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Thursday, December 19, 2013

बस्तर के लोकजीवन में रचा बसा नशा


अक्टूबर 2012 की बात है। भाई अशोक कुमार नाग के साथ उनके गाँव गया था। वहाँ से आदिवासी जीवन की कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मैने एकत्रित की। यह कहना अनुचित न होगा कि महुआ, शराब और नशा लगभग हर घर की कहानी है। किसी न किसी तरह अपने दैनिक उपयोग का नशा आदिवासी परिवार अपने घर अथवा सामूहिक रूप से अपने गाँव में ही तैयार कर लेता है। घर में ही इसे तैयार करने योग्य वस्तुओं, पकाने योग्य हांडी-भट्टी की व्यवस्था रहती है। मैने महसूस किया कि महुआ और शराब सामाजिक सम्बन्धों की प्रगाढता के साथ भी घुल-मिल और रच बस गयी है। इतना ही नहीं यह उनके देवी-देवताओं की भी आवश्यकता है। इस कथन के साथ मैं यह नहीं कहना चाहता कि शराब उचित है अथवा नशा आदिवासी जीवन के लिये अभिशाप नहीं है। निश्चित ही नशा आदिवासी जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है किंतु यह उनका प्रसंशनीय पक्ष नहीं है। इस बातपर आलेख के उपसंहार में चर्चा करते हैं पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि कितने प्रकार का नशा बस्तर मे जगभग हर आदिवासी जनजाति के दैनिक जीवन का हिस्सा है।

सर्वप्रथम लांदा बनाने की विधि जान लें। चावल को धो कर पीस लिया जाता है। जरूरत समझी गयी तो चावल के साथ कोसरा और मंडिया को भी मिला कर तथा पीस कर इसे तैयार किया जाता है। एक बडे से घड़े में जिसमे नीचे पानी खौल रहा होता है तथा उसके उपर छिद्रों वाली जाली रखी होती है, इसमें इस मिश्रण को रख दिया जाता है। अब भांप सारी प्रक्रिया को अंजाम देता है जिसमे इसे सेंक कर उतार लिया जायेगा। फिर अंकुरित जोंदरा के पावडर से मिला कर इसमे थोडा पानी डाल कर छ:-सात दिनों के लिये रख दिया जायेगा। घडे में अब खमीर उठने लगेगी। यह लांदा बनने की प्रक्रिया का अंतिम चरण है। लांदा का नशा एकदम से नहीं चढ़ता कितु एक बार चढ जाये तो आदिवासी लम्बे समय तक इसके सुरूर के आनंद में झूमते रह्ते हैं। 

इसी तरह सुराम बनाने के लिये मुख्य आवश्यकता है महुवे की। महुवे को धो कर देर शाम तक उबाला जाता है तथा फिर उसे उतार कर ढक लिया जाता है। अब इसे छान कर दूसरी हांडी में डाल दिया जायेगा। इसमें कुछ लोग आम की फांक का भी कभी कभी प्रयोग करते हैं। जितनी देरी से इसका सेवन होगा उतना ही अधिक नशा सिर पर चढेगा।

मंद बनाने के लिये महुआ को पानी में डाल कर किसी हांडी में तीन चार दिनों के लिये रख दिया जाता है। अब यहाँ अपने घरेलू यंत्र में भाप के योगदान से आगे की प्रक्रिया कीजाती है। इस सम्मिश्रण को हल्की आंच दी जाती है तथा इससे निकलने वाली भाप को बर्तन में उपर उठते ही ठंडा कर दूसरे बर्तन में बूंद बूंद एकत्रित कर लिया जाता है। भाप से ठंडा हो कर एकत्रित हुआ तरल पदार्थ ही मंद कहा जाता है। 

इसके अलावा सल्फी और ताड़ी की चर्चा के बिना लोकजीवन मे नशे पर चर्चा अधूरी रहेगी। क्षेत्रवार यदि सल्फी के पेड की तलाश की जाये तो इसका वितरण उत्तर तथा मध्य बस्तर में अधिक हैं जबकि दक्षिण बस्तर में ये कम पाये जाते हैं। दक्षिण बस्तर में ताड़ के वृक्ष ज्यादा हैं और वहाँ के लोग सल्फी की अपेक्षा ताड़ी पीने के अधिक आदी हैं। यह भी जोडना होगा कि यद्यपि ताडी का वृक्ष सल्फी के वंश का ही है; तथापि ताडी सल्फी से कहीं अधिक मादक होती है। सल्फी का रस निकालने के लिये पेड के अग्रभाग को जिसे ‘कली’ कहते हैं को काट दिया जाता है। रस को एकत्रित करने के लिये रस्सी के सहारे नीचे एक घडा बाँध दिया जाता है जिसमे कली से बूंद बूंद टपक कर रस संग्रहित होता रहता है। सल्फी का रंग दूध की तरह सफेद होता है, थोडा पतला भी जैसे किसी ने दूध में पानी मिला दिया हो। पीने पर सल्फी थोडा खट्टापन लिये हुए मीठी सी होती है। लगभग इसी प्रक्रिया से ताडी भी प्राप्त की जाती है अर्थात ताड़ के पेड़ से निकाले गये दूध से बनी मदिरा को ताड़ी कहते हैं। ताजी सलफी अथवा ताड़ी में नशा नहीं होता और यह सुबह सुबह एक ऊर्जा दायक पेय के रूप में पी जाती है। जैसे जैसे दिन चढता है तथा रस में फरमंटेशन की प्रक्रिया जोर पकडने लगती है, रस कडुवा होने लगता है साथ ही अधिक नशीला भी। 

नशा किसी भी समाज की अवनति का ही कारक है तथा एक सीमा से अधिक इसका प्रयोग सर्वथानुकसानदेय ही होता है। यह बात तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज पर भी लागू होती है और हमारे आदिवासी भाईयों पर भी। बस्तर में शराब उन्मूलन के जितने भी सरकारी कार्यक्रम चले हैं वे गैर व्यवहारिक है तथा समाजशास्त्र को समझे बिना चलाये जाते रहे हैं। एक समय मे अंग्रेजों ने अपनी शराब को यहाँ खपाने के लिये इनकी परम्परागत शराब को बंद कराने की तमाम तरह की कोशिशे की थी। समय के साथ हमारा अपरिपक्व लोकतंत्र उसी ढर्रे पर चलने लगा तथा उसे नीयम, कानून और प्रतिपादन छोड कर बाकी सब नज़र आना बंद हो गया। परम्परा बन चुकी आदते कानूनो के मथ्थे मार कर नहीं छुडवायी जा सकती वह भी तब जब इसकी आवश्यकता आदमी को ही नहीं उनके बेजुबान देवी-देवताओं को भी रोज ही पडती हो? हम सोचते हैं कि एसी कमरों में बैठ कर आज निर्णय ले लिया कि कल से देसी बंद, शराब बंद और हो गया? होता यह है कि इससे खाकी की चाँदी हो जाती है और उनके रोज के ठर्रे का पुख्ता इंतजाम होने लगता है। आदिवासी समाज में नशा अवमुक्ति किसी कानून से नहीं अपितु समाज की समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भरे किसी अभियान से ही संभव है। हाँ, इसके साथ ही इस विषय पर जंगल के भीतर आदिवासी समाज की भलाई के स्वयंभू ठेकेदार अर्थात माओवादियों पर चर्चा भी कर ली जाये। माओवादियों ने समय समय पर शराब बंदी की घोषणाये उसी तरह की है जिस तरह व्यवस्था के पैरोकार करते रहते हैं। एक गाँव के पूर्व सरपंच ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर जानकारी दी थी कि असल में उनकी शराबबंदी का मायना सामाजिक बदलाव नहीं अपितु अपनी खुद की सुरक्षा है। एसी कई घटनाये हुई हैं जहाँ नशे में आदिवासियों नें जंगल के भीतर की जानकारियाँ पुलिस के हथ्थे चढते ही उन्हे प्रदान कर दी हैं। अत: नशा तो बंद कराना ही होगा वह भी सख्ती से? कथनाशय यह है कि बस्तर के आदिवासी समाज में नशे की उपलब्धता बहुत सहज है तथा प्रत्येक घर में है। नशा उनके त्यौहारों का हिस्सा है, पूजा-परम्परा का हिस्सा है नृत्य-गीत का हिस्सा है। जितना गहरा नशा यहाँ की सामाजिकता से जुडा हुआ है उतनी ही गहन सोचपूर्णता के साथ बदलाव लाये जाने की आवश्यकता है।

