Wednesday, November 06, 2013

बस्तर के मृतक स्मृति स्मारक इतिहास और कला की दुर्लभ युति हैं।


एक मृत्यु गीत (हनाल पाटा) की दार्शनिकता ने मुझे अपनी ओर खींचा। शब्द थे - “अब तुम मर चुके हो; अब हम तुम्हारी सम्पत्ति खुशी खुशी मिल कर खा जायेंगे”“”। इस गीत का मर्म जीवन की निस्सारता की ओर ही इशारा करता है। बस्तर की मान्यताओं में आत्मा का अस्तित्व है और पुनर्जन्म तथा मोक्ष की अवधारणायें भी हैं। इससे अधिक महत्वपूर्ण कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की पहचान को जीवित रखा जाता है, उसकी स्मृतियों को कलात्मकता के साथ सजो कर रखा जाता है। बस्तर में स्मृति स्मारक बनाने की परम्परा है जिसे ध्यान से देखने पर आप मृतक के व्यक्तित्व का अपने मन मे खाका खीच सकते हैं। यह एक व्यक्ति के इतिहास को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की परम्परा है। बस्तर दुनिया के उन गिने चुने क्षेत्रों में से एक है जहाँ महापाषाण सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष आज भी सुरक्षित है। महापाषाण सभ्यता की पहचान है कि वहाँ मृतकों को अथवा उनके अवशेषों को पत्थर की बड़ी बड़ी शिलाओं को खड़ा कर के उनके मध्य अकेले अथवा सामूहिक रूप से दफनाया जाता था। महापाषाण शब्द मेगालिथ शब्द का हिन्दी रूपांतर है; यूनानी भाषा में मेगास का अर्थ है ‘विशाल’ और लिथोज का अर्थ है ‘पाषाण’। महापाषाण परम्परा बस्तर में किसी न किसी रूप में वर्तमान में भी सांस ले रही है; अत: इस निष्कर्ष पर पहुँचना गलत नहीं कि मृतक स्मारकों के माध्यम से आदिवासी समाज ने अपने इतिहास को सुरक्षित रखा है। 

बस्तर के मृतक स्तम्भ यहाँ के आम जनमानस की समाधियाँ हैं। कई तरह की समाधियाँ बनाने का चलन महापाषाण सभ्यता के विभिन्न स्थलों में देखा गया है। जिनमें प्रमुख हैं – “कैर्न समाधियाँ” जिसमे पत्थरों को गोल चक्र में बिछा कर इस घेराव के अंदर गड्ढा खोद कर उसमे शव रख मिट्टी से ढक दिया जाता था। तत्पश्चात उपर से पत्थर भर दिये जाते थे। “डोलमेन समाधियाँ” आयताकार मेज आकृति की समाधियाँ होती हैं अर्थात इसमे भूमि शिला खण्ड रख कर उसपर शव तथा अन्य सामग्रियाँ रखते हैं। इसके बाद चारो तरफ सपाट शिलाओं को खडा कर दिया जाता है। इसके पश्चात समाधि को उपर से एकाधिक शिलाओं द्वारा ढक दिया जाता है। “छत्र शिला” अर्थात चार प्रस्तर खण्डों को खड़ा गाड़ कर उसके उपर एक गोलाकार प्रस्तर खण्ड रखा जाता है इससे यह मृतक स्मारक किसी छत्र की तरह दिखाई देता है। “फन शिला” के निर्माण के लिये एक खोदे हुए गड्ढे में शव और अन्य सामग्री रख कर मिट्टी से ढकने के उपरांत उसके उपर गोलाकार पत्थर रख दिया जाता है। यह गोलाकार पत्थर सर्प के फन के समान दिखाई पड़ता है। “गुफा समाधियाँ” वस्तुत: पहाड़ों की चट्टानों को आयताकार अथवा वर्गाकार काट कर निर्मित की जाती हैं। “मेनहीर” प्रकार में मृतक की अंतिम क्रिया के पश्चात उस स्थल पर एक खड़ा पत्थर लगा दिया जाता है। ये पत्थर डेढ मीटर से पाँच मीटर तक लम्बे हो सकते हैं। बस्तर में मेनहीर समाधियाँ प्रमुखता से पायी जाती हैं तथा इसका विस्तार कांकेर से कोण्टा तक सर्वत्र देखा जा सकता है। बस्तर पर उपलब्ध प्राचीनतम संदर्भ ग्रंथ बस्तर भूषण में केदार नाथ ठाकुर ने मेनहीर समाधियों का उल्लेख करते हुए लिखा है – “महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई बुड्ढा मर जाने पर रास्ते के किनारे यादगार के लिये ऊँचा पत्थर गाड़ देते हैं। ये पत्थर तीन हाथ से ले कर पंद्रह पंद्रह हाथ तक के हो सकते हैं। रास्ते चलते लोग इन पत्थरों पर तम्बाकू डालते जाते हैं”। दक्षिण बस्तर में मृतक समाधियों के प्रकारों की विविधता दृष्टिगोचर होती है तथा कैर्न समाधियाँ और डोलमेन समाधियाँ भी अच्छी मात्रा में देखी जा सकती हैं। आमतौर पर ये समाधियाँ लम्बी लम्बी कतारों में पहाडी ढलानो पर, खेतों से अलग, सड़क के किनारे, घाटी में, तालाब के किनारे, गाँव की सीमा के पास और कभी कभी गाँव के भीतर भी स्थित होती हैं। दंतेवाड़ा-बीजापुर क्षेत्रों के माडिया मृतक स्तम्भों को मुख्य मार्गों के किनारे लगाते हैं। दण्डामि माडिया, अबूझ माडिया, दोरला और मुरिया जनजातियाँ अभी भी अपनी मृतक स्मारक निर्माण संस्कृति को बचाये हुए हैं।

मेनहीर प्रकार के मृतक स्तम्भ चूंकि सर्वाधिक मात्रा में बस्तर संभाग में पाये जाते हैं हमें इसके प्राप्त प्रकारों पर भी विवेचना करनी आवश्यक है। मुख्य प्रकारों में उरूसकल, बीत और खम्ब चलन में हैं। “उरुसकल” का गोण्डी में संधिविच्छेद कर अर्थ तलाशने की कोशिश की जाये तो उरूस अथवा उरसाना को दफनाना का पर्याय कहा जाता है जबकि कल का अर्थ है पत्थर; उरूसकल के स्थान पर कोटोकल शब्द भी चलन में मिलता है। उरूसकल आमतौर पर सीधा गाडा जाने वाला पत्थर होता है। मेनहीर लगाने की प्रक्रिया को कल उरसाना या पत्थर गाडना भी कहते हैं। उरूसकल प्रकार के मेनहीरों में समय के साथ प्रस्तर खण्डों के स्थान पर लकड़ी के नक्काशीदार खम्बे प्रयोग में आने लगे थे। “बीत” प्रकार के मेनहीर वस्तुत: छोटे छोटे पत्थरों का वर्गाकार ढेर होते हैं। “खम्ब” प्रकार के मेनहीर, लकडी के खम्बे (कभी कभी पत्थर के भी) होते हैं जिनके शीर्ष पर चिड़िया, जानवर या आदमी की आकृति उकेरी जाती है। मृतक स्मृति स्मारकों में आज अनेक प्रकार के बदलाव देखे जा रहे हैं तथा पत्थरों के स्थान पर सीमेंट, टाईल्स, संगमरमर आदि का भी प्रयोग होने लगा है किंतु परम्परागतता इन स्मारकों अथवा मठों का वास्तविक परिचय स्वत: ही करवा देती है; उदाहरण के लिये यदि सीमेंट के स्मृति स्तम्भ पर किसी तरह का कपड़ा लपेटा गया है तो उसे गायता (ग्राम प्रधान) के स्मारक के रूप में पहचाना जा सकता है। 

आमतौर पर स्त्री और पुरुषों के मृतक स्मृति स्तम्भ अलग अलग लगाये जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि किसी व्यक्ति की संदेहास्पद मृत्यु होती है तो उसका स्मारक अन्य उपस्थित मृतक स्तम्भों से दूर खडा किया जाता है। पत्थर गाडने की प्रक्रिया में मुख्य व सीधे खडे किये जाने वाले पत्थर नीचे एक छोटा और चपटा पत्थर जिसे दो अन्य पत्थरों से सहारा दिया गया होता है अवश्य लगाया जाता है। इन तीन पत्थरों को ‘हनाल गरया’ अर्थात आत्मा का सिंहासन कहते हैं। चूकि अब मृतक स्मृति स्तंभ लगाने की परम्परा टूटने और अपने स्वरूप में बदलने लगी है अत: वंश और गोत्र के हिसाब से पत्थरों को लाने के स्थान जैसी बाध्यतायें समाप्त होने लगी हैं। सामान्य तौर पर आदिवासी समाज अपने मृतक स्मारकों में प्रयोग करने के लिये पत्थर अथवा अपने देवताओं के लिये लकड़ी विशेष जंगलों और चिन्हित पहाड़ों से ही लाना पसंद करते हैं। वेरियर एल्विन से प्राप्त संदर्भ के अनुसार कोकोरी में नैतामी वंश के लोग चापा डोंगरी से और मरावी वंश के लोग महादेवडोंगरी से मृतक स्तम्भों के निर्माण के लिये पत्थर लाते थे। इसी तरह स्मृति स्तम्भों के आकार प्रकार को ले कर भी अलग अलग स्थानों में विविधतायें पायी गयी हैं। अंतागढ के पास अवस्थित मृतक स्मृति स्तम्भों के आकार आठ फीट तक उँचे हैं और चार फीट तक चौडे भी पाये गये हैं जबकि कोण्डागाँव के आसपास एक फुट से उँचे मेनहीर बमुशिक ही दिखाई पड़ते हैं। एक समय था जब सबसे विशालकाय स्मारक जिनमे बडे बडे पत्थर प्रयोग किये जाते थे, यह परम्परा झोरिया आदिवासियों में देखी जाती थी किंतु अब यह विलुप्त प्रथा है। जिस तेजी से आदिवासी समाज बदल रहा है तथा वंश विखर रहे हैं वे चिन्हित इलाको के देवताओं और जनजातियों की दावेदारी को भी मिटाते जा रहे हैं। 

यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि प्रचलित मान्यता कहती है अगर आत्मा अपने लिये की गयी व्यवस्था से प्रसन्न होती है तो मेनहीर (स्मृति पाषाण) का आकार बढ जायेगा। एक बच्चे के स्मारक में छोटा पत्थर लगाया जाता है; यह विश्वास किया जाता है कि अगले बीस वर्षों में यह पत्थर उतना ही बडा हो जायेगा जितना कि मृत शिशु युवा हो कर आकार लेता। इन मृतक स्मृति स्तम्भों से जोड कर व्यक्तियों, उनके वंश, गाँव और समाज के शगुन-अपशगुन भी देखे जाते हैं। किसी मृतक स्मारक की शिला का बढना एक शुभ शगुन माना जाता है। यदि स्मारक शिला गिर पड़े या टेढी हो जाये तो तुरंत ही मृतक के रिश्तेदार किसी गुनिया या सिरहा की सलाह लेते हैं और शांति के उपाय करते हैं चूंकि यह मान्यता है कि पत्थर तभी गिरता है जब मृतक की आत्मा क्रोधित या उपेक्षित महसूस कर रही हो। कई बार मृतक स्तम्भ के गिरने को गाँव में होने वाले अनिष्ट से भी जोड कर देखा जाता है। अगर सफेद चींटियाँ किसी स्मृति शिला के उपर बाबी बना लें तो यह अशुभ लक्षण है। एसा भी नहीं कि इन स्तभों पर सर्वदा निगाह रखी जाती है कहते हैं बीस वर्षों में मृतक या हनाल अपने पूर्वज में विलीन हो जाता है और उसका आत्मा के रूप में जीवन समाप्त हो जाता है; इसीलिये जब कोई पुराना पत्थर गिरता है तो उसपर ध्यान नहीं दिया जाता। 

बस्तर के मृतक स्मृति स्तंभ अपनी पुरातनता के लिये ही नहीं अपितु अंतर्निहित कलापक्ष के कारण भी विश्वप्रसिद्ध हैं। वर्तमान में मृतक स्मृति शिलाओं पर भित्तिचित्र उकेरने की परम्परा देखी गयी है जबकि लकडी के स्मृति स्तम्भों में नक्काशी कर उसे लगाने के अनेक प्राचीनतम अवशेष दक्षिण बस्तर में विभिन्न स्थानो पर देखे जा सकते हैं। कला अनायास ही पत्थरों-लकडी के स्मारकों के साथ समाहित नहीं हुई होगी अपितु गुफाओं में लिखने वाला मानव निश्चित ही पूर्वजों के स्मृति स्तम्भों पर आकृतियाँ अंकित करता रहा होगा। धूप और बारिश का आघात सहने वाले और निरंतर क्षरित होते रहने वाले खुले में खडे पत्थर गुफाचित्रों की भांति प्राकृतिक रंगो से बने चित्रों को सहेज नहीं सके। आज यही परम्परा इन पत्थरों में पेंटिंग कर के निभाई जा रही है। इन स्तम्भों में मृतक के प्रिय अस्त्र शस्त्र, हल-बैल, पशु-पक्षी, कीट पतंगों को उकेरा जाता है। उस व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष उसकी स्मृति मे खडे किये जाने वाले पत्थर पर चित्रित कर दिया जाता है। वह कैसे रहता था, उसके क्या महत्वपूर्ण शिकार किये, गाँव में वह कितने महत्व का व्यक्ति था आदि इन चित्रों में उकेर दिये जाते हैं। स्मृति स्तम्भ बनाने वाले कलाकार लोक जीवन में शामिल चिन्हों और प्रतीकों को अपने चित्रों में शामिल करते हैं। यह सही है कि कंकरीट के स्मृति स्तम्भ अब बहुत बडी संख्या में लगाये जा रहे हैं जिन्हें रंगा जाता है, चित्रित किया जाता है एवं उनके शीर्ष पर काष्ठ से पशु अथवा पक्षियों की आकृति लगा दी जाती है। यदि इन स्मृति शिलाओं मे उकेरे गये परम्परागत चित्रों के देखा जाये तो एक शिला में कई भागों में चित्र उकेरे जाते हैं और हर हिस्सा अलग अलग अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। अनेको बार चित्र उसके समय का प्रतिनिधित्व नहीं करते जैसे कि हाथी और घोडे आज का बस्तर नहीं हैं फिर भी व्यक्ति की प्रधानता अथवा महत्ता दर्शाने के लिये चित्रित किये जा रहे हैं। अन्य पशुपक्षियों में शेर, हिरण बतख, केकडे, सांप, उल्लू आदि प्रमुखता से मृतक स्मृति स्तंभों पर अंकित किये जा रहे हैं। अनेक बार उकेरे गये समानुवर्ती अथवा भांति भांति के ज्यामितिक आकार ध्यान खींचते हैं। सल्फी के पेड का यदा कदा चित्रण तो मिलता है किंतु पेड पौधों का बहुत अधिक चित्रण इन स्मृति शिलाओं में नहीं पाया जाता, इसके कारणों की विवेचना होनी चाहिये। यदि मृतक स्तम्भ काष्ठ निर्मित है तो उसकी भव्यता अतुलनीय होती है। प्राय: काष्ठ स्तंभ चौडाई में चौकोर आकृति के होते हैं जबकि लम्बाई दो से पाँच फुट तक होती है। कुछ पुराने काष्ठ स्तभ विशालकाय भी पाये गये हैं। इन काष्ठ स्तंभों के शीर्ष को आमतौर पर गोल आकृति में बनाया जाता है जिसके उपर यदा-कदा कोई मानव आकृति अथवा चारो दिशाओं में कोई पशु अथवा पक्षी आकृति अलग से लगा दी जाती है। काष्ठ स्तंभ में नीचे से उपर तक विभिन्न स्तरों और अनेक भांति की आकृतियाँ उकेर दी जाती हैं। मानव आकृतियों में गौर सींग लगाये हुए दण्डामि माडिया नर मुख्य रूप से बनाये जाते हैं। आदिवासी नृत्य भी उकेरे जाने वाली रचनाओं में प्रमुख हैं। काष्ठ निर्मित मृतक स्तंभों में पाषाण स्मारकों की तरह रंग नहीं भरे जाते किंतु उनकी कलात्मकता और भव्यता हर किसी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित करती ही है। आज काष्ठ स्मृति स्तंभों का चलन न के बराबर हो गया है अत: जो भी शेष हैं उन्हें धरोहर की तरह संरक्षित किया जाना चाहिये।    
 
