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Sunday, July 22, 2012

बस्तर मे जीवित पुरापाषाणकाल और कातिल विचारधारायें।


बस्तर क्षेत्र के इतिहास की विवेचना हम बस्तर क्षेत्र के इतिहास की विवेचना हम अत्यधिक सतही प्रमाणों के आधार पर कर पाते हैं। संभवत: हमारे युग को ज्ञान की लालसा ही नहीं रही और हमारी पीढी केवल उन विषयों के अध्ययन तक सिकुडती जा रही हैं जिसके केन्द्र में पैसा बैठा हुआ है। मगध क्षेत्र के बस्तर से अंतर्सम्बन्धों पर काम करते हुए भी यही दु:खद आश्चर्य मेरे सम्मुख था कि अंग्रेजों नें नालंदा के पुरावशेषों को बाहर लाने का जितना काम कर दिया वहीं आज भी हम ठहरे हुए हैं। न तो अब तक नालंदा विश्वविद्यालय का मुख्यद्वार प्राप्त हुआ है न ही उन पुरा-पुस्तकालयों का स्थल जिन्हें खिलजी नें आग लगा कर मिटाने का यत्न किया था। यही हाल वैशाली की उस पुरा-संसद का है जहाँ राजा ‘विशालगढ का किला’ नाम से खुदाई हो रही है। वैशाली में इस स्थल पर विश्व की सबसे प्राचीन संसद विद्यमान है जब इतने सालों में हमारे इतिहासकारों नें उसके अवशेष ही बाहर लाने में कोई रुचि नहीं दिखाई तो बस्तर के अतीत पर प्रामाणिकता से कितनी बात हो सकती है कहना कठिन है। कलिंग, आन्ध्र, कोशल, विदर्भ से घिरा बस्तर (दण्डकारण्य़) का क्षेत्र अपने अतीत को जानते के लिये इन्हीं क्षेत्रों की ओर लोलुप निगाहों से देखता है क्योंकि यहाँ बडी शासन-प्रणालियों की सत्ताएं रही हैं। इसके साथ ही आपको आदिम जीवन शैली को बहुत बारीकी से परखना होगा तो भी अतीत की रेखायें विद्यमान नज़र आयेंगी।  


माडिया जीवन शैली नें पाषाण युगीन अवस्था को अब भी बचा कर रखा है। मृतक स्मृति चिन्ह आज भी एक जीवित परम्परा है। इतना ही नहीं अबूझमाड़िया मुख्यत: स्थानांतरिक खेती करते हैं तथा इनकी कृषि परम्परा को दाही कहा जाता है; यह भी एक पुरा-परम्परा है जिसका सम्बन्ध पाषाण काल से ही है। माडिया जनजाति का बस्तर क्षेत्र में बाहुल्य है तथा इस क्षेत्र में उन्हें खदेडे जाने तथा दुर्गम क्षेत्रों में समेटे जाने जैसे कथनों को अवधारणा ही कहा जायेगा क्योंकि आर्यों के आगमन से बहुत पहले से यह अबूझमाड़ माड़ियाओं की ही भूमि बनी रही है। बिना किसी विवेचना किये एक नव-पुरापाषाण कालीन दृष्य की परिकल्पना कीजिये जब कबीलों के आक्रमण तथा हिंसक पशुओं से सुरक्षा पाने के लिये आदिम समाज नें अपने आवास के इर्फगिर्द पत्थरों की बाड बना कर उसे सुरक्षित करना आरंभ किया होगा। उसने नुकीली लकडी से मिट्टी खोद कर बीज बोना और पत्थर के हँसिये से फसल काटना आरंभ किया होगा। इस दृश्य को साकार आज भी अबूझमाडिया करते हैं। वही जंगल जला कर खेती और आखेट। यह प्रकृया इतनी सहज उनके जीवन में रच बस गयी है कि इन्हें आज के विचारक समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद जैसी घुट्टी जबरन पिलाने को आतुर हैं अपितु इनसे ही बहुत कुछ सीखे जाने की आवश्यकता है। माड़िया समाज में खेती पर पूरे गाँव का अधिकार होता है यही कारण है कि जमीन सम्बन्धी विवाद उनके बीच नहीं देखे जाते। मूल आवश्यकता संरक्षण की है किंतु जनजातियों को उपेक्षित रख कर अथवा किसी विचारधारा प्रधान युद्ध में झोंक कर नहीं। आवश्यकता अनावश्यक परम्पराओं को तोडने के लिये उनको किसी बौद्धिक हथियार से कुचलने की भी नहीं है।    


