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Friday, March 01, 2013

गोबर के भीतर पडा देवता [प्रसंग: बस्तर में धार्मिक मान्यतायें]



यह पंक्ति गहरी है – “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा। जनजातीय समाज में देवता इतनी विनम्रता की अपेक्षा नहीं रखते। देवता वह जो बात सुने; देवता वह जो माँग पूरी करे; देवता वह भी जिसकी डिमांड पूरी की जाये लेकिन सशर्त। यह बात कांकेर के निकट रिसेवाड़ा गाँव के पास की है। कांकेर से मेरे मार्गदर्शक थे पत्रकार-मित्र कमल शुक्ला हमने दो ग्रामीणों से रिसेवाड़ा के निकट सहायता माँगी थी और वे भी हमारे साथ चल पड़े थे। यहाँ की रिसेदेवी से भी आपका परिचय जल्दी ही कराउंगा तथा इस स्थल के कई चौकांने वाले तथ्यों से भी। आज बात भीमा देवता की। वस्तुत: रिसेदेवी की गुफा देख कर आगे बढते हुए एक जगह ग्रामीणों ने हमे छोडा और एक पेड के नीचे नत मस्तक हो गये। मैं जिज्ञासा वश वहाँ चला गया। छोटा सा पेड पौधों का झुरमुट जहाँ दो गोबर के थप्पे रखे हुए थे। 

यह क्या है?” मैने जिज्ञासा वश पूछा।

भीमादेव हैएक ग्रामीण ने बताया।

भीमादेव क्या गोबर की थप्पियाँ हैं? यह बात और जिज्ञासा से भर रही थी। भीमादेव तो पानी का देवता है न?” मैने अपना ज्ञान बघारा। हम तथाकथित सभ्य लोग हैं ज्ञान बघारना हमारा अधिकार है।

हौ पानी का देवता है।ग्रामीण ने अपनी सादगी से कहा।

.....लेकिन गोबर की थप्पिया? भीमादेवता की मेरी कल्पना बडी भव्य थी। भीमा साधारण देवता हर्गिज नहीं है; प्रचलित कहावत है कि नांगर धरला भीम पानी देला इन्दर। मैं बात आगे बढाने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि बस्तर का जनजातीय समाज उस चश्मे से देखा पढा ही नहीं जा सकता जिसका कि हम देश के अन्य भाग से तुलनात्मक सूत्र जोड सकें। बहुत से लोग आईसोलेशन थ्योरीकी वकालत करते हैं जिसके दुष्परिणाम समझने के लिये बस्तर सबसे बेहतरीन जगह है। 1324 में अन्नमदेव ने बस्तर राज्य के विधिवत गठन के बाद उसने अपनी सीमाओं को लगभग सील कर दिया था; भीतर और बाहर में कोई संवाद नहीं। यदि अंग्रेज जासूस ब्लंट की डायरी कोई पढे तो यह समझ सकता है कि तत्कालीन बस्तर की निकटवर्ती रियासत कांकेर और बस्तर के बीच भी अबोले-अबूझे की स्थिति थी। इसका परिणाम हुआ कि यहाँ शासक-शासित; मूल संस्कृति/परंपरायें तथा आयातित; विद्यमान देवी देवता तथा आयातित सभी आपस में घुल मिल गये। कभी जनजातीय समाज का चलन शाशक वर्ग नें ओढ लिया तो कभी शासकों की मान्यतायें शासित वर्ग नें अपना लीं। इसे बिना किसी विद्वेश के हुआ सामाजिक-धार्मिक बदलाव भी कहा जा सकता है और फिर शेष दुनिया से कटे रहने के कारण नये तर्क बस्तर की सीमाओं के भीतर आसानी से प्रविष्ठ नहीं हो सकते थे अत: उपलब्ध विकल्प ही गुत्थम-गुत्था हो गये। आईसोलेशन थ्योरी के कारण बाहर से आने वाले बंजारों को शोषण करने व वनोपज की लूट का अवसर प्राप्त हुआ। (स्वतंत्रता पश्चात भी एक ब्यूरोक्रेट नें अबूझमाड को आईसोलेशन के अभिशाप से ग्रसित कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप नक्सलवाद नें इन क्षेत्रो में सहजता से पैर जमाये।)। यह लम्बी चर्चा का विषय है अत: न भटकते हुए गोबर की थप्पियों पर लौटते हैं।

