलोमीटर भीतर एक पर्वतीय टीले पर इस मंदिर की अवस्थिति है जिसके पीछे की ओर से घना वन और ढलान प्रारंभ होती है। इस स्थल के सम्बन्ध में बुनियादी जानकारी स्थानीय पत्रकार तथा शोधार्थी कृष्णदत्त उपाध्याय मुझे उपलब्ध कराते चल रहे थे। मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल दो पुजारी वहाँ उपस्थित थे जो कि पोला उत्सव होने के कारण माता भंगाराम को चढाने के लिये भोग बना रहे थे। खपरैल का यह मंदिर पुराने समय की संरचनाओं का स्मरण कराता है। बस्तर के देवी देवताओं का प्रकृति प्रेम भी जाहिर है और आम तौर पर जहाँ पेडों के झुरमुट हों, एकांत पर्वतीय टीले के निकट सघन वनों से घिरा कोई स्थल हो तो वहाँ आप किसी देवगुडी अथवा माता गुडी होने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। माता भंगाराम का मंदिर बस्तर भर की आस्था का केन्द्र है। रियासतकालीन बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने यहाँ एक चाँदी का छत्र भी चढाया था जिसे विशिष्ठ अवसरों पर तथा भादो जात्रा के दौरान निकाला जाता है। एक समय था जब यहाँ पशुबलि भी प्रथा थी जिसे सत्तर के दशक में आदिवासी समाज ने आपसी सलाह से बंद कर दिया। भादो जात्रा न केवल प्रसिद्ध है अपितु बस्तर के दूर दराज गाँवों से इसमें सम्मिलित होने अनेक गायता, सिरहा, माझी और पटेल पहुँचते है। भादो के छ: शनिवार सेवा पूजा होती है जबकि सातवे शनिवार जात्रा निकाली जाती है। 

मंदिर परिसर के पीछे एक पर्वतीय ढलान आरंभ होती है; ठीक वहीं पर कई आंगा देव जमीन पर पडे हुए थे। उनका सामान यहाँ तक कि उनके चाँदी से किये गये श्रंगार, उनके चढावे आदि आदि इस ढलाने में यत्र तत्र बिखरे पडे थे। आंगादेव को मूलत: वंश का देवता कहा जाता हैं। तीन साजा, बेल या इरा लकड़ी की डंडियाँ जमीन में समानांतर गाड़ी जाती हैं। बीच की लकड़ी देवता का प्रतीक होती है जिसमें किसी साँप या चिडिया जैसी आकृति बनी होती है। दो सिर वाली आकृति यदि बनी हो तो आंगा पति और पत्नी दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोरपंख, चाँदी के गहनों आदि से इसे सजाया जाता है।“ देवता तो देवता है और उसका मान करने की परम्परा भी है। देवता को प्रसन्न रखने के हर जतन किये जाते हैं तथा सिरहाओं के माध्यम से देवताओं द्वारा रखी गयी हर मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती है। देवता है तो कुछ भी मांग ले एसा भी नहीं। बहुत सख्त मोल-भाव देवताओं और भक्त के बीच में होता है। बकरे की मांग से शुरु हुई बहस भक्त के इनकार और चीख चिल्लाहट भरी तकरार से घटते घटते मुर्गे तक भी पहुँच सकती है। यहाँ चूंकि देवता और उसपर आस्था रखने वालों के बीच सांकेतिक ही सही एक संवाद स्थापित है अत: बात चढावे लेने देने तक ही नहीं ठहरती अपितु भक्त की मांग भी पूरा करना देवता का ही दायित्व है। भक्त को परेशानी है, वह कर्जे में डूब गया है, घर में बीमारियों ने घर बना लिया है, पति-पत्नी के बीच झगडे होते रहते हैं और एसे में देवता मूकदर्शक नहीं रह सकता। उसे हर व्यक्तिगत समस्या बताई जाती है तथा उससे समाधान भी मांगे जाते हैं। यह सब कुछ भक्त की बर्दाश्त की पराकाष्ठा तक ही होता है। जिस दिन भक्त को लगा कि वह देवता किसी काम का नहीं, जिसके रहते हुए भी उसका जीवन उलझनों भरा है, उसके तनावों का निदान नहीं मिल रहा है, खेतों को बरसात नहीं मिल पा रही है तो समझ लीजिये कि अब इस आंगा की शामत आ गयी। देवता को अस्वीकार करना बस्तर के आदिवासी समाज की आस्था का सबसे सबल और अनुकरणीय पक्ष है।

