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Sunday, May 25, 2014

लाल बुझक्कड बूझगे और न बूझो कोय!!



पिछले पृष्ठ से क्रमश: 

[झिरमघाटी नक्सली हमले पर एक संस्मरण]
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झिरमघाटी की निंदनीय तथा भयावह घटना को पूरा एक वर्ष हो गया। इस घटना की अनेक कोण से विवेचनायें होती रही हैं। केवल यह मान कर कि नक्सली हमला कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा की हत्या करने की साजिश भर थी और इस तरह सलवा जुडुम का बदला लिया गया, इसे बहुत उथला विश्लेषण कहा जा सकता है। इस घटना के स्पष्ट राजनीतिक मायने भी थे। नक्सलियों द्वारा कॉग्रेसी नेताओं की एक पूरी पीढी को समाप्त करने के पीछे की समग्र योजना और उसके कारणों का सामने आना अभी शेष है। घटना के तीन दिन बाद मैं तत्कालीन माहौल और प्रभावों को जानने समझने के लिये दरभा घाटी को जोडने वाले दो छोर पर अलग अलग दिशा से गया था। जो कुछ इस आलेख के माध्यम से मैं कहने की कोशिश कर रहा हूँ उसे केवल संस्मरण कहना न्यायोचित नहीं होगा, यह इतिहास बन चुकी घटना पर एक अलग दृष्टिकोण अवश्य है। 

28 मई 2013 की सुबह; सड़क एकदम सूनसान थी। बचेली से बारसूर की तरफ बढ़ते हुए बार बार ध्यान सड़क के दोनो ओर गिराये गये पेड़ों की तरफ जा रहा था। 25 मई को बस्तर की दरभा घाटी में हुई लाल-आतंकवादी घटना समय ही सुकमा से बचेली और गीदम पहुचने वाले दोनो ओर के मार्गों पर बड़े बड़े पेड़ काट कर गिराये गये थे। सरसरी निगाह से देखने पर ही यह समझा जा सकता है कि दरभा घाटी में हुआ मौत का भयानक ताण्डव अगर वहाँ नहीं होता तो भी टलता नहीं। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा के जाने के प्रत्येक मार्ग अवरुद्ध किये गये थे और पेडों को महेन्द्र कर्मा के गृहनगर ‘फरसपाल पहुँच मार्ग’ से कहीं आगे तक काट काट कर गिराया गया था जिससे कि वारदात के समय गाडियों के चक्के जाम रहें। 

जैसे ही हम कुछ और आगे बढे एक पेड पर चिपाकाया गया पोस्टर नज़र आया। पोस्टर में महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या के बाद अब सलवा जुडुम के नेताओं को जान से मारने की धमकी दी गयी थी साथ ही ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिये मुर्दाबाद था। ऑपरेशन लाल हंट वालों को हर तरफ से अपने ही हंट की चिंता है यह बात इस पोस्टर की विवेचना से स्पष्ट है। सलवा जुडुम भले ही अब समाप्त हो गया हो लेकिन उसके नेताओं से बदला लिया जाना है जिससे कि आदिवासी कभी भी माओवादियों के खिलाफ सिर न उठा सकें और दूसरी बात कि उनके खिलाफ चलाया जा रहा तथाकथित अभियान बंद हो जिससे कि वे निष्कंटक अपना आधार इलाका बढा सकें और समूचे बस्तर को सुरसा मुख में निमग्न कर उसका लाल-सलाम कर दें। 

हमारे यहाँ दिल्ली से नौटंकीबाज समाजसेवियों की खूब सुनी जाती है तो चलिये उनकी ही जनपक्षधरता के नारों का ग्राउंड जीरो में खोखलापन देखें। दंतेवाड़ा को बचेली से जोड़ने वाला शंखिनी नदी पर अवस्थित एक पुल दोनो ओर से चार स्थानों से लगभग काट दिया गया था जिससे कि आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाये। इस बात को सामान्य करार देते हैं, मान लेते हैं कि सड़क तो केवल पूंजीपति और मध्यमवर्तीय लोगों की थाती है आम आदिवासी तो सड़क का उपयोग ही नहीं करता होगा? हो सकता है दिल्ली से एसा ही दिखता हो तो परे कीजिये इस बात को और यहाँ से कुछ सौ मीटर और आगे बढते हैं जहाँ माओवादियों के घटना के एन दिन एक वनोपज जांच नाका गिरा दिया था। दिल्ली सही चीखती है कि वन अधिकारी शोषक हैं इस लिये माओवादियों ने न्याय किया होगा। लेकिन सड़क के दूसरी ओर जहाँ बरसात-धूप से बचने के लिये यात्री शेड बना हुआ था उसे क्यों ध्वस्त किया गया? कोई नवीन जिन्दल उसके नीचे नहीं रुकता, कोई मध्यमवर्गीय व्यापारी, सेठ या किसी शरीर में आत्मा घुसा कर कोई जमींदार भी पुनर्जीवित हो यहाँ नहीं ठहरता। यह तो बस्तर की दो अलग अलग घाटियों को जोडने वाला स्थान था और यहाँ आगे जाने वाले यात्री वाहन की प्रतीक्षा करने के लिये आदिवासी ही विपरीत मौसमों में ठहरते थे। इस क्षेत्र में जो भी इमारते थी, संकेत चिन्ह थे, तथा होल्डिंग्स लगे थे सभी को जैसे चूर चूर कर दिया गया है। किसी बात की खीझ निकाली जा रही हो या गुस्सा प्रदर्शित किया जा रहा हो संभवत: एसा ही कुछ वहाँ देखा जा सकता था। 

इस दृश्य पर ठहर कर दरभा घाटी की घटना की विवेचना करते हैं। कुछ दिनों पहले एक खबर नारायणपुर से आयी थी जिसमे बताया गया था कि माओवादियों ने ग्रामीणों पर पेड काटने के लिये जुर्माना लगाया है। यह बात कही गयी थी कि इस तरह जंगल बचेंगे। वस्तुत: हम एक घटना का दूसरी घटना से तार कभी जोडते ही नहीं। मेरी बात को सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर तीनो ही मार्गों पर जाने वाले लोग आसानी से समझ सकते हैं। सड़क को अवरोधित करने के लिये माओवादियों द्वारा पेड़ काट कर गिराया जाना एक आम घटना है। उल्लेखित सड़कों के किनारे किनारे आपको सैंकडो काटे गये पेडों के ढूंठ नज़र आ सकते हैं। मुझे आशंका है कि मार्ग अवरुद्ध करने के लिये पेड़ काटा जाना कोई क्रांतिकारी गतिविधि नहीं अपितु आदिवासियों के संसाधनों की लूट का एक नये तरह का जरिया है। दरभा घाटी की घटना के दिन अकेले ही सौ से अधिक बडे बडे पेड काट कर मार्ग में बिछा दिये गये थे। मुझे अधिकतम पेड सागवान के लग रहे थे। अंचल के एक वरिष्ठ पत्रकार से जब मैने इसकी तस्दीक की तो ज्ञात हुआ कि चुन चुन कर सागवान के ही पेडों को काटा गया था। इतना ही नहीं दूसरे दिन किसी चमत्कार की तरह काटे गये पेडों के मुख्य हिस्से सड़क से गायब भी हो गये। मुझे किसी की आई क्यू पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना है आप चाहें तो इस सच्चाई के पीछे के खेल को नजरंदाज कर जनपक्षधरता की तकरीरे जारी रख सकते हैं। 

‘पर्यावरण और माओवादी’ बडा ही मजेदार विषय है जिसे बस्तर में होने वाली “मौतों पर जाम टकराने वाले एक विश्वविद्यालय” के विशेषज्ञों द्वारा बार बार दुहाई की तरह उठाया जाता है। मैने कई बार आदिवासियों से इस बात को जानने की कोशिश की है और अपुष्ट सूत्रों से यह बता सकता हूँ कि बस्तर के कई दुर्लभ पक्षी बाशिंदे निरंतर भूने खाये जा रहे हैं। आपको आदिवासियों के शिकार पर आपत्ति है और भीतर कई निरीह प्राणी इस महान सो-काल्ड साईंटिफिक सोच वाली लाल-सेना के कैम्प फायर की शोभा होते हैं। एक कश्मीरी पंडित लेखक ने फौरी बस्तर भ्रमण (माओवादियों से मिल कर उनसे सोने-जागने-धोने-नहाने पर किताबें लिखने वाला परिभ्रमण) के बाद लिखा कि किस तरह माओवादी कैम्प के बाहर एक सांप दिखा और उसे तुरंत मार दिया गया। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि बस्तर की कई महत्वपूर्ण खदाने जो कि कोरंडम, टिन जैसे बहुमूल्य संसाधनों की है उनपर अब लाल-आतंकवादियों का कब्जा है और मैं उन पर स्मग्लिंग का आरोप लगाउं- तौबा तौबा, आप तो यूं कहिये कि आदिवासियों के लाल-हंट के लिये बस्तर के ये संसाधन अब साधन जुटाने का काम कर रहे हैं। ये सभी वे कहानियाँ हैं जिन पर आपको कोई युनिवर्सिटी बात करती नजर नहीं आयेगी, कोई लेखक अपनी किताब में छाप कर चर्चा नहीं करेगा, कोई जनपक्षधर लाल-सलामी लेखक इन तथ्यों पर निगाह भी नहीं डालेगा। बस्तर मरता है तो मरे इससे किसको सरोकार? 

सच्चाई तो यही है कि जब 75 जवान मरे थे तब भी दिल्ली में खिलखिलाहट थी और जब 31 जनप्रतिनिधि मारे गये तब भी दिल्ली के कई बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इसे तरह तरह से जस्टीफाई करने में लगे हैं। एक कविता कहती है कि जब नाजी कम्युनिष्टों के पीछे आये तब कोई नहीं बोला; तो बाद में सारे कम्युनिष्ट ही बंदूखें पकड कर बस्तर के जंगलों में नाजी बन गये; और खबरदार अब कोई मत बोलना? लाल-आतंकवादियों को साम्राज्यवादी कहने के पीछे मेरा तर्क वृथा भी नहीं है। यह बात तो सर्व-विदित है कि दरभा घाटी की घटना के पीछे आन्ध्र-ओडिशा-महाराष्ट्र-झारखण्ड के आतंकवादियों का हाथ था। एयरपोर्ट में मिलने वाला मंहगा पानी गटकने वाले आतंकवादी बस्तर को कैसा रखना चाहते हैं यदि इस बात को कोई प्रमाण के साथ समझना चाहता है तो आपको केवल इतना करना है कि सुकमा-कोण्टा मार्ग से हैदराबाद जाने वाली बस में बैठ जाईये। जबतक बस्तर है तब तक आपकी बस हिचकोले खाती हुई जायेगी। माओवादियों ने इस सड़क को इतनी जगह से काटा है कि अब गिनती करना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे ही कोण्टा की सीमा समाप्त होती है और आन्ध्र लगता है तो चमत्कार नजर आता है। भाई यह भी तो माओवादी इलाका ही है लेकिन यहाँ की सड़क इतनी बढिया और फोर लेन? मैं जानता हूँ कि मेरी बात को कोई नहीं बूझ सकता - “लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!”