 बस्तर के आदिवासी जन्म से ले कर मृत्यु तक कलाधर्मी हैं; वे धर्मभीरू भी हैं और दार्शनिक भी। इन मृतक स्मारकों को लगाने के दौरान गाये जाने वाले मृत्यु गीत अर्थात हनाल पाटा वस्तुत: आदिवासी धर्म, उनके मृत्यु और आत्मा विषयक दर्शन की प्रस्तुति है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बस्तर के आदिवासी समाज से यह विरासत लुप्त होती जा रही है। अब न केवल शिला और काष्ठ के स्थान पर सीमेंट और ईंटों के स्मारक बनाये जाने लगे हैं अपितु संगमरमर तथा टाल्स का भी प्रयोग किया जाने लगा है। वंश के मृतक स्मारकों को एक स्थान पर लगाये जाने वाली परम्परा में भी बदलाव देखे जा रहे हैं एवं अब इसकी अनिवार्यता न होने की बात मुझे कई स्थानों पर आदिवासी प्रतिनिधियों ने बताई। यद्यपि आदिवासी समाज के प्रतिष्टित व्यक्तियों के मृतक स्मारक आपको अब भी परम्परागत एवं निर्दिष्ट स्थानों पर मिलेगें उदाहरण के लिये फरसपाल में आदिवासी नेता महेन्द्र कर्मा और उनके परिवार के सामूहिक मठ (स्मारक) देखे जा सकते हैं। 
इसी तरह स्मारकों में अंकित किये जाने वाले चित्रों में भी बदलाव हुए हैं; अब इनमे ट्रक, जीप, मोटरसाईकिल आदि देखने को मिल रही हैं। उत्तर बस्तर में मृतक स्मारकों के स्वरूप भी बदल रहे हैं और भिन्न भिन्न आकृतियाँ बनाई जा रही है जैसे मकान, जीप, मोटरसाईकल में सवार युवक आदि। दक्षिण बस्तर में भी मैने एक स्मारक एसा देखा जिसमे व्यक्ति का चेहरा ही मठ के रूप में बनवा कर स्थापित करवा दिया गया है। माओवादी हिंसा से जूझते इस अंचल में संघर्ष के प्रतीक भी स्मारक चित्रों में देखे जा रहे हैं उदाहरण के लिये मैने बंदूखें भी चित्रित देखीं और हेलीकॉप्टर भी। 
माओवाद ने भी बस्तर की इस संरक्षित की जाने वाली परम्परा को गहरा धक्का पहुँचाया है। यह ध्यान देने योग्य सत्य है कि माओवाद के नाम पर माड क्षेत्र में जारी युद्ध में मारे जाने वाले अधिकतम लोग माडिया ही हैं क्योंकि उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में खडा किया गया है। मारे जाने के बाद उनके अंतिम कर्म तो परम्परागत हों भले ही बंदूख वालों को ईश्वर पर आस्था नहीं तथापि इतिहास पर तो होनी चाहिये? लाल रंग के जिन स्तूपों का निर्माण मृतकों की स्मृतियों को जिन्दा रखने के बहाने इन दिनों देखने में आ रहा है वे प्राचीन काल में बनाये जाने वाले युद्ध स्तंभों जैसे हैं इनका आदिम परम्पराओं से कोई लेना देना नहीं है।

- राजीव रंजन प्रसाद
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Friday, November 01, 2013

बस्तर के आदिवासी जानते हैं अपने वोट की कीमत


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[बस्तर में विधान सभा चुनाव के इतिहास पर विशेष आलेख]

छत्तीसगढ राज्य के स्पष्ट भैगोलिक विभाजन क्षेत्र बस्तर की अपनी पहचान तथा राजनीतिक समझ रही है। हाल के दिनो में दिल्ली के बड़े बड़े अखबारों ने बस्तर के पिछडेपन और अबूझियत पर पन्ने काले किये हैं, एक दृश्य उभारा गया है जिसके अनुसार इस क्षेत्र की आदिवासी जनता राजनैतिक समझ नहीं रखती। अब फिर चुनाव सामने हैं और बस्तर ही छत्तीसगढ की राजनीति के केन्द्र में अवस्थित है। रायपुर में वही अपनी सरकार का दावा प्रस्तुत कर सकता है जिसने बस्तर को साध लिया। कोशिश करते हैं यह समझने की कि क्या बस्तर के आदिवासी अपने वोट की कीमत जानते हैं; अथवा दिल्ली के टेलीस्कोप की तस्वीर साफ साफ है? 

बस्तर के चुनावी संघर्षो पर बात करने से पूर्व मैं वर्ष 1957 से ले कर वर्ष 2008 तक के परिणामों पर एक वहंगम दृष्टि डालना चाहूंगा। मोटे तौर पर हमें राजनीतिक परिस्थितियो को तीन भागों में विभाजित करना होगा। पहला भाग आरंभ होता है जब स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ बस्तर और कांकेर रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ और वृहत बस्तर जिला अस्तित्व में आया। इस क्षेत्र की राजनीति को दोनो ही रियासतों के पूर्व शासक किसी न किसी तरह से प्रभावित करते रहे तथा 1957 से 1972 तक के चुनाव परिणामों में लोकतंत्र के शैशव काल का अस्त हो चुके राजतंत्र के साथ संघर्ष स्पष्ट देखा जा सकता है। बदलाव का समय अर्थात दूसरा भाग परिलक्षित होता है वर्ष 1977 के चुनाव परिणामों के साथ जो किसी न किसी तरह छत्तीसगढ राज्य की स्थापना तक राजनैतिक दशा दिशा को अपने नियंत्रण में बनाये रखता है। यह समझना भी आवश्यक है कि बस्तर और कांकर के राजपरिवारों का जैसे ही वर्चस्व समाप्त हुआ यह क्षेत्र नेतृत्व शून्यता के दौर से गुजरा। बस्तर की राजनीति का तीसरा भाग अर्थात छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ साथ माओवाद और सलवाजुडुम जैसी गतिविधियों ने बस्तर की राजनीति को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके बाद भी वाम दल पूरी तरह हाशिये पर चले गये और चुनावी नूराकुश्ती केवल दो दलों कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच ही सिमट कर रह गयी। किसी न किसी तौर पर माओवादी बस्तर की सभी बारह सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं परंतु यह भी सत्य है कि उनकी गतिविधियों का चरमकाल वर्ष-2003 और वर्ष-2008 के विधान सभा चुनाव का दौर था जबकि इन समयों में वाल दलों की उपस्थिति बस्तर से नगण्य हो गयी।

चुनावों की तीन अलग अलग परिस्थितियो का विवेचन करते हैं। मुझे यह लिखने में कत्तई संकोच नहीं कि बस्तर की आम जनता अत्यधिक जागरूक है तथा वह राजनैतिक समझ रखती है। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की अपनी ही सोच थी जिसमे कभी वे गहरे सामंतवादी प्रतीत होते थे तो कभी प्रखर बुद्धिजीवी। बस्तर क्षेत्र में हुए पहले चुनाव में राष्ट्रीय भावना हावी थी किंतु उम्मीदवारों के चयन में प्रवीर फैक्टर का बडा असर रहा। यह सब कुछ प्रारंभ हुआ था जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी। 1957 में प्रवीर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजित हो कर विधानसभा पहुँचे; 1959 को उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप में प्रवीर धनपूँजी गाँव में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके तुरंत बाद फरवरी-1961 में “प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट” के तहत प्रवीर को गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से 12.02.1961 को प्रवीर के बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त कर दी गयी। यही परिस्थिति 1961 के कुख्यात काण्ड का कारण बनी जहाँ प्रवीर की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे आदिवासियों को घेर कर लौहण्डीगुडा में गोली चलाई गयी। बस्तर की जनता ने इस बात का लोकतांत्रिक जवाब दिया। फरवरी 1962 को कांकेर तथा बीजापुर को छोड पर सम्पूर्ण बस्तर में महाराजा पार्टी के निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे तथा यह तत्कालीन सरकार को प्रवीर का लोकतांत्रिक उत्तर था। इस चुनाव का एक और रोचक पक्ष है। कहते हैं कि राजनैतिक साजिश के तहत तत्कालीन जगदलपुर सीट को आरक्षित घोषित कर दिया गया जिससे कि प्रवीर बस्तर में स्वयं कहीं से भी चुनाव न लड़ सकें। उन्होंने कांकेर से पर्चा भरा और हार गये। कांकेर से वहाँ की रियासतकाल के भूतपूर्व महाराजा भानुप्रताप देव विजयी रहे थे। 

बस्तर जिले की सभी सीटों पर प्रवीर की जबरदस्त पकड के कारण राजनैतिक साजिशों के लम्बे दौर चले। अंतिम परिणति हुई 1966 में महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की उनके ही महल में गोलीबारी के दौरान नृशंस हत्या। इसके अगले ही वर्ष चुनाव हुए; बस्तर की जनता ने फिर जवाब दिया। कांकेर, चित्रकोट और कोण्टा सीट को छोड कर कॉग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। अंतत: राजनैतिक पासे बाबा बिहारी दास की आड़ में खेले गये। उस दौर में स्वयं को प्रवीर का अवतार घोषित कर बाबा बिहारीदास ने जबरदस्त ख्याति पूरे बस्तर में अर्जित कर ली थी अत: वर्ष 1972 का चुनाव भी प्रवीर फैक्टर के साथ ही लडा गया। बाबा बिहारी दास ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। लोकतांत्रिक बस्तर के इन आरंभिक चुनावों से यह ज्ञात होता है कि दौर एक एसे नायक का था जिसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। अपने जीवनकाल तथा मृत्यु के पश्चात के दो चुनावों तक उसने बस्तर संभाग की राजनीति को अपने अनुरूप बनाये रखा। एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी यह कि वर्ष 1967 के चुनावों में जनसंघ ने भी दो सीटे जीती थी और यही परिणाम उसने 1972 के चुनावों में भी दिखाया।  

तालिका – 1: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1957 – 1972 तक)


प्रवीर के अवसान के साथ ही बस्तर नायक विहीनता के अंधकार में जाता हुआ प्रतीत होता है। यदि बस्तर की आदिवासी जनता में चुनावी समझ नहीं होती तो वर्ष 1977 के चुनाव में क्षेत्रवार भिन्न भिन्न परिणाम आने चाहिये थे। यह बस्तर में संकर काल था जो व्यक्ति आधारित राजनीति से बाहर आ कर नयी दिशायें तलाश रहा था। अब आंचलिक समस्याओं के लिये मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य की राजधानी भोपाल तक बस्तरियो का पहुँचना वैसा ही था जितना कि दिल्ली दूर थी। इसी कारण क्या बस्तर देश की राजनीति से सीधे प्रभावित हो रहा था? 

आपातकाल के बाद चुनावों का दौर आया; बस्तर में भी विधानसभा के चुनाव होने थे। यह समय देश भर में  इन्दिरा गाँधी के विरोध का था। यह जनता पार्टी के उत्थान का काल भी था; कई विचारधाराओं और छोटे-बड़े दलों को जोड़कर यह पार्टी बनी थी। क्या बस्तर की आदिवासी जनता ने भी राष्ट्रीय राजनीति के नायक जयप्रकाश नारायण के साथ अपनी सहभागिता दर्शाई थी? वर्ष 1977 के चुनाव तो यही कहते हैं। कोण्डागाँव को छोड कर शेष बस्तर की सभी सीटे जनता पार्टी के हिस्से में आयी थीं। राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव वाले इस दौर में एनएमडीसी की आमद के साथ ही दंतेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में मजदूर राजनीति का उद्भव हुआ। जनता पार्टी से देशभर का मोह भंग हो चुका था और कॉग्रेस का नवोत्थान हो गया था। वर्ष 1980 के चुनाव परिणाम पहली बार बस्तर में खिचडी सिद्ध हुए। एक ओर नारायणपुर से जनता पार्टी का उम्मीदवार विजयी रहा तो कांकेर और कोण्टा से निर्दलीय प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई। पांच सीटें कॉग्रेस की झोली में गयीं जबकि तीन सीट भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में आयी। इस के साथ ही मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी की टिकट से महेन्द्र कर्मा ने दंतेवाडा सीट जीत ली थी। इस जीत के पीछे बैलाडिला लौह अयस्क परियोजना में कार्यरत कम्पनी एनएमडीसी की मजदूर यूनियनों का बहुत बडा योगदान था, साथ ही साथ वर्ष 1978 में हुआ किरन्दुल गोलीकाण्ड भी इस मजदूर बाहुल्य क्षेत्र में वामपंथ की जमीन तैयार करने में मुख्य सहयोगी बना। 

पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, इन्दिरागाँधी की राजनैतिक साख आगामी चुनाव में एक बार फिर दाँव पर थी। इसी बीच वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी जिसने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया था; 31 अक्टूबर 1984 को इन्दिरा गाँधी की हत्या कर दी गयी। वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में सहानुभूति की वह लहर चली कि बस्तर क्षेत्र में जनता पार्टी ने  वर्ष 1977 के चुनावों में जो करिश्मा कर दिखाया था वह कॉग्रेस ने दोहरा दिया। भानपुरी की विधानसभा सीट जो कि भारतीय जनता पार्टी ने जीती इसे छोड कर शेष सभी ग्यारह सीटों पर कॉग्रेस का कब्जा हो गया। कॉग्रेस ने बस्तर क्षेत्र में पहली बार एसा वर्चस्व कायम किया था। इन चुनावों के परिणामों से यह बात तो स्पष्ट है कि वृहद मध्यप्रदेश का भाग बस्तर क्षेत्र अपने राज्य का एसा उपेक्षित हिस्सा था जिसकी स्थानीयता ही चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती थी। आश्चर्य की बात यह कि 1977 से ले कर 1993 तक लगभग हर चुनाव परिणाम के पीछे किसी न किसी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की बडी घटना को देखा जा सकता है। 

