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Thursday, April 11, 2013

वीरांगना चमेली बावी: एक अविस्मरणीय समर गाथा

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 9.04.2013 को प्रकाशित

रात बहुत हो चुकी थी लेकिन अन्नमदेव अभी सोये नहीं थे। उनकी आँखों के आगे रह रह कर उस वीरांगना की छवि उभर रही थी जिसनें आज के युद्ध का स्वयं नेतृत्व किया। नीले रंग का उत्तरीयांचल पहने हुए वह वीरांगना शरीर पर सभी युद्ध-आभूषण कसे हुए थी जिसमें भारी भरकम कवच एवं वह लौह मुकुट भी सम्मिलित था जिसमें शत्रु के तलवारों के प्रहार से बचने के लिये लोहे की ही अनेकों कडिया कंधे तक झूल रही थीं। वीरांगना नें अपने केश खुले छोड दिये थे तथा उसकी प्रत्येक हुंकार दर्शा रही थी जैसे साक्षात महाकाली ही युद्ध के मैदान में आज उपस्थित हुई हैं। अन्नमदेव हतप्रभ थे; वे तो आज ही अपनी विजय तय मान कर चल रहे थे फिर यह कैसा सुन्दर व्यवधान? उन्हें बताया गया था कि यह राजकन्या चमेली बावी है जो नाग राजा हरीश्चंद देव की पुत्री है। अन्नमदेव पुन: उस दृश्य को आँखों के आगे सजीव करने लगे जब युद्धक्षेत्र में राजकुमारी चमेली बावी अपनी दो अन्य सहयोगिनियों झालरमती नायकीन तथा घोघिया नायिका के साथ काकतीय सेना पर टूट पडी थीं। इतना सुव्यवस्थित युद्ध संचालन कि अपनी विजय को तय मान चुकी सेना घंटे भर के संघर्ष में ही तितर-बितर हो गयी और स्वयं अन्नमदेव पराजित तथा सैनिक सहायता के लिये प्रतीक्षारत तम्बू में ठहरे हुए यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बारसूर और किलेपाल से उनके सरदार अपनी अपनी सैन्य टुकडियों के साथ पहुँचे और पुन: एक जबरदस्त हमला चक्रकोटय के अंतिम नाग दुर्ग पर किया जा सके।

अगले दिन की सुबह का समय और विचित्र स्थिति थी। आक्रांता सेना अपने तम्बुओं में सिमटी हुई थी जबकि वीरांगना चमेली बावी अपने शस्त्र चमकाते हुए अपनी सेना के साथ आर या पार के संघर्ष के लिये आतुर दिख रही थी। वह अन्नमदेव जिसने अब तक गोदावरी से महानदी तक का अधिकांश भाग जीत लिया था एक वृक्ष की आड से मंत्रमुग्ध इस राजकन्या को देख रहा था। चक्रकोट्य में आश्चर्य की स्थिति निर्मित हो गयी चूंकि इस तरह काकतीय पलायन कर जायेगे सोचा नहीं जा सकता था। तभी एक घुडसवार सफेद ध्वज बुलंद किये तेजी से आता दिखाई दिया। उसे किले के मुख्यद्वार पर ही रोक लिया गया। यह दूत था जो कि अन्नमदेव के एक पत्र के साथ राजा हरिश्चन्द देव से मिलना चाहता था। राजा घायल थे अत: दूत को उनके विश्रामकक्ष में ही उपस्थित किया गया। चूंकि सेना का नेतृत्व स्वयं चमेली बावी कर रही थी अत: वे भी अपनी सहायिकाओं के साथ महल के भीतर आ गयी।

बाहर अन्नमदेव के दिन की धड़कने बढी हुई थीं। वे प्रेम-पाश में बँध गये थे। सारी रात हाँथ में तलवार चमकाती हुई चमेली बावी का वह आक्रामक-मोहक स्वरूप सामने आता रहा और वे बेचैन हो उठते। यह युवति ही उनकी नायिका होने के योग्य है....। केवल रूप ही क्यों वीरता एसी अप्रतिम कि जिस ओर तलवार लिये उनका अश्व बढ जाता मानो रक्त की होली खेली जा रही होती। राजकुमारी चमेली नें कई बार अन्नमदेव की ओर बढने का प्रयास भी किया था किंतु काकतीय सरदारों नें इसे विफल बना दिया। तथापि एक अवसर पर वे अन्नमदेव के अत्यधिक निकट पहुँच गयी थी। अन्नमदेव नें तलवार का वार रोकते हुए वीरांगना की आँखों में प्रसंशा भाव से क्या देखा कि बस उसी के हो कर रह गये। काजल लगी हुई जो बडी-बडी आखें आग्नेय हो गयी थीं वे अब बहुत देर तक अपलक ही रह गये अन्नमदेव की आखों का स्वप्न बन गयी थी।

महाराज! दूत आने की आज्ञा चाहता है।द्वारपाल नें तेलुगू में तेज स्वर से उद्घोषणा की। अन्नमदेव के शिविर से दूत को भीतर भेजने का ध्वनि संकेत दिया गया। अन्नमदेव आश्वस्त थे कि वे जो चाहते हैं वही होगा। हरिश्चंददेव के अधिकार मे केवल गढिया, धाराउर, करेकोट और गढचन्देला के इलाके ही रह गये थे; यह अवश्य था कि भ्रामरकोट मण्डल के जिनमें मरदापाल, मंधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजगढ, भेजरीपदर आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं; से कई पराजित नाग सरदार अपनी शेष सन्य क्षमताओं के साथ हरीश्चंद देव से मिल गये थे तथापि अब बराबरी की क्षमताओं का युद्ध नहीं रह गया था।

क्यों मौन हो पत्रवाहक?” अन्नमदेव नें बेचैनी से कहा। वे अपने मन का उत्तर सुनना चाहते थे आखिर प्रस्ताव ही मनमोहक बना कर भेजा गया था। हरिश्चंददेव से संधि की आकांक्षा के साथ अन्नमदेव नें कहलवाया था कि बस्तर राज्य की सीमा चक्रकोट से पहले ही समाप्त हो जायेगी तथा आपको काकतीय शासकों की ओर से हमेशा अभय प्राप्त होगा। चक्रकोट पर हुए किसी भी आक्रमण की स्थिति में भी आपको बस्तर राज्य से सहायता प्रदान की जायेगी.....राजा हरिश्चंददेव के साथ संधि की केवल एक शर्त है कि वे अपनी पुत्री राजकुमारी चमेली बावी का विवाह हमारे साथ करने के लिये सहमत हो जायें

क्या कहा राजा हरिश्चंद नें?” अन्नमदेव नें इस बार स्वर को उँचा कर बेचैन होते हुए पूछा।
जी राजा नें कहा कि अपनी बेटी के बदले उन्हें किसी राज्य की या जीवन की कामना नहीं है। पत्रवाहक नें दबे स्वर में कहा।

और कोई विशेष बात?” अन्नमदेव आवाक थे।

जी राजकुमारी नें अभद्रता का व्यवहार किया।

क्या कहा उन्होंने?”

“.....उन्होंने कहा कि स्त्री को संधि की वस्तु समझने वाले अन्नमदेव का विवाह प्रस्ताव मैं ठुकराती हूँ

ओहअन्नमदेव के केवल इतना ही कहा और मौन हो गये। यह तो एक कपोत का बाज को ललकारने भरा स्वर था; नागराजा का इतना दुस्साहस कि जली हुई रस्सी के बल पर अकड रहा है? “....और यह राजकुमारी स्वयं को आखिर क्या समझती हैं? अब आक्रमण होगा। विजय के चिन्ह स्वरूप बलात हरण किया जायेगा और मैं उस मृगनयनी-खड़्गधारिणी से विवाह करूंगा। अन्नमदेव की भँवे तनने लगीं थी।

सुबह होते ही युद्ध की दुंदुभि बजने लगी। दोनों ओर की सेनायें सुसजित खडी थीं। हरिश्चंददेव घायल होने के बाद भी अपने हाथी पर बैठ कर धनुष थामे अपने साथियों सैनिको का उत्साह बढा रहे थे। चमेली बावी नें सीधे उस सैन्यदल पर धावा बोलने का निश्चिय किया था किस ओर आक्रांता अन्नमदेव होंगे। यद्यपि आक्रांताओं नें भी भीषण तैयारी कर रखी थी। हरिश्चंद देव की कुल सैन्य क्षमता से कई गुना अधिक सैनिकों नें बारसूर, किलापाल और करंजकोट की ओर से चक्रकोट्य को चेर लिया था। भीषण संग्राम हुआ; नाग आहूतियाँ देते रहे और अन्नमदेव बेचैनी के साथ युद्ध के परिणाम तक पहुँचने की प्रतीक्षा करता रहा। आज कई बार आमने सामने के युद्ध में चमेली बावी नें उसे अपने तलवार चालन कौशल का परिचय दिया था। एसी प्रत्येक घटना अन्नमदेव के भीतर राजकुमारी चमेली के प्रति उसकी आसक्ति को बलवति करती जा रही थी। नहीं; अब युद्ध अधिक नहीं खीचा जाना चाहिये....अन्नमदेव अचूक धनुर्धर थे। धनुष मँगवाया गया तथा अब उन्होंने हरिश्चंददेव को निशाना बनाना आरंभ कर दिया। वाणों के आदान-प्रदान का दौर कुछ देर चला। तभी एक प्राणघातक वाण हरिश्चंद देव की छाती में आ धँसा। अन्नमदेव नें अब कि उस महावत को भी निशाना बनाया जो हरिश्चंद देव का हाथी युद्ध भूमि से लौटाने की कोशिश कर रहा था। नाग सेनाओं में हताशा और भगदड मच गयी। राजकुमारी नें स्थिति का अवलोकन किया और उन्हें पीछे हट कर नयी रणनीति बनाने के लिये बाध्य होना पड़ा। आनन फानन में राजकुमारी चमेली का तिलक कर उन्हें चक्रकोटय जी शासिका घोषित कर दिया गया यद्यपि इस समय केवल गिनती के सैनिक ही जयघोष करने के लिये शेष रह गये थे। बाहर युद्ध जारी था तथा अनेको वीर नाग सरदार अपनी नयी रानी तक अन्नमदेव की पहुँच को असंभव किये हुए थे। अपनी मनोकामना की पूर्ति में इस विलम्ब से कुपित अन्नमदेव नाग नें नाग सरदारो के पीछे अपने सैनिकों के कई कई जत्थे छोड़ दिये। भगदड मच गयी और अनेक सरदार व नाग सैनिक अबूझमाड़ की ओर खदेड दिये गये।

अब अन्नमदेव की विजयश्री का क्षण था। पत्थर निर्मित किले की पहले ही ढहा दी गयी दीवार से भीतर वे सज-धज कर तथा हाथी में बैठ कर प्रविष्ठ हुए। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। नगरवासी मौन आँखों से अपने नये शासक को देख रहे थे। सैनिक तेजी से आगे बढते हुए एक एक भवन और प्रतिष्ठान पर कब्जा करते जा रहे थे। राजकुमारी को गिरफ्तार कर प्रस्तुत करने के लिये एक दल को आगे भेजा गया था। अन्नमदेव चाहते थे कि राजकन्या का दर्पदमन किया जाये और तब वे उसके साथ सबके सम्मुख इसी समय विवाह करें।

क्या हुआ सामंत शाह, लौट आये?...कहाँ हैं राजकुमारी चमेली?”

