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Tuesday, August 07, 2012

दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी {प्राचीन बस्तर का समाजशास्त्र [संदर्भ: - रामायण काल]}

सांध्य दैनिक ट्रू-सोल्जर (रायपुर) से दिनांक 7.08.2012 को प्रकाशित
बस्तर पर जानकारी एकत्रीकरण के लिये आर्य-द्रविड अंतर्सम्बन्धों को बारीकी से समझना आवश्यक है। वस्तुत: हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। रामधारी सिंह दिनकर की कृति “संस्कृति के चार अध्याय” एक उत्कृष्ट रचना है जो एसी सभी बहसों को अपने तार्कित उत्तर से संतुष्ट करती है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। वर्तमान भारत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन निवासियों के मूल स्थानों के लिये मैने इतिहास की कई पुस्तकों में भी झांका लेकिन अधिकांश में पूर्वाग्रह ही अधिक नजर आता है। अत: दिनकर की ही पुस्तक के उद्धरण मुझे उचित जान पडते हैं जो “अंडा पहले आया कि मुर्गी” वाली बहस को अधिक तूल न दे कर समरस्ता के मर्म की बात करते हैं। 

 प्राचीन बस्तर रामायणकाल में दक्षिणा पथ की बहुतायत गतिविधियों का केन्द्र रहा होगा तथा इस सब का प्रारंभ महर्षि अगस्त्य के विन्ध्य पर्वत पार करने की रोचक कथा के साथ होता है। कथा नें कविता तत्व की मोटी गिलाफ ओढी हुई है। कथा कहती है कि विन्ध्य अपना आकार निरंतर बढा रहा था जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई। इससे निजात पाने के लिये महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है अतः मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने कहा कि विन्ध्य उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा वे पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा रहने लगे। यह दक्षिण की महत्ता तथा विन्ध्य की दो संस्कृतियों के बीच दीवाल की तरह खडे होने की पुष्टि करती हुई कथा है। प्राचीन आश्रम संस्कृति तथा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित होती है कि अगस्त्य एक पूरी संस्था की तरह कार्य कर रहे थे तथा वे उत्तर दक्षिण को एक सूत्र में बाँधने की प्रथम ज्ञात कडी हैं। हमनें उनका एक अध्यापक, एक उपदेशक, एक ज्ञानी, एक यायावर, एक दिव्यास्त्र निर्माता तथा योजनाकार का रूप तो जाना है लेकिन उनकी वास्तविक उपलब्धि कम ही लोग जानते हैं कि महर्षि अगस्त्य नें ही तमिल भाषा के आदि व्याकरण “अगस्त्यम” की रचना की है। यह रचना सिद्ध करती है कि अगस्त्य केवल दण्डकारण्य तक ही सीमित नहीं रहे अपितु सुदूर दक्षिण तक उन्होंने यात्रा की व वहाँ का जन जीवन यहाँ तक कि भाषा को भी एक व्यवस्था प्रदान करने का यत्न किया। 

दण्डकारण्य के प्राचीन समाजशास्त्र का आज भी महत्व विद्यमान है। दक्षिणापथ का उत्तरी भाग था दण्डकारण्य; यहाँ राक्षस जाति के निवास की जगह उनके आक्रमणों का ही विवरण अधिक मिलता है। प्राचीन विवरणों के आधार पर उन जनजातियों को जिन्हें राक्षस कहा गया है, उनका निवास दक्षिण के बस्तरेतर क्षेत्र अर्थात आन्ध्र व उस से लग कर सुदूर दक्षिण तक प्रतीत होते हैं। यह भी ज्ञात होता है कि लम्बे समय तक क्षेत्र में किसी समाजसेवी की तरह कार्य करते हुए अगस्त्य नें दण्डकारण्य क्षेत्र में निवासरत अनेक जनजातियों के मध्य समन्वय का वातावरण उत्पन्न कर लिया था। महर्षि अगस्त्य का आश्रम क्षेत्र वर्तमान बस्तर के भीतर ही था जो इस दिशा में किये गये श्री सूर्य कुमार वर्मा के 1906 में सरस्वति पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख द्वारा भली प्रकार सिद्ध किया गया है। राम के वनवास से पहले तक अगस्त्य मुनि का आश्रम ही दो संस्कृतियों का समंवय स्थल बन गया था जिसका स्थानीय जनजातियों के सहयोग और योगदान के बिना संचालित होना संभव प्रतीत नहीं होता। राम के वनागमन से पूर्व इस क्षेत्र में निवासरत जनजातियों पर राक्षसों के कुछ हमलों का जिक्र होता है; उदाहरण के लिये लंका को हस्तगत करने के बाद रावण दक्षिण विजय के लिये निकला जिसका कि उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है – युद्धं मे दीयतामिति निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत [वह दक्षिण में एक नगर से दूसरे नगर पहुँचता और चुनौती देता कि या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो]। वानर जनजाति का नेतृत्व कर रहे बालि नें रावण को न केवल युद्ध में पराजित कर दिया अपितु बंदी भी बना लिया। इस प्रसंग का अंत होता है जब रावण-बालि संधि हो जाती है। रावण नें बालि के अलावा मांधाता (बस्तर का वर्तमान मंधोता ग्राम) के जनजातियों के सरदारों से भी समझौते कर लिये और लंका लौटने से पहले दण्डकारण्य क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि खर-दूषण के रूप में किसी निगरानी चौकी या सत्ता प्रतीक की तरह छोड दिये थे। उल्लेख मिलता है कि उनके साथ चौदह हजार राक्षसों की एक टुकडी भी थी जिसका कार्य आतंक प्रसारित कर रावण की सत्ता का भय बनाये रखना था। यह कथा आगे बढती है जब राम का वनागमन होता है। पं केदारनाथ ठाकुर अपनी कृति बस्तर भूषण (1908) में उल्लेख करते हैं कि “राम पहले भारद्वाज आश्रम से होते हुए रत्नगिरि में आये। रत्नगिरि से चल कर बस्तर राज्य तथा कांकेर राज्य की पश्चिमी सीमा से होते हुए वे गोदावरी तक आये, वहाँ से गोदावरी के बहाव की ओर कुछ दिन घूमते रहे तत्पश्चात पर्णशाला में आ कर निवास किया। यहीं पर सीता हरण हुआ। रामचन्द्र जी सीता को गोदावरी नदी के पूर्व तथा इशान में ढूंढने लगे। यही पर उनकी शिवरी भीलनी (शबरी) से भेंट हुई। शिवरी नदी (शबरी नदी) के पूर्व तथा जैपुर राज्य में एक पर्वत है जिसे आज रामगिरि के नाम से जाना जाता है उसके चारो ओर असंख्य छोटी बडी पहाडियाँ हैं, इसी समूह में उत्तर की ओर रंफा पहाड है जिसे जैपुर स्टेट के लोग किष्किंधा पहाड़ कहते हैं। इन पहाडों पर वर्तमान समय में रेड्डी लोग वास करते हैं जो स्वयं को वानर का वंशज मानते हैं”।

बहुत अधिक कार्य अब तक इस दिशा में नहीं हुए हैं जो इतिहास प्रदत्त प्रमाणों का बारीकी से विश्लेषण करें। ब्रिटिश शासक ग्रिग्सन नें 1937 ई. में इस काल के प्रमाणों को एकत्र करने व दस्तावेजबद्ध करने के लिये कैप्टन गिब्सन को नियुक्त किया था। कहा जाता है कि गिब्सन नें बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित भी कर ली थी। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड गया। गिब्सन सारी एकत्र सामग्री व जानकारी को ले कर इंग्लैंण्ड चले गये व वहीं युद्ध में मारे गये। इसके बाद स्वतंत्र भारत के किसी शासक, नेता या जिलाधीश नें इस तरह का कार्य करने की जहमत नहीं उठायी। अगला प्रामाणिक कार्य उपलब्ध होता है डॉ. हीरालाल शुक्ल का जिनकी किताब “लंका की खोज” एवं “रामायण का पुरातत्व” अद्वितीय दस्तावेज हैं। डॉ. शुक्ल नें बस्तर क्षेत्र में उपस्थित रामायणकालीन जनजातियों की वर्तमान जनजातियों से तुलना व साम्यता को विस्तार से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। उनके अनुसार रामायण युगीन वनेचर प्रजातियों में आग्नेय परिवार से सम्बद्ध जनजातियाँ हैं - निषाद, गृद्ध तथा शबर; अगर मध्यवर्ती द्रविड परिवार की बात की जाये तो उससे सम्बद्ध प्रजातियाँ हैं – वानर तथा राक्षस। 