इसके साथ ही यह बात इनकार करने योग्य नहीं है कि इन समयो में ही आन्ध्रप्रदेश से चल कर माओवाद ने बस्तर के अबूझमाड में अपने पैर रख दिये थे। यद्यपि वामपंथ की लोकतांत्रिक जमीन भी इसी दौर में फैली और मनीष कुंजाम जैसे जमीन से जुड कर संघर्ष करने वाले नेता लाल झंडे को दंतेवाड़ा के साथ साथ बस्तर के दक्षिणी छोर कोण्टा में भी फहराने में सफल हुए; वाम दलों के लिये सीटों की यह स्थिति वर्ष 1990 और 1993 के चुनावों में बनी रही। नब्बे के दशक में राम मंदिर आन्दोलन बहुत तेजी से देश भर को प्रभावित कर रहा था। आश्चर्य यह कि राष्ट्र की मुख्यधारा का यही मुद्दा बस्तर में भी वोटरों को प्रभावित कर रहा था। बलीराम कश्यप जैसे आदिवासी नेताओं ने बस्तर में भारतीय जनता पार्टी के लिये जमीन तैयार की और वर्ष 1990 के चुनाव में इस दल ने बारह में से आठ सीटो पर अपना कब्जा कर लिया। कॉग्रेस को केवल एक सीट हासिल हुई जबकि भानुप्रतापपुर से निर्दलीय उम्मीदवार झाडूराम रावटे ने जीत हासिल की। यह कहना होगा कि वर्ष 1972 और उसके बाद के चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत लगभग असंभव हो गयी थी यद्यपि इक्का-दुक्का प्रभावी अथवा बागी उम्मीदवार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे। आंकडे यह भी तस्दीक करते हैं कि वर्ष 1980 से ही बस्तर के विधानसभा चुनावों में मुख्य मुकाबला कॉग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच होने लगा था। वर्ष 1993, एक स्थिर राजनीति और लगभग मुद्दाविहीन चुनाव का दौर था। बस्तर में कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी ने पाँच पाँच सीटों पर जीत हासिल की जबकि दो सीटें भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के हिस्से गयीं। 
   
तालिका – 2: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1977 – 1993 तक)


छत्तीसगढ राज्य निर्माण के आश्वासनों के बीच वर्ष 1998 के चुनाव हुए। कॉग्रेस ने वर्ष 1985 के चुनाव परिणामों वाला अपना करिश्मा दोहरा दिया। भारतीय जनता पार्टी को केवल कांकेर सीट से ही संतोष करना पडा जबकि शेष सभी ग्यारह सीटे कॉग्रेस के हिस्से में गयीं। वायदों पर अमल हुआ और 1 नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश से पृथक हो कर छत्तीसगढ राज्य अस्तित्व में आया। राज्य बनने का परिणाम यह हुआ कि बस्तर की राजनीति में स्थानीय मुद्दों की पुन: जगह बनने लगी। छत्तीसगढ राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी बने जबकि विद्याचरण शुक्ल की ताजपोशी तय मानी जा रही थी। सतारूढ कांग्रेस पार्टी के बीच हो रही अनेक तरह की अंदरूनी खीचतानों के बीच अगला विधान सभा का चुनाव वर्ष 2003 में हुआ जिसमे भारतीय जनता पार्टी ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाते हुए नौ सीटों पर जीत हासिल कर ली, कॉग्रेस को केवल तीन सीटों से संतोष करना पडा जो कि दक्षिण बस्तर में अवस्थित थीं। 

राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। इस समय तक नक्सलवाद छत्तीसगढ में प्राथमिक समस्या बन कर उभर आया था; क्या इस कारण जमीनी वामपंथ की हत्या हो गयी? यह सवाल आगे और बढता है चूंकि वर्ष 2004 से 2006 के बीच की ही बात है जब कई माओवादी धड़े संगठित हुए। इसी दौरान आन्ध्रप्रदेश में भीषण दमनात्मक कार्यवाईयों के फलस्वरूप अपने काडर के अठारह सौ से भी अधिक कार्यकर्ताओं को माओवादियों ने खो दिया था। अत: यही समय बस्तर के प्रवेश करने तथा स्वयं को संरक्षित करने की दृष्टि से माओवादियों के लिये सबसे मुफीद था। इसी समय अबूझमाड़ माओवादी गतिविधियों का केन्द्रीय स्थल बना। यही वह समय है जब बस्तर में कई विकास परियोजनायें घोषित हुई। यही वह समय है जब सलवा जुडूम आरंभ हुआ। यही वह समय है जब सैंकडों राहत शिविरों में लाखों विस्थापित रहने लगे और गाँवों में सन्नाटों ने बस्तियाँ बसायीं। यही वह समय है जब सलवा जुडुम का जवाब देने के लिये माओवादियों ने ‘कोया भूमकाल मिलीशिया’ का गठन किया और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों के हजारों आदिवासियों को गृह युद्ध की आहूति बनाया। इस सभी हलचलों के बीच देश-विदेश का मीडिया, मानवाधिकार कार्यकर्ता और एनजीओ बस्तर में सक्रिय हुए। सलवाजुडुम को ले कर देश भर में सरकार विरोधी मुहिम चलाई गयी। नतीजा यह हुआ कि वर्ष-2006 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सलवा जुडुम को गैर-वैधानिक करार दिया गया। 

हालाकि समानांतर रूप से प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम जैसे उपाय ग्रामीण क्षेत्रों से जुडने के लिये तलाश लिये। वर्ष 2008 का विधान सभा चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी की बस्तर में सबसे बडी जीत का कारण बना। केवल कोण्टा की सीट जो कि कॉग्रेस के कवासी लकमा के हिस्से आयी थी को छोड कर शेष सभी ग्यारह सीटों में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई। इस जीत के कई प्रकार के विश्लेषण संभव है लेकिन स्पष्ट तौर पर नक्सली रणनीति और लोकतंत्र को धत्ता बताने के लाल-प्रयासों की पराजय के रूप में भी इसे देखना चाहिये। लोकतंत्र में अनेक खामियाँ है लेकिन वह आम जन का स्वीकार्य तंत्र भी है यदि एसा न होता तो बस्तर के चुनाव परिणाम के पैटर्न बिलकुल विपरीत होते। आदिवासी बस्तर ने झारखण्ड होने जैसी अदूरदर्शिता नहीं दिखाई तथा अपनी सरकार चुनने और बदलने का हक अपने पास रखा है। यही कारण है कि सभी राजनैतिक दल बस्तर की ओर अपेक्षा की निगाह से आज देख रहे हैं। 

तालिका – 3: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1998 – 2008 तक)


नया इतिहास बनने का द्वार बस खुलने को है। कई चुनावी सर्वेक्षण यह बता रहे हैं कि राज्य में कांटे का संघर्ष होगा तथा संभावना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही तीसरी बार भी सत्ता हासिल कर सकेगी। सर्वेक्षणों से इतर यदि देखा जाये तो हाल ही में माओवादियों ने मई 2013 को बस्तर की दरभा घाटी में कॉंग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर महेन्द्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे कद्दावर नेताओं की हत्या कर दी। महेन्द्र कर्मा इस चुनाव को बहुत गंभीरता से ले रहे थे तथा उनका व्यापक चुनाव प्रचार अभियान परिवर्तन यात्रा के बहुत पहले से ही आरंभ हो गया था। उनकी हत्या के पश्चात यह देखना आवश्यक है कि सहानुभूति की जो लहर दंतेवाडा-बीजापुर जैसे क्षेत्रों में विद्यमान है क्या वह कॉग्रेस के पक्ष में वोट बन पाती है? कोण्टा सीट कई सालों से कॉंग्रेस के पास ही है; कवासी लकमा पर उठ रही उंगलियों और मनीष कुंजाम की जबरदस्त सक्रियता के बीच यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कॉग्रेस अपनी यह परम्परागत सीट बचा पाती है? क्या बस्तर के माओवाद प्रभावित क्षेत्रो में ठीक तरीके से मतदान हो पाता है इसपर भी पार्टियों का भविष्य निर्भर करेगा। हालाकि भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जो बात जाती है वह है पिछले चुनावों में जीत का प्राप्त प्रतिशत को कि सवा ग्यारह के लगभग है। किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिये यह दूरी पाटना बड़े संघर्ष का कार्य है। बस्तर को ले कर कोई भी राजनीतिक दल यह गलतफहमी नहीं पाल सकता कि यहाँ के वोटर राजनैतिक पैतरेबाजी नहीं समझते, यही कारण है कि बस्तर किसी भी एक पार्टी का गढ बन कर नहीं रहा। नक्सलियों की धमकी, चुनाव आयोग की सक्रियता, पोलिंग स्टेशन पर वीडियोग्राफी, कडी सुरक्षा व्यवस्था आदि से संभव है बस्तर के अंदरूनी इलाकों में वोट के प्रतिशत में कमी आये; यह भी चुनाव परिणामों पर असर डालने वाला कारक है। अब चुनाव बहुत दूर नहीं किंतु अभी से कहा जा सकता है कि दिलचस्प होंगे छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव जिसमे बस्तर सरकार बनाने की निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है।   
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Thursday, October 31, 2013

माफी की माओवादी पॉलिटिक्स


पिछले पृष्ठ का शेष -


किसी भी आन्दोलन का एक तेवर होता है, विचार होते हैं, दशा-दिशा होती है तथा कार्यशैली होती है। आप “हिट एण्ड ट्रायल” प्रक्रिया के अनुरूप कार्य करते हुए स्वयं को व्यवस्था परिवर्तन का स्वयंभू ठेकेदार तो निरूपित कर सकते हैं किंतु कोई क्रांति पैदा नहीं कर सकते। बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों को अस्सी के दशक से आधार क्षेत्र बना कर बैठे माओवादी भले ही अपनी सोच और कार्यान्वयन के फासीवादी तरीकों को सही बताने के लिये कथित प्रगतिशील शब्द तलाश लेते हों किंतु जनता की सोच ने ही उन्हें आतक़ंकवादियों की श्रेणी में रखा है। अब बहस विचारधारा से कहीं उपर जा चुकी है, सही मायनों में देखा जाये तो गोली के विरुद्ध गोली का संघर्ष भर रह गया है। बेचारा आदिवासी तो जानता ही नही कि उसे किस बात की सजा मिल रही है? क्या इस बात की कि उसके निवास उन पर्वतों पर अवस्थित हैं जहाँ भांति भांति के अयस्क और प्राकृतिक संसाधन हैं अथवा इस बात की कि वे उन प्राकृतिक स्थितियों में रह रहे हैं जो शेष दुनिया के लिये रहस्यमय और अबूझ हैं; जहाँ समुचित जानकारी के बिना परिन्दे भी पर मारने के लिये सहज नहीं हैं? 

माओवाद पर नये सिरे से बहस दो कारणों से आवश्यक है। पहला कि लाल-आतंकवाद की राजधानी बस्तर वाले राज्य छत्तीसगढ में चुनाव सामने है एसे में राजनीतिक सक्रियताओं के भोंपू का जंगल में भी बजना तय है। दूसरा कारण यह कि आम चुनावों के मद्देनजर आया कमाण्डर रमन्ना का साक्षात्कार शैली में बयान नक्सली राजनीति की कई परतें खोल रहा है। माओवादियों की बेबसाईट पर दस अक्टूबर को जारी किया गया यह साक्षात्कार वस्तुत: विवेचना की भी मांग करता हैं कि उनके पास व्यवस्था बदलने की कोई ठोस रणनीति वास्तव में है भी अथवा नहीं? इस संदेह के बीज तो इस वर्ष दक्षिण बस्तर में हुई पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या के समय ही पड़ गये थे। विरोधी विचार की इस निर्ममता से हत्या की जा सकती है इस बात से सजग पत्रकारों ने जब नक्सलियों का अभूतपूर्व विरोध किया जब ताल ठोंक कर मुखबिरी साबित करने वाले लाल-विचारकों को अपने हाथ से तोते उडते महसूस हुए। स्थानीय पत्रकारों ने अदम्य और सराहनीय साहस का परिचय देते हुए नक्सलियों से सम्बन्धित समाचारों का बहिष्कार कर दिया तथा उनकी प्रेस-विज्ञप्तियों, सूचनाओं, वक्तव्यों आदि से आंख मूंद ली। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल में लाख मोर नाचता रहे उसे देखेगा-दिखायेगा कौन? कथित क्रांति धरी न रह जाये इस बात से सशंकित नक्सली झुके और पत्रकारों से सम्बन्ध साधा गया। जंगल में हुई इस प्रेसवार्ता में पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी मेंबर कमलु कुंजाम एवं महिला कमांण्डर ज्योति ने यह सफाई दी कि नेमीचन्द्र की हत्या उच्च कमीटी को अंधेरे में रख कर की गयी है। घटना की उच्चस्तरीय माओवादी नेताओं द्वारा जांच किये जाने तथा दोषियों को सजा दिये जाने की बात भी कही गयी थी। पत्रकार बंधुओं ने इस अपील का सकारात्मक उत्तर दिया और समाचार में पहले की तरह ही माओवादी पक्ष को भी जगह मिलने लगी। यद्यपि पत्रकारों ने दुबारा यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनसे साथी नेमीचन्द्र जैन के मामले में क्या कार्यवाई हुई, किस तरह जांच हुई, कौन लोग दंडित किये गये, क्या सजा हुई या कि उन्हें भी आश्वासन की वैसी ही टॉफी चुसाई गयी जैसी मुख्यधारा की व्यवस्था उन्हें थमाया करती है? 