राजीव रंजन प्रसाद 

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Thursday, December 05, 2013

बस्तर में जीवन और कला के सहचर हैं घाँस और पत्ते


साधारण तत्वों की असाधारण प्रस्तुति को कला कहते है। कलात्मकता लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है जिसे मिट्टी से ले कर पत्थर तक और पेड की छाल से ले कर घाँस-पत्तों तक के दैनिक प्रयोग मे देखा जा सकता है। कला और आदिवासी समाज का इतना गहन सम्बन्ध है कि आप घास-पात में भी कल्पनातत्वों की उडान देख सकते हैं और दैनिक आवश्यकताओं के अनुरूप उनके प्रयोग का तरीका अचरज में डालता है। पत्ते दैनिक आवश्यकता हैं और साल वनो के द्वीप में सर्वत्र उपलब्ध हैं। इनका भोजन-पेय अथवा पदार्थों के संरक्षण के लिये प्रयोग होता ही है, पहनावे और सजावटी वस्तुओं में भी पत्तो का समुचित उपयोग देखा गया है। पत्ते श्रंगार की वस्तु भी हैं, वे कभी जूडों-खोंपों में खोंसे हुए नजर आ सकते हैं, कभी आभूषण या परिधान बने गले अथवा कमर में लटके देखे जा सकते हैं; खैर अथवा छींद की पत्तियाँ चबा कर युवतियाँ अपने होठों का श्रंगार भी करती हैं तथा उन्हें रंग प्रदान करती हैं। यही नहीं पत्ते लोक-चिकित्सा का हिस्सा भी हैं और औषधि भी। पतों पर कई लोककथायें हैं, ये लोकगीतों में बसे हैं कहावतों और पहेलियों में छिपे हैं। 

पहेलियाँ न बुझाते हुए घास-पत्तों की कलात्मक प्रस्तुतियों पर आते हैं। आवश्यकता आविष्कार को जन्म देती है; पत्तों के विभिन्न प्रयोग यही चरितार्थ करते हैं। बडे आकार अथवा विशिष्ठ आकार के पत्ते आदिवासियों की प्रमुख उपादेयता होते हैं और इसमें सियाड़ी के पत्तों की मुख्य भूमिका मानी जा सकती है। बस्तर में जिन पत्तों को उपयोगी माना जाता है उनमे सियाड़ी के अलावा सरगी, फरसा (पलाश), तेदू, आम इत्यादि प्रमुख हैं। इन्ही पत्तों की बदौलत बस्तर में यह कहानी गर्व से सुनाई जाती है कि प्रकृति ने आदिवासी को इतनी समृद्धि दी है कि वह नित्य नये बर्तन में खाता है; सही भी है, पत्तल और दोने ही आदिवासियों का थाली-ग्लास-कटोरा हैं। बांस की सींक इन पत्तों को जोडने का माध्यम बनती है और फिर सियाड़ी, सरगी या फरसा के पत्ते इस तरह गूंथ दिये जाते हैं कि वे पत्तल और दोनों का आकार ले लेते हैं।  

बस्तर में सरगी, पलाश, सियाड़ी, आम और तेन्दू के पत्ते विशेष उपयोगी प्रमाणित होते आ रहे हैं। तेन्दू पत्तों ने व्यवसाय और मजदूरी को अधिक प्रभावित किया है। सरगी, सियाड़ी और फरसा (पलाश) के पत्ते ग्रामीण जीवन में सर्वोपरि माने जाते रहे हैं इनसे पत्तल और दोने बनाये जाते हैं, इन्हें बांस की सींकों से सीते हैं। पत्तलों और दोनों के लिये फरसा और महुआ पत्तों का उपयोग कभी कभार ही होता है, अधिकतम सरगी और सियाड़ी के पत्तों से ही दोने साकार होते आ रहे हैं। सरगी की तुलना में सियाड़ी के पत्तों की उपयोगिता अधिक व्याप्त है। सियाड़ी के पत्ते बहुआयामी सृजन को आधार देते रहे हैं। इसी तरह तेन्दू पत्ता बीडी व्यवसाय के लिये कच्चा माल है और इसीलिये लम्बे समय से बस्तर में यह राजनीति के केन्द्र मे भी रहा है। माओवादियों ने बस्तर मे पैर जमाने के लिये जिस मुद्दे को अपनी घुसपैठ के आरंभिक दिनो में उठाया था वह तेन्दूपत्ता के संग्रहण और उसके मूल्य पर नियंत्रण के लिये ही था, वर्तमान में तेन्दूपत्ता संकलन और विक्रय पर सरकारी नीति उपलब्ध है।

आप दोना-पत्तल को बहुत सहजता से नहीं ले सकते। उपयोगिता के अनुसार दोनों और पत्तलों के कई आकार-प्रकार उपलब्ध हैं। भात रखने के लिये बडे आकार का दोना चाहिये जिसे डोबला या खोलडा भी कहा जाता है; सरगी अथवा सियाड़ी के बीस-पच्चीस पत्ते लगते हैं एक खोलडा बनाने के लिये जो अंतत: बांस की सीकियों से गुथ कर एक बडे पात्र का आकार ले लेता है। अगला प्रकार है मूंडी दोने; संरचना में इन मूंडी दोनों में बायें-दायें कुल चार मोड आते हैं और देखने पर किसी डोंगी या नाव की अनुभूति होती है। छोटे आकार की मूंडी को आमतौर पर पेज पीने में खूब प्रयोग में लाया जाता है; पेज पीने के उद्देश्य से ही दोनो का एक अन्य प्रकार है पुतकी जबकि चौकोनी तो नाम से ही स्पष्ट है कि इन प्रकार के दोनों में चार कोने होते हैं। शराब पीने के लिये जिन दोनों का इस्तेमाल होता है उन्हें चिपडी कहा जाता है; देखने में चिपडी भी एक नाव की तरह ही होती है। यदि पत्तल की बात की जाये तो मूल रूप से इसे गोलाकार दिया जाता है जिसके लिये दस बारह सरगी अथवा सियाड़ी के पत्तों को करीने से बिछा कर बांस की सींक से सिला जाता है। केवल उपयोगिता ही नहीं अपितु दोना-पत्तल आदिवासी प्रथाओं का भी हिस्सा हैं। पतरी उलटना वस्तुत: एसी ही प्रथा है जिसमे कि हलबा जनजाति के वर-वधु को पत्तल उलट कर उस पर बिठाया जाता है। पनारा जाति के लोग छींद के कोमल पत्तों का कलात्मक उपयोग दूल्हे और दुल्हन के विवाह-मौड बनाने के लिये इस्तेमाल करते हैं। वैसे ‘दोनों’ की रोचक उपादेयता जाननी हो तो कभी लाल-चींटी को एकत्रित करने की विधि को ध्यान देखिये जिसकी की चटनी बस्तर में खूब प्रचलित है। हाट-मडई में कतारों से सजे वनोत्पादों को थामने वाले दोना-पत्तल आज भी एक आम दृश्य हैं।            

कई दैनिक उपयोग के उत्पादों में पत्तों का स्वाभाविक रूप से उपयोग होता है उदाहरण के लिये धूप और छाया से बचने के लिये सिर पर पहनी जाने वाली छतूडी यद्यपि बाँस से बनायी जाती है किंतु इसमे छिद्र भरने का कार्य मुख्य रूप से सियाड़ी के पत्ते करते हैं। इन दिनो ‘सनहा’ का प्रयोग देखने में नहीं मिलता जबकि सियाड़ी के पत्तों से निर्मित एक समय यह प्रचलित रेनकोट हुआ करता था। बरसात में एक आदिवासी के सिर से पाँव तक का आवरण होता था सनहा और छतूडी। चिपटा भी अब चलन से बाहर हो गया है; सियाड़ी के पत्तों और सियाड़ी की ही रस्सी से चिपटा बनाया जाता था जिसने भीतर विभिन्न खाद्य उत्पाद खास कर अरहर, मूंग, उडद, सरसो आदि सुरक्षित रखे जाते थे। बाजार के आदिवासी घरों के भीतर तक पैठ होने के बाद ये प्राकृतिक पहनावे तथा संग्राहक अब चलन से दूर हो गये हैं। 