कुछ अविश्वसनीय किंतु सत्य जान लें। भंगाराम ही वह स्थल है जहाँ किसी देवता को मान्यता मिलती है तो किसी देवता की मान्यता समाप्त भी की जाती है। एक ही नाम के दो देवता होने पर वास्तविक कौन के विवाद का निबटारा भी यहीं होता है। सबसे बडी बात कि पीडित भक्त अपने देवता के बरताव के प्रति यहाँ अपनी नाखुशी व्यक्त करता है तथा उसके लिये सजा की मांग भी कर सकता है। वह अपने देवता का तिरस्कार भी कर सकता है अथवा उसे सजा दिलाने की पात्रता भी रखता है। एसा भी नहीं कि देवता को अपनी सफाई देने का मौका नहीं मिलता। देवता भी यहाँ अपने तर्क रखता है; वह भक्त की उन भूलों को उजागर कर सकता है जिसके कारण उसने समस्याओं का समाधान नहीं किया। भंगाराम की यह अदालत नीर-क्षीर विवेक करती है; वह कभी समझाईश से भक्त और देवता के बीच विवाद को समाप्त करती है तो कभी किसी देवता को कैद करने अथवा नष्ट करने का भी निर्देश दे सकती है। यही कारण भी है कि भादो जात्रा में महिलाओं का प्रवेश यहाँ तक कि प्रसाद ग्रहण करना वर्जित रखा गया है। इसका कारण उनके कोमल मन को माना गया है चूंकि देवताओं को कैद किया जाना अथवा नष्ट किया जाना एक भावुक क्षण होता है। पुजारी ने इस जानकारी में आगे जोडा कि कभी कभी कुछ साल बीत जाने के पश्चात भक्त को अपने कैद देवता की याद आती है अथवा उसे लगता है कि सजा पर्याप्त हो चुकी। अब देवता को छुडा कर लाने और सम्मान देने से उसकी बात सुनी जायेगी और समाधान भी उसे मिलने लगेंगे तो वह इसकी अपील भी भंगाराम में आ कर कर सकता है। यह प्रक्रिया वर्तमान न्याय प्रणाली में मिलने वाली जमानत की तरह होती है। वह निर्धारित शुल्क अदा कर अपने देवता को पुन: घर ले जा सकता है। 

क्या यह प्रक्रिया एक विमर्श नहीं मांगती? क्या देवताओं को मिलने वाली सजायें मुख्यधारा के उस समाज को आईना नहीं दिखाती जिन्होंने अपनी कट्टर आस्थाओं के लिये पाखण्ड की चादर ओढ रखी है? क्या यह समाजशास्त्र के लिये एक अनूठा विषय नहीं है जो तमाम नास्तिकता की दलीलों को जीभ चिढा कर उन्हें आस्थावान होने की अपनी ही परिभाषा सौंप देता है? यहाँ देवता असल में व्यक्ति के मनोविज्ञान से ही जन्म लेते हैं और उसके अपने तर्क द्वारा कभी भी नष्ट किये जा सकते हैं। भंगाराम मंदिर के पीछे की ओर जहाँ अनेको देवता कैद हैं अथवा उनके सामान, श्रंगार, चढावे आदि बिखरे हुए हैं; उन्हें देख कर मैं भी स्तब्ध रह गया हूँ और अपने तर्क को कुरेद रहा हूँ कि आदिवासी समाज की इस प्रगतिशीलता को हमारी मुख्यधारा की दकियानूसियत कभी हासिल भी कर पायेगी? 

- राजीव रंजन प्रसाद
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हजारो चेहरे ऐसे [पुस्तक चर्चा]


