Friday, October 25, 2013

बस्तर में बांस की कलात्मक दुनियाँ


तेरहवी शताब्दी का पूर्वार्द्ध जब अन्नमदेव ने चक्रकोट के नाग शासकों को अंतिम रूप से परास्त कर अपना शासन स्थापित किया तब कोंटा से कांकेर तक उनके द्वारा शासित क्षेत्र का नाम बस्तर रखा गया। इस नामकरण के पीछे अनेक कहानियाँ हैं जिसमे से प्रमुख मान्यता है कि वारंगल से निष्काषित होने के पश्चात बस्तर में अपने विजय अभियान का आरंभ करने के दौरान अन्नमदेव को अनेक बार बांसतरी में विश्राम करना पड़ा; बांस से शासक के इसी सम्बन्ध ने संभवत: बस्तर शब्द की उत्पत्ति की होगी। आदिवासी जीवन में वही वस्तुएं कला का माध्यम भी बनी हैं जो उनके आम जीवन की संगिनी रही हैं। वह चाहे पाषाण हो, धातु हो, मृदा हो, काष्ठ हो अथवा बांस। जहाँ तक बांस का प्रश्न है, यह आदिवासी जीवन का अभिन्न है तथा मृत्यु पर्यंत तक उसकी किसी न किसी दैनिक गतिविधि का हिस्सा बना रहता है।



लोकजीवन से आगे बढ कर लोक संस्कृति का हिस्सा बनते हुए बांस कभी आदिवासियों की पूजा परम्परा में इस्तेमाल होते हैं तो कभी लोकनृत्य और लोक वाद्य का भाग भी बनते हैं। इसका महत्वपूर्ण उदाहरण डंगईयाँ को कहा जा सकता है। एक मोटे मजबूत साबुत बाँस को डंगई कहते हैं जिसके शिखर पर चाँदी, कासा, या पीतल का बना सम्बन्धित देवी या देवता का एक कलापूर्ण प्रतीक लगा होता है; इस प्रतीक को हलबी-भतरी में गुबा कहते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पर्व के दौरान जगदलपुर के सीरासार चौक में तुपकी खूब चलाई जाती है। वस्तुत: तुपकी बाँस से बनी एक तिकोनी नली होती है जिसकी प्रक्रिया किसी पिचकारी सदृश्य मानी जा सकती है। इसके मूल में मलकांगिनी के फल रख कर किसी भी आगंतुक अथवा मित्र पर उसे सधान कर मारा जाता है। मोहरी, नांगड और तुडबुडी बस्तर अंचल के लोक वाद्यों में प्रमुख माने जाते हैं तथा सभी के निर्माण में बांस किसी न किसी तरह सहयोगी होता है। धनकुल बस्तर की ही एक अद्भुत वाध्य रचना है जिसमें एक आम वनवासी की गृहस्थी में रोज काम आने वाली कई वस्तुओं का प्रयोग होता है जैसे हंडी सूप, धनुष और बाँस की कमची। वाद्य ही क्यों गेडी नृत्य, डंडारी नृत्य आदि में भी प्रमुखता से बाँस ही प्रयोग में लाया जाता है।

बांस बस्तर में विवाद के केन्द्र में भी रहा जब बांग्लादेश से आये विस्थापितों को अरण्य क्षेत्रों में बसाया जाने लगा था। उस दौरान बंगाल से लायी गयी बांस की कुछ किस्मों के बस्तर में रोपण की योजनायें बनी तथा उनका क्रियान्वयन हुआ। अनेक तरह के विरोध तब सामने आये एवं विशेषज्ञों ने सिद्ध किया कि कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में भी बस्तर का नैसर्गिक बांस उच्च कोटि की गुणवत्ता रखता है। अपनी पुस्तक ‘बस्तर – इतिहास एवं संस्कृति’ में लाला लगदलपुरी लिखते हैं कि “आदिवासियों की दृष्टि में बस्तर अंचल में कुल नौ प्रकार के बांस होते हैं। घर बावँस, बरहा बावँस, पानी बावँस, डोंगर बावँस, पोड़सी बावँस, रान बावँस, माल बावँस, सुन्दर कोया और बोंगू। इनमे से केवल डोंगर बावँस, पोडसी बावँस, माल बावँस और रान बावँस ही टट्टे, टोकने, सूप और छतूडी आदि बनाने के काम में लाये जाते हैं और शेष से मोटे काम निबटाये जाते हैं। पानी बाँस पतला होता है जिससे बाँसुरी बनती है और शहनाई का मुख्य भाग तैयार किया जाता है। बोगू बाँस एक मोटा बांस होता है, इतना मोटा कि उससे बने पात्र दक्षिण बस्तर में ताडी उतारने और पानी पीने के काम आते हैं”।

इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि विस्थापित बंगालियों के साथ आयी बांस कला का बस्तर में अवस्थित परम्परागत शिल्प के साथ बखूबी संगम हुआ तथा उसमें आधुनिकता के तत्व सम्मिलित होने लगे। बस्तर के आदि-बांस शिल्पियों को नयी तकनीक और नये प्रयोगों से प्रशिक्षित किया गया तथा वे अब कुछ एसी वस्तुओं का भी निर्माण करने लगे जो उपभोक्तावादी संस्कृति अपने बाजार के लिये चाहती थी। मुख्य रूप से बांस से बने सोफा सेट, डायनिंग टेबल, टेबल लैम्प, गुलदस्ते, मोर, मछली, टोकनी, परदे आदि तैयार किये जाने लगे। छत्तीसगढ हस्त शिल्प विकास निगम, राष्ट्रीय शिल्प बोर्ड आदि सरकारी संस्थायें तथा अनेक गैर सरकारी संस्थायें सामने आयीं जिन्होंने आदिवासियों की परम्परागत बांस-कला तथा उनके द्वारा निर्मित नये दौर के उत्पादों को बाजार देना आरंभ किया। नारायणपुर, अंतागढ, पखांजुर तथा ओरछा आदि क्षेत्रों में बांस से विभिन्न वस्तुए तैयार करने के लिये प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन केन्द्र स्थापित किये गये। मृगनयनी एम्पोरियम के माध्यम से यहाँ निर्मित उत्पादों के लिये अनेक विक्रय केन्द्र उपलब्ध कराये गये।   

मुझे बहुत निकटता से नारायणपुर के बाँस कला केन्द्र को देखने का अवसर मिला है। यह भी बताना चाहूंगा कि यहाँ का केन्द्र उन आदिवासी परिवारों के लिये पुनर्वास की तरह भी कार्य कर रहा है जो नक्सलवाद की विभीषिका के कारण अबूझमाड़ से पलायन कर यहाँ पहुँचे हैं तथा आजीविका के लिये उनके ही साधन उन्हे थमाये गये हैं। यहाँ मेरी मुलाकात बांस कला के अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्पी पंडी राम मंडावी से हुई जो अबूझमाड़ के प्रवेशद्वार गढबंगाल से हैं। उन्होंने अपनी अनेक बाँस की निर्मित कलाकृतियाँ मुझे दिखाई तथा भारत के बाहर उनके हाँथ का किन किन देशों में क्या क्या बना हुआ है इससे भी मुझे परिचित कराया। घुटने के उपर वाली लुंगी और कमीज में वे आधी दुनिया घूम चुके हैं तथा प्रशंसाये बटोरी हैं। पंडी राम मंडावी में प्रसिद्धी और पैसे ने कुछ नहीं बदला यहाँ तक कि उसके नंगे पैर में जूता नहीं आया; उनके सिर का साफा नहीं बदला; हाँथ का झोला नहीं बदला। मुझे प्रसन्नता होती है कि कलाकार नहीं बदलते क्योंकि उनके हाथों की महारत का मर्म उनकी अंतरात्मा में अंतर्निहित होता है।   

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Wednesday, October 23, 2013

शोभन सरकार, बिहारी दास और इतिहास

नये दौर की तिलिस्मी कहानियाँ अब प्रस्तुत हैं। एक बाबा सपना देखता है और इसके साथ ही सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगते हैं। वैज्ञानिक, इतिहासकार और सरकारी मशीनरी एक सपने के सच की खोज में जुट जाती है। बाबा बैठे बिठाये ग्लोबल हो गये हैं। चुनावी मौसम है इसलिये उन पर कदाचित सीधे हमले नहीं किये जा सकेंगे इसलिये वे ठसक में भी हैं और अपनी महत्वाकांक्षा की आड में आने वाले लोगों से निबट भी लेना चाहते हैं। वे अपनी आलोचना का जवाब विशुद्ध राजनैतिक चिठ्ठी से देते हैं जिसपर देश का मीडिया गरमागरम बहस भी करता है। यही नहीं इस पर भी चर्चा होने लगती है कि इस कथित सोने पर हक किसका होगा – राज्य का कि केन्द्र का? सपना देखने वाले बाबा किसी प्रखर समाजसेवी की तरह बयान देते हैं कि इस सोने से इलाके का विकास होना चाहिये। बडे वालों की तो छोडिये डोंडिया खेडा के प्रधान साहब तो बल्लियों उछलते हुए मांग करते हैं कि हमारे इलाके में हवाई पट्टी बननी चाहिये आखिर हमारी जमीन से सोना निकल रहा है। ‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ को चरितार्थ करते हुए अर्थव्यवस्था पर बात करने वाले चैनल इस सोने की कीमत का आंकलन करने लगे हैं और इससे यह गणना तक कर ली गयी कि प्रतिव्यक्ति कर्जे से हर हिन्दुस्तानी को कितनी राहत मिल सकती है, डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या स्थिति हो सकती है। 

यह तमाशा देख कर सवाल उठता है कि क्या सचमुच हम एक परिपक्व लोकतंत्र होने की दिशा में बढ रहे हैं? क्या इस प्रकरण में हम धर्म और राजनीति का विज्ञान की सीमेंट से गठजोड नहीं कर रहे? प्रकरण यह भी बता रहा है कि अपने इतिहास को ले कर हम कितने संजीदा हैं तथा उसे जानने की हमारी उत्कंठा कितनी है? महज बीस वर्ग किलोमीटर के दायरेवाली डौड़ियाखेड़ा रियासत में हजार टन सोना मिलने की आशा चमत्कार ही प्रतीत होती है। हाँ इस बहाने भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक पर चर्चा होने लगी इसे उपलब्धि कहा जाना चाहिये; राजा रामराव बक्श जिनके किले में यह खुदाई चल रही है उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत में सम्मिलित होने के अपराध में 28 दिसंबर 1859 को बक्सर के पास फांसी दे दी गयी थी। बहरहाल आनंद उठाईये इस तिलिस्म कथा का जहाँ बाबा शोभन सरकार के एक चेले ओम बाबा कहते हैं ‘बस इतना बता दीजिये कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए कितना सोना चाहिए; बाबा शोभन सरकार उतना सोना पैदा कर देंगे’। इस प्रकरण को धार्मिक चश्मा चढा कर देख रेहे लोगों को भी बताना चाहूंगा कि एसे ही कारणों से आस्था और विश्वास जैसे शब्द मायना हीन हुए हैं तथा धर्म की परिभाषाओं को हास्यास्पद विवेचनाओं से गुजरना पड़ा है। 

इस विमर्श को आगे बढाने से पूर्व बाबा बिहारीदास पर बात करते हैं जिनका सत्तर के दशक में बस्तर के क्षेत्रों में बोलबाला था। बस्तर रियासतकाल के अंतिम महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की 1966 में हुई हत्या के बाद आदिवासी नेतृत्व और प्रतिनिधित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया। वर्ष -1971 में बाबा बिहारीदास प्रकट हुए। उनके प्रवीर होने के उसके दावे की पुष्टि खुसरू और बाली नाम के दो भतरा कार्यकर्ताओं ने की जो पहले भी प्रवीर के साथ काम कर चुके थे। बाबा के काले रंग के लिये यह तर्क दिया गया कि गोलियों की बौछार सहने के कारण प्रवीर का रंग काला पड़ गया है। उनके अनुयाईयों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। बाबा को कंठी वाले बाबा या गुरु महाराज कह कर संबोधित किया जाता था। बाबा ने अपने अनुयाईयों को सलाह दी कि वे माँस खाना और शराब पीना छोड़ दें तथा तुलसी की माला जिसे कंठी कहा गया धारण करें। यह कहा गया कि महाराजा प्रवीर का आदेश है कि सभी ग्रामवासियों को कंठी बाँधनी होगी। जो कंठी नहीं बाँधेगा उसकी जायदाद छीन ली जायेगी, वह मर जायेगा, उसको राक्षस खायेंगे। बिहारीदास के इस धर्मप्रचार और तथाकथित सुधारवादी आन्दोलन को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली। हरे राम हरे कृष्ण और रघुपति राघव राजा राम आदि भी लोक गीतों में शामिल होने लगे। इस आन्दोलन को वाद, पंथ और अंजाम से तौले बिना अगर देखा जाये तो इसकी स्वीकार्यता का पैमाना बहुत विशाल था, लगभग सम्पूर्ण बस्तर। बाबा बिहारी ने प्रवीर के नाम को आन्दोलन बनाया। उसने प्रवीर के बाद की उस शून्यता का इस्तेमाल किया जिसमे आदिवासी स्वयं को नेतृत्वविहीन तथा असहाय समझ रहे थे। ब्रम्हदेव शर्मा जो उन दिनों कलेक्टर थे इस धार्मिक आन्दोलन को तोडने के लिये मुखर दिखे। बाबा बिहारीदास को समानान्तर सरकार न बनने देने के लिये जिला बदर का आदेश दिया गया। ठीक दशहरे से पहले ब्रम्हदेव शर्मा ने बाबा बिहारीदास को बस्तर से बाहर कर दिया था। बाबा ने अपनी लोकप्रियता भुनाई। कहते हैं कि राजनीतिक दखल पर वे वापस लौटे और इसके बाद ब्रम्हदेव शर्मा का स्थानांतरण कर दिया गया। वर्ष-1975 में उसे मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। वर्ष-1981 में एक आदिवासी लड़की से बलात्कार के जुर्म में वह गिरफ्तार हुआ। इसके बाद बाबा बिहारीदास का पतन हो गया।

शोभन सरकार और बाबा बिहारी दास की कहानी में एक प्रकार की साम्यता है। दोनो ने ही इतिहास की उस टूटन को अपनी प्रसिद्धि का हथियार बनाया जहाँ सत्य दफन किये जाते हैं और मिथक पैदा होते हैं। ध्यान से देखा जाये तो राजनीति शोभन सरकार से भी सोना ही खीच रही है, अब संचार माध्यम मंहगाई पर चुप हैं, रुपये के अवमूल्यन पर खामोश हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार पर कोई वाद-विवाद नहीं हो रहे। बाबा शोभन सरकार ने वह ढाल दी है जो राजनीति के हिस्से सोना ही उगलेगी भले ही आपको दिखे अथवा नहीं। इसे समझने के लिये आप बाबा बिहारी दास के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकते हैं। वर्ष 1972 में विधानसभा चुनाव हुए; बाबा ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। मेरा इशारा किसी राजनीतिक दल विशेष की ओर नहीं अपितु मंतव्य समग्र राजनीति से है। हाँ यह दु:ख जरूर व्यक्त कर सकता हूँ कि काश बिहारीदास भी सपना देखा करते। काश बाबा ने सपना देखा होता कि दक्षिण बस्तर के बारसूर में सोना गडा है या कि केशकाल घाटी के गोबरहीन में नलों की सम्पदा छुपी हुई है तो शायद इन क्षेत्रों की किस्मत बदल जाती। यहाँ से सोना निकलता अथवा नहीं लेकिन उस स्वर्णिम अतीत का सच जरूर बाहर निकल आता जिसकी निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इतिहास खोजने वाले अगर सोना खोदने मे व्यस्त रहेंगे तो बस्तर जैसे क्षेत्र के अतीत पर अंधेरा गहरा ही होता रहेगा। 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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Monday, October 14, 2013

