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Saturday, November 16, 2013

बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है


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बस्तर में विधानसभा चुनावों के सम्पन्न होते ही गहरी गहरी स्वांसों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। सुरक्षाबलों के अपना एक सिपाही श्री पी. डी. जोसेफ़ को खोया तो कुछ ग्रामीण भी घायल हुए किंतु यह सब वर्ष 2008 में इस क्षेत्र में हुए मतदान के समय हुई नक्सली हिंसा जिसमे बयालिस से अधिक शहादत दर्ज हुई थी, उसके समकक्ष राहत भरी खबर बन कर आया है। क्षेत्र में चुनाव विश्लेषणों का समय अब उबर गया है तथा नारे और झंडे अब उत्तरी छत्तीसगढ की ओर केन्द्रित होने लगे हैं। अब गहरी खामोशी है, सुरक्षा बलों के मतदान केन्द्रों के छोडते ही कुछ खम्बे नोचे गये और दिन भर कई बम विस्फोट तो कई विस्फोटक बरामद होने की खबरें आती रहीं। इस बीच बस्तर के भीतर बैलेट और बुलेट की जय पराजय पर चर्चायें होने लगी हैं। यह चर्चा न केवल बस्तर अपितु दिल्ली से भी जारी है चूंकि विचारधारा की युद्धभूमि होने के कारण व्यापक दृष्टि से यहाँ हुए चुनावों के प्रत्येक कदम की विवेचना हुई और यह जानने की कोशिश की जाती रही कि क्या वास्तव में बैलेट से बुलेट पराजित हुआ है?

इस दृष्टिकोण को समझने से पहले इस बार चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका की सराहना करनी आवश्यक है। भारी मात्रा में सुरक्षाबल की तैनाती और सभी प्राप्त जानकारियों के अनुरूप समुचित निर्णय ले कर इन चुनावों को त्रासदी बनने से रोक दिया गया। यदि एसा न हुआ होता तो आज हम रक्तपात के अनुपात पर विमर्श कर रहे होते, मृतक अवशेषों पर मेनहीर गड़ रहे होते और यह मान लिया जाता कि समानांतर सरकार चलाने का दावा वास्तव में एक सच्चाई है। एसा नहीं था कि प्रयास नहीं हुए अथवा जंगल के भीतर से लोकतंत्र के इन महापर्व को धमाके सुनाये जाने की तैयारी नहीं थी। बीजापुर के अनेक क्षेत्रों से रह रह कर नक्सली फायरिंग तथा सुरक्षा बलों द्वारा उत्तर दिये जाने की सूचनायें आती रहीं, करकेली में जहाँ गोली चला कर नक्सली भाग निकले तो मंकेली बूथ पर उन्होने गोली चालन किया। बीजापुर चुनावी परिक्षेत्र के आवांपल्ली में दस किलोग्राम का एक शक्तिशाली बम भी बरामद किया गया था। दंतेवाड़ा में इससे भी भयावह तैयारियाँ थीं तथा पैंतीस और चालीस किलोग्राम के दो बम यहाँ भी बरामद हुए जबकि धानीरका बूथ के पास से दो टिफिन बम भी मौके पर नष्ट किये गये। यही नहीं बरसोल क्षेत्र में छ: आईडी बमो की बरामदगी हुई तो स्थान स्थान पर पोलिंग पार्टी पर नक्सली हमला होने की खबरे पूरे दिन आम थीं। कोण्टा विधानसभा क्षेत्र में हालात इतने खराब थे कि सुकमा के मुरतुण्डा बूथ पर जा रही पोलिंग पार्टी को ही वापस बुला लिया गया। कमोमेश यह स्थिति बस्तर में सभी सीटों पर देखी गयी थी। ओरछा मे दो बम जिन्दा बम मिले, नारायणपुर के आकाबेडा में पच्चीस किलोग्राम का बम बरामद हुआ था तो दरभा के कोलांग मतदान केन्द्र पर गोलीबारी हुई थी। कांकेर की भी यही स्थिति थी जहाँ दुर्गापल्ली के पास एक बम मिला तो पखाञुर मे शक्तिशाली बम विस्फोट के कारण बीएसएफ का एक जवान घायल हो गया, जिसे एयर-एम्बुलेंस से तत्काल ही अस्पताल पहुँचाया गया। ये सभी घटनायें सिद्ध करती हैं कि आतंकवाद ने अपनी ओर से तैयारियों में कोई कमी नही रखी थी। बस्तर समेत जिन अठारह सीटों के लिये छत्तीसगढ में मतदान हुआ वहाँ संवेदनशील मतदान केन्द्रों की संख्या 1517 थी जबकि लगभग इतनी ही अर्थात 1311 संख्या अतिसंवेदनशील मतदान केन्द्रों की थी। इन परिस्थितियों ने लोहा लेना कोई आसान कार्य नहीं था और इसे संभव कर दिखाने में लगी सभी संस्थाओं की सराहना इस लिये भी होनी चाहिये कि बुलेट को यदि योजनाबद्ध रूप से नहीं रोका जाता तो बैलेट की कभी जीत नहीं हो सकती थी। यहाँ जोडना चाहूंगा कि ये सभी तैयारियाँ केवल सुरक्षाबलों के विरुद्ध नहीं थी अपितु उस आम आम मतदाता पर सीधा हमला करने के लिये भी थीं जो अपने क्षेत्र में पसंद की सरकार चुनने के लिये प्रतिबद्ध हो कर साहस जुटा कर मतदान केन्द्रों तक पहुँचा था।       