अनूठी है बस्तर की लौह शिल्प कला


उन्होंने अपनी घुटने तक लपेटी हुई लुंगी के भीतर खोंस कर रखा पासपोर्ट निकाला जिसे पॉलीथीन और उसके उपर कपडे से लपेट कर सुरक्षा प्रदान की गयी थी। दो पासपोर्ट आपस में जुडे हुए थे और पन्ने पलटने पर ज्ञात हुआ कि अनेक देशों का उसमे वीज़ा लगा हुआ है। यह विद्याधर कश्यप थे जो नगरनार में अवस्थित हैं और बस्तर के लौह शिल्प का जाना पहचाना नाम हैं। कलाकार की प्रेरणा उसे मिलने वाला सम्मान और प्रोत्साहन ही होते हैं; यह बात मैं कश्यप जी की आँखों से झांकते गर्व को देख कर महसूस कर रहा था। यह गर्व उस दक्षता और कल्पनाशीलता से उत्पन्न होता है जो बस्तर के कलाकारों में आप देख-महसूस सकते हैं। लौह शिल्प से तात्पर्य आप विशुद्ध लोहार कर्म से नहीं लगा सकते। यह सही है कि परम्परागत रूप से बस्तर में लोहार निवास करते आये हैं तथा रियासत काल से ले कर आज तक वे भांति भांति के लौह औजार बना कर बाजार तक पहुँचाते रहे हैं। इन औजारों में दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे कुल्हाडी, छुरा, दीपक, सांकल, बड़गी, सिकरा, काटा, आदि रही हैं तो खेती के उपकरण जैसे हल के फाल आदि भी हैं। तीर के आगे का हिस्सा निर्मित किया गया है तो बर्तन और दरवाजे भी बनाये जाते रहे हैं। किसी समय तलवारे, त्रिशूल, भाला, बरछी भी इनकी धौंकनियों से तप कर निकली हैं और बंदूखों की नाल भी इनकी निर्मिति हुआ करती थी।

बस्तर का लौह कर्म जितना पुराना है उतनी ही पुरानी लौह शिल्प कला भी है। धातुयुगीन मानव सभ्यता का काल 1800 ई.पू से 1000 ई.पू माना गया है। इस कालखण्ड तक मध्यभारत, गोदावरी के तटीय क्षेत्रों जिसमे कि वर्तमान बस्तर भी सम्मिलित है निश्चित ही लोहे को गलाने और इस्पात बनाने की विधि सीख ली गयी थी। बैलाडिला क्षेत्र में जहाँ आज विश्व की सर्वाधिक लौह प्रचुरता वाले अयस्क का भंडार है और आधुनिकतम खदाने हैं वहाँ 1065 ई में चोलवंश के राजा कुलुतुन्द ने लोहे को गला कर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना लगाया था। यहाँ बने हथियारों को तंजाउर भेजा जाता था। कथनाशय यह है कि आदिवासी परम्परागत रूप से लोहा गलाने और उससे विभिन्न उत्पाद बनाने की विधि को पीढी दर पीढी आगे बढाते रहे और इस तरह लौह कर्म वर्तमान की दहलीज तक पहुँच सका। एक निर्माता वस्तुत अपने भीतर की कल्पनाशीलता को छोड ही नहीं सकता और गाहे-बगाहे उसके भीतर से निकलने वाली सृजन की हूक किसी एसी आकृति के साथ बाहर आती है जिसे देख कर सभी चमत्कृत रह जायें। किसी भी कला की यही आरंभिक अवस्था है और संभवत: लौह शिल्प की भी।

लौह शिल्प का जो कला पक्ष है वह अत्यधिक श्रम से निकल कर बाहर आता है जहाँ धौकनी का ताप, लोहे को गलाने-तपाने का समय और हथौडे की उसपर सही समय और सही मात्रा में की गयी चोट ही आकार देने में सहायक होती है। आज भी लौह शिल्प के कलाकार किसी तरह की ढलाई विधि का प्रयोग नहीं करते अपितु परम्परागत रूप से पीट पीट कर आकार देने की प्रक्रिया का ही निर्वहन किया जाता रहा है। लौह कर्म एक कुटीर उद्योग तो बना ही कला के रूप में आरंभ में लोहारों ने अनेको स्थानीय देवी देवताओं की आकृति को स्वरूप प्रदान किया। गुजरी देवी को देवगुडी में रखा जाता है; इसी तरह देवताओं के वाहन निर्मित किये गये जिनमे रावदेव का घोडा इस तरह बनाया जाता था जिसमे कि कान नहीं होते थे। विभिन्न अनुष्ठानो में देवी-देवता अथवा पशु मूर्तिया चढाना एक विधान की तरह है। मानव आकृतियाँ भी बनाई जाती हैं जिसमे गौर सिंह लगाये हुए दंडामि माडियाओं की अनुकृति प्रमुख है। इसी तरह लौह कर्म से निर्मित सिकरा तीन प्रकार के होते हैं – कपाट सिकरा, बिलाई सिकरा और काटा सिकरा। काटा सिकरा आजब भी देवस्थल पर रखे जाते हैं। चिटकुली को बजाने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। लौह कलाकृतियों में अनेक प्रकार के पशु पक्षी जिनमे कि बैल, हिरण, घोडा, भांति भांति के आकार की चिडिया आदि बनाये जाते हैं। लौह कलाकृतियों में घुडसवार गणेश विशेष रूप से दर्शनीय होते हैं। दीपंकर हो अथवा दीवार में सजाने वाली विभिन्न मूर्तियाँ; इन सभी में बस्तर के लौह-शिल्पियों की अद्भुत कलात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं।

