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Thursday, October 31, 2013

माफी की माओवादी पॉलिटिक्स


पिछले पृष्ठ का शेष -


किसी भी आन्दोलन का एक तेवर होता है, विचार होते हैं, दशा-दिशा होती है तथा कार्यशैली होती है। आप “हिट एण्ड ट्रायल” प्रक्रिया के अनुरूप कार्य करते हुए स्वयं को व्यवस्था परिवर्तन का स्वयंभू ठेकेदार तो निरूपित कर सकते हैं किंतु कोई क्रांति पैदा नहीं कर सकते। बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों को अस्सी के दशक से आधार क्षेत्र बना कर बैठे माओवादी भले ही अपनी सोच और कार्यान्वयन के फासीवादी तरीकों को सही बताने के लिये कथित प्रगतिशील शब्द तलाश लेते हों किंतु जनता की सोच ने ही उन्हें आतक़ंकवादियों की श्रेणी में रखा है। अब बहस विचारधारा से कहीं उपर जा चुकी है, सही मायनों में देखा जाये तो गोली के विरुद्ध गोली का संघर्ष भर रह गया है। बेचारा आदिवासी तो जानता ही नही कि उसे किस बात की सजा मिल रही है? क्या इस बात की कि उसके निवास उन पर्वतों पर अवस्थित हैं जहाँ भांति भांति के अयस्क और प्राकृतिक संसाधन हैं अथवा इस बात की कि वे उन प्राकृतिक स्थितियों में रह रहे हैं जो शेष दुनिया के लिये रहस्यमय और अबूझ हैं; जहाँ समुचित जानकारी के बिना परिन्दे भी पर मारने के लिये सहज नहीं हैं? 

माओवाद पर नये सिरे से बहस दो कारणों से आवश्यक है। पहला कि लाल-आतंकवाद की राजधानी बस्तर वाले राज्य छत्तीसगढ में चुनाव सामने है एसे में राजनीतिक सक्रियताओं के भोंपू का जंगल में भी बजना तय है। दूसरा कारण यह कि आम चुनावों के मद्देनजर आया कमाण्डर रमन्ना का साक्षात्कार शैली में बयान नक्सली राजनीति की कई परतें खोल रहा है। माओवादियों की बेबसाईट पर दस अक्टूबर को जारी किया गया यह साक्षात्कार वस्तुत: विवेचना की भी मांग करता हैं कि उनके पास व्यवस्था बदलने की कोई ठोस रणनीति वास्तव में है भी अथवा नहीं? इस संदेह के बीज तो इस वर्ष दक्षिण बस्तर में हुई पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या के समय ही पड़ गये थे। विरोधी विचार की इस निर्ममता से हत्या की जा सकती है इस बात से सजग पत्रकारों ने जब नक्सलियों का अभूतपूर्व विरोध किया जब ताल ठोंक कर मुखबिरी साबित करने वाले लाल-विचारकों को अपने हाथ से तोते उडते महसूस हुए। स्थानीय पत्रकारों ने अदम्य और सराहनीय साहस का परिचय देते हुए नक्सलियों से सम्बन्धित समाचारों का बहिष्कार कर दिया तथा उनकी प्रेस-विज्ञप्तियों, सूचनाओं, वक्तव्यों आदि से आंख मूंद ली। इसका परिणाम यह हुआ कि जंगल में लाख मोर नाचता रहे उसे देखेगा-दिखायेगा कौन? कथित क्रांति धरी न रह जाये इस बात से सशंकित नक्सली झुके और पत्रकारों से सम्बन्ध साधा गया। जंगल में हुई इस प्रेसवार्ता में पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी मेंबर कमलु कुंजाम एवं महिला कमांण्डर ज्योति ने यह सफाई दी कि नेमीचन्द्र की हत्या उच्च कमीटी को अंधेरे में रख कर की गयी है। घटना की उच्चस्तरीय माओवादी नेताओं द्वारा जांच किये जाने तथा दोषियों को सजा दिये जाने की बात भी कही गयी थी। पत्रकार बंधुओं ने इस अपील का सकारात्मक उत्तर दिया और समाचार में पहले की तरह ही माओवादी पक्ष को भी जगह मिलने लगी। यद्यपि पत्रकारों ने दुबारा यह जानने की कोशिश नहीं की कि उनसे साथी नेमीचन्द्र जैन के मामले में क्या कार्यवाई हुई, किस तरह जांच हुई, कौन लोग दंडित किये गये, क्या सजा हुई या कि उन्हें भी आश्वासन की वैसी ही टॉफी चुसाई गयी जैसी मुख्यधारा की व्यवस्था उन्हें थमाया करती है? 