भय और साहस के बीच संघर्ष की अनेक लोमहर्षक कथायें इस चुनाव में सामने आयीं। यह भी हुआ है कि दंतेवाड़ा, कोण्टा और बीजापुर के अनेक मतदान केन्द्रों में एक भी मतदाता नहीं पहुँचा जबकि इस बार प्रत्येक बूथ में 70-80 सुरक्षा कर्मी तैनात थे यहाँ तक कि हर बूथ में विभिन्न राज्यों से आयी महिला पुलिस कर्मी और कमाण्डों को भी ड्यूटी पर तैनात किया गया था। किंतु एसा भी हुआ है कि पैरों से लाचार मतदाता दोनों हाथों में जूते ठूसे कंटकाकीर्ण पगडंडियों पर घिसटता हुआ बूथ तक पहुँचा। एसे भी दृश्य है जहाँ चलने से लाचार बूढे की लाठी बन कर कोई बुढिया मतदान केन्द्र तक उसे ले आई थी। मतदाताओं को बूथों तक न पहुँचने देने के लिये नक्सलियों ने अनेक स्थानों पर सड़क काट दी तो कहीं नावों-डोंगियों को डुबो दिया था। ग्रामीण इस परिस्थिति से भी लडे और देखने में आया कि मुचनार के परिवर्तित मतदान केन्द्रों में उन्होंने अपनी व्यवस्था से छोटी डोंगियों से नदी पार की और मतदान किया। कई गाँवों के मतदाता चौबीस से अठाईस किलोमीटर पैदल चल कर वोट डालने पहुँचे जिसे अदम्य साहस संज्ञापित किया जाना चाहिये। बैलेट की जीत यदि हुई है तो इसी साहस के कारण संभव हुई है जहाँ आम आदिवासी ने यह बताया है कि उसकी आस्था तो अपनी व्यवस्था पर अब भी है और यदि यह तथ्य हमारे लोकतंत्र की बुनियादी समझ बन सके तो बस्तर ही बदल जाये।   

इन्ही परिस्थितियों के दृष्टिगत आखिरी समयों में अनेक मतदान केन्द्रों के बदले जाने को ले कर चुनाव आयोग की तीखी आलोचना भी देखी गयी। सुरक्षा कारणों से इसे सही भी माना जाये तो भी यदि आवश्यकता से अधिक दूर मतदान केंन्द्र होंगे, गाँवों से असहज दूरी और दुर्गम रास्तों से हो कर उन्हें वोट डालने के लिये बाध्य होना पडेगा तो निश्चित है कि औसत मतदान में गिरावट देखी जायेगी। नदी के उसपार के मतदाताओं को इसपार आने के लिये अपनी व्यवस्था से अगर नावों और अन्य संसाधनों का सहारा लेना पडा तो इन बदले गये बूथों पर मतदान होने का श्रेय ग्रामीणों के साहस को ही जाता है तथा इसके बदले जाने के विपक्ष में खडे तर्क मान्य प्रतीत होते हैं। इस सभी बातों को देखते हुए यदि छत्तीसगढ राज्य में पिछले दो चुनावों के साथ वर्तमान मतदान के प्रतिशत की एक विवेचना की जाये तो क्षेत्रवार जो चित्र उभरता है वह गहरा विमर्श मांगता है। 