बस्तर के आदिवासी समाज में प्रचलित एक प्रथा की जानकारी मिलती है जिसमे विवाह में कन्या को लौह दीपक प्रदान किया जाता है। इस प्रथा को दाईज दिया जाना कहते हैं। वस्तुत: यह कला ही है जो लोकजीवन में अपना आलोक विस्तारित करती है, देवताओं के सम्मुख प्रस्तुत की जाती है और समान पूजनीय होती है साथ ही साथ हर आम और खास घरों की सहर्ष शोभा भी बनती है। बस्तर के भीतर लोककला के रूप से एसी एसी विरासतें मौजूद हैं कि यदि इनका सही प्रकार से संरक्षण, संवर्धन तथा प्रसार किया जाये तो रोजगार के उन अवसरों को पुन: हासिल किया जा सकेगा जो धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।
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Wednesday, September 25, 2013

बस्तर की घड़वा कला में सांस लेता है मोहनजोदाडो


कलाकारों के साथ समय गुजारना एक अनोखा अनुभव होता है। बस्तर की घडवा कला अथवा ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है और हमेशा ही मुझे इन धातु-निर्मित कलाकृतियों ने अत्यधिक प्रभावित किया है। जगदलपुर स्थित मानवसंग्रहालय में मेरी मुकालात घडवा कला के साधक फगनुराम से हुई। वे बहुत देर तक इस बात से अनजान थे कि मैं उनके पीछे खड़ा मंत्रमुग्ध सा उनकी साधना को निहार रहा हूँ। मिट्टी, मोम और धातु की सम्मिलित है यह यह कला साधना जिसमे आकृति तो धातु की बनती है लेकिन कलाकार उसे मोम में साधता है और मिट्टी जीवन फूंकें जाने तक उसे अपने सांचे में धारण करती है। मैं कलाकार के बगल में ही बैठ गया और जानने की कोशिश करने लगा कि आखिर यह कला है क्या तथा इसकी निर्माण प्रक्रिया कैसी है। यह बात तो तय है कि घडवा अथवा ढोकरा कला केवल सांचे में धातु डाल कर उसे जमाने भर को नहीं कहते। मेरे सामने अनेक मोम से आकार दी गयी देव प्रतिमायें, स्त्री-पुरुष आकृतियाँ, हाथी हिरण आदि आदि के स्वरूप बना कर रखे हुए थे। मोम से ही इन्हें इतना बारीक तराशा और सजाया जा चुका था कि इतने भर को ही मैं श्रेष्ठतम कला कहने को बाध्य था किंतु यह तो शुरुआत मात्र है। 