फतेहपुर सीकरी के लपके और चुल्लू भर पानी


“लपका” शब्द रोचक लगा था मुझे। फतेहपुर सीकरी पहुँचने के बाद जब कई हमारी ओर लपके तब समझा कि इस शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई और इसके निहितार्थ क्या हैं। वैसे लपके सभी एतिहासिक स्थलों पर पाये जाते है; मूल रूप से ये गैर-प्रशिक्षित गाईड होते हैं जिनका कार्य होता है बस स्टेंड, टैक्सी स्टैंड, रेल्वे स्टेशन आदि आदि से अपने शिकार को फांसना। पर्यटक के लिये शिकार शब्द का प्रयोग करना एसा लगता जरूर है कि हलाली को कत्ल लिखा गया है, लेकिन ज़नाब किसी लपके की चपेट मे आ कर तो देखिये अगर अपने इतिहास ज्ञान और भूगोल की समझ पर आपको संदेह न हो जाये तो कहियेगा। गजब का आत्मविश्वास होता है इनमे और ये आपकी अनेक समस्याओं का एकमेव इलाज बन कर प्रकट होते हैं। अब उनके स्वयं को प्रस्तुत करने के तरीके को भी सराहिये ज़रा – ‘साहब आपको लाईन में नहीं लगना पड़ेगा’, ‘टिकट खरीदने के पैसे हमारी सर्विस में इंक्लूड हैं’, ‘आपको सबसे छोटे रास्ते से ले जाउंगा, कम सीढियाँ चढनी पड़ेंगी’, एकदम मॉन्यूमेंट के सामने ही पार्किंग करवा दूंगा’...यह सूची बहुत लम्बी भी हो सकती है यदि आपने त्वरित निर्णय नहीं ले किया। आपके चेहरे के भाव से वो जान जाते हैं कि आप फसने वाला मुर्गा हैं भी या नहीं। अगर आपने सलीके से झिडका तो इधर आपका पलक झपका और नदारद हुआ लपका, नहीं तो वह धीरे धीरे भूख और गरीबी की परिभाषाओं का डिमोंस्ट्रेशन आपके सामने आरंभ कर देगा। बोहनी का टाईम है, कल से कुछ खाया नहीं है, घर में माताजी भगवान के पास जाने ही वाली है और पिताजी टुन्न पडे हैं.....। आप देसी हैं तो संभव है इनके मनोविज्ञान को भांप सकते हैं; इनकी नुक्कड़ नाट्य प्रतिभा को सराह सकते हैं लेकिन सोचिये ज़रा उन विदेशियों के हालात जिन्हें देखते ही एक साथ उनकी ओर लपकते हैं लपके। यह बेचारा जर्मन हो या कि अमेरिकन, नाईजीरियन हो या कि ईरानी तय है जनाब की शामत आनी। इन्हें तो सलीम चिश्ती की दरगाह को कोई अलाउद्दीन खिलजी की समाधी भी बता दे तो येस येस में ही सिर हिलना है। 

मित्र शक्तिप्रकाश जी के साथ उनकी बाईक में फतेहपुर सीकरी पहुँचा। पार्किंग स्थल से ही हमपर एक सत्रह अठारह वर्ष के लपके ने डोरे डालने आरंभ कर दिये थे। सौ रुपये में वह फ्रेंड-फिलोसोफर और गाईड बनने की पेशकश किये जा रहा था। स्थानीय होने के कारण शक्ति जी के चेहरे पर संत वाले भाव थे और अनसुना करते हुए आगे बढते जा रहे थे किंतु मेरे भीतर के कवि मन ने ठगे जाने की सभी आशंकाओं के बाद भी इस लपके के प्रस्ताव को लपक लिया। पार्किंग से स्मारक स्थल तक जाने के लिये बस की व्यवस्था की गयी है। एक दिन पहले हुई बरसात के बाद भी मौसम में सुहानापन नहीं था और प्यास बेहाल कर रही थी। हम बुलंद दरवाजे से दूसरी और थे और इस स्थल से बमुश्किल पंद्रह सीढियाँ चढ कर ही स्मारक में प्रवेश किया जा सकता था। मैने लपका महोदय को अपना कैमरा दिया और उसने पहली तस्वीर जो निकाली उसके लिये नीचे बैठ कर एसी एसी मुद्रायें बनायी कि लगा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर को इनसे ही प्रशिक्षण लेना चाहिये; और जो तस्वीर खींची गयी उसे देख कर बस मैने सिर ही पीट लिया। खुद ही खुजा कर दर्द मोल लिया था तो भुगतना ही था। इस स्थल के आगे हमारे पास ‘खुद देखिये और आप ही बूझिये’ वाला विकल्प रह गया था। सही मायनो में न इस नवयुवक को स्मारक स्थल के विषय में कुछ पता था और न ही बताने में कोई अभिरुचि ही। उसका ध्यान केवल उन सौ रुपयों की तरफ था जो आधे घंटे की माथापच्ची के पश्चात उसकी जेब में जाने वाले थे। एक प्रशिक्षित गाईड स्मारक के संबंध में जानकारी रखता है, स्थल के इतिहास को पढना और समझाना उसका दायित्व होता है, उसके पास उन प्रश्नों के उत्तर होते हैं जो साथ चलने वाले पर्यटकों मे मन में उठते हैं चाहे वे सवाल कितने ही बचकाना हों अथवा कितने ही शास्त्रीय। इधर लपका का दिया पूरा विवरण उसकी कल्पना शीलता पर आधारित होता है। वह किसी गोल आकृति की कलाकृति को बादशाह की रसोई का हिस्सा बता सकता है तो दीवान-ए-आम को आम का बगीचा भी सिद्ध कर सकता है। बहरहाल बुलंद दरवाजे पर लपके ने मेरी तस्वीर खींचने के लिये कैमरे के कुछ तकनीकी बटनों पर अपना ज्ञान और हाथ आजमाया। इसके बाद कैमरे ने जवाब दे दिया। किसी भी दृश्य पर फोकस करना संभव नहीं हो रहा था। अंतत: मैंने छांव में बैठ कर कैमरे की बैटरी आदि निकाल कर फिर से उसे फिर से लगाया और इस तरह जुगाड तकनीक ने साथ दिया; तभी आगे की फोटोग्राफी संभव हो सकी। मैं आसपास से पर्यटकों को ले कर गुजरते लपकों की बातों पर ध्यान दे रहा था। सभी के पास एक जैसी जानकारी और रटे हुए वाक्यांश। अकबर को कोई संतान नहीं हो रही थी; शेख सलीम चिश्ती की दुआओं से एक हिन्दू रानी जोधा बाई के द्वारा उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। लपकाओं की कहानियों में आपको रस आ सकता है क्योंकि तथ्य के स्थान पर वे उन्ही कथ्यों तक खुद को रखना पसंद करते हैं जिनमे आम तौर पर लोगों की अभिरुचि होती है। आपको स्मारकों के भीतर की एसी एसी सास-बहू की कहानियाँ जानने को मिल जायेंगी जो कि एकता कपूर अपने सीरियलों में भी नहीं ला सकी। 

इस स्मारक के बारे में जिन बुनियादी जानकारियों के साथ मैं वहाँ गया था कमसेकम उतना भी मैं लपके से सुन लेता तो उनकी उपादेयता को दस प्रतिशत भी सार्थक पाता। आगरा से लगभग अडतीस किलोमीटर दूर अवस्थित यह स्मारक स्थल वस्तुत: दो हिस्सों में बटा हुआ है। पहले हिस्से में बुलंद दरवाज़ा और उससे लग कर परिधि है, जिसके भीतर विस्तृत अहाता और उसके बीचोबीच शेख सलीम चिश्ती की सफेद संगमरमर से निर्मित दरगाह अवस्थित है। मुझे जानकारी थी कि फतेहपुर सीकरी की दरगाह अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के पौत्र सलीम चिश्ती के सम्मान में निर्मित की गयी है जिनकी दुआओं के असर से बादशाह अकबर (1542-1605 ई.) को अपना वारिस प्राप्त हुआ था। यह दरगाह और समाधि स्थल उन गुने चुने संगमरमर के भवनो तथा निर्मितियों मे आता है जिसे आप बार बार निहारना चाहेंगे और भारत में इनके होने पर गर्व करेंगे। समाधि स्थल पर निर्मित मुख्यद्वार पर चार संगमरमर से तराशे हुए खम्बे निर्मित हैं जिसपर उकेरा गया सर्पाकार गुजराती शैली में निर्मित शिल्प विशेष दर्शनीय है। समाधि स्थल के चारो ओर संगमरमर का बारीक काम विशेषरूप से इसकी जालियाँ मनमोह लेती हैं। संगमरमर पर इतना महीन काम ताजमहल में भी देखने को नहीं मिलता अपितु यदि यहाँ किये गये कार्य की किसी दूसरे निर्माण से तुलना हो सकती है तो वे माउंट आबू में अवस्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिर ही हैं। यहाँ दरगाह पर चादर चढाने का रिवाज़ है साथ ही मन्नत का धागा भी बाँधा जाता है। बुलंद दरवाजे से बाहर निकलते हुए मेरी निगाह उपर उसके गुम्बद का निरीक्षण करने लगी उफ..पूरे गुम्बद पर मधुमक्खियों के अनेक छत्ते लगे हुए हैं। यहाँ दीवारों पर के भित्तिचित्रों और नक्काशियों का भी संरक्षण बहुत दयनीय स्थिति में हो रहा है। बुलंद दरवाजे का निर्माण अकबर द्वारा गुजरात विजय के पश्चात करवाया गया और इसके साथ ही सीकरी नाम के साथ फतेहपुर भी जोडा गया था। परिसर के दूसरे हिस्से में अनेक प्रशासकीय तथा रिहायशी भवन बने हुए हैं जिनमे दीवान-ए-खास (विशेष प्रशासकीय मंत्रणा का कक्ष), दीवान-ए-आम (जनता के सम्मुख बादशाह के उपस्थित होने का स्थान), मरियम का निवास, जोधा बाई का निवास, बीरबल का आवास, पंचमहल आदि शामिल हैं। सम्पूर्ण परिसर में स्थित अनेक भवनों में से जामी मस्जिद को फतेहपुर सीकरी के प्रारम्भिक निर्माणों में गिना जाता है जिसके पश्चात महल परिसर की निर्मिति 1569 – 1574 ई. के मध्य की गयी। फतेहपुर सीकरी को बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने 1571-1585 ई. तक अपने सल्तनत की राजधानी नियत किया था।

मैं सलीम चिश्ती की समाधि पर चादर चढाना चाहता था। साथ आये ‘लपका’ ने हमे दरगाह के पिछले हिस्से की ओर आने का इशारा किया जहाँ सैंकडो समाधियाँ बनी हुई हैं। ये सभी समाधियाँ सलीम चिश्ती के खानदान से सम्बन्धित हैं। यहाँ पुरुषों की समाधियाँ बाहर खुले स्थलों पर तथा महिलाओं की भीतरी परिधियों में बनी हुई है। नक्काशीदार जालियों से छन छन कर आती रोशनी जब इन समाधियों पर पडती है तो एक रूहानी दृश्य उपस्थित करती है। यद्यपि यहाँ के अधिकांश स्थलों पर चादर-फूल और संगमरमर के सामान बेचने वालों का कब्जा है। मैं समझ नहीं पाता कि स्मारक स्थल पर किसी भी विक्रय के लिये समुचित स्थल क्यों नियत नहीं किये जाते? कहीं भी सामान रख कर बेचने लगना अथवा फेरी लगाना वस्तुत: सर्वत्र भीड भाड को ही आमंत्रित करता है तथा इससे अव्यवस्था अधिक होती है। विदेशी पर्यटकों का एसे विक्रेता जो हश्र करते हैं वह भी एक दर्शनीय मनोरंजन बन जाता है; आखिर यह सब रुके इसका दायित्व किसका है? यहीं मेरी निगाह एक ‘लपके’ पर पड़ी जिसकी उम्र बमुश्किल नौ-दस वर्ष रही होगी। जिस आत्मविश्वास के साथ वह अपने साथ खडी भीड को सम्बोधित कर रहा था यह नज़ारा देखने योग्य था। एक सुरंगनुमा संरचना प्रतीत हो रही थी जिसका द्वार साधारण किंतु काष्ठनिर्मित था और उसपर ताला लगा हुआ था। इस स्थल पर खड़ा हो कर वह बालक जिसे उसके साथ खडे पर्यटक छोटू कह कर सम्बोधित कर रहे थे बहुत ही नाटकीय शैली मे अभिनय पूर्वक सलीम और अनारकली की कहानी प्रस्तुत कर रहा था। वह पर्यटकों को बता रहा था कि कैसे अकबर ने अनारकली को दीवारों मे चुनवाने का आदेश देने के बाद भी इसी गुफा से उसे फरार करवा दिया। मुझे इस लड़के की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं है और मैं उसकी अभिनय शैली से प्रभावित भी हूँ लेकिन क्या यह स्थिति भी बाल श्रम की नहीं है? बच्चे की असाधारण मेधा उससे इतिहास को तोड मरोड कर रोचकता के साथ प्रस्तुत तो करवा रही है किंतु क्या यह भी सही नहीं कि इन्ही बातों को पर्यटक अपने साथ गाँठ बांध कर ले जायेंगे? विदेशी इस बच्चे की तस्वीर लगातार खींच रहे थे, क्या आपको लगता है कि वे अपने देश जा कर लोगों को यह बतायेंगे कि बच्चे में कितनी प्रतिभा है? भोजन की गारंटी और शिक्षा की गारंती वाले देश मे छोटे छोटे बच्चे अगर लपका बने दीख पडते हैं तो हमारे नीति-निर्धारकों को चुल्लू भर पानी की ही आवश्यकता है। 
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Friday, October 11, 2013

महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?


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महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?
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धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाईयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है इसका उदाहरण है इन दिनो महिषासुर पर चलाई जा रही कुछ चर्चायें। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में कुछ वर्षों से ‘महिषासुर डे’ मनाये जाने के नाम पर उन अदृश्य हथियारों से तनाव फैलाने का सिलसिला जारी है जिनका संधान निरुद्देश्य नहीं किया गया। इन दिनो विचारधारा की पटाखा-लड़ियाँ किसी भी गली के कुत्ते की पूंछ पर बाँध कर सुलगा दी जाती हैं फिर तमाशा चालू आहे। क्या आदिवासी समाज को अपने गर्व के लिये अब कुछ गढी जाने वाली कहानियों पर निर्भर रहना पड़ेगा? संघर्ष की वे गाथायें जो एकलव्य से लेकर गुण्डाधुर तक फैली हुई हैं क्या वास्तविक आदिवासी विमर्श नहीं हैं? प्रश्न यह नहीं कि महिषासुर कौन था अथवा दुर्गा बहुसंख्यक समाज की आराध्य देवी हैं; प्रश्न यह भी नहीं कि महिषासुरमर्दिनी की आलोचना होनी चाहिये अथवा नहीं चूंकि हमने राम पर हमेशा ही सीता का परित्याग करने के लिये प्रश्न उठाये हैं, हमने कृष्ण को सदैव से छलिया ही माना है, हमारे अतीत के विमर्शों ने सृष्टि निर्माता कहे जाने वाले ब्रम्हा, पालनकर्ता माने जाने वाले विष्णु यहाँ तक कि संहार करने वाले शिव के कृत्यों पर भी अनेक प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों पर सार्थक बहसें हमेशा से होती रही हैं। इसी बात को आगे बढाते हुए महिषासुर के नाम पर हो रही जहरीली बहसों के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि किसी भी मिथक को इतिहास के साथ जोडने के आधारों पर चतुराई पूर्ण मौन क्यों फैला हुआ है? वस्तुत: हम एसे युग में रह रहे हैं जहाँ अध्ययन कम है लेकिन बात बात पर नाक मुँह फुलाने वालों की जमात बढती जा रही है। अब किसी संदर्भ पर तथा उसकी गहराई को समझने के लिये संवाद नहीं होते अपितु नारों के पीछे ही दौड लगाना सभी प्रकार के आन्दोलनों की नियति बन गयी है। संघर्ष का अर्थ कलात्मक पोस्टर किसी ‘विशेष विचारधारा परक कैम्पस’ में लगाना अथवा मोमबत्ती जलाना भर रह गया है।

संदर्भों पर आने से पहले महिषासुर को ले कर फैलाई जाने वाली आज की कहानियों की चीर फाड़ करते हैं। जो कहानी सबसे ज्यादा फैलाई जा रही है उसके अनुसार महिषासुर पश्चिमी भारत के बंग प्रदेश का प्रतापी राजा था। दुर्गा को राजा महिषासुर की हत्या करने में नौ दिन लगे। इन दिनों में देवता महिषासुर के किले के चारों तरफ जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। जिसके कारण दुर्गा को मानने वाले लोगों में आठ दिनों के व्रत-उपवास का प्रचलन है। आठ दिनों तक दुर्गा महिषासुर के किला में रही और और नौवे दिन उसने द्वार खोल दिये और महिषासुर की हत्या हुई। कहानी कहती है कि सवर्णो (?) की बर्बर कार्रवाईयों में बड़ी संख्या मेँ असुर (?) बस्तियाँ जला दी गयी; असुर नागरिकों को निशाना बनाया गया, औरतों का बलात्कार किया गया और बड़े पैमाने पर बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इन बर्बर कार्रवाहियों से घृणा और आत्मग्लानि से व्यथित, उस स्त्री जिसे दुर्गा कहा गया था..नदी मेँ कूदकर आत्महत्या कर ली.. जिसे विसर्जन का रूप देकर सवर्णो द्वारा महिमामंडित कर दिया गया। मैं यह प्रशन खडा नहीं करना चाहता कि आर्य और सवर्ण क्या पर्यायवाची हैं। हास्यास्पद विवरणों को इतिहास बताने की साजिशों पर प्रतिवाद केवल इस लिये नहीं होते क्योंकि एसे लेखकों से कोई तथ्य की मांग नहीं करता, इनसे किसी को संदर्भ पूछने की फुर्सत नहीं। विर्जन तो गणेश प्रतिमाओं के भी होते हैं तो क्या वह भी आत्महत्या का प्रतीक प्रदर्शन है? 

