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Monday, July 15, 2013

गलत पहचान - यह विष्णु प्रतिमा नहीं है

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित

नैनो दर्शन पत्रिका में प्रकाशित
[बारसूर (दंतेवाड़ा) के सिंगराज तालाब में अवस्थित प्रतिमा पर एक विश्लेषण] 
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आप बारसूर पहुँचते हैं तो अनेक दर्शनीय स्थलों की भीड़ में आपको जानकारी प्राप्त होती है सिंगराज तालाब में कंठ अवस्था तक जलमग्न एक विष्णु प्रतिमा की। लगभग पाँच फीट आकार वाली यह प्रतिमा भव्य है, दर्शनीय है तथा दुर्लभ है। सौभाग्य से इस बार जब मैं इस प्रतिमा के निकट पहुँचा तो भगवान विष्णु की प्रतिमा वाली ही अवधारणा मेरे मन में भी थी। तालाब के दूसरी ओर खड़े हो कर अपने कैमरे में जूम करते हुए इस प्रतिमा की तस्वीर कैद करने के पश्चात वहाँ अधिक रुकने का कोई कारण नहीं बनता था। लगभग सभी किताबों में, सरकारी बुकलेट तथा बारसूर महोत्सव की प्रचार सामग्रियाँ सभी इस प्रतिमा को विष्णु की घोषित कर चुकी हैं अत: मेरा यह अनुमान था कि निश्चित ही यह शेष शायी विष्णु की ही प्रतिमा होगी। मेरे साथ मित्र चन्द्रा मण्डा तथा संतोश बढई भी थे। मैं किनारे पर ही खडा रहा और चन्द्रा भाई से निवेदन किया कि वे निकट जा कर इस प्रतिमा की एक तस्वीर खीच लें। एकाएक न्यूटन वाला सेव जैसे मेरे सामने ही आ गिरा और मुझे खडी अवस्था में देख कर इसके विष्णु प्रतिमा होने में संदेह हुआ। गर्मी भयानक पड़ी थी इस वर्ष अत: एक गड्ढे में सिमट कर रह गया था। मैं प्रतिमा के सम्मुख आ पहुँचा और कोशिश करने लगा कि समझ सकूं कि यदि यह विष्णु प्रतिमा है तो क्यों है? और यदि मेरी छठी इन्द्री इस तथ्य को नकार रही है तो किस लिये?

कई मोटे मोटे संदेह मेरे सामने थे प्रतिमा के सिर पर पंचमुखी नाग अथवा शेष नाग होने तक तो ठीक है लेकिन उसके बगल में छठा नाग शीष आखिर क्यों है? विष्णु तो नाग धारण नहीं करते? इस छठे नाग की पूँछ पीछे से हो कर प्रतिमा के दूसरे हाथ तक पहुँच रही है। प्रतिमा के दो ही हाथ नज़र आ रहे हैं तथा शंख, हक्र, गदा, पद्म जैसे अन्य पहचान चिन्ह भी नदारद हैं जो किसी विष्णु प्रतिमा की पहचान होते हैं। मैं चूंकि पुरातत्व का जानकार नहीं हूँ अत: इन बहुत सारे सवालों के साथ मैने प्रतिमा की विभिन्न कोणों से फोटोग्राफी की और उन्हें प्रभात सिंह जी के पास भेज दिया। प्रभात सिंह जी पुरातत्वविद हैं तथा सिरपुर के उत्खनन में उनका महति योगदान है। उनसे मेरी मुलाकात भी सिरपुर में हुई थी जहाँ उनकी मेधा तथा उनके द्वारा प्रतिमाओं के बारीक विश्लेषण सुन कर मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था। प्रभात जी से मुझे दो अलग अलग ई-मेल प्राप्त हुए। पहले ई-मेल में उन्होंने मेरी शंकाओं का बहुत हद तक समाधान किया था और यह समझने में सहायता की कि प्रतिमा विष्णु की क्यों नही है। 