नेमीचन्द्र जैन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते; इस बात की झलख मुझे रमन्ना के हालिया साक्षात्कार से मिलती है। रमन्ना कहता है कि “जब नेमिचंद  जैन की हत्या हुई थी, थोड़ी  भ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। इस घटना को किसने और किसके निर्णय पर अंजाम दिया यह पता लगाने में काफी देरी हो गई। बाद में यह स्पष्ट हो गया कि हमारी एक निचली कमेटी के गलत आंकलन और संकीर्णतावादी निर्णय के चलते यह दुखद घटना घटी थी। हमें इस पर बेहद अफसोस है। मैं हमारी स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से नेमिचंद के परिजनों और दोस्तों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता हूँ। हमारी पार्टी इस पर पहले ही सार्वजनिक रूप से क्षमायाचना चुकी है। इस घटना ने हमें फिर एक बार यह सिखा दिया कि हमारे कतारों में जनदिशा और वर्गदिशा पर शिक्षा का स्तर ऊपर उठाने की सख़्त जरूरत है। मैं मीडिया के जरिए फिर एक बार जनता  को  यह  आश्वासन देता  हूँ कि आने वाले दिनों में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने पाए, हम पूरी एहतियात बरतेंगे”। कोई भी विवेचनावादी मुझे बताये कि इस क्षमायाचना में ठोस बात क्या कही गयी है? किसे सजा दी गयी है? जांच में जब निचले कैडर की गलती सामने आयी तो उनका क्या हुआ? जिस बात पर जोर है वह यही कि परिजनो और मित्रों भूल हुई माफ करो। क्या इस माफी से सर्वहारा पत्रकार नेमीचन्द्र जैन पुन: जीवित हो उठेगा और अपनी माँ के गले लग कर कहेगा देखा, मैं न कहता था कि सब ठीक हो जायेगा? यह हास्यास्पद बयान उन स्थानीय पत्रकारों के गले कैसे उतरा यह तो मैं नहीं जानता जिन्होंने इस प्रकरण का मुखर विरोध किया, साथ ही वे आज भी इन्ही परिस्थितियों में काम कर रहे है? यहाँ छोटे और बडे पत्रकार वाला बारीक अंतर भी देखना चाहिये। बीबीसी के पत्रकार रहे शुभ्रांशु चौधरी पर धमकी वाले मामले में रमन्ना ने जिस तरह मक्खन मल मल कर सफाई दी है वह बात समझने योग्य है। शुभ्रांशु पर धमकी की आलोचना अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ ने की इसके बाद तो उनपर सम्मानित पत्रकार जैसे सम्बोधन के साथ चर्चा होनी ही थी। वो कोई बस्तरिया नेमीचन्द्र जैन थोडे ही हैं। विरोध करने का अधिकार केवल नक्सलियों और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघों को ही तो है बाकी तो हवा हवाई बाते ही मानिये।  

बात गहरी है इसलिये यहाँ से थोडा और आगे बढते हैं। झीरमघाटी हमले पर चादर पडने लगी थी फिर रमन्ना का बयान क्यों आया? इससे पहले बयान क्या है इसकी चर्चा कर लेते हैं। अपने साक्षात्कार में रमन्ना कहता है कि “दिनेश पटेल को मारना हमारी एक बड़ी गलती थी क्योंकि उन्होंने हमारी पार्टी या आन्दोलन के खिलाफ कभी कोई काम नहीं किया था। उनका कोई जनविरोधी रिकार्ड  नहीं रहा”। रमन्ना आगे कहता है कि “यह बात सही है कि उन्होंने दस साल पहले गृहमंत्री रहते हुए हमारे आंदोलन का दमन करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। लेकिन चूंकि पिछले दस सालों से प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से दूर है और व्यक्तिगत रूप से नंदकुमार पटेल हमारे आन्दोलन के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से आगे नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्हें नहीं मारना चाहिए था”। अब झीरम घाटी की घटना के तुरंत बाद आया गुडसाउसेंडी का बयान देखिये जहाँ वह कहता है कि “राज्य के पूर्व गृहमंत्री और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल जनता पर ‘दमनचक्र चलाने में आगे रहे थे यही कारण है कि उन्हे मारा गया। यानी कि रमन्ना का साक्षात्कार वस्तुत: एक ‘यू टर्न’ है। नंद कुमार पटेल से अधिक उनके बेटे को मारने के लिये माओवादियों पर उंगली उठाई गयी है। एसा क्यों है कि श्री पटेल के बेटे को मारे जाने की घटना और उसके कारणों को चतुराई के साथ इस साक्षात्कार में गोल कर दिया गया है? क्या यह एक नयी साजिश या नये राजनीतिक-लाल गठबंधन की ओर इशारा है? एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिये कि यदि पटेल दस सालों ने नक्सलवाद का विरोध नहीं कर रहे थे तो क्या विपक्ष में उनकी भूमिका नक्सल समर्थक की थी? एक और बात कि रमन्ना ने अपने बयान में कहीं भी विद्याचरण शुक्ल को मारे जाने पर बात नहीं की है। स्मरण रहना चाहिये कि गुडसा उसेंडी नें झिरमघाटी में उन पर हलमा करने को जस्टीफाई करते हुए बयान दिया था कि “''ये भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालय संभालने वाले वीसी शुक्ल भी जनता के दुश्मन हैं, जो साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और ज़मींदारों के वफ़ादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियाँ बनाने और लागू करने में सक्रिय रहे।'' अब क्या यह सच नहीं कि वीसी शुक्ल भी पिछले दस साल से छत्तीसगढ़ या केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका नहीं निभा रहे थे तो फिर उनके लिये माफी क्यों नहीं मांगी गयी? अब तक मांगी गयी माफियों को गहराई से समझते ही आप भी माओवादियों की तारीफ करेंगे कि जबरदस्त पॉलिटिक्स है तुम्हारी बॉस; तुमने तो खादी वालों के भी कान काट दिये। 

माओवाद को क्यों आन्दोलन कहा जाये अगर उसके कैडर का बरताबव हमारी पुलिस से जरा भी भिन्न नहीं? बात बात पर लाठी-गोली ही चलाना है और बाद में मुह छिपाते भी घूमना है कि “हमसे भूल हो गई, हमका माफी दई दो” तो फिर यह कथित जनता का संघर्ष एक बडे गुब्बारे जैसा नहीं जिसमें अब तक पिन नहीं मारी गयी है? सच बात तो यह है कि रमन्ना ने अपने साक्षात्कार में जो बाते कहीं है वह चुनाव में माओवादियों की अदृश्य भागीदारी वाला ही पक्ष है; बस यह साफ नहीं किया गया है कि उनका वरदहस्त किनकी पीठ पर है। सलवाजुडुम का कभी भी स्थानीय पत्रकारों ने समर्थन नहीं किया यही कारण है कि महेन्द्र कर्मा की हत्या पर माओवादियों से भी अधिक सवाल नहीं पूछे गये। इसी बात को रमन्ना के सुप्रीमकोर्ट वाले बयान की ढाल से भी जोडना चाहता हूँ। अगर रमन्ना मानते हैं कि सलवाजुडुम पर सुप्रीमकोर्ट नें प्रतिबन्ध लगा दिया इस लिये यह गलत था, तो मान्यवर आप तो एक प्रतिबन्धित संगठन ही हो; आप अपने संगठन के अस्तित्व को और इसकी विचारधारा को कैसे जस्टीफाई कर पाते हो? कथनाशय है कि जिन कारणों से सलवाजुडुम गलत था बिलकुल उन्हीं कारणों के लिये माओवादी संगठनों को भी गलत ठहराया जाता है। रमन्ना का यह साक्षात्कार कच्चा प्रतीत होता है जिसमे अपनी चमडी बचाने की कवायद अधिक दिखाई देती है। हास्यास्पद यह कि अगर रमन्ना जोर दे कर यह बताना चाहते हैं कि जैसे वोट देना लोकतांत्रिक अधिकार है वैसे वोट न देना भी, तो उन्हें यह संज्ञान में रखा चाहिये कि धीरे धीरे परिपक्व होते लोकतंत्र ने बिना आपके हस्तक्षेप के ही ईवीएम मशीन पर किसी को भी न चुनने का अधिकार दे दिया है। रमन्ना का यह साक्षात्कार केवल ‘हमारे खिलाफ सेना हटाओ’, ‘हमारा सर्च बंद करो’, ‘हमारे खिलाफ कानूनी प्रक्रियायें बंद करो पर ही केन्द्रित है’। सरकार का विरोध भी उसने इतनी कच्ची बुनियाद पर किया है कि टिकता नहीं। 

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Wednesday, October 30, 2013

गोदना कला में बस्तर की जनजातियों का परिचय छिपा है


बस्तर की स्त्रियाँ अपने श्रंग्रार में कलात्मकता को समुचित स्थान देती रही हैं वह चाहे उनके केशविन्यास का अनूठापन हो, बालों में खोंसी जा रही पड़िया पर उकेरी गयी रचनात्मकता हो अथवा उसके शरीर पर अंकित किये जाने वाले गोदने हों। आज गोदना विश्वप्रसिद्ध है, आधुनिक समाज में इसे टैटू का नाम मिला हुआ है। आधुनिकता समाविष्ठ होने के साथ ही गोदना चर्चित और प्रचारित तो हुआ किंतु उसकी कलात्मकता का बुनियादी आयाम अब खो गया है। गोदना कला का केनवास नारी का अपना शरीर होता है, उसमें अंकित होने वाले चित्र उसकी मनोभावना का परिचायक भी होते हैं और आजीवन उसके व्यक्तित्व के साथ जुड जाते हैं। एक मनमोहक आदिवासी गीत का अनुवाद है जहाँ गोदना करवा रही स्त्री अपनी पीड़ा को छिपाने के लिये गा रही है कि ओ रास्ते चलने वाले मेरे प्रेमी/ क्या तुझे मेरा गुदना दिखाई नहीं देता?/ देखो गुदने की पीड़ा से मेरी आँखें सलोनी हो गयी हैं/ क्या अब भी तुझे मेरा रूप नहीं भाता/ हे माँ हमारी प्रार्थना सुन लो/ तुमने वचन दिया था/ हे माँ पीडा हो रही है/ सूई की जलन मिटा दो.....। यह गीत गोदना प्रक्रिया में जो पीड़ा है वह तो प्रदर्शित करता ही है साथ ही साथ उस नवयुवती के मनोभावों को बताता है जो शरीर पर आजीवन रहने वाले श्रंगार को अंकित को अंकित करती हुई अपने प्रेमी को लुभाना भी चाहती है। बस्तर में घोटुल की मुटियारी का मुख्य आभूषण ही गुदना है। यहाँ लोक-मान्यता है कि गुदने के बिना जीवन का सौन्दर्य अधूरा रह जाता है। जो युवती लम्बे समय तक गुदना नहीं करवाती उसे समाज में बडी-बूढी महिलाओं के बीच लज्जित होना पडता है। किसी कारणवश शादी होने तक गोदना न हुआ हो तो लड़की के माता-पिता को इसका प्रायश्चित करना पड़ता है तथा इन्हें सगा खिलाने का दण्ड भुगतना होता है। गुदना स्थाई आभूषण माना जाता है और कहते हैं कि यह मृत्योपरांत भी शरीर पर रहता है; गुदना वस्तुत: आत्मा का आभूषण है तथा परमात्मा तक साथ ही जायेगा। अलौकिक मान्यता से इस लोक के मोहक सम्बन्धों पर यदि हम लौटें तो माना जाता है कि गुदवाने से प्रेमी युवक की दृष्टि हमेशा अपनी प्रेमिका पर रहती है। पीड़ा के पश्चात होने वाली आनंदानुभूति और प्रिय के प्रेम का अहसास गोदना करवा रही नवयुवतियों को होता है जिसकी अभिव्यक्ति करता एक गीत देखें कि इली ओझिल गोदलि बांहां/ इज्जत गेली मरजद गेली/घांडी दे महां रे; जिसका अर्थ है कि ओ गोदना करने वाली तू मेरी बाँह में मेरे प्रेमी का नाम लिख दे/ इससे सखियाँ और सगे-सम्बन्धी मेरी हँसी जरूर उडायेंगे/ लेकिन मेरे प्रिय मुझसे कभी भी छूट नहीं पायेंगे। नवयुवतियाँ सुन्दर और कलात्मक आकृतियाँ शरीर पर गुदवाना पसंद करती हैं चाहे इसके लिये शरीर को कितनी ही पीडा से गुजरना पडे। यह गीत देखें जिसमे मोटियारी गुदना हो जाने के पश्चात हो रहे दर्द से परेशान है और अंतत: देवी से प्रार्थना करती है कि पीडा समाप्त करो – अरजी बिनती हमार/उई दिनो बचन तुम्हार/सुजी का झारा उतार देउ/ उ, ऊ, इ, ई, मां!!!!उतार। 

गोदना को कला इसलिये कह रहा हूँ चूंकि आदिवासी जीवन की अपनी मौलिकता और कल्पनाशीलता इसमे झांकती है। बस्तर में तीस से अधिक जनजातियाँ अवस्थित हैं; गोदना हर किसी की परम्परा का हिस्सा है और उनकी एकता का साथी भी; साथ ही साथ उन्हें एक दूसरे से भिन्न पहचान प्रदान करने में भी यही गोदने सहायक होते हैं। दक्षिण बस्तर में बिन्दियाँ और आडी रेखायें मुख्य रूप से गोदना की आकृतियाँ बनती हैं। उदाहरण के लिये मस्तक के मध्य भाग में टीका, टीके के दोनो ओर सात सात खड़ी रेखायें; नाक पर भी खडी रेखायें तथा तीन तीन चार चार बिन्दियाँ। बाहों में, कलाईयों पर तथा हथेलियों के उपरी भाग पर भी बिन्दियों से श्रंगार। मुरिया लडकियों के माथे, ठोडी, बाहों और पैरों की पिंदलियों को गोदा जाता है। आम तौर चतुर्भुज, त्रिभुज, विषमकोण सम चतुर्भुज आकार में इनके शरीर पर गोदना किया जाता है। उत्तर बस्तर में छत्तीसगढी संस्कृति का प्रभाव भी गुदने में देखा जाता है जिस कारण माछी (मक्खी), बिच्छी, पौअँडी (पायल), खाडू (पग वलय) बाहाँ-चेघा (बाँहटा) और सिइता (हँसुली) आदि नामो के गोदने कांकेर और निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित हैं। आमतौर पर सभी क्षेत्रों में गुदने में अंकित की जाने वाई प्रमुख आकृतियाँ हैं - मोर, सांकल, पटली, बिछिया, मस्सी, पौधा, सर्प, फूल, पत्तियाँ, लाल चींटे, मछली, कण्ठहार, हाथी, कुम्हडा, सींकरी, चरूगा, भौंरा, चाउर आदि। मुख्य रूप से गोदने किसी लडकी के कपाल, छाती, बाहें, कलाई, हथेली का पृष्ठ भाग, घुटनों के उपर, गुप्तांगों पर, पैरों की उंग्लियों, पिंडलियों, हाथ, पैर, स्तन आदि पर अंकित किये जाते हैं।  

