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Wednesday, November 06, 2013

बस्तर के मृतक स्मृति स्मारक इतिहास और कला की दुर्लभ युति हैं।


एक मृत्यु गीत (हनाल पाटा) की दार्शनिकता ने मुझे अपनी ओर खींचा। शब्द थे - “अब तुम मर चुके हो; अब हम तुम्हारी सम्पत्ति खुशी खुशी मिल कर खा जायेंगे”“”। इस गीत का मर्म जीवन की निस्सारता की ओर ही इशारा करता है। बस्तर की मान्यताओं में आत्मा का अस्तित्व है और पुनर्जन्म तथा मोक्ष की अवधारणायें भी हैं। इससे अधिक महत्वपूर्ण कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की पहचान को जीवित रखा जाता है, उसकी स्मृतियों को कलात्मकता के साथ सजो कर रखा जाता है। बस्तर में स्मृति स्मारक बनाने की परम्परा है जिसे ध्यान से देखने पर आप मृतक के व्यक्तित्व का अपने मन मे खाका खीच सकते हैं। यह एक व्यक्ति के इतिहास को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की परम्परा है। बस्तर दुनिया के उन गिने चुने क्षेत्रों में से एक है जहाँ महापाषाण सभ्यता के प्राचीनतम अवशेष आज भी सुरक्षित है। महापाषाण सभ्यता की पहचान है कि वहाँ मृतकों को अथवा उनके अवशेषों को पत्थर की बड़ी बड़ी शिलाओं को खड़ा कर के उनके मध्य अकेले अथवा सामूहिक रूप से दफनाया जाता था। महापाषाण शब्द मेगालिथ शब्द का हिन्दी रूपांतर है; यूनानी भाषा में मेगास का अर्थ है ‘विशाल’ और लिथोज का अर्थ है ‘पाषाण’। महापाषाण परम्परा बस्तर में किसी न किसी रूप में वर्तमान में भी सांस ले रही है; अत: इस निष्कर्ष पर पहुँचना गलत नहीं कि मृतक स्मारकों के माध्यम से आदिवासी समाज ने अपने इतिहास को सुरक्षित रखा है। 

बस्तर के मृतक स्तम्भ यहाँ के आम जनमानस की समाधियाँ हैं। कई तरह की समाधियाँ बनाने का चलन महापाषाण सभ्यता के विभिन्न स्थलों में देखा गया है। जिनमें प्रमुख हैं – “कैर्न समाधियाँ” जिसमे पत्थरों को गोल चक्र में बिछा कर इस घेराव के अंदर गड्ढा खोद कर उसमे शव रख मिट्टी से ढक दिया जाता था। तत्पश्चात उपर से पत्थर भर दिये जाते थे। “डोलमेन समाधियाँ” आयताकार मेज आकृति की समाधियाँ होती हैं अर्थात इसमे भूमि शिला खण्ड रख कर उसपर शव तथा अन्य सामग्रियाँ रखते हैं। इसके बाद चारो तरफ सपाट शिलाओं को खडा कर दिया जाता है। इसके पश्चात समाधि को उपर से एकाधिक शिलाओं द्वारा ढक दिया जाता है। “छत्र शिला” अर्थात चार प्रस्तर खण्डों को खड़ा गाड़ कर उसके उपर एक गोलाकार प्रस्तर खण्ड रखा जाता है इससे यह मृतक स्मारक किसी छत्र की तरह दिखाई देता है। “फन शिला” के निर्माण के लिये एक खोदे हुए गड्ढे में शव और अन्य सामग्री रख कर मिट्टी से ढकने के उपरांत उसके उपर गोलाकार पत्थर रख दिया जाता है। यह गोलाकार पत्थर सर्प के फन के समान दिखाई पड़ता है। “गुफा समाधियाँ” वस्तुत: पहाड़ों की चट्टानों को आयताकार अथवा वर्गाकार काट कर निर्मित की जाती हैं। “मेनहीर” प्रकार में मृतक की अंतिम क्रिया के पश्चात उस स्थल पर एक खड़ा पत्थर लगा दिया जाता है। ये पत्थर डेढ मीटर से पाँच मीटर तक लम्बे हो सकते हैं। बस्तर में मेनहीर समाधियाँ प्रमुखता से पायी जाती हैं तथा इसका विस्तार कांकेर से कोण्टा तक सर्वत्र देखा जा सकता है। बस्तर पर उपलब्ध प्राचीनतम संदर्भ ग्रंथ बस्तर भूषण में केदार नाथ ठाकुर ने मेनहीर समाधियों का उल्लेख करते हुए लिखा है – “महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई बुड्ढा मर जाने पर रास्ते के किनारे यादगार के लिये ऊँचा पत्थर गाड़ देते हैं। ये पत्थर तीन हाथ से ले कर पंद्रह पंद्रह हाथ तक के हो सकते हैं। रास्ते चलते लोग इन पत्थरों पर तम्बाकू डालते जाते हैं”। दक्षिण बस्तर में मृतक समाधियों के प्रकारों की विविधता दृष्टिगोचर होती है तथा कैर्न समाधियाँ और डोलमेन समाधियाँ भी अच्छी मात्रा में देखी जा सकती हैं। आमतौर पर ये समाधियाँ लम्बी लम्बी कतारों में पहाडी ढलानो पर, खेतों से अलग, सड़क के किनारे, घाटी में, तालाब के किनारे, गाँव की सीमा के पास और कभी कभी गाँव के भीतर भी स्थित होती हैं। दंतेवाड़ा-बीजापुर क्षेत्रों के माडिया मृतक स्तम्भों को मुख्य मार्गों के किनारे लगाते हैं। दण्डामि माडिया, अबूझ माडिया, दोरला और मुरिया जनजातियाँ अभी भी अपनी मृतक स्मारक निर्माण संस्कृति को बचाये हुए हैं।

