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Sunday, June 15, 2014

भोपालपट्टनम के विरासतों की नियति है नष्ट होना


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भोपालपट्टनम के विरासतों की नियति है नष्ट होना।
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भोपालपट्टनम का यह चहलपहल वाला क्षेत्र है। राजमहल बतायी गयी इमारत के सामने खडा हो कर लगा कि दुनिया को उलट-पुलट हो जाना चाहिये। जब हमें अपनी पहचान से, अपने अतीत और विरासत से ही लगाव नहीं तो एक बार को ही सबकुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाये, न बांसतरी में बांस रहे न बांसुरी ही बजे....। इतिहास को इस निर्ममता से ध्वस्त होते देख कर यही मेरे आरम्भिक मनोभाव थे। माना कि मैं लालकिले के सामने नहीं खड़ा था और यह किसी राजा-महाराजा का दुर्ग या भवन भी नहीं। यह भी माना कि कभी एक वन्य राज्य रहे बस्तर के गोंड जमींदार का भवन महत्व के मानक पर कभी परखा भी नहीं जायेगा किंतु यह कैसे मान सकता हूँ कि आने वाली पीढी भी अपने अतीत को हमारी तरह महत्वहीन ही मान कर चलेगी? मुख्यद्वार से भीतर प्रवेश करते हुए यह अहसास हो चला था कि भोपालपट्टनम में रियासत काल की यह निशानी निश्चित ही अत्यधिक भव्य रही होगी। इस विरासत के कर्णधारों ने क्यों इसका संरक्षण करना उचित नहीं समझा यह कहना कठिन है लेकिन इसकी महत्ता पर चर्चा की ही जा सकती है। 

भोपालपट्टनम में समृद्ध नाग कालीन विरासतें सर्वत्र बिखरी हुई हैं किंतु यहाँ का विधिवत राजनैतिक इतिहास वर्ष 1324 से प्रारंभ होता है जब वारंगल (वर्तमान तेलंगाना का हिस्सा) से चालुक्य राजकुमार अन्नमदेव तुगलकों के आक्रमण से परास्त शरणागत की तरह गोदावरी और इन्द्रावती नदी के संगम स्थल की ओर से नाग शासकों की भूमि में प्रविष्ठ हुए। एक समय समृद्ध रहा चक्रकोट अब एक सशक्त केन्द्रीय शक्ति के अभाव में इतना कमजोर हो गया था कि केवल दो सौ सैनिकों के साथ इस वन्यप्रांतर में प्रवेश करने वाले अन्नमदेव ने नागों को निर्णायक रूप से परास्त कर बस्तर राज्य की स्थापना की। कथनाशय यह है कि आज जिस भोपालपट्टनम का परिचय केवल और केवल लाल-आतंकवाद से निरूपित हो रहा है वस्तुत: यही भूमि उस राजैतिक व्यवस्था परिवर्तन की सूत्रधार रही है जिसके बाद स्थापित चालुक्य सत्ता का सम्पूर्ण बस्तर राज्य में वर्ष 1324 से वर्ष 1947 तक शासन रहा है। 

अन्नमदेव ने जब भोपालपट्टनम प्रवेश किया होगा तब यहाँ के भयावह जंगल तथा नागों से जुडे अनेक मिथकों को सुन कर उनकी क्या अवस्था हुई होगी इसे इस बात से समझा जा सकता है कि नाग शासकों के विरुद्ध अपना युद्धाभियान प्रारम्भ करने से पूर्व उन्होंने संगम स्थल पर शिवलिंग स्थापित कर विधिवत पूजा-अर्चना की और उसके बाद ही आगे का विजय अभियान आरम्भ हुआ। भोपालपट्टनम का नाग राजा कभी यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कोई गोदावरी की ओर से प्रवेश कर उसकी छोटी सी शासित परिधि में आक्रमण कर सकता है। अप्रत्याशित हमले से घबरा कर उसने भोपालपट्टनम रिक्त कर दिया और बिना लडे ही भाग खडा हुआ। यह अन्नमदेव के बस्तर विजय अभियान की पहली विजय थी जिसके लिये उन्हें रक्त की एक बूंद भी नहीं बहानी पडी। नागों की सत्ता का अंत होते ही बस्तर में सामंतवादी व्यवस्था की जडें भी गहरी हुईं तथा अन्नमदेव ने अपने विजित क्षेत्रों पर अनेक जमींदार नियुक्त किये। 