प्रभात जी ने बताया कि “सर्पफणों के पीछे प्रभावली की विद्यमानता प्रथम दृष्टया इसे देव प्रतिमा के रूप में रेखांकित करती है। यदि इसकी सिरोभूशा का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह विष्णु प्रतिमा नहीं हो सकती है क्योंकि वे किरीट मुकुट धारण करते हैं जबकि इस उदाहरण में जटामुकुट का प्रदर्शन है जो कि शिव प्रतिमा का एक अनिवार्य अभिलक्षण है। प्रतिमा द्विभुजी है और संभवतः (क्योंकि प्रतिमा का अधोभाग चित्र में उपलब्ध नहीं है) दोनो हाथ खण्डित हैं। दाहिने हाथ के अवशिष्ट भाग को देखकर अनुमान होता है कि इसकी हथेली अभय मुद्रा में रही होगी। वहीं बांया हाथ देह के समानान्तर लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। नीचे का हिस्सा उपलब्ध न होने के कारण हस्तमुद्रा अथवा उसमें धारित आयुध के विषय में निष्चित रूप से कह पाना अभी संभव नहीं है। सिरोभाग के ऊपर पाँच फणयुक्त सर्प का छत्र है। शिव प्रतिमा के साथ सर्प का संयोजन सर्वविदित है किन्तु आम तौर पर शिव प्रतिमा में इस प्रकार सर्पफण के छत्र का अंकन नही मिलता है। वहीं इस प्रतिमा में पृथक से एक सर्प एकदम दाहिनी ओर अंकित किया गया है जिसका पष्चभाग अर्थात पूंछ एकदम बांयी ओर देवता के कंधे से हाथ तक समानान्तर लटकती हुई देखी जा सकती है। इस प्रकार यहाँ दो सर्प उपस्थित हैं। देवता के कर्णाभूषण, वक्षाभूषण और वस्त्र का भी शिव प्रतिमा से सामंजस्य स्थापित नहीं होता। यह भी उल्लेखनीय है कि सर्प का प्रदर्शन जल के देवता वरूण के साथ भी होता है किन्तु जटामुकुट नहीं होना चाहिए। वहीं इस प्रतिमा की योगस्थानक मुद्रा नागपुरूष की प्रतिमा का अभिलक्षण स्वीकार नहीं किया जा सकता है”। 

मैने प्रभात जी को प्रतिमा के पृष्ठ भाग सहित आस पास की कई अन्य तस्वीरें भी भेजीं। अब यह स्पष्ट होने के पश्चात कि यह विष्णु प्रतिमा नहीं है जिस नाम से बहुत लम्बे समय से इसे जाना जा रहा है तब इसको नयी पहचान भी प्रदान किया जाना आवश्यक है। प्रभात जी ने विस्तृत अध्ययन के पश्चात मिझे बता कि “आपके द्वारा प्रेषित छायाचित्रों से उक्त प्रतिमा के अभिज्ञान के सम्बन्ध में कुछ लाभ अवष्य प्राप्त हुआ है तथापि अतिम निष्कर्श देना जल्दबाजी हो सकती है। आपके द्वारा भेजे गये छायाचित्र में प्रतिमा के बांये हाथ में धारित वस्तु स्पष्ट दिखलाई पड़ रही है। यह वस्तु वृत्ताकार है और मध्य में गहरा है जो प्याले जैसा पात्र प्रतीत हो रहा है। दाहिना हाथ जैसा की मैने पूर्व में उल्लेख किया है अभय मुद्रा में होना चाहिए। जे. वोगेल ने अपनी कृति (Indian Serpent Lore or the Nagas in Hindu legend and art) में कुकरगम से प्राप्त ऐसी ही एक प्रतिमा का जिक्र किया है जिसका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और बांये हथेली में प्याला पकडे़ हुए है तथा पृश्ठभाग में सर्पफणों का छत्र है। उसे उन्होनें नागदेवता का मानुषी रूपाभिव्यक्ति माना है। इस प्रतिमा के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए जे. एन. बनर्जी (The Development of Hindu Iconography, 2002, p. 349) आगे लिखते हैं कि “The type in a modified form was similar to Baldeva, one of whose aspect is based on a trait of this primitive folk cult” ज्ञात रहे कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण में निर्दिश्ट अनंतनाग का प्रतिमालक्षण, बलराम के प्रतिमालक्षण से भी मेल खाता है। अंततः यही कहा जा सकता है कि यह बलराम अथवा नागदेवता की प्रतिमा हो सकती है। किंतु छठे सर्प की तार्किक व्याख्या का आधार अभी भी उपलब्ध नहीं हो सका है। एक छायाचित्र में प्रस्तर स्तंभ भी दिखलाई दे रहा है। प्रतिमा के इर्द-गिर्द बिखरे प्रस्तर खण्डों में जो छिद्र बने हैं वो गिट्टक (Iron Dowel) के प्रयोग की सूचना दे रहे हैं। इन स्थापत्य खण्डों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ पर लगभग 10वीं-11वीं सदी ईस्वी में छिंदक नागवंशीयों के समय का मंदिर रहा होगा और उक्त प्रतिमा संभवतः गर्भगृह में स्थापित रही होगी।“ 