यदि हम बस्तर में गोदना कला की उत्पत्ति की बात करें तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। केवल यही मान सकते हैं कि आग, राख, रंग, चुभन और चित्रांकन के अंतर्सम्बन्ध को आदिमनुष्य से समझा होगा और उसने अपनी कपनाशीलता का केनवास अपने ही शरीर को बना लिया। यदि अतीत के संदर्भ तलाशें तो सबसे पुराने दो कथा संदर्भ वेरियर एल्विन द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं। दोनो की कहानिया कहती हैं कि ओझा औरते ही लम्बे समय से बस्तर में गोदना का कार्य सम्पन्न करती आ रही हैं। इन औरतों को गुदनारी भी कहा जाता है। ओझा औरतों और गोदना के अंतर्सम्बन्ध की पहली कहानी नारायणपुर से जुडती है जहाँ यह माना जाता है कि पहले आदिवासी समाज जातियों में नहीं बटा था। महापूरब विभिन्न जातियों को उपहार दे कर उन्हें बांटने का निर्णय लिया उदाहरण के लिये जिस व्यक्ति को जाल दिया गया वह मछुआरा बन गया, जिसे हल दिया गया वह गोंड बन गया। महापूरब ने देखा कि सब वस्तुओं का वितरण हो गया किंतु एक ढोल अब भी बचा हुआ है। बहुत से लोग उन्हें सड़क पर आते जाते दिखाई दिये। महापूरब ने ढोल उन्हीं में से एक व्यक्ति गले में लटका दिया और उसे ओझा नाम दिया। ओझा गाँव गाँव घूम कर भीख माँगता और कहानियाँ सुनाता हुआ अपना जीवन यापन करने लगा। एक शाम वह घर लौटा तो देखा खाना तैयार नहीं है। इसपर वह अपनी पत्नी पर बहुत नाराज हुआ। पत्नी भी बिफर गयी कि मैं तालाब से पानी लाती हूँ, जंगल से लकडी लाती हूँ, घर की सफाई करती हूँ, खाना बनाती हूँ और कितने काम की मुझसे उम्मीद रखते हो? गुस्से में ओझा की पत्नी ने निर्णय लिया कि अब वह खुद कमा कर खायेगी। आठ दिन तक उसने कुछ नहीं खाया। इस पर बूढी माताल का कालीन हिलने लगा; प्रसन्न हो कर बूढी माताल ने उस स्त्री से बात की और कहा कि मैं तुझे विशेष कार्य दूंगी किंतु इसके लिये तुझे मेरी पूजा करनी होगी। वह ओझा स्त्री को ले कर जंगल के एक सराई के पेड़ के पास पहुँची। उसने पेड़ से कुछ गोंद निकाल कर एक मिट्टी के टुकडे पर रखा। फिर गोंद के उपर आग में पकी मिट्टी का दूसरा टुकडा रखा। फिर उन्होंने दोनो टुकडों को गोबर से लीप कर आग में रख दिया। कुछ देर बाद ढक्कन खोला गया तो गोंद की जगह काला पदार्थ था। एक मिट्टी के टुकड़े से इसे खुरच कर बूढी माताल नें इस पदार्थ को टूटे हुए नारियल के टुकडे में रखा। तत्पश्चात पानी डाल कर इसे कुछ देर चलाया गया। अब उन्होंने तीन सूईयाँ एक बांस की गाँठ में बाँधी और ओझा स्त्री को लिटा दिया। पहला गोदना इस तरह बूढी माताल ने उस ओझा स्त्री के उपर किया। गोदना करने के पश्चात उन जगहों पर गोबर से लीप कर तेल और हल्दी लगा दी गयी। अब मताल ने कहा कि तुम आज से इसी तरह गोदाई का काम करोगी; गोदना करने के पश्चात उस स्थान को गोबर से लीप कर उस पर हल्दी का तेल छिडक कर, उस पर मेरे नाम से चावल बिखेर दोगी। कुछ सूईयाँ, हल्दी और दाल के दाने तुम हाथ में लेना और बायें हाथ से गोदी गयी स्त्री की उंगलियाँ पकड़ कर अपनी दाईं मुठ्ठी को तीन बार उसके शरीर के चारो ओर घुमाना। इसके बाद हल्दी और दाल उसकी साड़ी में रख देना और उसका हाथ छोड देना। इस उपाय से गोदने के निशानो पर जलन कम हो जायेगी। 

नारायणपुर से कोण्डागाँव आते आते यही कहानी अपने स्वरूप में बदल जाती है। यहाँ मान्यता है कि बाड़ादेव टाल्लुरमुताई और काडतेंगल के पुत्र थे। उनके छ: भाई और सात बहने थी। एक दिन सातों बहने टाल्लुरमुताई के पास गयीं और उनसे वो गहने मांगे जो मृत्यु के उपरांत भी बने रहें; यहीं से गोदना की उत्पत्ति हुई। बाडादेव को दो पुत्र हुए; एक का नाम था मुरहा और एक का ओझा। मुरहा खेत जोतने वाले बने जब कि ओझा शिकार करने और घरों की दीवार रंगने वाले बने। टाल्लुरमुताई की बेटियों से ओझा की पत्नी को भी गोदना करना आ गया। साल में एक बार ओझा बाडादेव पर बकरी चढाते हैं यह कहते हुए कि देखिये हम गुदाई करते हुए पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं जो निशान हम बनायें उसमे कोई घाव न हो, कोई पस न पड़े, न ही कोई सूजन आये, कार्य करते हुए हम पर किसी तरह का काला जादू असर न करे। कार्य शुरु करने से पहले ओझा स्त्री बाडादेव की सात बहनों का नाम लेती है। अंत में चावल, हल्दी, तेल, मिर्च और नमक आदि के रूप में प्राप्त भेंट व मेहनताने को वह लडकी के चारो ओर घुमाती है। इसका कुछ भाग वह सात बहनों को भेंट करती है जिससे कि गोदे गये निशान जल्दी ठंडे पडते हैं और जलन नहीं करते। टाल्लुरमुताई द्वारा सिखाई गयी गोदने की विधि भी लगभग वैसी ही है जैसी कि बूढी माताल ने पहली ओझा स्त्री को सिखाई थी। आज भी गोदना करने का कार्य बस्तर में ओझा स्त्रियाँ; गाँव की सियान स्त्रियाँ; कंजर, बंजारा, बादी और देवार जातियों की स्त्रियाँ ही निबटाती हैं। रुक्ष सी सुई पीतल के तार से बना ली जाती है। गोदने की सूई को पहले विसंक्रमित करने के लिये गोबर से धोया और उबाला जाता है। तत्पश्चात सेमीरंग और कोयले के रंग का उपयोग करते हुए गोदने वाली तीन या पाँच सूईयाँ एक साथ चलती हैं। हलबी-भतरी और छत्तीसगढी बोली में प्रथम बार सूई चालन को मूँडी, दूसरी बार को दुसडा और तीसरी बार को छडिया कहा जाता है।  

आज आदिवासी समाज में गोदना के प्रति पहले जैसी ललक नहीं देखी जा रही है। यद्यपि गोदना की तकनीक और इस्तेमाल किये जाने वाले रंगों में अनेक तरह के बदलाव होने लगे हैं। छत्तीसगढ के ही जशपुर क्षेत्रों में महिलाओं ने गोदना कला को केनवास और कपडों पर उतार कर अपनी कल्पनाशीलता और डिजाईनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिलाई है;  दुर्भाग्य से बस्तर में अभी एसा नहीं हो सका है। गोदना आदिवासी संस्कारों की ही नहीं उनकी कला की भी थाती है और इसका संरक्षण दायित्व भी है। अभिनेत्रियों के टैटुओं पर शोर मचाने वाले संचार साधनों ने कभी इन कलाओं के सौन्दर्य शास्त्र को अपने कैमरे और विषयवस्तु के केन्द्र में रखा होता तो सभव था कि इनकी स्थिति विलुप्ति की ओर जाती न दीख पडती। 

 - राजीव रंजन प्रसाद

Tuesday, October 29, 2013

बस्तर के भित्तिचित्र कला भी हैं और इतिहास भी


पाषाणकाल से ही स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बस्तर के आदिवासी समाज के पास उपलब्ध रहा है। अपनी अनुपम शैली तथा कलात्मक भाषा से बस्तर के आदिवासी समाज ने मनुष्य सभ्यता और उसके विकास के विभिन्न चरणों को लिपिबद्ध किया है। आप चित्रलिपि नाम देना चाहें अथवा शैलचित्र नामित करें किंतु मैं इसे लेखन कला के आरंभ, किसी भी लिपि के उद्भव के साथ साथ एसा अमरकंटक मानता हूँ जहाँ चित्रकला की विशाल नर्मदा का उद्गम स्थल है। दक्षिण बस्तर में अवस्थित अनेक पाषाणकालीन गुफायें यह बताती हैं कि वे ही आदि-मनुष्य का प्रारंभिक निवास थे। 

चित्रकला और गुफाचित्रों पर चर्चा से पहले बस्तर में अवस्थित आदिमनुष्य के आरंभिक हथियारों तथा औजारों की एक झलख देखें। निम्न पुरापाषाण काल के मूठदार छुरे जिसकी नोक चोंच के आकार की है, इन्द्रावती, नारंगी और कांगेर नदियों के किनारे मिले हैं। मध्यपाषाण काल में फ्लिट, चार्ट, जैस्पर, अगेट जैसे पत्थरों से बनाये गये तेज धार वाले हथियार इन्द्रावती नदी के किनारों पर खास कर खड़क घाट, कालीपुर, भाटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चंदेला, घाटलोहंगा के पास मिले हैं; इन जगहों से अब भी कई तरह के खुरचन के यंत्र, अंडाकार मूठ वाला छुरा और छेद करने वाले औजार मिल रहे हैं। उत्तर-पाषाणकाल का आदमी छोटे और प्रयोग करने में आसान हथियार बनाने लगा था; इनको लकड़ी, हड्डी या मिट्टी की मूठों में फँसा कर बाँधा जाता था, यद्यपि हथियार व औजार चर्ट, जैस्पर या क्वार्ट्ज जैसे मजबूत पत्थरों से ही बनाए जाते थे। इस समय के अवशेष इन्द्रावती नदी के किनारों पर विशेष रूप से चित्रकोट, गढ़चंदेला तथा लोहांगा के आसपास प्राप्त होते हैं। उत्तर-पाषाण युग के समानांतर तथा उसके पश्चात धातुओं ने पत्थर के हथियारों और औजारों का स्थान ले लिया। यदि हथियारों और औजारों के प्रकार ध्यान से विवेचित किये जाये तों उनकी उत्पत्ति और विकास के चरणों में न केवल शिकार, आत्मरक्षा, खेती-बागानी अपितु कलात्मकता का भी बराबर योगदान रहा है। खुरचन के लिये प्रयोग में आने वाले मूठदार हथियार आदिमनुष्य की अभिव्यक्ति का साध्य भी बने और उसने शनै: शनै: अपनी मौखिक और सांकेतिक भाषा को पत्थरों, पर्वतों और गुफाओं पर अंकित करना आरंभ कर दिया।

आड़ी टेढी खुरचनों से आरंभ हो कर परिष्कृत गुफाचित्रों तक कला की प्रारंभिक यात्रा बहुत रुचिकर जान पड़ती है। आदि-मनुष्य तब अपनी जिज्ञासाओं का परिष्कार तथा नित नये आविष्कार कर रहा था जिन्हें वह अचरज से देखता तथा उसकी कोशिश होती कि अपने साथियों और संततियों को भी वह इस नव-ज्ञान से अवगत करा सके। वस्तुत: बस्तर में प्राप्त गुफाचित्रों में दैनिक जीवन विषयक संदर्भों का आलेखन गुफा की छत और दीवारों पर किया गया है। इन चित्रों में आखेट, मधुसंचय, नृत्य, पशुयुद्ध, अग्निपूजा, वनस्पति इत्यादि से सम्बन्धित दृश्य प्रस्तुत किये गये हैं। दक्षिण बस्तर में लगभग चार हजार फुट ऊँची नड़पल्ली पहाड़ी के ऊपर चित्रित गुफा प्राप्त हुई है जिसमें हिरणों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। मटनार गाँव के पास इन्द्रावती नदी के तट पर चित्रित पशु-पक्षियों तथा मनुष्य की हथेलियों के चित्रन से यहाँ किसी अलौकिक शक्ति की पूजा का संकेत मिलता है। अपनी खुरचन कला मे प्रवीणता हासिल करने के पश्चात उसे प्रकृति ने ही रंगों का आरंभिक ज्ञान भी दिया होगा। फरसगाँव के समीप आलोर के निकट की पहाडी पर अनेक शैल चित्र बने हुए मिले हैं जो लाल रंग के हैं तथा मृदा वर्णों से चित्रित हैं; इन चित्रों को क्षरण के कारण स्पष्ट नहीं देखा जा सकता किंतु इनमे मानव और पशुओं की आकृति को आसानी से पहचाना जा सकता है।    

अब यदि इन आरंभिक चित्रों का बारीकी से प्रेक्षण निरीक्षण करें तो यह ज्ञात होता है कि रेखांकन से चित्र तक पहुँचने के पश्चात आदि-मनुष्य ने इनमे रंग भरने की भी कोशिश की होती। भांति भांति के प्रयोगों के पश्चात उसे गेरू मिट्टी के रूप में एक एसा रंग मिल गया होगा जो न केवल लम्बे समय तक स्थायी रह सकता था अपितु उसकी चटखीली लाल तथा भूरे रंग की आभा भी प्रभावित करती थी। गेरू-मिट्टी की कृतियों ने गुफाचित्रों को सजीव करना प्रारंभ किया तथा  कालांतर में अन्य प्राकृतिक रंगों का भी आविष्कार व प्रयोग होने लगा। उदाहरण के लिये पत्तियों के रस से हरा रंग निकाला गया होगा तो भांति भांति के फूलों ने लाल, नीले, बैंगनी, पीले आदि रंग प्रदान किये होंगे; काले रंग के लिये गाय के गोबर का प्रयोग किये जाने के भी संकेत प्राप्त होते हैं। 

समय बदलता गया और चित्रों के विषय भी बदलते चले गये। अब इन चित्रों में मनुष्य का सामाजिक जीवन प्रविष्ठ हो गया; उसका जन्म, उसकी मृत्यु, उसका बालपन, उसका बुढापा, उसका प्रेम उसके यौन सम्बन्ध, उसकी वितृष्णा, उसकी नफरत, उसके युद्ध, उसके वाद्य, उसके नृत्य, उसके देव, उसकी देवी, उसकी जिज्ञासायें उसके सपने.....यह सूची लगातार लम्बी होती चली गयी और ये भित्तिचित्र बस्तर की एक परिष्कृत और विश्व भर में सराही जाने वाली कला के रूप में अब हमारे सामने है। भित्तिचित्रों में बस्तर के लोक जीवन ही नहीं लोक काव्यों को भी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त किया है, जनश्रुतियों और कथाओं को मूर्तरूप दे कर पीढियों के लिये सुरक्षित करने का महति कार्य इन चित्रों के माध्यम से आज भी हो रहा है। बस्तर में भित्तिचित्र कला को गढ लिखना अथवा गढ लेखन करना भी कहा जाता रहा है। इन भित्तिचित्रों के केवल विषय ही नहीं बदले अपितु समय के साथ चित्र उकेरने और रंग भरने के माध्यम भी बदलते चले गये। गेरु मिट्टी, प्राकृतिक रंगों के साथ साथ अब चावल का आंटा जिसे स्थानीय बोली में बाना कहा जाता है; फर्श और दीवार के चित्रों को रंग व स्वरूप देने के कार्य में लिया जाने लगा। इस माध्यम से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी को बाना लिखना कहते हैं। चावल के आँटे को पानी में घोल लिया जाता है फिर कपडे के टुकडे की पोतनी बना कर उसी से मिट्ती अथवा लिपे हुए फर्श और दीवारों पर चित्रकारी करने की परम्परा बस्तर की थाती है। 

एक मुकम्मल कला बनने के साथ ही गढलेखन अथवा भित्तिचित्र निर्माण को न केवल सम्मान ही प्राप्त हुआ अपितु उसके आयामों मे भी परिवर्तन देखने को मिले। अब इन भित्तिचित्रों ने देवगुडियों को सजाया, घोटुलों के दरवाजों, फर्श और दीवारों को संवारा, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के निवास की शोभा बनी। वेरियर एल्विन की पुस्तक “दि डोर एण्ड वॉल डेकोरेशन” में बस्तर के भित्तिचित्रों की महान कलायात्रा का सुन्दर वर्णन उपस्थित है। आधुनिक समय ने बस्तर की इस कला को दीवार और भूमि जैसे केनवास के अलावा कागज और कपडे के माध्यम भी प्रदान किये हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर फेब्रिक रंग, पोस्टल कलर या ऑयल पेंट का उपयोग भी किया जाने लगा है। यद्यपि इस कला में अब भी परम्परागत विषयवस्तु को ही उकेरा जाता है किंतु समय के साथ आधुनिक बिम्बों के प्रयोग भी होने लगे हैं। जगदलपुर के मानवविज्ञान संग्रहालय में मेरी मुलाकात दो चित्रकारों महारूराम नेताम और बुधराम मरकाम से हुई। ये दोनो ही कोण्डागाँव से आये हुए कलाकार थे तथा आधुनिक माध्यमों और रंगों से अपनी विरासत कला का प्रदर्शन कर रहे थे। बस्तर की भित्तिचित्र कला के एक बडे साधक हैं कोण्डागाँव निवासी श्री खेम वैष्णव जिन्होंने न केवल इसे अपनी साधना बनाया अपितु देश-विदेश में इस कला की ख्याति को पहुँचाया है। इस वर्ष आईपीएल-2013 में देहली देयर डेविल्स की क्रिकेट टीम का सांकेतिक बल्ला श्री खेम वैष्णव द्वारा ही डिजाईन किया गया था जिसमे उन्होंने बस्तर की भित्ति चित्र कला की अनेक बारीकियाँ प्रस्तुत की थीं; यह इस कला की अनंत यात्रा का एक महत्वपूर्ण पडाव भर है। यहाँ हमें ठहर कर सोचना होगा कि कुछ विवादास्पद कलाकृतियों के लिये लाखों-करोडो की कीमत अदा करने वाले लोग क्यों इस महति कला की ओर उपेक्षा की दृष्टि रखते हैं?

