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Monday, November 25, 2013

‘समाजशास्त्र के संदर्भ हैं बस्तर के आदिवासी घर’


किसी समाज में कलाप्रियता और जीवंतता का प्राथमिक साक्ष्य उनके मकान हैं, उनके ग्राम हैं तथा जीवन शैली है। बस्तर संभाग में समग्रता से यदि मकानों की अवस्थिति को देखा जाये तो दो मुख्य विभेद सामने आते हैं। वे आदिवासी समूह जो पर्वत श्रंखलाओं और उनके शिखरों को अपना आवास चुनते हैं और दूसरे वे जो मैदानी इलाकों का चयन करते हैं। केवल माडिया जनजाति के ही दो मुख्य प्रकार देखें तो उपरोक्त आधार पर अबूझमाडिय़ा पर्वतों पर बसाहट वाली जनजातियों को कहा गया जबकि दण्डामि माडिया मैदानी आदिवासी मैदानी क्षेत्रों में बसे। यह स्पष्ट कर दूं कि परिचयात्मक विभेद किताबी हैं और केवल वस्तुस्थिति को समझाने के लिये है; वे आदिवासी स्वयं को कोयतूर या कोया कहना पसंद करते हैं जिन्हें मानव विज्ञान की पुस्तकें माड़िया निरूपित करती हैं। बस्तर में जनजातिगत विविधता चाहे जितनी हो किंतु बहुत हद तक रहन-सहन तथा मकान निर्माण की शैली में साम्यता दृष्टिगोचर होगी है। संभव है कि दक्षिण बस्तर में जिस मकान की छत पर ताड के पत्ते और पुआल थे वही मध्य और उत्तर बस्तर तक आते आते खपरैल और चूना पत्थर की फर्सियों से ढके नजर आयें किंतु मकान के आकार प्रकार, उनकी साज सज्जा, अहाते और पशु-पक्षियों के लिये नियत स्थानों आदि में सर्वत्र साम्यता ही प्राप्त होगी। अधिकतम गाँव पेडों के कुंज अथवा झुरमुटों के बीच बसे होते हैं जो आदिवासी जीवन की प्रकृतिप्रियता और शांतिप्रियता का परिचायक है। मुरिया आदिवासी सामान्य तौर पर अपनी बसाहट के लिये पहाडियों की चोटियों का चयन नहीं करते जबकि पर्वतीय-माडिया की स्वाभाविक पसंद होते हैं ये स्थल। मै यह मानता हूँ कि एसी अनेकता बस्तर में केवल सैद्धांतिक रूप से विद्यमान है जबकि एकरूपिता कांकेर से कोण्टा तक सर्वत्र देखी जा सकती है केवल दृष्टि को सही कोण चाहिये।   

बस्तर के पर्वतीय स्थानों पर निवास करने वाले आदिवासी सघन बसाहटों मे रहते नहीं पाये जाते। इसका कारण इतिहास से जुडा भी हो सकता है जो यह बताता है कि राजा भैरमदेव (1853-1891) के समय तक बस्तर रियासत में स्थाई गाँवों की संख्या बहुत कम थी। तत्कालीन दीवान दलगंजन सिंह ने कुछ प्रथाओं का सख्ती से अंत कराया जिनमे से एक थी कि यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो ग्रामीण अपनी बस्ती को उजाड कर नये सिरे से नये स्थान पर बस जाते थे। आज भी बडी बडी बसाहटों को देखना मुमकिन नहीं। पर्वतीय क्षेत्रों में आदिवासी पंद्रह-बीस मकानों के झुंड में बसे दिखाई पडते हैं। कई नितांत अकेली झोपडियाँ घाटी की ओर अथवा तलहटी में दिखाई पड सकती हैं, जो उसमे निवास कर रहे आदिवासी बंधु के निर्भय स्वभाव का परिचायक है। पर्वतीय स्थानों के मकान किसी टीले को चुन कर उनपर निर्मित किये जाते हैं। मकान क्रमिकता में पाये जाते हैं अर्थात लम्बाई में क्रमश: दो से तीन मकान एक साथ। मकान की निर्मिति में और रहन सहन में स्थानीय मान्यताओं की क्षेत्रवार झलख देखने को मिलती है; उदाहरण के लिये अबूझमाड़िया अपने मकान को लीपते नहीं हैं। ये लोग आज भी एक स्थान पर दो या तीन वर्ष की अवधि से अधिक नहीं टिकते। घर के भीतर की व्यवस्था में भी देवी देवताओं की रोकटोक है तथा स्त्री-पुरुष घर में एक स्थान पर नहीं सोते; इनका विश्वास है कि एसा करने पर देवता घर से बाहर चले जायेंगे। अबूझमाड के भीतर आज परम्पराओं और मान्यताओं की क्या स्थिति है व जीवन शैली में कैसे परिवर्तन आये हैं यह अलग अध्ययन का विषय है। माओवादियों ने सामाजिक अवस्थाओं को कितनी गहरी चोट पहुँचाई है इसकी विवेचना तो अब आने वाले समय के हाथ में ही है।  