-राजीव रंजन प्रसाद 

Sunday, May 18, 2014

बस्तर में इतिहास और नक्सलवाद का प्रवेशद्वार

इतवारी अखबार मे प्रकाशित  - 


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बस्तर को बूझने की पहली कड़ी है उसकी प्राणदायिनी सरिता इन्द्रावती। यह असाधारण नदी है जिसके पाटों में इतिहास और समाजशास्त्र मिलकर अपनी बस्तियाँ बसाये बैठे हैं। ओडिशा के कालाहाण्डी जिले में रामपुर युआमल के निकट डोंगरमला पहाड़ी से निकल कर इन्द्रावती नदी लगभग तीनसौछियासी किलोमीटर की अपनी यात्रा में पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। बस्तर पठार की पश्चिमी सीमा में यह नदी दक्षिण की ओर मुड कर भद्रकाली (भोपालपट्टनम) के पास गोदावरी नदी में समाहित हो जाती है।

बहुत समय से भद्रकाली जाने की मन में इच्छा थी। अपनी पुस्तक “बस्तर इतिहास एवं संस्कृति” में लाला जगदलपुरी ने “भद्रकाली का नीला-गेरुआ जलसंगम” शीर्षक से एक संस्मरण लिखा है जिसे पढने के पश्चात इस क्षेत्र को देखने की इच्छा बलवती हो उठी थी। लाला जी का लिखा संस्मरण वर्ष-1986 की वसंतपंचमी का है जब भद्रकाली का क्षेत्र अपने घने जंगलों और नयनाभिराम प्राकृतिक दृश्यों के लिये जाना जाता था किंतु फ़िजाओं में बारूद की गंध नहीं थी। समय के साथ यह क्षेत्र लाल आतंकवाद का प्रवेशद्वार बना। यहाँ के लुभाने वाले हरे भरे जंगल और मंत्रमुग्ध करने वाली पर्वत श्रंखला शनै: शनै: भय और आतंक का पर्याय कहे जाने लगे। यदि भौगोलिक दृष्टि से भद्रकाली की अवस्थिति को समझने की कोशिश की जाये तो यह भारत की दो पवित्रतम तथा प्राचीनतम नदियों की संगम स्थली है जो वस्तुत: तीन राज्यों की सीमा भी है। एक ओर आन्ध्रप्रदेश, दूसरी ओर महाराष्ट्र तथा तीसरे हिस्से की भूमि छत्तीसगढ राज्य है।

वातावरण में फरवरी की हल्की सी ठंडक विद्यमान थी। मेरे साथ सहयात्री थे मित्र कमल शुक्ला; रात्रि-विश्राम बीजापुर में करने के पश्चात हम सूरज की पहली किरण के प्रस्फुटन के साथ ही भोपालपट्टनम के लिये निकल गये थे। जीवंतता इन दिनो पूरे बस्तर से ही विलुप्तप्राय हो गयी है संभवत: इसी लिये बीजापुर से भोपालपट्टनम का सडकमार्ग एकदम सूनसान प्रतीत हो रहा था। भोपालपट्टनम प्रवेश कर पाते इससे पहले ही एक स्थान पर हम ठिठक गये। यहाँ लगभग दस से पंद्रह पेडों पर दर्जनों नक्सली पोस्टर लगाये गये थे। अनेक पोस्टरों में मुद्दे बैलाडिला से सम्बद्ध थे और उनमें लोहे की खदानों को बंद कराने की अपील थी। कुछ पोस्टर ऑपरेशन ग्रीन हंट को बंद करने, ग्रामीणों की हत्या रोकने, लुटेरी पार्टियों को गाँव में घुसने न देने आदि की चेतावनी भरे थे। नक्सलगढ में ऐसे स्वागत तोरण अपेक्षित ही थे। अब तक जितने भी नक्सली पोस्टर मैने पढे अथवा देखे है उसमें भाषा को ले कर जो भी त्रुटियाँ रहती हों मसलन “हत्या” की जगह “अत्या” अथवा “किनारे बसे” के स्थान पर “कीनारे बासे” आदि किंतु अपनी बात को नक्सली बहुत स्पष्टता से रखते हैं। प्राय: इन पोस्टरों की लिखावट मैंने इतनी सुंदर देखी है कि लगता ही नहीं कि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों की परिधि में ये हिन्दी में लिखे गये पोस्टर लगाये गये हैं। 

हमने यह ठीक समझा कि स्थानीय मित्रों से भद्रकाली की ओर आगे बढने से पहले सहायता ले ली जाये। भोपालपट्टनम में अफ़ज़ल भाई को कौन नहीं जानता, एकदम निर्मोही और जीवट किस्म के पत्रकार। हम अफज़ल भाई के निवास पर पहुँचे तो वे केवल एकवस्त्र में भूमि पर विराजमान थे और सरसों के तेल से अपनी मालिश करवा रहे थे। हमने भी उनकी परमानंद की इस अवस्था में कोई दखल नहीं दिया अपितु उनके इशारे भर से हमारे लिये पानी और नाश्ते की व्यवस्था हो गयी थी। अफजल भाई हमारे साथ भद्रकाली तक चलने के लिये तैयार हो गये। तूम्बा भर कर पानी गाड़ी में रख लिया गया और हम तीनो ही आगे बढ चले थे। कुछ ही देर में मुख्यसड़क का साथ छूट गया और पथरीली उबड़-खाबड़ सडक ने हमारा स्वागत किया। एकाएक उँचाई से हमें तीव्र ढाल दिखाई पडी जो कि चिंतावागु नदी तक पहुँचती थी। रास्ता पूरी तरह रेतीला और उसपार जाने के लिये गाडी को इस नदी से हो कर ही निकलना था। यह भी किसी दक्ष वाहनचालक के बूते की ही बात थी क्योंकि एक निश्चित गति से चलाते हुए गाडी को नदी पार न करायी गयी तो पहियों के फँस जाने का अंदेशा था। नदी पार करते ही हमने राहत की सांस ली, हम किनारे उतर कर यहाँ के परिदृश्य का जायजा ले ही रहे थे कि सामने से स्थानीय युवा-आदिवासी पत्रकार सोमैया अपनी मोटरसायकल से आता दिखाई दिया। अफज़ल भाई ने उसकी मोटरसायकिल स्वयं के कर यहाँ हमसे विदा ली और सोमैय्या को हमारा आगे का मार्गदर्शक नियत कर दिया। 

आदिवासियों की बैद्धिकक्षमता, कार्यनिष्ठा और लगन का सजीव उदाहरण है सोमैया। चिंतावागु के तट से आगे बढते हुए भद्रकाली तक रास्ते के एक-एक मोड़ और उससे जुडी अनेकानेक घटनायें उसके माध्यम से सुनकर कभी हृदय रोमांचित होता तो कभी सिहरन मन में दौड़ जाती थी। इसमे कोई संदेह नहीं कि जिस रास्ते से हम अब गुजर रहे थे वह माओवादियों की सक्रिय कर्मभूमि है। सोमैया जब हमे रास्ते में बताता कि इस मोड पर गाडी उडा दी गयी थी, इस घाटी में मुठभेड हुई थी और ग्यारह लोग मर गये थे या कि यहाँ वाहनों को जला दिया गया था तो हर बार उसकी कम्पन रहित आवाज़ पर मुझे महसूस होता था कि इन वादियों और यहाँ के रहवासियों ने यह सब स्वाभाविक मान लिया है। 

रास्ता पूरी तरह उजाड़ और पथरीला था तथा भद्रकाली तक पहुँचना केवल उनके ही बूते की बात है तो यह कमर कस कर निकले हों कि अब चाहे जो हो वहाँ पहुँचना ही है। यह सडक मार्ग भोपालपट्टनम को आन्ध्र से भी जोडता है। यहाँ से गुजरने वाले इक्कादुक्का वाहन ग्रामीणों से खचाखच भरे हुए थे। इसमे कोई संदेह नहीं कि माओवादियों की सहमति और जानकारी के बिना यहाँ वाहन नहीं चल सकते थे। रास्ते में अनेक स्थानों पर सडकों को काटे जाने तथा जानबूझ कर बाधित किये जाने के चिन्ह स्पष्ट  देखे जा सकते हैं। समय समय पर माओवादियों द्वारा अपने किसी मिशन अथवा गतिविधि को अंजाम देने के लिये इन टूटी-फूटी सडकों को भी काट दिया जाता है और इस तरह आवागमन पूरी तरह बाधित कर दिया जाता है। ये काटी गयी सड़कें फिर किसी माससून में पानी के साथ बह आती मिट्टी से खुद ही भर जायें तो ही आवागमन के लिये पुन: खुल पाती हैं। मैं बहुत खामोशी से महसूस कर रहा था कि ये मध्ययुगीन दृश्य इक्कीसवीं सदी के भारत का हिस्सा हैं। पूरे रास्ते हमे इक्का दुक्का लोग ही मिले। सड़क के किनारे खडी कुछ युवतियों के जूडे में लगे फूलों के गजरे से यह बात मुझे स्पष्ट होने लगी थी कि इस क्षेत्र में बस्तर की संस्कृति पर आन्ध्र-महाराष्ट्र का संगम भी देखने को मिलने लगता है। कुछ आगे बढने पर मुझे बताया गया कि बस्तर में पचास के दशक में कलेक्टर रहे आर.एस.वी.पी नरोन्हा के नाम पर यहाँ एक गाँव और तालाब भी अवस्थित है।