अगर प्रारंभ की बात की जाये तो बस्तर में मुख्य रूप से से घसिया जनजाति ने घडवा कला को साधा और शिखर तक पहुँचाया। घसिया के रूप में इस जनजाति को पहचान रियासतकाल में उनके कार्य को ले कर हुई चूंकि ये लोग उन दिनो घोडों के लिये घास काटने का कार्य किया करते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि घडवा कला को किसी काल विशेष से जोड कर नहीं देखा जा सकता चूंकि मोहनजोदाडो में ईसा से तीन हजार साल पहले प्राप्त एक नृत्य करती लडकी की प्रतिमा लगभग उसी तकनीक पर आधारित है जिसपर बस्तर का घडवा शिल्प आज कार्य कर रहा है। अपने एक आलेख में प्रसिद्ध घडवा शिल्प के कलाकार श्री जयदेव बघेल ने लिखा है कि बस्तर में इस कला के प्रारंभ के लिये जो मिथक कथा है उसका सम्बन्ध आदिमानव और उसकी जिज्ञासाओं से है। यदि उनके विवरणों को अपने शब्दों में प्रस्तुत करूं तो यह बात तब की है जब आदिमानव जंगल में विचरण करता था और शिकार पर आश्रित अपना जीवन निर्वहन किया करता था। इन्ही में से एक आदिमानव की यह कहानी है जो अपने माता-पिता से बिछड कर किसी गुफा में रह रहा था। एक दिन उसने पहाड पर आग लगी देखी। आग से निकलने वाले रंग तथा चिंगारिया उसे भिन्न प्रतीत हुईं और वह जिज्ञासा वश उस दावानल के निकट चला गया। अब तक आग स्थिर होने लगी थी। वहीं निकट ही उसे एक ठोस आकृति दिखाई पडी जो किसी धातु के पिघल कर प्रकृति प्रदत्त किसी गह्वर अथवा सांचे में प्रवेश कर जम जाने के पश्चात निर्मित हुई होगी। यह आकृति उसे अलग सी और आकर्षित करने वाली लगी और उसे उठा कर आदिमानव अपने घर ले आया। उसने इस प्रतिमा के लिये घर का एक हिस्सा साफ किया और इसे सजा कर रखा। इस प्रतिमा के लिये उसका आकर्षण इतना अधिक था कि नित्य ही वह इसे साफ करता और धीरे धीरे इससे प्रतिमा में चमक आने लगी। कहते हैं इसी चमक से प्रभावित हो कर वह स्वयं को भी चमकाने लगा अर्थात नित्य स्नानादि कर श्रंगार पूर्वक रहने लगा। यह धातु और वह मानव जैसे एक दूसरे के पूरक हो गये थे और समय के साथ दोनो में ही वैशिष्ठता की दमक उभरने लगी थी जिसे ग्रामीणों ने महसूस किया। जब कारण पूछा गया तो इस आदिमानव ने ग्रामीणों को वह जगह दिखाई जहाँ से उसे धातु का यह प्रकृति द्वारा गढा गया टुकडा प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर सभी ने पाया कि एक दीमक का टीला है जिसमे कि धातु-द्रव्य प्रवेश कर गया था और उसने वही आकार ले लिया था। उसी स्थल पर मधुमक्खी का छत्ता भी पाया गया जिससे मोम, सांचा और धातु को कलात्मकता देने का आरंभिक ज्ञान उन ग्रामीणों को हुआ होगा। उस आदि-कलाकार ने तब ग्रामीणों से कहा कि मैने इस धातु के टुकडे को अपनी माँ माना है और इसी तरह इससे प्रेम किया है। तुम भी इस कला और अपने निर्माण को माँ की तरह ही मानो। कहते हैं कि उस आदिकलाकार ने सबसे पहले अपनी माँ की आकृति बनाने का यत्न किया और धीरे धीरे वह अपने निकटस्थ परिवेश की वस्तुओं और पशु-पक्षियों को भी इस कला के माध्यम से मूर्त रूप देने लगा। जयदेव बघेल के अनुसार उस आदिनामव ने इस तरह पहले बाघ, भालू, हिरण, कुत्ता, खरगोश, नाग कछुवा, मछली, पक्षी, गाय, बकरा, बंदर आदि बनाये। धीरे धीरे उसने अपनी माँ के रूप में डोकरी माँ की कलाक़ृति बनाई और कालांतर में डोकरा बाबा के रूप में वह पिता के स्वरूप को गढने लगा। इसी तरह विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ घडवा कला के रूप में परिवर्तित होती रहीं। कर्मकोलातादो, मूलकोलातादो, भैरमदेव, भीमादेव, राजारावदेव, दंतेश्वरीदेवी, माता देवी, परदेसीन माता, हिंग्लाजिन देवी, कंकालिन माता आदि की मूर्तियाँ इस कला के विकास के विभिन्न चरणों में निर्मित की जाने लगी। लाला जगदलपुरी भी अपनी पुस्तक बस्तर इतिहास एवं संस्कृति में उल्लेखित करते हैं कि “बस्तर के घड़वा कला कर्मी पहले कुँडरी, कसाँडी, समई, चिमनी और पैंदिया तैयार करते थे। अब ये लोग देवी देवता, स्त्री पुरुष, हरिण, हाथी, अकुम आदि बनाते आ रहे हैं”। 

यह कला असाधारण इसलिये है चूंकि इसे सम्पूर्णता से समझने पर किसी न किसी रूप में इतिहास सामने आने लगता है। सिन्धु घाटी की सभ्यता अगर धातु की एसी प्रतिमाओं की निर्माती थी तो निश्चित ही इस सभ्यता के नष्ट होने के साथ जो पलायन हुए उनके साथ ही यह कला भी स्थानांतरित हुई होगी। बस्तर में नाग शासकों ने लगभग सात सौ वर्ष तक शासन किया है और इतिहास उनके आगमन का स्थल मध्य एशिया के पश्चात सिंधुघाटी का क्षेत्र ही मानता रहा है तो क्या यह कला उनके साथ ही बस्तर की जनजातियों के पास पहुँची? इन प्रतिमाओं का महापाषाणकालीन सभ्यता से भी सम्बन्ध जोड कर देखा गया है तो क्या यह माना जा सकता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में ही समानांतर बसे मानव समूहो को भी धातु को गला कर आकृतियाँ देने की यह कला ज्ञात थी जिसमे गोदावरी के तट पस बसे आदिम समूह भी सम्मिलित थे? यह अभी शोध का विषय है तथा इसपर गहराई से कार्य किये जाने की आवश्यकता है। 