मेनहीर प्रकार के मृतक स्तम्भ चूंकि सर्वाधिक मात्रा में बस्तर संभाग में पाये जाते हैं हमें इसके प्राप्त प्रकारों पर भी विवेचना करनी आवश्यक है। मुख्य प्रकारों में उरूसकल, बीत और खम्ब चलन में हैं। “उरुसकल” का गोण्डी में संधिविच्छेद कर अर्थ तलाशने की कोशिश की जाये तो उरूस अथवा उरसाना को दफनाना का पर्याय कहा जाता है जबकि कल का अर्थ है पत्थर; उरूसकल के स्थान पर कोटोकल शब्द भी चलन में मिलता है। उरूसकल आमतौर पर सीधा गाडा जाने वाला पत्थर होता है। मेनहीर लगाने की प्रक्रिया को कल उरसाना या पत्थर गाडना भी कहते हैं। उरूसकल प्रकार के मेनहीरों में समय के साथ प्रस्तर खण्डों के स्थान पर लकड़ी के नक्काशीदार खम्बे प्रयोग में आने लगे थे। “बीत” प्रकार के मेनहीर वस्तुत: छोटे छोटे पत्थरों का वर्गाकार ढेर होते हैं। “खम्ब” प्रकार के मेनहीर, लकडी के खम्बे (कभी कभी पत्थर के भी) होते हैं जिनके शीर्ष पर चिड़िया, जानवर या आदमी की आकृति उकेरी जाती है। मृतक स्मृति स्मारकों में आज अनेक प्रकार के बदलाव देखे जा रहे हैं तथा पत्थरों के स्थान पर सीमेंट, टाईल्स, संगमरमर आदि का भी प्रयोग होने लगा है किंतु परम्परागतता इन स्मारकों अथवा मठों का वास्तविक परिचय स्वत: ही करवा देती है; उदाहरण के लिये यदि सीमेंट के स्मृति स्तम्भ पर किसी तरह का कपड़ा लपेटा गया है तो उसे गायता (ग्राम प्रधान) के स्मारक के रूप में पहचाना जा सकता है। 

आमतौर पर स्त्री और पुरुषों के मृतक स्मृति स्तम्भ अलग अलग लगाये जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि किसी व्यक्ति की संदेहास्पद मृत्यु होती है तो उसका स्मारक अन्य उपस्थित मृतक स्तम्भों से दूर खडा किया जाता है। पत्थर गाडने की प्रक्रिया में मुख्य व सीधे खडे किये जाने वाले पत्थर नीचे एक छोटा और चपटा पत्थर जिसे दो अन्य पत्थरों से सहारा दिया गया होता है अवश्य लगाया जाता है। इन तीन पत्थरों को ‘हनाल गरया’ अर्थात आत्मा का सिंहासन कहते हैं। चूकि अब मृतक स्मृति स्तंभ लगाने की परम्परा टूटने और अपने स्वरूप में बदलने लगी है अत: वंश और गोत्र के हिसाब से पत्थरों को लाने के स्थान जैसी बाध्यतायें समाप्त होने लगी हैं। सामान्य तौर पर आदिवासी समाज अपने मृतक स्मारकों में प्रयोग करने के लिये पत्थर अथवा अपने देवताओं के लिये लकड़ी विशेष जंगलों और चिन्हित पहाड़ों से ही लाना पसंद करते हैं। वेरियर एल्विन से प्राप्त संदर्भ के अनुसार कोकोरी में नैतामी वंश के लोग चापा डोंगरी से और मरावी वंश के लोग महादेवडोंगरी से मृतक स्तम्भों के निर्माण के लिये पत्थर लाते थे। इसी तरह स्मृति स्तम्भों के आकार प्रकार को ले कर भी अलग अलग स्थानों में विविधतायें पायी गयी हैं। अंतागढ के पास अवस्थित मृतक स्मृति स्तम्भों के आकार आठ फीट तक उँचे हैं और चार फीट तक चौडे भी पाये गये हैं जबकि कोण्डागाँव के आसपास एक फुट से उँचे मेनहीर बमुशिक ही दिखाई पड़ते हैं। एक समय था जब सबसे विशालकाय स्मारक जिनमे बडे बडे पत्थर प्रयोग किये जाते थे, यह परम्परा झोरिया आदिवासियों में देखी जाती थी किंतु अब यह विलुप्त प्रथा है। जिस तेजी से आदिवासी समाज बदल रहा है तथा वंश विखर रहे हैं वे चिन्हित इलाको के देवताओं और जनजातियों की दावेदारी को भी मिटाते जा रहे हैं। 

यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि प्रचलित मान्यता कहती है अगर आत्मा अपने लिये की गयी व्यवस्था से प्रसन्न होती है तो मेनहीर (स्मृति पाषाण) का आकार बढ जायेगा। एक बच्चे के स्मारक में छोटा पत्थर लगाया जाता है; यह विश्वास किया जाता है कि अगले बीस वर्षों में यह पत्थर उतना ही बडा हो जायेगा जितना कि मृत शिशु युवा हो कर आकार लेता। इन मृतक स्मृति स्तम्भों से जोड कर व्यक्तियों, उनके वंश, गाँव और समाज के शगुन-अपशगुन भी देखे जाते हैं। किसी मृतक स्मारक की शिला का बढना एक शुभ शगुन माना जाता है। यदि स्मारक शिला गिर पड़े या टेढी हो जाये तो तुरंत ही मृतक के रिश्तेदार किसी गुनिया या सिरहा की सलाह लेते हैं और शांति के उपाय करते हैं चूंकि यह मान्यता है कि पत्थर तभी गिरता है जब मृतक की आत्मा क्रोधित या उपेक्षित महसूस कर रही हो। कई बार मृतक स्तम्भ के गिरने को गाँव में होने वाले अनिष्ट से भी जोड कर देखा जाता है। अगर सफेद चींटियाँ किसी स्मृति शिला के उपर बाबी बना लें तो यह अशुभ लक्षण है। एसा भी नहीं कि इन स्तभों पर सर्वदा निगाह रखी जाती है कहते हैं बीस वर्षों में मृतक या हनाल अपने पूर्वज में विलीन हो जाता है और उसका आत्मा के रूप में जीवन समाप्त हो जाता है; इसीलिये जब कोई पुराना पत्थर गिरता है तो उसपर ध्यान नहीं दिया जाता। 

बस्तर के मृतक स्मृति स्तंभ अपनी पुरातनता के लिये ही नहीं अपितु अंतर्निहित कलापक्ष के कारण भी विश्वप्रसिद्ध हैं। वर्तमान में मृतक स्मृति शिलाओं पर भित्तिचित्र उकेरने की परम्परा देखी गयी है जबकि लकडी के स्मृति स्तम्भों में नक्काशी कर उसे लगाने के अनेक प्राचीनतम अवशेष दक्षिण बस्तर में विभिन्न स्थानो पर देखे जा सकते हैं। कला अनायास ही पत्थरों-लकडी के स्मारकों के साथ समाहित नहीं हुई होगी अपितु गुफाओं में लिखने वाला मानव निश्चित ही पूर्वजों के स्मृति स्तम्भों पर आकृतियाँ अंकित करता रहा होगा। धूप और बारिश का आघात सहने वाले और निरंतर क्षरित होते रहने वाले खुले में खडे पत्थर गुफाचित्रों की भांति प्राकृतिक रंगो से बने चित्रों को सहेज नहीं सके। आज यही परम्परा इन पत्थरों में पेंटिंग कर के निभाई जा रही है। इन स्तम्भों में मृतक के प्रिय अस्त्र शस्त्र, हल-बैल, पशु-पक्षी, कीट पतंगों को उकेरा जाता है। उस व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष उसकी स्मृति मे खडे किये जाने वाले पत्थर पर चित्रित कर दिया जाता है। वह कैसे रहता था, उसके क्या महत्वपूर्ण शिकार किये, गाँव में वह कितने महत्व का व्यक्ति था आदि इन चित्रों में उकेर दिये जाते हैं। स्मृति स्तम्भ बनाने वाले कलाकार लोक जीवन में शामिल चिन्हों और प्रतीकों को अपने चित्रों में शामिल करते हैं। यह सही है कि कंकरीट के स्मृति स्तम्भ अब बहुत बडी संख्या में लगाये जा रहे हैं जिन्हें रंगा जाता है, चित्रित किया जाता है एवं उनके शीर्ष पर काष्ठ से पशु अथवा पक्षियों की आकृति लगा दी जाती है। यदि इन स्मृति शिलाओं मे उकेरे गये परम्परागत चित्रों के देखा जाये तो एक शिला में कई भागों में चित्र उकेरे जाते हैं और हर हिस्सा अलग अलग अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। अनेको बार चित्र उसके समय का प्रतिनिधित्व नहीं करते जैसे कि हाथी और घोडे आज का बस्तर नहीं हैं फिर भी व्यक्ति की प्रधानता अथवा महत्ता दर्शाने के लिये चित्रित किये जा रहे हैं। अन्य पशुपक्षियों में शेर, हिरण बतख, केकडे, सांप, उल्लू आदि प्रमुखता से मृतक स्मृति स्तंभों पर अंकित किये जा रहे हैं। अनेक बार उकेरे गये समानुवर्ती अथवा भांति भांति के ज्यामितिक आकार ध्यान खींचते हैं। सल्फी के पेड का यदा कदा चित्रण तो मिलता है किंतु पेड पौधों का बहुत अधिक चित्रण इन स्मृति शिलाओं में नहीं पाया जाता, इसके कारणों की विवेचना होनी चाहिये। यदि मृतक स्तम्भ काष्ठ निर्मित है तो उसकी भव्यता अतुलनीय होती है। प्राय: काष्ठ स्तंभ चौडाई में चौकोर आकृति के होते हैं जबकि लम्बाई दो से पाँच फुट तक होती है। कुछ पुराने काष्ठ स्तभ विशालकाय भी पाये गये हैं। इन काष्ठ स्तंभों के शीर्ष को आमतौर पर गोल आकृति में बनाया जाता है जिसके उपर यदा-कदा कोई मानव आकृति अथवा चारो दिशाओं में कोई पशु अथवा पक्षी आकृति अलग से लगा दी जाती है। काष्ठ स्तंभ में नीचे से उपर तक विभिन्न स्तरों और अनेक भांति की आकृतियाँ उकेर दी जाती हैं। मानव आकृतियों में गौर सींग लगाये हुए दण्डामि माडिया नर मुख्य रूप से बनाये जाते हैं। आदिवासी नृत्य भी उकेरे जाने वाली रचनाओं में प्रमुख हैं। काष्ठ निर्मित मृतक स्तंभों में पाषाण स्मारकों की तरह रंग नहीं भरे जाते किंतु उनकी कलात्मकता और भव्यता हर किसी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित करती ही है। आज काष्ठ स्मृति स्तंभों का चलन न के बराबर हो गया है अत: जो भी शेष हैं उन्हें धरोहर की तरह संरक्षित किया जाना चाहिये।    
 