यहाँ भीमा और इन्दर हमें भ्रमित करते हैं। इन्द्र पूजा को हिन्दू समाज में वर्षा से जोडा जाता है अत: यह भ्रम स्वाभाविक भी है। डॉ. के के झा नें चर्चा के दौरान इसी विषय पर अपनी थीसिस मुझे दिखाई थी जहाँ वे जनजातीय समाज की धार्मिक मान्यताओं में इतिहास की समय समय पर हुई दखलंदाजी की पूरी व्याख्या करते हुए इस अवगुण्ठन की क्रमबद्धता तथा कारणों पर बात करते हैं। डॉ. झा एसा साधिकार इस लिये कह पाते हैं चूंकि बस्तरिया जीवन को इस इतिहासकार नें इसी मिट्टी में जी कर समझा है। वरना तो दिल्ली में बैठे कई विचारक इन बदलावों को कॉफी पीते पीते ही खारिज कर देते हैं; एक आध तो गुडसा उसेंडी के अवतार वाले गुण्डाधुरकी तलाश करने वाले आगंतुक शोधार्थी बस्तरिया देवी दंतेश्वरी को शोषकबता कर अपनी थीसिस पूरी भी कर लेते हैं। भीमादेव को गोबर में लिपटा देख कर मेरा ठिठकना स्वाभाविक था चूंकि प्रचलित मान्यता के अनुसार - भीमादेव बस्तर के खेतीहर देवता हैं। भीमादेव को मनाने के लिये देवगुड़ी में पूजापाठ होता है, मन्नत माँगी जाती है। भीमादेव का पूरा श्रंगार साँप ही हैं। उनके सिर पर महामण्डलसाँप की पगड़ी बँधी है। टोकी-बोंडकीसाँप का जनेऊ पहना हुआ है। दूध-नागसाँप का कौपीन और बंदूक-मानासाँप का कमरपट्टा पहनते हैं। सुपलीसाँप भीमादेव के पैरों के कडे हैं।

बस्तर की जनजातीय मान्यताओं का यह भीमादेव हिन्दू मान्यता के किसी भी प्रचलन से साम्यता नहीं रखता तथापि जनजीवन में नल-नाग-काकतीय शासनकाल की मान्यताओं का प्रभाव ही न पडा हो क्या यह संभव था? आज कुछ देवगुडियों की जगह पक्के मंदिरो की भी झलक मिलती है यह भी समय का लाया परिवर्तन ही तो है। पूरे बस्तर में शिव-गणेश की असंख्य प्रतिमायें बिखरी मिलती हैं वह चाहे कोंटा हो, बीजापुर हो, भोपालपट्टनम हो, नारायणपुर हो या कि कांकेर। शिव के मान्य स्वरूप की हल्की सी झलख भीमादेव के स्वरूप में भी दिखाई पडती है। इन्ही नाम साम्यो के कारण जान बूझ कर विचारधारा-विशेष के द्वारा वैमनस्य प्रसारित करने की कोशिश है, या कहें सामाजिक खाई जो कि इन अवगुण्ठनों को अलग अलग करना चाहती है वह भी बिना इसके अतीत का पक्ष समझे हुए।

देवता वह नहीं जिसके आगे सिर झुका कर रहो और प्रतीक्षा करो कि वह तुम्हारी बात कभी सुनेगा। ग्रामीणों से चर्चा के दौरान ही मैं देवता और भक्त के बीच पुजारी या ओझा के माध्यम से होने वाली बातचीत या मोलभाव के मायने समझने का यत्न कर रहा था। यहाँ देवता बात करता है चाहे माध्यम कोई भी बने। देवता बात माने जाने से पहले अपने चढावे को ले कर भक्त और पुजारी से मोलभाव भी करता है कि पिछली बार तूने मुर्गा दिया था इस बार बकरा लूंगा। लेकिन भक्त के पास भी छूट है वह भी अपने देवता से उसी तरह झगड सकता है कि नहीं मैं तो मुर्गा ही दूंगा लेना हो तो लो वरना जाओ। इतना ही नहीं नाराज होने का अधिकार केवल देवता को ही नहीं है याचक या भक्त हो भी है। देवता के साथ झूमा झटकी भी हो सकती है और देवता को बैरंग लौटाया भी जा सकता है। इतना ही नहीं देवता बदल भी दिये जाते है, उपेक्षित भी कर दिये जाते हैं तथा मृत भी घोषित किये जाते हैं। बस्तर के देवी-देवता अकड नहीं सकते और सर्वे सर्वा नहीं बन पाते क्योंकि वे जन आवश्यकता से पनपते हैं उनकी सोच के अनुसार आकार लेते हैं उनकी जीवन शैली के अनुसार खाते पीते हैं और उसी प्रकार पूजे भी जाते हैं। इस विषय को अभी विस्तार न दे कर बात पुन: भीमादेव की।