अब कोई पूछे कि किस साक्ष्य को इस कथन का आधार बनाया गया है और कहानी को बंगाल से जोड कर प्रस्तुत किया गया है? क्या केवल इसलिये कि दुर्गा पूजा बंगाल की सबसे समृद्ध परम्पराओं में से एक है। वे कौन सी श्रुतियाँ अथवा तथ्य हैं जो बताते हैं कि महिषासुर वध के बाद बलात्कार हुए और बच्चों की हत्यायें हुईं। किसी भी घटना को कारुणिक और उत्तेजक बनाने के विचारधारापरक प्रचलित ‘शब्द हथियार’ हैं - बलात्कार और हत्या। आईये बंगाल से इतर कुछ स्थलों पर चलते हैं जहाँ यह माना जाता है कि वही वास्तविक स्थल है जिसका कि सम्बन्ध महिषासुर से है। सारे दावे उत्तर-भारत से ही हों क्या जरूरी है? दक्षिण भारत का भव्य एतिहासिक शहर है मैसूर। मैसूर शब्द पर ध्यान दीजिये क्योंकि प्रचलित मान्यता है कि एक समय में मैसूर ही महिषासुर की राजधानी ‘महिसुर’ हुआ करती थी; तर्कपूर्ण लगता है कि महिसुर बदल कर मैसूर हो गया हो। मैसूर के निकट की चामुण्डा पर्वत की अवस्थिति है जहाँ यह माना जाता है कि महिषासुर का वध भी यहीं हुआ था। अब समस्या आती है कि क्या सही है; जो दक्षिण की मान्यता है अथवा दिल्ली और झारखण्ड में ताजा-ताजा जो कहानी बुनी हुई है। अगर इन दोनो ही कहानियों से आगे बढें तो हमें पूर्वी भारत अर्थात हिमांचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में नैना देवी शक्तिपीठ तक पहुँचना होगा। पुराणों के अनुसार देवी सती के नैन गिरने के कारण यह शक्तिपीठ स्थापित हुआ किंतु महिषासुर की कथा भी इसी स्थल से जुडी हुई मानी जाती है तथा उसका वध-स्थल भी यहीं पर माना जाता है। कहानियाँ और भी हैं; झारखण्ड के चतरा जिले का भी यह दावा है कि महिषासुर का वध वहीं हुआ। इसके तर्क में तमासीन जलप्रपात के निकट क्षेत्रों में प्रचलित कथा है कि नवरात्र के समय आज भी यहाँ तलवारों की खनक सुनाई देती है तथा यत्र-तत्र सिंदूर बिखरा हुआ देखा जा सकता है।

जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय के कथित विद्वानों द्वारा फैलाई जा रही इन सभी कहानियों से अधिक प्रामाणिक मुझे वह संदर्भ लगता है जो बस्तर की मान्यताओं में अवस्थित है। ज्ञानी विश्वविद्यालय के गुणीजन यह जान लें कि बस्तर के जिस क्षेत्र का संदर्भ मैं प्रस्तुत करने जा रहा हूँ वह हमेशा से ही जंगली भैंसो के लिये विख्यात रहा है; पुनश्च भैंस अर्थात महिष। अपने विशाल स्वरूप और बलिष्ठ काठी के कारण बस्तर के महिष को कभी दैत्याकार लिखा गया तो कभी उसका विवरण भयावहतम शब्दों में प्राचीन पुस्तकों में प्रस्तुत किया गया है। बस्तर के इन महिषों/जंगली भैंसों पर गल्सफर्ड की डायरी (1860) से लिया गया यह एक विवरण देखें – “इसकी एक सींग साढे अठहत्तर इंच लम्बी होती है। यदि हम मस्तक की खोपड़ी एक फुट चौड़ी माने तो यह सिर से पैर तक चौदह फुट ऊँचा होता है”। फैलाई जा रही नई कहानी के अनुसार महिषासुर पशुपालक समाज का राजा था। यदि इस कहानी का बस्तर से उद्गम माना जाये तो यहाँ के महिष पालतू नहीं थे तथा उनका शिकार किया जाता रहा है। क्या यह संभावना नहीं बनती कि एसे ही किसी आक्रामक महिष के किसी स्त्री द्वारा किये गये शिकार को रोचक काव्य-कथा का रूप दे दिया गया हो? वस्तुत: महिषासुर के वध से जुडी कहानी बस्तर के बड़े डोंगर क्षेत्र से मानी जाती है। इस सम्बन्ध में क्षेत्र के दो वरिष्ठ विद्वानों श्री घनश्याम नाग और श्री जयराम पात्र की पुस्तक ‘बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर – देवलोक बड़े डोंगर”’ से उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। बस्तर में प्रचलित जन  मान्यताओं के अनुसार बडे डोंगर के मध्य में स्थित महिषाद्वन्द्व पहाड़ (बोलचाल की भाषा में भैंसादोंद डोंगरी) में दुर्गा और महिषासुर के मध्य अंतिम युद्ध हुआ। इस किंवदंती को अपने क्षेत्र की विरासत मानते हुए स्थानीय आदिवासी भैंसादोंद डोंगरी पर स्थित सिंह के पंजों के अनेक चिन्ह, आक्रामक महिष के अनेक पग चिन्ह, दुर्गा के पद चिन्ह, युद्ध के कारण पत्थरों पर पड़े निशान एवं महिषासुर का वध स्थल सहर्ष दिखाते हैं। इस सभी कहानियों में मिथक और सत्य जिस तरह घुले मिले हैं क्या उन्हें अलग करने का प्रयास किसी विद्वान ने किया है? 

हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। नाग जनजातियों (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) को भी  इसी प्रकार का संघर्ष और युद्ध करते हुए भारत भूमि में प्रविष्ठ होना पड़ा। तुर्क-मुगल भी इसी तरह मध्यकालीन भारत की राजनीति में पैठ बना सके और आज भारतीय अल्पसंख्यक समाज का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। यही कारण है कि हर समाज एक दूसरे से जुडा हुआ है, एक दूसरे के साथ मिल कर अथवा उससे संघर्ष करता हुआ आगे बढा है। विजयी होने पर एक समाज ने दूसरे पर अत्याचार किये तो पराजित का पलायन होता रहा। साथ ही साथ उसके जीवन संघर्ष की कहानियाँ कभी किंवदंति बन कर तो कभी शिलालेख बन कर सामने आती रही हैं। हर कहानी हम सभी की है तथा उसमे अनावश्यक रूप से काल्पनिक जातीय पहचान को प्रविष्ठ करा कर विद्यमान सामाजिक खाई को चौडा करना मैं बौद्धिजीविक षडयंत्र मानता हूँ, इसे विचारधारा के खास लक्ष्य को हासिल करने के लिये जान बूझ कर फैलाया जा रहा है।  

मेरा एसा मानने के कई कारण हैं। इतिहास में दर्ज प्राचीन संदर्भ बताते हैं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य ही आरंभिक आर्य राजा इक्ष्वाकु के पुत्र दण्ड के गुरु भी थे, राम ने केवट जनजाति, शबर जनजाति, वानर, भालू तथा गीध टोटेम रखने वाली आदिवासी जनजातियों के सरदारों से मित्रता स्थापित की तथा रावण के विरुद्ध युद्ध लिया। इन आर्येतर जनजातियों में भी आपसी संघर्ष विद्यमान थे अन्यथा सुग्रीव को बाली का वध करने के लिये राम की आवश्यकता ही नहीं थी? इधर राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण ने इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। उपरोक्त उद्धरण यह बताते हैं कि इतिहास पर बचकानी टिप्पणियों से बचना चाहिये। भारत के इतिहासकार इस आओचना के योग्य हैं कि उन्होंने वाद-विचार में उलझे रह कर तथ्यों और सत्यों का मानकीकरण नहीं किया इसी कारण अपनी अपनी व्याक्याओं से किसी भी संदर्भ को आरी बना कर समाज को काटने-बांटने का खेल खेला जाता है। असुर केवल झारखंड की ही विरासत नहीं अपितु सम्पूर्ण दक्षिण भारत की सत्ता का एक समय केन्द्र रहे हैं। महिषासुर पर जेएनयू की अनाप-शनाप बहसों को बस्तर और मैसूर से पहले गुजरना चाहिये। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालय उस मध्यकालीन मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ यह माना जाता था कि राजधानी से कही गयी बात ही परम सत्य है। इन विश्वविध्यालय के इतिहास विभाग पर कोई दबाव बनाये कि अतीत पर पूर्वाग्रह रहित दृष्टि यदि आपके शोध दे सकते हैं तो ठीक; अन्यथा आपकी उपादेयतायें क्या हैं? 

– राजीव रंजन प्रसाद
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Tuesday, October 01, 2013

बस्तर की पहचान है उसकी काष्ठ कला


महापाषाण कालीन संस्कृति की भव्यतम झांकी दक्षिण बस्तर में देखने को मिलती है। मृतकों अथवा उनके अवशेषों को बड़े बड़े पत्थर खड़ा कर दफनाये जाने की प्रथा के उदाहरण पुरा-अतीत से ले कर वर्तमान तक के उदाहरणों के साथ अनेक स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इन्ही मृतक स्तम्भों के बीच अनेक स्थानो पर काष्ठ के विशाल स्तम्भ भी नजर आये जिनकी न केवल कलात्मकता ही दर्शनीय थी अपितु कुछ तो हजारो साल पुराने स्मृति अवशेष हैं। बस्तर जहाँ जन्म से ले कर मृत्यु तक हर परम्परा में किसी न किसी तरह उनकी कलाधर्मिता झांकती रही है वहाँ स्वाभाविक था कि मृतक स्तंभों में भी कल्पनाशीलता का प्रादुर्भाव होता। इसका कारण है कि काष्ठ बहुत आसानी से शिल्पकार की कल्पना को आकार देने में सक्षम होता है। प्राचीन समय से ही कलात्मकताओं ने मनुष्य़ को आकर्षित किया है। साल वनो के द्वीप मे एसे काष्ठ की सहज उपलब्धता थी जो न केवल शिल्प निर्माण की दृष्टि से श्रेष्ठ है अपितु वह न तो जल्दी खराब होता है न ही अपनी आभा खोता है। आदिवासी समाज को कई स्थानो पर काष्ठ उस पाषाण का विकल्प प्रतीत हुआ होगा जिस पर आसानी से कलात्मकता का प्रदर्शन संभव नहीं था। समय के साथ बदलते मृतक स्तंभों में भी कई स्थानो पर मुझे पाषाण और काष्ठ की युति देखने को मिली जहाँ किसी अवसादी चट्टान (विशेष तौर पर चूना पत्थर की फर्सी) को मुख्य आधार बनाया गया है किंतु उसके शीर्ष पर काष्ठ के पशु-पक्षी अंकित किये गये हैं अथवा एक सम्पूर्ण कलाकृति निर्मित कर रखी गयी है। 

मनुष्य का विकास भी पत्थरों और लकडी के साथ साथ हुआ है। पत्थर से जलाने, काटने और धारदार हथियार बनाने की विधि में मिली दक्षता के बाद उसके यही आविष्कार लकडी के साथ मिल कर अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बने। उदाहरण के लिये धारधार पत्थर और लकडी की युति ने ही आरंभिक कुल्हाडी का स्वरूप प्राप्त किया था। आविष्कारों के साथ ही आदि-मनुष्य लकडी से हल, कुदाल, बैलगाडी के पहिये आदि वस्तुएं निर्मित करने लगा। मनुष्य के आरंभिक औजारों से प्रारंभ हो कर लकडी ने उसकी अभिव्यक्ति में स्थान पाने तक सभ्यताओं का एक लम्बा सफर तय किया है और आज एक परिपक्व कला बन कर बस्तर के आदिवासी समाज की पहचान में शामिल है। दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लकडी की अनेक वस्तुएं निर्मित की गयीं। इन्हीं निर्मितियों को सजाने के दृष्टिकोण से इसे बनाने वाले कलाकार अपनी कल्पनाशीलता को जोड देते थे जिससे कि उपयोग की वस्तुओ मे कलात्मकता ने अपने पैर पसारे। शनै: शनै: तराशे हुए स्वरूप में नागर, खोटला, टेंडा, मचान, पीढा, माची, घाना, नाव, पतवार, मयाल, कलात्मक खम्बे, फाटक, चौखट, खिडकिया आदि आदि निर्मित होने लगे। इन निर्माणों में बहुत खूबसूरती से काष्ठ शिल्पकारों ने भांति भांति के बेलबूटे तथा फूलपत्तियाँ तराशीं।

लकड़ी बस्तर के आदिवासी समाज में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये उसी तरह सहायक बनी जैसे कि आज हम गुलाब के फूल का सहारा लेते हैं। कई तरह की सुन्दर कंघियाँ बनायी जाने लगीं चूंकि इनके माध्यम से ही प्रेमी चेलक अपनी प्रेमिका मोटियारियों से प्रेम का इजहार करते थे। इन काष्ठ निर्मित कंघियों को पडिया कहा जाता है। किसी घोटुल में मोटियारियाँ श्रंगार करती हुई अपने बालों में मांग निकाल कर सजती रही हैं और अपने खोंपों में भांति भांति की पड़िया खोसती रही हैं। अपने खोंपे अथवा जूडे बनाने के लिये भी मोटियारियाँ लकडी के नक्काशीदार चौकोर टुकडों का प्रयोग करती रही हैं। इन काष्ठ टुकडों को बीच में रख कर उनके चारो ओर बालों को लपेट कर एक सुन्दर जूडा तैयार होता है। बालों को स्थिर रखने के लिये मोटियारियाँ जिन पिनों का प्रयोग करती हैं वे आम तौर पर तिकोनी होती हैं और उनपर बहुत बारीक काष्ठ शिल्प का कार्य किया जाता है। स्वाभाविक भी था कि हर चेलक अपनी मोटियारी के लिये सुन्दर से सुन्दर पडिया बनवाने के यत्न में रहता था। काष्ठ पड़ियों की परिधि को बारीक नक्काशी से सजाये जाने की प्रथा रही है। कुछ पडिया मैने एसी भी देखी है जिनके शीर्ष पर अलग से आकृतियाँ जैसे चिडिया आदि उकेरी हुई प्राप्त होती है। मोटियारियाँ एकाधिक पडिया अपने बालों में खोसा करती थीं और इसका सांकेतिक अर्थ था कि उसके पास उसे बहुत प्यार करने वाला प्रेमी है। आज घोटुल लगभग समाप्त हो गये हैं तथा जहाँ हैं वहाँ भी ये औपचारिकता भर रह गये हैं। एसे में कलात्मक पडिया अब आसानी से देखने को नहीं मिलती। इस सम्बन्ध में घोटुल के बीच में गडने वाले खम्बे मे अंकित देवी देवताओं की आकृति भी समान उल्लेखनीय है। घोटुल के दरवाजों और उनकी चौखटों पर भी बारीक नक्काशी करने का चलन रहा है। 

आज भी आदिवासी तम्बाखू रखने के लिये विभिन्न प्रकार की चुनैटी बनाते हैं। इन चुनौटियों पर काष्ठ कला के कई प्रयोग देखे जा सकते हैं। प्राय: ये चुनौटियाँ शंखाकार होती हैं किंतु अन्य भी आकार प्रकार बनाये जाते रहे हैं। प्रयोग तथा रखने के स्थान के अनुरूप इन चुनैटियों में वैसी सुविधायें भी होती हैं उदाहरण के लिये यदि पगडी में फसाने योग्य चुनैटा बनाना है तो उसकी आकृति के नीचे पिन नुमा संरचना भी बना दी जाती है जिससे उसे खोंसने में सुविधा हो। वेरियर एल्विन ने अपनी पुस्तक “मुरिया और उनका घोटुल” में उन दिनो प्रचलित कुछ चुनैटिया बतायी हैं (भाग-2, पृ-165) जिन्हें उन्होंने गोटा कह कर उल्लेखित किया है; इनमे प्रमुख हैं हुदौंद गोटा (मोटियारी के स्तनो की भांति गोल), चक्का गोटा (पहिये के आकार का), मारका बट्टा गोटा (आम की आकृति का), कलारी गोटा (मछली की हड्डियों जैसी आकृति), तुमुर गोटा (आबनूस के फूलों के समान) आदि आदि। 