घडवा कलाकार फगनुराम ने मुझे इसकी निर्मिति की जो विधि बताई उसके अनुसार इस प्रकृया में कई प्रकार की मिट्टी लगती है जिसमे दीमक की बाबी की मिट्टी की प्रमुख भूमिका होती है। इस बात की कडी उपरिउल्लेखित आदिवासी की मिथक कथा से जुडती हुई प्रतीत होती है जिसका उल्लेख कलाकार जयदेव बघेल अपने आलेखों में करते रहे हैं। मिट्टी के कई प्रकार इस आकृति निर्माण प्रकृया में लगते हैं जिसमे दीमक (डेंगुर) की बाबी की मिट्टी के अलावा काली मिट्टी, नदीतट की मिट्टी, रुई-मिट्टी आदि का उपयोग विभिन्न प्रक्रियाओं में किया जाता है। साथ ही साथ सहायक तत्व के रूप में धान का भूसा तथा रेतीली मिट्टी का भी प्रयोग होता है। मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया के पहले चरण में धान के भूसे को काली मिट्टी के साथ मिला कर अच्छी तरह गूथ लिया जाता है और फिर इससे ही सांचा तैयार किया जाता है। अब सांचे की आकृति को धूप में अथवा आग में तपा कर ठोस कर लिया जाता है। इस सांचे पर गीली मिट्टी की दूसरी परत चढाई जाती है। इस बार मिट्टी के सूखते ही इस सांचे के स्वरूप की घिसाई खपरे अथवा हंडी (मटके) के टुकडे से की जाती है और इसे चिकना बनाया जाता है। अगली प्रक्रिया है उन पौधों की पत्तियों से इस आकृति को घिसना जिनको पीसने पर हरा रंग अधिक मात्रा में निकलता हो। सेम वृक्ष की पत्तियों का विशेषरूप से इस हेतु प्रयोग किया जाता है। इस प्रकृया के पश्चात तैयार ढांचे को पहले सुखा लिया जाता है जिसके पश्चात इस आकृति के उपर कलाकार की कल्पना अपना कार्य आरंभ करती है। मोम की सहायता से इस आकृति के उपर विभिन्न प्रकार की कलात्मक बारीकियों को उभारा जाता है। वस्तुत: इस पूरी प्रकृया के प्राण इसी समय भरे जाते हैं जब मोम के माध्यम से बहुत बारीक बारीक आकृतियाँ और स्वरूप उकेरे जाते हैं, विभिन्न प्रकार की पच्चीकारी की जाती है। इस मिट्टी के स्वरूप का मोम से श्रंगार पूर्ण होते ही छानी हुई खडिया मिट्टी में कोयले के महीन छाने हुए पावडर या गोबर को मिला कर आकृति के उपर हलके हाथो से एक लेप चढाया जाता है। इस लेपन की परत के सूख जाने पर पुन: दीमक की बावी की मिट्टी तथा धान के भूसे को मिला कर एक और लेप कर दिया जाता है। इसी लेपन के दौरान आकृति के सिरे पर धातु (पीतल अथवा कासा) से ढलाई करने के लिये एक छेद छोडा जाता है। अब इस पूरी आकृति को आग में पुन: पकाया जाता है। गर्मी पाते ही सांचे पर लगाया गया मोम उतने ही क्षेत्र में एक रिक्ति अथवा खोखलापन बनाता हुआ वाष्पित हो जाता है। अब पहले से ही छोडे गये छिद्र के माध्यम से पिघली हुई धातु का प्रवेश कराया जाता है। यह धातु उन सभी रिक्त स्थानो में जा कर बैठ जाती है जो कि मोम के पिघल जाने से निर्मित हुई हैं। अर्थात जिस कलात्मकता का निर्माण मोम के माध्यम से कलाकार ने किया वही अब धातु की बन कर तैयार हो जाती है। अब इसे ठोस होने के लिये छोड दिया जाता है। बाद में धीरे धीरे मिट्टी को तोड कर अलग कर लिया जाता है और धातु की कलात्मक प्रतिमा अपना आकार ले लेती है। अद्भुत है यह कला...और अद्भुत अनुभव था अपनी आँखों के आगे उस कास्य युग को निहारना, इतिहास को पक कर आकार लेते देखना। 