“.....”

सबको साँप क्यों सूंघ गया है?क्या हुआ?” अन्नमदेव नें अपने सरदार सामंत शाह और उसके साथी सैनिकों के चेहरे के मनोभावों को पढने की कोशिश करते हुए कहा। 

“...जौहर राजा साहब। राजकुमारी अपनी दोनो मुख्य सहेलियों झालरमती और घोगिया के साथ मेरे सामने ही आग में कूद पडी और अपने प्राण दे दिये

तो तुमने बचाने की कोशिश नहीं की.....।बेचैनी में शब्दों नें अन्नमदेव का साथ छोड दिया था।

“...राजकुमारी आग में प्रवेश करने से पहले शांत थी, वे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने मुझे सम्बोधित किया और कहा कि मैं जा कर अपने राजा से कह दूं कि आक्रमणकारी बल से किसी की जमीन तो हथिया सकते हैं लेकिन मन और प्रेम हथियारों से हासिल नहीं होते....।

हाथी अब उस ओर मोड दिया गया जिस ओर से धुँआ उठ रहा था। राजा की नम आँखे कोई नहीं देख सका। एसी पराजय की कल्पना भी अन्नमदेव ने नहीं की थी।

Thursday, February 14, 2013

नागयुगीन बस्तर (760 - 1324 ई.) का समाज और वर्तमान का वैचारिक प्रदूषण



अभी हिन्दी दिवस के अवसर पर एक चर्चा से सामना हुआ। मूल रूप से यह कहे जाने की कोशिश थी कि हिन्दी एक सामंतवादी भाषा है तथा हमें अपनी स्थानीयताओं के स्तर पर उतरना चाहिये अथवा निज मातृभाषा को ही प्रबलता से अपना चाहिये। बस्तर क्षेत्र के अतीत में तो एसी आवाज़ कभी नहीं उठी किंतु पिछले कुछ वर्षों से वाम विचारधारा नें गोंडी का प्रश्न आगे किया है तथा माओवादी स्त्रोतों से एवं कुछ बस्तर के भ्रमणार्थी लेखकों/समाजशास्त्रियों/पत्रकारों नें यही बात बारम्बार राष्ट्रीय मंचों से आगे की है। किसी नें कहा शिक्षा का माध्यम गोंडी होना चाहिये तो कोई बताता है कि जंगल के भीतर माओवादी एसी पाठ्यपुस्तकें तैयार कर रहे हैं जो मूल गोण्डी में ही हैं। केवल गोण्डी ही क्यों बस्तर की अन्य अकेकानेक बोलियाँ भी समान आदरणीय हैं तथा मुझे लगता है कि भाषा-बोली का प्रश्न एक पंक्ति में विश्लेषित होने वाला नहीं है। नाग कालीन बस्तर के समाजशास्त्र पर चर्चा को इसी विन्दु के प्रारंभ करने के पीछे मेरा मंतव्य उस साजिश को उजागर करना है जिसके परोक्ष में जनजातियों को अलग थलग करने की कोशिश पुन: होने लगी है। बस्तर रियासत के अंतिम काकतीय राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव नें मध्य प्रादेशिक हिन्दी साहिय्त सम्मेलन (1950 ई.) के अवसर पर भाषा-बोली के सवालों को उठाते हुए अपने वक्तव्य में नागयुगीन इतिहास को कुरेदते हुए भाषा के सवाल को उठाया था - शिलालेखों से यह भली भाँति सिद्ध होता है कि गोंडों की अवनति लड़ाई में हार जाने के कारण नहीं हुई है परंतु प्रस्तुत प्रश्न के प्रति उदासीनता दिखाने के कारण हुई है। एक ही समय में जब उन्हें मुसलमान और आन्ध्र राजाओं से खतरा मालूम हुआ तो वे अपने अपने जंगलों में जा कर रहने लगे और शेष संसार से स्वयं को अलग कर लिया। संसार की कोई भी जाति अपने को अलग कर के उन्नति नहीं कर सकती।.....अमेरिका के रेड़ इंडियनों का समूल नाश गोलियों से नहीं हुआ। पर उनको रिजर्व यानि बाकी संसार से पृथक रखने से हुआ। हमारे देश के आदिवासी यदि पृथक रखे गये तो उनकी जाति ही नष्ट नहीं हो जायेगी पर उनका नैतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी विकास भी नहीं हो पायेगा। महाराजा प्रवीर नें एक बहु-भाषी अध्यापन का सिद्धांत दिया था व कहा था कि हिन्दी में पढाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, उनके स्थान पर हमें चित्रों की आवश्यकता है। जिसमें प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर दिखा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हलबी और गोंडी में लिख दिया जाये। यह प्रवीर ही थे जिन्होंने सबसे पहले आदिवासी आईसोलेशन के खतरे को भांपा और इसे रोकने के लिये एक एक्टिविस्ट की तरह प्रयास भी किये उन्होंने अजेर (हल्बी बोली में अजेर का अर्थ है उजाला) नाम का पत्र निकाला जो हिन्दी भाषा तथा आदिवासी बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होता था। लाला जगदलपुरी नें भी बाद में इस बात की अहमियत को समझते हुए हिन्दी भाषा व जनजाति बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होने वाला पत्र बस्तरियाप्रारंभ किया था जिनमें वे देश के ख्यातिनाम साहित्यकारों की रचनाओं का जनजातीय बोलियों में अनुवाद प्रस्तुत कर एक पुल बनाने का कार्य कर रहे थे। शायद यही सर्वश्रेष्ठ तरीका है समन्वय का क्योंकि जब आप बस्तर के जनजातीय क्षेत्रों की बात करते हैं तो केवल गोंडी कह कर स्पष्ट विभाजन नहीं किया जा सकता लेकिन इस सवाल पर उनका आईसोलेशन अवश्य किया जा सकता है चूंकि भाषा-बोली के सौहार्द वाले इस जनजाति क्षेत्र में तीस से अधिक बोलियाँ अवस्थित हैं। हलबी बोली नें सभी जनजातियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य नागयुगीन बस्तर से ही आरंभ कर दिया था यही कारण है कि यहाँ दो गोंड जनजातियाँ आपस में बात करते हुए अपनी अपनी बोली में जब गूंगी हो जाती हैं तो हल्बी उनकी ज़ुबान बनती रही है।

आलेख के उपसंहार में इस विषय पर पुन: लौटेंगे पहले नागयुगीन जनजातिगत जटिलताओं पर दृष्टिपात करते हैं। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल बहुत बारीकी से जनजातियों की संरचना का वर्गीकरण करते हैं। उन्होंने दो स्पष्ट विभेद किये हैं। हलबा प्रजाति (यूरोपाईट) जिनका उद्भव आर्य जातियों से हुआ वे नाग युग में पुरोहित, व्यवसायी एवं कृषक तीनों वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। जब कि नाग प्रजाति (वेद्दोआउड) का स्पष्ट विभाजन उनकी कनिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक मधुरांतक देव) के आधार पर धुरवा जनजाति (धुरवा, परजा) तथा वरिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक सोमेश्वर देव) के आधार पर गोंड जनजाति (दोर्ला, माड़िया) आदि में हुआ है। नाग प्रजाति प्रशासन से जुड़ कर योद्धा बन गयी जबकि हलबा - हलवाहक।

