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Thursday, December 05, 2013

बस्तर में जीवन और कला के सहचर हैं घाँस और पत्ते


साधारण तत्वों की असाधारण प्रस्तुति को कला कहते है। कलात्मकता लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है जिसे मिट्टी से ले कर पत्थर तक और पेड की छाल से ले कर घाँस-पत्तों तक के दैनिक प्रयोग मे देखा जा सकता है। कला और आदिवासी समाज का इतना गहन सम्बन्ध है कि आप घास-पात में भी कल्पनातत्वों की उडान देख सकते हैं और दैनिक आवश्यकताओं के अनुरूप उनके प्रयोग का तरीका अचरज में डालता है। पत्ते दैनिक आवश्यकता हैं और साल वनो के द्वीप में सर्वत्र उपलब्ध हैं। इनका भोजन-पेय अथवा पदार्थों के संरक्षण के लिये प्रयोग होता ही है, पहनावे और सजावटी वस्तुओं में भी पत्तो का समुचित उपयोग देखा गया है। पत्ते श्रंगार की वस्तु भी हैं, वे कभी जूडों-खोंपों में खोंसे हुए नजर आ सकते हैं, कभी आभूषण या परिधान बने गले अथवा कमर में लटके देखे जा सकते हैं; खैर अथवा छींद की पत्तियाँ चबा कर युवतियाँ अपने होठों का श्रंगार भी करती हैं तथा उन्हें रंग प्रदान करती हैं। यही नहीं पत्ते लोक-चिकित्सा का हिस्सा भी हैं और औषधि भी। पतों पर कई लोककथायें हैं, ये लोकगीतों में बसे हैं कहावतों और पहेलियों में छिपे हैं। 

पहेलियाँ न बुझाते हुए घास-पत्तों की कलात्मक प्रस्तुतियों पर आते हैं। आवश्यकता आविष्कार को जन्म देती है; पत्तों के विभिन्न प्रयोग यही चरितार्थ करते हैं। बडे आकार अथवा विशिष्ठ आकार के पत्ते आदिवासियों की प्रमुख उपादेयता होते हैं और इसमें सियाड़ी के पत्तों की मुख्य भूमिका मानी जा सकती है। बस्तर में जिन पत्तों को उपयोगी माना जाता है उनमे सियाड़ी के अलावा सरगी, फरसा (पलाश), तेदू, आम इत्यादि प्रमुख हैं। इन्ही पत्तों की बदौलत बस्तर में यह कहानी गर्व से सुनाई जाती है कि प्रकृति ने आदिवासी को इतनी समृद्धि दी है कि वह नित्य नये बर्तन में खाता है; सही भी है, पत्तल और दोने ही आदिवासियों का थाली-ग्लास-कटोरा हैं। बांस की सींक इन पत्तों को जोडने का माध्यम बनती है और फिर सियाड़ी, सरगी या फरसा के पत्ते इस तरह गूंथ दिये जाते हैं कि वे पत्तल और दोनों का आकार ले लेते हैं।  

बस्तर में सरगी, पलाश, सियाड़ी, आम और तेन्दू के पत्ते विशेष उपयोगी प्रमाणित होते आ रहे हैं। तेन्दू पत्तों ने व्यवसाय और मजदूरी को अधिक प्रभावित किया है। सरगी, सियाड़ी और फरसा (पलाश) के पत्ते ग्रामीण जीवन में सर्वोपरि माने जाते रहे हैं इनसे पत्तल और दोने बनाये जाते हैं, इन्हें बांस की सींकों से सीते हैं। पत्तलों और दोनों के लिये फरसा और महुआ पत्तों का उपयोग कभी कभार ही होता है, अधिकतम सरगी और सियाड़ी के पत्तों से ही दोने साकार होते आ रहे हैं। सरगी की तुलना में सियाड़ी के पत्तों की उपयोगिता अधिक व्याप्त है। सियाड़ी के पत्ते बहुआयामी सृजन को आधार देते रहे हैं। इसी तरह तेन्दू पत्ता बीडी व्यवसाय के लिये कच्चा माल है और इसीलिये लम्बे समय से बस्तर में यह राजनीति के केन्द्र मे भी रहा है। माओवादियों ने बस्तर मे पैर जमाने के लिये जिस मुद्दे को अपनी घुसपैठ के आरंभिक दिनो में उठाया था वह तेन्दूपत्ता के संग्रहण और उसके मूल्य पर नियंत्रण के लिये ही था, वर्तमान में तेन्दूपत्ता संकलन और विक्रय पर सरकारी नीति उपलब्ध है।

