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Thursday, December 12, 2013

बस्तर में वामपंथ की अवस्थिति पर एक बहस

बहस तो आवश्यक है किंतु वामपंथी नेता संजय पराते ने इसे व्यक्तिगत बना दिया। तथापि; मैं मूल आलेख जिसपर यह बहस आधारित है; उस आलेख पर संजय पराते का जवाब और फिर संजय पराते को मेरा जवाब एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आलेख पढते हुए साथ में प्रस्तुत किये गये आंकडे तालिका पर भी दृष्टि डाली जा सकती है। पहले पढे मेरा जवाब और फिर इसी श्रंखला में अन्य आलेख भी  - 

विफलताओं को छिपाने का श्रेष्ठ बहाना यही है “संजय पराते” जी 
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वामपंथ की बस्तर में जमीन नहीं यह बात तो चुनावी आंकडे सिद्ध कर रहे हैं लेकिन क्यों नहीं है इस बात के लिये आप आईना ले कर उन कथित नेताओं, विचारकों या प्रवक्ताओं के सामने आईये तो; गालिया दे दे कर आपका थोबडा न सुजा दें तो कहियेगा। क्या यही वामपंथ की जमीनी लडाई है और इसी व्यक्तिगत हमलों-झमलों के दम पर इन्हें सारी दुनियाँ चाहिये? इतनी तल्ख शुरूआत क्यों? यह इसलिये क्योंकि मैं व्यक्तिगत हमलों को सोचने समझने और विचारने के दिशा में बाधा मानता हूँ। व्यक्तिगत हमले करने वाले व्यक्तियों से आप जिन्दा विमर्शों की बात सोच ही नहीं सकते उनसे क्या व्यवस्था और अवस्था पर चर्चा होगी? संजय पराते को मैं नहीं जानता। कमल शुक्ला के माध्यम से ज्ञात हुआ था कि वे वामपंथी नेता हैं और बस्तर के चुनावों पर जो मैने आंकडे प्रस्तुत किये हैं उस पर अपनी बात रखेंगे। बात रखी भी गयी लेकिन जो मतदाता ने आईना दिखाया है उस पर नहीं बल्कि हकीकत को सामने लाने के कारण मुझ पर छीटा-कशी। ओह मेचारे मुक्तिबोध..छोडिये मुद्दों पर आते हैं। 

पहले व्यक्तिगत हमलों का जवाब दूंगा फिर तथ्य की बातें। वामपंथी नेता पराते लिखते हैं कि “अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृष्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं”। आभार पराते जी क्योंकि हम जैसे गिद्ध उस गंदगी को साफ कर रहे हैं जो समाज में घोषित “विचारधारायें” फैला रही हैं यह भी तो सही है न? आप फिर लिखते हैं कि “राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है”। यह आपने मेरे लेख को पढे बिना लिखा है या आप “झूठ” जान बूझ कर लिख रहे हैं। मेरा कहना है कि जमीनी वामपंथ कमजोर पडा है जबकि उसे मुखर और मजबूत होना चाहिये। मैं जमीनी लडाईयों का प्रखर समर्थक हूँ और इसीलिये अपने ही एक लेख में मैने टिप्पणी की थी कि मनीष कुंजाम की हार का मुझे दुख़ हुआ है। पर यह भी सच है कि मनीष कुंजाम केवल अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे थे। बस्तर में सभी जगह वामदल अपना दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। इस स्वीकारोक्ति से बचने के लिये अनावश्यक तेज आवाज क्यों? नेता होने का मतलब तो आप समझते हैं लेकिन क्या लेखक होने के मायने ज्ञात हैं आपको? मजेदार बात यह है कि बस्तर के कला-संस्कृति-समाज आदि आदि विषयों पर मैं लिखता रहा हूँ तो किसी को आपत्ति नहीं लेकिन जब जब राजनीतिक सच्चाईयों पर कलम चलाओं तो कई कलेजे सुलग जाते है। खैर, व्यक्तिगत हमले पर इतना ही अब तथ्य पर बात करते हैं। 

वामपंथ अपनी सतह खोता गया क्योंकि उसने लेखक तो पैदा किये, विचारक भी पैदा किये लेकिन जमीनी कार्यकर्ता कहाँ हैं? जमीनी कार्यकर्ता बस्तर में चुनावी अभियान के समय कहाँ थे? माना कि कॉग्रेस और भाजपा ने अपने धनबल से बडी बडी रैलियाँ की और परिवर्तन तथा विकास यात्रा के नाम पर चुनाव प्रचार किया लेकिन जनबल का दावा तो आपका है। कहाँ थी वे रैलियाँ? वे मुद्दे बाहर क्यों नहीं आये जिनको सामने रख कर जमीनी वामपंथ कहता कि हम ही विकल्प हैं काँग्रेस और भाजपा के? आपके देखते देखते “आम आदमी पार्टी” ने दिल्ली में वह कर दिखाया जिसकी अपेक्षा वामपंथियों से की जाती रही है। पराते जी आप लिखते हैं कि “वामपंथ पूरे देश में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है”। मेरा सवाल है कि अलग मुद्दा क्यों है? वाम की केरल पर हाल में भी चर्चा होनी चाहिये, वाम के बंगाल पराजय पर भी बात होनी चाहिये और तो और नेपाल का गढ ढहने पर भे विमर्श होना चाहिये और बस्तर की हार पर भी चर्चा होनी चाहिये। तिरुपति से पशुपति तक है क्या असलियत; केवल त्रिपुरा ही तो? इसका अर्थ यही है कि वाम राजनीति केवल कुछ एनजीओ और पत्र-पत्रिकाओं से चल रही है; जमीन पर आप हैं ही नहीं; इसलिये दिखते भी नहीं और जब कोई आईना दिखाता है तो फिर आपकी मुखरता के क्या कहने? 