 बस्तर के आदिवासी जन्म से ले कर मृत्यु तक कलाधर्मी हैं; वे धर्मभीरू भी हैं और दार्शनिक भी। इन मृतक स्मारकों को लगाने के दौरान गाये जाने वाले मृत्यु गीत अर्थात हनाल पाटा वस्तुत: आदिवासी धर्म, उनके मृत्यु और आत्मा विषयक दर्शन की प्रस्तुति है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बस्तर के आदिवासी समाज से यह विरासत लुप्त होती जा रही है। अब न केवल शिला और काष्ठ के स्थान पर सीमेंट और ईंटों के स्मारक बनाये जाने लगे हैं अपितु संगमरमर तथा टाल्स का भी प्रयोग किया जाने लगा है। वंश के मृतक स्मारकों को एक स्थान पर लगाये जाने वाली परम्परा में भी बदलाव देखे जा रहे हैं एवं अब इसकी अनिवार्यता न होने की बात मुझे कई स्थानों पर आदिवासी प्रतिनिधियों ने बताई। यद्यपि आदिवासी समाज के प्रतिष्टित व्यक्तियों के मृतक स्मारक आपको अब भी परम्परागत एवं निर्दिष्ट स्थानों पर मिलेगें उदाहरण के लिये फरसपाल में आदिवासी नेता महेन्द्र कर्मा और उनके परिवार के सामूहिक मठ (स्मारक) देखे जा सकते हैं। 
इसी तरह स्मारकों में अंकित किये जाने वाले चित्रों में भी बदलाव हुए हैं; अब इनमे ट्रक, जीप, मोटरसाईकिल आदि देखने को मिल रही हैं। उत्तर बस्तर में मृतक स्मारकों के स्वरूप भी बदल रहे हैं और भिन्न भिन्न आकृतियाँ बनाई जा रही है जैसे मकान, जीप, मोटरसाईकल में सवार युवक आदि। दक्षिण बस्तर में भी मैने एक स्मारक एसा देखा जिसमे व्यक्ति का चेहरा ही मठ के रूप में बनवा कर स्थापित करवा दिया गया है। माओवादी हिंसा से जूझते इस अंचल में संघर्ष के प्रतीक भी स्मारक चित्रों में देखे जा रहे हैं उदाहरण के लिये मैने बंदूखें भी चित्रित देखीं और हेलीकॉप्टर भी। 
माओवाद ने भी बस्तर की इस संरक्षित की जाने वाली परम्परा को गहरा धक्का पहुँचाया है। यह ध्यान देने योग्य सत्य है कि माओवाद के नाम पर माड क्षेत्र में जारी युद्ध में मारे जाने वाले अधिकतम लोग माडिया ही हैं क्योंकि उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में खडा किया गया है। मारे जाने के बाद उनके अंतिम कर्म तो परम्परागत हों भले ही बंदूख वालों को ईश्वर पर आस्था नहीं तथापि इतिहास पर तो होनी चाहिये? लाल रंग के जिन स्तूपों का निर्माण मृतकों की स्मृतियों को जिन्दा रखने के बहाने इन दिनों देखने में आ रहा है वे प्राचीन काल में बनाये जाने वाले युद्ध स्तंभों जैसे हैं इनका आदिम परम्पराओं से कोई लेना देना नहीं है।