इस बार हुए रिकॉर्ड मतदान के कारण यह माना जा रहा है कि चुनावों के नतीजे विविध होंगे जिसके कारण अटकलों का बाजार गर्म है। जगदलपुर, कांकेर, कोण्डागाँव, केशकाल चित्रकोट, नारायणपुर तथा दंतेवाडा में जहाँ पिछले चुनावों के मुकाबले बढत देखी गयी किंतु 2003 के आंकडों को भी सामने रखा जाये तो इन सभी सीटों में उतार चढाव भरा मतदान होने की परम्परा रही है साथ ही साथ भानुप्रतापपुर तथा नारायणपुर जैसी सीटों में यथास्थितिवाद दृष्टिगोचर हो रहा है। नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर में दंतेवाडा के आंकडे चौंकाने वाले हैं यहाँ 67% मतदान का होना कई तथ्य को विवेच्य बनाता है। महेन्द्र कर्मा के निधन को एक कारण मान कर यदि हालिया घटनाओं के देखा जाये तो नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार की अपील के पश्चात दंतेवाडा के कमलनार में पंद्रह गावों के प्रतिनिधियों ने बैठक की और वोट डालने का निश्चय किया। इसके पश्चात हुआ भारी मात्रा में मतदान होना वस्तुत: क्या सिद्ध करता है इसके लिये तो चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करनी ही होगी। तथापि कोण्टा और बीजापुर में मतदान का प्रतिशत गिरा है। कोण्टा में 2008 के मुकाबले 12% के लगभग मत प्रतिशत में कमी आना तथा 2003 के स्तर से भी इसका नीचे चला जाना क्या यह इशारा करता है कि यहाँ नक्सली धमकी का खासा असर देखा गया है। बीजापुर सीट में भी रिकॉर्ड गिरावट के साथ केवल 24% मतदान हुआ जबकि यह 2008 में 37% एवं 2003 में 29% रहा है। अंतागढ में भी गिरावट दर्ज की गयी है किंतु 58% मतदान होना संतोषप्रद ही कहा जायेगा।   

 यह इस दिशा की ओर भी इशारा करता है कि दक्षिण बस्तर से केवल वे वोटर ही बाहर निकले हैं जो किसी न किसी पार्टी का निर्धारित वोट बैंक हैं। क्या दक्षिण बस्तर मे कम मतदान का होना कोण्टा और बीजापुर में वाम संभावनाओं को क्षीण करता है यह भी देखना होगा। वाम अतिवाद ने यहाँ वाम दलों की जमीनी लडाईयों को कमजोर ही किया है तथा मनीष कुंजाम जैसे नेता अपनी “फेस वेल्यु” के कारण ही मुख्य पार्टियों को टक्कर दे पाते हैं। 

आंकडे चाहे जो कहते हों किंतु यह कहना होगा कि इस बार सारे चुनावी पंडित मौन हैं तथा यकीनी तौर पर कोई नहीं कह सकता है कि बस्तर की बारह सीटो पर किस राजनीतिक दल का पक्ष बंधा हुआ है। जो भी बातें सामने आ रही हैं वे केवल अनुमान भर हैं। चुनाव आयोग ने बहुत अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निर्वहन किया है और एक भयानक खून-खराबा भरा दिन देखने से हम बच गये हैं। आम मतदाताओं ने चुनाव के महति पर्व को अपने साहस के सफल बनाया है तथा भारी मात्रा में बस्तरियों ने लोकतंत्र के प्रति आस्था जताई है। ये चुनाव लाल-आतंकवाद के सूत्रधारों को बैठ कर सोचने के लिये भी बाध्य करेगा कि क्या बाहरी दहशत के भीतर उनकी जमीन पतली तो नहीं होती जा रही? चुनाव आयोग ने व्यवस्था को भी एक मार्ग दिखाया है कि समुचित इच्छाशक्ति के दम पर नक्सलवाद से निर्णायक लडाई लडी जा सकती है। बस्तर में सम्पन्न हुए इस सुनाव का उपसंहार यही है कि बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है।  

-राजीव रंजन प्रसाद
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Saturday, November 09, 2013

बस्तर - जहाँ गिरवी है लोकतंत्र

[बस्तर में विधान सभा चुनाव-2013 पर विशेष आलेख]  