चर्चा पत्तों पर है तो घांस की लोकजीवन मे उपादेयता और उसकी कलात्मकता पर चर्चा के बिना बात अधूरी रह जायेगी। दक्षिण बस्तर विशेषकर भैरमगढ, भोपालपट्टनम, बीजापुर आदि क्षेत्रों में बोथा घास बहुतायत में पायी जाती हैं इस घास से चटाई अथवा मसनी तैयार की जाती है जो अपनी मजबूती के लिये जानी जाती हैं। चटाई के अलावा ऊसरी जैसी घास या कि धान के पुआल से रस्सी बनाने का काम भी आदिवासी समाज का कुटीर उद्योग है। पुआल से बनाई गयी रस्सी को बेठ कहते हैं। इस बेठ का कलात्मक उपयोग देखिये कि इसे ही गोल गोल घुमा कर धान आदि के संग्रहण के लिये कोठा तैयार कर लिया जाता है जिसे ‘पुटका’ कहा जाता है।

घास-पात की उपादेयता को आदिवासी सामाजिकता में भी खूब देखा-समझा जा सकता है। बस्तरिया जीवन में तम्बाकू देना परस्पर सौहार्द और प्रेम का प्रतीक माना गया है। एक दूसरे का मन जीतने के लिये धुंगिया दिया जाना आम बात है किसके लिये प्राय: पत्ते की चोंगी बनाई जाती है जिसके भीतर तम्बाकू भरा जाता है। ये चोंगी मुख्य रूप से सरगी या तेन्दू के पत्तों की ही बनाई जाती है। समग्र रूप से देखा जाये तो जन्म से ले कर अवसान तक, पर्व से ले कर प्रार्थना तक और दैनिक उपयोग से ले कर बाजार तक घास-पात बस्तरिया जीवन के सहचर हैं।  

 -राजीव रंजन प्रसाद 
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Wednesday, October 30, 2013

गोदना कला में बस्तर की जनजातियों का परिचय छिपा है


बस्तर की स्त्रियाँ अपने श्रंग्रार में कलात्मकता को समुचित स्थान देती रही हैं वह चाहे उनके केशविन्यास का अनूठापन हो, बालों में खोंसी जा रही पड़िया पर उकेरी गयी रचनात्मकता हो अथवा उसके शरीर पर अंकित किये जाने वाले गोदने हों। आज गोदना विश्वप्रसिद्ध है, आधुनिक समाज में इसे टैटू का नाम मिला हुआ है। आधुनिकता समाविष्ठ होने के साथ ही गोदना चर्चित और प्रचारित तो हुआ किंतु उसकी कलात्मकता का बुनियादी आयाम अब खो गया है। गोदना कला का केनवास नारी का अपना शरीर होता है, उसमें अंकित होने वाले चित्र उसकी मनोभावना का परिचायक भी होते हैं और आजीवन उसके व्यक्तित्व के साथ जुड जाते हैं। एक मनमोहक आदिवासी गीत का अनुवाद है जहाँ गोदना करवा रही स्त्री अपनी पीड़ा को छिपाने के लिये गा रही है कि ओ रास्ते चलने वाले मेरे प्रेमी/ क्या तुझे मेरा गुदना दिखाई नहीं देता?/ देखो गुदने की पीड़ा से मेरी आँखें सलोनी हो गयी हैं/ क्या अब भी तुझे मेरा रूप नहीं भाता/ हे माँ हमारी प्रार्थना सुन लो/ तुमने वचन दिया था/ हे माँ पीडा हो रही है/ सूई की जलन मिटा दो.....। यह गीत गोदना प्रक्रिया में जो पीड़ा है वह तो प्रदर्शित करता ही है साथ ही साथ उस नवयुवती के मनोभावों को बताता है जो शरीर पर आजीवन रहने वाले श्रंगार को अंकित को अंकित करती हुई अपने प्रेमी को लुभाना भी चाहती है। बस्तर में घोटुल की मुटियारी का मुख्य आभूषण ही गुदना है। यहाँ लोक-मान्यता है कि गुदने के बिना जीवन का सौन्दर्य अधूरा रह जाता है। जो युवती लम्बे समय तक गुदना नहीं करवाती उसे समाज में बडी-बूढी महिलाओं के बीच लज्जित होना पडता है। किसी कारणवश शादी होने तक गोदना न हुआ हो तो लड़की के माता-पिता को इसका प्रायश्चित करना पड़ता है तथा इन्हें सगा खिलाने का दण्ड भुगतना होता है। गुदना स्थाई आभूषण माना जाता है और कहते हैं कि यह मृत्योपरांत भी शरीर पर रहता है; गुदना वस्तुत: आत्मा का आभूषण है तथा परमात्मा तक साथ ही जायेगा। अलौकिक मान्यता से इस लोक के मोहक सम्बन्धों पर यदि हम लौटें तो माना जाता है कि गुदवाने से प्रेमी युवक की दृष्टि हमेशा अपनी प्रेमिका पर रहती है। पीड़ा के पश्चात होने वाली आनंदानुभूति और प्रिय के प्रेम का अहसास गोदना करवा रही नवयुवतियों को होता है जिसकी अभिव्यक्ति करता एक गीत देखें कि इली ओझिल गोदलि बांहां/ इज्जत गेली मरजद गेली/घांडी दे महां रे; जिसका अर्थ है कि ओ गोदना करने वाली तू मेरी बाँह में मेरे प्रेमी का नाम लिख दे/ इससे सखियाँ और सगे-सम्बन्धी मेरी हँसी जरूर उडायेंगे/ लेकिन मेरे प्रिय मुझसे कभी भी छूट नहीं पायेंगे। नवयुवतियाँ सुन्दर और कलात्मक आकृतियाँ शरीर पर गुदवाना पसंद करती हैं चाहे इसके लिये शरीर को कितनी ही पीडा से गुजरना पडे। यह गीत देखें जिसमे मोटियारी गुदना हो जाने के पश्चात हो रहे दर्द से परेशान है और अंतत: देवी से प्रार्थना करती है कि पीडा समाप्त करो – अरजी बिनती हमार/उई दिनो बचन तुम्हार/सुजी का झारा उतार देउ/ उ, ऊ, इ, ई, मां!!!!उतार। 

गोदना को कला इसलिये कह रहा हूँ चूंकि आदिवासी जीवन की अपनी मौलिकता और कल्पनाशीलता इसमे झांकती है। बस्तर में तीस से अधिक जनजातियाँ अवस्थित हैं; गोदना हर किसी की परम्परा का हिस्सा है और उनकी एकता का साथी भी; साथ ही साथ उन्हें एक दूसरे से भिन्न पहचान प्रदान करने में भी यही गोदने सहायक होते हैं। दक्षिण बस्तर में बिन्दियाँ और आडी रेखायें मुख्य रूप से गोदना की आकृतियाँ बनती हैं। उदाहरण के लिये मस्तक के मध्य भाग में टीका, टीके के दोनो ओर सात सात खड़ी रेखायें; नाक पर भी खडी रेखायें तथा तीन तीन चार चार बिन्दियाँ। बाहों में, कलाईयों पर तथा हथेलियों के उपरी भाग पर भी बिन्दियों से श्रंगार। मुरिया लडकियों के माथे, ठोडी, बाहों और पैरों की पिंदलियों को गोदा जाता है। आम तौर चतुर्भुज, त्रिभुज, विषमकोण सम चतुर्भुज आकार में इनके शरीर पर गोदना किया जाता है। उत्तर बस्तर में छत्तीसगढी संस्कृति का प्रभाव भी गुदने में देखा जाता है जिस कारण माछी (मक्खी), बिच्छी, पौअँडी (पायल), खाडू (पग वलय) बाहाँ-चेघा (बाँहटा) और सिइता (हँसुली) आदि नामो के गोदने कांकेर और निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रचलित हैं। आमतौर पर सभी क्षेत्रों में गुदने में अंकित की जाने वाई प्रमुख आकृतियाँ हैं - मोर, सांकल, पटली, बिछिया, मस्सी, पौधा, सर्प, फूल, पत्तियाँ, लाल चींटे, मछली, कण्ठहार, हाथी, कुम्हडा, सींकरी, चरूगा, भौंरा, चाउर आदि। मुख्य रूप से गोदने किसी लडकी के कपाल, छाती, बाहें, कलाई, हथेली का पृष्ठ भाग, घुटनों के उपर, गुप्तांगों पर, पैरों की उंग्लियों, पिंडलियों, हाथ, पैर, स्तन आदि पर अंकित किये जाते हैं।  