ये गोबर जो रखा है उसीको आप भीमादेव मानते हो?” मुझे सही शब्द नहीं मिल रहे थे। काम करते हुए मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे मुख से निकले किसी भी शब्द से किसी की भी मान्यता आहत न हो। मुझे जो उत्तर मिला संभवत: धर्म और आस्था को ले कर बडी बडी बहसों के लिये सीख हो सकता है।

मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण नें भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव नें बार बार कहने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण नें अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या

कमल भैया नें पूछा कि क्या गोबर के नीचे रखी भीमादेव की मूर्ति को हम देख सकते हैं? यह स्वाभाविक प्रश्न था और हम यह उत्तर मान कर चल रहे थे कि हमे ना में उत्तर मिलेगा। हो सकता है हमे कहा जाये कि एसा करने पर देवता नुकसान पहुँचा सकता है....। अपेक्षा से विपरीत ग्रामीण ने कहा कि देवता है तो नुकसान क्यों पहुँचायेगा। यद्यपि हमने जानबूझ कर मूर्ति देखने की तत्परता नहीं दिखाई। मैं भाविक व्यक्ति हूँ और गोबर के भीतर पडे देवता ने मुझे अभिभूत कर दिया है।
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Friday, June 15, 2012

विरोध व्यवस्था का अथवा बस्तर का?

जनपक्षधरता हमेशा व्यवस्था में सुधार अथवा बदलाव की दिशा में इंगित होती है। आप संवेदनशील व्यक्ति हैं तो निश्चित रूप से आपको अपने परिवेश के इर्द-गिर्द की घटनायें कुरेदेंगी, झकझोरेंगी तथा उद्वेलित भी करेंगी। बुनियादी सवाल कश्मीर से कन्याकुमारी तक बिलकुल एक जैसे हैं और कहीं न कहीं हमारे लोकतंत्र को कोई बडा सरिया आरपार कर गया है, अवस्था गंभीर है। हर तरह की राजनीति और प्रत्येक राजनीतिक दल आकंठ आरोपों में डूबा, भ्रष्टाचारी तथा जनविरोधी होता जा रहा है। सत्ता और माया नें लोकतंत्र की मर्यादा और उसके हर खम्बे को खोखला कर दिया है। किसपर विश्वास की निगाह से देखा जाये? व्यव्यवस्थापिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा मीडिया सभी नें अपनी विश्वस्वनीयता खो दी है। इस प्रश्न पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि आमूलचूक परिवर्तन होने चाहिये और हो कर रहेंगे। आम आदमी अपनी जब शक्ति की अभिव्यक्ति करता है तो कोई भी बदलाव असंभव नहीं रह जाते। यहाँ जनपक्षधरता शब्द का कृपया वामपंथीकरण न किया जाये, बुनियादी तौर पर मेरा मानना है कि विचार महत्वपूर्ण होते हैं वे आपको उडनें, सोचने, समझने का मुक्ताकाश देते हैं जबकि विचारधारायें बेडियाँ हैं जो आपके दायरे निश्चित कर देती हैं, इलाके तय कर देती हैं।.....। 