आप लिखते हैं वामपंथी वैकल्पिक ताकत का निर्माण करना चाहते हैं मेरा प्रश्न है कि 1947 से 2013 आ गया और इस बीच मुख्य सत्ताधारी दल के कई विकल्प आ गये किंतु वामपंथी इस पंक्ति में कभी क्यों नहीं थे? मुद्दे की बात हो तो अरविन्द केजरेवाल भी शीला दीक्षित को हरा सकता है तो फिर टटोलिये न कहाँ हैं मुद्दे? या फिर कोई मुद्दे हैं ही नहीं हवा हवाई बहसे ही हैं? और काम हम जैसे अदना लेखकों को गरिया कर ही निकाला जा रहा है? मैने अपने आलेख में बस्तर से बात की थी और वही ले जाता हूँ अविभाजित मध्यप्रदेश से ले कर छत्तीसगढ-2013 तक बस्तर में जितने भी चुनाव हुए अधिकतम 5% से अधिक मत सम्मिलित रूप से बस्तर में कभी प्राप्त नहीं हुए क्यों? वह इस लिये क्योंकि वामपंथी जमीन बनाने की कोशिश ही नहीं करते पाये गये। जमीनी वामपंथ से बडी दुनिया तो बंदूखी-वामपंथ ने खडी कर ली और आप देखते रह गये? कभी आत्ममंथन नहीं हुआ, कभी दुबारा आन्दोलन खडा करने की कोशिश नहीं की गयी यहाँ तक कि मनीष कुंजाम को छोड कर कोई ठीक ठाक नेता भी बस्तर को वामपंथ ने अब तक नहीं दिया है। 

मुझे यह कहने में गुरेज नहीं है कि बस्तर का आदिवासी दो पाटों में पिस रहा है। यह बात मैने अपनी कवितओं-लेखों के माध्यम से कई बार कहीं हैं। किंतु इससे वामदलों की सक्रियता नहीं सिद्ध होती। वामपंथी राजनेता पूरे पाँच वर्ष परिदृश्य से बाहर रहते हैं और फिर चुनावों में उनसे अपेक्षा की जाये तो वही परिणाम होंगे जिसका की आंकडा मैने प्रस्तुत किया है। भाजपा और कांग्रेस को आप दोष इस लिये दे रहे हैं क्योंकि यह सबसे आसान तरीका है अपनी अवस्थिति छिपाने का। वामदल एक राजनैतिक पार्टी की हैसियत रखते हैं तो उसने अपेक्षायें भी उसी तरह की होंगी? या जो आपने कॉग्रेस-भाजपा पर टिप्पणी की है वही वामपंथियों की भी सच्चाई है अर्थात – हमप्याले, हमनिवाले?

आप लिखते हैं कि इस चुनाव में “वामपंथियों के पास वैकल्पिक नीतियाँ थीं, अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी” हो सकता है रही होंगी लेकिन न तो वे आपकी सभाओं से बाहर आयीं न ही आपके मुद्दों ने आन्दोलन का कोई रूप लिया। अगर इतना ही प्रभाव था जिसका कि आप दावा कर रहे हैं तो “नोटा” में पडे वोटों से भी दयनीय हालत आपकी पार्टी की क्यों हुई? जवाब में चाहें तो आप मुझे फिर दो चार गालियाँ दे सकते हैं क्योंकि न तो आत्ममंथन वामपंथियों का स्वभाव रहा है न ही अपने छद्म गुरूर से बाहर यह राजनैतिक दल आसानी से आयेगा। आप फिर लिखते हैं कि “चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है”। इस कथन पर क्या टिप्पणी करूं आप बस्तर के चुनाव परिणाम में वामदलों की हैसियत देखें, जनता को आप बेवकूफ समझते हैं तब तो कोई बात नहीं अन्यथा तो आप 365 दिन छोडिये 1950 के पहले चुनाव से अब तक केवल तीन सीट ही निकाल सके हैं। 

संजय पराते जी, आपकी मुझ पर नाराजगी उचित ही है क्योंकि यही वामपंथी दलों को बस्तर के चुनाव में मिली विफलताओं को छुपाने का श्रेष्ठ और सुलभ बहाना है। शुभकामनायें। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 
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[यह आलेख मेरे उस आलेख पर वामपंथी नेता श्री संजय पराते का मुझको जवाब है जिसे मैने इसी आलेख के नीचे हू-बहू प्रस्तुत किया है।] 


जब-जब वामपंथ पर हमले होंगे, हमलावरों को मुक्तिबोध के सवाल का जवाब देना ही होगा कि -‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’ अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृश्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं। ‘विचारधारा विहीन विचार’ आज की सबसे बड़ी विचारधारा है, क्योंकि प्रतिक्रियावादियों को ऐसे ही विचार रास आते हैं, जो मानवीय संवेदना से बहुत-बहुत दूर हो। ऐसे विचार किस विचारधारा की पुष्टि करते हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं हैं।