नेमीचन्द्र जैन कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते; इस बात की झलख मुझे रमन्ना के हालिया साक्षात्कार से मिलती है। रमन्ना कहता है कि “जब नेमिचंद  जैन की हत्या हुई थी, थोड़ी  भ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हुई थी। इस घटना को किसने और किसके निर्णय पर अंजाम दिया यह पता लगाने में काफी देरी हो गई। बाद में यह स्पष्ट हो गया कि हमारी एक निचली कमेटी के गलत आंकलन और संकीर्णतावादी निर्णय के चलते यह दुखद घटना घटी थी। हमें इस पर बेहद अफसोस है। मैं हमारी स्पेशल जोनल कमेटी की ओर से नेमिचंद के परिजनों और दोस्तों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता हूँ। हमारी पार्टी इस पर पहले ही सार्वजनिक रूप से क्षमायाचना चुकी है। इस घटना ने हमें फिर एक बार यह सिखा दिया कि हमारे कतारों में जनदिशा और वर्गदिशा पर शिक्षा का स्तर ऊपर उठाने की सख़्त जरूरत है। मैं मीडिया के जरिए फिर एक बार जनता  को  यह  आश्वासन देता  हूँ कि आने वाले दिनों में ऐसी दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने पाए, हम पूरी एहतियात बरतेंगे”। कोई भी विवेचनावादी मुझे बताये कि इस क्षमायाचना में ठोस बात क्या कही गयी है? किसे सजा दी गयी है? जांच में जब निचले कैडर की गलती सामने आयी तो उनका क्या हुआ? जिस बात पर जोर है वह यही कि परिजनो और मित्रों भूल हुई माफ करो। क्या इस माफी से सर्वहारा पत्रकार नेमीचन्द्र जैन पुन: जीवित हो उठेगा और अपनी माँ के गले लग कर कहेगा देखा, मैं न कहता था कि सब ठीक हो जायेगा? यह हास्यास्पद बयान उन स्थानीय पत्रकारों के गले कैसे उतरा यह तो मैं नहीं जानता जिन्होंने इस प्रकरण का मुखर विरोध किया, साथ ही वे आज भी इन्ही परिस्थितियों में काम कर रहे है? यहाँ छोटे और बडे पत्रकार वाला बारीक अंतर भी देखना चाहिये। बीबीसी के पत्रकार रहे शुभ्रांशु चौधरी पर धमकी वाले मामले में रमन्ना ने जिस तरह मक्खन मल मल कर सफाई दी है वह बात समझने योग्य है। शुभ्रांशु पर धमकी की आलोचना अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ ने की इसके बाद तो उनपर सम्मानित पत्रकार जैसे सम्बोधन के साथ चर्चा होनी ही थी। वो कोई बस्तरिया नेमीचन्द्र जैन थोडे ही हैं। विरोध करने का अधिकार केवल नक्सलियों और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघों को ही तो है बाकी तो हवा हवाई बाते ही मानिये।  

बात गहरी है इसलिये यहाँ से थोडा और आगे बढते हैं। झीरमघाटी हमले पर चादर पडने लगी थी फिर रमन्ना का बयान क्यों आया? इससे पहले बयान क्या है इसकी चर्चा कर लेते हैं। अपने साक्षात्कार में रमन्ना कहता है कि “दिनेश पटेल को मारना हमारी एक बड़ी गलती थी क्योंकि उन्होंने हमारी पार्टी या आन्दोलन के खिलाफ कभी कोई काम नहीं किया था। उनका कोई जनविरोधी रिकार्ड  नहीं रहा”। रमन्ना आगे कहता है कि “यह बात सही है कि उन्होंने दस साल पहले गृहमंत्री रहते हुए हमारे आंदोलन का दमन करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। लेकिन चूंकि पिछले दस सालों से प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से दूर है और व्यक्तिगत रूप से नंदकुमार पटेल हमारे आन्दोलन के खिलाफ प्रत्यक्ष रूप से आगे नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्हें नहीं मारना चाहिए था”। अब झीरम घाटी की घटना के तुरंत बाद आया गुडसाउसेंडी का बयान देखिये जहाँ वह कहता है कि “राज्य के पूर्व गृहमंत्री और छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल जनता पर ‘दमनचक्र चलाने में आगे रहे थे यही कारण है कि उन्हे मारा गया। यानी कि रमन्ना का साक्षात्कार वस्तुत: एक ‘यू टर्न’ है। नंद कुमार पटेल से अधिक उनके बेटे को मारने के लिये माओवादियों पर उंगली उठाई गयी है। एसा क्यों है कि श्री पटेल के बेटे को मारे जाने की घटना और उसके कारणों को चतुराई के साथ इस साक्षात्कार में गोल कर दिया गया है? क्या यह एक नयी साजिश या नये राजनीतिक-लाल गठबंधन की ओर इशारा है? एक प्रश्न और पूछा जाना चाहिये कि यदि पटेल दस सालों ने नक्सलवाद का विरोध नहीं कर रहे थे तो क्या विपक्ष में उनकी भूमिका नक्सल समर्थक की थी? एक और बात कि रमन्ना ने अपने बयान में कहीं भी विद्याचरण शुक्ल को मारे जाने पर बात नहीं की है। स्मरण रहना चाहिये कि गुडसा उसेंडी नें झिरमघाटी में उन पर हलमा करने को जस्टीफाई करते हुए बयान दिया था कि “''ये भी किसी से छिपी हुई बात नहीं है कि लंबे समय तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालय संभालने वाले वीसी शुक्ल भी जनता के दुश्मन हैं, जो साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों और ज़मींदारों के वफ़ादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियाँ बनाने और लागू करने में सक्रिय रहे।'' अब क्या यह सच नहीं कि वीसी शुक्ल भी पिछले दस साल से छत्तीसगढ़ या केंद्र की राजनीति में अहम भूमिका नहीं निभा रहे थे तो फिर उनके लिये माफी क्यों नहीं मांगी गयी? अब तक मांगी गयी माफियों को गहराई से समझते ही आप भी माओवादियों की तारीफ करेंगे कि जबरदस्त पॉलिटिक्स है तुम्हारी बॉस; तुमने तो खादी वालों के भी कान काट दिये। 