विरोध लोकतंत्र का स्वाभाविक स्वर है। दमन और प्रतिकार की हजारों हजार कोशिशों के बाद भी विरोध की धार जिन्दा है। अभी नाउम्मीदी के आगे नतमस्तक नहीं हुआ गया तथा कई दीपक टिमटिमाते हुए भी जल रहे हैं। दुर्भाग्यवश जिस तरह राजनीतीति की प्रकृति विश्लेषण से परे हो गयी है ठीक उसी तरह आन्दोलनों की विश्वस्वनीयता भी कलंकित हुई है। बहुतायत आन्दोलन छद्म है तथा उनके पीछे या तो कोई दूसरा राजनीतिक समीकरण काम कर रहा होता है या एसी कुछ गैर सरकारी संस्थायें जिनके चन्दे का हिसाब ठीक उसी तरह प्राप्त नहीं हो सकता जैसे कि हमारे नेताओं के स्विसबैक के खातों की जानकारियाँ। बस्तर के परिप्रेक्ष्य में विरोध के तेवरों को समझने की आवश्यकता महसूस होती है। कुछ पत्रकार मित्रों को जानता हूँ जो इमानदार हैं तथा सच के साथ खडे हो कर काम कर रहे हैं। उन्होंने सच की कीमत भी चुकाई है और यह कहने में हिचक नहीं कि आगे भी चुकानी पडेगी। यह राह ही एसी है बंधु और आग पर हर कोई नहीं चल सकता। इमानदार कोशिशे अपना असर भी दिखाती हैं और अनेकों बार जब आपकी व्यवस्था से सीधे सीधे ठन जाती है तब भी, अपना दमन झेल कर भी, अपनी पराजय के बिलकुल किनारे पर आप पाते हैं कि नहीं उम्मीद अभी है। जो दीपक आपने जलाया था उसने कई और रोशन कर दिये तथा धीरे धीरे आप फैल रहे हैं। सच्चाई और वास्तविक मुद्दे ही जनसरोकार बनते हैं, जनमत बनते हैं तथा बदलाव लाते हैं। तथापि बहुत गंभीरता से सोचता हूँ कि आज एसा क्या हुआ कि पूरा देश केवल बस्तर देखता है? मैं याद करता हूँ जब स्नात्कोत्तर के लिये मैने भोपाल में एडमिशन लिया था, वहाँ मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय के गोखले छात्रावास में रैगिंग के दौरान जब मैने बताया कि बस्तर से हूँ तो सभी की निगाह मेरे चेहरे पर गड गयी थी। बस्तर नाम बहुतायत के लिये अनसुना था, एक जो जानता था उसने मुझे उपर से नीचे तक देखा फिर बोला अच्छा!! बस्तर से? लेकिन तुम तो कपडे पहने हो? इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता। 

यह शोषित मिट्टी इन 10-15 वर्षों से ही उपेक्षित नहीं रही जबसे नक्सलवाद के दैत्याकार स्वरूप का साक्षात्कार होने लगा है अपितु काल दर काल यहाँ की उर्वरता, वनोपज, आदिम शालीनता तथा इनने पर्यावास का अतिक्रमण हुआ है। इस अंचल के किसी आन्दोलन में देश भर से आवाज़ नहीं उठी। यहाँ का शोषण जब तक बिकने वाली खबर नहीं बन गया तब तक यहाँ की मांसलता पर ही लिखा जाता रहा। जब बांग्लादेशी रिफ्यूजी बस्तर में बसाये जा रहे थे उस दौर में बोधघाट बंद करो विस्थापन होगा का शोर मचाने वाले समाजसेवी या मानवाधिकारवादी क्या भांग का गोला निगले रहते थे? उस दौर में किसी को दण्डकारण्य परियोजना और उसके तहत बहुत बडी मात्रा में बांग्लादेशी विस्थापितों को बसाना यहाँ की अबूझता, यहाँ की संस्कृति, यहाँ की जनजातियों, यहाँ की लोककला, यहाँ की परम्पराओं पर आघात क्यों नहीं लगा? बस्तर ही क्यों? क्या कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक के भूभाग को छोड कर बस्तर का इस बसाहट के लिये चयन तब एक सांस्कृतिक हमला नहीं था? बस्तर के भीतर से तब आवाजें उठी थीं किंतु वह इस देश का स्वर क्यों नहीं बन सकीं? 