यदि हम बस्तर में गोदना कला की उत्पत्ति की बात करें तो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जा सकता। केवल यही मान सकते हैं कि आग, राख, रंग, चुभन और चित्रांकन के अंतर्सम्बन्ध को आदिमनुष्य से समझा होगा और उसने अपनी कपनाशीलता का केनवास अपने ही शरीर को बना लिया। यदि अतीत के संदर्भ तलाशें तो सबसे पुराने दो कथा संदर्भ वेरियर एल्विन द्वारा उपलब्ध कराये गये हैं। दोनो की कहानिया कहती हैं कि ओझा औरते ही लम्बे समय से बस्तर में गोदना का कार्य सम्पन्न करती आ रही हैं। इन औरतों को गुदनारी भी कहा जाता है। ओझा औरतों और गोदना के अंतर्सम्बन्ध की पहली कहानी नारायणपुर से जुडती है जहाँ यह माना जाता है कि पहले आदिवासी समाज जातियों में नहीं बटा था। महापूरब विभिन्न जातियों को उपहार दे कर उन्हें बांटने का निर्णय लिया उदाहरण के लिये जिस व्यक्ति को जाल दिया गया वह मछुआरा बन गया, जिसे हल दिया गया वह गोंड बन गया। महापूरब ने देखा कि सब वस्तुओं का वितरण हो गया किंतु एक ढोल अब भी बचा हुआ है। बहुत से लोग उन्हें सड़क पर आते जाते दिखाई दिये। महापूरब ने ढोल उन्हीं में से एक व्यक्ति गले में लटका दिया और उसे ओझा नाम दिया। ओझा गाँव गाँव घूम कर भीख माँगता और कहानियाँ सुनाता हुआ अपना जीवन यापन करने लगा। एक शाम वह घर लौटा तो देखा खाना तैयार नहीं है। इसपर वह अपनी पत्नी पर बहुत नाराज हुआ। पत्नी भी बिफर गयी कि मैं तालाब से पानी लाती हूँ, जंगल से लकडी लाती हूँ, घर की सफाई करती हूँ, खाना बनाती हूँ और कितने काम की मुझसे उम्मीद रखते हो? गुस्से में ओझा की पत्नी ने निर्णय लिया कि अब वह खुद कमा कर खायेगी। आठ दिन तक उसने कुछ नहीं खाया। इस पर बूढी माताल का कालीन हिलने लगा; प्रसन्न हो कर बूढी माताल ने उस स्त्री से बात की और कहा कि मैं तुझे विशेष कार्य दूंगी किंतु इसके लिये तुझे मेरी पूजा करनी होगी। वह ओझा स्त्री को ले कर जंगल के एक सराई के पेड़ के पास पहुँची। उसने पेड़ से कुछ गोंद निकाल कर एक मिट्टी के टुकडे पर रखा। फिर गोंद के उपर आग में पकी मिट्टी का दूसरा टुकडा रखा। फिर उन्होंने दोनो टुकडों को गोबर से लीप कर आग में रख दिया। कुछ देर बाद ढक्कन खोला गया तो गोंद की जगह काला पदार्थ था। एक मिट्टी के टुकड़े से इसे खुरच कर बूढी माताल नें इस पदार्थ को टूटे हुए नारियल के टुकडे में रखा। तत्पश्चात पानी डाल कर इसे कुछ देर चलाया गया। अब उन्होंने तीन सूईयाँ एक बांस की गाँठ में बाँधी और ओझा स्त्री को लिटा दिया। पहला गोदना इस तरह बूढी माताल ने उस ओझा स्त्री के उपर किया। गोदना करने के पश्चात उन जगहों पर गोबर से लीप कर तेल और हल्दी लगा दी गयी। अब मताल ने कहा कि तुम आज से इसी तरह गोदाई का काम करोगी; गोदना करने के पश्चात उस स्थान को गोबर से लीप कर उस पर हल्दी का तेल छिडक कर, उस पर मेरे नाम से चावल बिखेर दोगी। कुछ सूईयाँ, हल्दी और दाल के दाने तुम हाथ में लेना और बायें हाथ से गोदी गयी स्त्री की उंगलियाँ पकड़ कर अपनी दाईं मुठ्ठी को तीन बार उसके शरीर के चारो ओर घुमाना। इसके बाद हल्दी और दाल उसकी साड़ी में रख देना और उसका हाथ छोड देना। इस उपाय से गोदने के निशानो पर जलन कम हो जायेगी। 

नारायणपुर से कोण्डागाँव आते आते यही कहानी अपने स्वरूप में बदल जाती है। यहाँ मान्यता है कि बाड़ादेव टाल्लुरमुताई और काडतेंगल के पुत्र थे। उनके छ: भाई और सात बहने थी। एक दिन सातों बहने टाल्लुरमुताई के पास गयीं और उनसे वो गहने मांगे जो मृत्यु के उपरांत भी बने रहें; यहीं से गोदना की उत्पत्ति हुई। बाडादेव को दो पुत्र हुए; एक का नाम था मुरहा और एक का ओझा। मुरहा खेत जोतने वाले बने जब कि ओझा शिकार करने और घरों की दीवार रंगने वाले बने। टाल्लुरमुताई की बेटियों से ओझा की पत्नी को भी गोदना करना आ गया। साल में एक बार ओझा बाडादेव पर बकरी चढाते हैं यह कहते हुए कि देखिये हम गुदाई करते हुए पूरे विश्व में भ्रमण करते हैं जो निशान हम बनायें उसमे कोई घाव न हो, कोई पस न पड़े, न ही कोई सूजन आये, कार्य करते हुए हम पर किसी तरह का काला जादू असर न करे। कार्य शुरु करने से पहले ओझा स्त्री बाडादेव की सात बहनों का नाम लेती है। अंत में चावल, हल्दी, तेल, मिर्च और नमक आदि के रूप में प्राप्त भेंट व मेहनताने को वह लडकी के चारो ओर घुमाती है। इसका कुछ भाग वह सात बहनों को भेंट करती है जिससे कि गोदे गये निशान जल्दी ठंडे पडते हैं और जलन नहीं करते। टाल्लुरमुताई द्वारा सिखाई गयी गोदने की विधि भी लगभग वैसी ही है जैसी कि बूढी माताल ने पहली ओझा स्त्री को सिखाई थी। आज भी गोदना करने का कार्य बस्तर में ओझा स्त्रियाँ; गाँव की सियान स्त्रियाँ; कंजर, बंजारा, बादी और देवार जातियों की स्त्रियाँ ही निबटाती हैं। रुक्ष सी सुई पीतल के तार से बना ली जाती है। गोदने की सूई को पहले विसंक्रमित करने के लिये गोबर से धोया और उबाला जाता है। तत्पश्चात सेमीरंग और कोयले के रंग का उपयोग करते हुए गोदने वाली तीन या पाँच सूईयाँ एक साथ चलती हैं। हलबी-भतरी और छत्तीसगढी बोली में प्रथम बार सूई चालन को मूँडी, दूसरी बार को दुसडा और तीसरी बार को छडिया कहा जाता है।  