 – राजीव रंजन प्रसाद


Friday, October 25, 2013

बस्तर में बांस की कलात्मक दुनियाँ


तेरहवी शताब्दी का पूर्वार्द्ध जब अन्नमदेव ने चक्रकोट के नाग शासकों को अंतिम रूप से परास्त कर अपना शासन स्थापित किया तब कोंटा से कांकेर तक उनके द्वारा शासित क्षेत्र का नाम बस्तर रखा गया। इस नामकरण के पीछे अनेक कहानियाँ हैं जिसमे से प्रमुख मान्यता है कि वारंगल से निष्काषित होने के पश्चात बस्तर में अपने विजय अभियान का आरंभ करने के दौरान अन्नमदेव को अनेक बार बांसतरी में विश्राम करना पड़ा; बांस से शासक के इसी सम्बन्ध ने संभवत: बस्तर शब्द की उत्पत्ति की होगी। आदिवासी जीवन में वही वस्तुएं कला का माध्यम भी बनी हैं जो उनके आम जीवन की संगिनी रही हैं। वह चाहे पाषाण हो, धातु हो, मृदा हो, काष्ठ हो अथवा बांस। जहाँ तक बांस का प्रश्न है, यह आदिवासी जीवन का अभिन्न है तथा मृत्यु पर्यंत तक उसकी किसी न किसी दैनिक गतिविधि का हिस्सा बना रहता है।



लोकजीवन से आगे बढ कर लोक संस्कृति का हिस्सा बनते हुए बांस कभी आदिवासियों की पूजा परम्परा में इस्तेमाल होते हैं तो कभी लोकनृत्य और लोक वाद्य का भाग भी बनते हैं। इसका महत्वपूर्ण उदाहरण डंगईयाँ को कहा जा सकता है। एक मोटे मजबूत साबुत बाँस को डंगई कहते हैं जिसके शिखर पर चाँदी, कासा, या पीतल का बना सम्बन्धित देवी या देवता का एक कलापूर्ण प्रतीक लगा होता है; इस प्रतीक को हलबी-भतरी में गुबा कहते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पर्व के दौरान जगदलपुर के सीरासार चौक में तुपकी खूब चलाई जाती है। वस्तुत: तुपकी बाँस से बनी एक तिकोनी नली होती है जिसकी प्रक्रिया किसी पिचकारी सदृश्य मानी जा सकती है। इसके मूल में मलकांगिनी के फल रख कर किसी भी आगंतुक अथवा मित्र पर उसे सधान कर मारा जाता है। मोहरी, नांगड और तुडबुडी बस्तर अंचल के लोक वाद्यों में प्रमुख माने जाते हैं तथा सभी के निर्माण में बांस किसी न किसी तरह सहयोगी होता है। धनकुल बस्तर की ही एक अद्भुत वाध्य रचना है जिसमें एक आम वनवासी की गृहस्थी में रोज काम आने वाली कई वस्तुओं का प्रयोग होता है जैसे हंडी सूप, धनुष और बाँस की कमची। वाद्य ही क्यों गेडी नृत्य, डंडारी नृत्य आदि में भी प्रमुखता से बाँस ही प्रयोग में लाया जाता है।

बांस बस्तर में विवाद के केन्द्र में भी रहा जब बांग्लादेश से आये विस्थापितों को अरण्य क्षेत्रों में बसाया जाने लगा था। उस दौरान बंगाल से लायी गयी बांस की कुछ किस्मों के बस्तर में रोपण की योजनायें बनी तथा उनका क्रियान्वयन हुआ। अनेक तरह के विरोध तब सामने आये एवं विशेषज्ञों ने सिद्ध किया कि कलात्मक वस्तुओं के निर्माण में भी बस्तर का नैसर्गिक बांस उच्च कोटि की गुणवत्ता रखता है। अपनी पुस्तक ‘बस्तर – इतिहास एवं संस्कृति’ में लाला लगदलपुरी लिखते हैं कि “आदिवासियों की दृष्टि में बस्तर अंचल में कुल नौ प्रकार के बांस होते हैं। घर बावँस, बरहा बावँस, पानी बावँस, डोंगर बावँस, पोड़सी बावँस, रान बावँस, माल बावँस, सुन्दर कोया और बोंगू। इनमे से केवल डोंगर बावँस, पोडसी बावँस, माल बावँस और रान बावँस ही टट्टे, टोकने, सूप और छतूडी आदि बनाने के काम में लाये जाते हैं और शेष से मोटे काम निबटाये जाते हैं। पानी बाँस पतला होता है जिससे बाँसुरी बनती है और शहनाई का मुख्य भाग तैयार किया जाता है। बोगू बाँस एक मोटा बांस होता है, इतना मोटा कि उससे बने पात्र दक्षिण बस्तर में ताडी उतारने और पानी पीने के काम आते हैं”।

इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि विस्थापित बंगालियों के साथ आयी बांस कला का बस्तर में अवस्थित परम्परागत शिल्प के साथ बखूबी संगम हुआ तथा उसमें आधुनिकता के तत्व सम्मिलित होने लगे। बस्तर के आदि-बांस शिल्पियों को नयी तकनीक और नये प्रयोगों से प्रशिक्षित किया गया तथा वे अब कुछ एसी वस्तुओं का भी निर्माण करने लगे जो उपभोक्तावादी संस्कृति अपने बाजार के लिये चाहती थी। मुख्य रूप से बांस से बने सोफा सेट, डायनिंग टेबल, टेबल लैम्प, गुलदस्ते, मोर, मछली, टोकनी, परदे आदि तैयार किये जाने लगे। छत्तीसगढ हस्त शिल्प विकास निगम, राष्ट्रीय शिल्प बोर्ड आदि सरकारी संस्थायें तथा अनेक गैर सरकारी संस्थायें सामने आयीं जिन्होंने आदिवासियों की परम्परागत बांस-कला तथा उनके द्वारा निर्मित नये दौर के उत्पादों को बाजार देना आरंभ किया। नारायणपुर, अंतागढ, पखांजुर तथा ओरछा आदि क्षेत्रों में बांस से विभिन्न वस्तुए तैयार करने के लिये प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन केन्द्र स्थापित किये गये। मृगनयनी एम्पोरियम के माध्यम से यहाँ निर्मित उत्पादों के लिये अनेक विक्रय केन्द्र उपलब्ध कराये गये।   

मुझे बहुत निकटता से नारायणपुर के बाँस कला केन्द्र को देखने का अवसर मिला है। यह भी बताना चाहूंगा कि यहाँ का केन्द्र उन आदिवासी परिवारों के लिये पुनर्वास की तरह भी कार्य कर रहा है जो नक्सलवाद की विभीषिका के कारण अबूझमाड़ से पलायन कर यहाँ पहुँचे हैं तथा आजीविका के लिये उनके ही साधन उन्हे थमाये गये हैं। यहाँ मेरी मुलाकात बांस कला के अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्पी पंडी राम मंडावी से हुई जो अबूझमाड़ के प्रवेशद्वार गढबंगाल से हैं। उन्होंने अपनी अनेक बाँस की निर्मित कलाकृतियाँ मुझे दिखाई तथा भारत के बाहर उनके हाँथ का किन किन देशों में क्या क्या बना हुआ है इससे भी मुझे परिचित कराया। घुटने के उपर वाली लुंगी और कमीज में वे आधी दुनिया घूम चुके हैं तथा प्रशंसाये बटोरी हैं। पंडी राम मंडावी में प्रसिद्धी और पैसे ने कुछ नहीं बदला यहाँ तक कि उसके नंगे पैर में जूता नहीं आया; उनके सिर का साफा नहीं बदला; हाँथ का झोला नहीं बदला। मुझे प्रसन्नता होती है कि कलाकार नहीं बदलते क्योंकि उनके हाथों की महारत का मर्म उनकी अंतरात्मा में अंतर्निहित होता है।   

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Wednesday, October 23, 2013

शोभन सरकार, बिहारी दास और इतिहास

नये दौर की तिलिस्मी कहानियाँ अब प्रस्तुत हैं। एक बाबा सपना देखता है और इसके साथ ही सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगते हैं। वैज्ञानिक, इतिहासकार और सरकारी मशीनरी एक सपने के सच की खोज में जुट जाती है। बाबा बैठे बिठाये ग्लोबल हो गये हैं। चुनावी मौसम है इसलिये उन पर कदाचित सीधे हमले नहीं किये जा सकेंगे इसलिये वे ठसक में भी हैं और अपनी महत्वाकांक्षा की आड में आने वाले लोगों से निबट भी लेना चाहते हैं। वे अपनी आलोचना का जवाब विशुद्ध राजनैतिक चिठ्ठी से देते हैं जिसपर देश का मीडिया गरमागरम बहस भी करता है। यही नहीं इस पर भी चर्चा होने लगती है कि इस कथित सोने पर हक किसका होगा – राज्य का कि केन्द्र का? सपना देखने वाले बाबा किसी प्रखर समाजसेवी की तरह बयान देते हैं कि इस सोने से इलाके का विकास होना चाहिये। बडे वालों की तो छोडिये डोंडिया खेडा के प्रधान साहब तो बल्लियों उछलते हुए मांग करते हैं कि हमारे इलाके में हवाई पट्टी बननी चाहिये आखिर हमारी जमीन से सोना निकल रहा है। ‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ को चरितार्थ करते हुए अर्थव्यवस्था पर बात करने वाले चैनल इस सोने की कीमत का आंकलन करने लगे हैं और इससे यह गणना तक कर ली गयी कि प्रतिव्यक्ति कर्जे से हर हिन्दुस्तानी को कितनी राहत मिल सकती है, डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या स्थिति हो सकती है। 

यह तमाशा देख कर सवाल उठता है कि क्या सचमुच हम एक परिपक्व लोकतंत्र होने की दिशा में बढ रहे हैं? क्या इस प्रकरण में हम धर्म और राजनीति का विज्ञान की सीमेंट से गठजोड नहीं कर रहे? प्रकरण यह भी बता रहा है कि अपने इतिहास को ले कर हम कितने संजीदा हैं तथा उसे जानने की हमारी उत्कंठा कितनी है? महज बीस वर्ग किलोमीटर के दायरेवाली डौड़ियाखेड़ा रियासत में हजार टन सोना मिलने की आशा चमत्कार ही प्रतीत होती है। हाँ इस बहाने भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक पर चर्चा होने लगी इसे उपलब्धि कहा जाना चाहिये; राजा रामराव बक्श जिनके किले में यह खुदाई चल रही है उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत में सम्मिलित होने के अपराध में 28 दिसंबर 1859 को बक्सर के पास फांसी दे दी गयी थी। बहरहाल आनंद उठाईये इस तिलिस्म कथा का जहाँ बाबा शोभन सरकार के एक चेले ओम बाबा कहते हैं ‘बस इतना बता दीजिये कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए कितना सोना चाहिए; बाबा शोभन सरकार उतना सोना पैदा कर देंगे’। इस प्रकरण को धार्मिक चश्मा चढा कर देख रेहे लोगों को भी बताना चाहूंगा कि एसे ही कारणों से आस्था और विश्वास जैसे शब्द मायना हीन हुए हैं तथा धर्म की परिभाषाओं को हास्यास्पद विवेचनाओं से गुजरना पड़ा है। 

इस विमर्श को आगे बढाने से पूर्व बाबा बिहारीदास पर बात करते हैं जिनका सत्तर के दशक में बस्तर के क्षेत्रों में बोलबाला था। बस्तर रियासतकाल के अंतिम महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की 1966 में हुई हत्या के बाद आदिवासी नेतृत्व और प्रतिनिधित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया। वर्ष -1971 में बाबा बिहारीदास प्रकट हुए। उनके प्रवीर होने के उसके दावे की पुष्टि खुसरू और बाली नाम के दो भतरा कार्यकर्ताओं ने की जो पहले भी प्रवीर के साथ काम कर चुके थे। बाबा के काले रंग के लिये यह तर्क दिया गया कि गोलियों की बौछार सहने के कारण प्रवीर का रंग काला पड़ गया है। उनके अनुयाईयों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। बाबा को कंठी वाले बाबा या गुरु महाराज कह कर संबोधित किया जाता था। बाबा ने अपने अनुयाईयों को सलाह दी कि वे माँस खाना और शराब पीना छोड़ दें तथा तुलसी की माला जिसे कंठी कहा गया धारण करें। यह कहा गया कि महाराजा प्रवीर का आदेश है कि सभी ग्रामवासियों को कंठी बाँधनी होगी। जो कंठी नहीं बाँधेगा उसकी जायदाद छीन ली जायेगी, वह मर जायेगा, उसको राक्षस खायेंगे। बिहारीदास के इस धर्मप्रचार और तथाकथित सुधारवादी आन्दोलन को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली। हरे राम हरे कृष्ण और रघुपति राघव राजा राम आदि भी लोक गीतों में शामिल होने लगे। इस आन्दोलन को वाद, पंथ और अंजाम से तौले बिना अगर देखा जाये तो इसकी स्वीकार्यता का पैमाना बहुत विशाल था, लगभग सम्पूर्ण बस्तर। बाबा बिहारी ने प्रवीर के नाम को आन्दोलन बनाया। उसने प्रवीर के बाद की उस शून्यता का इस्तेमाल किया जिसमे आदिवासी स्वयं को नेतृत्वविहीन तथा असहाय समझ रहे थे। ब्रम्हदेव शर्मा जो उन दिनों कलेक्टर थे इस धार्मिक आन्दोलन को तोडने के लिये मुखर दिखे। बाबा बिहारीदास को समानान्तर सरकार न बनने देने के लिये जिला बदर का आदेश दिया गया। ठीक दशहरे से पहले ब्रम्हदेव शर्मा ने बाबा बिहारीदास को बस्तर से बाहर कर दिया था। बाबा ने अपनी लोकप्रियता भुनाई। कहते हैं कि राजनीतिक दखल पर वे वापस लौटे और इसके बाद ब्रम्हदेव शर्मा का स्थानांतरण कर दिया गया। वर्ष-1975 में उसे मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। वर्ष-1981 में एक आदिवासी लड़की से बलात्कार के जुर्म में वह गिरफ्तार हुआ। इसके बाद बाबा बिहारीदास का पतन हो गया।