- राजीव रंजन प्रसाद
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Sunday, July 22, 2012

बस्तर मे जीवित पुरापाषाणकाल और कातिल विचारधारायें।


बस्तर क्षेत्र के इतिहास की विवेचना हम बस्तर क्षेत्र के इतिहास की विवेचना हम अत्यधिक सतही प्रमाणों के आधार पर कर पाते हैं। संभवत: हमारे युग को ज्ञान की लालसा ही नहीं रही और हमारी पीढी केवल उन विषयों के अध्ययन तक सिकुडती जा रही हैं जिसके केन्द्र में पैसा बैठा हुआ है। मगध क्षेत्र के बस्तर से अंतर्सम्बन्धों पर काम करते हुए भी यही दु:खद आश्चर्य मेरे सम्मुख था कि अंग्रेजों नें नालंदा के पुरावशेषों को बाहर लाने का जितना काम कर दिया वहीं आज भी हम ठहरे हुए हैं। न तो अब तक नालंदा विश्वविद्यालय का मुख्यद्वार प्राप्त हुआ है न ही उन पुरा-पुस्तकालयों का स्थल जिन्हें खिलजी नें आग लगा कर मिटाने का यत्न किया था। यही हाल वैशाली की उस पुरा-संसद का है जहाँ राजा ‘विशालगढ का किला’ नाम से खुदाई हो रही है। वैशाली में इस स्थल पर विश्व की सबसे प्राचीन संसद विद्यमान है जब इतने सालों में हमारे इतिहासकारों नें उसके अवशेष ही बाहर लाने में कोई रुचि नहीं दिखाई तो बस्तर के अतीत पर प्रामाणिकता से कितनी बात हो सकती है कहना कठिन है। कलिंग, आन्ध्र, कोशल, विदर्भ से घिरा बस्तर (दण्डकारण्य़) का क्षेत्र अपने अतीत को जानते के लिये इन्हीं क्षेत्रों की ओर लोलुप निगाहों से देखता है क्योंकि यहाँ बडी शासन-प्रणालियों की सत्ताएं रही हैं। इसके साथ ही आपको आदिम जीवन शैली को बहुत बारीकी से परखना होगा तो भी अतीत की रेखायें विद्यमान नज़र आयेंगी।  


माडिया जीवन शैली नें पाषाण युगीन अवस्था को अब भी बचा कर रखा है। मृतक स्मृति चिन्ह आज भी एक जीवित परम्परा है। इतना ही नहीं अबूझमाड़िया मुख्यत: स्थानांतरिक खेती करते हैं तथा इनकी कृषि परम्परा को दाही कहा जाता है; यह भी एक पुरा-परम्परा है जिसका सम्बन्ध पाषाण काल से ही है। माडिया जनजाति का बस्तर क्षेत्र में बाहुल्य है तथा इस क्षेत्र में उन्हें खदेडे जाने तथा दुर्गम क्षेत्रों में समेटे जाने जैसे कथनों को अवधारणा ही कहा जायेगा क्योंकि आर्यों के आगमन से बहुत पहले से यह अबूझमाड़ माड़ियाओं की ही भूमि बनी रही है। बिना किसी विवेचना किये एक नव-पुरापाषाण कालीन दृष्य की परिकल्पना कीजिये जब कबीलों के आक्रमण तथा हिंसक पशुओं से सुरक्षा पाने के लिये आदिम समाज नें अपने आवास के इर्फगिर्द पत्थरों की बाड बना कर उसे सुरक्षित करना आरंभ किया होगा। उसने नुकीली लकडी से मिट्टी खोद कर बीज बोना और पत्थर के हँसिये से फसल काटना आरंभ किया होगा। इस दृश्य को साकार आज भी अबूझमाडिया करते हैं। वही जंगल जला कर खेती और आखेट। यह प्रकृया इतनी सहज उनके जीवन में रच बस गयी है कि इन्हें आज के विचारक समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद जैसी घुट्टी जबरन पिलाने को आतुर हैं अपितु इनसे ही बहुत कुछ सीखे जाने की आवश्यकता है। माड़िया समाज में खेती पर पूरे गाँव का अधिकार होता है यही कारण है कि जमीन सम्बन्धी विवाद उनके बीच नहीं देखे जाते। मूल आवश्यकता संरक्षण की है किंतु जनजातियों को उपेक्षित रख कर अथवा किसी विचारधारा प्रधान युद्ध में झोंक कर नहीं। आवश्यकता अनावश्यक परम्पराओं को तोडने के लिये उनको किसी बौद्धिक हथियार से कुचलने की भी नहीं है।    