माओवाद को क्यों आन्दोलन कहा जाये अगर उसके कैडर का बरताबव हमारी पुलिस से जरा भी भिन्न नहीं? बात बात पर लाठी-गोली ही चलाना है और बाद में मुह छिपाते भी घूमना है कि “हमसे भूल हो गई, हमका माफी दई दो” तो फिर यह कथित जनता का संघर्ष एक बडे गुब्बारे जैसा नहीं जिसमें अब तक पिन नहीं मारी गयी है? सच बात तो यह है कि रमन्ना ने अपने साक्षात्कार में जो बाते कहीं है वह चुनाव में माओवादियों की अदृश्य भागीदारी वाला ही पक्ष है; बस यह साफ नहीं किया गया है कि उनका वरदहस्त किनकी पीठ पर है। सलवाजुडुम का कभी भी स्थानीय पत्रकारों ने समर्थन नहीं किया यही कारण है कि महेन्द्र कर्मा की हत्या पर माओवादियों से भी अधिक सवाल नहीं पूछे गये। इसी बात को रमन्ना के सुप्रीमकोर्ट वाले बयान की ढाल से भी जोडना चाहता हूँ। अगर रमन्ना मानते हैं कि सलवाजुडुम पर सुप्रीमकोर्ट नें प्रतिबन्ध लगा दिया इस लिये यह गलत था, तो मान्यवर आप तो एक प्रतिबन्धित संगठन ही हो; आप अपने संगठन के अस्तित्व को और इसकी विचारधारा को कैसे जस्टीफाई कर पाते हो? कथनाशय है कि जिन कारणों से सलवाजुडुम गलत था बिलकुल उन्हीं कारणों के लिये माओवादी संगठनों को भी गलत ठहराया जाता है। रमन्ना का यह साक्षात्कार कच्चा प्रतीत होता है जिसमे अपनी चमडी बचाने की कवायद अधिक दिखाई देती है। हास्यास्पद यह कि अगर रमन्ना जोर दे कर यह बताना चाहते हैं कि जैसे वोट देना लोकतांत्रिक अधिकार है वैसे वोट न देना भी, तो उन्हें यह संज्ञान में रखा चाहिये कि धीरे धीरे परिपक्व होते लोकतंत्र ने बिना आपके हस्तक्षेप के ही ईवीएम मशीन पर किसी को भी न चुनने का अधिकार दे दिया है। रमन्ना का यह साक्षात्कार केवल ‘हमारे खिलाफ सेना हटाओ’, ‘हमारा सर्च बंद करो’, ‘हमारे खिलाफ कानूनी प्रक्रियायें बंद करो पर ही केन्द्रित है’। सरकार का विरोध भी उसने इतनी कच्ची बुनियाद पर किया है कि टिकता नहीं। 

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Monday, January 21, 2013

माओवादी, मधुरांतक, नरबलि और प्राईवेट अंगों की शेविंग.....उफ़!!!!



माओवादी नेता सब्यसांची पाँडा का एक साक्षात्कार ‘दैनिक भास्कर’ में कुछ दिनो पहले पढने को मिला। इससे कुछ देर पहले मैं बस्तर के एक नाग वंशीय शासक मधुरांतक देव के विषय में पढ रहा था। ये दोनो ही विषय पता नहीं क्यों मेरी विचार श्रंखला में गुत्थमगुत्था होने लगे। वर्तमान पर बात करने से पहले मधुरांतक से आपको परिचित करा दूं। यह एक कुख्यात नागवंशीय शासक था जिसनें प्राचीन बस्तर अर्थात चक्रकोट पर 1062 से 1069 ई. के मध्य शासन किया। उल्लेखनीय है कि नाग राजाओं का शासन प्रबन्ध उनके राज्य को कई केन्द्रीय शासन द्वारा संचालित स्वायत्त मण्डलों में विभाजित करता था, इन्ही में से एक था मधुर मण्डल जिसमें छिन्दक नागराजाओं की ही एक कनिष्ठ शाखा के मधुरांतक देव का आधिपत्य था। माना जा सकता है कि मधुरांतक देव के पूर्वजों को माण्डलिक चोल राजाओं नें बनवाया होगा चूंकि राजेन्द्र चोल (1012 – 1044 ई.) के मधुर मण्डल पर विजय का उल्लेख अतीत में प्राप्त होता है। कहानी यह है कि चक्रकोट के राजा धारवर्ष जगदेक भूषण (1050 – 1062 ई.) के निधन के पश्चात चक्रकोटय में उत्तराधिकार को ले कर संघर्ष हुआ और राजनीतिक अस्थिरता हो गयी। इस परिस्थिति का लाभ उठा कर ‘मधुर-मण्डल’ के माण्डलिक मधुरांतक देव ने चक्रकोटय पर अपनी “एरावत के पृष्ठ भाग पर कमल-कदली अंकित” राज-पताका फहरा दी।

कहते हैं कि नितांत बरबर और निर्दयी था वह। उसे कुचल देना ही आता था। ड़र के साम्राज्य ने शासक और शासित के बीच स्वाभाविक दूरी उत्पन्न कर दी। उस पर अति यह कि अपनी कुल-अधिष्ठात्री माणिकेश्वरी देवी के सम्मुख नरबलि की प्रथा को नीयमित रखने के लिये उसने राजपुर गाँव को ही अर्पित कर दिया था। यह गाँव वर्तमान जगदलपुर शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। वहाँ से जिसे चाहे उठा लो और देवी के सम्मुख धड़ से सिर को अलग कर दो। जिन खम्बों पर साम्राज्यों की छतें खड़ी  होती है वे शनै: शनै:  कुचले हुए लोगों की आँहों भर से खोखले हो उठते हैं। मधुरांतकदेव नें अपने राजपुर ताम्रपत्र में नरबलि के लिये राजपुर गाँव को दिये जाने का कारण जनकल्याण बताया है। जनता की लाशें बिछा कर कैसा और किस प्रकार का जनकल्याण संभव हो सकता था? लेकिन उसके पास अपने विचार का नशा था जो उसके द्वारा की जाने वाली हर हत्या को जायज ठहराने का कारण बन जाता था।