बोलेरो जैसी कठिन रास्तों में चलने के लिये सक्षम जीप में यात्रा करते हुए भी कमर में दर्द हो चला था। हमारी आगे बढने की गति दस किलोमीटर प्रतिघंटा के आसपास रही होगी और यह लग गया था कि भद्रकाली पहुँचने-लौटने में ही आज पूरा दिन लग जायेगा। भद्रकाली गाँव के करीब पहुँचने पर हमे एक पुलिसकैम्प दिखाई पड़ा जिसके निकट से आगे बढते ही अब ग्रामीण बसाहट दिखने लगी थी। यहाँ एक पहाडी टेकरी पर भद्रकाली का मंदिर अवस्थित है जिसके नाम से ही गाँव को पहचान मिली है। मुझे स्थानीय पुजारी ने बताया कि प्रतिमा यहाँ पर बाद में स्थापित की गयी है और मंदिर किसी तहसीलदार द्वारा बनवाया गया है। पहले पहाडी टीले को ही देवी भद्रकाली का सांकेतक मान पर प्रार्थना-जात्रा संपन्न की जाती रही है। लाला जगदलपुरी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि “मंदिर के तत्वाधान में प्रतिवर्ष त्रिदिवसीय मेला लगता है। वसंतपंचमी के एक दिन पहले मेला भरता है और दूसरे दिन मेले का समापन बोनालू होता है। बोनालू के अंतर्गत हल्दी-कुमकुम से सजे हुए तीन घड़े रखे जाते हैं। एक के उपर एक। नीचे के घट में खीर रखी होती है। बीच के घडे में खिचडी रखते हैं और उपर वाले घडे में रहती है सब्जी। उपर वाले घट पर एक दीपक जलता रहता है। कई महिलायें अपने तीनों घडों को सिर पर रख कर मंदिर की परिक्रमा करती हैं। प्रदक्षिणा पूरी हो जाने के बाद हंडियों में रखी खीर, खिचडी और सब्जी का प्रसाद दर्शनार्थियों में बांटा जाता है। इसके अतिरिक्त तीन तीन साल में यहाँ अग्निप्रज्वलन समारोह भी श्रद्धालु शैव भक्तों द्वारा आयोजित होता रहता है। अग्निकुण्डों में अग्नि समयानुसार प्रज्ज्वलित रखी जाती है। मनौतियाँ मानने वाले लोग उपवास रखते हैं और आस्थापूर्वक अग्निकुण्डों में प्रवेश करते हैं और अंगारों पर चल निकलते हैं। भद्रकाली मंदिर में दर्शन करने के पश्चात हम अब उस जगह की ओर बढ चले थे जो दो महान सरिताओं की आलिंगन स्थली है और जहाँ गोदावरी नदी में बस्तर की प्राणदायिनी नदी इन्द्रावती समा कर अपना अस्तित्व विसर्जित कर देती है। आगे बढते हुए यहाँ ताड़ के पेडों की कतारें और खपरैल के बने तीस-पैंतीस मकानों की बसाहट दिखाई पड़ी।

इतिहास मेरे सामने उपस्थित हो गया था। यही वह स्थान है जहाँ से वर्ष-1324 में अन्नमदेव ने नागों के शासित क्षेत्रों में प्रवेश किया और बस्तर राज्य की स्थापना जी। इसी संगम स्थली पर प्रार्थना करने के पश्चात ही अन्नम्मदेव ने अपना बस्तर विजय युद्धाभियान आरम्भ किया था। यही वह स्थान है जहाँ से अस्सी के दशक में नक्सलवादी भोपालपट्टनम में प्रविष्ठ हुए और धीरे धीरे अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए सम्पूर्ण अबूझमाड को अपना आधार क्षेत्र बना लिया। आज यही संगम स्थली न केवल तीन राज्यों के बीच संस्कृतियों का आदान-प्रदान कर रही है अपितु दु:खद यह कि दुर्दांत आतंक भी इसी स्थल को धुरी बना कर तीन राज्यों के लिये चुनौती बना हुआ है। 

एक पहाडी टीले से नीचे उतरने के बाद दूर दूर तक रेत का विस्तार दिखाई पड़ा। यह प्रतीत हो रहा था कि लगभग दो किलोमीटर इसी रेतीली भूमि पर चलने के पश्चात ही हम संगम तक पहुँच सकते हैं। गर्मी थी तथा यह दूरी देख कर एक बार के लिये हिम्मत जवाब देने लगी। दूर इन्द्रावती दिखाई पड रही थी और निगाह दौडाने पर गोदावरी नदी क्षितिज बनी हुई थी। लगभग आधा किलोमीटर ही आगे बढने के बाद लगा जैसे दूसरी दुनिया सामने प्रकट हो गयी है। दूर दूर तक बैगनी और काले रंग के पत्थरों के अनेक तरह की आकृतियाँ जो नदी की विपरीत दिशा में झुकी हुई दिखाई पड़ रही थीं। हम इन्द्रावती की दिशा से संगम की ओर बढ रहे थे और यह स्पष्ट था कि नदी ने पूर्ण विश्राम से पहले राह में मिलने वाले सभी अवरोधों को बारीक रेत बना दिया है। वे चट्टाने जिन्हें स्वयं पर फौलादी होने का दंभ रहा होगा अब भी शनै: शनै: अस्तित्व खो रहे हैं। नदी निर्मित स्थलाकृतियों का एसा अद्भुत सौन्दर्य मैने अन्यत्र नहीं नहीं देखा है। यह किसी चित्रकार की कल्पना जैसा लगता है जहाँ केनवास पर रेतीला रंग बिखेर कर फिर करीने से उभरे-तराशे हुए पत्थरों की छटा उकेरी गयी हो।

संगम निकट आ गया था। इन्द्रावती नदी की रफ्तार बहुत धीमी हो चली थी जबकि सामने से बह आती गोदावरी में गहराई और वेग साफ देखा जा सकता था। बहुत लम्बे समय की साध साक्षात देख मैं रोमांचित हो उठा। गोदावरी की ओर कोई मछुवारा अपनी नाव से जाल नीचे डाले मछली के फसने की प्रतीक्षा में बगुले की तरह स्थिर खडा दिखाई पड रहा था। कमल शुक्ला राज्यों की सीमा पार करने को उद्यत थे और बस्तर की ओर से तैर कर वे महाराष्ट्र के गढचिरौली पहुँच गये। मैंने संगम का जल अपने सिर पर डाल कर स्वयं को पवित्र हुआ महसूस किया। संगम के दूसरी ओर गढचिरौली की तरफ ऐतिहासिक शिवलिंग अवस्थित है जो संरक्षण के अभाव में बहुत हद तक खण्डित हो चुका है।

इन्द्रावती नदी किनारे की ओर बहुत उथली थी। मैं पैर डुबो कर वहीं किनारे बैठ गया और प्रकृति निर्मित अनुपम सौन्दर्य को अपलक निहारता रहा। अचानक मुझे अपने पैरों में गुदगुदी सी महसूस हुई। मैने ध्यान दिया कि सैंकडों छोटी मछलियाँ मेरे पैरों के चारो ओर एकत्रित हो गयी हैं। मैने अपना पैर नहीं हटाया और धीरे धीरे महसूस करने लगा कि किस आराम से मेरे तलुओ पर के बाहरी चमडे को वे धीरे धीरे निकाल रही हैं। मुझे आराम मिल रहा था साथ ही इन्द्रावती का ठंडा पानी मुझे सुकून और ध्यान की किसी दूसरी दुनिया की ओर ले चला था। 

यह स्थल न केवल पर्यटन की दृष्टि से बस्तर को उपलब्ध एक अद्वितीय जगह है अपितु धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसकी महत्ता है। यह दु:खद है कि तीन राज्यों की सीमा होने का लाभ होने के स्थान पर हानि ही बस्तर का यह अंतिम छोर भुगतने के लिये बाध्य है। बहुत आसान है कि नावों से गोदावरी के रास्ते कोई भी बस्तर के अनछुवे सघन जंगलों और महानतम संस्कृति तक अपनी पैठ बना सकता है या कि तैर कर ही गढचिरौली से भद्रकाली तक पहुँच सकता है किंतु क्यों व्यापार इस रास्ते नहीं आता? प्रगति और समृद्धि को ये रास्ते दिखाई नहीं पडते लेकिन बारूद बेखौफ इन्द्रावती के तटों तक पहुँच रहा है। 

मैं भारी मन से दो महान सरिताओं की संगमस्थली से उठा था। अगाध सौन्दर्य जो बहुत ही कम निगाहों से गुजरा है, मेरे मानसपटल पर अंकित हो गया था। मैं कभी यह दृश्य नहीं भूल सकता और कामना भी है कि बस्तर की यह थाती हर किसी के लिये सुलभतम हो सके। इन्द्रावती बहुत खामोशी से गोदावरी का हिस्सा बन जाती है लेकिन बहुत दूर तक दोनो ही नदियों के जल को अलग अलग महसूस किया जा सकता है। बैलाडिला से चल कर अयस्क चूर्ण शंखिनी-डंकिनी नदियों के माध्यम से इन्द्रावती में मिल कर इस संगम स्थल तक भी पहुँच रहा है और इसे दूर दूर तक फैली रेत में घुले मिले भी देखा जा सकता है। अब तक दोपहर ढलने लगी थी। हम लौट रहे थे जबकि मन यहीं ठहरा रहना चाहता था। 

-राजीव रंजन प्रसाद            

Wednesday, January 29, 2014

अभिव्यक्ति के लिये नक्सलगढ में दुस्साहस भरी पदयात्रा


छब्बीस जनवरी का दिन जब राजपथ पर एक ओर जनजातीय क्रांति का सबसे बड़ा प्रतीक बस्तरिया नायक गुण्डाधुर उतरा हुआ था वहीं ओरछा के इस छोर पर छत्तीसगढ के अनेक पत्रकार और लेखक एकत्रित हो रहे थे। पत्रकारिता का मतलब बुद्धू बक्सा की चीख चिल्लाहट और क्रांति का अर्थ केजरीवाल वाला दृष्टिकोण इतना व्यापक हो गया है कि अखबार अपने ही पत्रकारों के दुस्साहस पर चुप्पी साधे बैठे हैं। जब पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या हुई थी तब भी एक तरह की खामोशी थी यह स्थानीय पत्रकारों का ही माओवादियों पर दबाव था जब उन्होंने जंगल के भीतर की रिपोर्टिंग बंद कर दी, जिसके फलस्वरूप नक्सली प्रवक्ताओं को घटना पर खेद जताना पड़ा। कुछ ही समय के पश्चात यही फिर दोहरा दिया गया जब दक्षिण बस्तर के पत्रकार साईं रेड्डी की बहुत ही निर्मम तरीके से हत्या की गयी। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उन क्षमा याचनाओं का क्या जो माओवादियों के जारी परचों की उद्घोषणायें थीं? छत्तीसगढ में कार्य कर रहा संगठन जिसका मुख्य प्रवक्ता गुडसा उसेंडी अपनी पत्नी के साथ बेहतर पुनर्वास की अपेक्षा में आत्मसमर्पण कर चुका हो वहाँ क्या वैचारिक तौर पर खलबली नहीं मची हुई होगी? जब आत्मसमर्पण के बाद स्वयं गुडसा उसेंडी यह बयान देता हो कि उसने जो कुछ कहा है उनमें से अधिकांश के साथ उसकी सहमति नहीं है और वह स्वयं अनावश्यक हिन्सा का विरोधी रहा है तब क्या जो कुछ बस्तर में होता रहा है उसपर बहुत गंभीरता से सोचे जाने की आवश्यकता नहीं है? और इस कारण से भी अबूझमाड में जारी पदयात्रा और अधिक प्रासंगिक नहीं हो जाती? 