नागयुग में पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय होने लगा। संयुक्त परिवार चलन में थे एवं ग्राम संरचना इस तरह थी कि दूर के सम्बन्धी भी एक पक्ति में बने मकानों में रहा करते थे। स्त्री को अब तक प्राप्त अधिकार सीमित होने लगे थे; तथापि धनाड्य परिवारों में स्त्रियाँ बराबरी का हक रखती थी तथा पर्दा प्रथा विद्यमान नहीं थी। नवसाहसांकचरित ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि स्त्रियाँ पुरुषों से हाँथ मिलाती थीं – “रुक्मागतं करग्राहसौहाद्रे पात्रतां नयततथा पुरुषों के साथ मदिरापान भी करती थीं – “मधु कापि पाटलकपोतलरलकलधौतकुण्डला। लोलनिजमुखतुषारकरबिम्बगर्भमधिकार्पिते। जगदलपुर के निकट चपका ग्राम से प्राप्त टेमरा सती अभिलेख तद्युगीन व्याप्त सतिप्रथा की ओर भी इशारा करता है। इस अभिलेख के अनुसार माणिक्यदेवी अपने पति नागराजा हरिश्चंददेव की चिता पर सति हो गयी थी। अब तक प्राप्त किसी भी अभिलेख व साहित्य से जनजातियों की वेषभूषा पर जानकारी नहीं मिलती किंतु उस युग में एलीट क्लास के पुरुष उत्तरीय व अंकुश पहनते थे, गले में हार, मणिकुण्डल तथा यज्ञोपवीत भी धारण करते थे। स्त्रियो के श्रंगारप्रिय होने की जानकारी मिलती है तथा वे अनेक प्रकार की केश-सज्जायें के साथ कण्ठ मे हार, कानो में रक्तकुण्डल व कर्णपुर, हाँथों में मणिकंकण,केयुर, नूपुर, मेखला और रत्नजटित पादुकाओं को धारण करती थीं। श्रंगार प्रसाधन के रूप में आखों में अंजन, होठों में लाली, शरीर में चन्दनलेप तथा पैरों में आलता लगाने के अनेक विवरण नवसाहसांकचरित ग्रंथ से प्राप्त होते हैं। विवाह को ले कर जनजातियों के बीच नीयम जटिल नहीं थे और तब पाँच प्रकार के विवाह प्रचलित थे आर्ष विवाह (वर से शुल्क लिया जाता था), आसुर विवाह (वर कन्या के माता पिता को धन दे कर कन्या को खरीदता है), राक्षस विवाह (वधू का अपहरण किया जाता है), पैशाच विवाह (बलात पतित्व का अधिकार पाया जाता है) तथा गान्धर्व विवाह (माता पिता की अनुमति से प्रेम विवाह)। एक ही गोत्र में विवाह करना निषिद्ध था। उपरोक्त में से बहुतायत विवाह प्रकार बदले हुए स्वरूपों में आज भी चलन में हैं।

नागयुग तक जैन धर्म-बौद्ध धर्म की पैठ चक्रकोट्य (बस्तर) में बनी हुई थी। यही वह समय है जब हिन्दू मान्यताओं और पूजा-परम्पराओं नें जनजातिगत मान्यतों के भीतर भी जगह बनाना आरंभ किया। शिव एक प्रमुख आराध्य देवता के रूप में उभरने लगे तथा तंत्रमंत्र के माहौल में शाक्त देवियों व सप्तमातृकाओं की भी आराधना व्यापक रूप से की जाने लगी। नागराजाओं की कुलदेवी माणिकेश्वरी थीं। नागयुगीन मंदिरों नें नृत्य-संगीत को समुचित प्राश्रय दिया तथा राजा सोमेश्वर देव के गढिया अभिलेख के अनुसार नृत्यांगनाओं को समुचित दान की वयवस्था शासन की ओर से थी।

नागयुग के शिल्पकार स्तुत्य हैं जिन्होंने एसी अनुपम धरोहरें बस्तर को सौंप दी हैं जो अलगी कई शताब्दियों तक इतिहास को जीवित रखेंगी। नारायणपाल का विष्णु मंदिर, बस्तर का शिव मंदिर, कुरुषपाल, भैरमगढ, चित्रकोट, गढधनोरा, केसरपाल, चपका, मटनार, छोटे-डोंगर, दंतेवाड़ा, कोईलीबेड़ा, कटगाव आदि में अवस्थित मंदिर तथा भग्नावशेष नागयुगीन वास्तुकला की आज भी गवाही देते हैं। बारसूर का बत्तीस स्तम्भों वाला मंदिर तो अनुपम है। अंग्रेज प्रशासक दि ब्रेत (1909) नें उल्लेख किया है कि एक ज़माने में बारसूर के मंदिर अपनी मिथुन मूर्तियों के कारण खजुराहो के मंदिरों से भी भव्य थे। किंतु अज्ञानता के कारण राजा महिपाल देव नें उन्नीसवीं सदी में इन्हें नष्ट करवा दिया था। आज भी मूर्तियों का बारीक अन्वेषण उनमें छिपे आदिम अभिव्यक्ति के छिपे कई दृश्य सामने लाता है जिसमें कहीं आदिवासी जीवन की पीडा है तो कहीं प्रेम भी है।

अब पुन: भाषा से प्रारंभ हुई चर्चा पर लौटते हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल नें अपनी पुस्तक चक्रकोट के छिन्दक नाग में उल्लेख किया है कि उन्होंने नागयुगीन बस्तर के कुल तैतीस अभिलेखों की खोज की है जिसमें से 16 अभिलेख तेलिगु में एवं 17 अभिलेख संस्कृत में हैं। डॉ. शुक्ल का मंतव्य है कि इन्द्रावती नदी एक स्पष्ट विभाज्य देखा है जिसके उत्तर का क्षेत्र संकर संस्कृत का तथा दक्षिण का अंचल संकर तेलुगु का रहा है। नागयुगीन राजा भाषा को ले कर स्पष्ट सोच रखते थे तथा समय समय पर उन्होंने एक भाषा नीति बनायी थी। नागयुगीन बस्तर की प्रथम राजभाषा (925-1062 ई.) तेलुगु थी चूंकि तब नाग दक्षिण से बस्तर आ कर स्थापित हुए थे एवं स्वयं का विस्तार करने के लिये अपनी भाषा को माध्यम बनाना उन्हें उचित लगा होगा। मधुरांतक देव (1062-1069 ई.) नें भाषानीति को बदल कर संस्कृत को राजभाषा घोषित किया। संभवत: इसका कारण सोमवंशी, कलचुरी, ओडिशा तथा चोल शासकों से सहसम्बन्ध बढाना रहा होगा। इसके बाद तीसरी राजभाषा नीति का काल 1069-1218 के मध्य का है जहाँ तेलुगू एवं संस्कृत दोनो को ही राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। सोमेश्वर देव (1069-1111ई.) नें कुल नौ आज्ञा पत्र जारी किये जिनमें से पाँच संस्कृत में तथा चार तेलुगु में थे। इस अवधि के विषय में डॉ. शुक्ल लिखते हैं कि भाषा-बोलियों का सम्मिश्रण जनजातियों में इसी प्रकार नागयुग में होता रहा। आन्ध्र के प्रभाव वाले क्षेत्रों में तेलुगु नें माड़िया तथा धुर्वी के साथ मिल कर द्विभाषिकता की स्थिति को निर्मित किया तथा हलबाओं के संपर्क में ओडिया भाषा आई। अबूझमाडिया कबीले तब शक्तिशाली थे तथा एकभाषीय बने रहे। कालांतर में द्विभाषी स्थिति तो यथावत बनी रही लेकिन एकलिपि (1218 -1224 ई.) का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इस काल में संस्कृत तथा तेलुगु दोनो ही भाषाओं के अभिलेख नागरी लिपि में लिखे जाने लगे। शनै: शनै: तेलुगु भाषा की परम्परा समाप्त हो गयी तथा संकर संस्कृत (1224-1324 ई.) का विकास हुआ जिसमें स्थानीयता का तेजी से सम्मिश्रण भी होने लगा। एक एसी भाषा में संस्कृत बदलने लगी जिसके बहुत निकट आज की हलबी प्रतीत होती है। इस कारण को प्रमुखता से पहडना होगा कि क्यों हलबी सभी जनजातियों के बीच बोली जाती है जाहे वे गोंड हो या हलबा।

नागयुग में विभिन्न जनजातियों का सहसंयोजन भी हुआ तथा जिन जनजातियों की शासन में सहभागिता नहीं रही वे उपेक्षित व पिछडते भी चले गये। नाग शासन में जनजातियों के बीच आपसी संघर्ष के कोई दस्तावेज़ अथवा प्रमाण नहीं मिलते साथ ही यह सु:खद प्रतीति होती है कि बस्तर में अनेक धर्म, अनेक जातियाँ, अनेक बोली-भाषा बोध के बाद भी आधुनिक तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा विद्वेष फैलाये जाने की साजिश से पहले तक कभी भी इन सवालों पर अनेकता या अलगाववाद की स्थितियाँ निर्मित नहीं हुई हैं। अत: वही दोषी हैं जो बस्तरिया समाज को इस दृष्टि से देख रहे हैं, प्रदूषक-विचारों का विरोध अवश्य होना चाहिये।
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Wednesday, February 13, 2013

नागयुगीन बस्तर की स्त्री प्रशासक – मासकदेवी।


लाला जगदलपुरी जी अपनी किताब बस्तर इतिहास एवं संस्कृतिमें मासकदेवी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं दंतेवाड़ा में एक शिलालेख मिलता है जिसके अनुसार बस्तर के छिन्दक नाग कुल में एक बड़ा प्रतापी नरेश हो गया है, जिसकी एक विदुषी बहिन थी। उसका नाम मासकदेवी था। उसने तत्कालीन वातावरण में नारीचेतना, प्रजा-प्रेम, सेवा-भाव, कृषि उत्थान आदि प्रवृत्तियों के विकास के लिये प्रसंशनीय कदम उठाया था। शिलालेख का समय अज्ञात है किंतु उसमें सर्व-साधारण को यह सूचित किया गया था कि राज्य अधिकारी कर उगाहने में कृषक जनता को कष्ट पहुँचाते हैं। अनीयमित रूप से कर वसूलते हैं। अतएव प्रजा के हितचिंतन की दृष्टि से पाँच महासभाओं और किसानों के प्रतिनिधियों नें मिल कर यह नीयम बना दिया है कि राज्याभिषेक के अवसर पर जिन गाँवों से कर वसूल किया जाता है, उनमें ही एसे नागरिकों से वसूली की जाये, जो गाँव में अधिक समय से रहते आये हों। जो इस नीयम का पालन नहीं करेंगे वे चक्रकोट के शासक और मासकदेवी के विद्रोही समझे जायेंगे। शिलालेख में दर्शायी गयी राजाज्ञा में राजा की बहिन का हाथ है जो प्रजाकल्याण की भावना से तत्कालीन हुकूमत पर हस्तक्षेप करती है और शासक तथा शासित के बीच प्रेम और सौहार्द स्थापित करने की पहल करती है

मासकदेवी पर विमर्श को उनकी ही कुछ पंक्तियों से आगे बढाते हैं

एसे पथराव चल गये लोगो
भाव कोमल कुचल गये लोगो।
भीड में अर्थ खा रहे धक्के,
शब्द आगे निकल गये लोगो। 