इसमे दो राय नहीं कि बस्तर की घडवा कला विश्व की प्राचीनतम कलाओं में से एक है जो आज भी सराही जा रही है तथा इसका अपना वैश्विक बाजार भी है। मुझे यह जान कर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि इस कला के कलाकार देश-विदेश की यात्रायें कर रहे हैं और न केवल अपनी कला का वहाँ प्रदर्शन कर रहे हैं अपितु विदेशों में हुई कार्यशालाओं से सीख कर कई तरह की आधुनिकताओं को भी अपनी आकृतियों में स्थान दे रहे हैं। वर्ष 1961-62 में सरोजिनी नायडु द्वारा घडवा कला के लिये श्री सिमरन बघेल को सम्मानित किया गया था इसके पश्चात कलाकारों का एक कारवा निरंतर बनता चला गया है। वर्ष 1970 में सोनाबाल गाँव के श्री सुखचंद को तथा वर्ष 1977 में कोण्डागाँव के श्री जयदेव बघेल को इस कला की साधना के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था। बदलते दौर में यह कला केवल सजावट नहीं अपितु दैनिक उपयोग की वस्तुओं की भी निर्मिति कर रही है जिससे कि उसके खरीददार बढें और कलाकारों की आजीविका चलती रहे। रायपुर एयरपोर्ट से ले कर दिल्ली के हर कला-शिल्प मेले में बस्तर की शान घडवा कला दिखाई पड ही जाती है। आज न केवल मोम अपितु धातु भी कीमती हो गयी है एसे में यह कहना उचित नहीं कि कलाकारों को उनकी निर्मिति के वास्तविक दाम मिल पा रहे हैं। हर हाल में इस कला को प्रोत्साहन, संरक्षण, विस्तार तथा बाजार की आवश्यकता है। 

Tuesday, September 24, 2013

एनबीटी की बस्तर में हलबी अनुवाद कार्यशाला के बहाने एक विमर्श


“एनबीटी की बस्तर में हलबी अनुवाद कार्यशाला के बहाने एक विमर्श” 
[कार्यशाला दिनांक 24-26 सितम्बर को जगदलपुर में] 
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बस्तर में दो वृहद रूप से पहचानी जाने वाली संस्कृतियाँ हैं – गोंड़ी तथा हलबी-भतरी परिवेशों में। भूतपूर्व बस्तर रियासत ने इन दोनों संस्कृतियों को भाषाई एकता के सूत्र में बाँधा था। एक लम्बे समय तक ‘हलबी’ बस्तर रियासत की राज भाषा रही किंतु इसका कारण किसी संस्कृति विशेष को महत्व दिया जाना अथवा जिसी जनजाति विशेष का वर्चस्व दिखाना नहीं था अपितु यह इस लिये किया गया था चूंकि रियासत में अवस्थित सभी जनजातियों की संपर्क भाषा तब हलबी ही थी। लाला जगदलपुरी की पुस्तक “बस्तर- लोक कला, संस्कृति प्रसंग” के पृष्ठ-17 मे उल्लेख है कि – “बस्तर संभाग की कोंडागाँव, नारायनपुर, बीजापुर, जगदलपुर और कोंटा तहसीलों में तथा दंतेवाडा में दण्डामिमाडिया, अबूझमाडिया, घोटुल मुरिया, परजा-धुरवा और दोरला जनजातियाँ आबाद मिलती हैं और इन गोंड जनजातियों के बीच द्रविड मूल की गोंडी बोलियाँ प्रचलित है। गोंडी बोलियों में परस्पर भाषिक विभिन्नतायें विद्यमान हैं। इसी लिये गोंड जनजाति के लोग अपनी गोंडी बोली के माध्यम से परस्पर संपर्क साध नहीं पाते यदि उनके बीच हलबी बोली न होती। भाषिक विभिन्नता के रहते हुए भी उनके बीच परस्पर आंतरिक सद्भावनाएं स्थापित मिलती है और इसका मूल कारण है – हलबी। अपनी इसी उदात्त प्रवृत्ति के कारण ही हलबी, भूतपूर्व बस्तर रियासत काल में बस्तर राज्य की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही थी।….और इसी कारण आज भी बस्तर संभाग में हल्बी एक संपर्क बोली के रूप में लोकप्रिय बनी हुई है।” 