आदिवासी घर आमतौर पर बांस की लकडी से निर्मित और बांस की छत वाले होते हैं। बांसों और लकड़ियों को आपस में मिट्टी से जोडा जाता है। आवश्यकतानुसार कमरों की संख्या निर्धारित की जाती है साथ ही बरामदा निवास की आवश्यक शर्त होता है। आदिवासी मकानों में मुख्य द्वार तो एक ही होता है किंतु पूरे घर में दो से अधिक दरवाज़ों की अवस्थिति सामान्य तौर पर मिलेगी। प्राय: घर एक कतार में बनाये जाते हैं जो गली में खुलते हैं। रिश्तेदारों के घर आसपास निर्मित किये जाते हैं जो आमतौर पर तीन-चार की संख्या में होते हैं और एक चौक मे खुलते हैं। आदिवासी जीवन में परिवार का हिस्सा उनके परिजनों के साथ साथ पशु-पक्षी भी होते है। यही कारण है कि आपको मकान के भीतर ही घूमते सूअर कुता, मुर्गी आदि तो नज़र आयेंगे ही इनके योग्य आवास अथवा बाडे भी मकान का ही हिस्सा होते हैं। सूअरों के रहने के बाडे आमतौर पर देखे जा सकते हैं, कभी कभी इन्हें दोहरी छत दे कर बनाया जाता है। अंडे से रही मुर्गियों को आरामदेय घोंसले दिये जाते हैं जो जमीन से ऊँचे स्थान पर बनाये जाते हैं। घरों के कुछ भाग का उपयोग आवास के लिये तो कुछ का अनाज भण्डारण के लिये होता है। बसाहट का एक प्रकार है लाडी जो एक प्रकार की झोपडी होती है। लाडी को खेतों के पास बनाया जाता है तथा वहीं अनाज की कटाई के पश्चात मिंजाई की जाती है। अनाज को प्राय: लाडी में ही रख दिया जाता है अत: इसे बनाने के लिये एसे स्थानों का चयन होता है जो आड में हो। 

आदिवासी घर नितांत आरामदेय होते हैं। आमतौर पर हर घर में भांति भांति की टोकरियाँ, चटाईयाँ, पत्तों के बंडल तथा मिट्टी और धातु के बर्तन नज़र आयेंगे। शराब और लांदा बनाने का उपक्रम भी हर आदिवासी घर के अहाते में मौजूद होता है। घर में मछली पकडने के जाल, ढोल आदि छत से लटकते नजर आ सकते हैं। बाँसुरियाँ, धनुष और वाण घर के छत की घास में अंदर की तरफ घुसा कर रखे जाते हैं। आदिवासियों के इन घरों का रसोई वाला कोना बहुत साधारण होता है। किसी कोने में अर्धचन्द्राकार स्थान को चुन कर रसोई बना लिया जाता है। मिट्टी के बर्तनों के अलावा घडे आदि भी रसोई मे रखे दिखाई पड जायेंगे। लकडी की चम्मच साथ ही बडे गोलाकार चमचे जिनसे रसदार भोजपदार्थ निकाला और परोसा जा सके इन रसोईयों में किसी कोने में पडा मिल जायेगा। अल्यूमीनियम की देगची और दूसरे बर्तनों को भी मैने अनेक रसोईयों में देखा है।   