कुछ लोग होते हैं (और ऐसे सनकी-पागल लोग बहुत कम होते हैं) जो पहले अपनी विचारधारा और राजनीति तय करते हैं और बाद में वे इसे स्थापित करने का कठिन कार्य करते हैं। लेकिन ऐसे ’चतुर सयानों’ की कोई कमी नहीं होती, जो ‘स्थापित राजनीति’ के साथ चलने में ही अपनी भलाई देखते हैं। राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष  कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है। इस राजनीति में ही भाजपा का भला है और कांग्रेस का भी.....और राजीव रंजन का भी! तो राजीव रंजन से और तमाम मित्रों से मेरा पहला अनुरोध यही है कि संसदीय वामपंथ (भाकपा-माकपा) को नक्सलियों/माओवादियों से अलग करके देखें। ऐसा इसलिए कि संसदीय वामपंथ पूरे देश  में ही नक्सलवाद के निशाने पर रहा है....इसीलिए उत्तर बस्तर में भी रहा है और दक्षिण में भी। कारण स्पष्ट है--यदि संसदीय वामपंथ प्रगति करेगा, तो माओवादी कमजोर होंगे। संसदीय वामपंथ को माओवादी तो बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते, देश  और प्रदेश  की दोनों प्रमुख पार्टियां-- कांग्रेस और भाजपा-- भी नहीं चाहतीं। आखिर संसदीय वामपंथ ही तो कांग्रेस-भाजपा की नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ तनकर खड़ा है-- और एक वैकल्पिक नीतियों को सामने रखकर। वैष्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की जिन नीतियों पर कांग्रेस-भाजपा के बीच व्यापक सहमति है (चुनावी नूरा-कुष्ती को छोड़ दें तो), उनको तेजी से लागू करने के खिलाफ रोड़ा तो वामपंथ ही है। वही पूरे देश  में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश  में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है। निष्चित ही वामपंथ के शुभचिंतकों और ‘स्थापित राजनीति’ के सहचरों का विश्लेषण अलग-अलग ही होगा। 

पूंजीवाद शोषण पर आधारित व्यवस्था है। यह व्यवस्था पहले अस्तित्व में आती है--शोशक वर्ग के लिए इस व्यवस्था को बनाये रखने का औचित्य प्रतिपादित करने वाली विचारधारा का विस्तार बाद में होता है। यह काम आज भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। साम्यवाद उस विचारधारा को प्रतिपादित करती है, जो शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेती है। यहां विचारधारा पहले स्थापित होती है, व्यवस्था निर्माण का काम बाद में। इस विचारधारा के विस्तार का काम आसान नहीं है, लेकिन वामपंथ ने अपनी विचारधारा और राजनीति तय करली है और इस राजनीति को स्थापित करने के काम में वे अनथक/अविचल लगे हुए हैं। इस काम में कहीं वे जमते हैं, तो कहीं जमी-जमायी जगह से उखड़ते भी हैं। लेकिन वामपंथ के इस जमने-उखड़ने की तुलना कांग्रेस-भाजपा की हार-जीत की तरह नहीं की जा सकती। आखिर पूंजीवादी व्यवस्था का विकल्प षोशणहीन, वर्गहीन समाज व्यवस्था ही हो सकती है-- आखिर ऐसी व्यवस्था में ही समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा के बुनियादी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। और सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ नहीं है, तो फिर वे मानवता के बुनियादी लक्ष्यों के साथ कैसे हो सकते हैं? 

तो वामपंथी ताकतें वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहती हैं, वो इसके लिए वैकल्पिक नीतियां पेष कर रही है, उन ताकतों की प्रगति कौन चाहेगा? सही वामपंथ को कुचलने के लिए कांग्रेस-भाजपा को छद्म वामपंथ से भी हाथ मिलाने में कभी गुरेज नहीं रहा। कौन नहीं जानता कि बस्तर में भाकपा-माकपा के नेता/कार्यकर्ता ही नक्सलियों/माओवादियों के सबसे ज्यादा षिकार हुए हैं। कौन नहीं जानता कि इन माओवादियों के लिए आर्थिक संसाधन इनके नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों, ठेकेदारों की दहलीजों से ही निकलते हैं और कौन नहीं जानता कि चुनाव में लेन-देन करके इन्हीं छद्म वामपंथियों का उपयोग कांग्रेस-भाजपा अपने हित में करती है। तो कांग्रेस-भाजपा वाकई चाहेगी कि माओवाद/नक्सलवाद खत्म हो, इनको कुचलने के नाम से आ रहे आर्थिक संसाधनों में भ्रष्टाचार खत्म हो और ‘स्थापित राजनीति’ के खिलाफ सही वामपंथ को पनपने का मौका मिले? इन दोनों पार्टियों इनकी सरकारों ने नक्सलियों को कुचलने के नाम पर वामपंथी कार्यकर्ताओं को ही अपने दमन का षिकार बनाया है। नक्सलियों/माओवादियों की ‘अघोषित/असंवैधानिक’ सप्ताह को स्थापित करने का काम इन दोनों पार्टियों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया है। 