बस्तर की प्रतिमाओं के बहुत बारीक विष्लेशण की आवश्यकता है अन्यथा हम उनके निहितार्थ नहीं पकड़ सकेंगे। छठे नाग की तार्किक व्याख्या उपलब्ध न होने के बाद भी यह स्पष्ट है कि यह किसी नागदेवता की प्रतिमा हो सकती है, यह प्रतिमा बलराम की भी हो सकती है जिन्हें स्वयं शेषावतार कहा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने आती है कि यह प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह में रही होगी। इस दृष्टिकोण से इसका महत्व अधिक बढ जाता है। इस प्रतिमा के आस-पास प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं जो इतिहास की विरासत हैं। बारसूर केवल बत्तीसा, चन्द्रादित्य मंदिर या कि गणेश प्रतिमा ही नहीं है यहाँ छिपा हुआ है कई हजार सालका इतिहास। हमारी हर गलत व्याख्या हमे सच्चाई से परे करती है और बस्तर उतना ही अबूझ होता जाता है। वर्तमान में यदि इंस क्षेत्रों में उत्खनन संभव न भी हों तो भी विषय-विशेषज्ञों को यहाँ आ कर एसी अनेक प्रतिमाओं की समुचित तथा तार्किक व्याख्या कर देनी चाहिये। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह असाधारण प्रतिमा है तथा इसका प्राथमिकता के साथ संरक्षण किये जाने की आवश्यकता है। स्थानीय प्रशासन से मेरी विनम्र अपील है कि इस प्रतिमा को तालाब के किनारे ही संरक्षित करने की व्यवस्था की जाये जिससे कि पर्यटकों के लिये इस प्रतिमा का आकर्षण बना रहे। यदि एसा करना संभव न हो तो इस प्रतिमा को यथाशीघ्र संग्रहालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। पानी से इस प्रतिमा का तेजी से क्षरण हो रहा है और हमारी यह अमूल्य विरासत मिटती जा रही है। 

Friday, December 28, 2012

बस्तर, बारसूर और गंग-राजवंश – बिखरी कडियाँ।


किसी समय ओड़िशा के जगन्नाथपुरी क्षेत्र के राजा गंगवंशीय थे। राजा की छ: संतानें उनकी व्याहता रानियों से थी तथा एक पुत्र दासी से उत्पन्न था। अनेक घटनायें अतीत के पन्नों में दर्ज है जहाँ राजा प्रेम अथवा वासना में इस तरह डूबा रहा करता कि अंतत: गणिकाओं, दासियों तथा नगरवधुओं नें उनसे अपनी मनमानियाँ करवायी हैं तथा सत्ता पर अपने परिजनों अथवा पुत्र को अधिकार दिलाने में सफल हो गयी हैं। इस गंगवंशीय राजा नें भी यही किया तथा दासी पुत्र सत्ता का अधिकारी बना दिया गया। छ: राजकुमार राज्य के बाहर खदेड दिये गये। इनमें से एक राजकुमार नें अपने साथियों के साथ किसी तत्कालीन शक्तिहीन हो रहे नल-राजाओं के गढ महाकांतार के एक कोने में सेन्ध लगा दी तथा वहाँ बाल-सूर्य नगर (वर्तमान बारसूर) की स्थापना की।