स्थान स्थान पर जैसे परम्परायें बदलती हैं, बोलियाँ बदलती हैं वैसे ही घरों के नीयम भी बदले पाये जा सकते हैं। अनेक आदिवासी घरों में एक गहन कक्ष में मृतक स्मृति संजोये हुए एक रहस्यमयी घडा रखा जाता है। यह प्रतीक है कि घर में परिवार के पूर्वजों का स्मरण बनाये रखा गया है एवं इस तरह उनके प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। कुछ आदिवासी समाजो में स्त्रियों के मासिकधर्म को ले कर भी भ्रांतियाँ हैं जो सीधे ही निवास व्यवस्था में परिलक्षित होती है। कुछ परम्परागत आदिवासी गाँवों में औरतों के लिये अलग झोपड़ी बना दी जाती है जिसका प्रयोग मे मासिकधर्म के दौरान करती हैं। एसी झोपडियों को गाँव के भीतर ही किंतु निर्जन स्थान पर बनाया जाता है। यह झोपडी और इसके दरवाजे छोटे होते हैं; अंदर एक बिस्तर, खाना बनाने की जगह, कुछ घड़े, कुछ कपड़े और आग जलाने की लकडियाँ रखी होती हैं। बातचीत में मुझे जानकारी मिली कि ये अब विलुप्त होती हुई प्रथायें हैं और पुरानी पीढी भी अब इन बातों को नहीं मानती। पहले थानागुडी किसी ग्रामीण व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी जिसमे कि बाहर से आने वाले अतिथियों को ठहराया जाता था एवं उनकी सेवा-सुश्रुषा के लिये किसी ग्रामीण को नियत किया जाता था जिसे अठपहरिया कहते थे। अब थानागुडियाँ भी अतीत का हिस्सा हो गयी हैं। यदि आप विभिन्न गावों के नक्शों का निर्माण करें और उसमे प्रभावशाली व्यक्तियों के आवास खोजने की कोशिश करें तो आपको निराशा हाथ लगेगी। बस्तर के आदिवासी गाँवों में स्वाभाविक रूप से साम्य अवस्था विद्यमान है तथा आवास व्यवस्था में वर्चस्व की भावना का नितांत अभाव दिखाई पड़ेगा। गायता, पटेल, पुजारी आदि के निवास भी आपको समान बसाहट में सम्मिलित मिलेंगे। यहाँ भी बदलाव के कुछ दृश्य नजर आने लगे हैं; प्रभावशाली आदिवासी परिवारों अथवा राजनैतिक परिवारों ने स्वयं को एक सीढी उपर चढा कर अपने ही बंधु-बांधवों से काट लिया है।  