इसकाल से एक अन्य अंतर्सम्बन्ध है अमूझमाड का विवस्त्र जीवन; अपितु महिलाओं का वक्षस्थलों को न ढक कर स्वाभाविक रहना भी अतीत से वर्तमान तक जुडी हुई कड़ी ही है। आश्चर्य है कि अरुन्धति राय का आलेख “वाकिंग विद द कामरेड्स” आदिवासी परम्पराओं की झूठी दास्तान प्रस्तुत करता है जिसे शहरी जिन्दाबाद-मुर्दाबाद वादी वर्ग नें बिना तर्क के हजम भी किया और आउटलुक जैसी पत्रिका नें बिना जाँच के छापा भी। अरुन्धति लिखती हैं (पृष्ठ – 75) कि “एक शाम अलाव के पास बैठी एक बूढी औरत उठी और उसने दादा लोगों के लिये एक गीत गाया। वह माड़िया आदिवासी थी जिनके बीच रिवाज था कि औरतें शादी के बाद चोलियाँ उतार दें और छातियाँ खुली रखें।....। औरतों के खिलाफ यह पहला मामला था जिसके खिलाफ पार्टी नें अभियान चलाने का फैसला किया”। यह वाक्यांश असत्य है। पहली और महत्वपूर्ण बात कि माडिया स्त्रियों में शादी के पहले हो या शादी के बाद; चोली (ब्ळाउज शब्द का प्रयोग अरुन्धति नें किया है) पहनने का चलन पुरा-काल से ही नहीं रहा है और इस रहन में उनकी स्वाभाविकता के पीछे हजारों साल का जैसे थे वाली जीवन शैली ही है। हमने समय के साथ पहला बदलाव देखा कि महिलाओं नें कमर पर पहने जाने वाले कपड़े के साथ खोंस कर लुंगी बाँध कर उससे वक्षस्थलों को ढकना आरंभ कर दिया था। अपनी बात सिद्ध करने के लिये मैं कुछ विद्वानों के उद्धरण लेना चाहूंगा। पं. केदारनाथ ठाकुर की 1908 में प्रकाशित पुस्तक इस सम्बन्ध में सबसे प्राचीन मानी जाती है उनकी नवकार प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “बस्तर भूषण” के पृष्ठ 48 से माडिया स्त्री जीवन का उल्लेख लीजिये वे लिखते हैं “साधारण लोग रस्सी से गुहाद्वार और उपस्थ के सामने पत्ते बाँध लेते हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी बाकी सब शरीर खोले रहती हैं....चाहे राजा महाराजा आवैं इनका मामूली यही ठाठ है”। चोली इसके बाद भी जीवन शैली में उपस्थित नहीं दिखती अपितु डॉ. नारायण चौरे नारायणपुर और निकटवर्ती क्षेत्रों का अध्ययन कर अपनी किताब आदिवासियों के घोटुल (पृष्ठ -18) में लिखते हैं कि “गले में रंग बिरंगी लाल-सफेद घुंघचियों की माला, मोतियों की, काँच की, रंगीन गुरियों की, लाख या कौड़ी की, घास की बीजों की मालायें पहनती हैं। इनके स्तन खुले रहते है। इसका कारण वे अपने ही प्रेमी को अपना बना लेना चाहती हैं। घोटुल की मोटियारी के मतानुसार स्तन को वे लड़कियाँ ढकती हैं जिन्हें प्रेम करना नहीं आता, जो प्रेम को पाप समझे, प्रेम एसों के लिये गिरगिट की तरह होता है, जो उससे भूत की तरह भागे या भय खाए”। उपरोक्त उदाहरणों को यहाँ प्रस्तुत करने का मायना है कि समय के साथ साथ अब जा कर चोलियाँ माडिया स्त्री जीवन में स्वयं उपस्थित हुई और हो भी जायेंगी किंतु इस प्रक्रिया को किसी भ्रामक तर्क के आईने में देखना उचित नहीं। मेरा मानना है कि स्वत: होने वाले परिवर्तन, परम्पराओं में भी अपनी पुरातनता की खुशबू सहेज लेते हैं किंतु इस स्वाभाविकता का ‘लाल सलाम’ जबरन है और अनुचित है।