गंभीरता पूर्वक कई इतिहासकारों के मंतव्यों और ताम्रपत्रों-शिलालेखों के अनुवाद पढने के पश्चात मेरी यह राय बनी है कि यदि किसी कृत्य को गरिमा प्रदान की जाये तो वह प्रथा बन जाती है। नरबलि को मधुरांतक नें त्यौहार बना दिया था अत: यह उसकी मौत के बाद भी प्रथा समाप्त नहीं हुई अपितु किसी न किसी रूप में चलती रही। मधुरांतक के बाद नरबलि के लिये किसी शासक द्वारा गाँव समर्पित करने का उल्लेख तो नहीं मिलता लेकिन मेरिया अर्थात वध्य को पकड़ने के लिये  तरह तरह के हथकंडे अपनाये जाने लगे। कालांतर अपराधी अथवा कभी कभी कोई अनजान यात्री अथवा पडोसी राज्य से किसी व्यक्ति को पकड कर बलि दी जाने लगी। नर बलि के कारण बडे ही जनकल्याणकारी बताये जाते थे उदाहरण के लिये कर्नल मैकफर्सन का प्रतिवेदन (1852) उल्लेखनीय है जिसमें वर्णित है कि “भूमिदेवी की पूजा के निमित्त नरबलि दी जाती है। अकाल मौत से बचने के लिये, शिशु जन्म के अवसर पर, वन्य पशुओं के आतंक से गावों को बचाने के लिये, फसल को खराब होने से रोकने के लिये, गाँव पर, राज्य पर, मुखिया पर अथवा राजा पर कोई विपत्ति आने की स्थिति में भी नर बलि दी जाती है”।

मधुरांतक देव का क्या हुआ यह जानने से पहले चर्चा सव्यसाँची पाँडा की अखबारी समाचार के आलोक में करते हैं। अखबार लिखता है “शोषितों, वंचितों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले नक्‍सिलयों में आजकल अंदरूनी घमासान मचा है। हाल में पार्टी से निकाले गए माओवादी कमांडर सब्‍यसाची पांडा ने काफी बगावती तेवर दिखाए थे। वह अब बिल्‍कुल अकेला है। ओडिशा में नक्‍सल आंदोलन के 'पोस्‍टर ब्‍वॉय' के तौर पर मशहूर 43 साल का पांडा अब खुद को 'ओल्‍ड डॉग' की तरह मानता है जिसका उसकी पार्टी नामोनिशान मिटा देनी चाहती है। ओडिशा का सबसे अहम नक्सली नेता माने जाने वाले पांडा को 'शे गुवेरा' कहलाता था। पांडा ने एक खत लिख कर कई सवाल उठाए थे। उसने नक्‍सलियों के प्राइवेट पार्ट्स 'क्‍लीन शेव' करने के चलन पर जोर देने की परंपरा को भी गलत ठहराया है। उसका कहना है कि यह तेलुगु कैडरों में आम बात है और महिला काडरों को अक्‍सर ऐसा करने की सलाह दी जाती है। उसने लिखा है, 'महिला काडरों को बिना कपड़े के स्‍नान करने को भी कहा जाता है। मुझे समझ नहीं आता कि क्रांति का ऐसे बकवास सिद्धांतों से क्‍या ताल्‍लुक है?

इसे पढने के बाद मेरा दिमाग सन्नाटे में आ गया था। पिछले तीस सालों से बस्तर के जंगलों में तेलगु कैडर नें ही खास तौर पर ‘नरबलियों’ से सन्नाटा पसराया हुआ है। क्या इस तरह की जा रही है क्रांति जिसमें व्यक्ति की इतनी निजता पर भी दिशानिर्देश जारी किये गये हैं? उपरी तौर पर तो अभिव्यक्ति और अन्य तमाम प्रकार की आजादी के लिये लडी जाने वाली इस तथाकथित क्रांति का स्वरूप इतना घृणास्पद होगा मेरी सोच में भी नहीं था। बडी बात यह है कि यह उजागर करने वाला व्यक्ति स्वयं कुख्यात माओवादी रहा है। निजी अंगों से विचार और विचारधारा का क्या अंतर्सम्बन्ध है? अथवा क्या निजी अंगो से ही संबंध है तथा विचारधारायें कम्बल का कार्य करने लगी हैं? उफ़.....।