ओरछा से बीजापुर तक अनेको पत्रकार और लेखक पैदल निकल चले हैं। यह यात्रा छब्बीस जनवरी से शुरु हुई है जो कि भारत के गणतंत्र हो जाने का दिवस है और तीस जनवरी को समाप्त होनी है जो अहिंसा के सबसे बडे प्रतीक महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि है। प्रतीकों के अपने मायने होते हैं और पैंसठ साल के हो चुके हमारे गणतंत्र को यह स्मरण ही नहीं कि जाने कैसे उसके मूलभूत सिद्धांतों पर धूल की परत चढती गयी है। यह पदयात्रा केवल पत्रकार साथियों की हत्या का विरोध भर नहीं है, यह संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार को कायम रखने के लिये उठाया गया जोखिम भी है। माओवाद यदि क्रांति की किसी अवधारणा के साथ कार्य करता है तो पत्रकार और लेखकों की निर्मम हत्यायें उसके दावों को झुठलाती हैं, खोखला बनाती हैं। किसी पत्रकार और लेखक की कलम वस्तुत: सच उजागर करने का कदम भर होते हैं वे लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे दृष्टिकोण के नहीं अपितु नीर-क्षीर विवेक के प्रस्तोता होते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखो तो जेलों में सडो, मुकदमों का सामना करो और नक्सलियों के विरुद्ध कलम चल गयी तो गला ही रेत दिया जायेगा। क्या इन परिस्थितियों के बीच काम करने वालों की स्थिति के विषय में हमारे अखबार चलाने वालों ने और उसके पाठकों ने ठहर कर कभी सोचा है? 

स्थानीय पत्रकार दोधारी तलवार पर चलते हैं। बेहतर तथा शीघ्रातिशीघ्र खबरें प्रस्तुत करने का दबाव रायपुर और दिल्ली से उनपर बना रहता है। वे अपना काम करें तो भी उनकी निष्पक्षताओं पर सवाल लिये खडे करने वालों की कोई कमी नहीं। इन्ही सवालों के कारण जंगल के भीतर का सच उजागर करने वाले पत्रकारों को कभी नक्सली होने का लेबल मिल जाता है तो कभी मुखबिर होने की लानत। हर किसी को कलम से ही शिकायत है और बंदूखें जंगल के भीतर और बाहर मुर्गा तोडने में व्यस्त हैं। इतना ही नहीं स्थानीय मुद्दों, इन पत्रकारों के वस्तविक हक-हुकूकों की जम कर अव्हेलना ही नहीं होती बल्कि दु:ख इस बात का भी है कि स्थानीय अखबारों और संचार माध्यमों तक ने अपने पत्रकार साथियों की दु:साहसी पदयात्रा को खबर बनाना जरूरी नहीं समझा? इन पत्रकारों को उनके अखबारों की ओर से न तो भविष्यनिधि हासिल है न ही बीमा लेकिन इतना तो हो सकता था कि इनके हौसलों को उनका हक और साहिल प्रदान किया जाता?

इस अभियान को सहमति स्वरूप वरिष्ठ लेखक गिरीश पंकज के साथ साथ अनेक पत्रकार जिनमे कमल शुक्ला, बाप्पी रे, रंजन दास, नितिन सिन्हा, लक्षमी नारायण लहरे, नील कमल वैष्णव, अशोक गभेल, लक्षमण चंद्रा आदि आदि के साथ साथ पटना से आये बिहार टुडे से दो पत्रकार भी सम्मिलित हैं। पदयात्रा में 26 जनवरी को पहला पड़ाव ओरछा से 13 किमी दूर जाटलूर में 27 जनवरी को दूसरा पड़ाव होगा, 28 को अगला पड़ाव लंका और 29 को कुटरू होगा, जहां पत्रकारों द्वारा सभा आयोजित होनी है। 30 जनवरी बीजापुर में पदयात्रा का समापन प्रस्तावित है। ओरछा से पदयात्रा के आगे बढने के पश्चात पिछले दो दिनों से इन साथियों की कोई भी खबर किसी भी स्त्रोत अथवा माध्यम से नहीं आ रही है। मैं यह मानता हूँ कि पंखों से नहीं अपितु हौसलों से उडान होती है और यही कारण है कि हमारे ये पत्रकार और लेखक साथी अपनी दुस्साहसी यात्रा अवश्य पूरी कर लेंगे तथा एक आवश्यक संदेश जंगल के भीतर छोड कर आने में सफल होंगे। संचार माध्यमों की इस महत्वपूर्ण खबर पर रहस्यमयी चुप्पी से मुझे कोई शिकायत नहीं उनके लिये दिल्ली है और दिल्ली की सरकार है खूब खबरें छापिये वहाँ की कानून व्यवस्था और वहाँ के कानून मंत्री की; बस्तर के पत्रकार अपनी अभिव्यक्ति का हक गुमनाम लडाईयों से भी हासिल करना जानते हैं। प्रतीक्षा है सथियों आपकी....।

- राजीव रंजन प्रसाद
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Saturday, November 16, 2013

बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है


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बस्तर में विधानसभा चुनावों के सम्पन्न होते ही गहरी गहरी स्वांसों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। सुरक्षाबलों के अपना एक सिपाही श्री पी. डी. जोसेफ़ को खोया तो कुछ ग्रामीण भी घायल हुए किंतु यह सब वर्ष 2008 में इस क्षेत्र में हुए मतदान के समय हुई नक्सली हिंसा जिसमे बयालिस से अधिक शहादत दर्ज हुई थी, उसके समकक्ष राहत भरी खबर बन कर आया है। क्षेत्र में चुनाव विश्लेषणों का समय अब उबर गया है तथा नारे और झंडे अब उत्तरी छत्तीसगढ की ओर केन्द्रित होने लगे हैं। अब गहरी खामोशी है, सुरक्षा बलों के मतदान केन्द्रों के छोडते ही कुछ खम्बे नोचे गये और दिन भर कई बम विस्फोट तो कई विस्फोटक बरामद होने की खबरें आती रहीं। इस बीच बस्तर के भीतर बैलेट और बुलेट की जय पराजय पर चर्चायें होने लगी हैं। यह चर्चा न केवल बस्तर अपितु दिल्ली से भी जारी है चूंकि विचारधारा की युद्धभूमि होने के कारण व्यापक दृष्टि से यहाँ हुए चुनावों के प्रत्येक कदम की विवेचना हुई और यह जानने की कोशिश की जाती रही कि क्या वास्तव में बैलेट से बुलेट पराजित हुआ है?

इस दृष्टिकोण को समझने से पहले इस बार चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका की सराहना करनी आवश्यक है। भारी मात्रा में सुरक्षाबल की तैनाती और सभी प्राप्त जानकारियों के अनुरूप समुचित निर्णय ले कर इन चुनावों को त्रासदी बनने से रोक दिया गया। यदि एसा न हुआ होता तो आज हम रक्तपात के अनुपात पर विमर्श कर रहे होते, मृतक अवशेषों पर मेनहीर गड़ रहे होते और यह मान लिया जाता कि समानांतर सरकार चलाने का दावा वास्तव में एक सच्चाई है। एसा नहीं था कि प्रयास नहीं हुए अथवा जंगल के भीतर से लोकतंत्र के इन महापर्व को धमाके सुनाये जाने की तैयारी नहीं थी। बीजापुर के अनेक क्षेत्रों से रह रह कर नक्सली फायरिंग तथा सुरक्षा बलों द्वारा उत्तर दिये जाने की सूचनायें आती रहीं, करकेली में जहाँ गोली चला कर नक्सली भाग निकले तो मंकेली बूथ पर उन्होने गोली चालन किया। बीजापुर चुनावी परिक्षेत्र के आवांपल्ली में दस किलोग्राम का एक शक्तिशाली बम भी बरामद किया गया था। दंतेवाड़ा में इससे भी भयावह तैयारियाँ थीं तथा पैंतीस और चालीस किलोग्राम के दो बम यहाँ भी बरामद हुए जबकि धानीरका बूथ के पास से दो टिफिन बम भी मौके पर नष्ट किये गये। यही नहीं बरसोल क्षेत्र में छ: आईडी बमो की बरामदगी हुई तो स्थान स्थान पर पोलिंग पार्टी पर नक्सली हमला होने की खबरे पूरे दिन आम थीं। कोण्टा विधानसभा क्षेत्र में हालात इतने खराब थे कि सुकमा के मुरतुण्डा बूथ पर जा रही पोलिंग पार्टी को ही वापस बुला लिया गया। कमोमेश यह स्थिति बस्तर में सभी सीटों पर देखी गयी थी। ओरछा मे दो बम जिन्दा बम मिले, नारायणपुर के आकाबेडा में पच्चीस किलोग्राम का बम बरामद हुआ था तो दरभा के कोलांग मतदान केन्द्र पर गोलीबारी हुई थी। कांकेर की भी यही स्थिति थी जहाँ दुर्गापल्ली के पास एक बम मिला तो पखाञुर मे शक्तिशाली बम विस्फोट के कारण बीएसएफ का एक जवान घायल हो गया, जिसे एयर-एम्बुलेंस से तत्काल ही अस्पताल पहुँचाया गया। ये सभी घटनायें सिद्ध करती हैं कि आतंकवाद ने अपनी ओर से तैयारियों में कोई कमी नही रखी थी। बस्तर समेत जिन अठारह सीटों के लिये छत्तीसगढ में मतदान हुआ वहाँ संवेदनशील मतदान केन्द्रों की संख्या 1517 थी जबकि लगभग इतनी ही अर्थात 1311 संख्या अतिसंवेदनशील मतदान केन्द्रों की थी। इन परिस्थितियों ने लोहा लेना कोई आसान कार्य नहीं था और इसे संभव कर दिखाने में लगी सभी संस्थाओं की सराहना इस लिये भी होनी चाहिये कि बुलेट को यदि योजनाबद्ध रूप से नहीं रोका जाता तो बैलेट की कभी जीत नहीं हो सकती थी। यहाँ जोडना चाहूंगा कि ये सभी तैयारियाँ केवल सुरक्षाबलों के विरुद्ध नहीं थी अपितु उस आम आम मतदाता पर सीधा हमला करने के लिये भी थीं जो अपने क्षेत्र में पसंद की सरकार चुनने के लिये प्रतिबद्ध हो कर साहस जुटा कर मतदान केन्द्रों तक पहुँचा था।       

भय और साहस के बीच संघर्ष की अनेक लोमहर्षक कथायें इस चुनाव में सामने आयीं। यह भी हुआ है कि दंतेवाड़ा, कोण्टा और बीजापुर के अनेक मतदान केन्द्रों में एक भी मतदाता नहीं पहुँचा जबकि इस बार प्रत्येक बूथ में 70-80 सुरक्षा कर्मी तैनात थे यहाँ तक कि हर बूथ में विभिन्न राज्यों से आयी महिला पुलिस कर्मी और कमाण्डों को भी ड्यूटी पर तैनात किया गया था। किंतु एसा भी हुआ है कि पैरों से लाचार मतदाता दोनों हाथों में जूते ठूसे कंटकाकीर्ण पगडंडियों पर घिसटता हुआ बूथ तक पहुँचा। एसे भी दृश्य है जहाँ चलने से लाचार बूढे की लाठी बन कर कोई बुढिया मतदान केन्द्र तक उसे ले आई थी। मतदाताओं को बूथों तक न पहुँचने देने के लिये नक्सलियों ने अनेक स्थानों पर सड़क काट दी तो कहीं नावों-डोंगियों को डुबो दिया था। ग्रामीण इस परिस्थिति से भी लडे और देखने में आया कि मुचनार के परिवर्तित मतदान केन्द्रों में उन्होंने अपनी व्यवस्था से छोटी डोंगियों से नदी पार की और मतदान किया। कई गाँवों के मतदाता चौबीस से अठाईस किलोमीटर पैदल चल कर वोट डालने पहुँचे जिसे अदम्य साहस संज्ञापित किया जाना चाहिये। बैलेट की जीत यदि हुई है तो इसी साहस के कारण संभव हुई है जहाँ आम आदिवासी ने यह बताया है कि उसकी आस्था तो अपनी व्यवस्था पर अब भी है और यदि यह तथ्य हमारे लोकतंत्र की बुनियादी समझ बन सके तो बस्तर ही बदल जाये।   