शोभन सरकार और बाबा बिहारी दास की कहानी में एक प्रकार की साम्यता है। दोनो ने ही इतिहास की उस टूटन को अपनी प्रसिद्धि का हथियार बनाया जहाँ सत्य दफन किये जाते हैं और मिथक पैदा होते हैं। ध्यान से देखा जाये तो राजनीति शोभन सरकार से भी सोना ही खीच रही है, अब संचार माध्यम मंहगाई पर चुप हैं, रुपये के अवमूल्यन पर खामोश हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार पर कोई वाद-विवाद नहीं हो रहे। बाबा शोभन सरकार ने वह ढाल दी है जो राजनीति के हिस्से सोना ही उगलेगी भले ही आपको दिखे अथवा नहीं। इसे समझने के लिये आप बाबा बिहारी दास के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकते हैं। वर्ष 1972 में विधानसभा चुनाव हुए; बाबा ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। मेरा इशारा किसी राजनीतिक दल विशेष की ओर नहीं अपितु मंतव्य समग्र राजनीति से है। हाँ यह दु:ख जरूर व्यक्त कर सकता हूँ कि काश बिहारीदास भी सपना देखा करते। काश बाबा ने सपना देखा होता कि दक्षिण बस्तर के बारसूर में सोना गडा है या कि केशकाल घाटी के गोबरहीन में नलों की सम्पदा छुपी हुई है तो शायद इन क्षेत्रों की किस्मत बदल जाती। यहाँ से सोना निकलता अथवा नहीं लेकिन उस स्वर्णिम अतीत का सच जरूर बाहर निकल आता जिसकी निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इतिहास खोजने वाले अगर सोना खोदने मे व्यस्त रहेंगे तो बस्तर जैसे क्षेत्र के अतीत पर अंधेरा गहरा ही होता रहेगा। 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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Monday, October 14, 2013

फतेहपुर सीकरी के लपके और चुल्लू भर पानी


“लपका” शब्द रोचक लगा था मुझे। फतेहपुर सीकरी पहुँचने के बाद जब कई हमारी ओर लपके तब समझा कि इस शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई और इसके निहितार्थ क्या हैं। वैसे लपके सभी एतिहासिक स्थलों पर पाये जाते है; मूल रूप से ये गैर-प्रशिक्षित गाईड होते हैं जिनका कार्य होता है बस स्टेंड, टैक्सी स्टैंड, रेल्वे स्टेशन आदि आदि से अपने शिकार को फांसना। पर्यटक के लिये शिकार शब्द का प्रयोग करना एसा लगता जरूर है कि हलाली को कत्ल लिखा गया है, लेकिन ज़नाब किसी लपके की चपेट मे आ कर तो देखिये अगर अपने इतिहास ज्ञान और भूगोल की समझ पर आपको संदेह न हो जाये तो कहियेगा। गजब का आत्मविश्वास होता है इनमे और ये आपकी अनेक समस्याओं का एकमेव इलाज बन कर प्रकट होते हैं। अब उनके स्वयं को प्रस्तुत करने के तरीके को भी सराहिये ज़रा – ‘साहब आपको लाईन में नहीं लगना पड़ेगा’, ‘टिकट खरीदने के पैसे हमारी सर्विस में इंक्लूड हैं’, ‘आपको सबसे छोटे रास्ते से ले जाउंगा, कम सीढियाँ चढनी पड़ेंगी’, एकदम मॉन्यूमेंट के सामने ही पार्किंग करवा दूंगा’...यह सूची बहुत लम्बी भी हो सकती है यदि आपने त्वरित निर्णय नहीं ले किया। आपके चेहरे के भाव से वो जान जाते हैं कि आप फसने वाला मुर्गा हैं भी या नहीं। अगर आपने सलीके से झिडका तो इधर आपका पलक झपका और नदारद हुआ लपका, नहीं तो वह धीरे धीरे भूख और गरीबी की परिभाषाओं का डिमोंस्ट्रेशन आपके सामने आरंभ कर देगा। बोहनी का टाईम है, कल से कुछ खाया नहीं है, घर में माताजी भगवान के पास जाने ही वाली है और पिताजी टुन्न पडे हैं.....। आप देसी हैं तो संभव है इनके मनोविज्ञान को भांप सकते हैं; इनकी नुक्कड़ नाट्य प्रतिभा को सराह सकते हैं लेकिन सोचिये ज़रा उन विदेशियों के हालात जिन्हें देखते ही एक साथ उनकी ओर लपकते हैं लपके। यह बेचारा जर्मन हो या कि अमेरिकन, नाईजीरियन हो या कि ईरानी तय है जनाब की शामत आनी। इन्हें तो सलीम चिश्ती की दरगाह को कोई अलाउद्दीन खिलजी की समाधी भी बता दे तो येस येस में ही सिर हिलना है। 

मित्र शक्तिप्रकाश जी के साथ उनकी बाईक में फतेहपुर सीकरी पहुँचा। पार्किंग स्थल से ही हमपर एक सत्रह अठारह वर्ष के लपके ने डोरे डालने आरंभ कर दिये थे। सौ रुपये में वह फ्रेंड-फिलोसोफर और गाईड बनने की पेशकश किये जा रहा था। स्थानीय होने के कारण शक्ति जी के चेहरे पर संत वाले भाव थे और अनसुना करते हुए आगे बढते जा रहे थे किंतु मेरे भीतर के कवि मन ने ठगे जाने की सभी आशंकाओं के बाद भी इस लपके के प्रस्ताव को लपक लिया। पार्किंग से स्मारक स्थल तक जाने के लिये बस की व्यवस्था की गयी है। एक दिन पहले हुई बरसात के बाद भी मौसम में सुहानापन नहीं था और प्यास बेहाल कर रही थी। हम बुलंद दरवाजे से दूसरी और थे और इस स्थल से बमुश्किल पंद्रह सीढियाँ चढ कर ही स्मारक में प्रवेश किया जा सकता था। मैने लपका महोदय को अपना कैमरा दिया और उसने पहली तस्वीर जो निकाली उसके लिये नीचे बैठ कर एसी एसी मुद्रायें बनायी कि लगा किसी प्रोफेशनल फोटोग्राफर को इनसे ही प्रशिक्षण लेना चाहिये; और जो तस्वीर खींची गयी उसे देख कर बस मैने सिर ही पीट लिया। खुद ही खुजा कर दर्द मोल लिया था तो भुगतना ही था। इस स्थल के आगे हमारे पास ‘खुद देखिये और आप ही बूझिये’ वाला विकल्प रह गया था। सही मायनो में न इस नवयुवक को स्मारक स्थल के विषय में कुछ पता था और न ही बताने में कोई अभिरुचि ही। उसका ध्यान केवल उन सौ रुपयों की तरफ था जो आधे घंटे की माथापच्ची के पश्चात उसकी जेब में जाने वाले थे। एक प्रशिक्षित गाईड स्मारक के संबंध में जानकारी रखता है, स्थल के इतिहास को पढना और समझाना उसका दायित्व होता है, उसके पास उन प्रश्नों के उत्तर होते हैं जो साथ चलने वाले पर्यटकों मे मन में उठते हैं चाहे वे सवाल कितने ही बचकाना हों अथवा कितने ही शास्त्रीय। इधर लपका का दिया पूरा विवरण उसकी कल्पना शीलता पर आधारित होता है। वह किसी गोल आकृति की कलाकृति को बादशाह की रसोई का हिस्सा बता सकता है तो दीवान-ए-आम को आम का बगीचा भी सिद्ध कर सकता है। बहरहाल बुलंद दरवाजे पर लपके ने मेरी तस्वीर खींचने के लिये कैमरे के कुछ तकनीकी बटनों पर अपना ज्ञान और हाथ आजमाया। इसके बाद कैमरे ने जवाब दे दिया। किसी भी दृश्य पर फोकस करना संभव नहीं हो रहा था। अंतत: मैंने छांव में बैठ कर कैमरे की बैटरी आदि निकाल कर फिर से उसे फिर से लगाया और इस तरह जुगाड तकनीक ने साथ दिया; तभी आगे की फोटोग्राफी संभव हो सकी। मैं आसपास से पर्यटकों को ले कर गुजरते लपकों की बातों पर ध्यान दे रहा था। सभी के पास एक जैसी जानकारी और रटे हुए वाक्यांश। अकबर को कोई संतान नहीं हो रही थी; शेख सलीम चिश्ती की दुआओं से एक हिन्दू रानी जोधा बाई के द्वारा उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। लपकाओं की कहानियों में आपको रस आ सकता है क्योंकि तथ्य के स्थान पर वे उन्ही कथ्यों तक खुद को रखना पसंद करते हैं जिनमे आम तौर पर लोगों की अभिरुचि होती है। आपको स्मारकों के भीतर की एसी एसी सास-बहू की कहानियाँ जानने को मिल जायेंगी जो कि एकता कपूर अपने सीरियलों में भी नहीं ला सकी। 

इस स्मारक के बारे में जिन बुनियादी जानकारियों के साथ मैं वहाँ गया था कमसेकम उतना भी मैं लपके से सुन लेता तो उनकी उपादेयता को दस प्रतिशत भी सार्थक पाता। आगरा से लगभग अडतीस किलोमीटर दूर अवस्थित यह स्मारक स्थल वस्तुत: दो हिस्सों में बटा हुआ है। पहले हिस्से में बुलंद दरवाज़ा और उससे लग कर परिधि है, जिसके भीतर विस्तृत अहाता और उसके बीचोबीच शेख सलीम चिश्ती की सफेद संगमरमर से निर्मित दरगाह अवस्थित है। मुझे जानकारी थी कि फतेहपुर सीकरी की दरगाह अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के पौत्र सलीम चिश्ती के सम्मान में निर्मित की गयी है जिनकी दुआओं के असर से बादशाह अकबर (1542-1605 ई.) को अपना वारिस प्राप्त हुआ था। यह दरगाह और समाधि स्थल उन गुने चुने संगमरमर के भवनो तथा निर्मितियों मे आता है जिसे आप बार बार निहारना चाहेंगे और भारत में इनके होने पर गर्व करेंगे। समाधि स्थल पर निर्मित मुख्यद्वार पर चार संगमरमर से तराशे हुए खम्बे निर्मित हैं जिसपर उकेरा गया सर्पाकार गुजराती शैली में निर्मित शिल्प विशेष दर्शनीय है। समाधि स्थल के चारो ओर संगमरमर का बारीक काम विशेषरूप से इसकी जालियाँ मनमोह लेती हैं। संगमरमर पर इतना महीन काम ताजमहल में भी देखने को नहीं मिलता अपितु यदि यहाँ किये गये कार्य की किसी दूसरे निर्माण से तुलना हो सकती है तो वे माउंट आबू में अवस्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिर ही हैं। यहाँ दरगाह पर चादर चढाने का रिवाज़ है साथ ही मन्नत का धागा भी बाँधा जाता है। बुलंद दरवाजे से बाहर निकलते हुए मेरी निगाह उपर उसके गुम्बद का निरीक्षण करने लगी उफ..पूरे गुम्बद पर मधुमक्खियों के अनेक छत्ते लगे हुए हैं। यहाँ दीवारों पर के भित्तिचित्रों और नक्काशियों का भी संरक्षण बहुत दयनीय स्थिति में हो रहा है। बुलंद दरवाजे का निर्माण अकबर द्वारा गुजरात विजय के पश्चात करवाया गया और इसके साथ ही सीकरी नाम के साथ फतेहपुर भी जोडा गया था। परिसर के दूसरे हिस्से में अनेक प्रशासकीय तथा रिहायशी भवन बने हुए हैं जिनमे दीवान-ए-खास (विशेष प्रशासकीय मंत्रणा का कक्ष), दीवान-ए-आम (जनता के सम्मुख बादशाह के उपस्थित होने का स्थान), मरियम का निवास, जोधा बाई का निवास, बीरबल का आवास, पंचमहल आदि शामिल हैं। सम्पूर्ण परिसर में स्थित अनेक भवनों में से जामी मस्जिद को फतेहपुर सीकरी के प्रारम्भिक निर्माणों में गिना जाता है जिसके पश्चात महल परिसर की निर्मिति 1569 – 1574 ई. के मध्य की गयी। फतेहपुर सीकरी को बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने 1571-1585 ई. तक अपने सल्तनत की राजधानी नियत किया था।

मैं सलीम चिश्ती की समाधि पर चादर चढाना चाहता था। साथ आये ‘लपका’ ने हमे दरगाह के पिछले हिस्से की ओर आने का इशारा किया जहाँ सैंकडो समाधियाँ बनी हुई हैं। ये सभी समाधियाँ सलीम चिश्ती के खानदान से सम्बन्धित हैं। यहाँ पुरुषों की समाधियाँ बाहर खुले स्थलों पर तथा महिलाओं की भीतरी परिधियों में बनी हुई है। नक्काशीदार जालियों से छन छन कर आती रोशनी जब इन समाधियों पर पडती है तो एक रूहानी दृश्य उपस्थित करती है। यद्यपि यहाँ के अधिकांश स्थलों पर चादर-फूल और संगमरमर के सामान बेचने वालों का कब्जा है। मैं समझ नहीं पाता कि स्मारक स्थल पर किसी भी विक्रय के लिये समुचित स्थल क्यों नियत नहीं किये जाते? कहीं भी सामान रख कर बेचने लगना अथवा फेरी लगाना वस्तुत: सर्वत्र भीड भाड को ही आमंत्रित करता है तथा इससे अव्यवस्था अधिक होती है। विदेशी पर्यटकों का एसे विक्रेता जो हश्र करते हैं वह भी एक दर्शनीय मनोरंजन बन जाता है; आखिर यह सब रुके इसका दायित्व किसका है? यहीं मेरी निगाह एक ‘लपके’ पर पड़ी जिसकी उम्र बमुश्किल नौ-दस वर्ष रही होगी। जिस आत्मविश्वास के साथ वह अपने साथ खडी भीड को सम्बोधित कर रहा था यह नज़ारा देखने योग्य था। एक सुरंगनुमा संरचना प्रतीत हो रही थी जिसका द्वार साधारण किंतु काष्ठनिर्मित था और उसपर ताला लगा हुआ था। इस स्थल पर खड़ा हो कर वह बालक जिसे उसके साथ खडे पर्यटक छोटू कह कर सम्बोधित कर रहे थे बहुत ही नाटकीय शैली मे अभिनय पूर्वक सलीम और अनारकली की कहानी प्रस्तुत कर रहा था। वह पर्यटकों को बता रहा था कि कैसे अकबर ने अनारकली को दीवारों मे चुनवाने का आदेश देने के बाद भी इसी गुफा से उसे फरार करवा दिया। मुझे इस लड़के की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं है और मैं उसकी अभिनय शैली से प्रभावित भी हूँ लेकिन क्या यह स्थिति भी बाल श्रम की नहीं है? बच्चे की असाधारण मेधा उससे इतिहास को तोड मरोड कर रोचकता के साथ प्रस्तुत तो करवा रही है किंतु क्या यह भी सही नहीं कि इन्ही बातों को पर्यटक अपने साथ गाँठ बांध कर ले जायेंगे? विदेशी इस बच्चे की तस्वीर लगातार खींच रहे थे, क्या आपको लगता है कि वे अपने देश जा कर लोगों को यह बतायेंगे कि बच्चे में कितनी प्रतिभा है? भोजन की गारंटी और शिक्षा की गारंती वाले देश मे छोटे छोटे बच्चे अगर लपका बने दीख पडते हैं तो हमारे नीति-निर्धारकों को चुल्लू भर पानी की ही आवश्यकता है। 
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Friday, October 11, 2013

महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?