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यहाँ लोकतंत्र गिरवी है। सन्नाटे चुनाव प्रचार कर रहे हैं और दहशत ही प्रत्याशी है। कहने को तो सभी राजनीतिक दलों ने अपने अपने उम्मीदवार उतारे हैं जिनके भाग्य का फैसला अंतत: यह तय करेगा कि राज्य में ऊँट किस करवट बैठने वाला है। इसमे कोई संदेह नहीं कि छत्तीसगढ राज्य बनने के पश्चात हुए पिछले दो चुनावों में बस्तर की लगभग सभी सीटों पर कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही हैं तथापि कम्युनिष्ट पार्टियों, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी की भी उल्लेखनीय उपस्थिति इन चुनावों मे देखी गयी है। यह बड़ा सवाल है कि नवम्बर-2013 के आगामी विधानसभा चुनावों में बस्तर की बारह सीटों में कैसे समीकरण होने जा रहे हैं?

दक्षिण बस्तर इस समय भयावह स्थितियों से गुजर रहा है। जिन भी प्रत्याशियों की स्थिति का आंकलन करने की कोशिश होती है वहाँ से अंदरूनी इलाको में जा कर अपनी बात न रख पाने की चिंता प्राथमिकता से उजागर होती है। प्रत्याशी और उनके समर्थक केवल उन स्थानो तक ही पहुँच रहे हैं जहाँ उन्हें जीवन सुरक्षित जान पडता है। जितनी राजनैतिक पोस्टरों की संख्या है उतनी ही तादाद में लाल बैनर भी उन क्षेत्रों का सीमांकन कर रहे हैं जहाँ माओवादियों की घोषित उपस्थिति है। वस्तुत: विकास यात्रा और परिवर्तन यात्रा के साथ ही बस्तर में चुनावी बिगुल फूंक दिया गया था और माओवादी पक्ष ने अपनी मजबूत उपस्थिति झीरमघाटी की घटना को अंजाम दे कर सिद्ध कर दी थी। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए हमले को महज एक आतंकवादी वारदात कह कर नजरंदाज नही किया जा सकता क्योंकि उसके स्पष्ट राजनैतिक मायने हैं और घटना के बाद हुई खींचतान का भी वर्तमान चुनावों पर निश्चित ही असर पडने वाला है। वस्तुत: राजनीति भांति भांति के गणित पर आधारित होती है।

उदाहरण के लिये वर्ष-2008 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अनेक नये चेहरों को टिकट दिया था और उसके सकारात्मक परिणाम उन्हे प्राप्त भी हुए थे; इस बार यही फारम्यूला कॉग्रेस ने आजमाया है। एसा नहीं कि गणित बिलकुल सीधा है क्योंकि जिनका टिकट कटा वे कितना भितरघात करने की क्षमता रखते हैं यह गुणा-भाग भी घोषित प्रत्याशियों की जीत-हार तय करता है। भाजपा के लिये जहाँ लगातार दस साल तक सत्ता में काबिज रहने के कारण एंटी इनकम्बेंसी का प्रभाव भी परिणामों पर अपनी जगह बना सकता है वहीं अनेको पुराने चेहरों पर फिर से विश्वास दिखाने की उनकी नीति क्या सही सिद्ध होगी यह तो परिणाम ही तय कर सकते हैं।

जिन अवस्थाओं में चुनाव हो रहे हैं, वे जब लोकतंत्र की उपस्थिति पर ही प्रश्न खड़ा कर रहे हैं, एसे में एग्जिटपोल और ओपीनियन पोल की बहुत अधिक सार्थकता बस्तर के संदर्भ में दृष्टिगोचर नहीं होती। यहाँ हर सीट अपने आप में खास है तथा परिणामों पर - खडे होने वाले प्रत्याशियों की संख्या, वोटिंग प्रतिशत, पोलिंग बूथ की अवस्थिति, माओवादियों का क्षेत्र में प्रभाव आदि आदि बहुत मायने रखते हैं। राज्य बनने के पश्चात हुए दो चुनावों में डाले गये मतों के प्रतिशत के आधार पर यदि बस्तर की अलग अलग सीटों पर एक दृष्टि डाली जाये तो यह कहना होगा कि यहाँ क्षेत्रवार वोटिंग पैटर्न भी अपनी ही कहानी कहते हैं तथा उन्हें भी विजय की संभावनाओं का एक घटक मानना ही होगा। 