वामपंथी ताकतों ने इस देष में आजादी की लड़ाई लड़ी है। आज भी वे साम्राज्यावदी संघर्षों  और विचारों की वाहक है। अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवाद आज भी अपनी लूट-खसोट की नीति को जारी रखना चाहता है और इसके लिए नये-नये उपनिवेष स्थापित करना चाहता है। इसके लिए विष्व-अर्थव्यवस्था पर वह अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। उदारीकरण-निजीकरण-वैष्वीकरण की नीतियां इसी लूट-खसोट और शोषण की मुहिम का ही अंग है। स्पश्ट है कि जो इन नीतियों के साथ है, वह आम जनता का दुष्मन है। उसे अमेरिकी हितों और पूंजीपतियों के स्वार्थों की तो चिंता सताती है, लेकिन आम जनता के दुख-दर्दों से वह न केवल आंखें मूंदे रहता है, बल्कि उसके बुनियादी मानवीय अधिकारों को भी कुचलने में भी उसे कोई हिचक नहीं होती। 

राजीव रंजन जी, आप भी जानते हैं कि मानव विकास सूचकांक के पैमानों पर छत्तीसगढ़ की क्या स्थिति है? चुनावी दावों और प्रतिदावों को छोड़ दिया जाये तो सरकारी हकीकत यही है कि छत्तीसगढ़ देष के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। तो छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े इलाके बस्तर की स्थिति का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सबसे निर्मम शिकार वंचित वर्ग हो रहा है और छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों पर ही इन नीतियों की बर्बर मार पड़ रही है। बस्तर देशी -विदेशी  कंपनियों की ‘लूट का चारागाह’ बन गया है। नागरिकों को उनके घरों में सुरक्षा देने की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकारों की है, लेकिन बस्तर के आदिवासियों को इससे महरुम कर दिया गया। नक्सलियों/माओवादियों से तो निपटने में इन सरकारों की नानी मरती है, लेकिन राज्य प्रायोजित सलवा जुडूम (ध्यान रहे, सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया है) के नाम पर घरों को जलाने, महिलाओं से बलात्कार करने, उनकी हत्यायें करने और उन्हें गांव से विस्थापित करने और एसपीओ के नाम पर अवयस्क बच्चे के हाथों में बंदूकें थमाने का ‘बहादुरीपूर्ण’ काम ये करते रहे हैं। आदिवासियों को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचलने में इन्हें जरा भी शर्म महसूस नहीं होती। ऐसा करते हुए ‘राज्य’ नामक संवैधानिक सत्ता को मानवाधिकारों की कभी याद नहीं आयी।

नक्सलियों/माओवादियों का तो मानवाधिकारों से कोई लेना-देना ही नहीं है, लेकिन ‘राज्य के संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन का अधिकार’ भाजपा सरकार को किसने दिया? माओवादियों द्वारा राज्य के कानूनों का उल्लंघन किसी भी आपराधिक कार्य की तरह निष्चित ही निंदनीय और दण्डनीय है, लेकिन भाजपा द्वारा संचालित ‘राज्य की संवैधानिक सत्ता’ को किसने ये अधिकार दिया है कि वह सोनी सोरी नामक नक्सली महिला (यदि वह नक्सली है!- और याद रखें, इस महिला पर सरकार के तमाम आरोप फर्जी साबित हो रहे हैं) के गुप्तांगों में पत्थर भर दें (मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो चुका है) और ऐसी बहादुरी के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी को राश्ट्रपति के ‘वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाये? राजीव रंजन जी, लिंगा कोड़ोपी की पत्रकारिता को आपकी पत्रकारिता की तरह भाजपा सरकार ने सामान्य दृश्टि से न देखकर ‘खतरनाक’ क्यों माना और नक्सली करार दे दिया? हिमांशु कुमार के दंतेवाड़ा के आश्रम को गैर कानूनी रुप से ध्वस्त करने का अधिकार भाजपा सरकार को किस संविधान ने दिया था? असलियत यही है कि आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन नक्सली भी कर रहे हैं और भाजपा सरकार भी। 

लेकिन आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन कोई आज की बात नहीं है। मध्यप्रदेष में कांग्रेस राज में भी यही सब हो रहा था। कांकेर के आमाबेड़ा थाने में मेहतरराम नामक आदिवासी को नक्सली कहकर मार दिया गया। अंतागढ़ थाने में मोहन गोंड नामक आदिवासी को नक्सली वर्दी पहनाकर फोटो खींची गयी और कांकेर थाने में कई दिनों तक उसे बंधक बनाकर रखा गया। केशकाल के पास धनोरा थाने में एक आदिवासी अविवाहित युवती को नक्सली कहकर कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया, उसके साथ बलात्कार किया गया और हाथ पैरों में जंजीर बांधकर ‘नक्सलियों को पहचानने’ के लिए बाजार में घुमवाया गया। ये सब इस गरीब बस्तर के गरीब आदिवासियों की ‘सत्यकथायें’ हैं। ये नक्सली थे कि नहीं, यह तय करने काम अदालतों की जगह पुलिस को किसने दिया?-- और यदि ये नक्सली थे भी, तो इनके मानवाधिकारों के हनन का अधिकार पुलिस और राज्य सरकार को किसने दे दिया था? ये सभी मामले माकपा नेता की हैसियत से मैंने स्वयं मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराये थे। मानवाधिकार आयोग ने इन मामलों की छानबीन का आदेश  भी दिया था। तत्कालीन एसडीएम संजीव बख्शी की अदालत में तमाम पीडि़तों और संबंधित गवाहों को मयशपथ पत्र मैंने पेश  किया था-- पुलिस द्वारा एनकाउंटर करने की धमकी की परवाह न करते हुए भी। लेकिन पूरा आयोग इसके बाद चुप बैठ गया। इतनी कसरत करवाने के बाद आयोग ने इन मामलों में फैसला देने की जहमत नहीं उठायी। आयोग की आलमारियों के किसी अंधेरे कोने में पड़े ये दस्तावेज आज भी सड़ रहे होंगे। पार्टनर, आपकी पहुंच तो काफी है- थोड़ा इन दस्तावेजों को सामने लाने की उठा-पटक करोगे? थोड़ा पता करोगे कि मानवाधिकार आयोग के अधिकारों का हनन करने में किसकी दिलचस्पी थी? थोड़ा पता करोगे कि बस्तर के तत्कालीन कमिष्नर सुदीप बैनर्जी ने नक्सलवाद से निपटने के लिए जो रिपोर्ट मध्यप्रदेश सरकार को दी थी और जिसे विधानसभा के पटल पर रखा गया था, उस सार्वजनिक रिपोर्ट का क्या हुआ? ‘सूचना का अधिकार’ के तहत मांगने पर सरकार ने उसे गुप्त (?) दस्तावेज बताते हुए मुझे देने से इंकार कर दिया है। इसे हासिल करने में आप मेरी मदद करोगे? 