वस्तुत: बस्तर को समझने के विमर्श में आम तौर पर लोग मासकदेवी को लांघ कर निकल जाते हैं; संभवत: इसी लिये इस महत्वपूर्ण स्त्रीविमर्श के अर्थ से अबूझ रहते हैं। इस अभिलेख के कुछ शब्दों पर ठहरना होगा वे हैं महासभा, किसानों के प्रतिनिधि तथा कर। जब तक महासभा के कार्य, किसानों के प्रतिनिधियों को हासिल अधिकार तथा कर प्रणाली की विवेचना न हो इस शिलालेख के आधे अधूरे मायने ही समझे जा सकते हैं। संभवत: यह महासभा पंचायतों का समूह रही होंगी जिनके बीच बैठ कर मासकदेवी नें समस्याओं को सुना, किसानों नें गाँव गाँव से वहाँ पहुँच कर अपना दुखदर्द बाँटा होगा। इस तर्क के पीछे गंग युग तक वैदिक सभ्यता की कुछ लोकतांत्रिक परम्पराओं का पाया जाना है। 

विरथ, सभा-समीति आदि पूर्ववैदिक काल से ही चली आ रही वे लोकतांत्रिक संस्थायें थीं जो विचार-विमर्श, सैनिक तथा धार्मिक कार्यों का सम्पादन आदि करती थी। ऋग्वेद में इस प्रकार की संस्थायें यथा- सभा, समीति, विरथ तथा गण का उल्लेख मिलता है। आज भी किसी न किसी बदले हुए रूप में ये सभी संस्थायें देखी जा सकती हैं। अथर्ववेद में उल्लेख है कि सभा च मा समिति-श्चावतां प्रजापतेदुहितरौ संविदानेअर्थात सभा तथा समिति प्रजापति की दो पुत्रियाँ हैं। डॉ. कीथ नें समीति को जनसभा बताया है जबकि सभा को श्रेष्ठ जनों की बैठक से जोड दिया है। इस दृष्टि से मासक देवी के शिलालेख में उल्लेखित पाँच- महासभा के मायने व्यापक हो जाते हैं। नाग युगीन शासन प्रबंध पाँच-प्रधान की बात करता है। सोनारपाल अभिलेख (1224 ई.) में इनमें से चार प्रधानों के नाम हैं महाप्रधान (मंत्री), पडिवाल (दौरावारिक), चामरकुमार (युवराज) तथा सर्ववादी (पुरोहित)। डॉ. हीरालाल शुक्ल समकालीन आन्ध्रप्रदेश के चालुक्य राज नरेन्द्र के नन्दमपुडी दानपत्र से उद्धरण लेते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि पंचप्रधान में उपरोक्त चार के अलावा पाँचवा पद सेनापति का रहा होगा। समग्रता से उपरोक्त उदाहरणों को देखा जाये तो प्रतीत होता है कि ग्रामीण सभायें आपस में जुडी होती थी जो पंच-प्रधानकी उपस्थिति के बाद महासभा कही जाती थी। इस सभा को शासन द्वारा नितिगत निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गयी होगी जिस आधार पर मासकदेवी नें अपनी अध्यक्षता में ग्रामीणों और किसानों की बातों को सुन कर न केवल समुचित निर्णय लिया अपितु शिलालेख बद्ध भी कर दिया। शिलालेख का अंतिम वाक्य मासकदेवीको मिले अधिकारों की व्याख्या करता है जिसमे लिखा है - जो इस नीयम का पालन नहीं करेंगे वे चक्रकोट के शासक और मासकदेवी के विद्रोही समझे जायेंगे

मासकदेवी एक उदाहरण है जिनको केन्द्र में रख कर प्राचीन बस्तर के स्त्री-विमर्श और शासकों व शासितों के अंतर्सम्बन्धों पर विवेचना संभव है। यह जानकारी तो मिलती ही है कि लगान वसूल करने में बहुत सी अनीयमिततायें थी। साथ ही सुखद अहसास होता है कि तत्कालीन प्रजा के पास एसी ग्रामीण संस्थायें थी जो शासन द्वारा निर्मित समीतियों से भी सीधे जुडी थी। प्रतिपादन की निरंकुशता पर लगाम लगाने का कार्य महासभाओं में होता था तथा नाग युग यह उदाहरण भी प्रस्तुत करता है कि अवसर दिये जाने पर स्त्री हर युग में एक बेहतर प्रशासक सिद्ध हुई है।
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Tuesday, January 22, 2013

नागयुगीन (760 – 1324 ई.) प्राचीन बस्तर में प्रशासनिक व्यवस्था।


नागयुगीन बस्तर वह सबसे महत्वपूर्ण कडी है जिसके अध्ययन द्वारा आधुनिक बस्तर के जनजातीय समाज में विद्यामन अनेक प्रथाओं, उनके सामाजिक ताने बाने को तथा जटिलताओं को समझने का यत्न किया जा सकता है। एक स्पष्ट विभागन रेखा है नागयुगीन समाज तथा उसके बाद के युगों में अत: अध्येताओं को इसी स्थल पर गहरे पानी उतरना चाहिये।

नाग राजाओं नें बस्तर तथा उसके आसपास एक विस्तृत भूभाग पर लगभग चार सौ वर्षों तक अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाये रखी थी। नाग शासन पूरी तरह से राजतंत्रात्मक था तथा युद्ध, न्याय तथा शांति हर अवसर पर किये जाने वाले प्रत्येक निर्णय पर राजा का कथन ही अंतिम माना जाता था। नाग युग में शासक प्रमुखता से राजा, राजाधिराज, महाराजा अथवा महाराजाधिराज जैसी उपाधियाँ धारण करते थे। राजा को दैवीशक्तियों से युक्त माना जाता था। नागयुगीन अभिलेखों में राजा के लिये परमेश्वर, प्रतिगण्डभैरव, परममाहेश्वर, विश्वम्भरेश्वर एवं महामाहेश्वर आदि सम्बोधन भी प्राप्त होते हैं। नागों का शासन क्षेत्र अर्थात तत्कालीन प्राचीन बस्तर चक्रकोटराष्ट्र कहलाता था। राष्ट्र का विभाजन महामण्डल (राज्य) में होता था (1324 ई. के एक अभिलेख में सैरहराजराज्य का उल्लेख मिलता है), जिसके प्रशासक महामाण्डलिक/महामण्डलेश्वर कहलाते थे। अगला विभाजन थे - मण्डल अर्थात नाडु (बारसूर अभिलेख में गोवर्धनाडु का उल्लेख आता है।), जिन्हें प्रशासकीय दृष्टि के वर्तमान संभागों के समतुल्य कहा जा सकता है; माण्डलिक ‘मण्डलाधिपति’ कहलाते थे। प्रत्येक नाडु अनेक ‘वाडि’ (विषय) मे बिभाजित थे, इन्हें वर्तमान प्रशासनिक ईकाइयों में जिलों के समतुल्य रखा जा सकता है; वडि के प्रशासक विषयपति कहलाते थे। यह प्रतीत होता है कि वाडि नागरिकों के कार्यों अथवा व्यावसायवार भी बँटे हुए थे। सोमेश्वरदेव के एक अभिलेख में जिन वाडियों की चर्चा है वे हैं – कुम्हारवाड, मोचिवाड, कंसारवाड, कल्लालवड, तेलिवाड, परियटवाड, चमारवाड तथा छिपवाड। यह जान कर सु:खद संतोष होता है कि नागयुग में शूद्र असम्मानित नहीं थे अपितु नाग नरेशों व महारानियों के दान अभिलेखों में मोची से ले कर ब्राम्हण तक के नाम उल्लेखित हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि समाज में वर्ग स्थापित होने के बाद भी विभेद व्यापक नहीं तथा तथा यह अंतर्सम्बंधो वाला समाज था। कार्य के आधार पर वाडियों के नाम रखे जाने को भी श्रम को प्राप्त सम्मान के रूप में विवेचना करना ही उचित जान पडता है। वाडि के अगले विभाजन नगर, पुर तथा ग्राम (नाडु) थे। ‘ग्राम’, ‘वाडा’ तथा ‘नार’ तीनों ही के तद्युगीन प्रयोग को आज भी देखा जा सकता है उदाहरण के लिये- जिणग्राम, दंतेवाडा, नकुलनार आदि। गामनायक गाँव के प्रशासक के लिये प्रयुक्त होता था, जो निर्वाचित नहीं अपितु राजाज्ञा से नियोक्त प्रतिनिधि होता था। आजीविका के लिये ग्रामनायक को गाँव का कोई भूखण्ड प्रदान कर दिया जाता था। छिंदक नागयुगीन अभिलेखों के अनुसार उस युग में द्वादश पात्रों द्वारा शासन व्यवस्था संचालित होती थी। ये हैं – सामंत, अमात्य, पुरोहित, श्रेष्ठी, सेनापति, श्रीकरण, धर्माध्यक्षमहापात्र, अंत:पुरीय, राष्ट्रकूट, प्रमुखन तथा दौरावारिक। राज्य की प्रमुख समस्याओं को सुनने तथा फैसले करने के लिये जो पंच प्रधान नियुक्त किये गये थे वे हैं – महाप्रधान (अमात्य), पाडिवाल (दौरावारिक), चामरकुमार (युवराज), सर्ववादी (पुरोहित) तथा सेनापति।