तालिका – 1: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणाम विश्लेषण वर्ष – 2003

यदि 2003 के चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि डाली जाये तो दक्षिण बस्तर पर कांग्रेस का कब्जा था। दंतेवाड़ा, कोण्टा तथा बीजापुर की सीटे उनके द्वारा जीती गयी थीं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भाजपा के मुकाबले मतों के अंतर का प्रतिशत दंतेवाडा (16.84%) तथा कोण्टा (34.74%) में बहुत बडा था जबकि बीजापुर में भी कॉग्रेस 8.49% मतो के अच्छे अंतर से विजयी रही थी। दंतेवाड़ा तथा कोण्टा में भाजपा तीसरे नम्बर पर रही थी जबकि यहाँ कम्युनिष्ट पार्टियों ने कॉग्रेस को ठीक ठाक टक्कर देते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। इसके ठीक उलट मध्य एवं उत्तर बस्तर में भारतीय जनता पार्टी ने जो जीत हासिल की वहाँ भी उसने एक बडे अंतर से कॉग्रेस को शिकस्त दी थी जिसमे कि सबसे सबसे उल्लेखनीय हैं – केशलूर (30.86%),  जगदलपुर (28.36%) तथा कांकेर (28.34%)। भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक संघर्ष के साथ इस चुनाव में भानुप्रतापपुर की सीट हासिल हुई थी जहाँ दोनो प्रमुख पार्टियों के बीच जीत का अंतर केवल 1.33% था। इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से एनसीपी का प्रदर्शन माकपा/भाकपा  के समकक्ष रहा था व चार विधानसभा सीटों पर उसने तीसरा स्थान प्राप्त किया था। इस चुनाव में बहुजन समाजपार्टी का विशेष प्रभाव तो नहीं देखा गया किंतु उसने अपनी मामूली उपस्थिति जगदलपुर (2.40%), चित्रकोट(3.21%), भानपुरी (3.21%) तथा केशलूर (2.99%) क्षेत्रों में दर्ज करायी थी।

तालिका – 2: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणाम विश्लेषण - वर्ष 2008 

वे परिस्थितियाँ क्या रहीं कि वर्ष-2008 के विचारसभा चुनाव में दक्षिण बस्तर में भी कॉग्रेस कोण्टा को छोड कर कोई भी सीट नहीं बचा सकी। कोण्टा की सीट को भी कांटे की टक्कर ही कहना होगा चूंकि यह पूरी तरह से त्रिकोणीय मुकाबला सिद्ध हुआ जिसमे आश्चर्यजनक रूप से भाजपा को दूसरा (31.12%) तथा माकपा को तीसरा (30.12%) स्थान हासिल हुआ जबकि केवल 0.28% मतो की बढत के साथ कॉग्रेस के कवासी लकमा ने पहला (31.40%) स्थान प्राप्त किया था। इसी तरह दंतेवाडा का मुकाबला यद्यपि भाजपा ने बडे अंतर (12.99%) से जीता तथापि भाकपा ने दूसरा स्थान प्राप्त किया था। दंतेवाडा सीट पर शिवसेना की उपस्थिति भी 6.14% वोटो के साथ महत्वपूर्ण थी। निर्दलीय प्रत्याशियों का भी शानदार संघर्ष इस चुनाव की विशेषता थी;  कांकेर से निर्दलीय प्रत्याशी चन्द्रप्रकाश ठाकुर ने 10.52% वोट हासिल किये थे जबकि भानुप्रतापपुर से निर्दलीय प्रत्याशी मनोज मंडावी को 24.07 प्रतिशत वोट मिले थे और उन्होंने क्षेत्र में कॉग्रेस को तीसरे नम्बर की पार्टी बना दिया था। मुख्य मुकाबले से एक कदम पीछे चलते हैं और बस्तर मे तीसरे प्रमुख दल अर्थात वामदलों के चुनावी प्रदर्शन तथा संभावनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं।

चित्र -1: वामदलों का वर्ष 2003 के चुनावों में प्रदर्शन

वर्ष 2003 के चुनावों में कोण्टा और दंतेवाड़ा को छोड कर शेष सभी सीटों पर वालदल लगभग अनुपस्थित रहे अर्थात उन्हें 15% मत भी प्राप्त नहीं हुए थे।  कांकेर एवं कोण्डागांव में वामदलों का खाता भी नहीं खुला था।   