आदिवासियों की काष्ठ कला ने इतिहास के साथ कदम मिलाये और आज उसकी एक झांकी बस्तर के दशहरे के अवसर पर तथा गोंचा पर्व पर निकलने वाली रथ यात्राओं में देखी जा सकती है। बस्तर के दशहरे के लिए बनाए जाने वाले रथ में आदिवासियों की काष्ठ कला का अद्भुत प्रदर्शन होता है। रथ के आगे तथा पीछे रखे जाने वाले काष्ठ निर्मित दो दो घुडसवार पुतले आज भी रथ की सज्जा का प्रमुख हिस्सा होते हैं। आदिवासी देवी देवताओं का काष्ठ स्वरूप में निर्माण भी प्राचीन समय से ही होता आ रहा है। बस्तर के सम्पूर्ण क्षेत्र में आंगादेव, पाटदेव, भीमादेव आदि प्रमुखता से काष्ठ निर्मित ही होते हैं। आदिवासी काष्ठकला का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप है मुखौटे। भाति भातिं के स्वरूप वाले मुखौटे काष्ठ शिल्प के माध्यम से बनाये जाते हैं तथा कुछ तो इनमे बेहद डरावने भी होते हैं। इन मुखौटों का प्रदशन आज भी दंतेवाड़ा की फागुन मडई में दर्शनीय होता है। 

लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है बस्तर की काष्ठ शिल्प कला जिसका कि अब व्यावसायीकरण भी हो गया है। अनेक संस्थायें आगे आयी हैं जिन्होंने इस आदिवासी कला के न केवल संरक्षण के लिये कार्य किया है अपितु बस्तर के काष्ठ शिल्प को समुचित बाजार भी मिल रहा है। दंतेवाड़ा, जगदलपुर, कोण्डागाँव जैसे नगरों में आपको एसी अनेक दुकाने मिल जायेंगी जहाँ काष्ठ शिल्प कलाकारों द्वारा बनायी गयी कई कलाकृतियाँ आपको देखने तथा खरीदने के लिये उपलब्ध मिलेंगीं। बदले समय की मांग के अनुसार इन दिनो काष्ठ शिल्प में गणेश प्रतिमा, महापुरुषों की प्रतिमायें, महाभारत में कृष्ण का अर्जुन को गीताउपदेश प्रदर्शित करती प्रतिमा, बस्तर दशहरे के दृश्य, दण्डामी माडिया युगल, आदिवासी नृत्य, सलफी के पेड की आकृति आदि सहजता से उपलब्ध हो जायेगी। आदिवासी काष्ठ कला अब मध्यम और उच्च वर्ग के घरों में केवल सजावट की वस्तुओं के रूप में ही नही अपितु फर्नीचर में भी दृष्टव्य है। बस्तर में निर्मित दीवान, सोफे, दरवाजे और चौखटों आदि पर की गयी काष्ठ कला इन दिनो चलन में है। यह अलग बात है कि कलाकार और उपभोक्ता के बीच इतने बिचौलिये काम करते है कि हमेशा ही निर्माता को उसका वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। आवश्यकता है कि कला को सहकारिता के साथ जोडे जाने की जिससे कि कलाकार को सही मूल्य मिल सके तथा काष्ठ कला एक कुटीर उद्योग बन कर बस्तर की पहचान बनी रहे। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Saturday, September 28, 2013

कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?


पिछले पृष्ठ का शेष -

कैद में देवता और सकते में प्रगतिशीलता?
[केशकाल (उ. बस्तर) से एक वृतांत]
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दो तरह के देवताओं का फैशन है - आस्तिकों के देवता और नास्तिकों के देवता। दो तरह के कट्टरपंथी भी पाये जाते हैं – आस्तिक और नास्तिक। बडा विचित्र दौर है यह जहाँ भांति भांति के आस्तिक तलवार खींचे खड़े हैं और नस्तिकों ने भी अपने खंजर हथेलियाँ मोड़ कर पीठ की ओर छिपा रखे हैं। अब यह आप की ख्वाहिश है कि किस ओर खड़े हो कर मरना पसंद करेंगे? कोई आपके मुंह पर श्लोक या आयते दे मारेगा तो कोई मार्क्स की थ्योरी को परम सत्य बता कर आपकी छाती पर चढ जायेगा। विचारधाराओं के थोथेपन के इस दौर में मुझे बस्तर सुकून का ठंडा पानी उपलब्ध कराता रहा है। कथनाशय यह है कि धर्म, मान्यताओं और नास्तिकता के बीच भी सेतु बनाया जा सकता है; इस बात की प्रतीति पहली बार मुझे तब हुई थी जब मैं कांकेर (उत्तर बस्तर) में रिसेवाड़ा के पास कुछ प्रतिमाओं के अध्ययन के लिये गया था। एक स्थल पर ठिठक गया चूंकि वहाँ निकट ही गोबर की थप्पी पडी थी; पास ही इसे पूजे जाने के चिन्ह भी थे। मैने जब ग्रामीणों से इस सम्बन्ध में पूछा तो ज्ञात हुआ कि यह भीमादेव का स्थान है (भीमादेव पानी के देवता कहे जाते हैं)। देवता गोबर के भीतर पड़ा हुआ था। मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण ने भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार बस्तर में देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं, बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव ने बार बार याचना करने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण ने अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या? क्या इस उदाहरण के सामने हमारे मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों और कार्ल-मार्क्स की थ्योरियों के तोते नहीं उड जाते? आस्था क्या है, तर्क क्या है और मान्यताओं की क्या सीमा हो इसे प्रस्तुत उदाहरण से बेहतर कहाँ समझा जा सकता है?

इसी बात को बारीकी से समझने के लिये केशकाल (बस्तर) की रमणीक वादियों से होते हुए माता भंगाराम के मंदिर पहुँचा जा सकता है। उस दिन पोला त्यौहार मनाया जा रहा था; मैं सुबह सुबह ही पत्रकार मित्र कमल शुक्ला और कृष्ण दत्त उपाध्याय जी के साथ भंगाराम मंदिर आ पहुँचा। केशकाल नगर से लगभग चार किलोमीटर भीतर एक पर्वतीय टीले पर इस मंदिर की अवस्थिति है जिसके पीछे की ओर से घना वन और ढलान प्रारंभ होती है। इस स्थल के सम्बन्ध में बुनियादी जानकारी स्थानीय पत्रकार तथा शोधार्थी कृष्णदत्त उपाध्याय मुझे उपलब्ध कराते चल रहे थे। मंदिर परिसर में सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल दो पुजारी वहाँ उपस्थित थे जो कि पोला उत्सव होने के कारण माता भंगाराम को चढाने के लिये भोग बना रहे थे। खपरैल का यह मंदिर पुराने समय की संरचनाओं का स्मरण कराता है। बस्तर के देवी देवताओं का प्रकृति प्रेम भी जाहिर है और आम तौर पर जहाँ पेडों के झुरमुट हों, एकांत पर्वतीय टीले के निकट सघन वनों से घिरा कोई स्थल हो तो वहाँ आप किसी देवगुडी अथवा माता गुडी होने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। माता भंगाराम का मंदिर बस्तर भर की आस्था का केन्द्र है। रियासतकालीन बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने यहाँ एक चाँदी का छत्र भी चढाया था जिसे विशिष्ठ अवसरों पर तथा भादो जात्रा के दौरान निकाला जाता है। एक समय था जब यहाँ पशुबलि भी प्रथा थी जिसे सत्तर के दशक में आदिवासी समाज ने आपसी सलाह से बंद कर दिया। भादो जात्रा न केवल प्रसिद्ध है अपितु बस्तर के दूर दराज गाँवों से इसमें सम्मिलित होने अनेक गायता, सिरहा, माझी और पटेल पहुँचते है। भादो के छ: शनिवार सेवा पूजा होती है जबकि सातवे शनिवार जात्रा निकाली जाती है। 

मंदिर परिसर के पीछे एक पर्वतीय ढलान आरंभ होती है; ठीक वहीं पर कई आंगा देव जमीन पर पडे हुए थे। उनका सामान यहाँ तक कि उनके चाँदी से किये गये श्रंगार, उनके चढावे आदि आदि इस ढलाने में यत्र तत्र बिखरे पडे थे। आंगादेव को मूलत: वंश का देवता कहा जाता हैं। तीन साजा, बेल या इरा लकड़ी की डंडियाँ जमीन में समानांतर गाड़ी जाती हैं। बीच की लकड़ी देवता का प्रतीक होती है जिसमें किसी साँप या चिडिया जैसी आकृति बनी होती है। दो सिर वाली आकृति यदि बनी हो तो आंगा पति और पत्नी दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोरपंख, चाँदी के गहनों आदि से इसे सजाया जाता है।“ देवता तो देवता है और उसका मान करने की परम्परा भी है। देवता को प्रसन्न रखने के हर जतन किये जाते हैं तथा सिरहाओं के माध्यम से देवताओं द्वारा रखी गयी हर मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती है। देवता है तो कुछ भी मांग ले एसा भी नहीं। बहुत सख्त मोल-भाव देवताओं और भक्त के बीच में होता है। बकरे की मांग से शुरु हुई बहस भक्त के इनकार और चीख चिल्लाहट भरी तकरार से घटते घटते मुर्गे तक भी पहुँच सकती है। यहाँ चूंकि देवता और उसपर आस्था रखने वालों के बीच सांकेतिक ही सही एक संवाद स्थापित है अत: बात चढावे लेने देने तक ही नहीं ठहरती अपितु भक्त की मांग भी पूरा करना देवता का ही दायित्व है। भक्त को परेशानी है, वह कर्जे में डूब गया है, घर में बीमारियों ने घर बना लिया है, पति-पत्नी के बीच झगडे होते रहते हैं और एसे में देवता मूकदर्शक नहीं रह सकता। उसे हर व्यक्तिगत समस्या बताई जाती है तथा उससे समाधान भी मांगे जाते हैं। यह सब कुछ भक्त की बर्दाश्त की पराकाष्ठा तक ही होता है। जिस दिन भक्त को लगा कि वह देवता किसी काम का नहीं, जिसके रहते हुए भी उसका जीवन उलझनों भरा है, उसके तनावों का निदान नहीं मिल रहा है, खेतों को बरसात नहीं मिल पा रही है तो समझ लीजिये कि अब इस आंगा की शामत आ गयी। देवता को अस्वीकार करना बस्तर के आदिवासी समाज की आस्था का सबसे सबल और अनुकरणीय पक्ष है।

कुछ अविश्वसनीय किंतु सत्य जान लें। भंगाराम ही वह स्थल है जहाँ किसी देवता को मान्यता मिलती है तो किसी देवता की मान्यता समाप्त भी की जाती है। एक ही नाम के दो देवता होने पर वास्तविक कौन के विवाद का निबटारा भी यहीं होता है। सबसे बडी बात कि पीडित भक्त अपने देवता के बरताव के प्रति यहाँ अपनी नाखुशी व्यक्त करता है तथा उसके लिये सजा की मांग भी कर सकता है। वह अपने देवता का तिरस्कार भी कर सकता है अथवा उसे सजा दिलाने की पात्रता भी रखता है। एसा भी नहीं कि देवता को अपनी सफाई देने का मौका नहीं मिलता। देवता भी यहाँ अपने तर्क रखता है; वह भक्त की उन भूलों को उजागर कर सकता है जिसके कारण उसने समस्याओं का समाधान नहीं किया। भंगाराम की यह अदालत नीर-क्षीर विवेक करती है; वह कभी समझाईश से भक्त और देवता के बीच विवाद को समाप्त करती है तो कभी किसी देवता को कैद करने अथवा नष्ट करने का भी निर्देश दे सकती है। यही कारण भी है कि भादो जात्रा में महिलाओं का प्रवेश यहाँ तक कि प्रसाद ग्रहण करना वर्जित रखा गया है। इसका कारण उनके कोमल मन को माना गया है चूंकि देवताओं को कैद किया जाना अथवा नष्ट किया जाना एक भावुक क्षण होता है। पुजारी ने इस जानकारी में आगे जोडा कि कभी कभी कुछ साल बीत जाने के पश्चात भक्त को अपने कैद देवता की याद आती है अथवा उसे लगता है कि सजा पर्याप्त हो चुकी। अब देवता को छुडा कर लाने और सम्मान देने से उसकी बात सुनी जायेगी और समाधान भी उसे मिलने लगेंगे तो वह इसकी अपील भी भंगाराम में आ कर कर सकता है। यह प्रक्रिया वर्तमान न्याय प्रणाली में मिलने वाली जमानत की तरह होती है। वह निर्धारित शुल्क अदा कर अपने देवता को पुन: घर ले जा सकता है। 

क्या यह प्रक्रिया एक विमर्श नहीं मांगती? क्या देवताओं को मिलने वाली सजायें मुख्यधारा के उस समाज को आईना नहीं दिखाती जिन्होंने अपनी कट्टर आस्थाओं के लिये पाखण्ड की चादर ओढ रखी है? क्या यह समाजशास्त्र के लिये एक अनूठा विषय नहीं है जो तमाम नास्तिकता की दलीलों को जीभ चिढा कर उन्हें आस्थावान होने की अपनी ही परिभाषा सौंप देता है? यहाँ देवता असल में व्यक्ति के मनोविज्ञान से ही जन्म लेते हैं और उसके अपने तर्क द्वारा कभी भी नष्ट किये जा सकते हैं। भंगाराम मंदिर के पीछे की ओर जहाँ अनेको देवता कैद हैं अथवा उनके सामान, श्रंगार, चढावे आदि बिखरे हुए हैं; उन्हें देख कर मैं भी स्तब्ध रह गया हूँ और अपने तर्क को कुरेद रहा हूँ कि आदिवासी समाज की इस प्रगतिशीलता को हमारी मुख्यधारा की दकियानूसियत कभी हासिल भी कर पायेगी? 

- राजीव रंजन प्रसाद
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हजारो चेहरे ऐसे [पुस्तक चर्चा]


अनूठी है बस्तर की लौह शिल्प कला


उन्होंने अपनी घुटने तक लपेटी हुई लुंगी के भीतर खोंस कर रखा पासपोर्ट निकाला जिसे पॉलीथीन और उसके उपर कपडे से लपेट कर सुरक्षा प्रदान की गयी थी। दो पासपोर्ट आपस में जुडे हुए थे और पन्ने पलटने पर ज्ञात हुआ कि अनेक देशों का उसमे वीज़ा लगा हुआ है। यह विद्याधर कश्यप थे जो नगरनार में अवस्थित हैं और बस्तर के लौह शिल्प का जाना पहचाना नाम हैं। कलाकार की प्रेरणा उसे मिलने वाला सम्मान और प्रोत्साहन ही होते हैं; यह बात मैं कश्यप जी की आँखों से झांकते गर्व को देख कर महसूस कर रहा था। यह गर्व उस दक्षता और कल्पनाशीलता से उत्पन्न होता है जो बस्तर के कलाकारों में आप देख-महसूस सकते हैं। लौह शिल्प से तात्पर्य आप विशुद्ध लोहार कर्म से नहीं लगा सकते। यह सही है कि परम्परागत रूप से बस्तर में लोहार निवास करते आये हैं तथा रियासत काल से ले कर आज तक वे भांति भांति के लौह औजार बना कर बाजार तक पहुँचाते रहे हैं। इन औजारों में दैनिक उपयोग की वस्तुएं जैसे कुल्हाडी, छुरा, दीपक, सांकल, बड़गी, सिकरा, काटा, आदि रही हैं तो खेती के उपकरण जैसे हल के फाल आदि भी हैं। तीर के आगे का हिस्सा निर्मित किया गया है तो बर्तन और दरवाजे भी बनाये जाते रहे हैं। किसी समय तलवारे, त्रिशूल, भाला, बरछी भी इनकी धौंकनियों से तप कर निकली हैं और बंदूखों की नाल भी इनकी निर्मिति हुआ करती थी।