हर घर के चारो ओर एक चारदीवारी निर्मित की जाती है। चारदीवारी का कि निर्माण निजी अथवा सामुदायिक बागीचे की परिधि में भी होता है। चारदीवारी अथवा परिधि निर्माण बस्तर के घरों की विशेषता है। बाडी बनाना तो आधुनिक समयों में अधिक होने लगा है किंतु मेढे पाषाणकाल से ही बस्तर के आसिवासी जीवन की विशेषता रहे हैं। मेढ़ा - लकड़ी या बांस का वह सीधा गाड़ा गया खूंटा होता है जो किसी बाडी की बुनावट को आधार देता है। जितनी लम्बी बाडी लगानी है उतने ही अधिक मेढे। समान आकार और गोलाई के तनों को सीधे और एक के बाद एक गाड कर किसी मकान की परिधि बनाई जाती है। लकडी के स्थान पर लम्बे आकार के पत्थर खास तौर पर चूना पत्थर की फर्सियाँ भी इस काम में प्रयुक्त की जाती हैं। चूना पत्थर की अलग अलग परतों को उखाड़ कर बराबर आकार प्रकार में बना लिया जाता है फिर परिधि में एक के पश्चात एक सीधा गाडा जाता है। ये मेढे न केवल किसी मकान, बागीचे अथवा खेत की सीमा निर्धारित करते हैं अपितु इनका लोक-ज्योतिष मे भी अपना ही महत्व है। मेढ़ा गन्तेया यानी कि मेढ़ा गिनने वाला ज्योतिषी; किसी घर की परिधि में लगाई गयी इनकी संख्या से ही वह विचित्र गणनायें कर लेता है और किसी ग्रामीण की समस्याओं का हल बता सकता है। मध्यबस्तर में जहाँ कि चूने पत्थर की अधिकता है वहाँ मकान के निर्माण तथा चौखटों में भी सीधी और लम्बी लम्बी फर्सियों का प्रयोग होता है। पत्थरों के छोटे छोटे टुकडों को एक के उपर एक चढा कर मिट्टी के माध्यम से जोड कर घर की दीवारें तैयार कर ली जाती हैं। 

बस्तरिया आदिवासी घर करीने से बने और साफसुथरे होते है। फर्श और दीवारों को रंग-बिरंगी मिट्टी अथवा गोबर से लीपना आम है किंतु पहली दृष्टि में बहुत अधिक कलात्मक सजावट इन मकानो में दिखाई नहीं पडेगी। मुझे उन दीवारों पर ही भित्तिचित्र नजर आये जिनमें कोई पर्व अथवा उत्सव मनाया जा रहा था। प्राय: घर की चौखट भी सामान्य ही होती है और लकडी से अथवा बाँस गूथ कर बनाये गये दरवाजों को ले कर भी एक प्रकार की उदासीनता है। आदिवासी जीवन अपने घोटुलों को जितना सजीव और कलात्मक बनाता है उनता ही साधारण और सादगी से भरा वह अपने निवास को रखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ये दर्शनीय नहीं हैं, बस्तर में मकान बनाये जाने के तरीके, परिधियाँ निर्माण की विशेषतायें और यहाँ के सामाजिक सहसम्बन्ध किसी भी समाजशास्त्री के लिये आदर्श विषय हो सकते हैं। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Tuesday, August 07, 2012

दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी {प्राचीन बस्तर का समाजशास्त्र [संदर्भ: - रामायण काल]}

सांध्य दैनिक ट्रू-सोल्जर (रायपुर) से दिनांक 7.08.2012 को प्रकाशित
बस्तर पर जानकारी एकत्रीकरण के लिये आर्य-द्रविड अंतर्सम्बन्धों को बारीकी से समझना आवश्यक है। वस्तुत: हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। रामधारी सिंह दिनकर की कृति “संस्कृति के चार अध्याय” एक उत्कृष्ट रचना है जो एसी सभी बहसों को अपने तार्कित उत्तर से संतुष्ट करती है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। वर्तमान भारत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन निवासियों के मूल स्थानों के लिये मैने इतिहास की कई पुस्तकों में भी झांका लेकिन अधिकांश में पूर्वाग्रह ही अधिक नजर आता है। अत: दिनकर की ही पुस्तक के उद्धरण मुझे उचित जान पडते हैं जो “अंडा पहले आया कि मुर्गी” वाली बहस को अधिक तूल न दे कर समरस्ता के मर्म की बात करते हैं। 