इस यौनविकार भरी लिजलिजी विचार प्रक्रिया से बाहर निकलते हैं और पाँडा की मन:स्थिति को समझने का यत्न करते हैं। ओपन' मैगजीन ने पांडा के खत अपने पास होने का दावा किया है। मैगजीन ने कहा है कि दुखी मन से लिखे गए इस खत में पांडा ने सीपीआई (माओवादी) के आलाकमान की गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खत में पांडा ने ऐसे सनसनीखेज खुलासे किए हैं जिनसे माओवादी नेतृत्‍व में फूट पड़ सकती है। पांडा ने कहा है कि माओवादी नेता खुद को मालिक समझ बैठे हैं और कैडर उनकी गलतियों का विरोध करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाते हैं। पांडा ने नक्सल नेतृत्व पर अकारण हिंसा फैलाने का आरोप लगाया है। पांडा ने लिखा है, हम कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी में किसी गलती के लिए पार्टी के सदस्‍य को सस्‍पेंड कर सकते हैं और जरूरत पड़ी तो उसकी हत्‍या भी की जा सकती है। पांडा ने सवालिया लहजे में कहा, क्‍या किसी क्रांतिकारी का काम केवल पुलिसवालों की हत्‍या करना ही रह गया है?” यह सवाल महत्वपूर्ण है, एकपूर्व माओवादी नेता द्वारा उठाये जाने के कारण इस सवाल को विषद चर्चा का विषय बनना चाहिये। यह सवाल उन सभी युवाओं के सामने पडना चाहिये जिनके सामने रात दिन क्रांति का ढोल पीटा जा रहा है और बंदूख उठाने के लिये कई उत्प्रेरक सामने रखे गये हैं। यह सवाल क्रांति के नाम पर किसी भी हथियार उठाने वाले को स्वयं से करना ही चाहिये कि क्या वे जाने अनजाने मधुरांतक देव तो नहीं बन रहे?

यह आम आदमी की बलि ही तो है; पांडा आगे लिखते कहते हैं पांडा ने बेवजह किसी खास वर्ग के विध्‍वंस के खिलाफ भी जमकर अपनी भड़ास निकाली है। उसने लिखा है, किसी पर मुखबिर होने का ठप्‍पा लगाकर उसे मारना-पीटना और जला देना ही समस्‍या का हल नहीं है। पांडा ने संबलपुर के पांच-छह गाँववालों, जिन्‍हें 2004 में मुखबिर होने के शक में मार डाला गया था, का उदाहरण देते हुए कहा, “केवल मैंने इसका विरोध किया था इस परिप्रेक्ष्य को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि यह उस व्यक्ति के द्वारा कही गयी बाते हैं जो अब तक आउटलुक, तहलका या बीबीसी जैसे खबरदात्री स्थलों में चंद दिन या महीने रहे घूमंतू पत्रकारों अथवा किसी राजनीतिक-विचारधाराबद्ध लेखकों की कही-सुनी-गढी-बढी-चढी बातों से बिलकुल अलग प्रतीत होती हैं। वह व्यक्ति जिसने वर्तमान की इस तथाकथित क्रांति को खाया-पीया-ओढा-बिछाया है उस पर बुद्धिजीवी केवल खखार कर नहीं रह सकते (यद्यपि मौन ही रहने वाला है)। अखबार सब्यसांची पाण्डा का परिचय देते हुए एवं माओवादी संगठनों की आंतरिक गुटबाजी पर जोर दे कर लिखता है कि “सब्यसाची पांडा भाकपा (माओवादी) राज्य (ओडिशा) संगठन का सचिव था। मार्च महीने में दो इतालवी नागरिकों के अपहरण के पीछे इसी का हाथ था। अपहृतों की रिहाई के बदले पांडा ने अपनी पत्‍नी मिली को जेल से छोड़े जाने की मांग की थी। उसे बाद में जमानत पर छोड़ दिया गया था। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक पांडा नक्सली संगठन में आंध्र प्रदेश कैडर के नक्सलियों के दबदबे से परेशान था और ओडिशा में पांडा की बढ़ती ताकत से आंध्र के नक्सली नेता खुश नहीं थे। यही कारण है कि पांडा को अब तक सेंट्रल कमेटी या पोलित ब्यूरो में जगह नहीं दी गई थी”। 

क्रांति नरबलियों से नहीं आ सकती, प्राईवेट अंगों को शेव करने से भी नहीं आयेगी, महिला कैडरों को निर्वस्त्र नहाते ताकने वाले.....नहीं ला सकते क्रांति। इनसे क्रांति के मायनों की तलाश छोड कर हश्र की बात करते हैं और यहाँ मधुरांतक देव की चर्चा पुन: आवश्यक हो जाती है। इस शासक को एक जनक्रांति नें सत्ता से बेदखल किया था। हाँ, मैं यहाँ उसी बस्तर की बात कर रहा हूँ जिसे क्रांति सिखाने वाले देश भर में पिले पडे हैं। इस क्रांति का नेतृत्व किया था सोमेश्वरदेव (1069 – 1111 ई.) नें। वे दिवंगत नाग राजा धारवर्ष जगदेक भूषण के पुत्र थे। मधुरांतक द्वारा पराजित और निर्वासित किये जाने के बाद वे चक्रकोटय के निकट ही किसी गुप्त स्थान पर रहते हुए जन-शक्ति संचय में लगे थे। उनका कार्य कठिन नहीं था। हाहाकार करती प्रजा को एक योग्य नेता ही चाहिये था। राज्य में विद्रोह अवश्यंभावी था। सोमेश्वर देव ने जनभावना का लाभ उठाते हुए उनके क्रोध को युद्ध में झोंक दिया। आक्रमण हुआ तो किले के भीतर रह रहे नागरिकों में हर्ष का संचार हो गया। मधुरांतक ऐसी सेना को साथ लिये कितनी देर लड़ सकता था जिनकी सहानुभूति और भरोसा उसने खो दिया था? युद्ध समाप्त हुआ। मधुरांतक जंजीरों में जकड़ कर राजा सोमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। राजाज्ञा से जब आततायी मधुरांतक के सिर पर हाथी ने अपना पैर रखा तो यह दृश्य देखने के लिये नगर का एक-एक व्यक्ति उपस्थित था। किसी भी आँख में कोई सहानुभूति नहीं थी। क्या आधुनिक मधुरांतकों के पास यह घटना उदाहरण के तौर पर मौजूद है?......या जलक्रीडायें और रेजर की दुकाने ही क्रांति को आगे ठेलती रहेंगी? 
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Monday, November 29, 2010