बस्तर का लौह कर्म जितना पुराना है उतनी ही पुरानी लौह शिल्प कला भी है। धातुयुगीन मानव सभ्यता का काल 1800 ई.पू से 1000 ई.पू माना गया है। इस कालखण्ड तक मध्यभारत, गोदावरी के तटीय क्षेत्रों जिसमे कि वर्तमान बस्तर भी सम्मिलित है निश्चित ही लोहे को गलाने और इस्पात बनाने की विधि सीख ली गयी थी। बैलाडिला क्षेत्र में जहाँ आज विश्व की सर्वाधिक लौह प्रचुरता वाले अयस्क का भंडार है और आधुनिकतम खदाने हैं वहाँ 1065 ई में चोलवंश के राजा कुलुतुन्द ने लोहे को गला कर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना लगाया था। यहाँ बने हथियारों को तंजाउर भेजा जाता था। कथनाशय यह है कि आदिवासी परम्परागत रूप से लोहा गलाने और उससे विभिन्न उत्पाद बनाने की विधि को पीढी दर पीढी आगे बढाते रहे और इस तरह लौह कर्म वर्तमान की दहलीज तक पहुँच सका। एक निर्माता वस्तुत अपने भीतर की कल्पनाशीलता को छोड ही नहीं सकता और गाहे-बगाहे उसके भीतर से निकलने वाली सृजन की हूक किसी एसी आकृति के साथ बाहर आती है जिसे देख कर सभी चमत्कृत रह जायें। किसी भी कला की यही आरंभिक अवस्था है और संभवत: लौह शिल्प की भी।

लौह शिल्प का जो कला पक्ष है वह अत्यधिक श्रम से निकल कर बाहर आता है जहाँ धौकनी का ताप, लोहे को गलाने-तपाने का समय और हथौडे की उसपर सही समय और सही मात्रा में की गयी चोट ही आकार देने में सहायक होती है। आज भी लौह शिल्प के कलाकार किसी तरह की ढलाई विधि का प्रयोग नहीं करते अपितु परम्परागत रूप से पीट पीट कर आकार देने की प्रक्रिया का ही निर्वहन किया जाता रहा है। लौह कर्म एक कुटीर उद्योग तो बना ही कला के रूप में आरंभ में लोहारों ने अनेको स्थानीय देवी देवताओं की आकृति को स्वरूप प्रदान किया। गुजरी देवी को देवगुडी में रखा जाता है; इसी तरह देवताओं के वाहन निर्मित किये गये जिनमे रावदेव का घोडा इस तरह बनाया जाता था जिसमे कि कान नहीं होते थे। विभिन्न अनुष्ठानो में देवी-देवता अथवा पशु मूर्तिया चढाना एक विधान की तरह है। मानव आकृतियाँ भी बनाई जाती हैं जिसमे गौर सिंह लगाये हुए दंडामि माडियाओं की अनुकृति प्रमुख है। इसी तरह लौह कर्म से निर्मित सिकरा तीन प्रकार के होते हैं – कपाट सिकरा, बिलाई सिकरा और काटा सिकरा। काटा सिकरा आजब भी देवस्थल पर रखे जाते हैं। चिटकुली को बजाने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। लौह कलाकृतियों में अनेक प्रकार के पशु पक्षी जिनमे कि बैल, हिरण, घोडा, भांति भांति के आकार की चिडिया आदि बनाये जाते हैं। लौह कलाकृतियों में घुडसवार गणेश विशेष रूप से दर्शनीय होते हैं। दीपंकर हो अथवा दीवार में सजाने वाली विभिन्न मूर्तियाँ; इन सभी में बस्तर के लौह-शिल्पियों की अद्भुत कलात्मक क्षमता के दर्शन होते हैं।

बस्तर के आदिवासी समाज में प्रचलित एक प्रथा की जानकारी मिलती है जिसमे विवाह में कन्या को लौह दीपक प्रदान किया जाता है। इस प्रथा को दाईज दिया जाना कहते हैं। वस्तुत: यह कला ही है जो लोकजीवन में अपना आलोक विस्तारित करती है, देवताओं के सम्मुख प्रस्तुत की जाती है और समान पूजनीय होती है साथ ही साथ हर आम और खास घरों की सहर्ष शोभा भी बनती है। बस्तर के भीतर लोककला के रूप से एसी एसी विरासतें मौजूद हैं कि यदि इनका सही प्रकार से संरक्षण, संवर्धन तथा प्रसार किया जाये तो रोजगार के उन अवसरों को पुन: हासिल किया जा सकेगा जो धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।
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Wednesday, September 25, 2013

बस्तर की घड़वा कला में सांस लेता है मोहनजोदाडो


कलाकारों के साथ समय गुजारना एक अनोखा अनुभव होता है। बस्तर की घडवा कला अथवा ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है और हमेशा ही मुझे इन धातु-निर्मित कलाकृतियों ने अत्यधिक प्रभावित किया है। जगदलपुर स्थित मानवसंग्रहालय में मेरी मुकालात घडवा कला के साधक फगनुराम से हुई। वे बहुत देर तक इस बात से अनजान थे कि मैं उनके पीछे खड़ा मंत्रमुग्ध सा उनकी साधना को निहार रहा हूँ। मिट्टी, मोम और धातु की सम्मिलित है यह यह कला साधना जिसमे आकृति तो धातु की बनती है लेकिन कलाकार उसे मोम में साधता है और मिट्टी जीवन फूंकें जाने तक उसे अपने सांचे में धारण करती है। मैं कलाकार के बगल में ही बैठ गया और जानने की कोशिश करने लगा कि आखिर यह कला है क्या तथा इसकी निर्माण प्रक्रिया कैसी है। यह बात तो तय है कि घडवा अथवा ढोकरा कला केवल सांचे में धातु डाल कर उसे जमाने भर को नहीं कहते। मेरे सामने अनेक मोम से आकार दी गयी देव प्रतिमायें, स्त्री-पुरुष आकृतियाँ, हाथी हिरण आदि आदि के स्वरूप बना कर रखे हुए थे। मोम से ही इन्हें इतना बारीक तराशा और सजाया जा चुका था कि इतने भर को ही मैं श्रेष्ठतम कला कहने को बाध्य था किंतु यह तो शुरुआत मात्र है। 

अगर प्रारंभ की बात की जाये तो बस्तर में मुख्य रूप से से घसिया जनजाति ने घडवा कला को साधा और शिखर तक पहुँचाया। घसिया के रूप में इस जनजाति को पहचान रियासतकाल में उनके कार्य को ले कर हुई चूंकि ये लोग उन दिनो घोडों के लिये घास काटने का कार्य किया करते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि घडवा कला को किसी काल विशेष से जोड कर नहीं देखा जा सकता चूंकि मोहनजोदाडो में ईसा से तीन हजार साल पहले प्राप्त एक नृत्य करती लडकी की प्रतिमा लगभग उसी तकनीक पर आधारित है जिसपर बस्तर का घडवा शिल्प आज कार्य कर रहा है। अपने एक आलेख में प्रसिद्ध घडवा शिल्प के कलाकार श्री जयदेव बघेल ने लिखा है कि बस्तर में इस कला के प्रारंभ के लिये जो मिथक कथा है उसका सम्बन्ध आदिमानव और उसकी जिज्ञासाओं से है। यदि उनके विवरणों को अपने शब्दों में प्रस्तुत करूं तो यह बात तब की है जब आदिमानव जंगल में विचरण करता था और शिकार पर आश्रित अपना जीवन निर्वहन किया करता था। इन्ही में से एक आदिमानव की यह कहानी है जो अपने माता-पिता से बिछड कर किसी गुफा में रह रहा था। एक दिन उसने पहाड पर आग लगी देखी। आग से निकलने वाले रंग तथा चिंगारिया उसे भिन्न प्रतीत हुईं और वह जिज्ञासा वश उस दावानल के निकट चला गया। अब तक आग स्थिर होने लगी थी। वहीं निकट ही उसे एक ठोस आकृति दिखाई पडी जो किसी धातु के पिघल कर प्रकृति प्रदत्त किसी गह्वर अथवा सांचे में प्रवेश कर जम जाने के पश्चात निर्मित हुई होगी। यह आकृति उसे अलग सी और आकर्षित करने वाली लगी और उसे उठा कर आदिमानव अपने घर ले आया। उसने इस प्रतिमा के लिये घर का एक हिस्सा साफ किया और इसे सजा कर रखा। इस प्रतिमा के लिये उसका आकर्षण इतना अधिक था कि नित्य ही वह इसे साफ करता और धीरे धीरे इससे प्रतिमा में चमक आने लगी। कहते हैं इसी चमक से प्रभावित हो कर वह स्वयं को भी चमकाने लगा अर्थात नित्य स्नानादि कर श्रंगार पूर्वक रहने लगा। यह धातु और वह मानव जैसे एक दूसरे के पूरक हो गये थे और समय के साथ दोनो में ही वैशिष्ठता की दमक उभरने लगी थी जिसे ग्रामीणों ने महसूस किया। जब कारण पूछा गया तो इस आदिमानव ने ग्रामीणों को वह जगह दिखाई जहाँ से उसे धातु का यह प्रकृति द्वारा गढा गया टुकडा प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर सभी ने पाया कि एक दीमक का टीला है जिसमे कि धातु-द्रव्य प्रवेश कर गया था और उसने वही आकार ले लिया था। उसी स्थल पर मधुमक्खी का छत्ता भी पाया गया जिससे मोम, सांचा और धातु को कलात्मकता देने का आरंभिक ज्ञान उन ग्रामीणों को हुआ होगा। उस आदि-कलाकार ने तब ग्रामीणों से कहा कि मैने इस धातु के टुकडे को अपनी माँ माना है और इसी तरह इससे प्रेम किया है। तुम भी इस कला और अपने निर्माण को माँ की तरह ही मानो। कहते हैं कि उस आदिकलाकार ने सबसे पहले अपनी माँ की आकृति बनाने का यत्न किया और धीरे धीरे वह अपने निकटस्थ परिवेश की वस्तुओं और पशु-पक्षियों को भी इस कला के माध्यम से मूर्त रूप देने लगा। जयदेव बघेल के अनुसार उस आदिनामव ने इस तरह पहले बाघ, भालू, हिरण, कुत्ता, खरगोश, नाग कछुवा, मछली, पक्षी, गाय, बकरा, बंदर आदि बनाये। धीरे धीरे उसने अपनी माँ के रूप में डोकरी माँ की कलाक़ृति बनाई और कालांतर में डोकरा बाबा के रूप में वह पिता के स्वरूप को गढने लगा। इसी तरह विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ घडवा कला के रूप में परिवर्तित होती रहीं। कर्मकोलातादो, मूलकोलातादो, भैरमदेव, भीमादेव, राजारावदेव, दंतेश्वरीदेवी, माता देवी, परदेसीन माता, हिंग्लाजिन देवी, कंकालिन माता आदि की मूर्तियाँ इस कला के विकास के विभिन्न चरणों में निर्मित की जाने लगी। लाला जगदलपुरी भी अपनी पुस्तक बस्तर इतिहास एवं संस्कृति में उल्लेखित करते हैं कि “बस्तर के घड़वा कला कर्मी पहले कुँडरी, कसाँडी, समई, चिमनी और पैंदिया तैयार करते थे। अब ये लोग देवी देवता, स्त्री पुरुष, हरिण, हाथी, अकुम आदि बनाते आ रहे हैं”। 

यह कला असाधारण इसलिये है चूंकि इसे सम्पूर्णता से समझने पर किसी न किसी रूप में इतिहास सामने आने लगता है। सिन्धु घाटी की सभ्यता अगर धातु की एसी प्रतिमाओं की निर्माती थी तो निश्चित ही इस सभ्यता के नष्ट होने के साथ जो पलायन हुए उनके साथ ही यह कला भी स्थानांतरित हुई होगी। बस्तर में नाग शासकों ने लगभग सात सौ वर्ष तक शासन किया है और इतिहास उनके आगमन का स्थल मध्य एशिया के पश्चात सिंधुघाटी का क्षेत्र ही मानता रहा है तो क्या यह कला उनके साथ ही बस्तर की जनजातियों के पास पहुँची? इन प्रतिमाओं का महापाषाणकालीन सभ्यता से भी सम्बन्ध जोड कर देखा गया है तो क्या यह माना जा सकता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में ही समानांतर बसे मानव समूहो को भी धातु को गला कर आकृतियाँ देने की यह कला ज्ञात थी जिसमे गोदावरी के तट पस बसे आदिम समूह भी सम्मिलित थे? यह अभी शोध का विषय है तथा इसपर गहराई से कार्य किये जाने की आवश्यकता है। 

घडवा कलाकार फगनुराम ने मुझे इसकी निर्मिति की जो विधि बताई उसके अनुसार इस प्रकृया में कई प्रकार की मिट्टी लगती है जिसमे दीमक की बाबी की मिट्टी की प्रमुख भूमिका होती है। इस बात की कडी उपरिउल्लेखित आदिवासी की मिथक कथा से जुडती हुई प्रतीत होती है जिसका उल्लेख कलाकार जयदेव बघेल अपने आलेखों में करते रहे हैं। मिट्टी के कई प्रकार इस आकृति निर्माण प्रकृया में लगते हैं जिसमे दीमक (डेंगुर) की बाबी की मिट्टी के अलावा काली मिट्टी, नदीतट की मिट्टी, रुई-मिट्टी आदि का उपयोग विभिन्न प्रक्रियाओं में किया जाता है। साथ ही साथ सहायक तत्व के रूप में धान का भूसा तथा रेतीली मिट्टी का भी प्रयोग होता है। मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया के पहले चरण में धान के भूसे को काली मिट्टी के साथ मिला कर अच्छी तरह गूथ लिया जाता है और फिर इससे ही सांचा तैयार किया जाता है। अब सांचे की आकृति को धूप में अथवा आग में तपा कर ठोस कर लिया जाता है। इस सांचे पर गीली मिट्टी की दूसरी परत चढाई जाती है। इस बार मिट्टी के सूखते ही इस सांचे के स्वरूप की घिसाई खपरे अथवा हंडी (मटके) के टुकडे से की जाती है और इसे चिकना बनाया जाता है। अगली प्रक्रिया है उन पौधों की पत्तियों से इस आकृति को घिसना जिनको पीसने पर हरा रंग अधिक मात्रा में निकलता हो। सेम वृक्ष की पत्तियों का विशेषरूप से इस हेतु प्रयोग किया जाता है। इस प्रकृया के पश्चात तैयार ढांचे को पहले सुखा लिया जाता है जिसके पश्चात इस आकृति के उपर कलाकार की कल्पना अपना कार्य आरंभ करती है। मोम की सहायता से इस आकृति के उपर विभिन्न प्रकार की कलात्मक बारीकियों को उभारा जाता है। वस्तुत: इस पूरी प्रकृया के प्राण इसी समय भरे जाते हैं जब मोम के माध्यम से बहुत बारीक बारीक आकृतियाँ और स्वरूप उकेरे जाते हैं, विभिन्न प्रकार की पच्चीकारी की जाती है। इस मिट्टी के स्वरूप का मोम से श्रंगार पूर्ण होते ही छानी हुई खडिया मिट्टी में कोयले के महीन छाने हुए पावडर या गोबर को मिला कर आकृति के उपर हलके हाथो से एक लेप चढाया जाता है। इस लेपन की परत के सूख जाने पर पुन: दीमक की बावी की मिट्टी तथा धान के भूसे को मिला कर एक और लेप कर दिया जाता है। इसी लेपन के दौरान आकृति के सिरे पर धातु (पीतल अथवा कासा) से ढलाई करने के लिये एक छेद छोडा जाता है। अब इस पूरी आकृति को आग में पुन: पकाया जाता है। गर्मी पाते ही सांचे पर लगाया गया मोम उतने ही क्षेत्र में एक रिक्ति अथवा खोखलापन बनाता हुआ वाष्पित हो जाता है। अब पहले से ही छोडे गये छिद्र के माध्यम से पिघली हुई धातु का प्रवेश कराया जाता है। यह धातु उन सभी रिक्त स्थानो में जा कर बैठ जाती है जो कि मोम के पिघल जाने से निर्मित हुई हैं। अर्थात जिस कलात्मकता का निर्माण मोम के माध्यम से कलाकार ने किया वही अब धातु की बन कर तैयार हो जाती है। अब इसे ठोस होने के लिये छोड दिया जाता है। बाद में धीरे धीरे मिट्टी को तोड कर अलग कर लिया जाता है और धातु की कलात्मक प्रतिमा अपना आकार ले लेती है। अद्भुत है यह कला...और अद्भुत अनुभव था अपनी आँखों के आगे उस कास्य युग को निहारना, इतिहास को पक कर आकार लेते देखना। 