 प्राचीन बस्तर रामायणकाल में दक्षिणा पथ की बहुतायत गतिविधियों का केन्द्र रहा होगा तथा इस सब का प्रारंभ महर्षि अगस्त्य के विन्ध्य पर्वत पार करने की रोचक कथा के साथ होता है। कथा नें कविता तत्व की मोटी गिलाफ ओढी हुई है। कथा कहती है कि विन्ध्य अपना आकार निरंतर बढा रहा था जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई। इससे निजात पाने के लिये महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है अतः मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने कहा कि विन्ध्य उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा वे पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा रहने लगे। यह दक्षिण की महत्ता तथा विन्ध्य की दो संस्कृतियों के बीच दीवाल की तरह खडे होने की पुष्टि करती हुई कथा है। प्राचीन आश्रम संस्कृति तथा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित होती है कि अगस्त्य एक पूरी संस्था की तरह कार्य कर रहे थे तथा वे उत्तर दक्षिण को एक सूत्र में बाँधने की प्रथम ज्ञात कडी हैं। हमनें उनका एक अध्यापक, एक उपदेशक, एक ज्ञानी, एक यायावर, एक दिव्यास्त्र निर्माता तथा योजनाकार का रूप तो जाना है लेकिन उनकी वास्तविक उपलब्धि कम ही लोग जानते हैं कि महर्षि अगस्त्य नें ही तमिल भाषा के आदि व्याकरण “अगस्त्यम” की रचना की है। यह रचना सिद्ध करती है कि अगस्त्य केवल दण्डकारण्य तक ही सीमित नहीं रहे अपितु सुदूर दक्षिण तक उन्होंने यात्रा की व वहाँ का जन जीवन यहाँ तक कि भाषा को भी एक व्यवस्था प्रदान करने का यत्न किया। 

दण्डकारण्य के प्राचीन समाजशास्त्र का आज भी महत्व विद्यमान है। दक्षिणापथ का उत्तरी भाग था दण्डकारण्य; यहाँ राक्षस जाति के निवास की जगह उनके आक्रमणों का ही विवरण अधिक मिलता है। प्राचीन विवरणों के आधार पर उन जनजातियों को जिन्हें राक्षस कहा गया है, उनका निवास दक्षिण के बस्तरेतर क्षेत्र अर्थात आन्ध्र व उस से लग कर सुदूर दक्षिण तक प्रतीत होते हैं। यह भी ज्ञात होता है कि लम्बे समय तक क्षेत्र में किसी समाजसेवी की तरह कार्य करते हुए अगस्त्य नें दण्डकारण्य क्षेत्र में निवासरत अनेक जनजातियों के मध्य समन्वय का वातावरण उत्पन्न कर लिया था। महर्षि अगस्त्य का आश्रम क्षेत्र वर्तमान बस्तर के भीतर ही था जो इस दिशा में किये गये श्री सूर्य कुमार वर्मा के 1906 में सरस्वति पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख द्वारा भली प्रकार सिद्ध किया गया है। राम के वनवास से पहले तक अगस्त्य मुनि का आश्रम ही दो संस्कृतियों का समंवय स्थल बन गया था जिसका स्थानीय जनजातियों के सहयोग और योगदान के बिना संचालित होना संभव प्रतीत नहीं होता। राम के वनागमन से पूर्व इस क्षेत्र में निवासरत जनजातियों पर राक्षसों के कुछ हमलों का जिक्र होता है; उदाहरण के लिये लंका को हस्तगत करने के बाद रावण दक्षिण विजय के लिये निकला जिसका कि उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है – युद्धं मे दीयतामिति निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत [वह दक्षिण में एक नगर से दूसरे नगर पहुँचता और चुनौती देता कि या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो]। वानर जनजाति का नेतृत्व कर रहे बालि नें रावण को न केवल युद्ध में पराजित कर दिया अपितु बंदी भी बना लिया। इस प्रसंग का अंत होता है जब रावण-बालि संधि हो जाती है। रावण नें बालि के अलावा मांधाता (बस्तर का वर्तमान मंधोता ग्राम) के जनजातियों के सरदारों से भी समझौते कर लिये और लंका लौटने से पहले दण्डकारण्य क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि खर-दूषण के रूप में किसी निगरानी चौकी या सत्ता प्रतीक की तरह छोड दिये थे। उल्लेख मिलता है कि उनके साथ चौदह हजार राक्षसों की एक टुकडी भी थी जिसका कार्य आतंक प्रसारित कर रावण की सत्ता का भय बनाये रखना था। यह कथा आगे बढती है जब राम का वनागमन होता है। पं केदारनाथ ठाकुर अपनी कृति बस्तर भूषण (1908) में उल्लेख करते हैं कि “राम पहले भारद्वाज आश्रम से होते हुए रत्नगिरि में आये। रत्नगिरि से चल कर बस्तर राज्य तथा कांकेर राज्य की पश्चिमी सीमा से होते हुए वे गोदावरी तक आये, वहाँ से गोदावरी के बहाव की ओर कुछ दिन घूमते रहे तत्पश्चात पर्णशाला में आ कर निवास किया। यहीं पर सीता हरण हुआ। रामचन्द्र जी सीता को गोदावरी नदी के पूर्व तथा इशान में ढूंढने लगे। यही पर उनकी शिवरी भीलनी (शबरी) से भेंट हुई। शिवरी नदी (शबरी नदी) के पूर्व तथा जैपुर राज्य में एक पर्वत है जिसे आज रामगिरि के नाम से जाना जाता है उसके चारो ओर असंख्य छोटी बडी पहाडियाँ हैं, इसी समूह में उत्तर की ओर रंफा पहाड है जिसे जैपुर स्टेट के लोग किष्किंधा पहाड़ कहते हैं। इन पहाडों पर वर्तमान समय में रेड्डी लोग वास करते हैं जो स्वयं को वानर का वंशज मानते हैं”।