आप दोना-पत्तल को बहुत सहजता से नहीं ले सकते। उपयोगिता के अनुसार दोनों और पत्तलों के कई आकार-प्रकार उपलब्ध हैं। भात रखने के लिये बडे आकार का दोना चाहिये जिसे डोबला या खोलडा भी कहा जाता है; सरगी अथवा सियाड़ी के बीस-पच्चीस पत्ते लगते हैं एक खोलडा बनाने के लिये जो अंतत: बांस की सीकियों से गुथ कर एक बडे पात्र का आकार ले लेता है। अगला प्रकार है मूंडी दोने; संरचना में इन मूंडी दोनों में बायें-दायें कुल चार मोड आते हैं और देखने पर किसी डोंगी या नाव की अनुभूति होती है। छोटे आकार की मूंडी को आमतौर पर पेज पीने में खूब प्रयोग में लाया जाता है; पेज पीने के उद्देश्य से ही दोनो का एक अन्य प्रकार है पुतकी जबकि चौकोनी तो नाम से ही स्पष्ट है कि इन प्रकार के दोनों में चार कोने होते हैं। शराब पीने के लिये जिन दोनों का इस्तेमाल होता है उन्हें चिपडी कहा जाता है; देखने में चिपडी भी एक नाव की तरह ही होती है। यदि पत्तल की बात की जाये तो मूल रूप से इसे गोलाकार दिया जाता है जिसके लिये दस बारह सरगी अथवा सियाड़ी के पत्तों को करीने से बिछा कर बांस की सींक से सिला जाता है। केवल उपयोगिता ही नहीं अपितु दोना-पत्तल आदिवासी प्रथाओं का भी हिस्सा हैं। पतरी उलटना वस्तुत: एसी ही प्रथा है जिसमे कि हलबा जनजाति के वर-वधु को पत्तल उलट कर उस पर बिठाया जाता है। पनारा जाति के लोग छींद के कोमल पत्तों का कलात्मक उपयोग दूल्हे और दुल्हन के विवाह-मौड बनाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। वैसे ‘दोनों’ की रोचक उपादेयता जाननी हो तो कभी लाल-चींटी को एकत्रित करने की विधि को ध्यान देखिये जिसकी की चटनी बस्तर में खूब प्रचलित है। हाट-मडई में कतारों से सजे वनोत्पादों को थामने वाले दोना-पत्तल आज भी एक आम दृश्य हैं।            

कई दैनिक उपयोग के उत्पादों में पत्तों का स्वाभाविक रूप से उपयोग होता है उदाहरण के लिये धूप और छाया से बचने के लिये सिर पर पहनी जाने वाली छतूडी यद्यपि बाँस से बनायी जाती है किंतु इसमे छिद्र भरने का कार्य मुख्य रूप से सियाड़ी के पत्ते करते हैं। इन दिनो ‘सनहा’ का प्रयोग देखने में नहीं मिलता जबकि सियाड़ी के पत्तों से निर्मित एक समय यह प्रचलित रेनकोट हुआ करता था। बरसात में एक आदिवासी के सिर से पाँव तक का आवरण होता था सनहा और छतूडी। चिपटा भी अब चलन से बाहर हो गया है; सियाड़ी के पत्तों और सियाड़ी की ही रस्सी से चिपटा बनाया जाता था जिसने भीतर विभिन्न खाद्य उत्पाद खास कर अरहर, मूंग, उडद, सरसो आदि सुरक्षित रखे जाते थे। बाजार के आदिवासी घरों के भीतर तक पैठ होने के बाद ये प्राकृतिक पहनावे तथा संग्राहक अब चलन से दूर हो गये हैं। 

चर्चा पत्तों पर है तो घांस की लोकजीवन मे उपादेयता और उसकी कलात्मकता पर चर्चा के बिना बात अधूरी रह जायेगी। दक्षिण बस्तर विशेषकर भैरमगढ, भोपालपट्टनम, बीजापुर आदि क्षेत्रों में बोथा घास बहुतायत में पायी जाती हैं इस घास से चटाई अथवा मसनी तैयार की जाती है जो अपनी मजबूती के लिये जानी जाती हैं। चटाई के अलावा ऊसरी जैसी घास या कि धान के पुआल से रस्सी बनाने का काम भी आदिवासी समाज का कुटीर उद्योग है। पुआल से बनाई गयी रस्सी को बेठ कहते हैं। इस बेठ का कलात्मक उपयोग देखिये कि इसे ही गोल गोल घुमा कर धान आदि के संग्रहण के लिये कोठा तैयार कर लिया जाता है जिसे ‘पुटका’ कहा जाता है।

घास-पात की उपादेयता को आदिवासी सामाजिकता में भी खूब देखा-समझा जा सकता है। बस्तरिया जीवन में तम्बाकू देना परस्पर सौहार्द और प्रेम का प्रतीक माना गया है। एक दूसरे का मन जीतने के लिये धुंगिया दिया जाना आम बात है किसके लिये प्राय: पत्ते की चोंगी बनाई जाती है जिसके भीतर तम्बाकू भरा जाता है। ये चोंगी मुख्य रूप से सरगी या तेन्दू के पत्तों की ही बनाई जाती है। समग्र रूप से देखा जाये तो जन्म से ले कर अवसान तक, पर्व से ले कर प्रार्थना तक और दैनिक उपयोग से ले कर बाजार तक घास-पात बस्तरिया जीवन के सहचर हैं।  

 -राजीव रंजन प्रसाद 
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