दण्डकारण्य परियोजना के नाम पर उस दौर में लूट-खसोट का एक लम्बा सिलसिला चला। श्री गोरेलाल झा के 1968 में प्रकाशित एक आलेख से उद्धरण है कि “करीब चालीस हजार एकड भूमि जो कि सुरक्षित वन में स्थित थी इस योजना के लिये दी गयी। आदिवासियों को भूमि देने का उतना दुख नहीं है जितनी कि इस नीति से कि भूमिहीन आदिवासियों को तो कोई इस सुरक्षित वन में एक एकड भूमि देने के लिये भी तैयार नहीं है”। एक उदाहरण महाराजा प्रवीर की डायरी में मिलता है कि दण्डकारण्य परियोजना पर युक्ति व बुद्धि बंगाल की ब्युरोक्रेसी लगा रही थी। एक राय आयी कि वहाँ बंगाल में होने वाली बाँस की प्रजाति का रोपण किया जाये क्योंकि उससे रिफ्यूजियों का कुटीर उद्योग संचालित हो सकता था। प्रवीर नें विरोध किया कि बस्तर में अपनी ही तरह के बाँस होते हैं तथा उसी से यहाँ की जनजातियाँ टोकनी सूपा या अन्य कलात्मक वस्तुओं का निर्माण करती हैं। लाखो रुपये फूंके गये और नतीजा सिफर निकला। यहाँ पाईन रोपण परियोजना के परिणाम भी बांस रोपण जैसे ही भयानक थे। बस्तर में जब मालिक मकबूजा की लूट चल रही थी तब राष्ट्रीय मीडिया का मौन और यहाँ पर दिल्ली के आन्दोलनकारियों का अकाल क्यों था? आज जिनकी यहाँ के शोषण से आह!! निकल आती है; अमेरिका तक से यहाँ के दर्द को गीत बना बना कर गाते है तब इन बीनों को फूंक मारने की फुरसत क्यों नहीं रही थी? लेव्ही को ले कर तथा धान के मूल्य निर्धारण को ले कर प्रवीर नें व्यापक आन्दोलन चलाया था तब उनके समर्थन में मौन क्यों था वह भी एसा मौन कि उनकी नृशंस हत्या के लगभग पचास साल बाद उनके लिये पहली श्रद्धांजली सभा कुछ वर्षों पूर्व ही जगदलपुर में सम्पन्न हो सकी। 1961 का लौहण्डीगुडा गोली काण्ड, 1966 का राजमहल गोली काण्ड अंचल की भीषणतम घटनायें हैं जिनके विषय में आज तक केवल मौन ही पसरा हुआ है। जब बीबीसी के कैमरे बस्तर के घोटुलों में पूरी बेशर्मी के साथ घुसे थे और अधकचरी जानकारियाँ एकत्रित कर उसे यौन फिल्म की तरह विश्वभर में परोस दिया था तब भी केवल और केवल स्थानीय साहित्यकारों और लेखकों नें ही आवाज उठाई थी। मई 1981 में दण्डकारण्य समाचार में प्रकाशित श्री राम सिंह ठाकुर के आलेख का अंतिम पैरा “आज जब कि बस्तर के मूल निवासियों के संस्कृति पर विदेशी अपनी मनमानी कर के फिल्म बना सके वहाँ उस देश के अन्य मूल निवासियों का क्या होगा? उचित तो यही होगा कि बीबीसी द्वारा बनाये गये फिल्मप्रदर्शन पर विश्वस्तरीय रोक लगा दिया जाये और फिल्म को भारत ला कर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाये”। प्रश्न यह है कि इन आवाजों को सुनने वाला कोई क्यों नहीं था? क्या तब देश भर में एक्टिविस्टों का अकाल था? आज भी नक्सली बीबीसी प्रसारणों का ही अनुसरण जानकारी बटोरने के लिये करते हैं जिसका उल्लेख कई बार नक्सल समर्थक लेखकों नें अपने आलेखों में किया है। आज भी बीबीसी के संवाददाताओं के पास ही नक्सली अपने मध्यस्तों के नाम तय करने के लिये एसएमएस भेजते हैं, यह तो सर्वविदित है चूंकि ताजा घटना है। बडी बडी राष्ट्रीय खबरों से बडी घटना थी किरंदुल गोली कांड चूंकि यह 20,000 असंगठित मजदूरों का मसला था। यह उस दौर की घटना है जब नक्सलियों की आमद भी बस्तर में हो चुकी थी। इन मजदूरों से एसी क्या खता हुई थी कि यह घटना केवल स्थानीय अखबारों की सुर्खियाँ बन कर रह गयी तथा वाम आन्दोलन के नाम पर दादा बन कर घुसे नक्सलियों नें भी घटना पर मौन ही साधे रखा था। दिल्ली का एक्टिविज्म तो हमेशा ही पहले की तरह चुप रहा - नक्सलियों की आमद पर मौन उनकी नृशंसताओं पर मौन.....। 