अच्छा तो तुम वामपंथी नहीं हो? यानी कि दक्षिण पंथी हो? - राजीव रंजन प्रसाद



इस बात को साल भर से अधिक हो गया। मैंने बस्तर में जारी नक्सलवाद के खिलाफ किसी लेख में टिप्पणी की थी। उस दिन मेरे नाम को इंगित करते हुए एक पोस्ट “मोहल्ला” ब्लॉग पर डाली जिसका शीर्षक था – “बस्तर के हो तो क्या कुछ भी कहोगे?” और लिंक - http://mohalla.blogspot.com/2008/05/blog-post_24.html इस पोस्ट नें मुझे झकझोर दिया। मैं माओवाद को ले कर हो रहे प्रचार की ताकत जानता हूँ और चूंकि मेरा अपना घर जल रहा हैं इस लिये आतंकवाद और क्रांति जैसे शब्दों के मायने भी समझने लगा हूँ। मैंनें निश्चित किया कि बस्तर का एक और चेहरा है जो माओवाद और सलवाजुडुम की धाय धमक में कहीं छुप गया है। बस्तर की और भी तस्वीरें हैं जो लाल नहीं हैं और बस्तर वैसा तो हर्गिज नहीं जो अरुन्धति के आउटलुक से दिखाया गया। अपनी मातृभूमि बस्तर के लिये कहानियाँ, आलेख और संस्मरण लिखते हुए अचानक ही एक उपन्यास लिखने का विचार कौंधा। बस्तर के इतिहास और वर्तमान पर काम करने का फिर मुझमें जुनून सा सवार हुआ। मैंने केवल शोध के कार्य के लिये बस्तर भर की कई यात्रायें कीं और उन जगहों पर विशेष रूप से गया जहाँ जाना इन दिनों दुस्साहस कहा जाता है। यानि कि हम अपने ही घर, अपनी ही मिट्टी में निर्भीक नहीं घूम सकते?

मेरे बस्तर विषयक आलेख जब पत्र-पत्रिकाओं और ब्ळोग में प्रकाशित होने लगे तो मेरा दो तरह के स्वर से सामना हुआ। पहला स्वर जो मुझसे सहमत था और दूसरा जो असहमत। असहमति भी स्वाभाविक है, मैं उम्मीद नहीं कर सकता कि मेरी तरह ही सभी सोचें। सब एक तरह ही सोचते तो भी समाजवाद होता? लेकिन जो बात सबसे अधिक विचारणीय है वह है सोच की खेमेबाजी, सोच का रंग और सोच का झंडा। कोई तर्क करे तो समझ में आता है, कोई विचार रखे और उद्धरण दे तो भी समझ में आता है यहाँ तक कि किसी के अनुभव सामने आयें वह विरोधाभासी भी हों तो भी सोच को जमीन देते हैं। लेकिन “खास तरह के खेमेबाजों का” एक मजेदार विश्लेषण है – आप वामपंथी नहीं हो तो आप संघी हो या दक्षिणपंथी हो?

मैं बहुत सोचता हूँ कि आखिर क्या हूँ मैं? उम्र के पन्द्रह साल से ले कर लगभग सत्ताईस साल तक अपने नाम के आगे कामरेड सुनना अच्छा लगता था। इप्टा से जुड कर में नुक्कड भी किये, गली गली जनगीत भी गाये,  हल्ला भी बोला इतना ही नहीं उस दौर के लिखे हुए मेरे अनेकों नाटक लाल सुबह ही उगाते हैं जिनमें प्रमुख हैं – किसके हाँथ लगाम, खबरदार एक दिन, और सुबह हो गयी आदि आदि। किसके हाँथ लगाम की एक प्रस्तुति ‘भारत-भवन’ में तथा मेरे नाटकों की कई प्रस्तुतियाँ भोपाल के रवीन्द्र भवन में भी हुई हैं। तब की लिखी मेरी कहानियों के अंत में हमेशा ही लाल सुबह होती रही थी। लेकिन बहुत कुछ तब दरका जब तू चल मैं आया वाले प्रधानमंत्रियों का दौर आया और वामपंथी दलों की अवसरवादिता नें मेरे सिद्धांतों की कट्टरता को झकझोर दिया। धर्म को जनता की अफीम मानने वाले एक दिवंगत कामरेड की पहचान हमेशा उनकी पगडी से ही रही। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडने वाले कई छत्रप अपने बेटों के लिये लाल कालीन की जुगाड में ही दिखे। उनका श्रम भी रंग लाया और कुछ फैक्ट्री मालिक है तो कुछ सी.ई.ओ। मैं धीरे धीरे प्रायोजित विरोध और स्वाभाविक विरोध के अंतर को समझने लगा हूँ।