भोपालपट्टनम के पहले जमींदार थे नाहर सिंह पामभोई। यह कहा जाता है कि भोई वस्तुत: अन्नमदेव के पालकीचालक हुआ करते थे। वारंगल से भोपालपट्टनम तक के प्रयाण में भोई समुदाय ने अपने नायक अन्नमदेव की जी-जान से सहायता की। इनाम स्वरूप अपनी पहली ही जीत को अन्नमदेव ने भोई नायक नाहर सिंह पामभोई के नाम कर दिया और उन्हें जमींदार नियुक्त किया गया। भोई के पामभोई कहे जाने के पीछे भी एक रोचक कहानी है। यह जनश्रुति है कि जब अन्नमदेव गोदावरी नदी पार कर रहे थे तब अचानक हवा के तेज बबण्डर के साथ एक बडा सा अजगर प्रकट हुआ। भोई ने बडी ही बहादुरी से इस अजगर को मार दिया। यह मिथककथा भोपालपट्तनम के जमींदार के लिये गाये जाने वाले विरुद का एक अंश “गालिवीर पामभोई” से भी स्पष्ट होती है जहाँ गालि का अर्थ है हवा, वीर अर्थात साहसी, पाम का अर्थ है अजगर तथा भोई का मतलब है पालकीचालक। इस विरुद को कालांतर में बदल कर “कृष्णपामभोई” कर दिया गया था। ब्लण्ट तथा दि ब्रेट जैसे अंग्रेज विवेचनाकर्ताओं ने यहाँ के जमींदार को गोंड जाति का माना है। बस्तर के पहले इतिहासकार कहे जाने वाले केदारनाथ ठाकुर (1908) ने इन्हें भोई जाति का माना है। यह कहा जा सकता है कि गोंडों की ही उपशाखा भोई है। भोई चालुक्य शासन में कितने शक्तिशाली थे इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 1901 तक जगदलपुर के निकट तक के अनेक गाँवों के अधिपति भोई ही थे। 

भोपालपट्टनम के राजनैतिक इतिहास और उसकी महत्ता को समझने की कोशिश किये जाने की आवश्यकता है। यदि भोपालपट्टनम का संधिविच्छेद किया जाये तो भूपाल अर्थात राजा तथा पत्तनम अर्थात बंदरगाह। इसके अतिरिक्त यह भी माना जाता है कि भूपाल (राजा) के चरण सबसे पहले इसी क्षेत्र में पडे इसीलिये भोपालपट्टनम नाम पड गया। सत्यता जो भी हो किंतु रियासतकालीन बस्तर और वर्तमान बस्तर संभाग का हिस्सा भोपालपट्टनम अभी रहस्य की चादर ओढे हुए है। 

उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों की दृष्टि से भोपालपट्तनम को समझने की कोशिश की जाये तो जो जानकारियाँ सामने आती हैं उनके अनुसार “भोपालपट्टनम जमींदारी का कुल क्षेत्रफल 722 वर्गमील था जिसके अंतर्गत 139 गाँव थे जिसमे 14 जनशून्य थे। यहाँ की कुल जनसंख्या 9055 थी (दि ब्रेट, 1909)।” वर्ष 1918-19 में इस जमींदारी का अस्तित्व कोर्ट ऑफ वार्ड्स के आधीन था। वर्ष 1887 में हुए विद्रोह का तत्कालीन अंग्रेज शासकों के पक्ष में दमन करने में सहायता करने के कारण भोपालपट्टनम के जमींदार को मल्लमपल्ली परगना 1859 ई. मे उपहार स्वरूप दिया गया था। यद्यपि वर्ष 1908 में अंग्रेजों द्वारा प्रतिपादित नये नियम के तहत मल्लमपल्ली परगना पुन: अहीरी जमींदारी में मिला दिया गया किंतु भोपालपट्टम के जमींदार का वहाँ से भूमिकर (मालकानी) वसूलने का अधिकार बना रहा (केदारनाथ ठाकुर, 1908)। जमींदारी का मुख्यालय भोपालपट्टनम नगर था जहाँ वर्ष 1908 से पूर्व ही राजमहल, अस्पताल, स्कूल, पोस्टऑफिस, पुलिस कार्यालय, इन्जीनियर कार्यालय एवं तहसील कार्यालय बनाये गये थे। भोपालपट्टनम को सडक मार्ग से जगदलपुर से जोड दिया गया था (केदारनाथ ठाकुर, 1908)। वर्ष 1910 के विद्रोह (भूमकाल) के समय भोपालपट्तनम का जमींदार श्रीकृष्णा पामभोई था। अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें 1912 में जगदलपुर दशहरा दरबार में सम्मानित भी किया गया था। रिकॉर्ड बताते हैं कि जमींदार श्रीकृष्ण पामभोई के कारण जमींदारी मेनेजमेंट के तहत थी। उस दौरान 147 एकड बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित किया गया और 4300 रुपये तकाबी ऋण के रूप में किसानों मे वितरित किया गया (एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट 1954, अप्रकाशित)। वस्तुत: ब्रिटिश शासनकाल में भोपालपट्टनम जमींदारी नौ परगनों में विभक्त थी। इनमे से आठ माझी परगने थे और एक चालकी परगना था। भोपालपट्टनम जमींदारी का तीन चौथाई भाग जंगली और पहाड़ी था। यहाँ के जमींदार की आय का मुख्य स्त्रोत सागवान जैसी कीमती इमारती लकडिया एवं वनोपज ही थे। गोदावरी तथा इन्द्रावती नदी मार्ग से निर्यात किया जाता था। तीन नदियों (गोदावरी, इंद्रावती तथा चिंतावागु) एवं राज्यों की सीमा का संगम होने के कारण यह महत्वपूर्ण व्यापारिक एवं सामरिक महत्व का स्थल भी हुआ करता था। 

इतिहास बताता है कि अन्नमदेव ने अपने शासनकाल में बस्तर को एक रहस्यमय राज्य बना दिया था और इस तरह उसने लम्बे समय तक बाहरी राजनैतिक दखल से सुरक्षा बनाये रखी। अंग्रेज जासूस कैप्टन जे डी ब्लण्ट वर्ष 1795 में बस्तर सियासत के भीतर भोपालपट्टनम की ओर से घुसने की कोशिश मे था किंतु यहाँ के गोंड आदिवासियों ने अपने तीरों से उसके अनेक साथियो को घायल कर दिया और उसे गोदावरी के दूसरी ओर खदेड दिया था। भोपालपट्टनम में अंग्रेजों के विरुद्ध शौर्यगाथा लिखने में अनेक वीर आदिवासियों का योगदान रहा है जिसमें धुर्वाराव, यादोराव, वेंकुटराव तथा बाबूराव प्रमुख थे। यह सबकुछ अब भुला दिया गया है। 

भोपालपट्टनम नगर को यह सुध ही नहीं कि उनकी महानतम विरासत की निशानियाँ मटियामेट हो रही हैं। लम्बे समय तक रियासतकालीन राजनीति के केन्द्र मे रहा राजमहल भवन अभी पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है और यदि कोशिश की जाये तो इसे बचाया जा सकता है। भवन के भीतर के भवनों में कब्जा कर लिया गया है तथा पीछे अवस्थित मैदानों में भी लोग झोपडियाँ बना कर रहने लगे हैं। सामने की संरचना, भीतर का अहाता और उससे लग कर अनेक भवन अभी ठीक-ठाक अवस्था में हैं जबकि पिछली दीवारों पर बरगद का कब्जा है। अनेक बडे कमरे अब ईंटों का ढेर रह गये हैं। संभवत: समय की प्रतीक्षा की जा रही है जब अतीत का यह साक्ष्य धराशायी हो जाये। शायद इतिहास तो लालकिलों के ही होते हैं भोपालपट्टनम की इन विरासतों की नियति नष्ट होना ही है। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