यह कथा तिथियों के अभाव में इतिहास का हिस्सा कहे जाने की अपेक्षा जनश्रुतियों की श्रेणी में ही वर्गीकृत रहेगी। पं. केदारनाथ ठाकुर (1908) नें अपनी किताब “बस्तर भूषण (1908)” में इस घटना का इतिहासिक तथ्य की तरह वर्णन किया है। इसे बस्तर के इतिहास की शून्यता में कई स्थानों/तिथियों में जोडने की गुंजाईश दिखती है। पहली संभावना बनती है नल राजा स्कंदवर्मन (475-500 ई.)की मृत्यु के बाद; चूंकि इसके पश्चात लम्बे समय तक नल शासन का उल्लेख प्राचीन बस्तर के अब तक उपलब्ध एतिहासिक प्रमाणों से प्राप्त नहीं होता। प्राय: शक्तिशाली राजाओं की संततियाँ विरासत को संभाल पाने में नाकाबिल साबित होती रही हैं। अत: हो सकता है कि  इसी समय वाकाटकों नें पुन: नलों को परास्त किया हो। यह संभावना है कि वाकाटक नरेश हरिषेण नें स्कंदवर्मन के पश्चात के शासको को परास्त कर राज्य विस्तार किया होगा। इसी समय में पूर्वी गंग नाम के एक राजवंश के शक्तिशाली हो कर उदित होने की जानकारी भी प्राप्त होती है। यह विश्वास किया जा सकता है कि वाकाटक नरेश हरिषेण की आधीनता में ही पूर्वी गंग त्रिकलिंग के शासक बने तथा वे वाकाटकों व आन्ध्र के शासकों के बीच प्रतिरोधक का कार्य करते रहे।