तो राजीव जी, माकपा-भाकपा पर सरकार और दोनों पार्टियों के हमलों की तुलना भाजपा राज में कांग्रेस पर दमन से न करें। कांग्रेस ने यदि सशक्त विपक्ष की भूमिका निभायी होती, तो आज वह सत्ता से दूर नहीं रहती और यदि उस पर वर्गीय दमन होता, तो वह इतनी सीटें नहीं ले पाती। सत्ता पर कब्जा किसका रहे और मलाई का हिस्सा ज्यादा किसको मिले, इसे तय करने के लिए दमन-दमन का खेल खेला जाता है। मत भूलिये कि जोगीराज में भाजपा भी ऐसे ही कांग्रेसी दमन का शिकार होती थी। लेकिन रात के अंधेरे में हम-प्याले, हम-निवाले। 

वामपंथ की कमजोरी यही है कि अपनी सही वैकल्पिक राजनीति को आम जनता के बीच स्थापित नहीं कर पायी। इस दिषा में उसे एक लंबा रास्ता तय करना है इस विकल्प के अभाव में कांग्रेस-भाजपा के बीच ही धु्रवीकरण बना हुआ है। नीतिगत रुप से दोनों पार्टियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यही कारण है कि दोनों पार्टियों के बीच वोटों का प्रतिषत अंतर सिमटकर 0.77 प्रतिशत  रह गया है। पिछले बार यह पौने दो प्रतिशत से अधिक था। यदि भाजपा की नीतियां छत्तीसगढ़ की गरीब जनता के जीवन को सकारात्मक रुप से प्रभावित करती, तो यह अंतर बढ़ता--लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नोटा के रुप में तीन प्रतिशत  से अधिक-- 4 लाख से ऊपर-- मतदाताओं ने निर्णायक रुप से दोनों ही पार्टियों को ठुकराया है। यदि इनके पास तीसरे विकल्प के रुप में वामपंथी-जनवादी विकल्प होता, तो न भाजपा को सत्ता मिलती, न कांग्रेस को बहुमत।

चुनाव में वामपंथ के पास लाल झंडा था, तो उसने अपना झंडा लहराया-- ठीक वैसे ही जैसे भाजपा ने भगवा और कांग्रेस ने बहुरंगा झंडा लहराया। लेकिन वामपंथ के पास वैकल्पिक नीतियां थीं-- अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी। उसने कांग्रेस-भाजपा की कथनी-करनी और लफ्फाजियों को पर्दाफाष भी किया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, रोजगार गांरटी, वनाधिकार कानून, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, महंगाई, बेरोजगार, भ्रश्टाचार, प्रदेष का पिछड़ापन.........सभी मुद्दों पर वामंपथ ने आम जनता के बीच अपनी बातों को रखने का प्रयास किया। अवश्य ही साधन सीमित थे। चुनाव आयोग द्वारा गठित ‘गणमान्य’ व्यक्तियों की स्क्रीनिंग कमेटी ने आकाश वाणी और दूरदर्षन से प्रसारित होने वाले मेरे पार्टी संबोधन को दिशा -निर्देष और आचार संहिता के नाम पर मनमाने तरीके से कांट-छांट की कोशीश  की। भाजपा सरकार की तरह ही इन बेचारों का जिंदल प्रेम अपने पूरे उफान पर था। माकपा ने उनकी हर कोशीश को नाकाम करते हुए अपनी नीतिगत बातें रखीं प्रदेश  में प्राकृतिक संसाधनों की हो रही लूट के मामलों में माकपा ने हीं जिंदल को निषाने पर रखा-- कांग्रेस-भाजपाईयों की तो घिग्घी बंधी थी! वामपंथ ने अपना पूरा चुनाव प्रचार नीतियों पर केन्द्रित किया। 