इसमे दो राय नहीं कि बस्तर की घडवा कला विश्व की प्राचीनतम कलाओं में से एक है जो आज भी सराही जा रही है तथा इसका अपना वैश्विक बाजार भी है। मुझे यह जान कर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि इस कला के कलाकार देश-विदेश की यात्रायें कर रहे हैं और न केवल अपनी कला का वहाँ प्रदर्शन कर रहे हैं अपितु विदेशों में हुई कार्यशालाओं से सीख कर कई तरह की आधुनिकताओं को भी अपनी आकृतियों में स्थान दे रहे हैं। वर्ष 1961-62 में सरोजिनी नायडु द्वारा घडवा कला के लिये श्री सिमरन बघेल को सम्मानित किया गया था इसके पश्चात कलाकारों का एक कारवा निरंतर बनता चला गया है। वर्ष 1970 में सोनाबाल गाँव के श्री सुखचंद को तथा वर्ष 1977 में कोण्डागाँव के श्री जयदेव बघेल को इस कला की साधना के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था। बदलते दौर में यह कला केवल सजावट नहीं अपितु दैनिक उपयोग की वस्तुओं की भी निर्मिति कर रही है जिससे कि उसके खरीददार बढें और कलाकारों की आजीविका चलती रहे। रायपुर एयरपोर्ट से ले कर दिल्ली के हर कला-शिल्प मेले में बस्तर की शान घडवा कला दिखाई पड ही जाती है। आज न केवल मोम अपितु धातु भी कीमती हो गयी है एसे में यह कहना उचित नहीं कि कलाकारों को उनकी निर्मिति के वास्तविक दाम मिल पा रहे हैं। हर हाल में इस कला को प्रोत्साहन, संरक्षण, विस्तार तथा बाजार की आवश्यकता है। 

Tuesday, September 24, 2013

एनबीटी की बस्तर में हलबी अनुवाद कार्यशाला के बहाने एक विमर्श


“एनबीटी की बस्तर में हलबी अनुवाद कार्यशाला के बहाने एक विमर्श” 
[कार्यशाला दिनांक 24-26 सितम्बर को जगदलपुर में] 
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बस्तर में दो वृहद रूप से पहचानी जाने वाली संस्कृतियाँ हैं – गोंड़ी तथा हलबी-भतरी परिवेशों में। भूतपूर्व बस्तर रियासत ने इन दोनों संस्कृतियों को भाषाई एकता के सूत्र में बाँधा था। एक लम्बे समय तक ‘हलबी’ बस्तर रियासत की राज भाषा रही किंतु इसका कारण किसी संस्कृति विशेष को महत्व दिया जाना अथवा जिसी जनजाति विशेष का वर्चस्व दिखाना नहीं था अपितु यह इस लिये किया गया था चूंकि रियासत में अवस्थित सभी जनजातियों की संपर्क भाषा तब हलबी ही थी। लाला जगदलपुरी की पुस्तक “बस्तर- लोक कला, संस्कृति प्रसंग” के पृष्ठ-17 मे उल्लेख है कि – “बस्तर संभाग की कोंडागाँव, नारायनपुर, बीजापुर, जगदलपुर और कोंटा तहसीलों में तथा दंतेवाडा में दण्डामिमाडिया, अबूझमाडिया, घोटुल मुरिया, परजा-धुरवा और दोरला जनजातियाँ आबाद मिलती हैं और इन गोंड जनजातियों के बीच द्रविड मूल की गोंडी बोलियाँ प्रचलित है। गोंडी बोलियों में परस्पर भाषिक विभिन्नतायें विद्यमान हैं। इसी लिये गोंड जनजाति के लोग अपनी गोंडी बोली के माध्यम से परस्पर संपर्क साध नहीं पाते यदि उनके बीच हलबी बोली न होती। भाषिक विभिन्नता के रहते हुए भी उनके बीच परस्पर आंतरिक सद्भावनाएं स्थापित मिलती है और इसका मूल कारण है – हलबी। अपनी इसी उदात्त प्रवृत्ति के कारण ही हलबी, भूतपूर्व बस्तर रियासत काल में बस्तर राज्य की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित रही थी।….और इसी कारण आज भी बस्तर संभाग में हल्बी एक संपर्क बोली के रूप में लोकप्रिय बनी हुई है।” 

डॉ. हीरा लाल शुक्ल की पुस्तक “बस्तर का मुक्तिसंग्राम” के पृष्ठ -6 में उल्लेख मिलता है कि – ‘वर्तमान में निम्नांकित मुख्य जातियाँ बस्तर के भूभागों में रहती हैं – 1. सुआर ब्रामन, 2. धाकड, 3. हलबा, 4. पनारा, 5. कलार, 6. राउत, 7. केवँटा, 8. ढींवर, 9. कुड़्क, 10. कुंभार, 11. धोबी, 12. मुण्डा, 13. जोगी, 14. सौंरा, 15. खाती, 16. लोहोरा, 17. मुरिया, 18. पाड़, 19. गदबा, 20. घसेया, 21. माहरा, 22. मिरगान, 23. परजा, 24. धुरवा, 25. भतरा, 26. सुण्डी, 27. माडिया, 28. झेडिया, 29. दोरला तथा 30. गोंड। उपर्युक्त मुख्य जातियों में 1 से 22 तक की जातियों की “हलबी” मातृबोली है और शेष जातियों की हलबी मध्यवर्ती बोली है। कुछ जातियों की अपनी निजी बोलियाँ भी हैं जैसे क्रम 23 और 24 में दी गयी जातियों की बोली है परजी जबकि 25 और 26 की बोली है भतरी। क्रम 27 से 30 तक की बोलियाँ हैं माडी तथा गोंडी।” 

उपरोक्त उद्धरणों से यह बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि आज भी हलबी बोली बस्तर की एक मान्य और कोंटा से ले कर कांकेर तक बोली-समझी जानेवाली भाषा है। हलबी बस्तर के साहित्य की भी भाषा है और सौभाग्य से इसका अपना व्याकरण और शब्दकोश भी है। यह प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) द्वारा बस्तर की आदिवासी भाषा-बोलियों में मुख्यधारा की पुस्तकों के अनुवाद किये जाने की दूसरी कार्यशाला जिसका आयोजन दिनांक 24-26 सितम्बर को जगदलपुर में किया जा रहा है; इसमे हलबी भाषा में अनेक पुस्तकों का अनुवाद, तत्पश्चात प्रकाशन किया जायेगा। हलबी में हो रहे इस कार्य की महत्ता इस बात से भी है कि एक बडा पाठक वर्ग होने के बाद भी पुस्तकों की उपलब्धता का अभाव होने के कारण भाषा का ह्रास हो रहा था तथा साहित्यकारों की भी हलबी में रचनाकर्म करने की अभिरुचि टूट रही थी। मैं एनबीटी तथा श्री पंकज चतुर्वेदी जी का हृदय से आभार करता हूँ जिनकी संकल्पना से यह आयोजन संभव हो पा रहा है। 

इस आयोजन के साथ मुझे महाराजा प्रवीर याद आ रहे हैं। वर्ष-1950 में 21 से 23 अक्टूबर तक चलने वाले मध्य-प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन जगदलपुर के राजमहल परिसर में हुआ था। तत्कालीन गृह मंत्री पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे। अधिवेशन में पं सुन्दर लाल त्रिपाठी, सुनीत कुमार चटर्जी, आचार्य क्षिति मोहन सेन, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, भदंत आनंद कौशल्यान, बाबूराम सक्सेना, दादा धर्माधिकारी, डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, भवानी प्रसाद मिश्र, भवानी प्रसाद तिवारी, प्रो. अंचल आदि मनीषी उपस्थित थे। प्रवीर ने तब शिक्षा और भाषा-बोली के समन्यवय को ले कर एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि - “हिन्दी में पढ़ाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, इनमें हमें चित्रों की भी आवश्यकता है। प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर लगा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हल्बी और गोंडी में लिखा जाये।” अर्थात यह कि हिन्दी और स्थानीय भाषाओं के बीच एक सेतु बनाने की आवश्यकता है चाहे हम आदिवासी भाईयों को मुख्यधारा से जोडने का स्वप्न देखें अथवा उनकी नयी पीढी के लिये शिक्षा का। 

एनबीटी जैसे प्रकाशन संस्थान यदि इसी तरह अपना दायित्व निर्वहन करेंगे तो निश्चित ही बडे बदलाव बस्तर के सामाजिक परिदृश्य में देखने को मिलेंगे। मेरा यह अनुरोध भी होगा कि इस तरह की कार्यशालायें लगातार आयोजित की जानी चाहिये। अगली कार्यशाला गोंडी में होनी चाहिये जिससे कि दक्षिण बस्तर और अबूझमाड क्षेत्र के लिये भी एसी ही पुस्तके द्विभाषा में प्रकाशित की जा सकें शिक्षक सीधे ही इन पुस्तकों को पढ कर बच्चों तथा ग्रामीणों को सुना सकेंगे तथा उनमें सोच और दृष्टिकोण के बीच बोने में सहायक हो सकेंगे। 

इस आयोजन के लिये पुन: शुभकामनायें। 

Friday, September 20, 2013

बदल रहा है बस्तर के मिट्टी शिल्प का दृष्टिकोण


गीली मिट्टी से खेलने वाला हर बच्चा अपनी कल्पनाओं को कोई न कोई आकार देने की कोशिश अवश्य करता है। बुनियादी रूप से यह कल्पनाशीलता ही मिट्टी शिल्प की कलात्मकता का आधार है। बस्तर में मिट्टी शिल्प देश के किसी भी अन्य भाग के टेर्राकोटा कार्यों से भिन्न है चूंकि इसमे कलाकार की मौलिकता मौजूद है न कि सांचों से इसकी निर्मिति हो रही है। साथ ही साथ जो कुछ बस्तर के कलाकार आज भी गुथी हुई मिट्टी को स्वरूप दे कर बना रहे हैं उसमे क्षेत्र के प्रागैतिहास से ले कर इतिहास के हर बदलते हुए दौर की किसी न किसी रूप में झांकी मिलती है। 

मिट्टी शिल्प की बुनियादी जानकारी मुझे धरमपुरा जगदलपुर स्थित मानव संग्रहालय में चल रही एक कार्यशाला के दौरान प्रदान की गयी जहाँ नगरनार से आये मिट्टी शिल्प के कलाकार अपनी कृतियों का न केवल प्रदर्शन अपितु वहीं निर्माण भी कर रहे थे। कलाकारों ने बताया कि यह कला परम्परागत रूप से चाक, उनके हाथों की कारीगरी तथा कल्पनाशीलता का संगम है। मिट्टी मूलरूप से किसी खेत से, नदी-नाले के किनारे नर्म हुई सतह से, तालाब आदि के किनारे से प्राप्त की जाती है जिसे श्रमपूर्वक तथा पैरों से गूंथ कर निर्माण के लिये तैयार कर लिया जाता है। आवश्यकतानुसार थोडी सी रेत मिला कर और पुन: गूंथ कर इस मिट्टी को किसी भी कलात्मक निर्माण के लिये तैयार कर लिया जाता है। 

भव्य हाथी बस्तर के मिट्टी शिल्प की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। मिट्टी शिल्प का कलाकार मुझे वह प्रक्रिया समझाने लगा जिस तरह वह हाथी का निर्माण कर रहा था। हाथी के पैरो और सूंड को छोड कर पूरा कार्य हाँथों से ही किया जाता है; इसे सजाने के लिये कल्पना और परम्परागत ज्ञान ही उनके सहयोगी होते हैं। यह भी प्रतीत होता है कि हाथी अथवा बैल पर किये गये अलंकरण संभवत: बस्तर को दक्षिण की देन हैं। बस्तर के कलाकारों द्वारा हाथी के अलावा घोडे, बैल नंदी, बेन्दरी आदि प्रमुखता से बनाये जाते हैं। अपने देवी देवताओं को भी मिट्टी के यही कलाकार अपनी कल्पनाशीलता से आकार देते हैं, मुख्य रूप से दंतेश्वरी, जलनी, भण्डारिनी, माडिन माता, बूढी माई, हिंगलाजिन, बंजारिन, मावली, गोंडिन, डोकरा, राहुर, भीमादेव, लिंगोपेन आदि की मृत्तिका-प्रतिमायें बनायी जाती हैं। केवल यही नहीं मृदभांड आज भी आदिवासी परम्परा का हिस्सा है और मटका, घगरी, कुंडरा, कनजी, रूखी, परई, भांजना सुराही आदि भी बनाये जाते हैं। खिलौने बनाना भी कुम्हारों द्वारा किया जाता है और मुख्य रूप से चकिया, चूल्हा, कोंडी, ढक्कन, चाटू, सिल, गुडिया, घोडा, हाथी आदि बनाये जाते हैं। 

कई मिथक कथायें भी उपलब्ध हैं। बस्तर मे यह जनमान्यता है कि तब चारो ओर केवल जल ही जल था और ईश्वर को निर्माण के लिये मिट्टी की आवश्यकता थी। ईश्वर ने केंकडे से कहा कि जाओ पाताललोक में केंचुवे के पास मिट्टी है, उसे ले कर आओ; मुझे उस मिट्टी से दुनिया का निर्माण करना है। केंकडा पाताल लोक पहुँचा और उसके केंचुवे से सृजन के लिये मिट्टी मांगी। इनकार करने पर केंकडे नें अपनी दाढ में केंचुवे को दबा लिया। घबरा कर केंचुवे ने मिट्टी छोड दी, जिसे ले कर केंकडा ईश्वर के पास पहुँचा। ईश्वर नें यह मिट्टी अपने एक गण को दे कर कहा कि जाओ रोशनी के लिये मिट्टी के दीप बनाओ, मिट्टी के पात्र और घट बनाओ। यह गण तथा इसके वंशज कुम्हार बने। इस कहानी से एक और मिथक कथा पूरक की तरह आ जुटती है। कुम्हार ने भगवान से कहा कि मिट्टी के बर्तनों और प्रतिमाओं के निर्माण के लिये मुझे साधन चाहिये। विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र जिससे चाक बना, शिव ने पिण्डी दी जिससे चाक की धुरी बनी तथा ब्रम्ह ने अपनी जनेऊ प्रदान की जिससे मिट्टी काटने की रस्सी बनी। प्रगतिशील समाज इस कहानी को नकार दे इससे पहले मेरा अनुरोध होगा कि इस मिथक कथा को किसी कविता की तरह पढा जाये। सृजन करने वाला हर व्यक्ति वस्तुत: इश्वर का गण ही तो है? इतिहास को भी देखे तो दुनिया के सारे आविष्कार अकस्मात हुए हैं चाहे वह चक्के की खोज हो अथवा आग की; कालांतर में उन्हें किसी न किसी तरह ईश्वरीय सत्ता के साथ उस काल के मानव ने जोड कर अपनी जिज्ञासाओं के सामाधान प्राप्त किये हैं। बस्तर में मिट्टी की किसी कृति के निर्माण के पश्चात उसे आग/भट्टी में पका कर पक्का कर लिया जाता है। बसंत निर्गुणे की पुस्तक “मिट्टी शिल्प” के अनुसार उन्हें कोण्डागाँव के एक कुम्हार बनऊ राम नाग ने यह मिथक कथा बताई थी कि एक बार किसी हाथी के सिर पर मिट्टी चिपक गयी। यह मिट्टी सूख कर किसी पपडी की तरह जमीन पर गिर गयी। बस्तर का पुरा-मानव इस मिट्टी की पपडी को अपनी झोपडी में ले आया। किसी कारण वश झोपडी में आग लग गयी। मिट्टी की यह अर्धचन्द्राकार पपडी जो आकार में किसी पात्र की तरह थी इस आग में पक गयी और ठोस हो गयी। बरसात में पुरा-मानव ने पाया कि इस मात्र में तो वह जल को संचित कर रख सकता है। यही नहीं इस प्रक्रिया से वह अपने उपयोग के योग्य पात्र भी बना सकता है। कहते हैं इसी घटना के फलस्वरूप मिट्टी शिल्प का जन्म हुआ। यह कारण भी है कि हाथी बस्तर में कुम्हारों की निर्मिति में प्राथमिकता से आते हैं और उनकी पूजा भी होती है। यह कथा मनुष्य सभ्यता के विकास की भी परते खोलती हुई भी प्रतीत होती है।