अचानक बस्तर में क्या हुआ कि सारे एक्टिविस्ट दिल्ली में “ले अंगडाई हिल उठी धरा..” एक साथ जाग गये; वस्तुत: जिन मुद्धों पर बस्तर का दुष्प्रचार करने वाले लोग दिल्ली में सक्रिय हैं उनकी मानसिकताओं और राजनीति को समझना आवश्यक है। उनका निशाना व्यवस्था नहीं है वह तो केवल चदरिया झीनी झीनी है अन्यथा तो खेल विचारधारा के बस्तर में जारी युद्ध के लिये समर्थन बनाने और बचाने का है। जायज आवाजें हाशिये पर हैं तथा वे स्वर राष्ट्रीय भोंपू बनते जा रहे हैं जिनमें यहाँ के भूगोल और अतीत तो छोडिये वर्तमान तक की समुचित समझ नहीं है। बस्तर के मुद्दों का राष्ट्रीयकरण नक्सलियों के प्रभावी होने के साथ साथ हुआ है किंतु क्या वास्तविक सरोकार विषयवस्तु बन रहे हैं? देश-विदेश में सलवाजुडुम का विरोध किया और अब बस्तर में इस आन्दोलन से जुडे आदिवासी एक एक कर नक्सलियों द्वारा मारे भी जा रहे हैं। किस सामाजिक तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता नें इस विषय को खुल कर उठाया है और अब भी जारी इस अनावश्यक हत्या श्रंखला का विरोध किया है? इन घटनाओं का विरोध असल में उस माहौल को बनाये जाने की कोशिश का हिस्सा नहीं है जिसे विश्व भर में दिखा कर इस क्षेत्र को निरंतर उपनिवेश बना रही विचारधारा की बंदूखों को जायज ठहराया जाना है। उसने पेड काट दिया, उसने बलात्कार कर दिया, उसने प्रताडित कर दिया, वह नंगा है, वह भूखा है, उसके घर में बिजली नहीं है, वहाँ अभी भी स्कूल नहीं है, पुलिसिया दमन हो रहा है आदि आदि केवल बस्तर का चेहरा नहीं है यह पूरे भारत का एक जैसा सच है और एक जैसा ही कडुवा। पत्रकार भाईयों को इन तथ्यों-सत्यों को उजागर करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिये। मेरा इशारा उन समाचारों की खदानों की,ओर है जो समाचार चुनते है और चुने हुए समाचारों के साथ बौद्धिक विलास करते हैं। मेरे पास इसी तरह के प्रचार का हिस्सा एक ईमेल निरंतर आता है जिसमें कई प्रकाशित आलेखों के लिंक होते हैं [बहुतायत कहानियाँ छत्तीसगढ के नाम पर कभी झारखण्ड की होती हैं कभी महाराष्ट्र की तो कभी आन्ध्र की। इसके अलावा देश भर में कुछ चुने हुए लोगों की गतिविधियों का ब्यौरा कि कहाँ-कहाँ दिल्ली में बस्तर के नाम पर हाय तौबा की]। इन चुनी हुई कहानियों पर अगाध श्रम किया जाता है। ये कहानियाँ वह मील का पत्थर बनायी जाती हैं जिन्हें लहरा लहरा कर बस्तर को दुनिया की सबसे डरावनी जगह बनाये जाने की कोशिश लगातार की जा रही है। ये समाचार बस्तर के वास्तविक सरोकार भी नहीं अपितु सरोकार के करीब की घटनायें मात्र हैं। उदाहरण के तौर पर एक सप्ताह में नक्सलियों नें चार सडकें फोडी, दो स्कूल विध्वंस कर दिये एक बाजार में हमला किया आदि आदि तो यह सामान्य घटना लेकिन इसकी प्रतिक्रिया राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समाचार। ये समाचार पोर्टल, समाजसेवी और विचारक बस्तर की समस्याओं का कोई समाधान ले कर आज तक क्यों उपस्थ्ति नहीं हुए? 