रामायण में चिन्हित आग्नेय परिवार की जनजातियों नें आर्यों से शीघ्र निकटता तथा मैत्री कर ली थी। निषाद प्रजाति का उल्लेख मूल रूप से उत्तरप्रदेश के संदर्भों में प्राप्त होता है। राम को गंगा पार कराना एवं राम-निषाद मैत्री का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन रामायण में प्राप्त होता है। बस्तर के ‘कुण्डुक’ स्वयं को निषाद वंश का मानते हैं तथा इस जनजाति का विश्वास है कि वे त्रेता युग में राम के साथ ही गंगातट से दण्डक तक आये। यह प्रजाति आज भी नाविक ही है एवं इनकी उपस्थिति चित्रकूट के निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित रह गयी है। रामायण में वर्णित दूसरी प्रजाती है गृद्ध। गोदावरी की पार्श्ववर्ती पर्वतमालाओं पर इनका निवास माना गया है। गिद्ध इन जनजातियों का प्रतीक रहा होगा। इनके प्रमुख नायक सम्पाति तथा जटायु का आर्य जनजातियों से तालमेल प्रतीत होता है। रामायण में पंख कटने के बाद जिस प्रस्त्रवण पर्वत (बैलाडिला) के निकट जटायु के दम तोडने का वर्णन है उस स्थल को आज गीदम के नाम से जाना जा रहा है। जगदलपुर के जाटम ग्राम में अब भी गदबा जनजाति के घर हैं जिनका सम्बन्ध गृद्ध प्रजाति से जोड कर देखा जाता है। बस्तर की गदबा प्रजाति प्रतीक पूजक है तथा गृद्ध आज भी इनके यहाँ “टोटेम” है। जिस प्रकार बस्तर में हल प्रतीक के वाहकों को हलबा कहा गया उसी प्रकार गृद्ध प्रतीक के वाहक गदबा कहलाने लगे। यह प्रजाति आज विलुप्ति पर पहुँच गयी है। लोग कृषक अथवा मजदूर हैं तथा अब इन्हें पहचानना कठिन होता जा रहा है। राम-शबरी मिलन और शबरी के प्रेम से खिलाये गये जूठे बेर एक महान प्रेरक प्रसंग है। इसी कथा नें शबर जनजाति की पहचान को उसकी प्राचीनता से जोडा है। ऐतरेय ब्राम्हण में शबरों को आर्य देश की सीमा पर स्थित बताया गया है अत: यह क्षेत्र निश्चित ही दण्डकारण्य है। साक्ष्यों के आधार पर एवं पुरा-भूगोल पर किये गये विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि शबरी का आश्रम शबरी तथा गोदावरी नदी के संगम पर स्थित था। डब्ल्यु जी ग्रिफिथ नें मध्य भारत की कोल प्रजाति को शबर माना है (क़ोल ट्राईब्स ऑफ सेंट्रल इंडिया, 1946)। डॉ. हीरालाल शुक्ल भी इन्हें ओडिशा और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में चिन्हित करते हैं। शबर जनजाति के लोग गोंड अथवा खोंड की तुलना में भिन्न होते हैं। इनकी स्त्रियाँ नासिका तथा हनु में गुदना करती हैं एवं कपोलों में भी गहरी रेखायें गुदवाती हैं। कर्ण-आभूषण दर्शनीय होते हैं व कान में चौदह तक छेद कराने का चलन पाया गया है। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शबरों के दो विभेद पाये गये हैं – पर्ण शबर तथ नग्न शबर। नग्न शबर प्रजाति आर्यों के निकट नहीं आ पायी थी व अपनी मूलावस्था में रहने के कारण यह नामांकरण हुआ है। बंडा परजा जनजाति ही नग्न शबर मानी जाती है। 

मध्यवर्ती द्रविड परिवार की वानर तथा राक्षस जातियाँ एक समय में ताकतवर तथा सक्रियतम रही हैं। यह तो पहचान ही लिया गया है कि काकिनाडु (पूर्वी गोदावरी) सहित कोरापुट व कालाहाँडी के आंशिक क्षेत्र किष्किन्धा जनपद के अंतर्गत आते थे। रामायण में किष्किन्धा के निवासियों के लिये वानर पहचान का प्रयोग है। वानरो की जो प्रजातिगत विशेषतायें कही जाती हैं उसके अनुसार वे भावुक, चपल, ताम्रवदना अथवा कनकप्रभ उल्लेखित होने के कारण सोने जैसे वर्ण के होते थे। आज भी खम्माम, बस्तर, कोरापुट तथा कालाहाण्डी की आदिम प्रजातियाँ (इन क्षेत्रों में निवास करने वाली कंध जनजातियों को विद्वानों नें वानर माना है) बालि का स्मरण करती हैं। बस्तर में बालिजात्रा धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। कंध प्रजाति का गोत्र चिन्ह वानर है तथा वंशों के नाम सुग्री, जाम्ब तथा हनु आदि मिलते हैं। नृत्य आदि अवसरों पर कंध लोग आज भी पूँछ धारण करते हैं। कन्ध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई तथा कुवि हैं जो इन्हें कोयतुर (गोंड) जनजातियों के निकट सिद्ध करते हैं। प्रकृति की दृष्टि से ये लोग दण्डामि माडिया के भी निकट नजर आते हैं। रामायण में जिसे राक्षस कहा गया है वैदिक साहित्य नें उन्हें दस्यु सम्बोधित किया है। यह जनजाति प्रखर योद्धा रही है तथा इन्होंने आर्यों की आधीनता को अस्वीकार कर सर्वदा युद्ध का मार्गानुसरण किया है। राक्षसों के लिये ऋग्वेद में क्रव्याद: अर्थात कच्चा मांसाहार करने वाले; मृघ्रवाच: अर्थात जिनकी भाषा न समझ आये; अदेवयु: अर्थात देवताओं को न मानने वाले; अनास अर्थात जिनकी नाक छोटी व उठी हुई हो; शिश्नदेवा: अर्थात लिंगोपासक कहा गया है। इनमें गर्धर्व विवाह का प्रचलन था तथा बलात् विवाह करने की वृत्ति को भी बाद में राक्षस विवाह नामांकरण से जाना गया। राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण नें इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। राक्षसों (रक्ष शाखा) की मूल उपस्थिति को आन्ध्रप्रदेश से माना जा सकता है।