इसी आलोक में कुछ बातें बस्तर के बहुत पुराने अतीत की। प्रागैतिहासिक काल से ही यहाँ मानव रहा है। इन्द्रावती, नारंगी और कांगेर नदियों के किनारों से पुरा-पाषाण काल के मूठदार छुरे मिले हैं। उस समय का आदमी जिन उपकरणों से पशुओं की खाल या पेड़ों की छाल उतारता था, हड्डी तोड़ने, मांस काटने या चमडे में छेद करने में काम आने वाले उसके जो औजार थे, वे यहाँ मिले हैं। इसके बाद का समय यानी कि मध्य-पाषाणकाल; इन्द्रावती नदी तो खोज करने वालों के लिये खजाना हो सकती है। फ्लिट, चार्ट, जैस्पर, अगेट जैसे पत्थरों से बनाये गये तेज धार वाले हथियार इन्द्रावती नदी के किनारों पर खास कर खड़क घाट, कालीपुर, भाटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चंदेला, घाटलोहंगा के पास मिले हैं। नारंगी नदी के किनारे भी गढ़बोदरा और राजपुर के आसपास ऐसे औजार और हथियार देखे जा सकते हैं। खोजने वालों को इन जगहों से कई तरह के खुरचन के यंत्र, अंडाकार मूठ वाला छुरा और छेद करने वाले औजार मिल रहे हैं। ये तो स्वाभाविक है क्योंकि उन दिनों आदमी की निर्भरता या तो शिकार पर रही होगी या कंदमूल पर। 


बस्तर और इसके आसपास के उत्तर-पाषाण युग का आदमी अच्छे किस्म के पत्थरों से कई कामों को एक साथ करने वाले उपकरण और औजार बनाने लगा। इस समय दांत वाले हड्डियों से बने हंसिये का उपयोग फसल काटने के लिये किया जाता था। विकास लगातार चलने वाली प्रक्रिया है इसीलिये इतिहास का हर अगला काल बेहतर औजारों के किये जाना गया। यानी कि उत्तर-पाषाणकाल का आदमी छोटे और प्रयोग करने में आसान हथियार बनाने लगा था; इनको लकड़ी, हड्डी या मिट्टी की मूठों में फँसा कर बाँधा जाता था। हथियार तो चर्ट, जैस्पर या क्वार्ट्ज जैसे मजबूत पत्थरों से ही बनाए जाते थे। इस समय के अवशेष इन्द्रावती नदी के किनारों पर मिलेंगे खास तौर पर चित्रकोट, गढ़चंदेला तथा लोहांगा के आसपास...। नव पाषाणकाल तक आते आते यहाँ के आदमी चित्रकार हो गये थे। कई गुफायें उपलब्ध हैं जिनकी छतों पर शिकार करने, शहद इकट्ठे करने, नाचने-गाने, जानवरों की लड़ाईयाँ, आग की पूजा, पेड़-पौधों से संबंधित बहुत से चित्र बने मिलेंगे। जैसा जीवन वे जी रहे थे उसे चित्र बना कर हमारे लिये इतिहास छोड़ गये। नड़पल्ली पहाड़ी दक्षिण बस्तर में है जहाँ लगभग चार हजार फुट की उँचाई पर एक नव-पाषाण काल की गुफा है जिसमें हिरणों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। इन्द्रावती नदी के किनारे, मटनार गाँव के पास भी इस समय के बने गुफा-चित्र मिलते हैं जिसमें जानवरों की आकृतियाँ बनायी गयी हैं। मटनार में एक चित्र ने मेरा ध्यान खींचा था जिसमें आदमी की हथेलियों से किसी अलौकिक शक्ति की पूजा का संकेत मालूम पड़ता है। फरसगाँव के पास आलोर गाँव में भी चिड़िया के चित्र बने हुए हैं। ये गुफा चित्र ही बताते हैं कि तब इन्द्रावती नदी में नाव चलायी जाने लगी होगी इतनी ही नहीं  मछली का शिकार करने के प्रमाण भी मिलते हैं।  


बस्तर और इसके आसपास नव पाषाणकाल में मानव सभ्यता का ठीक-ठाक विकास हो गया था। उस समय का आदमी खेती करने लगा था; जानवर पालना जान गया था; घर बना कर रहने लगा था; बर्तन बनाना जान गया था....।  इसी समय से आदमी जंगल जला कर, खाली हुई जमीन को नुकीली लकड़ी से खोद कर खेती करने लगा था। वह अपनी फसल बचाने के लिये झोपड़ी बना कर रहने लगा होगा। अनाज और पानी जमा करने के लिये बनाये गये मिट्टी के बर्तन के अवशेष कई जगहों पर मिले हैं। नव-पाषाण काल के पेड़ काटने के लिये बनाये गये पत्थर के औजार तो देखने लायक हैं। समय के साथ अनाज, जानवरों और औजारों के लिये कबीलों में आपसी झगड़े भी हुए। घरों और पालतू जानवरों को हिंसक जानवरों से बचाने के लिये पत्थर की बाड़ लगायी जाने लगी। उसूर, छोटे ड़ोंगर, गढ़चंदेला और गढ़धनोरा में नवपाषाणकाल के अवशेष और उपकरण देखे जा सकते हैं। गढ़चंदेला, गढ़धनोरा और वोदरा में तो उँची पहाड़ी पर नवपाषाण काल के बने आवास स्थल भी देखने को मिल जायेंगे। पाषाणयुग के बाद ताम्र और लौह युग आये। सभ्यता के इन युगों की बहुत सीमित जानकारी ही मिल पायी है। इन युगों के कुछ उपकरण दक्षिण बस्तर में मिले हैं इनमे बहुत खास है नुकीले बेल्ट वाली एक कुल्हाड़ी।