बहुत अधिक कार्य अब तक इस दिशा में नहीं हुए हैं जो इतिहास प्रदत्त प्रमाणों का बारीकी से विश्लेषण करें। ब्रिटिश शासक ग्रिग्सन नें 1937 ई. में इस काल के प्रमाणों को एकत्र करने व दस्तावेजबद्ध करने के लिये कैप्टन गिब्सन को नियुक्त किया था। कहा जाता है कि गिब्सन नें बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित भी कर ली थी। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड गया। गिब्सन सारी एकत्र सामग्री व जानकारी को ले कर इंग्लैंण्ड चले गये व वहीं युद्ध में मारे गये। इसके बाद स्वतंत्र भारत के किसी शासक, नेता या जिलाधीश नें इस तरह का कार्य करने की जहमत नहीं उठायी। अगला प्रामाणिक कार्य उपलब्ध होता है डॉ. हीरालाल शुक्ल का जिनकी किताब “लंका की खोज” एवं “रामायण का पुरातत्व” अद्वितीय दस्तावेज हैं। डॉ. शुक्ल नें बस्तर क्षेत्र में उपस्थित रामायणकालीन जनजातियों की वर्तमान जनजातियों से तुलना व साम्यता को विस्तार से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। उनके अनुसार रामायण युगीन वनेचर प्रजातियों में आग्नेय परिवार से सम्बद्ध जनजातियाँ हैं - निषाद, गृद्ध तथा शबर; अगर मध्यवर्ती द्रविड परिवार की बात की जाये तो उससे सम्बद्ध प्रजातियाँ हैं – वानर तथा राक्षस। 