आज भी बस्तर में नगरनार, कोण्डागाँव, कुम्हारपारा (जगदलपुर) तथा एडका (नारायणपुर) में बस्तर की मिट्टी शिल्प कला स्वांस ले रही है। अद्भुत कलात्मकता और कल्पनाशीलता के साथ अब इसमे आधुनिकता का भी समावेश होने लगा है। समय के साथ साथ कलाकार गमले, पेनस्टेंड, दीवार पर लगाये जाने वाली सजावटी कलाकृतियाँ आदि भी बना रहे है। इन सबके बाद जिस बात ने मुझे सर्वाधिक आकर्षित किया वह था “पुरातन और आधुनिकता का फ्यूजन”। कलाकारों से बुनियादी जानकारी ले कर मैं आगे बढा ही था कि मेरी दृष्टि बडे कॉफी कप तथा पेन स्टेंड जैसी कुछ मिट्टी की आकृतियों पर पड़ी। इससे भी बडा और सु:खद आश्चर्य मुझे तब हुआ जब एक नौजवान मेरे सामने आ खडा हुआ और उसने सगर्व बताया कि यह उसका बनाया हुआ है। यह आदिवासी लडका बारहवी पास कर चुका है और अपने पेशे के प्रति भी समर्पित है। उसकी शिक्षा ने ही उसे परम्परा और आधुनिकता को जोड कर नयी कलात्मकताओं को प्रदर्शित करने की प्रेरणा दी है। यह बदलते बस्तर की एक बानगी भर है। हममे से बहुत से लोग जो यह मानते हैं कि रोजगार निर्माण के परम्परागत स्त्रोतों की ओर भी लौटना चाहिये, उन्हें यह प्रयास करने की आवश्यकता है कि एसी कलाकृतियों को बाजार भी उपलब्ध हो। यदि इन कलाकारों को उनके श्रम का वास्वविक मूल्य तथा जीवन यापन योग्य समुचित आय प्राप्त होने लगेगी तो यकीन मानिये बस्तर की यह पारम्परिक कला विश्वमानचित्र पर अपना महत्वपूर्ण दखल रख सकती है। बस्तर में बदलाव के बीज यहीं मौजूद हैं केवल उन्हें सही खाद-पानी और रोशनी प्रदान करना है हमें। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Thursday, September 19, 2013

एक था चेन्द्रू



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चेन्द्रू नहीं रहा। चेन्द्रू जब था तब भी उसके होने से किसी को बहुत फर्क नहीं था। बहुत से गुमनाम नायकों की कतार में एक वह भी था जिसने कभी जीवन में हॉलीवुड की चमक दमक देखी; लाईट. कैमरा और साउंड जैसे सम्मोहित करने वाले शब्दों के आगे वह कभी शेर से खेला तो कभी जंगल के उस स्वाभाविक जीवन को रुपहले पर्दे पर उतारने में सहायक बना जिसमे वह स्वयं जीता रहा था। वर्ष 1988-89 की बात है जब मैने पहली बार चेन्द्रू का नाम सुना था। पत्रकार मित्र केवलकृष्ण को कहीं से यह जानकारी प्राप्त हुई थी कि बस्तर में किसी आदिवासी बालक ने हॉलीवुड की फिल्म में काम किया था। इस सूत्र को पकड कर उसने बस्तर के प्रख्यात रिसर्चर इकबाल से मुलाकात की और वहाँ से पहली बार उसे चेन्द्रू का पता मिला।   

चेन्द्रू होने के क्या मायने हैं? क्या केवलकृष्ण को जब इकबाल भाई ने पहली बार चेन्द्रू का पता बताया और वो उनसे अबूझमाड़ के प्रवेशद्वार पर अवस्थित गाँव ‘गढ-बंगाल’ में मिले तब क्या यह जानते थे कि जिस व्यक्ति पर अखबार के लिये न्यूज फीचर करने जा रहे हैं वह पूरे बस्तर के लिये विरासत है? चेन्द्रू निश्चित ही अमिताभ बच्चन नहीं है और इसलिये उसकी गुमनामी तय है लेकिन यह बताना आवश्यक है कि मोगली और टारजन जैसे काल्पनिक किरदारों की भीड में वह एक जीता जागता नायक था। यह ठीक है कि बात छप्पन साल पुरानी है और वर्ष 1957 में स्वीडिश फिल्मकार अर्न सक्सिडॉर्फ की फिल्म 'एन डीजंगलसागा' ('ए जंगल सागा' या 'ए जंगल टेल' अथवा अंगरेजी शीर्षक 'दि फ्लूट एंड दि एरो') का नायक था चेन्द्रू। फिल्म में वास्तविक शेर से किसी खिलौने सा खेलता हुआ चेन्द्रू अपने नायकत्व से अनेक जंगल आधारित सिनेकारों पर मुस्कुरा कर यह कहता अवश्य प्रतीत होता है कि “नक्कालों से सावधान!!”। 

सिनेकार के लिये चेन्द्रू महज एक किरदार ही तो था जिसकी इतिश्री फिल्म के बनते ही हो गयी। इसके बाद फिल्म की एक डिस्क-प्रति, सिनेकार की हस्ताक्षरित एक किताब जो चेन्द्रू के कार्यों और उसकी अद्भुत तस्वीरों का प्रस्तुतिकरण भर थी, को थमा कर उसने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की कि उसका ‘बस्तरिया माडिया नायक’ आगे किस हाल में रहा और कैसा जीवन जीता रहा। यद्यपि यह जानकारी मिलती है कि दस वर्ष के चेन्द्रू को तब फिल्मकार अर्न सक्स डॉर्फ गोद भी लेना चाहते थे किंतु उनका अपनी पत्नी से तलाक होने के पश्चात यह संभव न हो सका। हर नायक ताउम्र चमक-दमक मे नहीं रहता; बहुत से सुपरस्टार राजेशखन्ना बन जाते हैं और उम्र के आखिरी पडाव में दोयम दर्जे की छत्तीसगढी फिल्म में अभिनय करते दिखाई पडते हैं...कितने हैं जो फिर हल उठा लेते हैं; फिर अपनी लंगोट में आ जाते हैं; फिर अपनी झोपडी को घर मानने लगते हैं और फिर अपने गाँव में अपने साथियों के साथ ताड़ी-लांदा से अलमस्त यह भूल पाते हैं कि जीवन में उन्होंने लाईट-कैमरा-एक्शन की चमत्कारी दुनिया भी देखी हुई है? 

केवल कृष्ण ने बताया था कि जब पहली बार चेन्द्रू से मिलने गढबंगाल पहुँचा तो वह किसी बीमार की झाड़-फूंक करने गया था। उसे चेन्द्रू को देख कर यकीन ही नहीं हुआ कि यही व्यक्ति एक हॉलीवुड फिल्म का नायक भी रह चुका है और इसी ने बस्तर के प्रतिनिधित्व को वैश्विक बनाया है। नायक भी कैसा, जो यह जानता ही नहीं कि उसके काम की अहमियत क्या थी? एक फटी-चिटी किताब जिसमे सिनेकार ने अपना हस्ताक्षर कर चेन्द्रू को हस्तगत किया था वस्तुत: वही प्रमाण के रूप में चेन्द्रू के पास उपलब्ध था। इस फटी-मुडी किताब में प्रकाशित चेन्द्रू की तस्वीरें देख कर किसी की भी आँखें फटी रह सकती थी। प्रश्न केवल अभिनय की स्वाभाविकता का नहीं है चूंकि चेन्द्रू पर तो वही फिल्माया जा रहा था जो उसका जीवन है, यहाँ से कई मुद्दे उभर कर आते हैं। स्वीडिश फिल्मकार ने चेन्द्रू का जीवन तो प्रस्तुत किया किंतु उसे पहचान नहीं दी। भारत में उन दिनो भी फिल्म का जुनून था और तब भी यह आवश्यकता नहीं समझी गयी कि स्वीडिश फिल्म ‘जंगल सागा’ या कि अंग्रेजी रूपांतरण 'दि फ्लूट एंड दि एरो' हिन्दी में ‘जंगल गाथा’ बन कर सामने आ पाती। हिन्दी में जंगल पर बनने वाले बदन-दिखाऊ और अश्लील टार्जनों के सामने एक आईना तो होता? जाने दीजिये हम न तब जागरूक थे और न अब हैं। न हमने चेन्द्रू की अहमियत तथा उसके कार्य की महत्ता तब समझी थी न आज ही उसे जानना चाहते हैं। 

बात उस केवल कृष्ण के न्यूज फीचर से ही करना चाहता हूँ जिसने चेन्द्रू से मेरा पहला परिचय करवाया था। उसने बताया था कि चेन्द्रू से बहुत स्वाभाविक रूप से अपनी विरासत अर्थात उसकी फिल्म पर प्रकाशित पुस्तक सौंप दी थी। जब वह पुस्तक लौटाने पुन: गढ-बंगाल पहुँचा तब चेन्द्रू घर पर नहीं था। घर के बाहर ही चन्द्रू की माँ मिल गयी जो अहाते को गोबर से लीपने में लगी हुई थी। बहुत देर तक चेन्द्रू की प्रतीक्षा करने के पश्चात भी जब वह नहीं लौटा तो केवल ने चेन्द्रू की माँ को ही अपने आने का प्रायोजन बताया। बहुत ही स्वाभाविक लेकिन कडुवा प्रश्न उस ग्रामीण महिला ने केवल के सामने रख दिया कि “तुम लोग तो ये खबर छाप के पैसा कमा लोगे? कुछ हमको भी दोगे?” आज भी यह सवाल कायम है। चेन्द्रू ने बस्तर को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी है, केवल कृष्ण तथा आलोक पुतुल को एक दुर्लभ कहानी दी है, पत्रकार हेमंत पाणिग्राही को राज्यस्तरीय पुरस्कार दिलाया है...और मैने भी अपनी पुस्तक “बस्तर के जननायक” में उसकी कहानी को प्रस्तुत किया है। हम सभी बगले झांक सकते हैं क्योंकि यह सवाल कायम है कि चेन्द्रू को क्या मिला? 

पिछले एक माह से चेन्द्रू जिन्दगी और मौत की लडाई लड रहा था। उसका आधा शरीर पक्षाघात का शिकार हो गया था तथा वह कुछ भी बोल पाने अथवा किसी को भी पहचान पाने में असमर्थ था। मैं इस बार जगदलपुर केवल चेन्द्रू से मिलने के लिये गया था चूंकि मैं हर बार इस अपराधबोध के सामने खुद को खडा पाता हूँ कि आखिर चेन्द्रू को क्या मिला? मुझे अस्पताल में यह देख कर हार्दिक प्रसन्नता हुई थी कि बस्तर के ख्यातिनाम साहित्यकारों में गिने जाने वाले मित्र रुद्रनारायण पाणिग्राही चेन्द्रू की स्वयं आगे बढ कर खोज खबर रख रहे थे और चिकित्सकों और चेन्द्रू के परिजनो के बीच होने वाली भाषा-संवाद की समस्या को भी रह रह कर दूर कर रहे थे। मेरे लिये एक अद्भुत नायक की छवि को मरणासन्न देखना हृदयविदारक सा था। मैं जान गया था कि व्यवहारिक रूप से हमने अब चेन्द्रू को खो दिया है लेकिन जब तक सांसे हैं उसका हक बनता है कि वह सम्मान के साथ चिर निद्रा मे लीन हो। उसका हक बनता था कि उसके स्वास्थ्य की चिंता प्रशासन करे। उसका हक बनता था कि उस पर लिखा जाये और न केवल बस्तर अपितु पूरे छत्तीसगढ का ध्यान चेन्द्रू की ओर जाये; उसका हक बनता था कि जिस बस्तर को उसने सात समन्दर पार भी पहचान दी उसे उसकी अपनी मिट्टी भी सगर्व पहचाने। अपने आग्रह पर नारायणपुर में मुझे मित्र संजय महापात्रा के माध्यम से यह सूचना प्राप्त हुई कि आदिमजाति कल्याण मंत्री केदार कश्यप ने चेन्द्रू से मुलाकात की तथा उसका मुफ्त इलाज करने के निर्देश अस्पताल को दिये। 

आज चेन्द्रू हमारे बीच नहीं है। चेन्द्रू की उपलब्धियों पर गर्व करने का हक हम बस्तरियों को तभी होगा जब हम उसकी अहमियत को भी पहचान और सम्मान देंगे। चेन्द्रू को मिलने वाला सम्मान अनेक अबूझमाडियों के लिये वह प्रेरणा बन सकता है कि बारूद की गंध के बीच भी कोई फिर जंगल सागा की गुनगुनाहट बनना चाहे। अलविदा चेन्द्रू....।  
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वो सुबह हमीं से आयेगी


साहिर लुधियानवी ने गीत लिखा था “वह सुबह हमीं से आयेगी” और इस गीत की कुछ पंक्तियाँ बहुत खूबसूरत सपने को सार्थक करने का रास्ता दिखाती हैं – 

संसार के सारे मेहनतकश, खेतो से, मिलों से निकलेंगे
बेघर, बेदर, बेबस इन्सां, तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और खुशहाली के, फूलों से सजाई जायेगी
वो सुबह हमीं से आयेगी।

संभवत: फिल्म की मांग के अनुरूप साहिर ने गीत के मुखडे को बदल दिया – “वो सुबह कभी तो आयेगी”। यह गीत आज भी एक नया समाज बनाने और व्यवस्था में सुधार अथवा बदलाव देखने वालों की जुबां जुबां पर है। साहिर साहब ने अपने बदले हुए गीत में सपना तो दिया लेकिन समाधान हटा दिया कि “वो सुबह हमीं से आयेगी”। यही कारण है कि अपने अपने झंडों और नारों के साथ लोग आसमान ताकते दिखाई देते हैं कि काले मेघा आयेंगे, पानी बरसा जायेंगे कितु कोई भी अब खेत जोतने को तैयार नहीं। बस्तर एक एसी जगह है जहाँ साहिर का गीत “वो सुबह कभी तो आयेगी” नुक्कडों-नुक्कडों गाया गया है लेकिन इसे मुमकिन बनाने वाले लोग कौन हैं? 

नारायणपुर अबूझमाड के प्रवेशद्वार पर बसा नगर है। वस्तुत: अबूझमाड की जीवनधारा के साथ यह शहर कई मायनो में गुथा हुआ है। यही पर रामकृष्ण आश्रम भी मौजूद है जिसके प्रयासो से हर वर्ष अबूझमाड से अनेक शिक्षित और रोजगार में प्रशिक्षित युवक/युवतियाँ बाहर आ रहे हैं। वस्तुत: हर संस्था अपने बुनियादी रूप में एक इकाई होती है और आज मैं एक इकाई की ही चर्चा करना चाहता हूँ। बात पचास के दशक की है। रियासतकालीन बस्तर में राजकीय कर्मचारी श्री पूरनसिंह ठाकुर के पुत्र श्री राम सिंह ठाकुर आज बस्तर के सम्मानित साहित्यकारों, पत्रकारों, फोटोग्राफर आदि आदि में गिने जाते हैं। रामसिंह जी पचास के दशक में जब नारायणपुर में बसे तब इस नगर में बुनियादी सुविधा नगण्य थी। बस्तर, विशेषकर अबूझमाड उन दिनो भी विदेशियों की अभिरुचि का महत्वपूर्ण केन्द्र था। यहाँ कोई फोटोग्राफर नहीं था। संभव भी नहीं था चूंकि तब फोटोग्राफी कोई सस्ती अथवा साधारण तकनीक की विधा नहीं थी। कैमरा भी ले लिया और तस्वीर भी खींच ली लेकिन अब आप रोल को डेवलप कहाँ करेंगे? तब नारायणपुर से रायपुर पहुँच पाना ही एक बडा काम हुआ करता था। रामसिंह जी ने जगदलपुर के सिनेमाघरों मे फिल्म दिखाने का कार्य करते हुए प्रोजेक्टर के साथ कुछ समय बिताया था। केवल अनुभव ही से प्रकाश, फिल्म तथा उसके दृश्य बनने के सिद्धांत को उन्होंने समझ लिया था। कहते हैं कि किसी निश्चयी व्यक्ति को रास्ते के कांटे तो क्या खाई और पर्वत भी नहीं रोक पाते। श्री रामसिंह ठाकुर ने प्रयोग के तौर पर अपने खपरैल और मिट्टी के घर में ही एक डार्क रूम का निर्माण किया। छत की सूर्य से निर्धारित कोण और अवस्थिति माप कर खपरैल हटायी गयी और निश्चित मात्रा में ही रोशनी को कमरे के भीतर आने देने का मार्ग बनाया गया। इसके बाद फिल्म डेवलप करने के लिये लगने वाले फिक्शर्स और कलर्स के लिये भी कई एसे प्रयोग किये गये जिसे हम कभी कभी जुगाड टेक्नोलॉजी कह कर आज उपहास कर लेते हैं। फाईनल आउटपुट या कि फोटो जिस प्रिंटिंग पेपर में निकलनी है इसके बडे बडे रोल रामसिंह जी ने नारायणपुर में ला कर बाकायदा फोटोग्राफी के लिये स्टूडियो खोल लिया था। कहते हैं कि एक अमरेकी महिला फोटोग्राफर जिसे उसकी खीची हुई तस्वीरें कुछ बडे आकार में चाहिये थी उसे नारायणपुर में ही उस दौर में उपलब्ध हो गयीं तो बडे ही अविश्वास के साथ वह रामसिंह जी का डार्करूम देखने पहुँची। उस अमेरिकी महिला और उसके विदेशी साथियों की आँखें आश्चर्य और अविश्वास से खुली रह गयी थी कि बस्तर के नारायणपुर जैसे कस्बे में एसा स्टूडियो भी हो सकता था जहाँ जिस आकार की चाहो उस आकार की तस्वीर डेवलप कर प्रदान की जा सकती थी वह भी बिना बिजली और आधुनिक तकनीक की उपलब्धता के।