बी. डी. कृष्णास्वामि अपनी कृति “प्री हिस्टोरिक बस्तर” में उल्लेख करते हैं कि ईसा से लगभग एक सहस्त्राब्दि पूर्व महापाषाणीय शवागारों का प्रचनल था। शवों को गाड़ने के लिये बड़े शिलाखंडों का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार के शवगारों के उस समय के अवशेष करकेली, सकनपल्ली, हांदागुडा, गोंगपाल, नेला-कांकेर तथा राये में मिल जायेंगे। उन दिनों भी शव के साथ कब्र में अन्न, जल, अस्त्र-शस्त्र और मिट्टी के बर्तन जैसी चीजें रखी जाती थी। आज भी बस्तर के माड़िया ठीक यही करते हैं; इसी तरह शवागारों के उपर स्तंभों को गाडते हैं। यह परम्परा बहुत खूबसूरती से हजारों हजार साल का सफर तय करती हुई आज तक आ पहुँची है। जैसा कि मैंने आरंभ में कहा था समय स्वयं परम्पराओं को खूबसूरत स्वरूप दे देता है तथा उनमें आधुनिकता का स्त: समावेश होने लगता है, इन्हें खण्डित करने की आवश्यकता नहीं। मृतक स्तम्भ समय के साथ नक्काशीदार खम्बों में भी परिवर्तित हुए। अस्त्र-शस्त्र, चिडिया, जानवर या आदमी की आकृतियों नें इन मृतक स्तम्भों में जगह बनाना आरंभ किया। गायता के स्मृति स्तंभ कर कपडा लपेटने की प्रथा भी प्राचीन स्वरूप में नये बदलाव का संकेत देती है। अबूझमाड एक जीवित संग्रहालय है जहाँ अब सोच की खुली ऑक्सीजन कम हो गयी है। जंगल के भीतर आन्ध्र और निकटवर्ती राज्यों से घुस आये तथाकथित क्रांतिकारियों नें बिना विचार किये जीवन शैली तहा परम्पराओं में जो बदलाव जाने की कोशिश आरंभ की है वह संवेदनहीनता है। माओवाद के नाम पर माड क्षेत्र में जारी युद्ध में मारे जाने वाले अधिकतम लोग माडिया ही हैं क्योंकि उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में खडा किया गया है। मारे जाने के बाद उनके अंतिम कर्म तो परम्परागत हों भले ही बंदूख वालों को ईश्वर पर आस्था नहीं तथापि इतिहास पर तो होनी चाहिये? लाल रंग के जिन स्तूपों जिनका निर्माण मृतकों की स्मृतियों को जिन्दा रखने के बहाने इन दिनों देखने में आ रहा है वे प्राचीन काल में बनाये जाने वाले युद्ध स्तंभों जैसे हैं इनका आदिम परम्पराओं से कोई लेना देना नहीं है। विचारधारा अपनी जगह है, युद्ध और उसकी सच्चाईयाँ अपनी जगह है किंतु माड क्षेत्र की जीवित परम्परा को इस तरह मरते देख कर असंतोष होता है कि वह माडिया जो अपने पहचान के संकट से कभी नहीं गुजरा उसे पहचानना कठिन हो जायेगा। क्रांति माडिया स्त्रियों को हरी बुश्शर्ट पहना कर, बंदूख थमा देने से आनी होती तो कब का आ जाती। माडिया बच्चे हरे भरे जंगल के बीच गुजरी सडक से हो कर स्कूल जायें लेकिन मांदर की थाप पर उनके कदम थिरकना न भूलें तो क्रांति आयेगी। माडिया दफ्तरों तक पहुँचें, खेती के तरीकों में आधुनिकता लायें, अस्पतालों और बिलजी जैसी मूलभूत आवश्यकतायें उनके घर तक आ पहुँचे किंतु जब उसका देहावसान हो तो परिजन परम्परा के पुरातनता की खुशबू बनाये रखें और स्मृति स्तंभ उसकी यादों को चिरजीवी रखें तब आयेगी माडिया क्षेत्रों में क्रांति साथ ही वे जीवित रख पायेंगे विश्व की सबसे प्राचीनतम और सुन्दरतम परम्परायें। मुझे लगने लगा है कि इस जीवित पुरापाषाणकाल को कातिल विचारधाराओं से बचाना आवश्यक है।      

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