लेकिन क्या कांग्रेस-भाजपा ने भी ऐसा ही किया? दोनों के पास केवल लोकलुभावन घोशणाएं हीं थीं। नीतियों पर तो उन्हें बहस से ही परहेज है। कांग्रेस के पास धान का समर्थन मूल्य 2 हजार रुपये क्ंिवटल देने तथा राषन दुकानों से मुफ्त अनाज देने का वादा था (क्या इसके लिए राज्य में कांग्रेस सरकार की जरूरत है?) , तो भाजपा के अपनी तथाकथित उपलब्धियों की भरमार। लेकिन वादों और उपलब्धियों के बावजूद सच्चाई क्या है? कांग्रेस के मौजूदा 35 विधायकों में से नेता प्रतिपक्ष सहित 27 हार गये। भाजपा के 5 धाकड़ मंत्री सहित विधानसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और 5 संसदीय सचिव तथा 18 विधायक हार गये। और ये इसके बावजूद हुआ है कि दोनों ही पार्टियों ने खुलकर षराब, मुर्गा, पैसा, साड़ी, कंबल का सहारा लिया। तो क्या आम जनता ने कांग्रेस-भाजपा की नीतियों व उनकी कथनी-करनी पर टिप्पणी नहीं की हैं? यदि इनकी उपलब्धियां और कथनी-करनी सकारात्मक होती, तो इन पार्टियों को लोकतंत्र को स्वाहा करने की जरूरत नहीं पड़ती। 

इसलिए चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है। आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने की टाटा की नीति के खिलाफ भाकपा ही आगे रही है, कांग्रेस नहीं। आदिवासियों के मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ वामपंथ ही लड़ाई लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। वनाधिकार कानून व रोजगार गारंटी कानून के क्रियान्वयन के लिए वामपंथ ही लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। यही कारण है कि भले ही वामपंथ अपने संघर्शों व प्रभावों को सीटों में बदलने में सफल न हो पा रहा हो, लेकिन वामपंथ की मारक शक्ति से इस देष की राजनीति में उसकी प्रभावषाली भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि अलेक्स पाल मेनन के अपहरण के मामले में मनीष कुंजाम मध्यस्थ के रुप में स्वीकार किये जाते हैं। वे सरकार और माओवादी दोनों के बीच मध्यस्थ थे और भाजपा सरकार ने ही उन्हें हेलिकाप्टर उपलब्ध करवाया था। लेकिन इस मामले से आदिवासियों पर मुकदमों की समीक्षा के लिए जो समिति गठित की गयी, उसका काम फिसड्डी साबित हुआ तो इसमें भाजपा सरकार दोशी नहीं है? निदोश आदिवासी आज भी जेलों में हैं। तो मानवाधिकारों का हनन कौन कर रहा है? असलियत तो यही है कि नक्सल समस्या को बढ़ाने में भाजपा सरकार का बड़ा हाथ है। यदि नक्सली नहीं रहेंगे, तो भाजपा कहां रहेगी? 

राजीव रंजन को वेब पोर्टल और फेसबुक पर कांग्रेस-भाजपा का प्रचार नहीं दिखता, लेकिन उन्हें यहां वामपंथ का ‘हवाई’ प्रचार जरूर दिख गया। वामपंथ को इस मीडिया पर आने के लिए क्या षर्मिंदा होना चाहिए? सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा राज की कृपा मीडियाकर्मियों पर भले ही न हुयी हो, लेकिन मीडिया माफिया पर यह कृपा जमकर बरस रही है। मीडिया में चाटुकार पत्रकारों की एक ऐसी फौज तैयार हो गयी है, जो सच्चाई लाने के बजाय सत्ता पक्ष की बगलगीर रहने में अपनी भलाई देखती है। सत्ता की पक्षधरता अपना प्रभाव बढ़ाने और सुविधायें जुटाने का साधन बन गयी है। सामान्य मीडियाकर्मियों को उचित वेतनमान भी नहीं मिलेगा। साईं रेड्डी की नक्सली हत्या करेंगे, तो कमल शुक्ल को सत्ता जनसुरक्षा कानून की धौंस दिखायेगी। राजीव रंजन जी, अपने मित्रों के लिए कुछ तो कीजिए।

तो पार्टनर, वामपंथ अपनी जमीन तलाषने की कोषिष कर रहा है, इस तलाष में उसकी राजनीति की दिषा स्पश्ट है। यदि आप वामपंथ को गरियाना चाहते हैं तो उसके लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन जब हम बहस कर रहे हैं, तो आपको यह जवाब तो देना ही होगा--‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’

---संजय पराते

मूल आलेख जिस पर केन्द्रित है बहस: 

बस्तर में वामपंथ की कोई जमीन है भी? 
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बस्तर पर सर्वाधिक चर्चा वामपंथी ही करते हैं। माओवाद की आलोचना करने पर सबसे तल्ख प्रतिवाद वामपंथियों से ही प्राप्त होता है। बस्तर क्षेत्र में इस बार हुए चुनाव यह तो स्पष्ट कर रहे हैं कि माओवाद अपनी जमीन खो चुका और अधिकाधिक मतदाताओं ने बाहर आ कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। अब उस वामपंथ पर बात की जाये जिसने बैलेट से अपना शक्तिप्रदर्शन किया है। चुनावों से पहले ही कोण्टा, दंतेवाडा और बीजापुर सीट पर वामपंथी उम्मीदवारों के विजय की भविष्य़वाणी अनेको अतिउत्साही वाम-विचारधारापरक पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों में की जा रही थीं। यह समझने के लिये मैने स्थानीय पत्रकार दोस्तों से लगातार यह जानने की कोशिश की कि विशेषरूप से दक्षिण बस्तर में वामपंथी दल किन मुद्दों के साथ बाहर आये हैं, उनकी घोषणायें क्या हैं, तथा चुनावस प्रचार में अपनी बात किस तरह रख रहे हैं। अधिकतर जानकारियाँ यही प्रतीत हुईं कि कोण्टा में मनीष कुंजाम अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे हैं लेकिन सभी जगह वामदल अपनी दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। 