रामायण में चिन्हित आग्नेय परिवार की जनजातियों नें आर्यों से शीघ्र निकटता तथा मैत्री कर ली थी। निषाद प्रजाति का उल्लेख मूल रूप से उत्तरप्रदेश के संदर्भों में प्राप्त होता है। राम को गंगा पार कराना एवं राम-निषाद मैत्री का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन रामायण में प्राप्त होता है। बस्तर के ‘कुण्डुक’ स्वयं को निषाद वंश का मानते हैं तथा इस जनजाति का विश्वास है कि वे त्रेता युग में राम के साथ ही गंगातट से दण्डक तक आये। यह प्रजाति आज भी नाविक ही है एवं इनकी उपस्थिति चित्रकूट के निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित रह गयी है। रामायण में वर्णित दूसरी प्रजाती है गृद्ध। गोदावरी की पार्श्ववर्ती पर्वतमालाओं पर इनका निवास माना गया है। गिद्ध इन जनजातियों का प्रतीक रहा होगा। इनके प्रमुख नायक सम्पाति तथा जटायु का आर्य जनजातियों से तालमेल प्रतीत होता है। रामायण में पंख कटने के बाद जिस प्रस्त्रवण पर्वत (बैलाडिला) के निकट जटायु के दम तोडने का वर्णन है उस स्थल को आज गीदम के नाम से जाना जा रहा है। जगदलपुर के जाटम ग्राम में अब भी गदबा जनजाति के घर हैं जिनका सम्बन्ध गृद्ध प्रजाति से जोड कर देखा जाता है। बस्तर की गदबा प्रजाति प्रतीक पूजक है तथा गृद्ध आज भी इनके यहाँ “टोटेम” है। जिस प्रकार बस्तर में हल प्रतीक के वाहकों को हलबा कहा गया उसी प्रकार गृद्ध प्रतीक के वाहक गदबा कहलाने लगे। यह प्रजाति आज विलुप्ति पर पहुँच गयी है। लोग कृषक अथवा मजदूर हैं तथा अब इन्हें पहचानना कठिन होता जा रहा है। राम-शबरी मिलन और शबरी के प्रेम से खिलाये गये जूठे बेर एक महान प्रेरक प्रसंग है। इसी कथा नें शबर जनजाति की पहचान को उसकी प्राचीनता से जोडा है। ऐतरेय ब्राम्हण में शबरों को आर्य देश की सीमा पर स्थित बताया गया है अत: यह क्षेत्र निश्चित ही दण्डकारण्य है। साक्ष्यों के आधार पर एवं पुरा-भूगोल पर किये गये विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि शबरी का आश्रम शबरी तथा गोदावरी नदी के संगम पर स्थित था। डब्ल्यु जी ग्रिफिथ नें मध्य भारत की कोल प्रजाति को शबर माना है (क़ोल ट्राईब्स ऑफ सेंट्रल इंडिया, 1946)। डॉ. हीरालाल शुक्ल भी इन्हें ओडिशा और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में चिन्हित करते हैं। शबर जनजाति के लोग गोंड अथवा खोंड की तुलना में भिन्न होते हैं। इनकी स्त्रियाँ नासिका तथा हनु में गुदना करती हैं एवं कपोलों में भी गहरी रेखायें गुदवाती हैं। कर्ण-आभूषण दर्शनीय होते हैं व कान में चौदह तक छेद कराने का चलन पाया गया है। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शबरों के दो विभेद पाये गये हैं – पर्ण शबर तथ नग्न शबर। नग्न शबर प्रजाति आर्यों के निकट नहीं आ पायी थी व अपनी मूलावस्था में रहने के कारण यह नामांकरण हुआ है। बंडा परजा जनजाति ही नग्न शबर मानी जाती है। 