इन्ही परिस्थितियों के दृष्टिगत आखिरी समयों में अनेक मतदान केन्द्रों के बदले जाने को ले कर चुनाव आयोग की तीखी आलोचना भी देखी गयी। सुरक्षा कारणों से इसे सही भी माना जाये तो भी यदि आवश्यकता से अधिक दूर मतदान केंन्द्र होंगे, गाँवों से असहज दूरी और दुर्गम रास्तों से हो कर उन्हें वोट डालने के लिये बाध्य होना पडेगा तो निश्चित है कि औसत मतदान में गिरावट देखी जायेगी। नदी के उसपार के मतदाताओं को इसपार आने के लिये अपनी व्यवस्था से अगर नावों और अन्य संसाधनों का सहारा लेना पडा तो इन बदले गये बूथों पर मतदान होने का श्रेय ग्रामीणों के साहस को ही जाता है तथा इसके बदले जाने के विपक्ष में खडे तर्क मान्य प्रतीत होते हैं। इस सभी बातों को देखते हुए यदि छत्तीसगढ राज्य में पिछले दो चुनावों के साथ वर्तमान मतदान के प्रतिशत की एक विवेचना की जाये तो क्षेत्रवार जो चित्र उभरता है वह गहरा विमर्श मांगता है। 

इस बार हुए रिकॉर्ड मतदान के कारण यह माना जा रहा है कि चुनावों के नतीजे विविध होंगे जिसके कारण अटकलों का बाजार गर्म है। जगदलपुर, कांकेर, कोण्डागाँव, केशकाल चित्रकोट, नारायणपुर तथा दंतेवाडा में जहाँ पिछले चुनावों के मुकाबले बढत देखी गयी किंतु 2003 के आंकडों को भी सामने रखा जाये तो इन सभी सीटों में उतार चढाव भरा मतदान होने की परम्परा रही है साथ ही साथ भानुप्रतापपुर तथा नारायणपुर जैसी सीटों में यथास्थितिवाद दृष्टिगोचर हो रहा है। नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर में दंतेवाडा के आंकडे चौंकाने वाले हैं यहाँ 67% मतदान का होना कई तथ्य को विवेच्य बनाता है। महेन्द्र कर्मा के निधन को एक कारण मान कर यदि हालिया घटनाओं के देखा जाये तो नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार की अपील के पश्चात दंतेवाडा के कमलनार में पंद्रह गावों के प्रतिनिधियों ने बैठक की और वोट डालने का निश्चय किया। इसके पश्चात हुआ भारी मात्रा में मतदान होना वस्तुत: क्या सिद्ध करता है इसके लिये तो चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करनी ही होगी। तथापि कोण्टा और बीजापुर में मतदान का प्रतिशत गिरा है। कोण्टा में 2008 के मुकाबले 12% के लगभग मत प्रतिशत में कमी आना तथा 2003 के स्तर से भी इसका नीचे चला जाना क्या यह इशारा करता है कि यहाँ नक्सली धमकी का खासा असर देखा गया है। बीजापुर सीट में भी रिकॉर्ड गिरावट के साथ केवल 24% मतदान हुआ जबकि यह 2008 में 37% एवं 2003 में 29% रहा है। अंतागढ में भी गिरावट दर्ज की गयी है किंतु 58% मतदान होना संतोषप्रद ही कहा जायेगा।   

 यह इस दिशा की ओर भी इशारा करता है कि दक्षिण बस्तर से केवल वे वोटर ही बाहर निकले हैं जो किसी न किसी पार्टी का निर्धारित वोट बैंक हैं। क्या दक्षिण बस्तर मे कम मतदान का होना कोण्टा और बीजापुर में वाम संभावनाओं को क्षीण करता है यह भी देखना होगा। वाम अतिवाद ने यहाँ वाम दलों की जमीनी लडाईयों को कमजोर ही किया है तथा मनीष कुंजाम जैसे नेता अपनी “फेस वेल्यु” के कारण ही मुख्य पार्टियों को टक्कर दे पाते हैं। 

आंकडे चाहे जो कहते हों किंतु यह कहना होगा कि इस बार सारे चुनावी पंडित मौन हैं तथा यकीनी तौर पर कोई नहीं कह सकता है कि बस्तर की बारह सीटो पर किस राजनीतिक दल का पक्ष बंधा हुआ है। जो भी बातें सामने आ रही हैं वे केवल अनुमान भर हैं। चुनाव आयोग ने बहुत अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निर्वहन किया है और एक भयानक खून-खराबा भरा दिन देखने से हम बच गये हैं। आम मतदाताओं ने चुनाव के महति पर्व को अपने साहस के सफल बनाया है तथा भारी मात्रा में बस्तरियों ने लोकतंत्र के प्रति आस्था जताई है। ये चुनाव लाल-आतंकवाद के सूत्रधारों को बैठ कर सोचने के लिये भी बाध्य करेगा कि क्या बाहरी दहशत के भीतर उनकी जमीन पतली तो नहीं होती जा रही? चुनाव आयोग ने व्यवस्था को भी एक मार्ग दिखाया है कि समुचित इच्छाशक्ति के दम पर नक्सलवाद से निर्णायक लडाई लडी जा सकती है। बस्तर में सम्पन्न हुए इस सुनाव का उपसंहार यही है कि बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है।  

-राजीव रंजन प्रसाद
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Wednesday, July 10, 2013

लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!


[बस्तर की दरभा घाटी की लाल-आतंकवादी घटना पर एक और दृष्टिकोण] 
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 28 मई 2013 की सुबह; सड़क एकदम सूनसान थी। बचेली से बारसूर की तरफ बढ़ते हुए बार बार ध्यान सड़क के दोनो ओर गिराये गये पेड़ों की तरफ जा रहा था। 25 मई को बस्तर की दरभा घाटी में हुई लाल-आतंकवादी घटना समय ही सुकमा से बचेली और गीदम पहुचने वाले दोनो ओर के मार्गों पर बड़े बड़े पेड़ काट कर गिराये गये थे। सरसरी निगाह से देखने पर ही यह समझा जा सकता है कि दरभा घाटी में हुआ मौत का भयानक ताण्डव अगर वहाँ नहीं होता तो भी टलता नहीं। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा के जाने के प्रत्येक मार्ग अवरुद्ध किये गये थे और पेडों को महेन्द्र कर्मा के गृहनगर ‘फरसपाल पहुँच मार्ग’ से कहीं आगे तक काट काट कर गिराया गया था जिससे कि वारदात के समय गाडियों के चक्के जाम रहें। जैसे ही हम कुछ और आगे बढे एक पेड पर चिपाकाया गया पोस्टर नज़र आया। पोस्टर में महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या के बाद अब सलवा जुडुम के नेताओं को जान से मारने की धमकी दी गयी थी साथ ही ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिये मुर्दाबाद था। ऑपरेशन लाल हंट वालों को हर तरफ से अपने ही हंट की चिंता है यह बात इस पोस्टर की विवेचना से स्पष्ट है। सलवा जुडुम भले ही अब समाप्त हो गया हो लेकिन उसके नेताओं से बदला लिया जाना है जिससे कि आदिवासी कभी भी माओवादियों के खिलाफ सिर न उठा सकें और दूसरी बात कि उनके खिलाफ चलाया जा रहा तथाकथित अभियान बंद हो जिससे कि वे निष्कंटक अपना आधार इलाका बढा सकें और समूचे बस्तर को सुरसा मुख में निमग्न कर उसका लाल-सलाम कर दें। हमारे यहाँ दिल्ली से नौटंकीबाज समाजसेवियों की खूब सुनी जाती है तो चलिये उनकी ही जनपक्षधरता के नारों का ग्राउंड जीरो में खोखलापन देखें। दंतेवाड़ा को बचेली से जोड़ने वाला शंखिनी नदी पर अवस्थित एक पुल दोनो ओर से चार स्थानों से लगभग काट दिया गया था जिससे कि आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाये। वाम डिक्शनरी से अर्थ निकाल कर इस बात को सामान्य करार देते हैं चूंकि सड़क तो केवल पूंजीपति और मध्यमवर्तीय लोगों की थाती है आम आदिवासी तो सड़क का उपयोग ही नहीं करता होगा? हो सकता है दिल्ली से एसा ही दिखता हो तो परे कीजिये इस बात को और यहाँ से कुछ सौ मीटर और आगे बढते हैं जहाँ माओवादियों के घटना के एन दिन एक वनोपज जांच नाका गिरा दिया था। दिल्ली सही चीखती है कि वन अधिकारी शोषक हैं इस लिये माओवादियों ने न्याय किया होगा। लेकिन सड़क के दूसरी ओर जहाँ बरसात-धूप से बचने के लिये यात्री शेड बना हुआ था उसे क्यों ध्वस्त किया गया? कोई नवीन जिन्दल उसके नीचे नहीं रुकता, कोई मध्यमवर्गीय व्यापारी, सेठ या किसी शरीर में आत्मा घुसा कर कोई जमींदार भी पुनर्जीवित हो यहाँ नहीं ठहरता। यह तो बस्तर की दो अलग अलग घाटियों को जोडने वाला स्थान था और यहाँ आगे जाने वाले यात्री वाहन की प्रतीक्षा करने के लिये आदिवासी ही विपरीत मौसमों में ठहरते थे। इस क्षेत्र में जो भी इमारते थी, संकेत चिन्ह थे, तथा होल्डिंग्स लगे थे सभी को जैसे चूर चूर कर दिया गया है। किसी बात की खीझ निकाली जा रही हो या गुस्सा प्रदर्शित किया जा रहा हो संभवत: एसा ही कुछ वहाँ देखा जा सकता था। 