चुनाव परिणाम वामदलों के दिवास्वप्नों पर कुठाराघात था। यह ठीक है कि पूरा चुनाव ही दो बडी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच का हो गया था लेकिन वामदल तो हमेशा ही अपनी उपस्थिति और प्रभाव का बस्तर में दावा करते रहे हैं। आज यह सवाल उठता ही है कि पिछले पाँच सालों में वाम दलों ने कितनी बार जमीनी मुद्दों को सडक तक लाने का श्रम किया? मनीष कुंजाम भी चार साल की गुमनामी बिता कर एकाएक चुनाव के समय सक्रिय हुए। यह बस्तर हो या दिल्ली जमीन पर अपनी ठोस उपस्थिति दिखाये बिना आप एक सीट पर भी अपनी जीत का दावा नहीं रख सकते। बस्तर वाम दलों ने खुल कर कभी वाम चरमपंथ का विरोध भी नहीं किया तथा स्पष्ट रूप से उनसे अपनी दूरी भी दिखाने मे वे नाकामयाब रहे हैं। जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण किया गया था तब मनीष कुंजाम का माओवादियों द्वारा नाम मध्यस्त के रूप में आगे किया जाना उनके खिलाफ ही गया लगता है। वामपंथी दल बस्तर की बारह में से नौं सीटों पर लडे और उन्हें तीसरे से ले कर दसवे स्थान तक की प्राप्ति हुई और वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं थे। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सडक पर भी अपनी ठोस उपस्थिति नहीं दर्ज कराई बल्कि उनके जमीनी प्रचार से अधिक हवाई प्रचार तो बेवपोर्टल और फेसबुक पर सक्रिय वामपंथी करते दिखे। 

तो बस्तर में जमीनी वामपंथ की क्या हैसियत है इसपर बात करने के लिये नतीजों पर एक दृष्टि डालते है। कोंटा में कवासी लकमा फिर एक बार अपनी सीट समुचित बहुमत से निकाल ले गये जबकि दूसरा स्थान भाजपा को मिला है। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे वामपंथी इस बार पुन: मनीष कुंजाम के नेतृत्व में थे किंतु तीसरे स्थान पर खिसक गये और हार भी लगभग आठ हजार मतो से हुई है। दंतेवाडा (12954) और चित्रकोट (11099) छोड कर वामदलों को अन्य सभी सीटों में गिनती के वोट ही हासिल हुए हैं। अधिकतम सीटों पर तो इस वैकल्पिक राजनीतिक दल से अधिक मत बस्तर के मतदाताओं नें “नोटा” को दिया है। वामदल एकता के साथ भी नहीं लडे यहाँ तक कि जगदलपुर में तो सीपीआई और सीपीआई (एम-एल) एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड रही थी और दोनो को मिलाकर भी गिनती के वोट (3321) मिले। वाम दलों को न्यूनतम 655 मत (जगदलपुर में शंभु प्रसाद सोनी) तो अधिकतम 19384 मत (कोण्टा में मनीष कुंजाम) को प्राप्त हुए जो इस दल की क्षेत्र में बेहद पतली हालत का प्रदर्शन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वामपंथ अब बस्तर में कोई जमीनी हैसियत नहीं रखता। 

-राजीव रंजन प्रसाद

Monday, November 29, 2010

अच्छा तो तुम वामपंथी नहीं हो? यानी कि दक्षिण पंथी हो? - राजीव रंजन प्रसाद



इस बात को साल भर से अधिक हो गया। मैंने बस्तर में जारी नक्सलवाद के खिलाफ किसी लेख में टिप्पणी की थी। उस दिन मेरे नाम को इंगित करते हुए एक पोस्ट “मोहल्ला” ब्लॉग पर डाली जिसका शीर्षक था – “बस्तर के हो तो क्या कुछ भी कहोगे?” और लिंक - http://mohalla.blogspot.com/2008/05/blog-post_24.html इस पोस्ट नें मुझे झकझोर दिया। मैं माओवाद को ले कर हो रहे प्रचार की ताकत जानता हूँ और चूंकि मेरा अपना घर जल रहा हैं इस लिये आतंकवाद और क्रांति जैसे शब्दों के मायने भी समझने लगा हूँ। मैंनें निश्चित किया कि बस्तर का एक और चेहरा है जो माओवाद और सलवाजुडुम की धाय धमक में कहीं छुप गया है। बस्तर की और भी तस्वीरें हैं जो लाल नहीं हैं और बस्तर वैसा तो हर्गिज नहीं जो अरुन्धति के आउटलुक से दिखाया गया। अपनी मातृभूमि बस्तर के लिये कहानियाँ, आलेख और संस्मरण लिखते हुए अचानक ही एक उपन्यास लिखने का विचार कौंधा। बस्तर के इतिहास और वर्तमान पर काम करने का फिर मुझमें जुनून सा सवार हुआ। मैंने केवल शोध के कार्य के लिये बस्तर भर की कई यात्रायें कीं और उन जगहों पर विशेष रूप से गया जहाँ जाना इन दिनों दुस्साहस कहा जाता है। यानि कि हम अपने ही घर, अपनी ही मिट्टी में निर्भीक नहीं घूम सकते?