इसकाल से एक अन्य अंतर्सम्बन्ध है अमूझमाड का विवस्त्र जीवन; अपितु महिलाओं का वक्षस्थलों को न ढक कर स्वाभाविक रहना भी अतीत से वर्तमान तक जुडी हुई कड़ी ही है। आश्चर्य है कि अरुन्धति राय का आलेख “वाकिंग विद द कामरेड्स” आदिवासी परम्पराओं की झूठी दास्तान प्रस्तुत करता है जिसे शहरी जिन्दाबाद-मुर्दाबाद वादी वर्ग नें बिना तर्क के हजम भी किया और आउटलुक जैसी पत्रिका नें बिना जाँच के छापा भी। अरुन्धति लिखती हैं (पृष्ठ – 75) कि “एक शाम अलाव के पास बैठी एक बूढी औरत उठी और उसने दादा लोगों के लिये एक गीत गाया। वह माड़िया आदिवासी थी जिनके बीच रिवाज था कि औरतें शादी के बाद चोलियाँ उतार दें और छातियाँ खुली रखें।....। औरतों के खिलाफ यह पहला मामला था जिसके खिलाफ पार्टी नें अभियान चलाने का फैसला किया”। यह वाक्यांश असत्य है। पहली और महत्वपूर्ण बात कि माडिया स्त्रियों में शादी के पहले हो या शादी के बाद; चोली (ब्ळाउज शब्द का प्रयोग अरुन्धति नें किया है) पहनने का चलन पुरा-काल से ही नहीं रहा है और इस रहन में उनकी स्वाभाविकता के पीछे हजारों साल का जैसे थे वाली जीवन शैली ही है। हमने समय के साथ पहला बदलाव देखा कि महिलाओं नें कमर पर पहने जाने वाले कपड़े के साथ खोंस कर लुंगी बाँध कर उससे वक्षस्थलों को ढकना आरंभ कर दिया था। अपनी बात सिद्ध करने के लिये मैं कुछ विद्वानों के उद्धरण लेना चाहूंगा। पं. केदारनाथ ठाकुर की 1908 में प्रकाशित पुस्तक इस सम्बन्ध में सबसे प्राचीन मानी जाती है उनकी नवकार प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक “बस्तर भूषण” के पृष्ठ 48 से माडिया स्त्री जीवन का उल्लेख लीजिये वे लिखते हैं “साधारण लोग रस्सी से गुहाद्वार और उपस्थ के सामने पत्ते बाँध लेते हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी बाकी सब शरीर खोले रहती हैं....चाहे राजा महाराजा आवैं इनका मामूली यही ठाठ है”। चोली इसके बाद भी जीवन शैली में उपस्थित नहीं दिखती अपितु डॉ. नारायण चौरे नारायणपुर और निकटवर्ती क्षेत्रों का अध्ययन कर अपनी किताब आदिवासियों के घोटुल (पृष्ठ -18) में लिखते हैं कि “गले में रंग बिरंगी लाल-सफेद घुंघचियों की माला, मोतियों की, काँच की, रंगीन गुरियों की, लाख या कौड़ी की, घास की बीजों की मालायें पहनती हैं। इनके स्तन खुले रहते है। इसका कारण वे अपने ही प्रेमी को अपना बना लेना चाहती हैं। घोटुल की मोटियारी के मतानुसार स्तन को वे लड़कियाँ ढकती हैं जिन्हें प्रेम करना नहीं आता, जो प्रेम को पाप समझे, प्रेम एसों के लिये गिरगिट की तरह होता है, जो उससे भूत की तरह भागे या भय खाए”। उपरोक्त उदाहरणों को यहाँ प्रस्तुत करने का मायना है कि समय के साथ साथ अब जा कर चोलियाँ माडिया स्त्री जीवन में स्वयं उपस्थित हुई और हो भी जायेंगी किंतु इस प्रक्रिया को किसी भ्रामक तर्क के आईने में देखना उचित नहीं। मेरा मानना है कि स्वत: होने वाले परिवर्तन, परम्पराओं में भी अपनी पुरातनता की खुशबू सहेज लेते हैं किंतु इस स्वाभाविकता का ‘लाल सलाम’ जबरन है और अनुचित है।