 इस दृश्य पर ठहर कर दरभा घाटी की घटना की विवेचना करते हैं। कुछ दिनों पहले एक खबर नारायणपुर से आयी थी जिसमे बताया गया था कि माओवादियों ने ग्रामीणों पर पेड काटने के लिये जुर्माना लगाया है। यह बात कही गयी थी कि इस तरह जंगल बचेंगे। वस्तुत: हम एक घटना का दूसरी घटना से तार कभी जोडते ही नहीं। मेरी बात को सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर तीनो ही मार्गों पर जाने वाले लोग आसानी से समझ सकते हैं। सड़क को अवरोधित करने के लिये माओवादियों द्वारा पेड़ काट कर गिराया जाना एक आम घटना है। उल्लेखित सड़कों के किनारे किनारे आपको सैंकडो काटे गये पेडों के ढूंठ नज़र आ सकते हैं। मुझे आशंका है कि मार्ग अवरुद्ध करने के लिये पेड़ काटा जाना कोई क्रांतिकारी गतिविधि नहीं अपितु आदिवासियों के संसाधनों की लूट का एक नये तरह का जरिया है। दरभा घाटी की घटना के दिन अकेले ही सौ से अधिक बडे बडे पेड काट कर मार्ग में बिछा दिये गये थे। मुझे अधिकतम पेड सागवान के लग रहे थे। अंचल के एक वरिष्ठ पत्रकार से जब मैने इसकी तस्दीक की तो ज्ञात हुआ कि चुन चुन कर सागवान के ही पेडों को काटा गया था। इतना ही नहीं दूसरे दिन किसी चमत्कार की तरह काटे गये पेडों के मुख्य हिस्से सड़क से गायब भी हो गये। मुझे किसी की आई क्यू पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना है आप चाहें तो इस सच्चाई के पीछे के खेल को नजरंदाज कर जनपक्षधरता की तकरीरे जारी रख सकते हैं। 

‘पर्यावरण और माओवादी’ बडा ही मजेदार विषय है जिसे बस्तर में होने वाली “मौतों पर जाम टकराने वाले एक विश्वविद्यालय” के विशेषज्ञों द्वारा बार बार दुहाई की तरह उठाया जाता है। मैने कई बार आदिवासियों से इस बात को जानने की कोशिश की है और अपुष्ट सूत्रों से यह बता सकता हूँ कि बस्तर के कई दुर्लभ पक्षी बाशिंदे निरंतर भूने खाये जा रहे हैं। आपको आदिवासियों के शिकार पर आपत्ति है और भीतर कई निरीह प्राणी इस महान सो-काल्ड साईंटिफिक सोच वाली लाल-सेना के कैम्प फायर की शोभा होते हैं। एक कश्मीरी पंडित लेखक ने फौरी बस्तर भ्रमण (माओवादियों से मिल कर उनसे सोने-जागने-धोने-नहाने पर किताबें लिखने वाला परिभ्रमण) के बाद लिखा कि किस तरह माओवादी कैम्प के बाहर एक सांप दिखा और उसे तुरंत मार दिया गया। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि बस्तर की कई महत्वपूर्ण खदाने जो कि कोरंडम, टिन जैसे बहुमूल्य संसाधनों की है उनपर अब लाल-आतंकवादियों का कब्जा है और मैं उन पर स्मग्लिंग का आरोप लगाउं- तौबा तौबा, आप तो यूं कहिये कि आदिवासियों के लाल-हंट के लिये बस्तर के ये संसाधन अब साधन जुटाने का काम कर रहे हैं। ये सभी वे कहानियाँ हैं जिन पर आपको कोई युनिवर्सिटी बात करती नजर नहीं आयेगी, कोई लेखक अपनी किताब में छाप कर चर्चा नहीं करेगा, कोई जनपक्षधर लाल-सलामी लेखक इन तथ्यों पर निगाह भी नहीं डालेगा। बस्तर मरता है तो मरे इससे किसको सरोकार? 

सच्चाई तो यही है कि जब 75 जवान मरे थे तब भी दिल्ली में खिलखिलाहट थी और जब 31 जनप्रतिनिधि मारे गये तब भी दिल्ली के कई बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इसे तरह तरह से जस्टीफाई करने में लगे हैं। एक कविता कहती है कि जब नाजी कम्युनिष्टों के पीछे आये तब कोई नहीं बोला; तो बाद में सारे कम्युनिष्ट ही बंदूखें पकड कर बस्तर के जंगलों में नाजी बन गये; और खबरदार अब कोई मत बोलना? लाल-आतंकवादियों को साम्राज्यवादी कहने के पीछे मेरा तर्क वृथा भी नहीं है। यह बात तो सर्व-विदित है कि दरभा घाटी की घटना के पीछे आन्ध्र-ओडिशा-महाराष्ट्र-झारखण्ड के आतंकवादियों का हाथ था। एयरपोर्ट में मिलने वाला मंहगा पानी गटकने वाले आतंकवादी बस्तर को कैसा रखना चाहते हैं यदि इस बात को कोई प्रमाण के साथ समझना चाहता है तो आपको केवल इतना करना है कि सुकमा-कोण्टा मार्ग से हैदराबाद जाने वाली बस में बैठ जाईये। जबतक बस्तर है तब तक आपकी बस हिचकोले खाती हुई जायेगी। माओवादियों ने इस सड़क को इतनी जगह से काटा है कि अब गिनती करना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे ही कोण्टा की सीमा समाप्त होती है और आन्ध्र लगता है तो चमत्कार नजर आता है। भाई यह भी तो माओवादी इलाका ही है लेकिन यहाँ की सड़क इतनी बढिया और फोर लेन? मैं जानता हूँ कि मेरी बात को कोई नहीं बूझ सकता - “लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!”

Wednesday, July 03, 2013

यहाँ कहाँ आ गये पागल [आकाश नगर से लौट कर]


जब मैं स्कूल में था उन दिनो बचेली नगर के लिये आकाशनगर एसा ही था जैसे कि देहरादून के लिये मसूरी। मैदानी नगर से लग कर अचानक उँचाई लेती हुई दो समानांतर पहाडियाँ जिनके बीचोबीच विभाजनकारी रेखा की तरह बहता है गली नाला। यह बैलाडिला पर्वत श्रंखला है जो स्वयं में समाहित विश्व के सर्वश्रेष्ठ स्तर के लौह अयस्क के लिये जानी जाती है। यही वह पर्वत श्रंखला है जिसके लिये एक समय में जमशेद जी टाटा ने रुचि दिखाई थी तथा सर्वप्रथम उनके भूवैज्ञानिक पी एन बोस ने प्राथमिक सर्वे पूरा किया था। जैसे ही इस लौह-अयस्क की जानकारी तत्कालीन अग्रेजी शासकों को मिली तुरंत ही भूवैज्ञानिक क्रूकशैंक के नेतृत्व में इस क्षेत्र का भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने विस्तृत सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के अनुसार लौह के चौदह भण्डारों को चिन्हित किया गया। बस्तर अचानक एक अत्यंत गरीब से बेहद अमीर रियासत हो गयी तथा यहाँ के शासकों पर दबाव बनाया जाने लगा कि बैलाडिला पर्वत श्रंखलाओं वाले क्षेत्र को हैदराबाद के निजाम को सौंप दिया जाये। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनथिनगो ने तब बस्तर की शासिका रही महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी से इस सम्बन्ध में मुलाकात भी की थी। कहते हैं महारानी अपने पति प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव से प्रभावित थी जो कि राष्ट्रीयता की भावना से भरे हुए थे, उनकी ही सलाह पर महारानी ने बैलाडिला पर अपनी असहमति जाहिर कर दी थी। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी की मौत स्वाभाविक नहीं थी अपितु उनकी हत्या अंग्रेजों के द्वारा बैलाड़िला को हथियाने की दृष्टि से की गयी थी। बाद में यही दबाव प्रवीर पर भी बनाया जाने लगा और स्वतंत्रता प्राप्ति के एन पहले प्रवीर को सभी राज्याधिकार केवल इसी लिये प्रदान किये गये थे जिससे कि वे निजाम के हाथों इन खदानो वाले क्षेत्रों को सौंप सकें। यह प्रवीर की समझ थी कि उन्होंने एसा नहीं किया यद्यपि खदानों के कुछ हिस्सों को वे सशर्त लीज पर निजाम को देने के लिये तैयार हो गये थे। यह सारी रस्साकशी केवल इसलिये हो रही थी चूंकि हैदराबाद का निजाम स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संघ में नहीं रहना चाहता था और एक स्वतंत्र देश की संकल्पना कर रहा था। बैलाडिला की इन खदानों पर भारत सरकार द्वारा वर्ष 1968 से कार्यारंभ किया गया। वैसे इतिहास मे रुचि रखने वालों के लिये यह जानकारी महत्व की हो सकती है कि यहाँ से लौह उत्खनन पहली बार नहीं किया गया अपितु 1065 ई में चोलवंश के राजा कुलुतुन्द ने यहाँ लोहे को गला कर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना लगाया था। यहाँ बने हथियारों को तंजाउर भेजा जाता था।

बस्तर क्षेत्र में आज यही एक मात्र ऑरगेनाईज्ड माईनिंग है इसके अलावा किसी भी खदान में कोई काम नहीं हो रहा। असंगठित खदानों के रूप में ग्रेनाईट और लाईमस्टोन क्रशिंग और माईनिंग कई स्थानों पर सक्रिय है। संभावित खदानों में रावघाट परियोजना हो सकती है जिसका भविष्य अधर में ही लटका हुआ है। केरल राज्य से भी बडे इस संभाग में इससे अधिक कोई माईनिग कहीं भी नहीं हो रही है यद्यपि यहाँ खनिजों के अपार भण्डार उपस्थित हैं। तोकापाल के पास ही एक बडे किम्बरलाईट पाईप को खोजा गया था जहाँ से हीरे उत्खनित करने की अभी कोई योजना नहीं है। हालाकि सारी बहसें जो दिल्ली में बैठ कर बस्तर के नाम पर हो रही हैं वे खदानों को ही केन्द्र में रख कर हो रही हैं। कभी कभी मैं दिल्ली के अखबार पढ कर हँसता हूँ कि क्या समाचार बिना जमीनी जानकारी के लिखे अथवा तैयार किये जाते हैं? बैलाडिला खदानो के अपने फायदे और नुकसान हैं साथ ही अन्य खदाने अगर अस्तित्व में आयीं निश्चित ही उनके अपने फायदे-नुकसान सन्निहित होंगे। तथापि दक्षिण बस्तर में एसा कोई परियोजना मेरी जानकारी में नहीं है जिसके हाल में अस्तित्व में आने की संभावना भी दूर दूर तक है। रावघाट पहाडियों से भी उत्खनन इतनी आसानी से संभव हो सकेगा मुझे नहीं लगता। 