चोल अभिलेख से ज्ञात होता है कि बस्तर के जनजातीय योद्धा वीर और लड़ाकू थे। आदिवासी धनुर्धारी अपने अचूक लक्ष्यभेदन व कठोर धनुष धारण करने के लिये प्रसिद्ध थे। तद्युगीन नाग-दुर्गों पर उँची पताकायें लहराया करती थीं। आज भी बस्तर के वनवासी अपनी धनुर्विद्या के लिये विख्यात हैं। धनुर्धर तथा पदाति के अलाव नागों के पास अपनी अश्वों व गजों से सज्जित सेना थी। थोडी थोडी दूरी पर दुर्गम किले थे जो खाईयों से घिरे होते थे। किले की की प्राचीर का निर्माण मिट्टी, ईंट तथा प्रस्तर खण्डों से होता था। बारसूर, भैरमगढ, चक्रकोट, गढबोदरा, छिन्दगढ, तीरथगढ, बडे-डोंगर, राजपुर आदि अनेक दुर्ग नाग राजाओं की सुरक्षा के लिये निर्मित किये गये। धनुषवाण के अतिरिक्त तलवार, कृपाण, कटार, भाला, त्रिशूल, गदा, फरसा, आदि शस्त्रों का प्रयोग युद्ध में किया जाता था। पट्ट, सूर्य खोत्तर, शंख, घंटा, आदि युद्ध के वाद्य यंत्र थे। युद्ध व समारोहों के अवसर पर पताकायें ले कर चलने का प्रचलन था।

कृषकों को भूमि का स्वमित्व प्राप्त था। यदि राजा अथवा माण्डलिक को किसी कृषक से भूमि चाहिये होती थी तो वह भी सम्बद्ध भूमि को खरीदता था। दंतेवाडा अभिलेख इसकी तस्दीक करता है जहाँ उल्लेख है कि राजा नें एक कृषक से बोरिगाम खरीद कर भैरम के मंदिर हेतु दान कर दिया था। राजा द्वारा प्रदत्त भूमि अनुदान एवं पदवियाँ पुश्तैनी नहीं थे अत: सामंतों का बहुत हस्तक्षेप किसानों पर नहीं हो सका था। शोषण के यद्यपि दूसरे स्त्रोत खुले हुए थे और बहुतायत किसान कामगार कृषि ऋण के बोझ से दबे हुए थे। कर उगाहने की प्रथा जटिल थी एवं यह कार्य ठेके पर दिया जाता था। ठेकेदार की संविदा द्वारा सशर्त नियुक्ति होती थी। यह समझा जा सकता था कि इस प्रकार के ठेकेदार किस तरह ग्रामीण जनता को चूसते रहे होंगे। एक ओर खास वर्ग तो करो से छूट के अधिकारी बनते जा रहे थे जबकि नये नये कर व राजनीय अवसरों के आयोजनों हेतु बेसमय करों की उगाही से आदिवासी जनता पिस गयी थी। नाग युगीन मंदिर किसानो से जो कर वसूलते थे उसमें धन, खाद्यपदार्थ के अलावा दूध, तेल, घी, फूल, हार, वस्त्र तथा अन्य वओपज भी सम्मिलित थे। कर-वसूली सम्बन्धित अनीयमितताओं की विवेचना पंच-प्रधान करते थे तथा किसानों की भी राय ली जाती थी; एसा प्रतीत होता है कि उस युग में सभी क्षेत्रों के किसानों नें संयुक्त रूप से एक किसान महासभा का गठन किया था। उपरोक्त व्यवस्थाओं के बाद भी शिकायतों के अम्बार थे और किसानों में बार बार तथा अनेक प्रकार के करों की उगाही के कारण असंतोष व्याप्त था।
चक्रकोटयराष्ट्र के समस्त खनिज क्षेत्र पर राजा का ही अधिकार था। खनिकर्म के अलावा इस युग में वाणिज्य-व्यापार में अभूतपूर्व प्रगति हुई। सूती कपडा बुनने की कला व व्यापार नें खूब प्रगति की। सर्वाधिक मूर्तियाँ व मंदिर बस्तर को नाग युग की ही देन हैं अत: कहा जा सकता है कि स्थापत्य तथा मूर्तिकला का विकास हुआ। राजाओं द्वारा तडाग, कूप वापि तथा उद्यान आदि के निर्माण द्वारा जनकल्याण कारी कार्यों के प्रमाण भी मिलते हैं। समाज में अलगाव भले ही न आया हो तथापि कार्यों का जातिवार स्पष्ट विभाजन नागयुग तक आते आते हो गया था। ब्राम्हण वर्ग नें अन्य व्यवसायों से हाँथ खींच कर कर्मकाण्ड-पूजनपाठ व राजपरामर्शकर्ता तक अपनी भूमिका सीमित कर ली थी। हस्तशिल्प का विकास हो गया था अत: कारीगर वर्ग था, लेखन कार्य के लिये कायस्थ वर्ग था व्यापार के लिये बनिक वर्ग तथा स्पष्ट रूप में दास प्रथा विद्यमान न होते हुए भी दमित-श्रमिक-बेगारी वर्ग उपस्थित था। कुछ तद्युगीन कार्मिक – माली, मोची, कोसटा (कोसे से वस्त्र बनाने वाला), छिप (दर्जी), परियट (लोहार), तेलि (तेल का व्यवसाय करने वाले), साव (बिचौलिये), महाजन (उधार का व्यवसाय करने वाले), कोरी (बुनकर), राउत (गोपालक), भोई (धातुकर्मी), श्रेष्ठि (व्यापारी), छुरिकार (आयुध निर्माता) आदि थे।

संचार के साधनों का व अनेक यात्रा-मार्गों का इस युग में विकास हो गया था जिसका श्रेय प्राचीन मंदिरो विशेषकर नारायणपाल के विष्णु मंदिर को दिया जा सकता है। यह मंदिर एक तीर्थ बन चुका था जहाँ प्रार्थना-दर्शन हेतु दूर दूर से यात्री आया करते थे। नागपुर, चाँदा, कवर्धा, खैरागढ, दमोह, जबलपुर, अमरकण्टक, चित्तोड से यात्रियों के पोटागढ व नारायणपाल आने सम्बन्धी अभिलेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कई यात्रामार्ग चक्रकोट्यराष्ट्र को शेष भारत से जोडते रहे होंगे। यह कार्य व्यापार के लिये भी आवश्यक था जिसके यहाँ सुदूर दक्षिण तक किये जाने के उल्लेख प्राप्त होते हैं। एक ज्ञात व्याख्या के अनुसार कभी कांकेर से विशाखापट्टनम के लिये  यात्री मार्ग आमपानी या सलूरघाट हो कर गुजरता था।

ग्रामीण जन वस्तु विनिमय आधारित अर्थव्यवस्था से संचालित थे तथापि श्रेष्ठि, महाजन जैसे तदयुगीन धनाड्य गद्याणक (स्वर्ण मुद्रा) का परस्परव्यवहार करते थे। 1921 में बिलासपुर के सोनसारी ग्राम से सोमेश्वरदेव प्रथम (1069 – 1111 ई.) के द्वारा जारी लगभग 600 स्वर्ण मुद्रायें प्राप्त हुई थीं। 59 ग्रेन भार वाली इन वर्तुलाकार स्वर्न मुद्राओं में व्याघ्रलांछन अंकित था। अब तक प्राप्त नागयुगीन स्वर्णमुद्राओं का इतिहास दो सौ वर्ष से अधिक का हो जाता है जहाँ राजा जगदेकभूषण धारावर्ष (1050-1060 ई.) से प्रारंभ कर लगभग 1250 ई. तक जारी मुद्रायें प्राप्त हुई हैं। कार्य के बदले अनुदान की परम्परा नागयुग में रही उदाहरणार्थ नृत्यांगना को अनुदान अथवा मेडिपिट (बलि के लिये वध्य पकडने वाला) को अनुदान आदि। 

उपरोक्त विवरणों से यह कहा जा सकता है कि नागराजाओं नें प्रशासनिक व्यवस्था को बहुत जटिल बना दिया था जिस कारण जनता और राजा के बीत प्रशासकों के बहुत से वर्ग पनप गये थे। प्रशासन एक वृत्त बना रहे तभी यह चक्र चलता रहता है किंतु इस युग में जैसे जैसे व्यूरोक्रेसी हावी होने लगी पहली और आखिरी कडी नें अपने सहसम्बन्ध खो दिये। नागयुग का गौरव उसकी प्रगति थी तो पतन का कारण इस विकास की धारा को बनाये न रख पाना भी है। असंतोष अगर उत्पादक में होगा तो उपभोक्ता भी बहुत दिनों तक अपना उदर बढाये घूमता नहीं रह सकता और यही स्थिति जब प्रबल हुई तो नाग शासन के अनेक महामण्डल अलग अलग होने लगे। अपने  शासनके अंतिम वर्षों में तो चक्रकोटय अनेक राष्ट्रों का समूह बन गया था जिसमें कई नाग शासक विद्यमान थे। उनके मध्य अनेकता व जनता में व्याप्त असंतोष नें ही अगके आक्रांता को यहा अपने पैर पसारने की सहूलियत दी थी।
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Monday, January 21, 2013

माओवादी, मधुरांतक, नरबलि और प्राईवेट अंगों की शेविंग.....उफ़!!!!