रामायण कालीन बस्तर के जटिल समाजशास्त्र को समझने के लिये उपरोक्त सभी विवरणों को एक साथ देखना होगा। दण्डकारण्य की अपनी ही तरह की संस्कृति थी जिसमें गंगाजमुनी सम्मिश्रण होने लगा तब भी उसनें इन्द्रावती का वेग और गोदावरी की विराटता को मजबूती से थामे रखा। यह दो संस्कृतियों के मध्य का क्षेत्र होने के कारण कई अनेकताओं का समागम स्थल है। यह ज्ञात होता है कि कई जनजातियाँ जैसी अवस्था में रामायण काल में रहती होंगी अब भी उनमें बहुत कुछ नहीं बदला है। यहाँ के समाजशास्त्र नें दक्षिण से उसकी पहचान अलग रखी व उत्तर से भी स्वयं को मिलने नहीं दिया। यहाँ से जुडे केवल आर्य-द्रविड युद्ध के ही प्रसंग नहीं हैं अपितु कई द्रविड प्रजातियों के आपसी संघर्ष का भी यह क्षेत्र रहा है जहाँ समय समय पर शक्तिशाली आर्य व रक्ष प्रजातियों ने कभी मैत्री तो कभी युद्ध द्वारा अपनी शक्ति व सत्ता के केन्द्र स्थापित किये। यह अनोखा स्थल है जहाँ आश्रम संस्कृति भी पूरे चरम पर थी तो उसका विरोध भी पूरी निर्ममता से होता रहा। मेरा मानना है कि प्राचीन ग्रंथों से मिल रहे सूत्रों को जब तक इतिहासकार बारीकी से नहीं पकडेंगे वे बस्तर के अतीत की न्यायपूर्ण व्याख्या नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में दण्डकारण्य क्षेत्र पुन: युद्धभूमि बना हुआ है तथा आन्ध्र ओडिशा महाराष्ट्र से भीतर घुस कर खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों नें इसे अपना उपनिवेश बना लिया है। युद्धरत दिखने वाले लोग बस्तर की वही जनजातियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक अपनी पुरातन परम्पराओं की थाती सम्भाले अतीत का जीवत प्रमाण है। दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी।

[यह तस्वीर मित्र राकेश सिंह जी के संकलन से]
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Friday, August 03, 2012

बस्तर के भौगोलिक परिवेश पर विमर्श - रामायण काल से वर्तमान तक

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 3.08.2012 को प्रकाशित

मैं इन्द्रवती नदी के बूँद-बूँद को, अपने दृगजल की भाँति जानता आया हूँ। 
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प्राचीन बस्तर अथवा दण्डकारण्य के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की आवश्यकता है। कितना जटिल था वह समाज अथवा कितना उनमुक्त? कितना बटा हुआ था अथवा कितना मिलनसार? यह समाज जिस भौगोलिक दायरे में बंधा हुआ था वह मायने रखता है। यदि हम वर्तमान की जनजातियों और उसकी प्राचीन बस्तर से किसी तरह की साम्यता देखने वाली अंतर्दृष्टि चाहते हैं तो प्राचीन पुस्तकें दिशा निर्देश देती हैं। वाल्मीकी  रामायण, महाभारत, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, वामन पुराण, पद्म पुराण, मारकण्डेय पुराण, कालिदास रचित रघुवंश, भवभूति रचित उत्तर रामचरित, कथा सरितसागर आदि ग्रंथों में प्राप्त विवरणों के आधार पर प्राचीन बस्तर के भूगोल पर एक दृष्टि डाली जा सकती है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुरातनता में भारत भूमि के दो मोटे विभाजन उत्तरापथ तथा दक्षिणापथ के रूप में किये जा सकते थे तथा लम्बे समय तक इस स्पष्ट विभाजन की सीमा रेखा विन्ध्य पर्वत ही बना रहा है। रामायण काल से प्रारंभ हो कर लगभग तेरहवी शताब्दी तक दण्डकारण्य क्षेत्र की सीमा के अंतर्गत प्राचीन बस्तर राज्य, जयपुर जमीन्दारी, गोदावरी के उत्तर का कुछ क्षेत्र तथा चाँदा जमीन्दारी का क्षेत्र सम्मिलित था। यह भी उल्लेखनीय है कि दण्डकारण्य की स्वतंत्र पहचान रही है एवं इसकी उपस्थिति को कलिंगारण्य के समानांतर माना गया था। 

बस्तर क्षेत्र (दण्डकारण्य) का भौगोलिक अध्ययन सर्वप्रथम भवभूति नें किया था। रियासतकालीन बस्तर तथा उसके भूगोल का स-विस्तार वर्णन पं. केदारनाथ ठाकुर नें अपनी पुस्तक “बस्तर भूषण” (1908) में किया है। महाराजा प्रवीरचन्द्र नें अपनी पुस्तक “आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड” (1966) में तत्कालीन बस्तर रियासत के भूगोल की बानगी प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “प्रमुखत: यह कहा जा सकता है कि यह रियासती भूखण्ड उत्तरी सीमा से शनै:-शनै: ढलवा होता जाता है और दक्षिण सीमा गोदावरी तक निरंतर नीचा होता गया है”।  

लाला जगदलपुरी नें अपनी पुस्तक “बस्तर इतिहास एवं संस्कृति” में बस्तर क्षेत्र को चार प्राकृतिक विभागों में बाँटा है – 
अ) उत्तर की निचली भूमि जो छत्तीसगढ के मैदान का सिलसिला है। 
ब) उत्तरपूर्वी पठार – यह केशकाल की तेलिन घाटी से आरंभ हो कर जगदलपुर के दक्षिण में तुलसी डोंगरी तक गया है। 
स) अबूझमाड़ का क्षेत्र 
द) दंतेवाडा घाटी जिसके पूर्व में विशाल पठार उत्तर में अबूझमाड तथा पश्चिम में बैलाडिला की पहाडियाँ हैं। 

प्रो. जे. आर वर्ल्यानी तथा प्रो. व्ही डी साहसी नें अपनी पुस्तक “बस्तर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास” में इस वर्गीकरण को अधिक सरल करते हुए प्राकृतिक दृष्टि से बस्तर को छ: भागों में बाँटा है - 
अ) उत्तर का निम्न या मैदानी भाग – इसका विस्तार उत्तर बस्तर, परलकोट, प्रतापपुर, कोयलीबेड़ा, और अंतागढ़ तक है। 
ब) केशकाल की घाटी – यह घाटी तेलिन सती घाटी से प्रारंभ हो कर जगदलपुर के दक्षिण में स्थित तुलसी डोंगरी तक लगभग 160 वर्गमील क्षेत्र में विस्तृत है। 
स) अबूझमाड़ – यह क्षेत्र बस्तर के मध्य में स्थित है। इसके उत्तरपूर्व में रावघाट पहाडी घोडे की नाल की तरह फैली है। यहाँ कच्चे लोहे के विशाल भंडार हैं। 
द) उत्तरपूर्वी पठार- यह पठार कोंडागाँव और जगदलपुर में फैला है। पठार का ढाल तीव्र है। 
ई) दक्षिण का पहाडी क्षेत्र – इसके अंतर्गत दंतेवाडा, बीजापुर व कोंटा के उत्तरी क्षेत्र आते हैं। 
फ) दक्षिणी निम्न भूमि – इसके अंतर्गत कोंटा क्षेत्र का संपूर्ण भाग तथा बीजापुर क्षेत्र का दक्षिणी भाग आता है। 

भूगोल एक लम्बे कालखण्ड तक अपरिवर्तनशील रहता है जब तक कि बडे भू-वैज्ञानिक बदलाव न हों। अत: बस्तर क्षेत्र के वर्तमान भूगोल को ही प्राचीन पुस्तकों में शब्दश: चित्रित पाया जा सकता है कि यहाँ की मनोरम हरित वसना धरती पहाड़ों, पठारों और मैदानों में विभाजित है। दंतेवाड़ा की तराइयों, बीजापुर की उँचाईयों और केशकाल घाटी की खाईयों ने बस्तर को विविधता, विचित्रता और उन्मुक्तता दी है तो रहस्य और रोमांच भी। यहाँ खुले मैदान और सघन वन; उर्वरा खेत और बंजर पथरीली भूमि; नदियाँ, झरने, ताल-तलाब तो सूखे फटे पानी पानी चीखते टीले-टपरे; बेहिसाब गर्मी से बिबाईयाँ होते मैदान तो महीनों तक जम कर बरसने वाली बरसातें जसी स्पष्ट विविधतायें विद्यमान हैं। 

इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल नें पुरा-भूगोल पर अपनी पैनी दृष्टि डाली है तथा उन्होंने बस्तर की अनेक पर्वत श्रंखलाओं का सम्बन्ध प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त विवरणों के आधार पर बस्तर क्षेत्र से स्थापित किया है। उनके विवरणों का ही संक्षेपीकरण अन्य विद्वानों के विचारों की सहमतियों से मिलाते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ। पं. सुन्दरलाल त्रिपाठी, पं केदारनाथ ठाकुर, महाराजा प्रवीर, लाला जगदलपुरी, प्रो. वर्लयानी, प्रो. साहसी तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल के विवरणों को जोड कर यह तस्वीर मिलती है कि प्राचीन बस्तर की उत्तरपूर्वी सीमा है शुक्तिमान/शुक्तिमत पर्वत [कनिंघम; आर्कियोलॉजिकल सर्वे रिपोर्ट, XIII, 24-26]। शुक्तिमान पर्वत वस्तुत: बस्तर को शेष छतीसगढ से पृथक करने वाली सिहावा तथा कांकेर के दक्षिण में स्थित पहाडियाँ हैं। शुक्तिमत पर्वत दण्डकारण्य की उत्तरपूर्वी सीमा है जो पूर्व में ओडोशा में अवस्थित महेन्द्र पर्वत से मिल जाती है। आधुनिक बस्तर की मातला दोंगरी, रावघाट, तेलिनघाटी तथा सिहावा पहाड़ की शाखाओं को प्राचीन शुक्तिमान पर्वत माना जा सकता है जो उत्तर बस्तर को घेरे हुए हैं। इस शाखा की प्रमुख प्रशाखा परलकोट, परलकोट-परतापपुर-कोईलीबेडा-अंतागढ-कांकेर-सिहावा तक फैली हुई है। रामायण में उत्तरवर्ती पर्वत श्रंखलाओं के अंतर्गत चित्रकोट एवं अयोमुख पर्वतों का उल्लेख मिलता है। इन्हें वर्तमान के साथ निम्न तरह से समझा जा सकता है – अ) चित्रकूट पर्वत: - रामायण के अयोध्याकाण्ड के अनुसार चित्रकोट में मंदाकिनी (इन्द्रावती) तथा मालिनी (नारंगी) नामक दो नदियाँ थी। वाल्मीकी रामायण में चित्रकोत को शालवनों से घिरा हुआ माना गया है। ब) अयोमुख पर्वत:- इस पर्वत की ओर सीतांवेषण के लिये सुग्रीव नें अंगद को भेजा था। संस्कृत में अयस का अर्थ है लोहा तथा अयोमुख एसा पर्वत प्रतीत होता है जिसके मुख में लोहा हो। गोंडी में मेटा का अर्थ पर्वत है तथा लोहे के लिये कच्च या कच्चा प्रयोग में आता है। इस आधार पर पश्चिमोत्तर बस्तर में (रावघाट तथा अबूझमाड से संलग्न क्षेत्रों में) कई पहाडियाँ कच्चामेटा के नाम से जानी गयी हैं। 

मध्यवर्ती पर्वत श्रंखलाओं के लिये विशेष रूप से प्रस्त्रवण पर्वत का उल्लेख मिलता है। प्रस्त्रवण को आधुनिक बस्तर से आन्ध्र के खम्माम तक विस्तृत माना जा सकता है। बस्तर की बैलाडिला पर्वत श्रंखला, विनता, टिकनपल्ली, अरनपुर, गोलापल्ली, किलेपल्ली, गोगोण्डा तथा उसूर की पहाडियों के लिये प्रस्त्रवण प्रयुक्त होता है।  

बस्तर क्षेत्र की पूर्ववर्ती पर्वत श्रंखलाओं का सीधा सम्बन्ध महेन्द्र पर्वत से स्थापित होता है। महेन्द्र पर्वत वर्तमान ओडिशा में महानदी के दक्षिण में गंजाम जिले व उसके पार्श्व में व्याप्त है। समुद्र तल से इसकी उँचाई 5000 फीट है। बस्तर से महेन्द्र पर्वत का सम्बन्ध जोडने वाली श्रंखलायें हैं – अ) माल्यवान पर्वत: - माल्यवान को प्रस्त्रवण पर्वत के एक शिखर के रूप में निरूपित किया गया है। बस्तर में तुलसी डोंगरी पहाडी माल्यवान कही जा सकती है। ब) क्रौंचगिरि:- यह पहाडी कोरापुट जिले में अवस्थित है तथा शबरी नदी इससे लग कर प्रवाहित होती है। रामायण के अरण्य़ काण्ड में उल्लेख “क्रौंचारण्यमतिक्रम्य मतंगस्याश्रमंतरे” के अनुरूप यहीं पर मतंग मुनि का आश्रम होना माना जा सकता है। स) ऋष्यमूक पर्वत:- रामायण में उल्लेखित विवरणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किन्धा राज्य के बीच बहुत दूरी नहीं थी एवं मलय पर्वत भी निकट ही था। इस आधार पर इसकी उपस्थिति शबरी नदी के निकट ओडिशा में ही सिद्ध होती है। इसी क्षेत्र में बाली-सुग्रीव नाम के एक पर्वत की उपस्थिति है जिससे लग कर गोदावरी के तट पर उत्तर की ओर किष्किन्धा पर्वत है। यही ऋष्यमूक पर्वत है जिसका विस्तार कालाहाण्डी से कोरापुट तक व्याप्त है। 

दक्षिणवर्ती पर्वत श्रंखलाओं की बस्तर में स्थिति को जानने के लिये मलय पर्वत के विस्तार को समझना आवश्यक है। मलय पर्वत वर्तमान पूर्वीघाट पर्वत श्रंखलाओं के लिये प्रयोग में आता है। लगभग 2000 फीट की उँचाई वाली पर्वत श्रंखलायें समुद्रतट से समानांत स्थित हैं। मलय पर्वत श्रंखला के अंतर्गत ही दक्षिण बस्तर व उससे जुडी आन्ध्रप्रदेश की पहाडियाँ आती हैं। सुकमा की गोलापल्ली (दक्षिण पश्चिम में कोण्टा तक विस्तार), उसूर (कोटपल्ली से भोपालपट्टनम), बरहा डोंगरी (दंतेवाडा तथा बीजापुर के मार्ग में) जिसकी एक शाखा दक्षिणोन्मुख हो कर चिंतलनार, फोतकेल तथा कोण्टा को घेरे हुए है मलय पर्वत की उप-शाखायें हैं। इसकी एक अन्य उप-शाखा बीजापुर से होती हुई उसूर की पहाडियों से मिल कर भोपालपट्टनम की ओर चली गयी हैं। प्राचीन बस्तर के इतिहास में इसी श्रंखला के रामगिरि पर्वत का अत्यधिक वर्णन प्राप्त होता है। आन्ध्रप्रदेश के खम्माम जिले के अंतर्गत भद्राचलम तालुका में रामगिरि पर्वत की अवस्थिति मानी जा सकती है जिसका वर्णन कालिदास नें भी मेघदूत में विभिन्न आयामों से किया है। 

पश्चिमी घाट से जुडे पर्वतों को पुराणों में सह्य पर्वत माना गया है। गोदावरी नदी को सह्यपर्वत से ही निकला बताया गया है। इस अतिविस्तृत पर्वत श्रंखला की एक उपशाखा कुञवान पर्वत की पहचान बस्तर क्षेत्र में होती है। कुञवान पर्वत पर कबन्ध नामक राक्षस का निवास बताया जाता है। प्राचीन काव्यकृतियों में इसे इन्द्रावती तथा गोदावरी के मध्य का क्षेत्र बताया गया है इस आधार पर अबूझमाड ही कुञवान प्रतीत होता है। अबूझमाड विविध पहाडियों के समूह के रूप में परलकोट/कुटरू से प्रारंभ हो कर नारायणपुर तथा छोटे डोंगर तक फैला हुआ है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राकृतिक अवरोधों से घिरा हुआ है। अबूझमाड क्षेत्र में ही राकसमेटा (राक्षस पर्वत) नाम की कई पहाडियाँ हैं। एक छोटी पहाडी राक्षस पडेका (राक्षस हड्डी) कही जाती है जिसके पीछे मान्यता है कि यह अस्थियों के ढेर लगने के कारण निर्मित हुई हैं। एक रोचक पहाडी कोईलीबेडा के जीमरतराई गाँव के निकट है जिसके पत्थर अस्थियों जैसे गुणधर्म रखते हैं। इन्हें जलाने पर हड्डियों जैसी गंध आती है।  