आज आदिवासी समाज में गोदना के प्रति पहले जैसी ललक नहीं देखी जा रही है। यद्यपि गोदना की तकनीक और इस्तेमाल किये जाने वाले रंगों में अनेक तरह के बदलाव होने लगे हैं। छत्तीसगढ के ही जशपुर क्षेत्रों में महिलाओं ने गोदना कला को केनवास और कपडों पर उतार कर अपनी कल्पनाशीलता और डिजाईनों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी दिलाई है;  दुर्भाग्य से बस्तर में अभी एसा नहीं हो सका है। गोदना आदिवासी संस्कारों की ही नहीं उनकी कला की भी थाती है और इसका संरक्षण दायित्व भी है। अभिनेत्रियों के टैटुओं पर शोर मचाने वाले संचार साधनों ने कभी इन कलाओं के सौन्दर्य शास्त्र को अपने कैमरे और विषयवस्तु के केन्द्र में रखा होता तो सभव था कि इनकी स्थिति विलुप्ति की ओर जाती न दीख पडती। 

 - राजीव रंजन प्रसाद

Tuesday, October 29, 2013

बस्तर के भित्तिचित्र कला भी हैं और इतिहास भी


पाषाणकाल से ही स्वयं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बस्तर के आदिवासी समाज के पास उपलब्ध रहा है। अपनी अनुपम शैली तथा कलात्मक भाषा से बस्तर के आदिवासी समाज ने मनुष्य सभ्यता और उसके विकास के विभिन्न चरणों को लिपिबद्ध किया है। आप चित्रलिपि नाम देना चाहें अथवा शैलचित्र नामित करें किंतु मैं इसे लेखन कला के आरंभ, किसी भी लिपि के उद्भव के साथ साथ एसा अमरकंटक मानता हूँ जहाँ चित्रकला की विशाल नर्मदा का उद्गम स्थल है। दक्षिण बस्तर में अवस्थित अनेक पाषाणकालीन गुफायें यह बताती हैं कि वे ही आदि-मनुष्य का प्रारंभिक निवास थे। 

चित्रकला और गुफाचित्रों पर चर्चा से पहले बस्तर में अवस्थित आदिमनुष्य के आरंभिक हथियारों तथा औजारों की एक झलख देखें। निम्न पुरापाषाण काल के मूठदार छुरे जिसकी नोक चोंच के आकार की है, इन्द्रावती, नारंगी और कांगेर नदियों के किनारे मिले हैं। मध्यपाषाण काल में फ्लिट, चार्ट, जैस्पर, अगेट जैसे पत्थरों से बनाये गये तेज धार वाले हथियार इन्द्रावती नदी के किनारों पर खास कर खड़क घाट, कालीपुर, भाटेवाड़ा, देउरगाँव, गढ़चंदेला, घाटलोहंगा के पास मिले हैं; इन जगहों से अब भी कई तरह के खुरचन के यंत्र, अंडाकार मूठ वाला छुरा और छेद करने वाले औजार मिल रहे हैं। उत्तर-पाषाणकाल का आदमी छोटे और प्रयोग करने में आसान हथियार बनाने लगा था; इनको लकड़ी, हड्डी या मिट्टी की मूठों में फँसा कर बाँधा जाता था, यद्यपि हथियार व औजार चर्ट, जैस्पर या क्वार्ट्ज जैसे मजबूत पत्थरों से ही बनाए जाते थे। इस समय के अवशेष इन्द्रावती नदी के किनारों पर विशेष रूप से चित्रकोट, गढ़चंदेला तथा लोहांगा के आसपास प्राप्त होते हैं। उत्तर-पाषाण युग के समानांतर तथा उसके पश्चात धातुओं ने पत्थर के हथियारों और औजारों का स्थान ले लिया। यदि हथियारों और औजारों के प्रकार ध्यान से विवेचित किये जाये तों उनकी उत्पत्ति और विकास के चरणों में न केवल शिकार, आत्मरक्षा, खेती-बागानी अपितु कलात्मकता का भी बराबर योगदान रहा है। खुरचन के लिये प्रयोग में आने वाले मूठदार हथियार आदिमनुष्य की अभिव्यक्ति का साध्य भी बने और उसने शनै: शनै: अपनी मौखिक और सांकेतिक भाषा को पत्थरों, पर्वतों और गुफाओं पर अंकित करना आरंभ कर दिया।

आड़ी टेढी खुरचनों से आरंभ हो कर परिष्कृत गुफाचित्रों तक कला की प्रारंभिक यात्रा बहुत रुचिकर जान पड़ती है। आदि-मनुष्य तब अपनी जिज्ञासाओं का परिष्कार तथा नित नये आविष्कार कर रहा था जिन्हें वह अचरज से देखता तथा उसकी कोशिश होती कि अपने साथियों और संततियों को भी वह इस नव-ज्ञान से अवगत करा सके। वस्तुत: बस्तर में प्राप्त गुफाचित्रों में दैनिक जीवन विषयक संदर्भों का आलेखन गुफा की छत और दीवारों पर किया गया है। इन चित्रों में आखेट, मधुसंचय, नृत्य, पशुयुद्ध, अग्निपूजा, वनस्पति इत्यादि से सम्बन्धित दृश्य प्रस्तुत किये गये हैं। दक्षिण बस्तर में लगभग चार हजार फुट ऊँची नड़पल्ली पहाड़ी के ऊपर चित्रित गुफा प्राप्त हुई है जिसमें हिरणों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। मटनार गाँव के पास इन्द्रावती नदी के तट पर चित्रित पशु-पक्षियों तथा मनुष्य की हथेलियों के चित्रन से यहाँ किसी अलौकिक शक्ति की पूजा का संकेत मिलता है। अपनी खुरचन कला मे प्रवीणता हासिल करने के पश्चात उसे प्रकृति ने ही रंगों का आरंभिक ज्ञान भी दिया होगा। फरसगाँव के समीप आलोर के निकट की पहाडी पर अनेक शैल चित्र बने हुए मिले हैं जो लाल रंग के हैं तथा मृदा वर्णों से चित्रित हैं; इन चित्रों को क्षरण के कारण स्पष्ट नहीं देखा जा सकता किंतु इनमे मानव और पशुओं की आकृति को आसानी से पहचाना जा सकता है।    

अब यदि इन आरंभिक चित्रों का बारीकी से प्रेक्षण निरीक्षण करें तो यह ज्ञात होता है कि रेखांकन से चित्र तक पहुँचने के पश्चात आदि-मनुष्य ने इनमे रंग भरने की भी कोशिश की होती। भांति भांति के प्रयोगों के पश्चात उसे गेरू मिट्टी के रूप में एक एसा रंग मिल गया होगा जो न केवल लम्बे समय तक स्थायी रह सकता था अपितु उसकी चटखीली लाल तथा भूरे रंग की आभा भी प्रभावित करती थी। गेरू-मिट्टी की कृतियों ने गुफाचित्रों को सजीव करना प्रारंभ किया तथा  कालांतर में अन्य प्राकृतिक रंगों का भी आविष्कार व प्रयोग होने लगा। उदाहरण के लिये पत्तियों के रस से हरा रंग निकाला गया होगा तो भांति भांति के फूलों ने लाल, नीले, बैंगनी, पीले आदि रंग प्रदान किये होंगे; काले रंग के लिये गाय के गोबर का प्रयोग किये जाने के भी संकेत प्राप्त होते हैं। 