मेरे बस्तर विषयक आलेख जब पत्र-पत्रिकाओं और ब्ळोग में प्रकाशित होने लगे तो मेरा दो तरह के स्वर से सामना हुआ। पहला स्वर जो मुझसे सहमत था और दूसरा जो असहमत। असहमति भी स्वाभाविक है, मैं उम्मीद नहीं कर सकता कि मेरी तरह ही सभी सोचें। सब एक तरह ही सोचते तो भी समाजवाद होता? लेकिन जो बात सबसे अधिक विचारणीय है वह है सोच की खेमेबाजी, सोच का रंग और सोच का झंडा। कोई तर्क करे तो समझ में आता है, कोई विचार रखे और उद्धरण दे तो भी समझ में आता है यहाँ तक कि किसी के अनुभव सामने आयें वह विरोधाभासी भी हों तो भी सोच को जमीन देते हैं। लेकिन “खास तरह के खेमेबाजों का” एक मजेदार विश्लेषण है – आप वामपंथी नहीं हो तो आप संघी हो या दक्षिणपंथी हो?

मैं बहुत सोचता हूँ कि आखिर क्या हूँ मैं? उम्र के पन्द्रह साल से ले कर लगभग सत्ताईस साल तक अपने नाम के आगे कामरेड सुनना अच्छा लगता था। इप्टा से जुड कर में नुक्कड भी किये, गली गली जनगीत भी गाये,  हल्ला भी बोला इतना ही नहीं उस दौर के लिखे हुए मेरे अनेकों नाटक लाल सुबह ही उगाते हैं जिनमें प्रमुख हैं – किसके हाँथ लगाम, खबरदार एक दिन, और सुबह हो गयी आदि आदि। किसके हाँथ लगाम की एक प्रस्तुति ‘भारत-भवन’ में तथा मेरे नाटकों की कई प्रस्तुतियाँ भोपाल के रवीन्द्र भवन में भी हुई हैं। तब की लिखी मेरी कहानियों के अंत में हमेशा ही लाल सुबह होती रही थी। लेकिन बहुत कुछ तब दरका जब तू चल मैं आया वाले प्रधानमंत्रियों का दौर आया और वामपंथी दलों की अवसरवादिता नें मेरे सिद्धांतों की कट्टरता को झकझोर दिया। धर्म को जनता की अफीम मानने वाले एक दिवंगत कामरेड की पहचान हमेशा उनकी पगडी से ही रही। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडने वाले कई छत्रप अपने बेटों के लिये लाल कालीन की जुगाड में ही दिखे। उनका श्रम भी रंग लाया और कुछ फैक्ट्री मालिक है तो कुछ सी.ई.ओ। मैं धीरे धीरे प्रायोजित विरोध और स्वाभाविक विरोध के अंतर को समझने लगा हूँ।

एसे ही एक दिन जब मैं अपने घर बचेली पहुँचा तो अपनी डायरी ले कर जंगल जाने लगा। जंगल में सिम्प्लेक्स नाले पर एक पत्थर मेरी टेबल-कुर्सी दसियों साल से ‘था’। यहाँ पानी में पैर डाले घंटों अपनी किताबों के साथ मैं समय गुजारा करता था। दसवी और बारहवी में अपने प्रिपरेशन लीव के दौरान भी मैं यहीं सारे सारे दिन बैठ कर पढा करता था। यहीं मैने कई वो कहानियाँ और नाटक भी लिखे जिनके अंत में मुक्के तन जाने के बाद धरती समतल हो गयी और एक सी धूप फैल गयी। इस बार जब मम्मी नें जंगल में उस ओर जाने से रोक दिया। कारण था नक्सलवाद। एसा प्रतीत हुआ जैसे किसी नें मुझे मेरे ही घर में घुसने से रोक दिया। उस दिन मैने गहरे सोचा कि एसा क्यों है कि मैं उदास हूँ? मुझे तो खुश होना चाहिये था कि वैसा ही हो रहा है जैसा मेरी कहानियों में होता था कि क्रांतिकारी बंदूख ले कर उग आये हैं और ढकेल कर लाल सवेरा के कर आने ही वाले हैं? मैंने अपनी कहानियों को टटोला लेकिन उनमें कहीं बारूदी सुरंग फाड कर सुकारू और हिडमाओं की ही लाशों के अनगिनत टुकडे किये जाने की कल्पना नहीं थी। मैंने जब भी क्रांतिकारी सोचे तो वो भगतसिंह थे। उनकी नैतिकता एसी थी कि असेम्बली में भी बम फेंके तो यह देख कर कि कोई आहत न हो लेकिन बात पहुँच जाये। बस्तर के इन जंगलों में जो धमाके रात दिन हो रहे हैं क्या ये बहरों को सुनाने के लिये हैं? नहीं ये अंधों की लगायी आग है और दावानल बन गयी हैं। ये सब कुछ जला देगी खेत-खलिहान भी, महुआ-सागवान भी, आदिम किसान भी।              
                           
नहीं मैं लाल नहीं सोचता, हरा नहीं सोचता, भगवा नहीं सोचता, नीला पीला या काला कुछ नहीं सोचता। मेरी सोच को मेरी लिये बख्श दो भाई। चूल्हे में जायें सारे झंडे और सारे नारे। तुम उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, साम, दाम, वाम जो भी हो मुझे ये गालिया न दो। मैने बहुत सी कहानिया जला दी हैं बहुत से नाटक अलमारी में दफन कर दिये हैं और अब मैं वही लिखता हूँ जो मैं खुद सोचता हूँ अपने बस्तर के लिये।