इसी आलोक में कुछ बातें बस्तर के बहुत पुराने अतीत की। प्रागैतिहासिक काल से ही यहाँ मानव रहा है। इन्द्रावती, नारंगी और कांगेर नदियों के किनारों से पुरा-पाषाण काल के मूठदार छुरे मिले हैं। उस समय का आदमी जिन उपकरणों से पशुओं की खाल या पेड़ों की छाल उतारता था, हड्डी तोड़ने, मांस काटने या चमडे में छेद करने में काम आने वाले उसके जो औजार थे, वे यहाँ मिले हैं। इसके बाद का समय यानी कि मध्य-पाषाणकाल; इन्द्रावती नदी तो खोज करने वालों के लिये खजाना हो सकती है। फ्लिट, चार्ट, जैस्पर, अगेट जैसे पत्थरों से बनाये गये तेज धार वाले हथियार इन्द्रावती नदी के किनारों पर खास कर खड़क घाट, कालीपुर, भाटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चंदेला, घाटलोहंगा के पास मिले हैं। नारंगी नदी के किनारे भी गढ़बोदरा और राजपुर के आसपास ऐसे औजार और हथियार देखे जा सकते हैं। खोजने वालों को इन जगहों से कई तरह के खुरचन के यंत्र, अंडाकार मूठ वाला छुरा और छेद करने वाले औजार मिल रहे हैं। ये तो स्वाभाविक है क्योंकि उन दिनों आदमी की निर्भरता या तो शिकार पर रही होगी या कंदमूल पर। 


बस्तर और इसके आसपास के उत्तर-पाषाण युग का आदमी अच्छे किस्म के पत्थरों से कई कामों को एक साथ करने वाले उपकरण और औजार बनाने लगा। इस समय दांत वाले हड्डियों से बने हंसिये का उपयोग फसल काटने के लिये किया जाता था। विकास लगातार चलने वाली प्रक्रिया है इसीलिये इतिहास का हर अगला काल बेहतर औजारों के किये जाना गया। यानी कि उत्तर-पाषाणकाल का आदमी छोटे और प्रयोग करने में आसान हथियार बनाने लगा था; इनको लकड़ी, हड्डी या मिट्टी की मूठों में फँसा कर बाँधा जाता था। हथियार तो चर्ट, जैस्पर या क्वार्ट्ज जैसे मजबूत पत्थरों से ही बनाए जाते थे। इस समय के अवशेष इन्द्रावती नदी के किनारों पर मिलेंगे खास तौर पर चित्रकोट, गढ़चंदेला तथा लोहांगा के आसपास...। नव पाषाणकाल तक आते आते यहाँ के आदमी चित्रकार हो गये थे। कई गुफायें उपलब्ध हैं जिनकी छतों पर शिकार करने, शहद इकट्ठे करने, नाचने-गाने, जानवरों की लड़ाईयाँ, आग की पूजा, पेड़-पौधों से संबंधित बहुत से चित्र बने मिलेंगे। जैसा जीवन वे जी रहे थे उसे चित्र बना कर हमारे लिये इतिहास छोड़ गये। नड़पल्ली पहाड़ी दक्षिण बस्तर में है जहाँ लगभग चार हजार फुट की उँचाई पर एक नव-पाषाण काल की गुफा है जिसमें हिरणों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। इन्द्रावती नदी के किनारे, मटनार गाँव के पास भी इस समय के बने गुफा-चित्र मिलते हैं जिसमें जानवरों की आकृतियाँ बनायी गयी हैं। मटनार में एक चित्र ने मेरा ध्यान खींचा था जिसमें आदमी की हथेलियों से किसी अलौकिक शक्ति की पूजा का संकेत मालूम पड़ता है। फरसगाँव के पास आलोर गाँव में भी चिड़िया के चित्र बने हुए हैं। ये गुफा चित्र ही बताते हैं कि तब इन्द्रावती नदी में नाव चलायी जाने लगी होगी इतनी ही नहीं  मछली का शिकार करने के प्रमाण भी मिलते हैं।  


बस्तर और इसके आसपास नव पाषाणकाल में मानव सभ्यता का ठीक-ठाक विकास हो गया था। उस समय का आदमी खेती करने लगा था; जानवर पालना जान गया था; घर बना कर रहने लगा था; बर्तन बनाना जान गया था....।  इसी समय से आदमी जंगल जला कर, खाली हुई जमीन को नुकीली लकड़ी से खोद कर खेती करने लगा था। वह अपनी फसल बचाने के लिये झोपड़ी बना कर रहने लगा होगा। अनाज और पानी जमा करने के लिये बनाये गये मिट्टी के बर्तन के अवशेष कई जगहों पर मिले हैं। नव-पाषाण काल के पेड़ काटने के लिये बनाये गये पत्थर के औजार तो देखने लायक हैं। समय के साथ अनाज, जानवरों और औजारों के लिये कबीलों में आपसी झगड़े भी हुए। घरों और पालतू जानवरों को हिंसक जानवरों से बचाने के लिये पत्थर की बाड़ लगायी जाने लगी। उसूर, छोटे ड़ोंगर, गढ़चंदेला और गढ़धनोरा में नवपाषाणकाल के अवशेष और उपकरण देखे जा सकते हैं। गढ़चंदेला, गढ़धनोरा और वोदरा में तो उँची पहाड़ी पर नवपाषाण काल के बने आवास स्थल भी देखने को मिल जायेंगे। पाषाणयुग के बाद ताम्र और लौह युग आये। सभ्यता के इन युगों की बहुत सीमित जानकारी ही मिल पायी है। इन युगों के कुछ उपकरण दक्षिण बस्तर में मिले हैं इनमे बहुत खास है नुकीले बेल्ट वाली एक कुल्हाड़ी।