वर्णित प्रकार की पर्वत श्रंखलायें बस्तर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और भैगिलिक विविधता के लिये ही नहीं विशिष्ठ जैव-विविधताओं के लिये भी जानी जाती हैं। प्रत्येक प्राकृतिक विभाग प्राचीन काल से मानव विकास के आयामों को अपनी परिधियों के भीतर गढता रहा तथा हर परिधि नें अपने आँचल में अनन्य प्रकार की जनजातियों को संरक्षण दिया है। नदियों के विस्तार को समख कर ही उसके कारण बने भैगोलिक क्षेत्रों और उत्पन्न हुई विविधताओं को समझा जा सकता है। विश्वेसर पाण्डेय के ग्रंथमन्दार मंजरी (वाराणसी, 1955) में वर्गीकरण मिलता है कि रामायण और परवत्री साहित्य के आधार पर दण्डकारण्य क्षेत्र प्राचीन काल से ही दो प्राकृतिक भागों में बँटा था तथा इन्द्रावती नदी इसको विभाजित करने का कार्य करती थी। इस आधार पर उत्तरी भाग को शुक्तिमत क्षेत्र तथा दक्षिणी भाग को सप्तगोदावरी क्षेत्र या गौतमी प्रदेश कहा गया है। बस्तर क्षेत्र की नदी-प्रणालियाँ दो वृहत सरिताओं का जलागम क्षेत्र निर्मित करती हैं। ये नदियाँ हैं महानदी तथा गोदावरी। 

महानदी ओडिशा की सबसे विशाल नदी है जो प्राचीन बस्तर के सिहावा की पहाडियों से निकलती है। यह सिहावा से प्रवाहित हो कर कांकेर जिले की ओर बढती है तत्पश्चात बिलासपुर तथा रायगढ होते हुए सम्बलपुर (ओडिशा) में प्रवेश करती है। यहाँ से दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हुई महानदी कटक शहर से गुजर कर बंगाल की खाडी में विसर्जित होती है। बस्तर के उत्तर पूर्व में केशकाल के निकट तेलिनघाटी की पहाडियों से उत्तर की ओर प्रवाहित होने वाली कुछ नदियाँ महानदी सरितप्रणाली के अंततर्गत आती हैं एवं उसके जलागमक्षेत्र का हिस्सा हैं। इनमें सेन्दर, चिनार, दूध, हतकुल, दूरी, तेन्दुला (इसपर तेन्दुला बांध भी बना हुआ है), कांकेर तथा तेलनदी प्रमुख हैं। 

गोदावरी नदी का जलागम बस्तर की धरती का बहुत वृहत क्षेत्र है। बस्तर तथा आन्ध्रप्रदेश से गुजरते हुए गोदावरी के प्रवाह में दस सहायक नदियाँ बायीं ओर से तथा ग्यारह दाहिनी ओर से मिलती हैं। पूर्णा, कदम, प्राणहिता तथा इन्द्रावाती बायीं ओरकी महत्वपूर्न नदियाँ हैं जबकि दायीं ओर की नदियों में मंजरी, सिन्दकना, मनेर और किनरसिनी हैं। प्राचीनकाल में (1320 तक) गोदावरी बस्तर की दक्षिणपूर्वी सीमा बनाने का कार्य करती थी। अब बस्तर के अनेक क्षेत्रों के महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश व ओडिशा में चले जाने के कारण गोदावरी अब बस्तर के मात्र दस मील क्षेत्र में ही प्रवाहमान है व भद्रकाली के निकट बस्तर की सीमा बनाती है। बस्तर स्थित गोदावरी की सहायक नदियों में इन्द्रावती, शबरी, तालपियर, गुब्बेक, उसूर प्रमुख हैं। 

इन्द्रावती और उसकी सहायक नदियो पर चर्चा इस लिये भी आवश्यक है कि यही बस्तर की प्रमुख नदी प्रणाली है जो संभाग के मध्यभाग से प्रवाहित होती है। रामायण में वर्णित मंदाकिनी नदी वर्तमान इन्द्रावती ही है। यह बस्तर क्षेत्र की 240 मील की यात्रा कर इसे दो भागों में विभक्त कर देती है। इन्द्रावती ओडिशा प्रांत के कालाहांडी के पास रामपुर घुमल नामक स्थान से उत्पन्न होती है जहाँ से तीस मील तक दक्षिण-पश्चिमोन्मुख होती हुई कालाहाण्डी व कोरापुट जिले की परिधियों से होते हुए बस्तर की सीमा में प्रवेश करती है। इन्द्रावती नदी ही जगदलपुर के निकट चित्रकोट जलप्रपात का निर्माण करती है। चित्रकोट के निकट ही नारंगी नदी इन्द्रावती से मिलती है तथा लगभग दस मील और आगे चलने पर भँवरडिंग नदी आ कर मिल जाती है। यहाँ से आगे बढते ही इन्द्रावती नदी अबूझमाड की दक्षिणी सीमा बन जाती है तथा भोपालपट्टनम के निकट आ कर गोदावरी से मिल जाती है। इन्द्रावती नदी के किनारे जगदलपुर, चित्रकोट, बारसूर तथा तिम्मेड़ एतिहासिक स्थान हैं। इन्द्रावती नदी की अनेको सहायक नदियाँ हैं जिनमें कांकेर, काकडीघाट, केंदा, कोतरी, कोमरा, कोयर, खण्डी, गुडरा, गोंईन्देर, चारगाँव, चिंतावागु, डंकिनी, दंतेवाडा, दहकोंगा, दुर्ग, नारंगी, बेरुडी, गुरियाबहार, बोरोदा, भँवरडिंग, माड़िन, माडी, मातलाघाट, मान्देर, माकडी, रायकेरा, रावघाट, वड़ी, वालेर, संकिनी, ताडुकी, तथा सिंगार बहार।  

शबरी नदी कोरापुट की सिंगारम नामक पहाडी से निकलती है तथा सर्पिल गति से उत्तरपश्चिम में प्रवाहित हो कर कोरापुट के दक्षिण में पाँच मील की दूरी पर आगे बढ जाती है एवं प्राचीन जयपोर राज्य की सीमा में प्रवेश करती है। यहाँ से दक्षिणोन्मुख हो कर यह कोरापुट व बस्तर की सीमा का निर्धारण करती है। पुन: पश्चिम की ओर मुड कर तुलसीडोंगरी से होते हुए शबरी नदी बस्तर में बहने लगती है। सुकमा में कुछ दूर बहने के पश्चात शबरी सुकमा तथा मालकागिरि एवं कोण्टा तथा मालकागिरि के बीच की सीमारेखा बनती हुई प्रवाहित होती है। आगे यह भद्राचलम होते हुए गोदावरी नदी में समाहित हो कर अपनी यात्रा समाप्त करती है। शबरी नदी दोर्ला क्षेत्र की पूर्वी सीमा निर्धारण का कार्य भी करती है। इसके प्रांत भाग में दर्जनों दोर्ला बस्तियाँ हैं; पथा पेंटा, आरगट्टा, मनीकोंटा, बिरला, एर्राबोर, मूलाकिसोली, जगारम, मेट्टागुडा, नँजमगुडा, आसिरगुडा, इंजरम आदि। दक्षिण में शबरी नदी के तटवर्ती क्षेत्र कोण्टा तक दोर्ला जनजाति मिलती है व ढोंढरा इनका सबसे बडा गाँव है। शबरी की प्रमुख सहायिकाओं में पोट्टेरु नदी मलकांगिरि (कोरापुट) में बालीमेरा के पास शबरी से मिलती है; कांगेर नदी टाँगरी डोंगरी से निकल कर अपने उत्तरपूर्व में शबरी से मिलती है जहाँ से यह नदी मालकांगिरि में प्रवेश कर पुन: बस्तर की ओर लौटती है। मालेंगर नदी बैलाडिला की दक्षिणी श्रेणियों से निकल कर सुकमा और दुब्बाटोटा के बीच शबरी से मिलती है। तीरथगढ के निकट मालेंगर नदी 150 फुट की ऊँचाई से गिर कर तन्नामक प्रपात बनाती है। सिलेरू नदी कोण्टा के नीचे शबरी से आ मिलती है। शबरी नदी के तत पर गुप्तेशवर, तिलवर्ती, सुकमा, मिस्सा, ढोंढरा व कोण्टा आदि एतिहासिक गाँव हैं। 