एसे ही एक दिन जब मैं अपने घर बचेली पहुँचा तो अपनी डायरी ले कर जंगल जाने लगा। जंगल में सिम्प्लेक्स नाले पर एक पत्थर मेरी टेबल-कुर्सी दसियों साल से ‘था’। यहाँ पानी में पैर डाले घंटों अपनी किताबों के साथ मैं समय गुजारा करता था। दसवी और बारहवी में अपने प्रिपरेशन लीव के दौरान भी मैं यहीं सारे सारे दिन बैठ कर पढा करता था। यहीं मैने कई वो कहानियाँ और नाटक भी लिखे जिनके अंत में मुक्के तन जाने के बाद धरती समतल हो गयी और एक सी धूप फैल गयी। इस बार जब मम्मी नें जंगल में उस ओर जाने से रोक दिया। कारण था नक्सलवाद। एसा प्रतीत हुआ जैसे किसी नें मुझे मेरे ही घर में घुसने से रोक दिया। उस दिन मैने गहरे सोचा कि एसा क्यों है कि मैं उदास हूँ? मुझे तो खुश होना चाहिये था कि वैसा ही हो रहा है जैसा मेरी कहानियों में होता था कि क्रांतिकारी बंदूख ले कर उग आये हैं और ढकेल कर लाल सवेरा के कर आने ही वाले हैं? मैंने अपनी कहानियों को टटोला लेकिन उनमें कहीं बारूदी सुरंग फाड कर सुकारू और हिडमाओं की ही लाशों के अनगिनत टुकडे किये जाने की कल्पना नहीं थी। मैंने जब भी क्रांतिकारी सोचे तो वो भगतसिंह थे। उनकी नैतिकता एसी थी कि असेम्बली में भी बम फेंके तो यह देख कर कि कोई आहत न हो लेकिन बात पहुँच जाये। बस्तर के इन जंगलों में जो धमाके रात दिन हो रहे हैं क्या ये बहरों को सुनाने के लिये हैं? नहीं ये अंधों की लगायी आग है और दावानल बन गयी हैं। ये सब कुछ जला देगी खेत-खलिहान भी, महुआ-सागवान भी, आदिम किसान भी।              
                           
नहीं मैं लाल नहीं सोचता, हरा नहीं सोचता, भगवा नहीं सोचता, नीला पीला या काला कुछ नहीं सोचता। मेरी सोच को मेरी लिये बख्श दो भाई। चूल्हे में जायें सारे झंडे और सारे नारे। तुम उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, साम, दाम, वाम जो भी हो मुझे ये गालिया न दो। मैने बहुत सी कहानिया जला दी हैं बहुत से नाटक अलमारी में दफन कर दिये हैं और अब मैं वही लिखता हूँ जो मैं खुद सोचता हूँ अपने बस्तर के लिये।  

Tuesday, February 23, 2010

माओवादियों का “सीजफायर” और दिनकर की “शक्ति और क्षमा”

रात जब संचार माध्यमों नें चीखना आरंभ किया कि माओवादियों नें बहत्तर दिनों के सीजफायर का एलान किया है तो जिज्ञासा इस बात की थी कि उनकी शर्ते क्या हैं? हम महान देश के वासी हैं, हमसे आतंकवादी भी अपनी शर्तों पर बात करते हैं। शर्त स्पष्ट है – ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद होना चाहिये। लाल-आतंक के लम्बरदार किशन नें जब यह शर्त सार्वजनिक की तो तुरंत ही मेरा ध्यान दिनकर की प्रसिद्ध कविता “शक्ति और क्षमा” की ओर गया। कविता की एक एक पंक्ति इस घटना से भी जुडती है आईये प्रसंग और संदर्भ के साथ इसकी व्याख्या करें।

अनेकों बारूदी सुरंग विस्फ़ोट हुए, हजारों करोड की सरकारी संपत्ति स्वाहा कर दी गयी, अनेकों अपहरण, फिरौतियाँ और कत्लेआम भी जारी रहे किंतु गणतंत्र की साठवी वर्षगांठ बनाने वाले हम खामोश ही रहे। हमें पाकिस्तान की चिंता थी चूंकि उनके घर की आग में हाथ सेकते हमे मजा आ रहा था। हम रस ले कर सुनते रहे कि कैसे तालिबानी निर्ममता से हत्यायें करते हैं, कैसे बम-बंदूखों के तकिये पर सोते हैं। ठीक इसी वक्त लाल-आतंक तालिबानियों की ही रणनीति पर देश के जंगलों की आड में पनपा। उनकी हर गुस्ताखी पर हमनें कंधे झटके और अपने साहसी सैनिकों की शहादत पर कुछ घडियाली आँसुवों को बहाने के सिवा कुछ भी नहीं किया। दिनकर नें चेताया भी था कि -

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे, कहो, कहाँ कब हारा ?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष, तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको, कायर समझा उतना ही।

सहनशीलता एक सीमा से अधिक दुर्गुण है। लाल आतंक के डैने फैलते रहे और हम उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के दिखाये सब्ज बाग की हरी भरी सब्जियाँ खाते रहे कि एक दिन क्रांति हो जायेगी और व्यवस्था बदलेगी। सवाल यह कि जिन्हे व्यवस्था से शिकायत है वो सडक पर आयें अपने ठोस सिद्धांतों और वाद-विचार के साथ जनता के बीच जायें, उन्हे जागृत करें तथा मुख्यधारा ही उन्हे एसे बदलाव का रास्ता देती है जहाँ आपके साथ अगर जनता हो तो परिवर्तन अवश्यंभावी है। बंदूख ले कर मासूम आदिवासियों और नीरीह ग्रामीणों की हत्याओं से हिंसा फैला कर क्रांति की आशा भी बेमानी है और वास्तविकता में यह लुटेरापना है।

हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकानें “लाल” माध्यमों से चलती हैं। इस वाद के कर्ता-धर्ता इकट्ठा होने में बेहद यकीन रखते हैं। एक जैसी बात बोलेंगे, एक जैसा लिखेंगे, एक दूसरे की पीठ खुजायेंगे और केवल एक दूसरे को ही पढेंगे। यकीन नहीं होता तो आज किसी भी स्कूल में किसी भी कक्षा में जा कर समकालीन कवियों/लेखकों का नाम ले कर पूछिये उन्हें जानने वालों में किसी के हाथ शायद ही कभी उठते हैं लेकिन साहित्य के ठेकेदारों के पास जाईये तब पता चलता है कि भईया आज कल फलां-फलां समकालीन हैं। खैर फिर वही बात कि जिनकी लेखनी में इतना गूदा भी नहीं कि जन-जागृति करा सकें वे बंदूख से क्रांति के लिये अखबारों के कॉलम और टीवी के फीचर रचते हैं। देखिये हमारी सहनशीलता कि हम इन्हे बर्दाश्त भी करते हैं और नपुंसकों की तरह इनकी न समझ में आने वाली कविताओं/रचनाओं पर तालियाँ भी पीटते हैं। लाल आतंक इसी तरह की बुद्धिजीविता की आड में पनपा और हम इन्हे धिक्कारने की बजाये खामोश और सहनशील रहे। दिनकर कहते हैं -

अत्याचार सहन करने का, कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज, कोमल होकर खोता है।

मैं बस्तर की बात करूंगा। जब आदिवासी आंदोलित हुए और नक्सलवादियों के खिलाफ हथियार उठा लिया तब एक बडी क्रांति हुई। लाल-आतंक और उनके प्रचारक लेखकों को पहले तो यह समझ ही नहीं आया कि आखिर आम आदमी इस तरह अपने मामूली तीर धनुष और नंगा-चौडा सीना लिये नक्सलियों की इम्पोर्टेड बंदूखों के आगे कैसे खडा हो गया। बाद में लाल-प्रचारकों नें आम आदिमों की इस दिलेरी को सरकार-प्रायोजित बता दिया और मीडिया/पुस्तके/अखबार रंग दिये। नक्सलियों के मानव अधिकार पर ए.सी कमरों में कॉकटेल पार्टियाँ हुईं तथा लोगों को गुमराह करने का अभियान जारी रहा। इनकी फंतासी का खैर जवाब भी नहीं लेकिन यह देश इन्हे हर बार क्षमा ही करता रहा....आखिर कब तक। दिनकर कहते हैं -

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ।

नक्सलियों को हाथी के दाँत दिखा कर काबू में नहीं किया जा सकता था। आतंकवाद से लडने के लिये शास्त्रार्थ से काम चलेगा भी नहीं वर्ना तो बहुत सी महान समाजसेविका टाईप लेखिकायें/लेखक हैं जो इसके लिये विदेशी पैसे से बडे बडे प्रेस कॉंफ्रेंस करती है, भूख हडताल-वडताल करती/करते और करवाती/करवाते हैं। उनसे मीडिया अपने हर कार्यक्रम में बैठा कर संवाद अदायगी करवाता रहता है। खैर मीडिया के काम में बोलने वाले हम कौन? लोकतंत्र का पाँचवा खंबा है जो कि सबसे अधिक पॉलिश्ड है, यहाँ तक कि उसे भीतर लगी दीमक दिखती नहीं है।

सरकारी तंत्र हाँथ जोडे नक्सलियों के आगे पीछे दशकों से घूमता रहा कि “मान जाओ भईया-दादा” लेकिन हाल वैसा ही जैसे सागर नहीं माना था और राम तीन दिवस तक रास्ता ही माँगते रहे। रास्ता तब बताया गया जब राम नें धनुष को अपने कंधे से उतार कर संधान किया -

तीन दिवस तक पंथ मांगते, रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द, अनुनय के प्यारे-प्यारे ।
उत्तर में जब एक नाद भी, उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की, आग राम के शर से ।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि, करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की, बँधा मूढ़ बन्धन में।

ऑपरेशन ग्रीन हंट का नक्सलवाद समर्थक बुद्धिजीवियों/पत्रकारों/मीडिया कर्मियों और लालबुझक्कडों नें खुल कर विरोध किया, लेकिन देखिये राम नें धनुष में अभी प्रत्यंचा ही तो चढाई है, वार्ता की टेबल माओवादियों ने सजा ली है। वे जानते हैं कि जब लिट्टे नहीं रहा जब तालिबान नप गये तो इनकी भी वो सुबह आ ही जायेगी। वार्ता की पेशकश वस्तुस्थिति में ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता पर मुहर है। नक्सलवाद से निर्णायक मुक्ति का समय आ गया है। वार्ता माओवादियों की शर्तों पर नहीं सरकार की शर्तों पर होनी चाहिये साथ ही नक्सल समर्थी बुद्धिजीवी सारी परिस्थिति पर पानी फेर देंगे इस लिये सीधे माओवादी और सरकार ही सीधे बात करे तब शायद किसी दिशा पर पहुँचा जा सकेगा। यहाँ भी यह सजगता आवश्यक है कि इस सीजफायर की नौटंकी का माओवादी कहीं अपनी ताकत बढानें में इस्तेमाल न करें। दिनकर नें रास्ता बताया है –

सच पूछो , तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की ।
सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है।