चित्र -2: वामदलों का वर्ष 2008 के चुनावों में प्रदर्शन

वामदलो की हालत को वर्ष 2008 के चुनाव और भी पतला कर देते हैं जहाँ कि वे अधिकतम सीटों पर 5% से भी कम वोट शेयर के साथ दिखाई पडते हैं तो अंतागढ, केशकाल, भानुप्रतापपुर और कोण्डागाँव में पूरी तरह अनुपस्थित हो जाते हैं। संभवत: अपनी इस दयनीय हालत की भरपाई उन्होंने दक्षिण बस्तर में अपना वोटशेयर बढा कर की थी जो कि लगभग 25 से 30% तक उनके हिस्से में गया था। इस तरह वे कोई सीट भले ही न निकाल पाये हों किंतु यह सिद्ध करने में कामयाब रहे थे कि इस बार भी दक्षिण बस्तर में चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय ही होगा। 

उपरोक्त विवेचना को सही सिद्ध करते हुए कोण्टा विधानसभा सीट में त्रिकोणीय मुकाबला स्पष्ट्त: देखा जा रहा है। कम्युनिष्ट पार्टी के उम्मीदवार मनीष कुंजाम इस बार अच्छी स्थिति में नजर आ रहे हैं किंतु कवासी लकमा को और दरभाघाटी के कारण कांग्रेस के पक्ष में जाती संवेदनाओं को भी कमतर नहीं समझा जा सकता। इस सीट पर सीधी रेस है और देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोण्टा सीट जीत कर इस बार वामदल अपना खाता खोल पाते हैं? दक्षिण बस्तर की दंतेवाड़ा सीट पर मुकाबला कॉग्रेस और भाजपा के बीच अधिक नज़र आता है। बैलाडिला में मजदूर संगठनों में कई फाड हो गये हैं; अब ये मजदूर संगठन वाम राजनीति को सीधे प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रह गये हैं। महेन्द्र कर्मा इस बार दंतेवाड़ा सीट से मजबूत नजर आ रहे थे किंतु माओवादियों द्वारा उनकी हत्या के पश्चात इस क्षेत्र में उभरी सहानुभूति क्या कॉंग्रेस को यह सीट दिला पायेगी, यह देखना दिलचस्प होगा? बीजापुर से महेश गागडा भरतीय जनता पार्टी के युवा प्रत्याशी हैं जिसपर पार्टी द्वारा पुन: भरोसा जताया गया है। बीजापुर में मतदान हमेशा से एक चुनौती रहा है पिछले दोनो चुनावों में यह क्रमश: 37.07% तथा 29.20% ही रहा है। एसी स्थिति में मतदान का कम होना अथवा अधिक होना भी प्रत्याशियों की सांस उपर-नीचे करता रहेगा। कॉग्रेस के उम्मीदवार विक्रम मण्डावी पिछले चुनाव के 24.11% के मत अंतर को काटने के लिये श्रम करते दिखाई पड रहे हैं किंतु यहाँ उनकी ही पार्टी के एक अन्य असंतुष्ट टिकिटार्थी द्वारा भितरघात की बाते भी कही जा रही हैं। 