प्राचीन बस्तर पर शासन करने वाले गंग राजाओं नें स्वयं को त्रिकलिंगाधिपति कहा है अत: यह समझना आवश्यक हो जाता है कि यह प्राचीन भूगोल में किस क्षेत्र का परिचायक है। त्रिकलिंग का उल्लेख पहले-पहल ग्रीक-यूनानी लेखकों की इतिहास लेखन के उद्देश्य से रची गयी कृतियों में मिलता है। ग्रीक लेखक प्लीनी नें कलिंग को गंगरिदेसकलिंगे, मक्को कलिंगे एवं कलिंग नामक तीन उपविभागों में बाँटा है। पूर्वीगंगों के ताम्रपत्रों में उन्हें त्रिलिंगाधिपति घोषित किये जाने का अनेको बार उल्लेख मिलता है। त्रिकलिंग एवं कलिंग पर गंग राजाओं के आधिपत्य का विवरण वज्रहस्त पंचम, राजराज प्रथम एवं चोडगंग के ताम्रपत्रों में मिलता है। चोड़गंग के ताम्रपत्र एक कथा की ओर इशारा करते हैं कि गंग राजाओं की वंशावली राजा कामार्ण्णव से प्रारंभ होती है जिन्होंने अपने चार भाईयों की सहायता से एक नये राज्य की स्थापना की जिसे त्रिकलिंग कहा गया। दानपत्रों के उल्लेख त्रिकलिंग को कलिंग के पश्चिम में अवस्थित सिद्ध करते हैं। त्रिकलिंग क्षेत्र की व्याख्या अनेक इतिहासकार/विद्वानों नें अपने अपने तरह से की है। कुछ इतिहासकार इसे तीन राज्यों का सम्मिलित क्षेत्र मानते हैं जैसा कि कनिंघम का मंतव्य है जिनके अनुसार धनकट, अमरावती व आन्ध्र मिला कर त्रिकलिंग बनते हैं। फ्लीट त्रिकलिंग को गंगा के मिहाने तक प्रसारित मानते हैं जबकि कीलहार्न प्राचीन तेलंगाना को  ही त्रिकलिंग मानते हैं। डीसी गाँगुली त्रिकलिंग के अंतर्गत उत्तरी कलिंग (गंजाम); दक्षिणी कलिंग (गोदावरी क्षेत्र) तथा मध्य कलिंग (विशाखापट्टनम) मानते हैं। शक संवत 1280 के श्रीरंगम ताम्रपत्र के अनुसार त्रिकलिंग के पश्चिम में महाराष्ट्र, पूर्व में कलिंग, दक्षिण में पाण्डय देश एवं उत्तर में कान्यकुब्ज हैं – “पश्चात पुरस्तादपि यस्य देशौ ख्यातौ महाराष्ट्रकलिंगसंज्ञो:। आर्वादुदक पाण्ड्यकान्यकुब्जौ देशो स्मतत्रापि तिलिंगनामा”। उपरोक्त विवरणो से त्रिकलिंग के पृथक व एक स्वतंत्र राज्य होने का उल्लेख बनता है जिसे गंग राजाओं नें बसाया होगा तथा यह प्राचीन बस्तर की कुछ भूमि समेत कोरापुट व कालाहाण्डी क्षेत्रों के लिये संयुक्त रूप से प्रयोग में लाया जाने वाला नाम रहा होगा। इस सत्य की सबसे अधिक ठोस रूप में पुष्टि ओडिशा म्यूजियम, भुवनेश्वर में संरक्षित रखे ब्रम्हाण्डपुराण के ताडपत्र से होती है जिसमे एक श्लोक त्रिकलिंग क्षेत्र की स्पष्ट जानकारी प्रदान करता है। इस श्लोक का अंतिम शब्द ताडपत्र में अस्पष्ट है तथापि इसके अनुसार झंझावती से वेदवती नदी के मध्य का क्षेत्र त्रिकलिंग है जबकि इससे लग कर अर्थात झंझावती से ऋषिकुल्या तक का क्षेत्र कलिंग है – अषिकुल्यां समासाद्य यावत झंझावती नदी, कलिंग देशख्यातो देशाना गर्हितस्तदा। झंझावतीं सभासद्य यावद वेदवती नदी, त्रिकलिंगड़गीति ख्यातो...”। झंझावती, नागवल्ली नदी की सहायक सरिता है जबकि वेदवती इन्द्रावती का उपनाम। अत: विवादों को दृष्टिगत रखते हुए भी इस समहति पर पहुँचना होगा कि प्राचीन बस्तर क्षेत्र पर पूर्वीगंग वंश का शासन 498 – 702 ई. के मध्य रहा होगा।

गंगवंश का प्रथम ज्ञात राजा इन्द्रवर्मन है जिसने अपने जिरजिंगी दानपत्र (537 ई.) में स्वयं को त्रिलिंगाधिपति कहा है। इसका राज्य क्षेत्र समुद्रतट तक विस्तृत बताया जाता है। दूसरा गंग राजा सामंतवर्मन था जिनका पोन्नुतुरू दानपत्र भी उन्हें त्रिलिंगाधिपति घोषित करता है। सामंतवर्मन की राजधानी सौम्यवन थी जिसे वर्तमान श्रीकाकुलम जिले में वंशधारानदी के तट पर अवस्थित माना जाता है। सामंतवर्धन के पश्चात राजा हस्तिवर्मन का उल्लेख नरसिंहपल्ली ताम्रपत्र तथा उरलाम दानपत्र से प्राप्त होता है। हस्तिवर्मन द्वारा त्रिलिंगाधिपति के स्थान पर सकलकलिंगाधिपात उपाधि धारण करने का उल्लेख मिलता है तथा उनके द्वारा कलिंगनगर को राजधानी बनाया गया था। हस्तिवर्मन का उत्तराधिकारी इन्द्रवर्मन द्वितीय था जिसके समय में त्रिकलिंग के दक्षिणी क्षेत्रों पर चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितिय नें अधिकार कर लिया था। इसके पश्चात गंगवंशीय राजा इन्द्रवर्मन तृतीय का उल्लेख मिलता है जिसने 632 ई. में तेकाली पत्र जारी किया था। एक अन्य अभिलेख में देवेन्द्रवर्मन का चिकाकोल पत्र (681 ई.) प्राप्त हुआ है। गंगवंशीय अंतिम प्राप्त अभिलेख है देवेन्द्रवर्मन के पुत्र अनन्तवर्मन का धर्मलिंगेश्वर दानपत्र (702 ई.) जिसके पश्चात इस राजवंश का कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है