मध्यवर्ती द्रविड परिवार की वानर तथा राक्षस जातियाँ एक समय में ताकतवर तथा सक्रियतम रही हैं। यह तो पहचान ही लिया गया है कि काकिनाडु (पूर्वी गोदावरी) सहित कोरापुट व कालाहाँडी के आंशिक क्षेत्र किष्किन्धा जनपद के अंतर्गत आते थे। रामायण में किष्किन्धा के निवासियों के लिये वानर पहचान का प्रयोग है। वानरो की जो प्रजातिगत विशेषतायें कही जाती हैं उसके अनुसार वे भावुक, चपल, ताम्रवदना अथवा कनकप्रभ उल्लेखित होने के कारण सोने जैसे वर्ण के होते थे। आज भी खम्माम, बस्तर, कोरापुट तथा कालाहाण्डी की आदिम प्रजातियाँ (इन क्षेत्रों में निवास करने वाली कंध जनजातियों को विद्वानों नें वानर माना है) बालि का स्मरण करती हैं। बस्तर में बालिजात्रा धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। कंध प्रजाति का गोत्र चिन्ह वानर है तथा वंशों के नाम सुग्री, जाम्ब तथा हनु आदि मिलते हैं। नृत्य आदि अवसरों पर कंध लोग आज भी पूँछ धारण करते हैं। कन्ध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई तथा कुवि हैं जो इन्हें कोयतुर (गोंड) जनजातियों के निकट सिद्ध करते हैं। प्रकृति की दृष्टि से ये लोग दण्डामि माडिया के भी निकट नजर आते हैं। रामायण में जिसे राक्षस कहा गया है वैदिक साहित्य नें उन्हें दस्यु सम्बोधित किया है। यह जनजाति प्रखर योद्धा रही है तथा इन्होंने आर्यों की आधीनता को अस्वीकार कर सर्वदा युद्ध का मार्गानुसरण किया है। राक्षसों के लिये ऋग्वेद में क्रव्याद: अर्थात कच्चा मांसाहार करने वाले; मृघ्रवाच: अर्थात जिनकी भाषा न समझ आये; अदेवयु: अर्थात देवताओं को न मानने वाले; अनास अर्थात जिनकी नाक छोटी व उठी हुई हो; शिश्नदेवा: अर्थात लिंगोपासक कहा गया है। इनमें गर्धर्व विवाह का प्रचलन था तथा बलात् विवाह करने की वृत्ति को भी बाद में राक्षस विवाह नामांकरण से जाना गया। राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण नें इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। राक्षसों (रक्ष शाखा) की मूल उपस्थिति को आन्ध्रप्रदेश से माना जा सकता है।

रामायण कालीन बस्तर के जटिल समाजशास्त्र को समझने के लिये उपरोक्त सभी विवरणों को एक साथ देखना होगा। दण्डकारण्य की अपनी ही तरह की संस्कृति थी जिसमें गंगाजमुनी सम्मिश्रण होने लगा तब भी उसनें इन्द्रावती का वेग और गोदावरी की विराटता को मजबूती से थामे रखा। यह दो संस्कृतियों के मध्य का क्षेत्र होने के कारण कई अनेकताओं का समागम स्थल है। यह ज्ञात होता है कि कई जनजातियाँ जैसी अवस्था में रामायण काल में रहती होंगी अब भी उनमें बहुत कुछ नहीं बदला है। यहाँ के समाजशास्त्र नें दक्षिण से उसकी पहचान अलग रखी व उत्तर से भी स्वयं को मिलने नहीं दिया। यहाँ से जुडे केवल आर्य-द्रविड युद्ध के ही प्रसंग नहीं हैं अपितु कई द्रविड प्रजातियों के आपसी संघर्ष का भी यह क्षेत्र रहा है जहाँ समय समय पर शक्तिशाली आर्य व रक्ष प्रजातियों ने कभी मैत्री तो कभी युद्ध द्वारा अपनी शक्ति व सत्ता के केन्द्र स्थापित किये। यह अनोखा स्थल है जहाँ आश्रम संस्कृति भी पूरे चरम पर थी तो उसका विरोध भी पूरी निर्ममता से होता रहा। मेरा मानना है कि प्राचीन ग्रंथों से मिल रहे सूत्रों को जब तक इतिहासकार बारीकी से नहीं पकडेंगे वे बस्तर के अतीत की न्यायपूर्ण व्याख्या नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में दण्डकारण्य क्षेत्र पुन: युद्धभूमि बना हुआ है तथा आन्ध्र ओडिशा महाराष्ट्र से भीतर घुस कर खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों नें इसे अपना उपनिवेश बना लिया है। युद्धरत दिखने वाले लोग बस्तर की वही जनजातियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक अपनी पुरातन परम्पराओं की थाती सम्भाले अतीत का जीवत प्रमाण है। दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी।

[यह तस्वीर मित्र राकेश सिंह जी के संकलन से]
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