माओवादी नेता सब्यसांची पाँडा का एक साक्षात्कार ‘दैनिक भास्कर’ में कुछ दिनो पहले पढने को मिला। इससे कुछ देर पहले मैं बस्तर के एक नाग वंशीय शासक मधुरांतक देव के विषय में पढ रहा था। ये दोनो ही विषय पता नहीं क्यों मेरी विचार श्रंखला में गुत्थमगुत्था होने लगे। वर्तमान पर बात करने से पहले मधुरांतक से आपको परिचित करा दूं। यह एक कुख्यात नागवंशीय शासक था जिसनें प्राचीन बस्तर अर्थात चक्रकोट पर 1062 से 1069 ई. के मध्य शासन किया। उल्लेखनीय है कि नाग राजाओं का शासन प्रबन्ध उनके राज्य को कई केन्द्रीय शासन द्वारा संचालित स्वायत्त मण्डलों में विभाजित करता था, इन्ही में से एक था मधुर मण्डल जिसमें छिन्दक नागराजाओं की ही एक कनिष्ठ शाखा के मधुरांतक देव का आधिपत्य था। माना जा सकता है कि मधुरांतक देव के पूर्वजों को माण्डलिक चोल राजाओं नें बनवाया होगा चूंकि राजेन्द्र चोल (1012 – 1044 ई.) के मधुर मण्डल पर विजय का उल्लेख अतीत में प्राप्त होता है। कहानी यह है कि चक्रकोट के राजा धारवर्ष जगदेक भूषण (1050 – 1062 ई.) के निधन के पश्चात चक्रकोटय में उत्तराधिकार को ले कर संघर्ष हुआ और राजनीतिक अस्थिरता हो गयी। इस परिस्थिति का लाभ उठा कर ‘मधुर-मण्डल’ के माण्डलिक मधुरांतक देव ने चक्रकोटय पर अपनी “एरावत के पृष्ठ भाग पर कमल-कदली अंकित” राज-पताका फहरा दी।

कहते हैं कि नितांत बरबर और निर्दयी था वह। उसे कुचल देना ही आता था। ड़र के साम्राज्य ने शासक और शासित के बीच स्वाभाविक दूरी उत्पन्न कर दी। उस पर अति यह कि अपनी कुल-अधिष्ठात्री माणिकेश्वरी देवी के सम्मुख नरबलि की प्रथा को नीयमित रखने के लिये उसने राजपुर गाँव को ही अर्पित कर दिया था। यह गाँव वर्तमान जगदलपुर शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। वहाँ से जिसे चाहे उठा लो और देवी के सम्मुख धड़ से सिर को अलग कर दो। जिन खम्बों पर साम्राज्यों की छतें खड़ी  होती है वे शनै: शनै:  कुचले हुए लोगों की आँहों भर से खोखले हो उठते हैं। मधुरांतकदेव नें अपने राजपुर ताम्रपत्र में नरबलि के लिये राजपुर गाँव को दिये जाने का कारण जनकल्याण बताया है। जनता की लाशें बिछा कर कैसा और किस प्रकार का जनकल्याण संभव हो सकता था? लेकिन उसके पास अपने विचार का नशा था जो उसके द्वारा की जाने वाली हर हत्या को जायज ठहराने का कारण बन जाता था।

गंभीरता पूर्वक कई इतिहासकारों के मंतव्यों और ताम्रपत्रों-शिलालेखों के अनुवाद पढने के पश्चात मेरी यह राय बनी है कि यदि किसी कृत्य को गरिमा प्रदान की जाये तो वह प्रथा बन जाती है। नरबलि को मधुरांतक नें त्यौहार बना दिया था अत: यह उसकी मौत के बाद भी प्रथा समाप्त नहीं हुई अपितु किसी न किसी रूप में चलती रही। मधुरांतक के बाद नरबलि के लिये किसी शासक द्वारा गाँव समर्पित करने का उल्लेख तो नहीं मिलता लेकिन मेरिया अर्थात वध्य को पकड़ने के लिये  तरह तरह के हथकंडे अपनाये जाने लगे। कालांतर अपराधी अथवा कभी कभी कोई अनजान यात्री अथवा पडोसी राज्य से किसी व्यक्ति को पकड कर बलि दी जाने लगी। नर बलि के कारण बडे ही जनकल्याणकारी बताये जाते थे उदाहरण के लिये कर्नल मैकफर्सन का प्रतिवेदन (1852) उल्लेखनीय है जिसमें वर्णित है कि “भूमिदेवी की पूजा के निमित्त नरबलि दी जाती है। अकाल मौत से बचने के लिये, शिशु जन्म के अवसर पर, वन्य पशुओं के आतंक से गावों को बचाने के लिये, फसल को खराब होने से रोकने के लिये, गाँव पर, राज्य पर, मुखिया पर अथवा राजा पर कोई विपत्ति आने की स्थिति में भी नर बलि दी जाती है”।

मधुरांतक देव का क्या हुआ यह जानने से पहले चर्चा सव्यसाँची पाँडा की अखबारी समाचार के आलोक में करते हैं। अखबार लिखता है “शोषितों, वंचितों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले नक्‍सिलयों में आजकल अंदरूनी घमासान मचा है। हाल में पार्टी से निकाले गए माओवादी कमांडर सब्‍यसाची पांडा ने काफी बगावती तेवर दिखाए थे। वह अब बिल्‍कुल अकेला है। ओडिशा में नक्‍सल आंदोलन के 'पोस्‍टर ब्‍वॉय' के तौर पर मशहूर 43 साल का पांडा अब खुद को 'ओल्‍ड डॉग' की तरह मानता है जिसका उसकी पार्टी नामोनिशान मिटा देनी चाहती है। ओडिशा का सबसे अहम नक्सली नेता माने जाने वाले पांडा को 'शे गुवेरा' कहलाता था। पांडा ने एक खत लिख कर कई सवाल उठाए थे। उसने नक्‍सलियों के प्राइवेट पार्ट्स 'क्‍लीन शेव' करने के चलन पर जोर देने की परंपरा को भी गलत ठहराया है। उसका कहना है कि यह तेलुगु कैडरों में आम बात है और महिला काडरों को अक्‍सर ऐसा करने की सलाह दी जाती है। उसने लिखा है, 'महिला काडरों को बिना कपड़े के स्‍नान करने को भी कहा जाता है। मुझे समझ नहीं आता कि क्रांति का ऐसे बकवास सिद्धांतों से क्‍या ताल्‍लुक है?

इसे पढने के बाद मेरा दिमाग सन्नाटे में आ गया था। पिछले तीस सालों से बस्तर के जंगलों में तेलगु कैडर नें ही खास तौर पर ‘नरबलियों’ से सन्नाटा पसराया हुआ है। क्या इस तरह की जा रही है क्रांति जिसमें व्यक्ति की इतनी निजता पर भी दिशानिर्देश जारी किये गये हैं? उपरी तौर पर तो अभिव्यक्ति और अन्य तमाम प्रकार की आजादी के लिये लडी जाने वाली इस तथाकथित क्रांति का स्वरूप इतना घृणास्पद होगा मेरी सोच में भी नहीं था। बडी बात यह है कि यह उजागर करने वाला व्यक्ति स्वयं कुख्यात माओवादी रहा है। निजी अंगों से विचार और विचारधारा का क्या अंतर्सम्बन्ध है? अथवा क्या निजी अंगो से ही संबंध है तथा विचारधारायें कम्बल का कार्य करने लगी हैं? उफ़.....।

इस यौनविकार भरी लिजलिजी विचार प्रक्रिया से बाहर निकलते हैं और पाँडा की मन:स्थिति को समझने का यत्न करते हैं। ओपन' मैगजीन ने पांडा के खत अपने पास होने का दावा किया है। मैगजीन ने कहा है कि दुखी मन से लिखे गए इस खत में पांडा ने सीपीआई (माओवादी) के आलाकमान की गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खत में पांडा ने ऐसे सनसनीखेज खुलासे किए हैं जिनसे माओवादी नेतृत्‍व में फूट पड़ सकती है। पांडा ने कहा है कि माओवादी नेता खुद को मालिक समझ बैठे हैं और कैडर उनकी गलतियों का विरोध करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते हैं। पांडा ने नक्सल नेतृत्व पर अकारण हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। पांडा ने लिखा है, हम कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी में किसी गलती के लिए पार्टी के सदस्‍य को सस्‍पेंड कर सकते हैं और जरूरत पड़ी तो उसकी हत्‍या भी की जा सकती है। पांडा ने सवालिया लहजे में कहा, क्‍या किसी क्रांतिकारी का काम केवल पुलिसवालों की हत्‍या करना ही रह गया है?” यह सवाल महत्वपूर्ण है, एकपूर्व माओवादी नेता द्वारा उठाये जाने के कारण इस सवाल को विषद चर्चा का विषय बनना चाहिये। यह सवाल उन सभी युवाओं के सामने पडना चाहिये जिनके सामने रात दिन क्रांति का ढोल पीटा जा रहा है और बंदूख उठाने के लिये कई उत्प्रेरक सामने रखे गये हैं। यह सवाल क्रांति के नाम पर किसी भी हथियार उठाने वाले को स्वयं से करना ही चाहिये कि क्या वे जाने अनजाने मधुरांतक देव तो नहीं बन रहे?

यह आम आदमी की बलि ही तो है; पांडा आगे लिखते कहते हैं पांडा ने बेवजह किसी खास वर्ग के विध्‍वंस के खिलाफ भी जमकर अपनी भड़ास निकाली है। उसने लिखा है, किसी पर मुखबिर होने का ठप्‍पा लगाकर उसे मारना-पीटना और जला देना ही समस्‍या का हल नहीं है। पांडा ने संबलपुर के पांच-छह गाँववालों, जिन्‍हें 2004 में मुखबिर होने के शक में मार डाला गया था, का उदाहरण देते हुए कहा, “केवल मैंने इसका विरोध किया था इस परिप्रेक्ष्य को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह उस व्यक्ति के द्वारा कही गयी बाते हैं जो अब तक आउटलुक, तहलका या बीबीसी जैसे खबरदात्री स्थलों में चंद दिन या महीने रहे घूमंतू पत्रकारों अथवा किसी राजनीतिक-विचारधाराबद्ध लेखकों की कही-सुनी-गढी-बढी-चढी बातों से बिलकुल अलग प्रतीत होती हैं। वह व्यक्ति जिसने वर्तमान की इस तथाकथित क्रांति को खाया-पीया-ओढा-बिछाया है उस पर बुद्धिजीवी केवल खखार कर नहीं रह सकते (यद्यपि मौन ही रहने वाला है)। अखबार सब्यसांची पाण्डा का परिचय देते हुए एवं माओवादी संगठनों की आंतरिक गुटबाजी पर जोर दे कर लिखता है कि “सब्यसाची पांडा भाकपा (माओवादी) राज्य (ओडिशा) संगठन का सचिव था। मार्च महीने में दो इतालवी नागरिकों के अपहरण के पीछे इसी का हाथ था। अपहृतों की रिहाई के बदले पांडा ने अपनी पत्‍नी मिली को जेल से छोड़े जाने की मांग की थी। उसे बाद में जमानत पर छोड़ दिया गया था। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक पांडा नक्सली संगठन में आंध्र प्रदेश कैडर के नक्सलियों के दबदबे से परेशान था और ओडिशा में पांडा की बढ़ती ताकत से आंध्र के नक्सली नेता खुश नहीं थे। यही कारण है कि पांडा को अब तक सेंट्रल कमेटी या पोलित ब्यूरो में जगह नहीं दी गई थी”। 