समय बदलता गया और चित्रों के विषय भी बदलते चले गये। अब इन चित्रों में मनुष्य का सामाजिक जीवन प्रविष्ठ हो गया; उसका जन्म, उसकी मृत्यु, उसका बालपन, उसका बुढापा, उसका प्रेम उसके यौन सम्बन्ध, उसकी वितृष्णा, उसकी नफरत, उसके युद्ध, उसके वाद्य, उसके नृत्य, उसके देव, उसकी देवी, उसकी जिज्ञासायें उसके सपने.....यह सूची लगातार लम्बी होती चली गयी और ये भित्तिचित्र बस्तर की एक परिष्कृत और विश्व भर में सराही जाने वाली कला के रूप में अब हमारे सामने है। भित्तिचित्रों में बस्तर के लोक जीवन ही नहीं लोक काव्यों को भी सम्पूर्णता से अभिव्यक्त किया है, जनश्रुतियों और कथाओं को मूर्तरूप दे कर पीढियों के लिये सुरक्षित करने का महति कार्य इन चित्रों के माध्यम से आज भी हो रहा है। बस्तर में भित्तिचित्र कला को गढ लिखना अथवा गढ लेखन करना भी कहा जाता रहा है। इन भित्तिचित्रों के केवल विषय ही नहीं बदले अपितु समय के साथ चित्र उकेरने और रंग भरने के माध्यम भी बदलते चले गये। गेरु मिट्टी, प्राकृतिक रंगों के साथ साथ अब चावल का आंटा जिसे स्थानीय बोली में बाना कहा जाता है; फर्श और दीवार के चित्रों को रंग व स्वरूप देने के कार्य में लिया जाने लगा। इस माध्यम से फर्श पर की जाने वाली चित्रकारी को बाना लिखना कहते हैं। चावल के आँटे को पानी में घोल लिया जाता है फिर कपडे के टुकडे की पोतनी बना कर उसी से मिट्ती अथवा लिपे हुए फर्श और दीवारों पर चित्रकारी करने की परम्परा बस्तर की थाती है। 

एक मुकम्मल कला बनने के साथ ही गढलेखन अथवा भित्तिचित्र निर्माण को न केवल सम्मान ही प्राप्त हुआ अपितु उसके आयामों मे भी परिवर्तन देखने को मिले। अब इन भित्तिचित्रों ने देवगुडियों को सजाया, घोटुलों के दरवाजों, फर्श और दीवारों को संवारा, महत्वपूर्ण व्यक्तियों के निवास की शोभा बनी। वेरियर एल्विन की पुस्तक “दि डोर एण्ड वॉल डेकोरेशन” में बस्तर के भित्तिचित्रों की महान कलायात्रा का सुन्दर वर्णन उपस्थित है। आधुनिक समय ने बस्तर की इस कला को दीवार और भूमि जैसे केनवास के अलावा कागज और कपडे के माध्यम भी प्रदान किये हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर फेब्रिक रंग, पोस्टल कलर या ऑयल पेंट का उपयोग भी किया जाने लगा है। यद्यपि इस कला में अब भी परम्परागत विषयवस्तु को ही उकेरा जाता है किंतु समय के साथ आधुनिक बिम्बों के प्रयोग भी होने लगे हैं। जगदलपुर के मानवविज्ञान संग्रहालय में मेरी मुलाकात दो चित्रकारों महारूराम नेताम और बुधराम मरकाम से हुई। ये दोनो ही कोण्डागाँव से आये हुए कलाकार थे तथा आधुनिक माध्यमों और रंगों से अपनी विरासत कला का प्रदर्शन कर रहे थे। बस्तर की भित्तिचित्र कला के एक बडे साधक हैं कोण्डागाँव निवासी श्री खेम वैष्णव जिन्होंने न केवल इसे अपनी साधना बनाया अपितु देश-विदेश में इस कला की ख्याति को पहुँचाया है। इस वर्ष आईपीएल-2013 में देहली देयर डेविल्स की क्रिकेट टीम का सांकेतिक बल्ला श्री खेम वैष्णव द्वारा ही डिजाईन किया गया था जिसमे उन्होंने बस्तर की भित्ति चित्र कला की अनेक बारीकियाँ प्रस्तुत की थीं; यह इस कला की अनंत यात्रा का एक महत्वपूर्ण पडाव भर है। यहाँ हमें ठहर कर सोचना होगा कि कुछ विवादास्पद कलाकृतियों के लिये लाखों-करोडो की कीमत अदा करने वाले लोग क्यों इस महति कला की ओर उपेक्षा की दृष्टि रखते हैं?

 – राजीव रंजन प्रसाद


Tuesday, October 01, 2013

बस्तर की पहचान है उसकी काष्ठ कला


महापाषाण कालीन संस्कृति की भव्यतम झांकी दक्षिण बस्तर में देखने को मिलती है। मृतकों अथवा उनके अवशेषों को बड़े बड़े पत्थर खड़ा कर दफनाये जाने की प्रथा के उदाहरण पुरा-अतीत से ले कर वर्तमान तक के उदाहरणों के साथ अनेक स्थानों पर देखे जा सकते हैं। इन्ही मृतक स्तम्भों के बीच अनेक स्थानो पर काष्ठ के विशाल स्तम्भ भी नजर आये जिनकी न केवल कलात्मकता ही दर्शनीय थी अपितु कुछ तो हजारो साल पुराने स्मृति अवशेष हैं। बस्तर जहाँ जन्म से ले कर मृत्यु तक हर परम्परा में किसी न किसी तरह उनकी कलाधर्मिता झांकती रही है वहाँ स्वाभाविक था कि मृतक स्तंभों में भी कल्पनाशीलता का प्रादुर्भाव होता। इसका कारण है कि काष्ठ बहुत आसानी से शिल्पकार की कल्पना को आकार देने में सक्षम होता है। प्राचीन समय से ही कलात्मकताओं ने मनुष्य़ को आकर्षित किया है। साल वनो के द्वीप मे एसे काष्ठ की सहज उपलब्धता थी जो न केवल शिल्प निर्माण की दृष्टि से श्रेष्ठ है अपितु वह न तो जल्दी खराब होता है न ही अपनी आभा खोता है। आदिवासी समाज को कई स्थानो पर काष्ठ उस पाषाण का विकल्प प्रतीत हुआ होगा जिस पर आसानी से कलात्मकता का प्रदर्शन संभव नहीं था। समय के साथ बदलते मृतक स्तंभों में भी कई स्थानो पर मुझे पाषाण और काष्ठ की युति देखने को मिली जहाँ किसी अवसादी चट्टान (विशेष तौर पर चूना पत्थर की फर्सी) को मुख्य आधार बनाया गया है किंतु उसके शीर्ष पर काष्ठ के पशु-पक्षी अंकित किये गये हैं अथवा एक सम्पूर्ण कलाकृति निर्मित कर रखी गयी है। 

मनुष्य का विकास भी पत्थरों और लकडी के साथ साथ हुआ है। पत्थर से जलाने, काटने और धारदार हथियार बनाने की विधि में मिली दक्षता के बाद उसके यही आविष्कार लकडी के साथ मिल कर अधिक शक्तिशाली और प्रभावी बने। उदाहरण के लिये धारधार पत्थर और लकडी की युति ने ही आरंभिक कुल्हाडी का स्वरूप प्राप्त किया था। आविष्कारों के साथ ही आदि-मनुष्य लकडी से हल, कुदाल, बैलगाडी के पहिये आदि वस्तुएं निर्मित करने लगा। मनुष्य के आरंभिक औजारों से प्रारंभ हो कर लकडी ने उसकी अभिव्यक्ति में स्थान पाने तक सभ्यताओं का एक लम्बा सफर तय किया है और आज एक परिपक्व कला बन कर बस्तर के आदिवासी समाज की पहचान में शामिल है। दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये लकडी की अनेक वस्तुएं निर्मित की गयीं। इन्हीं निर्मितियों को सजाने के दृष्टिकोण से इसे बनाने वाले कलाकार अपनी कल्पनाशीलता को जोड देते थे जिससे कि उपयोग की वस्तुओ मे कलात्मकता ने अपने पैर पसारे। शनै: शनै: तराशे हुए स्वरूप में नागर, खोटला, टेंडा, मचान, पीढा, माची, घाना, नाव, पतवार, मयाल, कलात्मक खम्बे, फाटक, चौखट, खिडकिया आदि आदि निर्मित होने लगे। इन निर्माणों में बहुत खूबसूरती से काष्ठ शिल्पकारों ने भांति भांति के बेलबूटे तथा फूलपत्तियाँ तराशीं।