कालिदास के रघुवंश तथा भवभूति के उत्तररामचरित में मुरला नदी का उल्लेख मिलता है जिसको महर्षि अगस्त्य के आश्रम के निकट से हो कर बहना बताया जाता है। इस आधार को बस्तर की तीसरी प्रमुख नदी तालपेरु या तालपियर के साथ जोड कर देखा जाता है। अपने ग्रंथ बस्तर भूषण (1908) में वर्णन करते हुए पं केदारनाथ ठाकुर लिखते हैं कि तालपियर बैलाडिला पहाड की नंदराज गुहा से निकली है; यह नदी बीजापुर, फोतकेल, कोतापाल होती हुई गोदावरी में समाहित हो जाती है। इसके अलावा टिकनपल्ली-गोलापल्ली की पहाडियों से निकलने वाली गुब्बेल नदी कोतापल्ली के नीचे गोदावरी नदी से मिलती है। यह बस्तर के दक्षिणी निम्नभूमि के पश्चिमी भाग को सींचती है। उसूर से निकलने वाली उसूर नदी वारंगल तथा बस्तर की सीमा पर गोदावरी से मिलती है। 

वर्तमान बस्तर और प्राचीन बस्तर की भौगोलिक पहचान को निरूपित करते ही प्राचीन बस्तर का इतिहास साकार हो उठता है। इसी ज्ञात भूगोल आधार ही बस्तर क्षेत्र का प्राचीन गौरव निरूपित होता है एवं प्राचीन काल में इस की सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर एक समझ विकसित होती है। भूगोल और वर्तमान जनजातियों का अंतर्सम्बन्ध, भूगोल तथा पुरा-ग्रंथों में वर्णित जनजातियों की उपस्थिति के स्थल तथा वर्तमान से साम्यतायें एक अलग विश्लेषण का विषय है जिसपर मैं अगले आलेखों में चर्चा करूंगा। इस आलेख के उपसंहार के लिये मुझे लाला जगदलपुरी के उस यात्रावृतांत से बेहतर कुछ नहीं मिलता जहाँ वे इन्द्रावती नदी के गोदावरी में समाहित हो जाने का वर्णन इन शब्दों में करते हैं – “एक छोर से दूसरे छोर तक पत्थरों का सिलसिला कुछ एसा चला गया है जैसे कि विभिन्न आकार प्रकार की पाषाण मूर्तियाँ वहाँ स्थापित कर दी गयी हों। पानी के हाँथो तराशी गयी इन आकृतियों में आप अपनी मनचाही आकृति तलाश कीजिये, अवश्य मिलेगी। रेत पर कुछ दूर चलने के बाद संगम की दुरंगी धाराओं नें हमें मुग्ध कर दिया। नीली और गेरुई धाराओं नें अपने में समोये रखा, थकान मिटा दी। मानना पडेगा कि इस संगम में गोदावरी को समर्पित हो कर भी इन्द्रावती अपनी पहचान नहीं खोती। उसके पानी का गेहुँआ रंग स्पष्ट दिखाई देता था। इन्द्रावती का गेहुँआ पानी कुछ गर्म लगता था, किंतु गोदावरी का नीला जल काफी ठंडा मालूम होता था।....। इंद्रावती-गोदावरी मिलाप। इधर पहाडियाँ, उधर पहाडियाँ बीच में संगम का बहता बहता दुरंगा पानी। नीला जल, गेरुआ जल। आन्ध्र, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा-रेखायें”। 

बस्तर भूमि की पहचान शास्वत है तथा बनी रहनी चाहिये। इसीलिये ‘बस्तर के भूगोल’ को ‘बस्तर के वर्तमान’ पर अपनी समझ विकसित करने से पहले जानना आवश्यक है। बस्तर की पहचान उसके पर्वत, उसकी मिट्टी उसकी सरितायें और उसके वनवासी हैं। लाला जगदलपुरी जैसे बस्तरियों नें इस भूमि को बूझने के लिये जीवन लगा दिया और बूझा भी क्या खूब कि उनकी ही एक पंक्ति से समझिये - “मैं इन्द्रवती नदी के बूँद-बूँद को/ अपने दृगजल की भाँति जानता आया हूँ”। हाँ यही बस्तर की धरती को जानने का वास्तविक सूत्र है।  
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Friday, July 27, 2012

प्राचीन बस्तर - रामायणकालीन दण्डकारण्य का इतिहास [1]


सान्ध्य दैनिक - ट्रू सोल्जर में प्रकशित दिनांक 26.07.2012


रामायण को ले कर प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज के अपने पूर्वाग्रह हैं तथा उसके बीच अंतर्निहित अतीत की ओर कोई शोध भरी दृष्टि से देखने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। धार्मिक समाज भी मन की गुफाओं में प्रसन्न है; वह सदियों से स्थापित कविता की कल्पनाशीलता से बाहर नहीं आना चाहता तथा घटना के उपर आरोपित बिम्बों को पृथक करने का प्रयास नहीं करता। आज जब हम यह रटते इतराते रहते हैं कि ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ तो फिर प्राचीन अतीत के साहित्य को खारिज करते हुए क्या एक पूरे कालखण्ड का दर्पण तोडने का दुस्साहस हमारे ही पूर्वाग्रहों का नहीं है? वस्तुत: तर्क की आड़ में प्राचीन कविता के आलंकारिक तत्वों की पूर्णत: अव्हेलना कर के हमने मिथक और इतिहास को पृथक-पृथक करने का कार्य अब भी मनोयोग से नहीं किया है। हमें मध्यकालीन चारण-भाटों की नृप-स्तुतियों में तो इतिहास नजर आता है और अतिश्योक्तियों में भी प्रमाण तलाशने का दावा कर लिया जाता है किंतु पुरा अतीत को सम्प्रदाय विशेष की मनोभ्रांति कह कर खारिज कर देते हैं....हमारी यह वृत्ति हमें एक दिन बहुत भारी पडने वाली है। बस्तर के रामायणकाल पर बात करने से यह भूमिका इस लिये क्योंकि दण्डकारण्य क्षेत्र की उपेक्षा इतिहास अन्वेषण ही नहीं धार्मिक महत्व, दोनो ही दृष्टियों से हुई है। विचारधारा वादी इतिहासकारों का यदि बस चले तो जर्मनी या पोलैंड से किसी सोच का ताला बस्तर की पुरातनता पर जड कर निश्चिंत ही हो जायें और वापस मुगल सल्तनत पर अपने अध्ययन में व्यस्त दिखने लगें। 