आज इस लेख में मेरा उद्देश्य बस्तर के खनिजों को ले कर कोई बहस खडी करने का नहीं है। इस पर तथ्यों के साथ विस्तृत परिचर्चा फिर कभी। आज बात उजडे आकाश नगर की। यह पूरा नगर अब बचेली ला कर बसा दिया गया है। कभी घुमावदार सड़कों से हो कर आकाश नगर पहुँचने का आनंद और उसकी नैसर्गिकता ही अब समाप्त नहीं हो गयी अपितु लाल-आतंक के साये में यह पूरा इलाका गहरी गहरी सांस लेता प्रतीत होता है। आकाश नगर में मुट्ठी भर सिपाही सुरक्षा के नाम पर तैनात हैं लेकिन उन्हें सारा जोर स्वयं को ही सुरक्षित रखने पर लगाना होता है। वह आकाश नगर जो मानसून आते ही बादलों के स्पर्श से मुस्कुराता था आज खामोशी और दहशत यहाँ की पीड़ा है। जिन रास्तों से हो कर कभी हम एतिहासिक राजा बंगला जाते थे वहाँ कदम रखने की भी अघोषित मनाही है, किस कदम पर क्या हो जाये कहा नहीं जा सकता। ऊँचाई पर खडा हो कर मैं देख रहा था एक ओर घना जंगल जिसके भीतर भीतर आ घुसा नक्सलगढ। दूर दूर तक दिखने वाला एक व्यक्ति भी नहीं। कहीं कोई जिन्दादिली नहीं। हवा भी सहम कर कहती है कि यहाँ कहाँ आ गये पागल!! जल्दी निकलो यहाँ से।   
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Thursday, January 24, 2013

सलवा जुडुम को दुष्प्रचार ने मारा है – महेन्द्र कर्मा [साक्षात्कार]




बस्तर में माओवादी हिंसा और सलवाजुडुम दोनो के ही अपने पक्ष-विपक्ष हैं। माओवादी हिंसा तो अभी जारी है लेकिन सलवाजुडुम अभियान की अब कमर टूट चुकी है। बस्तर की राजनीति में महेन्द्र कर्मा एक जाना पहचाना नाम हैं तथा भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के कार्यकर्ता से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने के बाद इन दिनो वे कांग्रेस के बडे आदिवासी नेताओं में गिने जाते हैं। उनका एक परिचय यह भी है कि सलवा जुडुम अभियान का उन्होंने अग्रिम पंक्ति में खड़े हो कर नेतृत्व किया था। महेन्द्र कर्मा प्रखर वक्ता भी हैं तथा बस्तर पर अपने विचार वे दृढता और आत्मविश्वास के साथ रखते हैं। बस्तर पर किये जा रहे अपने अध्ययन के दौरान महेन्द्र कर्मा से मेरी मुलाकात दंतेवाड़ा में हुई थी। मैने उनका साक्षात्कार रिकॉर्ड किया था जिसमें बिना अपना मत-मंतव्य जोडे शब्दश: प्रस्तुत कर रहा हूँ -  


राजीव रंजन: कर्मा जी, महाराजा प्रवीर का समय और आज का बस्तर; दोनों समयों मे आप कैसा परिवर्तन महसूस करते है?

महेन्द्र कर्मा: देखिए प्रवीर का पूरा समय राजतंत्र और लोकतंत्र के बीच फसा हुआ समय था। प्रवीर राजतंत्र की अन्तिम कड़ी होने के साथ-साथ बहुत अच्छे विधायक थे। उन्होंन राजतंत्र के मानकों को उभारा जिसके परिणाम में 1966 का गोलीकाण्ड हुआ। प्रवीर बस्तरवासियों के बीच में बहुत ही लोकप्रिय थे तथा अपने समय के डेमोक्रेटिक सेटअप में एक अच्छे लीडर हो सकते थे। उन्होंने लीडर बनने की बजाय एक राजा होने की भूमिका ज्यादा निभाई।.....मैं समझता हूँ कि बस्तर ही नहीं पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर, परिवर्तन और विकास की आहट बहुत कम सुनाई दी है। जो भी डेवलेप्टमेन्ट; जो भी चेंजेज़ आए हैं वे बहुत ही स्लो हैं, धीमी प्रोसेज में आये हैं। बस्तर की जहाँ तक बात है, अचानक 1967 - 68 के उपरान्त जैसे ही यहाँ बैलाडिला प्रोजेक्ट आया तो वह यहाँ के शान्त माहौल में हलचल की तरह आया या कहिये एक शान्त झील में कोई बड़ा सा पत्थर फेंकने के बाद उठी लहरों का अहसास यहां के लोगों ने किया है। बैलाडिला के लिए भी यहाँ के लोग तैयार नहीं थें। अगर सरकार थोड़ा भी यहाँ के लोगों को इस बड़े और प्रभावित करने वाले अध्याय से जोड़ती, यहाँ के लोगों को इससे सीधे जोड पाती, यहाँ के शिक्षित लोगों के लिये यह एक अवसर की तरह आता तो मैं समझता हूँ कि इसका स्वागत भी होता और इसके दूरगामी परिणाम कुछ और बेहतर हो सकते थे, जो नही हुआ।

राजीव रंजन:  बैलाडिला तो आ गया लेकिन उस बीच में बस्तर में बोधघाट परियोजना बन्द हो गई या नगरनार प्रोजेक्ट बन्द हो गया। जिन्हें हम विकास परियोजनाएं कहते हैं वे बस्तर अंचल से एक-एक करके खत्म होती चली गई....?

महेन्द्र कर्मा: बस्तर में इस सम्बन्ध में दो प्रकार की विचारधारा हैं। एक विचारधारा वो, जो ऑर्थोडॉक्स है; वो लोग यहां के समाज, संस्कृति, धर्म जैसे बातों का भय दिखा कर बस्तर के विकास को रोक रहे हैं। दूसरी विचारधारा है जो यहाँ के संसाधनों पर आधारित हैं, यहाँ के लोगों के लिये विकास की पहल कर रही हैं। इसमें हम लोग भी हैं।....बस्तर में काम पैदा होना चाहिये, जितना सही तरह से संभव हो उद्योग धंधे भी लगने चाहिए, इस बात के हम लोग शुरू से सर्मथक रहे हैं। हमारा कहना है कि यहाँ के संसाधन सिर्फ ग्लोबल नहीं होने चाहिए, उन पर कहीं न कही इस जमीन का पहले हक है। पर वेल्यूऐटेड डेवलपमेंट होना चाहिए। वेल्युएडिशन की स्थिति में यहा एम्प्लॉयमेंट बढ जायेगा। आज जो बस्तर का आदमी है वह भी बदल गया है। उसके लिये अब बिलकुल एक नया युग हैं। उसकी सोच ही अलग हैं। वह बदलती दुनिया के साथ अपने आप को एडजेस्ट करना चाहता हैं। अभी इस तरह की तमाम चीजों पर बाते एक ब्लास्टिंग मोड में हैं....नए अवसर खुल सकते हैं। हम जो उनको नही दे पा रहे, इसका कोई तुक नहीं है। मेरा मानना है कि डिसाईजिव स्थिति में रहने के बाद भी, साधन सम्पन्नता के बाद भी हम यहाँ के लोगों के लिये विकास से सही अवसर खोल पाने में अब तक असफल ही रहे हैं।

राजीव रंजन: कर्मा जी, अपने बहुत खुलकर एक बात की है। इसी से जुड़ा हुआ एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि जिन दिनों ब्रह्मदेव शर्मा बस्तर में रहें, दो महत्वपूर्ण काम हुए। पहला तो प्रशासक के तौर पर उनके प्रयासों द्वारा अबूझमाड़ क्षेत्र को आम दुनिया से काट दिया गया और उसे एक आईसोलेटेड क्षेत्र बना दिया गया। दूसरा एक एक्टिविस्ट के तौर पर उन्होंने मावलीभाटा के पास बनने वाले स्टील प्लांट का विरोध किया; हालाकि बाद में उसका विरोध भी ब्रम्हदेव शर्मा को झेलना पड़ा था, दूसरे तरीके से। इन उदाहरणों से जुडा मेरा प्रश्न है कि क्या आप भी आदिवासी आईसोलेशन की प्रक्रिया को सही मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: दुनिया में जो भी विकास हुआ हैं, कुछ एक उदाहरणों को छोड दें तो आजादी के पहले से अब तक का जो पूरा हिन्दुस्तानी इतिहास हैं, वो सब संपर्कों पर आधारित इतिहास रहा  हैं।...कितने सारे आक्रमणों का दौर आया, मुगलो का युग आया और फिर अंग्रेज....अंग्रेज हमे कोई एज्युकेट करने नहीं आए थे। वो लोग तो भारत में अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए आये थे। वह तो जो भी लोग उनके सम्पर्को में आये, उन लोगों ने सम्पर्को का फायदा उठाया। संपर्क तो एक कैरियर है, एक वाहक है। दूसरी बात जिसका उदाहरण आपने स्वयं दिया- ब्रम्हदेव शर्मा; जो कि एक ऑर्थोडॉक्स आईडियोलॉजी का प्रतीक है। ये तमाम बस्तर की परियोजनाओं के विरोध करने वाले लोग कहीं न कही इसी आईडियोलॉजी के फॉलोअर लोग हैं। आदिवासी आईसोलेशन सही नहीं है।

राजीव रंजन: कर्मा जी, क्या आदिवासी आईसोलेशन की प्रक्रिया भी बस्तर में नक्सलिज्म का एक कारण हो सकता है? 

महेन्द्र कर्मा: जी हाँ बिलकुल। आजादी के बाद, जैसे मैंने कहा कि यहाँ संपर्कों का अभाव बना दिया गया जिससे इस आदिवासी क्षेत्र में समस्यायें पैदा हुई। हमारा डेवलपमेंट कॉंसेप्ट बहुत ज्यादा त्रुटिपूर्ण है। हम शहरों से गाँवो की ओर धीरे-धीरे चले; हमको गांवों से शहरों की और चलना चाहिए। यह जो नक्सलवाद जिसे आप कह रहे हैं इसी का खामियाजा है। नक्सलवादियों नें भी तो उन्हीं क्षेत्रों को को आईसोलेटेड थे, जहाँ प्रशासन की पहुँच नहीं थी, जहाँ विकास की रोशनी नहीं पहुँचाई गयी; उसी क्षेत्र को अपना आधार इलाका बनाया है। और अब ये सभी क्षेत्र और अधिक आईसोलेट और विचलित हो गये हैं। आईसोलेशन तो सीधे सीधे कूपमण्डूकता हैं, समझ गए आइसोलेशन मतलब?.....अगर आज के दौर में हम किसी भी समाज को या एक समूह विशेष को पृथक रखने का, या आईसोलेट करने का कोई भी काम करते है तो हम एक बार फिर उन्हे अभिशप्त  जिन्दगी जीने को प्रेरित और बाध्य दोनो ही कर रहे हैं।

राजीव रंजन: कर्मा जी इतिहास पलट कर देखा जाये तो हम पाते हैं कि बस्तर के आदिवासी हमेशा से जुझारू रहे है तथा अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम रहे हैंक्या कारण रहा की उनकी लड़ाई लड़ने के लिए बाहर से लोगों को आना पड़ा जिनका दावा हैं कि वे बस्तर के आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं; मेरा इशारा नक्सलियों की तरफ हैं?