Wednesday, October 23, 2013

शोभन सरकार, बिहारी दास और इतिहास

नये दौर की तिलिस्मी कहानियाँ अब प्रस्तुत हैं। एक बाबा सपना देखता है और इसके साथ ही सक्रिय राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगते हैं। वैज्ञानिक, इतिहासकार और सरकारी मशीनरी एक सपने के सच की खोज में जुट जाती है। बाबा बैठे बिठाये ग्लोबल हो गये हैं। चुनावी मौसम है इसलिये उन पर कदाचित सीधे हमले नहीं किये जा सकेंगे इसलिये वे ठसक में भी हैं और अपनी महत्वाकांक्षा की आड में आने वाले लोगों से निबट भी लेना चाहते हैं। वे अपनी आलोचना का जवाब विशुद्ध राजनैतिक चिठ्ठी से देते हैं जिसपर देश का मीडिया गरमागरम बहस भी करता है। यही नहीं इस पर भी चर्चा होने लगती है कि इस कथित सोने पर हक किसका होगा – राज्य का कि केन्द्र का? सपना देखने वाले बाबा किसी प्रखर समाजसेवी की तरह बयान देते हैं कि इस सोने से इलाके का विकास होना चाहिये। बडे वालों की तो छोडिये डोंडिया खेडा के प्रधान साहब तो बल्लियों उछलते हुए मांग करते हैं कि हमारे इलाके में हवाई पट्टी बननी चाहिये आखिर हमारी जमीन से सोना निकल रहा है। ‘घर में नहीं दाने और अम्मा चली भुनाने’ को चरितार्थ करते हुए अर्थव्यवस्था पर बात करने वाले चैनल इस सोने की कीमत का आंकलन करने लगे हैं और इससे यह गणना तक कर ली गयी कि प्रतिव्यक्ति कर्जे से हर हिन्दुस्तानी को कितनी राहत मिल सकती है, डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या स्थिति हो सकती है। 

यह तमाशा देख कर सवाल उठता है कि क्या सचमुच हम एक परिपक्व लोकतंत्र होने की दिशा में बढ रहे हैं? क्या इस प्रकरण में हम धर्म और राजनीति का विज्ञान की सीमेंट से गठजोड नहीं कर रहे? प्रकरण यह भी बता रहा है कि अपने इतिहास को ले कर हम कितने संजीदा हैं तथा उसे जानने की हमारी उत्कंठा कितनी है? महज बीस वर्ग किलोमीटर के दायरेवाली डौड़ियाखेड़ा रियासत में हजार टन सोना मिलने की आशा चमत्कार ही प्रतीत होती है। हाँ इस बहाने भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के एक गुमनाम नायक पर चर्चा होने लगी इसे उपलब्धि कहा जाना चाहिये; राजा रामराव बक्श जिनके किले में यह खुदाई चल रही है उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत में सम्मिलित होने के अपराध में 28 दिसंबर 1859 को बक्सर के पास फांसी दे दी गयी थी। बहरहाल आनंद उठाईये इस तिलिस्म कथा का जहाँ बाबा शोभन सरकार के एक चेले ओम बाबा कहते हैं ‘बस इतना बता दीजिये कि देश के आर्थिक हालात सुधारने के लिए कितना सोना चाहिए; बाबा शोभन सरकार उतना सोना पैदा कर देंगे’। इस प्रकरण को धार्मिक चश्मा चढा कर देख रेहे लोगों को भी बताना चाहूंगा कि एसे ही कारणों से आस्था और विश्वास जैसे शब्द मायना हीन हुए हैं तथा धर्म की परिभाषाओं को हास्यास्पद विवेचनाओं से गुजरना पड़ा है। 