लकड़ी बस्तर के आदिवासी समाज में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये उसी तरह सहायक बनी जैसे कि आज हम गुलाब के फूल का सहारा लेते हैं। कई तरह की सुन्दर कंघियाँ बनायी जाने लगीं चूंकि इनके माध्यम से ही प्रेमी चेलक अपनी प्रेमिका मोटियारियों से प्रेम का इजहार करते थे। इन काष्ठ निर्मित कंघियों को पडिया कहा जाता है। किसी घोटुल में मोटियारियाँ श्रंगार करती हुई अपने बालों में मांग निकाल कर सजती रही हैं और अपने खोंपों में भांति भांति की पड़िया खोसती रही हैं। अपने खोंपे अथवा जूडे बनाने के लिये भी मोटियारियाँ लकडी के नक्काशीदार चौकोर टुकडों का प्रयोग करती रही हैं। इन काष्ठ टुकडों को बीच में रख कर उनके चारो ओर बालों को लपेट कर एक सुन्दर जूडा तैयार होता है। बालों को स्थिर रखने के लिये मोटियारियाँ जिन पिनों का प्रयोग करती हैं वे आम तौर पर तिकोनी होती हैं और उनपर बहुत बारीक काष्ठ शिल्प का कार्य किया जाता है। स्वाभाविक भी था कि हर चेलक अपनी मोटियारी के लिये सुन्दर से सुन्दर पडिया बनवाने के यत्न में रहता था। काष्ठ पड़ियों की परिधि को बारीक नक्काशी से सजाये जाने की प्रथा रही है। कुछ पडिया मैने एसी भी देखी है जिनके शीर्ष पर अलग से आकृतियाँ जैसे चिडिया आदि उकेरी हुई प्राप्त होती है। मोटियारियाँ एकाधिक पडिया अपने बालों में खोसा करती थीं और इसका सांकेतिक अर्थ था कि उसके पास उसे बहुत प्यार करने वाला प्रेमी है। आज घोटुल लगभग समाप्त हो गये हैं तथा जहाँ हैं वहाँ भी ये औपचारिकता भर रह गये हैं। एसे में कलात्मक पडिया अब आसानी से देखने को नहीं मिलती। इस सम्बन्ध में घोटुल के बीच में गडने वाले खम्बे मे अंकित देवी देवताओं की आकृति भी समान उल्लेखनीय है। घोटुल के दरवाजों और उनकी चौखटों पर भी बारीक नक्काशी करने का चलन रहा है। 

आज भी आदिवासी तम्बाखू रखने के लिये विभिन्न प्रकार की चुनैटी बनाते हैं। इन चुनौटियों पर काष्ठ कला के कई प्रयोग देखे जा सकते हैं। प्राय: ये चुनौटियाँ शंखाकार होती हैं किंतु अन्य भी आकार प्रकार बनाये जाते रहे हैं। प्रयोग तथा रखने के स्थान के अनुरूप इन चुनैटियों में वैसी सुविधायें भी होती हैं उदाहरण के लिये यदि पगडी में फसाने योग्य चुनैटा बनाना है तो उसकी आकृति के नीचे पिन नुमा संरचना भी बना दी जाती है जिससे उसे खोंसने में सुविधा हो। वेरियर एल्विन ने अपनी पुस्तक “मुरिया और उनका घोटुल” में उन दिनो प्रचलित कुछ चुनैटिया बतायी हैं (भाग-2, पृ-165) जिन्हें उन्होंने गोटा कह कर उल्लेखित किया है; इनमे प्रमुख हैं हुदौंद गोटा (मोटियारी के स्तनो की भांति गोल), चक्का गोटा (पहिये के आकार का), मारका बट्टा गोटा (आम की आकृति का), कलारी गोटा (मछली की हड्डियों जैसी आकृति), तुमुर गोटा (आबनूस के फूलों के समान) आदि आदि। 

आदिवासियों की काष्ठ कला ने इतिहास के साथ कदम मिलाये और आज उसकी एक झांकी बस्तर के दशहरे के अवसर पर तथा गोंचा पर्व पर निकलने वाली रथ यात्राओं में देखी जा सकती है। बस्तर के दशहरे के लिए बनाए जाने वाले रथ में आदिवासियों की काष्ठ कला का अद्भुत प्रदर्शन होता है। रथ के आगे तथा पीछे रखे जाने वाले काष्ठ निर्मित दो दो घुडसवार पुतले आज भी रथ की सज्जा का प्रमुख हिस्सा होते हैं। आदिवासी देवी देवताओं का काष्ठ स्वरूप में निर्माण भी प्राचीन समय से ही होता आ रहा है। बस्तर के सम्पूर्ण क्षेत्र में आंगादेव, पाटदेव, भीमादेव आदि प्रमुखता से काष्ठ निर्मित ही होते हैं। आदिवासी काष्ठकला का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप है मुखौटे। भाति भातिं के स्वरूप वाले मुखौटे काष्ठ शिल्प के माध्यम से बनाये जाते हैं तथा कुछ तो इनमे बेहद डरावने भी होते हैं। इन मुखौटों का प्रदशन आज भी दंतेवाड़ा की फागुन मडई में दर्शनीय होता है। 

लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा है बस्तर की काष्ठ शिल्प कला जिसका कि अब व्यावसायीकरण भी हो गया है। अनेक संस्थायें आगे आयी हैं जिन्होंने इस आदिवासी कला के न केवल संरक्षण के लिये कार्य किया है अपितु बस्तर के काष्ठ शिल्प को समुचित बाजार भी मिल रहा है। दंतेवाड़ा, जगदलपुर, कोण्डागाँव जैसे नगरों में आपको एसी अनेक दुकाने मिल जायेंगी जहाँ काष्ठ शिल्प कलाकारों द्वारा बनायी गयी कई कलाकृतियाँ आपको देखने तथा खरीदने के लिये उपलब्ध मिलेंगीं। बदले समय की मांग के अनुसार इन दिनो काष्ठ शिल्प में गणेश प्रतिमा, महापुरुषों की प्रतिमायें, महाभारत में कृष्ण का अर्जुन को गीताउपदेश प्रदर्शित करती प्रतिमा, बस्तर दशहरे के दृश्य, दण्डामी माडिया युगल, आदिवासी नृत्य, सलफी के पेड की आकृति आदि सहजता से उपलब्ध हो जायेगी। आदिवासी काष्ठ कला अब मध्यम और उच्च वर्ग के घरों में केवल सजावट की वस्तुओं के रूप में ही नही अपितु फर्नीचर में भी दृष्टव्य है। बस्तर में निर्मित दीवान, सोफे, दरवाजे और चौखटों आदि पर की गयी काष्ठ कला इन दिनो चलन में है। यह अलग बात है कि कलाकार और उपभोक्ता के बीच इतने बिचौलिये काम करते है कि हमेशा ही निर्माता को उसका वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता। आवश्यकता है कि कला को सहकारिता के साथ जोडे जाने की जिससे कि कलाकार को सही मूल्य मिल सके तथा काष्ठ कला एक कुटीर उद्योग बन कर बस्तर की पहचान बनी रहे। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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Friday, September 20, 2013

बदल रहा है बस्तर के मिट्टी शिल्प का दृष्टिकोण


गीली मिट्टी से खेलने वाला हर बच्चा अपनी कल्पनाओं को कोई न कोई आकार देने की कोशिश अवश्य करता है। बुनियादी रूप से यह कल्पनाशीलता ही मिट्टी शिल्प की कलात्मकता का आधार है। बस्तर में मिट्टी शिल्प देश के किसी भी अन्य भाग के टेर्राकोटा कार्यों से भिन्न है चूंकि इसमे कलाकार की मौलिकता मौजूद है न कि सांचों से इसकी निर्मिति हो रही है। साथ ही साथ जो कुछ बस्तर के कलाकार आज भी गुथी हुई मिट्टी को स्वरूप दे कर बना रहे हैं उसमे क्षेत्र के प्रागैतिहास से ले कर इतिहास के हर बदलते हुए दौर की किसी न किसी रूप में झांकी मिलती है। 