पिछले तीन दशकों से लाल-आतंकवाद और वर्तमान व्यवस्था के बीच आहिस्ता आहिस्ता पिसता हुआ अबूझमाड अपनी पहचान, जिजीविषा, संघर्ष करने की ताकत और मुस्कुराहट से महरूम होता जा रहा है। रामसिंह ठाकुर जैसे जुझारू व्यक्तित्व ने अपने परिवेश को जो देना था वह दे दिया है लेकिन क्या इससे बात आगे बढ सकी? इतना तो तय है कि नारायणपुर का समय बदला है और यहाँ अब बिजली भी है, मोबाईल भी आ पहुँचे हैं, इंटरनेट भी है और कदाचित डिशटीवी के कारण जगमगाती सपनीली दुनिया की झांकी भी है। नारायनपुर अवश्य बदल गया किंतु अबूझमाड वहीं का वहीं ठहरा हुआ है। रामसिंह ठाकुर जी से मुलाकात करने मैं नारायणपुर (4.09.2013) पहुँचा था और मेरे साथ हरिहर वैष्णव तथा कमल शुक्ला भी थे। वापस लौटने के क्षणों में उनके छोटे पुत्र राकेश सिंह ने आग्रह किया कि हम उनके स्टूडियो भी देखते चलें। राकेश ने अपने पिता की विरासत संभाल ली है और नारायणपुर में वे फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी को न केवल व्यवसाय अपितु कला के रूप मे भी आत्मसात किये हुए हैं। हाल ही में उन्होंने एक सर्वसुविधायुक्त स्टूडियो बनवाया है जिसका उद्घाटन अभी होना है। इसे देखने के पश्चात हम राकेश के कार्यस्थल पहुँचे। भीतर प्रवेश करते ही मैं ठिठक गया। एक लडकी एसएलआर कैमरा ले कर फोटो खीच रही थी और दो अन्य सर्वश्रंगार युक्त आदिवासी लडकियाँ सामने खडी हो कर अपनी तस्वीर खिंचवा रही थी। प्रथमदृष्टया यह सामान्य दृश्य ही प्रतीत हो रहा था जब तक कि राकेश ने नहीं बताया कि न केवल तस्वीर खिचवाने वाली अपितु खींचने वाली लडकी भी अबूझमाड की आदिवासी बाला है। एक क्षण के लिये मेरा रोम रोम रोमांचित हो उठा चूंकि मेरी कल्पना में रामसिंह ठाकुर जी का वही डार्करूम कौंध उठा जिसके भीतर सूरज की रोशनी एक निश्चित कोण से प्रवेश कर रही थी। यह उसी रोशनी से जगमगाता हुआ दृश्य है जिसमे बिना किसी नारे-झंडे के बदलाव लाने की ताकत है। यह अबूझमाड को मिली एक और दिशा है और इसका वर्तमान आपको चाहे जितना साधारण प्रतीत हो रहा हो, भविष्य की कल्पना कर तो देखिये। सोचिये एक दिन बदलेगा अबूझमाड, कल्पना कीजिये कि कैमरा थामे इस लडकी के पास क्रांति का वह बीज है जो उनके पास भी नहीं जिन्हें थमा दी गयी है बंदूख। यह एसा उत्तर है जिसे प्रश्न स्वयं हमारी अपनी व्यवस्था ने ही बनाया है। चलिये साहिर के ही सपनीले गीत पर लौटते हैं इस अभिप्राय के साथ कि अपने बस्तर में वो सुबह हमीं से आयेगी - 

फ़ाको की चिताओं पर जिस दिन, इन्सां न जलाये जायेंगे
सीनों के दहकते दोज़ख में, अरमां न जलाये जायेंगे
ये नरक से भी गन्दी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी

-राजीव रंजन प्रसाद
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Thursday, September 12, 2013

“डॉक्टर खान देवा - स्वीकार करो अंड़े”

सांध्य दैनिक "छत्तीसगढ" में दिनांक 12.09.2013 को प्रकाशित


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बहुत सी राजनीतियाँ हैं जो समाज पर छुरियाँ चलाती हैं और इसके हिस्से-हिस्से एक दूसरे के मुँह पर मल कर जश्न करती प्रतीत होती हैं। हम कैसे बुने गये यह आज महत्व का नहीं रहा जबकि हमें कैसे उधेडा जा सकता है यही सभी के चिंतन का विषय बना हुआ है। आस्तिकताओं के पंथ हैं तो नास्तिकता का अपना ही घमंड कि वही समाज में बदलाव के नये पन्ने लिखने के काबिल है। मुजफ्फरनगर में बह रहा खून और बस्तर में बह रहा लहू यह साम्यता तो दिखाता ही है कि रक्त केवल धार्मिक प्रतिद्वन्दिवता के कारण ही नहीं बहाया जाता अपितु नाहक और अकारण नास्तिकताओं ने भी झंडा थाम कर निर्दोषों पर ट्रिगर दबा दबा कर बहाया है। एसे में कभी कभी बुद्ध याद आते हैं। बुद्धत्व प्राप्ति के लिये सिद्धार्थ मगध जनपद के सैनिक सन्निवेश उरूबेला पहुँचे और निरंजना नदी के तट पर एक वृक्ष के नीचे कटोर तपस्या में लीन हो गये। छ: साल तक कठोर तपस्या लेकिन हाथ रीते? शरीर सूख कर काँटा हो चुका था और प्राण साथ छोडना चाहते थे। तभी जंगल में स्त्रियों का एक समूह गीत गाता हुआ गुजरा जिसके निहितार्थ थे कि वीणा के तार को इतना भी नहीं कसना चाहिये कि वह टूट जाये और इतना ढीला भी नहीं छोडना चाहिये कि उससे कोई आवाज़ ही न निकल सके। बस इसी क्षण बुद्ध को मध्यममार्ग का बोध हुआ। बुद्ध ने एक महिला सुजाता के हाथ खीर ग्रहण कर अपना उपवास तोड दिया और शरीर को तपाने की जगह सत्यबोध में जुट गये। यही मर्म हर नाविक जानता है कि समंदर तक नौका को खेना है तो धार के साथ चलना होगा यदि उद्गम तक पहुँचना है तो धार के विपरीत चलना होगा किंतु किसी भी स्थिति में किनारों की छीना झपटी का कोई निहितार्थ नहीं। 

यह भूमिका लम्बी प्रतीत हो सकती है लेकिन असहिष्णु हो चुके वर्तमान परिवेश को आईना अवश्य दिखाती है। मैं बस्तर से संबंधित एक घटना पर चर्चा को ले जाना चाहता हूँ जो घुलने मिलने वाले समाज, सहिष्णु परिवेश और अनुकरणीय परिस्थिति का अनूठा उदाहरण है। बात बस्तर के प्रवेशद्वार कांकेर से कुछ दूर घाटियों में अवस्थित केशकाल कस्बे की है। मैं पत्रकार मित्र कमल शुक्ला के साथ केशकाल पहुँचा और यहाँ कृष्ण दत्त उपाध्याय जी से मेरी मुलाकात हुई। केशकाल में मेरी रुचि आंगाओ (आदिवासी देव स्वरूपों) को ले कर थी। केशकाल निवासी श्री कृष्ण दत्त उपाध्याय ने स्थानीय देवी-देवताओं एवं आदिवासी परम्पराओं पर महत्वपूर्ण कार्य किया है वे मेरे गाईड बने और हम नगर परिसर से दूर वन परिधि के प्रारंभ होने की अवस्थिति में उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भंगाराम देवी का मंदिर बना हुआ है। असाधारण शक्तिशाली देवी हैं भंगाराम और यदि उनकी प्रतिमा को ध्यान से देखा जाये तो इसकी निर्मिति में दक्षिण का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। खपरैल की कुटिया सदृश्य मंदिर जिसके सामने एक प्राचीन काष्ठ स्तम्भ गडा हुआ था जिसके आगे साल-दर-साल होने वाली भादो जात्रा में गाडे जाने वाले सैंकडो लौह त्रिशूल गडे हुए थे। हम पोला त्यौहार के दिन यहाँ पहुँचे थे। मंदिर प्रांगण में केवल दो आदिवासी पुजारी ही मौजूद थे और पूरी तन्यमता से भंगाराम देवी के लिये भोग बना रहे थे। भोग के लिये चावल को पीस लिया गया था जिसमें मीठा और तैलीय पदार्थ मिला कर अब उसे गूंथा जा रहा था। इसे छोटे छोटे गोलाकार में बदला जाना था जिसे तलने के पश्चात भोग स्वरूप देवी के आगे प्रस्तुत किया जाना था। इन पुजारियों की आस्था भी कितनी गैर दिखावटी है, वे जानते हैं कि आज किसी को मंदिर नहीं आना है लेकिन परम्परा कहती है कि आज देवी को विशिष्ठ भोग लगाया जाना है तो दोनो बियाबान में निर्मिप्त भाव से लगे हुए हैं। 

इस मंदिर और यहाँ से जुडी मान्यताओं पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन तभी मुझे एक पुजारी ने आवाज़ दे कर एक ओर बुलाया। वह मंदिर परिसर के दाहिनी ओर बने उन खुले कक्षों में अवस्थित देवी देवताओं के विषय में बताना चाहता था। कृष्ण दत्त उपाध्याय जी ने केशकाल का वासी होने के गर्व के साथ कहा कि यह स्थान साम्प्रदायिक सौहार्द का उदाहरण है तो मैं चौंक गया। बस्तर में आस्तिकों और नास्तिकों की खूनी साम्प्रदायिकता तो जाहिर है और उसपर पूरी दुनिया की निगाह गडी हुई है लेकिन इससे इतर क्या? अब पुजारी ने मेरा ध्यान खींचा और एक पाषाण प्रतिमा की ओर इशारा कर बताया कि “ये डॉक्टर खान देव हैं। मुसलमान देवता है।” 

पुजारी के दिये विवरण के हर शब्द ध्यान खींच रहे थे। मैने अपने मोबाईल का ऑडियो रिकॉर्डर ऑन किया और पुजारी के पास चला आया। मैने पूछा कि क्या यह प्रतिमा किसी डॉक्टर की है? क्या वे मुसलमान थे? वे देवता कैसे बन गये? उत्तर भी आश्चर्यचकित कर देने वाला था। जो मैं समझ सका उसके अनुसार अतीत में कभी बस्तर क्षेत्र में हैजा महामारी की तरह फैल गया था। तब इन क्षेत्रों में बचाव के लिये राजा और ब्रिटिश सरकार द्वारा चिकित्सकों की नियुक्ति की गयी थी। इन्ही में से एक चिकित्सक रहे होंगे जिनका पूरा नाम तो ग्रामीणों को याद नहीं किंतु घटना को कई पीढिया गुजर जाने के बाद आज भी इतनी जानकारी शेष है कि वे डॉक्टर कोई खान थे और मुसलमान थे। कहते हैं कि डॉक्टर खान ने अपनी मेधा और ज्ञान को इन आदिवासियों का जीवन बचाने के लिये समर्पित कर दिया। पुजारी के विवरण के अनुसार डॉ. खान के छडी घुमाने से महामारी गाँव छोड कर भाग रही थी। बारीकी से समझने की कोशिश करता हूँ तो लगता है कि डॉ. खान ने तब स्वयं को महाज्ञानी मान कर अपकी चिकित्सकीय पेटी खोलने के स्थान पर प्रचलित धार्मिक मान्यताओं, सिरहाओं और ओझाओं के माध्यम से लोगों को अपनी दवाईयों के साथ जोडा होगा। देवी का आदेश ग्रामीणों को चिकित्सक तक खीच लाया होगा और डॉ. खान ने ज्ञान और परम्परा को साथ जोड कर उपचार का सर्वमान्य रास्ता निकाल लिया होगा और इससे उन्हे महामारी से लडने में सहायता मिली होगी। उपलब्ध जनश्रुति कहती है कि महामारी से लडते हुए स्वयं इस बीमारी का डॉ. खान शिकार हो गये और अपना दम तोड दिया। 

यहाँ तक तो एक संघर्षशील इंसान की कहानी है लेकिन इसके पश्चात एक प्रेरक और अनुकरणीय उदाहरण देखने को मिलता है। जन-मान्यता है कि देवी भंगाराम इस मुसलमान चिकित्सक से बेहद प्रसन्न थी जो उसकी आज्ञा से उसके ही भक्तों को महामारी से बचा रहा था। इस मुसलमान चिकित्सक की मौत होते ही देवी ने आज्ञा दी कि डॉ. खान हमेशा ही उनके सहयोगी रहेंगे और ‘डाक्टर खान देवा’ बन कर उनसे साथ काम करते रहेंगे। आज इस घटना को सैंकडो साल बीत गये लेकिन डॉ. खान आज भी जन मान्यताओं में जीवित हैं। देवी भंगाराम की आज्ञा से उनका एक पाषाण बुत स्थापित किया गया है। आज भी केशकाल और इसके आसपास अवस्थित क्षेत्रों में किसी भी तरह की बीमारी फैलने पर उसकी चिकित्सा का दायित्व डॉक्टर खान देवा पर ही है। डॉ. खान देवा को विधिवत अंडे तथा नीबू चढाया जाता है और देवी के सहयोगी के रूप में आज भी भरपूर सम्मान प्रदान किया जाता है। पुजारी सगर्व बताता है कि ये मुसलमान देवा हैं जो हमें व्याधि-बीमारियों से बचा कर रखते हैं। 

साम्प्रदायिकता क्यों है इसपर बहस बेमानी है, आस्था क्या है इस पर भी कई बैद्धिजीविक थ्योरी बाजार से खरीदी जा सकती है; लेकिन डॉक्टर खान देवा हर सवाल का खामोश उत्तर हैं। बुतपरस्ती के खिलाफ खडे धर्म के मानने वाले डॉ. खान आज आदिवासी समाज द्वारा स्वयं एक बुत बना दिये गये हैं। यही नहीं पूरी आस्था और सम्मान के साथ वे सिन्दूर से भी पोते जाते हैं, अगरबत्तियाँ उनके गिर्द खोंची जाती हैं, वे अंडा भोग के रूप में स्वीकार करते हैं। वे आज भी अपनी इस बेमिसाल उपस्थिति से आदिवासी समाज को एक मनोवैज्ञानिक ढाढस दिये रखते हैं कि कोई महामारी उनके रहते इस क्षेत्र को छू भी नहीं सकती। तो मुझसे मार्क्स लाख कहे कि धर्म अफीम है लेकिन मैं हजार बार डॉ. खान के इस बुत के आगे नत-मस्तक होने के लिये तैयार हूँ जिनकी मौन उपस्थिति आज भी सार्थक है। आदिवासी समाज अपनी धार्मिक मान्यताओं को तर्क के साथ स्वीकार करता है। इसी भंगाराम मंदिर के पीछे वह स्थल भी है जहाँ देवी देवताओं के खिलाफ उसके भक्त शिकायत प्रस्तुत करते हैं। यहाँ देवी देवताओं को दंडित करने, उन्हें कैद करने, यहाँ तक कि उन्हें नष्ट करने तक का विधान है और यह सब कुछ इसलिये कि एसे देवताओं का क्या लाभ जो उसे मानने वालों के अनुरूप नहीं, जिसमे उसे मानने वालों को व्याधियों से मुक्त कराने का सम्बल नहीं और जिसके पास उसपर भरोसा रखने वालों के प्रश्नो के उत्तर नहीं। यह एक लम्बा विषय है अत: पुन: डॉ. खान देवा पर लौटते हैं। साम्प्रदायिकता के खिलाफ सोच तभी पैदा हो सकती है जब डॉ. खान देवा जैसे सच मुख्यधारा कहे जाने वाले विचारकेन्द्रों तक पहुँचें और चर्चा का कारण बनें। ये कहानियाँ केवल अचरज से सुने जाने के लिये न हों अपितु पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनें जिससे कि हर छात्र यह जान सके कि किसी भंगाराम देवी के मुसलमान सहायक देवता भी हो सकते हैं अर्थात देवता होना किसी चमत्कार पर नहीं, किसी धर्म विशेष की मिल्कियत नहीं अपितु परोपकार पर निर्भर करता है। हर वह व्यक्ति जो अपने समाज के लिये समर्पण के साथ जुटता है और जूझता है वह देवता बना दिया जाता है और कृतज्ञतायें उसे हर काल में जीवित रखती हैं। 

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