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महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?
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धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाईयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है इसका उदाहरण है इन दिनो महिषासुर पर चलाई जा रही कुछ चर्चायें। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में कुछ वर्षों से ‘महिषासुर डे’ मनाये जाने के नाम पर उन अदृश्य हथियारों से तनाव फैलाने का सिलसिला जारी है जिनका संधान निरुद्देश्य नहीं किया गया। इन दिनो विचारधारा की पटाखा-लड़ियाँ किसी भी गली के कुत्ते की पूंछ पर बाँध कर सुलगा दी जाती हैं फिर तमाशा चालू आहे। क्या आदिवासी समाज को अपने गर्व के लिये अब कुछ गढी जाने वाली कहानियों पर निर्भर रहना पड़ेगा? संघर्ष की वे गाथायें जो एकलव्य से लेकर गुण्डाधुर तक फैली हुई हैं क्या वास्तविक आदिवासी विमर्श नहीं हैं? प्रश्न यह नहीं कि महिषासुर कौन था अथवा दुर्गा बहुसंख्यक समाज की आराध्य देवी हैं; प्रश्न यह भी नहीं कि महिषासुरमर्दिनी की आलोचना होनी चाहिये अथवा नहीं चूंकि हमने राम पर हमेशा ही सीता का परित्याग करने के लिये प्रश्न उठाये हैं, हमने कृष्ण को सदैव से छलिया ही माना है, हमारे अतीत के विमर्शों ने सृष्टि निर्माता कहे जाने वाले ब्रम्हा, पालनकर्ता माने जाने वाले विष्णु यहाँ तक कि संहार करने वाले शिव के कृत्यों पर भी अनेक प्रश्नचिन्ह लगाये हैं। श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों पर सार्थक बहसें हमेशा से होती रही हैं। इसी बात को आगे बढाते हुए महिषासुर के नाम पर हो रही जहरीली बहसों के संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि किसी भी मिथक को इतिहास के साथ जोडने के आधारों पर चतुराई पूर्ण मौन क्यों फैला हुआ है? वस्तुत: हम एसे युग में रह रहे हैं जहाँ अध्ययन कम है लेकिन बात बात पर नाक मुँह फुलाने वालों की जमात बढती जा रही है। अब किसी संदर्भ पर तथा उसकी गहराई को समझने के लिये संवाद नहीं होते अपितु नारों के पीछे ही दौड लगाना सभी प्रकार के आन्दोलनों की नियति बन गयी है। संघर्ष का अर्थ कलात्मक पोस्टर किसी ‘विशेष विचारधारा परक कैम्पस’ में लगाना अथवा मोमबत्ती जलाना भर रह गया है।

संदर्भों पर आने से पहले महिषासुर को ले कर फैलाई जाने वाली आज की कहानियों की चीर फाड़ करते हैं। जो कहानी सबसे ज्यादा फैलाई जा रही है उसके अनुसार महिषासुर पश्चिमी भारत के बंग प्रदेश का प्रतापी राजा था। दुर्गा को राजा महिषासुर की हत्या करने में नौ दिन लगे। इन दिनों में देवता महिषासुर के किले के चारों तरफ जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। जिसके कारण दुर्गा को मानने वाले लोगों में आठ दिनों के व्रत-उपवास का प्रचलन है। आठ दिनों तक दुर्गा महिषासुर के किला में रही और और नौवे दिन उसने द्वार खोल दिये और महिषासुर की हत्या हुई। कहानी कहती है कि सवर्णो (?) की बर्बर कार्रवाईयों में बड़ी संख्या मेँ असुर (?) बस्तियाँ जला दी गयी; असुर नागरिकों को निशाना बनाया गया, औरतों का बलात्कार किया गया और बड़े पैमाने पर बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया गया। इन बर्बर कार्रवाहियों से घृणा और आत्मग्लानि से व्यथित, उस स्त्री जिसे दुर्गा कहा गया था..नदी मेँ कूदकर आत्महत्या कर ली.. जिसे विसर्जन का रूप देकर सवर्णो द्वारा महिमामंडित कर दिया गया। मैं यह प्रशन खडा नहीं करना चाहता कि आर्य और सवर्ण क्या पर्यायवाची हैं। हास्यास्पद विवरणों को इतिहास बताने की साजिशों पर प्रतिवाद केवल इस लिये नहीं होते क्योंकि एसे लेखकों से कोई तथ्य की मांग नहीं करता, इनसे किसी को संदर्भ पूछने की फुर्सत नहीं। विर्जन तो गणेश प्रतिमाओं के भी होते हैं तो क्या वह भी आत्महत्या का प्रतीक प्रदर्शन है? 

अब कोई पूछे कि किस साक्ष्य को इस कथन का आधार बनाया गया है और कहानी को बंगाल से जोड कर प्रस्तुत किया गया है? क्या केवल इसलिये कि दुर्गा पूजा बंगाल की सबसे समृद्ध परम्पराओं में से एक है। वे कौन सी श्रुतियाँ अथवा तथ्य हैं जो बताते हैं कि महिषासुर वध के बाद बलात्कार हुए और बच्चों की हत्यायें हुईं। किसी भी घटना को कारुणिक और उत्तेजक बनाने के विचारधारापरक प्रचलित ‘शब्द हथियार’ हैं - बलात्कार और हत्या। आईये बंगाल से इतर कुछ स्थलों पर चलते हैं जहाँ यह माना जाता है कि वही वास्तविक स्थल है जिसका कि सम्बन्ध महिषासुर से है। सारे दावे उत्तर-भारत से ही हों क्या जरूरी है? दक्षिण भारत का भव्य एतिहासिक शहर है मैसूर। मैसूर शब्द पर ध्यान दीजिये क्योंकि प्रचलित मान्यता है कि एक समय में मैसूर ही महिषासुर की राजधानी ‘महिसुर’ हुआ करती थी; तर्कपूर्ण लगता है कि महिसुर बदल कर मैसूर हो गया हो। मैसूर के निकट की चामुण्डा पर्वत की अवस्थिति है जहाँ यह माना जाता है कि महिषासुर का वध भी यहीं हुआ था। अब समस्या आती है कि क्या सही है; जो दक्षिण की मान्यता है अथवा दिल्ली और झारखण्ड में ताजा-ताजा जो कहानी बुनी हुई है। अगर इन दोनो ही कहानियों से आगे बढें तो हमें पूर्वी भारत अर्थात हिमांचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में नैना देवी शक्तिपीठ तक पहुँचना होगा। पुराणों के अनुसार देवी सती के नैन गिरने के कारण यह शक्तिपीठ स्थापित हुआ किंतु महिषासुर की कथा भी इसी स्थल से जुडी हुई मानी जाती है तथा उसका वध-स्थल भी यहीं पर माना जाता है। कहानियाँ और भी हैं; झारखण्ड के चतरा जिले का भी यह दावा है कि महिषासुर का वध वहीं हुआ। इसके तर्क में तमासीन जलप्रपात के निकट क्षेत्रों में प्रचलित कथा है कि नवरात्र के समय आज भी यहाँ तलवारों की खनक सुनाई देती है तथा यत्र-तत्र सिंदूर बिखरा हुआ देखा जा सकता है।

जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय के कथित विद्वानों द्वारा फैलाई जा रही इन सभी कहानियों से अधिक प्रामाणिक मुझे वह संदर्भ लगता है जो बस्तर की मान्यताओं में अवस्थित है। ज्ञानी विश्वविद्यालय के गुणीजन यह जान लें कि बस्तर के जिस क्षेत्र का संदर्भ मैं प्रस्तुत करने जा रहा हूँ वह हमेशा से ही जंगली भैंसो के लिये विख्यात रहा है; पुनश्च भैंस अर्थात महिष। अपने विशाल स्वरूप और बलिष्ठ काठी के कारण बस्तर के महिष को कभी दैत्याकार लिखा गया तो कभी उसका विवरण भयावहतम शब्दों में प्राचीन पुस्तकों में प्रस्तुत किया गया है। बस्तर के इन महिषों/जंगली भैंसों पर गल्सफर्ड की डायरी (1860) से लिया गया यह एक विवरण देखें – “इसकी एक सींग साढे अठहत्तर इंच लम्बी होती है। यदि हम मस्तक की खोपड़ी एक फुट चौड़ी माने तो यह सिर से पैर तक चौदह फुट ऊँचा होता है”। फैलाई जा रही नई कहानी के अनुसार महिषासुर पशुपालक समाज का राजा था। यदि इस कहानी का बस्तर से उद्गम माना जाये तो यहाँ के महिष पालतू नहीं थे तथा उनका शिकार किया जाता रहा है। क्या यह संभावना नहीं बनती कि एसे ही किसी आक्रामक महिष के किसी स्त्री द्वारा किये गये शिकार को रोचक काव्य-कथा का रूप दे दिया गया हो? वस्तुत: महिषासुर के वध से जुडी कहानी बस्तर के बड़े डोंगर क्षेत्र से मानी जाती है। इस सम्बन्ध में क्षेत्र के दो वरिष्ठ विद्वानों श्री घनश्याम नाग और श्री जयराम पात्र की पुस्तक ‘बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर – देवलोक बड़े डोंगर”’ से उद्धरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। बस्तर में प्रचलित जन  मान्यताओं के अनुसार बडे डोंगर के मध्य में स्थित महिषाद्वन्द्व पहाड़ (बोलचाल की भाषा में भैंसादोंद डोंगरी) में दुर्गा और महिषासुर के मध्य अंतिम युद्ध हुआ। इस किंवदंती को अपने क्षेत्र की विरासत मानते हुए स्थानीय आदिवासी भैंसादोंद डोंगरी पर स्थित सिंह के पंजों के अनेक चिन्ह, आक्रामक महिष के अनेक पग चिन्ह, दुर्गा के पद चिन्ह, युद्ध के कारण पत्थरों पर पड़े निशान एवं महिषासुर का वध स्थल सहर्ष दिखाते हैं। इस सभी कहानियों में मिथक और सत्य जिस तरह घुले मिले हैं क्या उन्हें अलग करने का प्रयास किसी विद्वान ने किया है? 

हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। नाग जनजातियों (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) को भी  इसी प्रकार का संघर्ष और युद्ध करते हुए भारत भूमि में प्रविष्ठ होना पड़ा। तुर्क-मुगल भी इसी तरह मध्यकालीन भारत की राजनीति में पैठ बना सके और आज भारतीय अल्पसंख्यक समाज का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। यही कारण है कि हर समाज एक दूसरे से जुडा हुआ है, एक दूसरे के साथ मिल कर अथवा उससे संघर्ष करता हुआ आगे बढा है। विजयी होने पर एक समाज ने दूसरे पर अत्याचार किये तो पराजित का पलायन होता रहा। साथ ही साथ उसके जीवन संघर्ष की कहानियाँ कभी किंवदंति बन कर तो कभी शिलालेख बन कर सामने आती रही हैं। हर कहानी हम सभी की है तथा उसमे अनावश्यक रूप से काल्पनिक जातीय पहचान को प्रविष्ठ करा कर विद्यमान सामाजिक खाई को चौडा करना मैं बौद्धिजीविक षडयंत्र मानता हूँ, इसे विचारधारा के खास लक्ष्य को हासिल करने के लिये जान बूझ कर फैलाया जा रहा है।  

मेरा एसा मानने के कई कारण हैं। इतिहास में दर्ज प्राचीन संदर्भ बताते हैं कि असुरों के गुरु शुक्राचार्य ही आरंभिक आर्य राजा इक्ष्वाकु के पुत्र दण्ड के गुरु भी थे, राम ने केवट जनजाति, शबर जनजाति, वानर, भालू तथा गीध टोटेम रखने वाली आदिवासी जनजातियों के सरदारों से मित्रता स्थापित की तथा रावण के विरुद्ध युद्ध लिया। इन आर्येतर जनजातियों में भी आपसी संघर्ष विद्यमान थे अन्यथा सुग्रीव को बाली का वध करने के लिये राम की आवश्यकता ही नहीं थी? इधर राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण ने इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। उपरोक्त उद्धरण यह बताते हैं कि इतिहास पर बचकानी टिप्पणियों से बचना चाहिये। भारत के इतिहासकार इस आओचना के योग्य हैं कि उन्होंने वाद-विचार में उलझे रह कर तथ्यों और सत्यों का मानकीकरण नहीं किया इसी कारण अपनी अपनी व्याक्याओं से किसी भी संदर्भ को आरी बना कर समाज को काटने-बांटने का खेल खेला जाता है। असुर केवल झारखंड की ही विरासत नहीं अपितु सम्पूर्ण दक्षिण भारत की सत्ता का एक समय केन्द्र रहे हैं। महिषासुर पर जेएनयू की अनाप-शनाप बहसों को बस्तर और मैसूर से पहले गुजरना चाहिये। इस प्रकरण से यह भी स्पष्ट होता है कि दिल्ली के कुछ विश्वविद्यालय उस मध्यकालीन मानसिकता में जी रहे हैं जहाँ यह माना जाता था कि राजधानी से कही गयी बात ही परम सत्य है। इन विश्वविध्यालय के इतिहास विभाग पर कोई दबाव बनाये कि अतीत पर पूर्वाग्रह रहित दृष्टि यदि आपके शोध दे सकते हैं तो ठीक; अन्यथा आपकी उपादेयतायें क्या हैं? 

– राजीव रंजन प्रसाद
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