चित्रकोट, जगदलपुर, बस्तर तीनो ही मध्य बस्तर के विधानसभा क्षेत्रों में इस बार भी द्विपक्षीय मुकाबले की ही संभावना है। चित्रकोट से भाजपा के उम्मीदवार बैदूराम कश्यप चुनाव के मुकाबले कॉग्रेस के प्रत्याशी दीपक वैज एक नया चेहरा हैं जिनका प्रयोग संभवत: मौजूदा विधायक के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी की भावना को वोटो में तब्दील करने के लिये किया गया है। चित्रकोट विधानसभा में माकपा की भी सशक्त उपस्थिति है (18.51%), जिसे कोई भी राजनैतिक दल हल्के में नहीं ले सकता। जगदलपुर में कॉग्रेस ने सामान्य विचानसभा सीट होने के बाद भी आदिवासी कार्ड खेलने का यत्न किया है। यहाँ से कॉग्रेस के शामू कश्यप भाजपा के मौजूदा विधायक संतोष बाफना के खिलाफ लड रहे हैं। बीजापुर से टिकट न मिलने से नाराज भाजपा के नेता राजाराम तोडेम ने पार्टी छोड कर स्वाभिमान मंच से लडना निश्चित किया है। यह एक तरह का भितरघात है जो संतोष बाफना के खिलाफ जा सकता है। यदि पिछले चुनाव में भाजपा की जीत का अंतर देखा जाये तो यह 15.32% थी जिसे पाटना कॉग्रेस के लिये वास्तविक चुनौती है। जगदलपुर तथा मध्य बस्तर की अन्य सीटों से प्रत्याशी बडी मात्रा में खडे होते हैं तथा उनके द्वारा वोटों का बटवारा भी सीधे जीत-हार के गणित को प्रभावित करता है। बस्तर सीट की बात करें तो यहाँ पिछले चुनावों में डॉ. सुबाहू कश्यप (भाजपा) और लखेश्वर बघेल (कॉग्रेस) के बीच हारजीत केवल 1.23% वोटो के अंतर से तय हुई थी। मध्य बस्तर चुनाव के लिहाज से अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र है अत: प्रत्याशियों की हलचल और चुनाव के दंगल का नज़ारा यहाँ बखूबी देखा जा सकता है; शहरी और मैदानी क्षेत्रों के लिये चुनाव वैसे भी उत्सव ही बन जाते हैं।  

उत्तर बस्तर की ओर आते ही स्थितियाँ पुन: संघर्ष की जान पडती हैं। नारायणपुर सीट पर केदार कश्यप मजबूत प्रत्याशी हैं। प्रतिद्वंद्वी से पिछले चुनावी नतीजों में 24.47% वोट अंतर के कारण नारायणपुर सीट भाजपा के पक्ष में जाती प्रतीत होती है। यह स्थिति अंतागढ में उलट जाती है; विक्रम उसेंडी को अपनी ही पार्टी से अलग हुए भोजराक नाग का न केवल विरोध झेलना है जो उनके वोट काट सकते हैं अपितु कॉग्रेस के उम्मीदवार मंगतूराम पवार भी एक मजबूत प्रत्याशी हैं। इस क्षेत्र में खास कर पखांजूर और आसपास, दण्डकारण्य परियोजना के तहत विस्थापित हो कर आये बंगाली शरणार्थियों (नामशूदों) का वर्चस्व है। इन शरणार्थियों की बडी तादाद संगठित हो कर वोट देती है और उन्होंने प्रमुखता से स्वयं को अनुसूचित जाति में सम्मिलित किये जाने की माँग उठाई हुई है। यह देखना होगा कि किस प्रत्याशी का आश्वासन से विस्थापित बंगाली समाज लपक लेता है और उसकी जीत में अपनी भूमिका निभाता है। अंतागढ में 2008 के चुनावों में भाजपा की जीत का अंतर केवल 0.03% था अर्थात केवल 109 वोट से विक्रम उसेंडी जीत हासिल कर सके थे अत: यह दिलचस्प सीट सिद्ध होने जा रही है। केशकाल विधानसभा सीट में निर्दलीय उम्मीदवार ही यदि त्रिपक्षीय मुकाबला खडा कर सकें तभी चुनाव रोचक होगा अन्यथा तो भाजपा के सेवकराम नेताम और कॉग्रेस से संतराम नेताम आमने सामने भिडने वाले हैं। पिछले चुनाव में जीत का अंतर दोंनो प्रमुख पार्टियों के बीच महज 7.73% था जो सुरक्षित दूरी किसी लिहाज से नहीं है। यही स्थिति कमोबेश कोण्डागाँव में भी है जहाँ वर्तमान में भाजपा की विधायक लता उसेंडी चुनाव लड रही हैं। केवल 2.62% मतो के अंतर से भाजपा ने पिछले चुनाव में कोण्डागाँव सीट पर जीत दर्ज की थी। यहाँ कॉग्रेस की अंदरूनी लडाई के कारण उनके लिये अंगूर खट्टे भी हो सकते हैं। मोहन मरकाम को फिर से कॉग्रेसी उम्मीदवार बनाने से नाराज शंकर सोढी (भूतपूर्व सांसद मानकू राम सोढी के बेटे) के निर्दलीय लडने से त्रिपक्षीय समीकरण बनने लगे हैं। यद्यपि शंकर सोढी 2008 में भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में केशकाल से लडे थे और उन्हें केवल 4627 (4.36%) मत ही प्राप्त हुए थे। कांकेर विधानसभा सीट पर भाजपा ने वर्तमान विधायक की टिकट काट दी है तथा नये उम्मीदवार के रूप में संजय कोडोपी को मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में भाजपा ने बडे अंतर (16.78%) से कॉग्रेस को हराया था अत: प्रश्न सामने हैं कि क्या कॉग्रेस के उमीदवार शंकर धुर्वा मतो की यह खाई पाट सकते हैं? यह ध्यान देने योग्य बात है कि तीसरा पक्ष वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में लगभग नगण्य था; यहाँ से 2.95% वोट कम्युनिष्ट दल के हिस्से तो महज 4.12% वोट बसपा के खाते में दर्ज हुए थे। बिलकुल कांकेर वाली स्थिति भानुप्रतापपुर की भी है जहाँ मौजूदा विधायक का टिकट काट कर भाजपा ने रुक्मिणी ठाकुर को मैदान में उतारा है। कॉग्रेस के प्रत्याशी मनोज मण्डावी को पिछले चुनावों के 15.83% मतों के अंतर से जूझना होगा।