महेन्द्र कर्मा: असल में तो नक्सली अपनी आईडियोलॉजी यहाँ के लोगों पर थोप रहे हैं इसके बाद भी वे यही सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं कि ये मूवमेंट उनका नहीं, आदिवासियों का हैं जबकि नक्सलवाद से आदिवासियों का कोई सम्बन्ध नही है, वो इसीलिए नही भी नहीं हैं, क्योंकि  आदिवासियों नें आजतक अपनी समस्याओं का निदान संविधान के दायरे से बाहर जा कर नहीं खोजा। वो संविधान के दायरे मे ही रहकर लोकतांत्रिक तरीके से, शांतिपूर्ण तरीके से, अपनी बात कहता रहा है। इसके साथ ही यह भी कहना चाहिये कि वो गूंगा भी नहीं है। उसकी अभिव्यक्ति के तथा अपनी बात को कहने के तरीके अलग हैं; इस तरह की हिंसा का उसका चहरा या तरीका नहीं है।

राजीव रंजन: इसी बात को आगे बढाते हुए मैं आपसे सलवा जुडुम की भी बात करना चाहूंगा। कर्मा जी मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि सलवा जुडुम का इतिहास क्या है तथा इसके आरंभ होने की क्या परिस्थिति थी?

महेन्द्र कर्मा: आपको याद होगा कि सलवा जुडुम से पहले एक जन जागरण अभियान भी चला था 89 से 91 लगभग दो सालों तक; बिल्कुल वैसे ही, ये भी चला था। घटना यह हुई कि एक गांव में...गाँव का नाम नहीं ले रहा हूँ नहीं तो उस गांव के लोगों को नक्सली मार देंगे। तो एक गाँव में नक्सलियों की बैठक चल रही थी; बिल्कुल रोड़ किनारे यह सब चल रहा था। फोर्स का राशन जा रहा था, ड्राइवर नक्सलियों से मिला हुआ था; अचानक वो रोड छोड़ कर गाँव की ओर मुड़ गया। बिल्कुल बगल मे ही नक्सली लोग मीटिंग कर रहे थे तो फोर्स वाले जो दो जो ऊपर बैठे थे वो भाग के आ गए और राशन को उनके हैण्डओवर कर दिया। नक्सली वो राशन को लूट लाट कर ले गए। दूसरे दिन फोर्स जाकर गांव के कुछ लोगों को उठा कर थाना ले आई। थाने में बैठे लोगों नें विचार किया कि एक गलत आदमी की वजह से गांव के सियाने लोगों को पुलिस क्यों बिठाएगी? तो उन लोगों नें पुलिस से कहा कि एक आदमी की वजह से गाँव के सभी बडे सियाने क्यों परेशान हों। वो लोग गाँव गये और दोषी को पकडकर ले आये और पुलिस के हवाले कर दिया। पकड के तो ले आये लेकिन फिर गाँव वालों में डर भी जगा कि अब अगर हमने लोगों को हमारे साथ नही जोड़ा तो नक्सली आकार हमारे गांव को तो भून देंगेइस प्रकार से वहाँ के नक्सलियों के खिलाफ डर से शुरु हो कर सलवाजुडुम एक प्रतिष्ठा की लड़ाई, स्वाभिमान की लड़ाई, आन-बान की लड़ाई बनता गया। यह घटना तो बस शुरूआत थी। वहाँ के लोगों ने तब दस गाँव के लोंगों कों बुलाया। कहते है, बड़े आन्दोलन की शुरूआत या एक बड़े विद्रोह की शुरूआत छोटे कारणों से होती रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है।....अपने समय के समकालीन लोग किसी ईवेंट को कैसे देखते हैं; किसी घटना को किस तरह लेते हैं; हम लोगों नें इसे वैसे ही देखा हैं। ये मई की घटना थी, 18-19 जून को मैं दिल्ली में था। वहाँ मै पेपर पढ कर इस घटना को देख-समझ रहा था, फिर मुझे लगा, वहाँ तुरंत जाना चाहिए, ऐसी जगह पर जहाँ लोग तो अपने आप आन्दोलन करने के लिये इकट्ठा हो रहे हैं लेकिन उनके लिये लीडरशीप का पता नही हैं। मेरे वहाँ पहुँचते-पहुँचते 26 तारीख लग गई। वहाँ पहुँचने के बाद मैने इसे सिस्टमेटिक ढंग से चलाने की कोशिश की है। सलवा जुडुम के उपर जो हत्या बलात्कार के आरोप जगाये गये हैं वो दुष्प्रचार है; जो भी नक्सलियों के खिलाफ कोई आन्दोलन खडा करने की कोशिश करेगा उसको इसी प्रकार से दबाने का षडयंत्र किया जाता है। सच यह है कि हम लोग न तो अपने ही लोगों को मार सकते हैं न उनका बलात्कार कर सकते हैं।       

राजीव रंजन: सलवा जुडुम को क्या आप एक सशस्त्र आंदोलन के खिलाफ एक दूसरा सशस्त्र  आंदोलन मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नही। ऐसा था ही नहीं। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी समस्या का समाधान मास-मूमेंट होता है और यह हमारा मास-मूमेंट था। वह सशस्त्र था ही नहीं। हम हजारो लोग जब विलेज टू विलेज मूव कर रहे तो हमारी सुरक्षा में एक फोर्स था। फोर्स को अपनी भूमिका निभानी होती है; आज कोई भी जंगल जाएगा कोई जाँच कमीटी भी जाएगी तो उसके लिए भी फार्स लगायी जायेगी; हम तो फिर भी नक्सलियों के खिलाफ में लड़ रहे थे। यह बिल्कुल सशस्त्र मूवमेन्ट नहीं था....बहुत ज्यादा हुआ तो हमने अपने परम्परागत हथियार को जिनमे टंगिया, कुल्हाडी, तीर-धनुष को अपने साथ रखा। सभी जानते हैं कि यह हमारे परम्परागत हथियार हैं; कुछ लोंगों ने इसे ही फोर्स अटैक बताया; जैसे हम सशस्त्र लड़ाई लड़ रहे हैं।

राजीव रंजन: सलवाजुडुम के समाप्त होने में आप किसकी भूमिका मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: नक्सलियों के खिलाफ जब भी कोई बात या मूमेंट या बहस फ्लोर पर होती है तो उसे बहुत योजनाबद्ध तरीके से डिफ्यूज किया जाता है; और एसा करने वाले बहुत अच्छी तरह इसे करने में अब तक सफल रहे है... समझ गए। इन दिनो एक रूझान सा देखने को मिल रहा हैं...एंटी सिस्टम बाते करना आम हो गया हैं। मुझे लगता है इस मामले को हम लोग सही तरह से उठा नहीं पाये; हम अपना सही प्रेजेंटेशन नहीं दे पाये; सही पूछिये तो हमने उसकी जरूरत भी नहीं समझी। जमीन पर तो हम अपना पक्ष रोज रख रहे थे, लेकिन दिल्ली, भोपाल तक हम लोग अपना प्रजेन्टेशन नहीं दे पाये...... हम इस बात की जरूरत नहीं समझ रहे थे। जब हम जंगल में जमीनी लड़ाई लड़ रहे हैं तो हमे क्या जरूरत है कि दिल्ली और भोपाल में जाकर अपना पक्ष रखें। जो हमारी खिलाफत करने वाले लोग है वो प्रेजेंटेशन दिल्ली भोपाल में लगातार देते रहे।....इसी से हम हार गये। बहुत जबरदस्त धक्का लगा हमारे मूमेंट को। इतने बडे पब्लिक मूमेंट में ठहराव आ गया है, आन्दोलन खत्म हो गया है....यही चाह रहे थे नक्सली और वे सफल रहे; हम लोग हार गए।

राजीव रंजन: तो आपको अफसोस है?

महेन्द्र कर्मा: बहुत ज्यादा, और वो अफसोस तब तक रहेगा जब तक नक्सलवादी रहेगें। ये अफसोस बना रहेगा जब तक हमें फिर नई शुरूआत कोई नयी लड़ाई नहीं मिल जाती।

राजीव रंजन: कर्मा जी तो अब प्रश्न उठता है कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है?

महेन्द्र कर्मा: अब तो ऐसा है कि यह बात सिर्फ बस्तर की ही नहीं रह गयी है; अब तो यह पूरे देश की बात है। इसका समाधान पब्लिक के पास हैं; सरकार के पास है; फोर्सेज के पास है और कहीं न कहीं इन सभी को कलेक्टिवली सामने आना ही पडे़गा। एक बड़े सपोर्ट के साथ में; एक बड़े वॉल्यूम के साथ में। आज हम लोग कहां हैं?...और वो लोग कितना जबरदस्त दबाव बनाते हैं, गाँव के मुखिया से ले कर, एक सरपंच से लेकर परम्परिक जो हमारे रूरल ट्रैडिशनल सिस्टम हैं इन सभी को क्रश कर के रख दिया  है।  न गायता हैं, न पुजारी, न कोतवाल है, न पटेल है,  न सरपंच है। गांव में अब कोई भी नहीं है। जो भी है वो उनका आदमी है; वो हमारे ट्रेडिशन सेटअप को रिलीजियस सिस्टम को टारगेट करता हैं....देखिये कि जो ट्राइबल है वह नेचर के साथ रहने वाला आदमी है; प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा है और उसका अपना एक डैली रूटीन भी है। वो अपने कस्टम-सिस्टम के साथ जीने वाला आदमी हैं। लेकिन नक्सलवादी ये चाहता है कि ट्राइबल उसका अपना जो कुछ है उसको छोड दे; अपने जीने का तरीका बदल दे; कस्टम-सिस्टम छोड दे। उसी बात को वह अब कहीं बोल नही सकता, कहीं सही तरह से अभिव्यक्त नही कर पाता। इसी लिये उसके अन्दर एक गुस्सा है; इसी बात से वह लड़नें के लिए ललायित है; यही एक फैक्टर है जो उसको टैम्पर कर रहा हैं.......... वो अपनी बेसिक पहचान खो रहा हैं। समाधान इस लिये नहीं हो रहा है कि बडी पॉलिटिकल विल चाहिये। जब तक किसी सरकार में  कुर्बानी देने के माद्दा नहीं आयेगा तब तक....। हमने पंजाब में देखा है, हमने नार्थईस्ट में देखा है कि सरकारों को आतंकवाद नें निगला है। अगर एसा ही रहा तो मुझे लगता है बहुत जल्दी इस देश मे वभी नेपाल की स्थिति बन सकती हैं क्योंकि इस आतंकवाद को कोई रोक ही नही रहा हैं।

राजीव रंजन: आदिवासी नेता छत्तीसगढ़ की राजनीती में कहाँ है?

महेन्द्र कर्मा: अब करवट ले रहा हैंआदिवासी नेतृत्व आगे आ रहा है। उसे अब आप रोक भी नहीं सकते। इतने बर्निंग प्वाईंट पर आदमी यहाँ पर स्ट्रगल कर रहा है, ऐसे आदमी की आवाज को ज्यादा रोका नहीं जा सकता है।

राजीव रंजन:  आपसे बहुत सी बाते हुईं; बहुत-बहुत धन्यवाद आपका!!!

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