डॉ. हीरा लाल शुक्ल की पुस्तक “बस्तर का मुक्तिसंग्राम” के पृष्ठ -6 में उल्लेख मिलता है कि – ‘वर्तमान में निम्नांकित मुख्य जातियाँ बस्तर के भूभागों में रहती हैं – 1. सुआर ब्रामन, 2. धाकड, 3. हलबा, 4. पनारा, 5. कलार, 6. राउत, 7. केवँटा, 8. ढींवर, 9. कुड़्क, 10. कुंभार, 11. धोबी, 12. मुण्डा, 13. जोगी, 14. सौंरा, 15. खाती, 16. लोहोरा, 17. मुरिया, 18. पाड़, 19. गदबा, 20. घसेया, 21. माहरा, 22. मिरगान, 23. परजा, 24. धुरवा, 25. भतरा, 26. सुण्डी, 27. माडिया, 28. झेडिया, 29. दोरला तथा 30. गोंड। उपर्युक्त मुख्य जातियों में 1 से 22 तक की जातियों की “हलबी” मातृबोली है और शेष जातियों की हलबी मध्यवर्ती बोली है। कुछ जातियों की अपनी निजी बोलियाँ भी हैं जैसे क्रम 23 और 24 में दी गयी जातियों की बोली है परजी जबकि 25 और 26 की बोली है भतरी। क्रम 27 से 30 तक की बोलियाँ हैं माडी तथा गोंडी।” 

उपरोक्त उद्धरणों से यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि आज भी हलबी बोली बस्तर की एक मान्य और कोंटा से ले कर कांकेर तक बोली-समझी जानेवाली भाषा है। हलबी बस्तर के साहित्य की भी भाषा है और सौभाग्य से इसका अपना व्याकरण और शब्दकोश भी है। यह प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) द्वारा बस्तर की आदिवासी भाषा-बोलियों में मुख्यधारा की पुस्तकों के अनुवाद किये जाने की दूसरी कार्यशाला जिसका आयोजन दिनांक 24-26 सितम्बर को जगदलपुर में किया जा रहा है; इसमे हलबी भाषा में अनेक पुस्तकों का अनुवाद, तत्पश्चात प्रकाशन किया जायेगा। हलबी में हो रहे इस कार्य की महत्ता इस बात से भी है कि एक बडा पाठक वर्ग होने के बाद भी पुस्तकों की उपलब्धता का अभाव होने के कारण भाषा का ह्रास हो रहा था तथा साहित्यकारों की भी हलबी में रचनाकर्म करने की अभिरुचि टूट रही थी। मैं एनबीटी तथा श्री पंकज चतुर्वेदी जी का हृदय से आभार करता हूँ जिनकी संकल्पना से यह आयोजन संभव हो पा रहा है। 

इस आयोजन के साथ मुझे महाराजा प्रवीर याद आ रहे हैं। वर्ष-1950 में 21 से 23 अक्टूबर तक चलने वाले मध्य-प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन जगदलपुर के राजमहल परिसर में हुआ था। तत्कालीन गृह मंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे। अधिवेशन में पं सुन्दर लाल त्रिपाठी, सुनीत कुमार चटर्जी, आचार्य क्षिति मोहन सेन, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, भदंत आनंद कौशल्यान, बाबूराम सक्सेना, दादा धर्माधिकारी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, भवानी प्रसाद मिश्र, भवानी प्रसाद तिवारी, प्रो. अंचल आदि मनीषी उपस्थित थे। प्रवीर ने तब शिक्षा और भाषा-बोली के समन्यवय को ले कर एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि - “हिन्दी में पढ़ाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, इनमें हमें चित्रों की भी आवश्यकता है। प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर लगा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हल्बी और गोंडी में लिखा जाये।” अर्थात यह कि हिन्दी और स्थानीय भाषाओं के बीच एक सेतु बनाने की आवश्यकता है चाहे हम आदिवासी भाईयों को मुख्यधारा से जोडने का स्वप्न देखें अथवा उनकी नयी पीढी के लिये शिक्षा का। 

एनबीटी जैसे प्रकाशन संस्थान यदि इसी तरह अपना दायित्व निर्वहन करेंगे तो निश्चित ही बडे बदलाव बस्तर के सामाजिक परिदृश्य में देखने को मिलेंगे। मेरा यह अनुरोध भी होगा कि इस तरह की कार्यशालायें लगातार आयोजित की जानी चाहिये। अगली कार्यशाला गोंडी में होनी चाहिये जिससे कि दक्षिण बस्तर और अबूझमाड क्षेत्र के लिये भी एसी ही पुस्तके द्विभाषा में प्रकाशित की जा सकें शिक्षक सीधे ही इन पुस्तकों को पढ कर बच्चों तथा ग्रामीणों को सुना सकेंगे तथा उनमें सोच और दृष्टिकोण के बीच बोने में सहायक हो सकेंगे। 

इस आयोजन के लिये पुन: शुभकामनायें।