दुर्गमतम क्षेत्र होने के कारण प्राचीन बस्तर के इतिहास को एक क्रम में देखने से कई समस्यायें आ जाती है। हम काल निर्धारण करते हुए पूरी तरह आश्वस्त नहीं रह सकते तथापि यह मान सकते हैं कि स्कन्दवर्मन के पश्चात  नल वंश का महाकांतार में पतन होने लगा; अत बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गंग राजवंश जो कि दण्ड़क वन क्षेत्र में “बाल सूर्य” (वर्तमान बारसूर) नगर और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित था अब महाकांतार क्षेत्र का वास्तविक शासक बन गया। इस राजवंश की शासन-प्रणाली तथा राजा-जन संबंधों पर बात करने के लिये समुचित प्रमाण, ताम्रपत्र अथवा शिलालेख उपलब्ध नहीं हैं तथापि गंग राजाओं का स्थान बस्तर की स्थापत्य कला की दृष्टि से अमर हो गया है। बालसूर्य नगर की स्थापना के पश्चात गंग राजाओं नें अनेकों विद्वानों तथा कारीगरों को आमंत्रित किया जिन्होंने राजधानी में एक सौ सैंतालीस मंदिर तथा अनेकों मंदिर, तालाबों का निर्माण किया। गंगमालूर गाँव से जुडा “गंग” शब्द तथा यहाँ बिखरी तद्युगीन पुरातत्व के महत्व की संपदाये गंग-राजवंश के समय की भवन निर्माण कला एवं मूर्तिकला की बानगी प्रस्तुत करती हैं। बारसूर मेंअवस्थित प्रसिद्ध मामा भांजा मंदिर गंग राजाओं द्वारा ही निर्मित है। कहते हैं कि राजा का भांजा उत्कल देश से कारीगरों को बुलवा कर इस मंदिर को बनवा रहा था। मंदिर की सुन्दरता ने राजा के मन में जलन की भावना भर दी। इस मंदिर के स्वामित्व को ले कर मामा-भांजा में युद्ध हुआ। मामा को जान से हाँथ धोना पड़ा। भाँजे ने पत्थर से मामा का सिर बनवा कर मंदिर में रखवा दिया फिर भीतर अपनी मूर्ति भी लगवा दी थी। आज भी यह मंदिर अपेक्षाकृत अच्छी हालत में संरक्षित है। आज का बारसूर ग्राम अपने खंड़हरों को सजोए अतीत की ओर झांकता प्रतीत होता है।

बारसूर नगर के एतिहासिक अतीत को देखते हुए उसके संरक्षण के लिये किये जाने वाले कार्यों की सराहना करनी होगी। अभी जो प्रयास हुए हैं उनके तहत कुच प्राचीनमंदिर व भव्य प्रतिमायें अगली पीढी के लिये बचा ली गयी हैं तथापि बहुत कुछ किया जाना अभी शेष है। यह नगर इतिहासकारों व पुरातत्वविदों की समग्रदृष्टि तथा विषद शोध की माँग करता है तभी हम गंग वंशीय अतीत पर प्रामाणिकता से कुछ कहने की स्थिति में होंगे। बारसूर वैसे भी प्राचीन मंदिरों व भग्नावशेषों से पटी पडी नगरी है जो स्वयं को पढे और पुन: गढे जाने की राह तक रही है।