चित्र -3: चुनावों में जीत का अंतर (प्रतिशत में)


चुनावी गणित में मतो के अंतर अवश्य मायने रखते हैं किंतु मतदान कितना हुआ इस पर सभी राजनीतिक दलों की निगाह रहती है। सुरक्षा कारणों से निर्वाचन आयोग ने अनेक मतदान केन्द्रों को अस्थाई रूप से स्थानांतरित कर दिया है। उदाहरण के लिये अंतागढ के सोलह मतदान केन्द्रों को दूसरे स्थानों पर ले जाया गया है। इस कदम के अपने पक्ष-विपक्ष हैं तथा यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जिन गावों में नक्सली भय से लोग मतदान के लिये बाहर ही नहीं आते वे नये बूथों तक पहुँचेंगे? जिन बूथों से गावों की दूरी कई किलोमीटर बढ गयी है क्या वह मतदान प्रतिशत में गिरावट का एक कारण नहीं सिद्ध होगी? कई पत्रकार मित्रों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चुनाव की स्थिति को ले कर अपने अनुभव मुझसे साझा किये हैं। जो बात बाहर निकल कर आयी है वह सु:खद आश्चर्य पैदा करती है चूंकि आदिवासी मतदान में भाग लेना चाहते हैं। कई ग्रामीणों ने खुल कर कहा कि वे अगर वोट नहीं डालेंगे तो सडक, बिजली पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर उनका हक समाप्त हो जायेगा। वस्तुत: सबसे बडा लोकतंत्र विवश है चूंकि आज भी एसे तंत्र विकसित नहीं हो सके जिससे कि हर इच्छुक मतदाता अपनी राय जाहिर करने के लिये उपस्थित हो सके भले ही वह “इनमे से कोई नहीं” वाले बटन को चटखा कर चला आये। चुनावों को प्रभावित करने वाला एक बडा पक्ष है बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों से विस्थापन। सलवा जुडुम की समाप्ति के साथ ही हजारों विस्थापित आदिवासी परिवारों के साथ अपनी पुनर्स्थापना की दिक्कते आने लगीं। यह भी समझने योग्य बात है कि नक्सलवाद भी बडे पैमाने पर विस्थापन को जन्म देता है तथा परिवार के परिवार भय से अथवा मुखबिर करार दिये जाने के बाद अपनी जमीन छोड देने के लिये बाध्य हो जाते हैं। यह एक बडा आंकडा है जो मतदाताओं की सूची के बहुतायत उपस्थित नामों को केन्द्रों से गायब पाता है। हमारे चुनाव विश्लेषण इन विस्थापितों के महत्व को हमेशा ही नजरंदाज कर देते हैं। एक सही चुनाव के लिये वास्तविक मतदाता और सही मतप्रतिशत की आवश्यकता है अन्यथा विजय खोखली ही है। प्रस्तुत आंकडे बस्तर के चुनाव की जो भी दिशा-दशा बताते हों इनमे विस्तापित आदिवासी अनुपस्थित हैं। यही कारण है कि इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता कि क्या हमारे चुनाव वास्तविक लोकतंत्र के प्रतिनिधि हैं? 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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