यहाँ समस्या है कृषि का आधुनिकीकरण किये जाने की, यहाँ आवश्यकता है सिंचाई के साधन विकसित किये जाने की, यहाँ आवश्यकता है शिक्षा के बेहतर माहौल की, यहाँ आवश्यकता है उच्च शिक्षा के मौजूदा संस्थानों को दुरुस्त करने तथा उनमे आदिवासी छात्रों को विशेष वरीयता तथा आर्थिक मदद दिये जाने की, यहाँ आवश्यकता है रोजगार मूलक उपायों की, यहाँ आवश्यकता है साफ पानी की, बिजली की, सडक की। पिछले बीस-सालों में इन विषयों पर न तो विमर्श हो रहा है न ही आन्दोलन। वस्तुत: अगर इनके समाधानों की बात और कोशिश की पहल होगी तो नक्सलवाद की प्रासंगिकता क्या बचेगी; इस बात को पूरी तरह जान कर और समझ कर जनसरोकारों की नये किस्म की परिभाषा गढी गयी है जिसमें दो ही किरदार हैं नक्सली जो क्रांतिकारी हैं और पुलिस जो विलेन है। इस पृष्ठभूमि के लेखो में ड्रामा है, फिक्शन है.....समाधान नहीं हैं। जिन्हे बस्तर का ‘ब’ पता नहीं उनसे हम समाधान की उम्मीद रखें यह तो हमारी ही सोच में कमी हुई न? 

समाधान ‘केवल और केवल’ पढी लिखी आदिवासी पीढी के पास ही है। आप ही उर्वरा बीज हो और आप ही अपना स्वर। दिल्ली में बहुत से लोग भगतसिंह का मुखौटा लगाकर आपकी क्रांति करने की जुगत में हैं; उनके भरम में आये बिना अपने चेहरे के साथ अपनी मुट्ठी बाँधिये। अपने अधिकार के लिये लडाई आपकी अपनी है। फिर वह वयवस्था के खिलाफ हो अथवा आपकी आड में वयवस्था बदलने वाली बदूखों के खिलाफ.....आपको अपनी बुद्धिजीविता के साथ अपना स्वर बनना ही होगा। आपकी अपनी कोई आवाज नहीं है इस लिये दिल्ली के पास भोंपू है। आदिवासी मित्रों, शिक्षा सोच देती है तथा अपनी समस्याओं को स्वयं अनुभव कर निराकरण की समझ भी स्वयं में विकसित कर देती है। गहराई से उन समस्याओं की विवेचना कीजिये जो आपके सरोकारों को स्पर्श करते हों। यह समय आपकी सक्रियता का है क्योंकि ‘चलता है’ कि प्रवृत्ति ही आपको हाशिये पर धकेल रही है। अपनी अभिव्यक्ति के अवसर तलाशिये और अपनी बात सकारात्मकता से कहिये क्योंकि व्यवस्था के खिलाफ खडे होना आपका अधिकार है तथा बस्तर के खिलाफ चल रहे दुष्प्रचार के विरुद्ध लामबंद होना आपका कर्तव्य। जड ही महत्वपूर्ण होती है तथा आपकी जडें हजारों सालों का गौरवशाली अतीत आपके साथ जोडती हैं। आप गेन्दसिंह, झाडा सिरहा, आयतु माहरा, यादव राव, व्यंकट राव, डेबरी धुर और गुण्डाधुर की संततियाँ हो। आपका नेतृत्व सुबरन कुँवर जैसी वीरांगना और प्रवीर जैसे विचारक नें किया है फिर एसा क्यों कि आप बस्तर के दुष्प्रचार तंत्र के प्रति नाराज नहीं होते। मित्रों यह जाहिर करना ही होगा कि हम किसी ओर की बंदूख के साथ नहीं है और किसी दुष्प्रचार का हिस्सा भी नहीं है। बस्तर हमारा है और अब बहुत हो चुका इसका नवनिर्माण भी हम बस्तरिया ही करेंगे।