बी. डी. कृष्णास्वामि अपनी कृति “प्री हिस्टोरिक बस्तर” में उल्लेख करते हैं कि ईसा से लगभग एक सहस्त्राब्दि पूर्व महापाषाणीय शवागारों का प्रचनल था। शवों को गाड़ने के लिये बड़े शिलाखंडों का प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार के शवगारों के उस समय के अवशेष करकेली, सकनपल्ली, हांदागुडा, गोंगपाल, नेला-कांकेर तथा राये में मिल जायेंगे। उन दिनों भी शव के साथ कब्र में अन्न, जल, अस्त्र-शस्त्र और मिट्टी के बर्तन जैसी चीजें रखी जाती थी। आज भी बस्तर के माड़िया ठीक यही करते हैं; इसी तरह शवागारों के उपर स्तंभों को गाडते हैं। यह परम्परा बहुत खूबसूरती से हजारों हजार साल का सफर तय करती हुई आज तक आ पहुँची है। जैसा कि मैंने आरंभ में कहा था समय स्वयं परम्पराओं को खूबसूरत स्वरूप दे देता है तथा उनमें आधुनिकता का स्त: समावेश होने लगता है, इन्हें खण्डित करने की आवश्यकता नहीं। मृतक स्तम्भ समय के साथ नक्काशीदार खम्बों में भी परिवर्तित हुए। अस्त्र-शस्त्र, चिडिया, जानवर या आदमी की आकृतियों नें इन मृतक स्तम्भों में जगह बनाना आरंभ किया। गायता के स्मृति स्तंभ कर कपडा लपेटने की प्रथा भी प्राचीन स्वरूप में नये बदलाव का संकेत देती है। अबूझमाड एक जीवित संग्रहालय है जहाँ अब सोच की खुली ऑक्सीजन कम हो गयी है। जंगल के भीतर आन्ध्र और निकटवर्ती राज्यों से घुस आये तथाकथित क्रांतिकारियों नें बिना विचार किये जीवन शैली तहा परम्पराओं में जो बदलाव जाने की कोशिश आरंभ की है वह संवेदनहीनता है। माओवाद के नाम पर माड क्षेत्र में जारी युद्ध में मारे जाने वाले अधिकतम लोग माडिया ही हैं क्योंकि उन्हें ही अग्रिम पंक्ति में खडा किया गया है। मारे जाने के बाद उनके अंतिम कर्म तो परम्परागत हों भले ही बंदूख वालों को ईश्वर पर आस्था नहीं तथापि इतिहास पर तो होनी चाहिये? लाल रंग के जिन स्तूपों जिनका निर्माण मृतकों की स्मृतियों को जिन्दा रखने के बहाने इन दिनों देखने में आ रहा है वे प्राचीन काल में बनाये जाने वाले युद्ध स्तंभों जैसे हैं इनका आदिम परम्पराओं से कोई लेना देना नहीं है। विचारधारा अपनी जगह है, युद्ध और उसकी सच्चाईयाँ अपनी जगह है किंतु माड क्षेत्र की जीवित परम्परा को इस तरह मरते देख कर असंतोष होता है कि वह माडिया जो अपने पहचान के संकट से कभी नहीं गुजरा उसे पहचानना कठिन हो जायेगा। क्रांति माडिया स्त्रियों को हरी बुश्शर्ट पहना कर, बंदूख थमा देने से आनी होती तो कब का आ जाती। माडिया बच्चे हरे भरे जंगल के बीच गुजरी सडक से हो कर स्कूल जायें लेकिन मांदर की थाप पर उनके कदम थिरकना न भूलें तो क्रांति आयेगी। माडिया दफ्तरों तक पहुँचें, खेती के तरीकों में आधुनिकता लायें, अस्पतालों और बिलजी जैसी मूलभूत आवश्यकतायें उनके घर तक आ पहुँचे किंतु जब उसका देहावसान हो तो परिजन परम्परा के पुरातनता की खुशबू बनाये रखें और स्मृति स्तंभ उसकी यादों को चिरजीवी रखें तब आयेगी माडिया क्षेत्रों में क्रांति साथ ही वे जीवित रख पायेंगे विश्व की सबसे प्राचीनतम और सुन्दरतम परम्परायें। मुझे लगने लगा है कि इस जीवित पुरापाषाणकाल को कातिल विचारधाराओं से बचाना आवश्यक है।      

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