क्रांति नरबलियों से नहीं आ सकती, प्राईवेट अंगों को शेव करने से भी नहीं आयेगी, महिला कैडरों को निर्वस्त्र नहाते ताकने वाले.....नहीं ला सकते क्रांति। इनसे क्रांति के मायनों की तलाश छोड कर हश्र की बात करते हैं और यहाँ मधुरांतक देव की चर्चा पुन: आवश्यक हो जाती है। इस शासक को एक जनक्रांति नें सत्ता से बेदखल किया था। हाँ, मैं यहाँ उसी बस्तर की बात कर रहा हूँ जिसे क्रांति सिखाने वाले देश भर में पिले पडे हैं। इस क्रांति का नेतृत्व किया था सोमेश्वरदेव (1069 – 1111 ई.) नें। वे दिवंगत नाग राजा धारवर्ष जगदेक भूषण के पुत्र थे। मधुरांतक द्वारा पराजित और निर्वासित किये जाने के बाद वे चक्रकोटय के निकट ही किसी गुप्त स्थान पर रहते हुए जन-शक्ति संचय में लगे थे। उनका कार्य कठिन नहीं था। हाहाकार करती प्रजा को एक योग्य नेता ही चाहिये था। राज्य में विद्रोह अवश्यंभावी था। सोमेश्वर देव ने जनभावना का लाभ उठाते हुए उनके क्रोध को युद्ध में झोंक दिया। आक्रमण हुआ तो किले के भीतर रह रहे नागरिकों में हर्ष का संचार हो गया। मधुरांतक ऐसी सेना को साथ लिये कितनी देर लड़ सकता था जिनकी सहानुभूति और भरोसा उसने खो दिया था? युद्ध समाप्त हुआ। मधुरांतक जंजीरों में जकड़ कर राजा सोमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। राजाज्ञा से जब आततायी मधुरांतक के सिर पर हाथी ने अपना पैर रखा तो यह दृश्य देखने के लिये नगर का एक-एक व्यक्ति उपस्थित था। किसी भी आँख में कोई सहानुभूति नहीं थी। क्या आधुनिक मधुरांतकों के पास यह घटना उदाहरण के तौर पर मौजूद है?......या जलक्रीडायें और रेजर की दुकाने ही क्रांति को आगे ठेलती रहेंगी? 
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Saturday, January 19, 2013

रहस्यमयी नागलोक तथा बस्तर में नाग शासन (760 – 1324 ई.)


हमारी कल्पनाशीलता नें नागों को अत्यधिक कलात्मकता और रहस्यमयता प्रदान की है। नाग सदियों से कविताओं का विषय रहे हैं। नाग आज की सिनेमा के किरदार भी हैं, जहाँ वे मनुष्य रूप में परिवर्तित हो कर प्रेम करते हैं, नृत्य करते हैं और पुन: अपने लोक में लौट जाते हैं। रोमांचित करती हैं नाग और उनके पाताल लोक से जुडी कहानियाँ। प्राचीन बस्तर में जहाँ नाग शासकों का उल्लेख मिलता है वहाँ एक अध्येता के रूप में मेरे मन में भी एसी ही रोमांचित कर देने वाली कहानियाँ प्रश्न खड़े करने लगीं। पहला प्रश्न तो यही कि नाग कौन थे? इसका उत्तर जटिल नहीं है चूंकि इतिहासकार मानते हैं कि पर्वतो (नग) में निवास करने वाली जनजातियाँ ही नाग कहलाने लगीं। दक्षिणापथ से नागों का सम्बन्ध प्राचीनकाल से जोडा भी जाता रहा है। वाल्मीकी रामायण (5.12.12) में नाग कन्याओं के अप्रतिम सौन्दर्य का उल्लेख है। रावण नें बलपूर्वक कई नागकन्याओं का हरण किया था – “प्रमथ्य राक्षसेन्देण नागकन्या: बलाद्धृता:”। नाग पाताल लोक में रहते थे जिसकी राजधानी भोगावती थी। पाताल लोक के सप्तगोदावरी क्षेत्र में होने की पुष्टि वामनपुराण के इस श्लोक से होती है – “पर्जन्यं तत्र चामंत्रय प्रेषयित्वा महाश्रमे। सप्तगोदावरे तीर्थे पातालम गमत कपि:”। अर्थात पाताल लोक और गोंडवाना पर्यायवाची शब्द कहे जा सकते हैं। इसके साथ ही भोगावती की भौगोलिक स्थिति की जानकारी रामायण के अरण्य काण्ड (32:13-14) से प्राप्त होती है जिसके अनुसार महर्षि अगस्त्य के आश्रम के निकट नागों की यह राजधानी अवस्थित थी। भोगावती का उल्लेख यदाकदा एक नदी के रूप में भी होता है जिसके विवरणों के विश्लेषन से इसे इन्द्रावती नदी माना जा सकता है। महाभारत के अनुसार भी भोगावती दक्षिणापथा में ही स्थित है जिसके शासक वासुकि, तक्षक तथा एरावत थे। दक्षिणापथ में महाभारत युग तक आर्यों की घुसपैठ बढ गयी थी जिसकारण नाग-आर्यों के बीच कई संघर्ष भी हुए। महाभारत में एसी कई कथाये उपलब्ध हैं। बौद्धग्रंथों में भोगावती का उल्लेख हिरण्यमयी नगरी के रूप में किया गया है। प्राचीन बस्तर के नाग शासक सोमेश्वरदेव प्रथम (1069-1111 ई.) के लिये भी भोगावती स्वामी का उल्लेख कई उपलब्ध एतिहासिक साक्ष्यों में हुआ है। प्राचीन बस्तर में शासन करने वाले सभी नाग राजा भोगावतीपुरवरेश्वर की उपाधि भी धारण करते थे।    

प्रश्न यह भी उठता है कि क्या नाग और गोंड भी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? संभवत: महाभारत की एक कथा इसका कोई उत्तर दे सके जिसके अनुसार दुर्योधन के एक भाई कर्ण नें मध्यप्रदेश की पचमढी के निकट किसी नागकन्या के प्रति आसक्त हो कर उससे विवाह कर लिया। नागकन्या के पिता इस बेमेल विवाह से अप्रसन्न व असंतुष्ट थे अत: उन्होंने यह आदेश दिया कि उत्पन्न बालक का पिता के वंश से कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा एवं यह नागवंशी कहलायेगा। इस संतति के वंशज गोंड कहलायेंगे (वार्ड; 1868)। इस कहानी से साम्यता रखते हुए भी बस्तर के गढधनोरा में उपलब्ध एक कहानी गोंडों को कुरुवंश से नहीं जोडती अपितु उनके अनुसार कर्ण एक दानी गोंड राजा था जिसने अपने ही पुत्र की बलि दे दी थी। रसेल तथा हीरालाल (1916) के अनुसार छोटानागपुर के नागवंशी राजा मानते थे कि उनके पूर्वपुरुष नागदेवता और ब्राम्हण कन्या की युति से उत्पन्न हुए थे। 1908 में लाल-कालेन्द्रसिंह रचित बस्तर राज वंशावली (अप्रकाशित) के अनुसार “बस्तर के माडिया क्षेत्रों में नागों के 33 अभिलेख एवं 800 स्वर्ण मुद्रायें मिली हैं। अभिलेख के सभी नृपति स्वयं को पौराणिक नागों से सम्बद्ध करते हैं। बस्तर के बारसूर ग्राम के नेगी आज भी स्वयं को नागवंशी राजाओं के वंशज मानते हैं; तथा ये आदिवासी हैं”। इन मिथक कथाओं से गोंड उत्पत्ति के सूत्र भ्रामक लगते हों तथापि इतना अवश्य सिद्ध होता है कि गोण्डवाना ही वह रहस्यमयी नागलोक है जिसकी चर्चा उपरोक्त संदर्भों में की गयी है।

उल्लेखनीय है कि आधुनिक द्रविडों के पूर्वज कभी सिन्धु घाटी क्षेत्र के आस-पास निवासरत रहे होंगे जिसकी तस्दीक पाकिस्तान के बलुचिस्तान क्षेत्र में बोली जाने वाली द्रविड़ परिवार की ब्राहुई भाषा से होती है जो अब भी लगभग चार लाख लोगों द्वारा बोली जाती है। द्रविड ईसापूर्व तीसरी-चौथी सहस्त्राब्दि में भारत की ओर बढे तथा वर्तमान मध्यप्रदेश उनका प्रमुख ठिकाना बना एवं पद्मावती नागों की राजधानी बनायी गयी। यहाँ से वे अनेक धाराओं-शाखाओं मे विभाजित हो कर विभिन्न दिशाओं में चले गये। बस्तर के नाग शासकों का सम्बन्ध छिन्दक शाखा से जुडा पाया गया है। के पी जायसवाल नें अपनी किताब अंधकारयुगीन भारत (1955) में उल्लेख किया है कि गुप्तराजाओं से पराजय के फलस्वरूप पद्मावती के नाग दक्षिण की ओर चले गये तथा कुछ काल तक उनका शासन होशंगाबाद और जबलपुर जिलों में रहा। यहीं से वे बस्तर की ओर कूच कर गये।

इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल के अनुसार सिन्धु तट से मध्यप्रदेश आ कर बसे नागों नें यहाँ से पलायन करने के पश्चात कर्नाटक में शरण ली; यहाँ उनकी तीन उपशाखाओं का उल्लेख मिलता है – सेन्द्रक शाखा (मैसूर तथा लगभग सम्पूर्ण कर्नाटक में विस्तार), सेनावार शाखा (कर्नाटक के कडूर तथा सिमोगा में शासन) तथा सिन्द शाखा (छ: उपशाखायें जिनमें बस्तर भी सम्मिलित था)। जिन छ: सिन्द क्षेत्रों का उल्लेख है वे हैं – बागलकोट (बगदगे), एरमबिगगे (येलबुर्गा), बेलगवट्टि, हलावूर/बेल्लारी, चक्रकोट तथा भ्रमरकोट। अंतिम दो स्थल अर्थात चक्रकोट एवं भ्रमरकोट वर्तमान बस्तर का हिस्सा हैं। यहाँ शासन करने वाले नाग राजाओं को छिन्दक कहा गया है जिसकी उत्पत्ति सेन्द्रक से ही हुई है। बस्तर के छिन्दक नागों के भी दो घरानों का उल्लेख मिलता है – वरिष्ठ शाखा के मुकुट पर “सवत्सव्याघ्र” प्रतीक अंकित था तथा उनका ध्वज “फणिध्वज” रहा है। नाग की कनिष्ठ शाखा जिसके एक मात्र शासक मधुरांतक देव का ही प्रमुखता से उल्लेख मिलता है; वे “धनुषव्याघ्रलांछन” युक्त मुकुट चिन्ह एवं “कमल के पुष्प एवं कदलीपत्र” के ध्वज का प्रयोग करते थे।     

नल-गंग युगीन महाकांतार अथवा चक्रकोट्य़ में अनेकों स्वतंत्र तथा अर्ध-स्वतंत्र राज्य निर्मित हो गये थे, जिन्हें मण्डल कहा जाता था। आक्रांताओं के लिये यह भूमि सुलभ से सुलभतर होती गयी। नौवी शताब्दी में पूर्वी-चालुक्यों के चक्रकूट पर आक्रमण और विजय की जानकारी प्राप्त होती है। यह प्रतीत होता है कि इसी काल में किसी नागवंशी सामंत को माण्डलिक बनाया गया होगा। वल्लभराज (925-980 ई.) प्रथम ज्ञात नालवंशीय राजा है जिसकी पुष्टि एर्राकोट से प्राप्त एक तेलुगु अभिलेख से होती है। यह प्रस्तराभिलेख बारसूर के निकट उपेत नामक स्थान से प्राप्त हुआ है जिसमें कर उगाही करने वाले संविदाकारों के लिये राजा वल्लभराज की शर्तों का वर्णन है। अगले शासक शंखपाल (980-1012 ई.) के सम्बन्ध में अधिकतम जानकारी साहित्यिक प्रमाणों से उपलब्ध होती है। मालवा के सिन्धुराजा के दरबारी कवि पद्मगुप्त परिमल नें महाकाव्य “नवसाहसांकचरित” की 1005 ई. के लगभग रचना की थी जिसमें नागवंशी राजा शंखपाल का उल्लेख है जिसने सिन्धुराज की युद्ध में सहायता की थी। यह भी उल्लेख है कि राजा शंखपाल की पुत्री शशिप्रभा का विवाह सिन्धुराज से किया जाता है। संदर्भों के आधार पर यह संभावना बनती है कि बंगाल के किसी पाल राजा के 1012 ई. में हुए आक्रमण तथा उसी युद्ध में शंखपाल की मृत्यु हो गयी जिसके परिणाम स्वरूप राजा नृपति भूषण (1012-1050 ई.) चक्रकोटय क्षेत्र के राजा हुए। इन्हीं समयों में चोल राजा राजेन्द्र (1011-1022 ई.) के चक्रकोटय पर आक्रमण कर अधिकार करने का भी उल्लेख मिलता है। संभवत: नृपतिभूषण से पुन: स्वयं को स्वाधीन कर लिया होगा। नृपति भूषण के निधन के पश्चात जगदेकभूषण धारवर्ष (1050-1062 ई.) चक्रकोटय के राजा हुए। 1062 ई में उनके निधन के बाद चक्रकोटय में उत्तराधिकार को ले कर संघर्ष हुआ और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो गयी। इस परिस्थिति का लाभ उठा कर ‘मधुर-मण्डल’ के मधुरांतक देव (1062- 1069 ई.) ने चक्रकोटय पर अपनी “एरावत के पृष्ठ भाग पर कमल-कदली अंकित” राज-पताका फहरा दी। मधुरांतक देव को अपनी क्रूरता तथा निरंकुशता के लिये भी जाना जाता है। कहा जाता है कि उसने जगदलपुर से 22 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित राजपुर नाम के गाँव को नरबलि के लिये एक मंदिर को दान में दे दिया था। मधुरांतक बहुत समय तक शासन नहीं कर सका, जगदेक भूषण धारावर्ष के पुत्र सोमेश्वर प्रथम (1069-1111 ई.) नें युद्ध में उसका वध कर दिया तथा वे चक्रकोटक के निष्कंटक शासक बन गये। सोमेश्वर प्रथम की दो पत्नियाँ थीं सासन महादेवी तथा धारण महादेवी। धारण महादेवी अभिलेखों की दानदात्री भी रही हैं। ग्यारहवी शताब्दी के दंतेवाड़ा से प्राप्त एक शिलालेख में राजा सोमेश्वरदेव प्रथम की बहन मासकदेवी का उल्लेख मिलता है जो किसानों के द्वारा जबरन तथा बार बार लगान वसूली से चिंतित प्रतीत होती हैं। मासक देवी किसानों के बीच जाती हैं उनकी समस्यायें सुनती हैं तथा शासन से अलग इकाई होने के बाद भी समस्या के निदान की सक्रिय पहल करती हैं। वे पाँच महासभाओं के प्रमुखों तथा किसान प्रतिनिधियों के साथ बैठक करती हैं। लिये गये निर्णय को राजाज्ञा की तरह जारी करती हैं कि भविष्य में अनीयमित लगान वसूली किसी शासकीय अधिकारी द्वारा नहीं की जायेगी। एसा करने वाले को विद्रोही तथा राज्य का शत्रु समझा जायेगा। सोमेश्वर देव की माता गुण्ड महादेवी भगवान विष्णु की भक्त थी। उन्होंने नारायणपाल में भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था तथा यह गाँव मंदिर को दान में दे दिया था। नारायणपाल का विष्णु मंदिर आज भी संरक्षित अवस्था में उपलब्ध है। सोमेश्वर प्रथम के शासनकाल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिलेख कुरुसपाल से प्राप्त हुआ है जिसमें उनकी समस्त युद्ध विजयों की गाथा अंकित है। ज्ञात होता है कि उन्होंने वेंगी पर आक्रमण कर उसे जला दिया था; भद्रपट्टन तथा वज्र के साथ साथ दक्षिण कोसल के बडे क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उनके उत्तराधिकारी थे कन्हारदेव प्रथम (1111-1153 ई.)। कुरुसपाल अभिलेख, राजपुर ताम्रपत्र और नारायणपाल अभिलेख में कन्हारदेव प्रथम का उल्लेख आता है। यह उनके शासन काल की ही घटना है कि रतनपुर के कलचुरी सामंत जगपालदेव (1145 ई.) नें काकर्य (कांकेर) पर विजय प्राप्त की थी। कन्हार देव प्रथम के बाद चक्रकोटय के इतिहास पर पुन: लगभग पचहत्तर वर्ष का अंधकार मिलता है। बहुत सीमित जानकारी बारसूर अभिलेख से प्राप्त होती है जिसके अनुसार कन्हारदेव द्वितीय (1153-1195) का शासन काल सोमेशवर द्वितीय (1195-1218 ई.) के पहले रहा होगा। सोमेश्वर द्वितीय पहले नगवंशी शासक हैं जिन्हें चक्रवर्ती अर्थात सम्राट होने की उपाधि प्राप्त थी। संभव है विभिन्न माण्डलिक राजाओं नें उनकी आधीनता स्वीकार कर ली होगी। बारसूर अभिलेख के अनुसार उन्होंने बारसूर के ही दो शिवमंदिरों के संचालन के लिये एक गाँव दान में दे दिया था। इसके बाद के शासक थे जगदेकभूषण नरसिंहदेव (1218-1224 ई.) उन्हें मणिकेश्वरी देवी का भक्त बताया गया है। मणिकेश्वरी देवी का मंदिर वर्तमान दंतेवाडा में दंतेश्वरी मंदिर से लग कर अवस्थित है। एसी जानकारियाँ है कि उनके शासनकाल में बस्तर का शिव धर्म तांत्रिक समुदाय में परिवर्तित होने लगा था। वस्तुत: नाग राजाओं की शासन प्रणाली से सम्बन्धित कुछ जानकारी हमें जयसिंह देव (1224-1248 ई.) के समय के अभिलेखों से प्राप्त होती है। महाराजा राष्ट्र का अधिपति होता था जिसके आधीन महामण्डलेश्वर (महामण्डल के शासक) होते थे। इसके बाद माण्डलिक, विषयपति तथा ग्रामनायक आते थे। राजा की सहायता तब पाँच मंत्री किया करते थे जिन्हें पंच प्रधान कहा जाता था। पंचप्रधान के अंतर्गत मुख्यमंत्री, प्रमुख सेनानायक, प्रमुख चामरधारी, राजकुमार तथा गुप्तचर संस्था के प्रमुख सम्मिलित होते थे। नाग युग में कोट या राज्य प्रमुख प्रशासकीय क्षेत्र थे जो नाडु में विभाजित थे। नाडु को प्रशासनिक संभाग अथवा मण्डल भी माना जा सकता है। ये मण्डल जिलों में विभाजित थे जिन्हें वाडि कहा गया है। वाडि अथवा जिलों का अगला विभाजन महानगर, पुर तथा ग्राम के रूप में होता था। इसके बाद इतिहास का एक और अंघेरा समय जो पुन: लगभग पचहत्तर वर्ष का है, आता है जिसके सम्बन्ध में कोई अभिलेख अथवा साक्ष्य सामने नहीं आया है। हरिश्चंद देव (1300-1324 ई.) अगले ज्ञात राजा हैं जो चक्रकोटय में नाग शासन की अंतिम कडी कहे जा सकते हैं। काकतीय राजा अन्नमदेव के साथ उनका संघर्ष 1324 में हुआ तथा उनकी मृत्यु के साथ ही बस्तर के इतिहास का नया अध्याय प्रारंभ होता है।
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