धर्म के झंडाबरदारों को भी या तो अयोध्या नज़र आती है या श्रीलंका किंतु उस बस्तर अथवा दण्डकारण्य की धार्मिक महत्ता पर मौन किसलिये जब कि हनूमान भी इसी धरती नें दिये चूंकि किष्किन्धा राज्य के दण्डकारण्य में होने के प्रमाण मिलते हैं, राम के वनवास का दस वर्ष से अधिक समय यहीं के जंगलों में गुजरा है तथा उन्होंने गोदावरी नदी के पास जिस पंचवटी में वनवास काल बिताया था वह स्थान भी दण्ड़कारण्य में ही है। राम विंध्य पार कर दण्ड़कारण्य आये, उन दिनों यह क्षेत्र सभ्यता का बड़ा केंद्र भी हुआ करता था। अगस्त्य, सुतीक्ष्ण, शबरी, शम्बूक, माण्डकर्णि, शरभंग आदि ऋषि-मुनियों की यही कर्मस्थली रही है। तब शूर्पणखा, खर, दूषण, त्रिशिरा, अकम्पन, मारीच जैसे बलशाली राक्षस दण्ड़कारण्य में ही रहा करते थे और रावण की मर्यादा से बंधे हुए थे। सीता का रावण के द्वारा अपहरण भी दण्डकारण्य में ही हुआ तथा जटायु नें भी इसी पावन धरती पर प्राण त्यागे। सुग्रीव को राज्य दिला देने के बाद थोड़े समय के लिए राम जिस प्रस्त्रवण पर्वत पर रहने लगे थे वह स्थान भी दण्ड़कारण्य में ही है। 

प्राचीन समय के साहित्य से उस समाज की कल्पना करना हो तो हमें एक पूरा भूगोल गठित करना होगा जिसके साथ साथ मिथक कथा की यात्रा चल रही है। जनश्रुतियों, मुहावरों तथा लोकगीतों के पास भी ठहर कर बैठना होगा तभी किसी क्षेत्र की पुरातनता के प्रमाण दबे पाव आपकी ओर पहुँच सकते हैं। आईये वर्तमान में अतीत की कुछ आहट तलाशते हैं। दण्डकारण्य और बस्तर की साम्यता कहता बस्तर के काकतीय शासक दिक्पाल देव का एकशिलालेख दंतेवाडा से प्राप्त हुआ है जो दण्डकारण्य क्षेत्र में बस्तर राज्य होने की घोषणा करता है – 

‘दण्डकारण्य निकट वस्तर देशे राज्यं चकार। (1703 ई.) 

अपने एक लेख में मैने दण्डक जनपद के अरण्य होने की कथा प्रस्तुत की थी। इसी आलोक में बस्तर के ही प्राचीन दण्डकारण्य क्षेत्र होने का एक जीवित साक्ष्य हैं “दण्डामि माडिया आदिवासी” जो अबूझमाड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगे मैदानों में आज भी निवास करते हैं। पहचान के साथ जुडा दण्डामि शब्द तथा मैदान क्षेत्र को आवास के लिये चुनना उनके एक समय के सांस्कृतिक परिवर्तन का हिस्सा होने को प्रमुखता से सत्यापित करता है। इसका सम्बन्ध उस काल के राजा दण्ड के शासन की स्मृतियों से प्रतीत भी होता है। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल रतनपुर शिलालेख में उद्धरित दण्डकपुर का सम्बन्ध नारायणपुर तहसील के तन्नामक ग्राम से जोडते हैं इतना ही नहीं दण्डवन नाम से आज भी छोटे डोंगर के निकट के वन, बेडमाकोट के निकट के जंगल अथवा कोण्डागाँव के निकट के कुछ वन क्षेत्र आदिम समाज के बीच भी जाने जाते हैं। नारायणपुर के समीपस्थ क्षेत्रों में कसादण्ड, गौर दण्ड, बघनदण्ड जैसे गाँव भी मिलते हैं जिनमें उपसर्ग की तरह चिपका दण्ड शब्द प्राचीनता एवं एतिहासिकता की ओर ही इशारा करता है। 

प्राचीन ग्रंथों में दण्ड़कारण्य क्षेत्र की दक्षिणी सीमा गोदावरी और शैवल पर्वत मानी गयी है जबकि पूर्वी सीमा कलिंग तक जाती है। महानदी इसकी उत्तरी सीमा बनाती है तथा रामायण-काल में इस क्षेत्र की पश्चिमी सीमा विदर्भ जनपद से मिल जाती थी। इस तरह संपूर्ण वर्तमान बस्तर तथा आस-पास के कुछ क्षेत्र ‘प्राचीन बस्तर या दण्डकारण्य’ कहे जा सकते हैं। वाल्मीकी रामायण का अरण्य काण्ड वस्तुत: प्राचीन बस्तर अथवा दण्डकारण्य के इतिहास-भूगोल के दस्तावेजीकरण की तरह भी देखा जा सकता है। उदाहरण के लिये वाल्मीकि रामायण में दो मंदाकिनी नदियों का उल्लेख मिलता है। अरण्यकाण्ड में उल्लेखित मंदाकिनी नदी अयोध्याकाण्ड की उल्लेखित मंदाकिनी नदी से पूर्णत: भिन्न हैं। अरण्यकाण्ड की मंदाकिनी अत्रि, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य के आश्रम से महिमामंडित दंडकारण्य़ की मंदाकिनी है; वायुपुराण में इसी मंदाकिनी का उल्लेख इन्द्रनदी के नाम से भी हुआ है जिसे वर्तमान में इन्द्रावती के नाम से जाना जाता है। 

लेखक तथा स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुन्दरलाल त्रिपाठी नें बस्तर के भूगोल को निरूपित करने के लिये वाल्मीकी रामायण से राम के राज्याभिषेक के समय का एक प्रसंग उद्धरित किया है जहाँ मंथरा कैकेयी को याद दिलाती है कि अयोध्या से दक्षिण में दण्डकारण्य का क्षेत्र है जिसके निकट वैजयंतपुर में असुर राजा तिमिराध्वज राज करते हैं– 

दिशमास्थाय कैकेयी दक्षिणान दण्डकान प्रति। 
वैजयंतपुरमिति ख्यातं पुरं यत्र निमिध्वज:॥ 

दण्डकारण्य के भूगोल को कालांतर में भास नें अपने नाटक “प्रतिभा”, कालिदास नें “मेघदूत” तथा भवभूति नें “उत्तर रामचरित” में स्पष्ट किया है। 

रामायणकाल का वर्णन करते ग्रंथों में साल वन, पिप्लिका वन, मधुबन, केसरी वन, मतंगवन, आम्रवन आदि का वर्णन स्थान स्थान पर मिलता है यही वर्तमान बस्तर के भी प्रमुख पादप-वृक्ष-वनसमूह हैं। अरण्यकाण्ड का यह श्लोक देखें जो कि साल वनों तथा कंदमूल की दण्डकारण्य में प्रचुरता के विषय में उल्लेख है – 

समिदिभस्तियकलशै: फलमूलैश्च स्भोभितम। 
आरण्यैश्च महावृक्षै: पुष्पै: स्वादुफलैवृर्तम॥ 

दण्ड से प्रारंभ कर के राम के वनवास काल तक का गंभीरता पूर्वक अध्ययन करने से यह सत्य निकल कर आता है कि आद्य एतिहासिक युग में आर्यों का प्रसार बस्तर तक हो गया था, इसका उल्लेख वाल्मीकी रामायण (अरण्यकाण्ड), अर्थशास्त्र, पद्मपुराण, रघुवंश, कामसूत्र, जातकों तथा जैन ग्रंथों आदि में भी मिलता है। बस्तर की स्थानीय परम्पराओं तथा स्थलों के नाम भगवान राम के साथ संबंध स्थापित करते हैं। इसका उदाहरण बस्तर क्षेत्र में शबरी नदी, रामगिरि पर्वत, चित्रकूट; नारायणपुर तहसील स्थित कोसलनार, राममेंटा, रामपुरम, रामारम, लखनपुरी, सीतानगर, सीतारम, रावणग्राम आदि हैं (वी डी झा, उपरिवत 1982, पृ 11-12)। अर्थात वैदिक साहित्य में उल्लेखित शव विसर्जन तथा कब्र निर्माण विषय निर्देशो का अक्षरक्ष: पालन करने वाले अबूझमाड़िया एवं दण्डामि माड़िया वैदिक आर्यों के सम्पर्क में आये थे तथापि उन्होंने अपनी मूल परम्पराओं को जीवित रखा। पं. गंगाधर सामंत नें बस्तर क्षेत्र को रावण का उद्यान कहा है। उन्होंने भी माड़ियाओं को बस्तर की प्राचीनता से निवास कर रही जनजाति निरूपित किया है। वे भी गोदावरी नदी, श्रीराम गिरि और शबदी नदी के अंतर्सम्बन्ध को राम के वनवास क्षेत्र से ही जोड कर देखते हैं। गंगाधर सावंत रावण और बस्तर क्षेत्र में उसके निरंतर आगमन को सिद्ध करने के लिये एक जनश्रुति का सहारा लेते हैं। वे कहते हैं स्थानीय लोग गिद्ध पक्षी को “रावना” कहते हैं संभवत: वे तब पुष्पक विमान से साम्यता, आकार व उसके रावण का वाहन होने के कारण एसा कहने लगे होंगे।