मिट्टी शिल्प की बुनियादी जानकारी मुझे धरमपुरा जगदलपुर स्थित मानव संग्रहालय में चल रही एक कार्यशाला के दौरान प्रदान की गयी जहाँ नगरनार से आये मिट्टी शिल्प के कलाकार अपनी कृतियों का न केवल प्रदर्शन अपितु वहीं निर्माण भी कर रहे थे। कलाकारों ने बताया कि यह कला परम्परागत रूप से चाक, उनके हाथों की कारीगरी तथा कल्पनाशीलता का संगम है। मिट्टी मूलरूप से किसी खेत से, नदी-नाले के किनारे नर्म हुई सतह से, तालाब आदि के किनारे से प्राप्त की जाती है जिसे श्रमपूर्वक तथा पैरों से गूंथ कर निर्माण के लिये तैयार कर लिया जाता है। आवश्यकतानुसार थोडी सी रेत मिला कर और पुन: गूंथ कर इस मिट्टी को किसी भी कलात्मक निर्माण के लिये तैयार कर लिया जाता है। 

भव्य हाथी बस्तर के मिट्टी शिल्प की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है। मिट्टी शिल्प का कलाकार मुझे वह प्रक्रिया समझाने लगा जिस तरह वह हाथी का निर्माण कर रहा था। हाथी के पैरो और सूंड को छोड कर पूरा कार्य हाँथों से ही किया जाता है; इसे सजाने के लिये कल्पना और परम्परागत ज्ञान ही उनके सहयोगी होते हैं। यह भी प्रतीत होता है कि हाथी अथवा बैल पर किये गये अलंकरण संभवत: बस्तर को दक्षिण की देन हैं। बस्तर के कलाकारों द्वारा हाथी के अलावा घोडे, बैल नंदी, बेन्दरी आदि प्रमुखता से बनाये जाते हैं। अपने देवी देवताओं को भी मिट्टी के यही कलाकार अपनी कल्पनाशीलता से आकार देते हैं, मुख्य रूप से दंतेश्वरी, जलनी, भण्डारिनी, माडिन माता, बूढी माई, हिंगलाजिन, बंजारिन, मावली, गोंडिन, डोकरा, राहुर, भीमादेव, लिंगोपेन आदि की मृत्तिका-प्रतिमायें बनायी जाती हैं। केवल यही नहीं मृदभांड आज भी आदिवासी परम्परा का हिस्सा है और मटका, घगरी, कुंडरा, कनजी, रूखी, परई, भांजना सुराही आदि भी बनाये जाते हैं। खिलौने बनाना भी कुम्हारों द्वारा किया जाता है और मुख्य रूप से चकिया, चूल्हा, कोंडी, ढक्कन, चाटू, सिल, गुडिया, घोडा, हाथी आदि बनाये जाते हैं। 

कई मिथक कथायें भी उपलब्ध हैं। बस्तर मे यह जनमान्यता है कि तब चारो ओर केवल जल ही जल था और ईश्वर को निर्माण के लिये मिट्टी की आवश्यकता थी। ईश्वर ने केंकडे से कहा कि जाओ पाताललोक में केंचुवे के पास मिट्टी है, उसे ले कर आओ; मुझे उस मिट्टी से दुनिया का निर्माण करना है। केंकडा पाताल लोक पहुँचा और उसके केंचुवे से सृजन के लिये मिट्टी मांगी। इनकार करने पर केंकडे नें अपनी दाढ में केंचुवे को दबा लिया। घबरा कर केंचुवे ने मिट्टी छोड दी, जिसे ले कर केंकडा ईश्वर के पास पहुँचा। ईश्वर नें यह मिट्टी अपने एक गण को दे कर कहा कि जाओ रोशनी के लिये मिट्टी के दीप बनाओ, मिट्टी के पात्र और घट बनाओ। यह गण तथा इसके वंशज कुम्हार बने। इस कहानी से एक और मिथक कथा पूरक की तरह आ जुटती है। कुम्हार ने भगवान से कहा कि मिट्टी के बर्तनों और प्रतिमाओं के निर्माण के लिये मुझे साधन चाहिये। विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र जिससे चाक बना, शिव ने पिण्डी दी जिससे चाक की धुरी बनी तथा ब्रम्ह ने अपनी जनेऊ प्रदान की जिससे मिट्टी काटने की रस्सी बनी। प्रगतिशील समाज इस कहानी को नकार दे इससे पहले मेरा अनुरोध होगा कि इस मिथक कथा को किसी कविता की तरह पढा जाये। सृजन करने वाला हर व्यक्ति वस्तुत: इश्वर का गण ही तो है? इतिहास को भी देखे तो दुनिया के सारे आविष्कार अकस्मात हुए हैं चाहे वह चक्के की खोज हो अथवा आग की; कालांतर में उन्हें किसी न किसी तरह ईश्वरीय सत्ता के साथ उस काल के मानव ने जोड कर अपनी जिज्ञासाओं के सामाधान प्राप्त किये हैं। बस्तर में मिट्टी की किसी कृति के निर्माण के पश्चात उसे आग/भट्टी में पका कर पक्का कर लिया जाता है। बसंत निर्गुणे की पुस्तक “मिट्टी शिल्प” के अनुसार उन्हें कोण्डागाँव के एक कुम्हार बनऊ राम नाग ने यह मिथक कथा बताई थी कि एक बार किसी हाथी के सिर पर मिट्टी चिपक गयी। यह मिट्टी सूख कर किसी पपडी की तरह जमीन पर गिर गयी। बस्तर का पुरा-मानव इस मिट्टी की पपडी को अपनी झोपडी में ले आया। किसी कारण वश झोपडी में आग लग गयी। मिट्टी की यह अर्धचन्द्राकार पपडी जो आकार में किसी पात्र की तरह थी इस आग में पक गयी और ठोस हो गयी। बरसात में पुरा-मानव ने पाया कि इस मात्र में तो वह जल को संचित कर रख सकता है। यही नहीं इस प्रक्रिया से वह अपने उपयोग के योग्य पात्र भी बना सकता है। कहते हैं इसी घटना के फलस्वरूप मिट्टी शिल्प का जन्म हुआ। यह कारण भी है कि हाथी बस्तर में कुम्हारों की निर्मिति में प्राथमिकता से आते हैं और उनकी पूजा भी होती है। यह कथा मनुष्य सभ्यता के विकास की भी परते खोलती हुई भी प्रतीत होती है।

आज भी बस्तर में नगरनार, कोण्डागाँव, कुम्हारपारा (जगदलपुर) तथा एडका (नारायणपुर) में बस्तर की मिट्टी शिल्प कला स्वांस ले रही है। अद्भुत कलात्मकता और कल्पनाशीलता के साथ अब इसमे आधुनिकता का भी समावेश होने लगा है। समय के साथ साथ कलाकार गमले, पेनस्टेंड, दीवार पर लगाये जाने वाली सजावटी कलाकृतियाँ आदि भी बना रहे है। इन सबके बाद जिस बात ने मुझे सर्वाधिक आकर्षित किया वह था “पुरातन और आधुनिकता का फ्यूजन”। कलाकारों से बुनियादी जानकारी ले कर मैं आगे बढा ही था कि मेरी दृष्टि बडे कॉफी कप तथा पेन स्टेंड जैसी कुछ मिट्टी की आकृतियों पर पड़ी। इससे भी बडा और सु:खद आश्चर्य मुझे तब हुआ जब एक नौजवान मेरे सामने आ खडा हुआ और उसने सगर्व बताया कि यह उसका बनाया हुआ है। यह आदिवासी लडका बारहवी पास कर चुका है और अपने पेशे के प्रति भी समर्पित है। उसकी शिक्षा ने ही उसे परम्परा और आधुनिकता को जोड कर नयी कलात्मकताओं को प्रदर्शित करने की प्रेरणा दी है। यह बदलते बस्तर की एक बानगी भर है। हममे से बहुत से लोग जो यह मानते हैं कि रोजगार निर्माण के परम्परागत स्त्रोतों की ओर भी लौटना चाहिये, उन्हें यह प्रयास करने की आवश्यकता है कि एसी कलाकृतियों को बाजार भी उपलब्ध हो। यदि इन कलाकारों को उनके श्रम का वास्वविक मूल्य तथा जीवन यापन योग्य समुचित आय प्राप्त होने लगेगी तो यकीन मानिये बस्तर की यह पारम्परिक कला विश्वमानचित्र पर अपना महत्वपूर्ण दखल रख सकती है। बस्तर में बदलाव के बीज यहीं मौजूद हैं केवल उन्हें सही खाद-पानी और रोशनी प्रदान करना है हमें। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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