इस विमर्श को आगे बढाने से पूर्व बाबा बिहारीदास पर बात करते हैं जिनका सत्तर के दशक में बस्तर के क्षेत्रों में बोलबाला था। बस्तर रियासतकाल के अंतिम महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव की 1966 में हुई हत्या के बाद आदिवासी नेतृत्व और प्रतिनिधित्व पूरी तरह से समाप्त हो गया। वर्ष -1971 में बाबा बिहारीदास प्रकट हुए। उनके प्रवीर होने के उसके दावे की पुष्टि खुसरू और बाली नाम के दो भतरा कार्यकर्ताओं ने की जो पहले भी प्रवीर के साथ काम कर चुके थे। बाबा के काले रंग के लिये यह तर्क दिया गया कि गोलियों की बौछार सहने के कारण प्रवीर का रंग काला पड़ गया है। उनके अनुयाईयों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। बाबा को कंठी वाले बाबा या गुरु महाराज कह कर संबोधित किया जाता था। बाबा ने अपने अनुयाईयों को सलाह दी कि वे माँस खाना और शराब पीना छोड़ दें तथा तुलसी की माला जिसे कंठी कहा गया धारण करें। यह कहा गया कि महाराजा प्रवीर का आदेश है कि सभी ग्रामवासियों को कंठी बाँधनी होगी। जो कंठी नहीं बाँधेगा उसकी जायदाद छीन ली जायेगी, वह मर जायेगा, उसको राक्षस खायेंगे। बिहारीदास के इस धर्मप्रचार और तथाकथित सुधारवादी आन्दोलन को अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली। हरे राम हरे कृष्ण और रघुपति राघव राजा राम आदि भी लोक गीतों में शामिल होने लगे। इस आन्दोलन को वाद, पंथ और अंजाम से तौले बिना अगर देखा जाये तो इसकी स्वीकार्यता का पैमाना बहुत विशाल था, लगभग सम्पूर्ण बस्तर। बाबा बिहारी ने प्रवीर के नाम को आन्दोलन बनाया। उसने प्रवीर के बाद की उस शून्यता का इस्तेमाल किया जिसमे आदिवासी स्वयं को नेतृत्वविहीन तथा असहाय समझ रहे थे। ब्रम्हदेव शर्मा जो उन दिनों कलेक्टर थे इस धार्मिक आन्दोलन को तोडने के लिये मुखर दिखे। बाबा बिहारीदास को समानान्तर सरकार न बनने देने के लिये जिला बदर का आदेश दिया गया। ठीक दशहरे से पहले ब्रम्हदेव शर्मा ने बाबा बिहारीदास को बस्तर से बाहर कर दिया था। बाबा ने अपनी लोकप्रियता भुनाई। कहते हैं कि राजनीतिक दखल पर वे वापस लौटे और इसके बाद ब्रम्हदेव शर्मा का स्थानांतरण कर दिया गया। वर्ष-1975 में उसे मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। वर्ष-1981 में एक आदिवासी लड़की से बलात्कार के जुर्म में वह गिरफ्तार हुआ। इसके बाद बाबा बिहारीदास का पतन हो गया।

शोभन सरकार और बाबा बिहारी दास की कहानी में एक प्रकार की साम्यता है। दोनो ने ही इतिहास की उस टूटन को अपनी प्रसिद्धि का हथियार बनाया जहाँ सत्य दफन किये जाते हैं और मिथक पैदा होते हैं। ध्यान से देखा जाये तो राजनीति शोभन सरकार से भी सोना ही खीच रही है, अब संचार माध्यम मंहगाई पर चुप हैं, रुपये के अवमूल्यन पर खामोश हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार पर कोई वाद-विवाद नहीं हो रहे। बाबा शोभन सरकार ने वह ढाल दी है जो राजनीति के हिस्से सोना ही उगलेगी भले ही आपको दिखे अथवा नहीं। इसे समझने के लिये आप बाबा बिहारी दास के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकते हैं। वर्ष 1972 में विधानसभा चुनाव हुए; बाबा ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। मेरा इशारा किसी राजनीतिक दल विशेष की ओर नहीं अपितु मंतव्य समग्र राजनीति से है। हाँ यह दु:ख जरूर व्यक्त कर सकता हूँ कि काश बिहारीदास भी सपना देखा करते। काश बाबा ने सपना देखा होता कि दक्षिण बस्तर के बारसूर में सोना गडा है या कि केशकाल घाटी के गोबरहीन में नलों की सम्पदा छुपी हुई है तो शायद इन क्षेत्रों की किस्मत बदल जाती। यहाँ से सोना निकलता अथवा नहीं लेकिन उस स्वर्णिम अतीत का सच जरूर बाहर निकल आता जिसकी निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इतिहास खोजने वाले अगर सोना खोदने मे व्यस्त रहेंगे तो बस्तर जैसे क्षेत्र के अतीत पर अंधेरा गहरा ही होता रहेगा। 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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