रामायणकालीन बस्तर निश्चित ही दो संस्कृतियों के प्रयाग का समय रहा। यह आर्यों का पुनरागमन काल था चूंकि एसा प्रतीत होता है कि इक्ष्वाकु वंश के शासक दण्ड को शुक्राचार्य नें अपनी पुत्री से बलात्कार किये जाने से क्रोधित हो कर माडियाओं के सहयोग से वन्य क्षेत्र से खदेड दिया तथा उसके शासन प्रतीकों को आग के हवाले कर के क्षेत्र को निरा अरण्य बना दिया होगा। इसके बाद जितनी भी ज्ञात घटनायें हैं उनके कवितातत्वों को अलग करने के पश्चात ऋषि अगस्त्य के विन्ध्य पार कर के दक्षिणापथ आने तथा सर्वप्रथम यहाँ आश्रम के संचालन का उल्लेख मिलता है। आर्यों के आगमन की अगली आहट राम के कदमों के साथ ही आरंभ होती है। एक अन्य महत्वपूर्ण संदर्भ जो समझ आता है कि राम नें केवल युद्ध का मार्ग नहीं चुना अपितु संधि के मार्ग का ही अधिकतम उपयोग किया। रामायण में वर्णित तत्कालीन बस्तर की कई जनजातियों को प्रतीकों के माध्यम से श्लोको/काव्यग्रंथों में स्थान मिला है जैसे गीध (वर्तमान गदबा जनजाति से साम्यता); शबरी (शबर/ बोंडो परजा जनजाति); वानर, भालू आदि। इस संभी प्रतीकों में सहसम्बद्ध एवं वर्णित गुणों को वर्तमान की उपस्थित जनजातियों में अथवा उनके गोत्र चिन्हों की पहचान को सामने रख कर भी देखा जा सकता है। राम का युद्ध खर दूषण से हुआ; राम और रावण (दो भिन्न संस्कृतियों) के बीच एक बडे युद्ध की रूपरेखा जो दण्डकारण्य में तैयार हुई वह पूरी तरह से आर्य-द्रविड संघर्ष या इस तरह के किसी तर्क का अक्षरक्ष: सत्य आख्यान नहीं माना जा सकता चूंकि रावण से युद्ध करने वाली राम की सेना दण्डकवन और निकटवर्ती आम जनजातियों की निर्मित थी। यह उस काल के जटिल समाजशास्त्र को समझने का पहलू मात्र है कि राम शबरी के बेर ही नहीं खाते अपितु शबर जनजाति के साथ प्रेम का संबंध गठित कर लेते हैं। राम के लिये जटायु मित्र हैं और जटायु की वर्णित सभी विशेषताये बस्तर की गदबा जनजातियाँ धारण करती हैं। राम सुग्रीव का साथ ही नहीं देते अपितु वानर-भालू के प्रतीक धारण करने वाली शक्तिशाली जनजातियों से मित्रता भी हासिल कर लेते हैं। राम दण्डक प्रवास के दौरान कुछ सेनाओं से भी युद्ध करते हैं जिसके लिये आम जनजातियाँ ही उनकी सहयोगी होती हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल लंका को भी गोदावरी डेल्टा में ही निरूपित करते हैं।

रामायण में वर्णित वानर कौन थे यह विवाद का विषय रहा है कई विद्वान मुण्डा जनजातियों से उन्हें जोड कर देखते हैं तो कुछ विद्वानों नें छत्तीसगढ की ही उराँव जनजाति को रामायण कालीन वानर माना है। डॉ. हीरालाल शुक्ल नें अपनी पुस्तक रामायण का पुरातत्व में वानर प्रजाति के सभी गुणों का प्राचीन ग्रंथो से प्राप्त उल्लेखों के आधार पर अध्ययन किया है। उनके अनुसार ऋष्यमूक, पम्पासर तथा किष्किन्धा के ज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि प्राचीन किष्किन्धा जनपद अर्थात वर्तमान कोरापुट, कालाहांडी तथा काकिनाडु जिलों में निवास करने वाली आदिम प्रजाति कंध ही प्राचीन वानर प्रजाति की उत्तराधिकारिणी कही जा सकती है। केदारनाथ ठाकुर (1908) भी इस बात का उल्लेख अपनी कृति बस्तर भूषण मे करते हुए कहते हैं कि कंध (खोंड, कोंडा) स्वयं को वानरवंशी मानते हैं। इस जाति का गोत्रप्रतीक वानर है तथा वंशो के नाम सुग्री, हनु, जाम्ब आदि हैं जो कि इन्हें रामायण में वर्णित वानर प्रजाति के बहुत निकट ले आते हैं। डॉ. हीरालाल आगे उल्लेख करते हैं कि कंध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई, कुवि तथा कुबि प्रभृति है जो इन्हें कोयतूर (गोंड) जनजाति के निकट अधिक सिद्ध करती है। प्रकृति की दृष्टि से ये बस्तर की दण्दामि माडिया प्रजाति से बहुत भिन्न नहीं हैं। इन कडियों को आपस में जोडने पर यह स्पष्ट नहीं होता कि आखिर राक्षस किसे कहा गया है? कई विद्वान गोंड जनजाति की कुछ शाखाओं में राक्षस होने की साम्यता तलाशते हैं तो कुछ के अनुसार प्राक मध्यवर्ती द्रविड जन या आन्ध्र जन प्राप्त विवरणों एवं प्राचीन ज्ञात भूगोल के अधिक निकट मिलते हैं। सातवाहनों और राक्षसों के बीच साम्यता के कई उदाहरण इतिहासकार तलाशते हैं। 

इस सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि रामायण कालीन बस्तर विभिन्न मूल जनजातियों से आर्यों का संघर्ष ही नहीं संधि काल भी रहा है। मेरे एसा मानने के कुछ अन्य कारण भी हैं। बस्तर क्षेत्र में न केवल आर्य आगमन अपितु सुदूर दक्षिण के क्षेत्रों से भी आगमन एवं आक्रमण के उल्लेख मिलते हैं। रामायणकालीन वृतांतों अथवा जनश्रुतियों में जनजातियों के मध्य संघर्ष की कथा नहीं मिलती, किसी तरह के गृहयुद्ध का कोई उल्लेख नहीं है यद्यपि सिंहासन अथवा सत्ता को ले कर पारिवारिक खींचतान की अवश्य कुछ कथायें विद्यमान हैं। एसे में बस्तर और राम के सम्बन्धों को संघर्ष के साथ कम तथा सांस्कृतिक सम्मिलन के साथ अधिक देखना चाहिये। राम के बस्तर से निकल कर दक्षिण की ओर प्रस्थान करने के पश्चात के संघर्ष की भले ही व्यापक समीक्षायें की जायें। रामायणकालीन बस्तर अनेक जनजातिगत विशेषताओं से युक्त क्षेत्र रहा है तथा प्रतीत होता है कि आदिकाल से ही यह क्षेत्र संस्कृति सम्मिश्रण की मध्यरेखा ही बना रहा है। इस कडी के साथ चल कर भी प्रतीत होता है कि तत्कालीन बस्तर अपने लचीलेपन के कारण मिटने से बचा भी रहा।
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चित्र प्रस्तुति: http://www.johann-rousselot.com/ से साभार; 
यह तस्वीर दंतेवाडा के निकट खींची गयी बतायी जाती है।