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Friday, February 19, 2010

नक्सलवादी, आतंकवादी और भगत सिंह

कुहु बिटिया अब हाथी-घोडे की कहानियों से आगे आ गयी है, क्यों न हो वह अब कक्षा दूसरी में जो जाने वाली है। आज मैंने भगत सिंह से उसका परिचय कराया।

“बेटा भगत सिंह नें संसद के भीतर बम और आजादी के पर्चे फेंके” मैं कहानी सुना रहा था।

”लेकिन पापा बम क्यों फेंका इससे तो कितने लोग मर गये होंगे न?” कुहू नें बहुत मासूम सवाल किया।

”नहीं बेटा वो क्रांतिकारी थे, उनका मक्सद किसी को मारना नहीं था। बस जैसे पटाखे जोर से आवाज करते हैं न वैसी ही आवाज वो संसद के भीतर पैदा कर के अपनी माँगों की तरफ कानून बनाने वाले लोगों का ध्यान खींचना चाहते थे”।

“फिर क्या हुआ पापा”

”बेटा अंग्रेजों को उनका यह कदम इतना गुस्से से भर गया कि उन्होंने भगत सिंह को फाँसी पर लट्का दिया?”

“पर पापा फिर बम फेंक कर आवाज करने से तो कोई फायदा नहीं हुआ?”

”बेटा यह आवाज बहुत असर करने वाली थी, इससे पूरे देश में जोश और क्रांति की लहर दौड गयी। इतना विरोध बढ गया कि अंग्रेजों को भारत छोड कर जाना पडा, इस तरह अपना बलिदान दे कर इस क्रांतिकारी नें असंभव काम कर दिखाया”

”पापा तब तो नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते न” कुहू नें अपना मासूम सवाल मुझसे आँखों में आँखें डाल कर किया। मैं बेहद आश्चर्य से भर उठा चूंकि इस उम्र के मासूम बच्चे से इस तरह के प्रश्न की उम्मीद की नहीं जा सकती थी।

“तुम्हे नक्सलवादी कैसे पता बेटा” मैंने कुहु को गोद में उठा लिया था।

“पापा मैंने टीवी में देखा था वो लोग बम फोडते हैं और क्रांति करते हैं” बिटिया नें बेहद सहजता से उत्तर दिया।

“तो फिर तुम्हे क्यों लगा कि नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते?”

“क्योंकि पापा वो तो कितने सारे लोगों को मार देते हैं”

इस उत्तर से मैं सिहर गया था। पिछले दो दिनों से टीवी पर मिदनापुर के नक्सली हमले में चौबीस मौतें, सहरसा के नक्सली हमले में ग्यारह मौतें ब्रेकिंग न्यूज थी। फिर मैंने महसूस किया कि बच्ची नें क्रांति का बुनियादी अर्थ तो जान ही लिया है।

“तो फिर नक्सलवादी कौन होते हैं पापा?”

“आतंकवादी” मैंने कहा।

Tuesday, February 16, 2010

बंगाल में हुए नक्सली हमले पर खामोश मीडिया, मानवादिकारवादी और लेखक [श्रद्धांजलि आलेख]

कोई आश्चर्य नहीं कि चौबीस घंटे भी नहीं बीते और पश्चिम बंगाल में नक्सली हमले की खबर मीडिया के सर से सींग की तरह गायब हो गयी। देश और दुनियाँ में बहुत सी खबरे हैं जिसके लिये हमारे देसी जेम्स बॉंड जुटे हुए है और बहुत सक्रिय हैं। कोई महानायक को महानालायक सिद्ध करने में तुला है तो कोई मुम्बई हमलों के पीछे की कफन खसोटी को बेनकाब कर देना चाहता है। जाहिर है आतंकवाद के हिन्दुकरण और मुसलमानी करण से टी. आर. पी की रोटी बहुत आसानी से सेकी जा सकती है लेकिन आतंकवाद के तालिबानीकरण यानि कि नक्सलवाद से किसी को कोई वास्ता नहीं। मेरे क्षोभ को शब्द बनने तक चौबीस पुलिस वाले शहीद हो गये थे और जाने कितने लापता, मैं अब जानने लगा हूँ कि इस क्रांति के लम्बरदारों के झंडे लाल क्यों हैं, आखिर लहू उन्हे कितनी सहजता से सुलभ है।

मारे गये पुलिस वाले चार्ल्स डार्विन की इजाद किस प्रजाति के थे पता नहीं चूंकि इस देश का मानवाधिकार उन्हे हासिल ही नहीं। व्यवस्था पर चोट के नाम पर कभी बारूदी सुरंग में चिथडे हो जाते हैं कभी विदेशी हथियारों के आगे बेबस उनकी पुरानी रायफलें उन पर कफन धर देती हैं। मोमबत्तियों उन घरों में भी जलो जहाँ उजाला करने की हिम्मत अब किसी सूरज के बाप में भी नहीं है। क्रांति में सब जायज है तो फिर इन चौबीस-पच्चीस विधवाओं और सौ-पचास अनाथों से क्या वास्ता। एक दिन जब भूत बसेंगे तो इनका समाजवाद होगा।

एसी घटनाओं के बाद माननीय लेखक गण कुछ दिन अपनी दुम किसी बिल में घुसाये रखते हैं फिर फिजा के शांत होते ही उनकी क्रांतिकारी खुजास उजागर होने लगती है। हुजूर आपकी तो सुबह ही सुबह है फिर किस सबेरे को आवाज देते हो? आपकी लाल लॉबी आपकी पीठ खुजाने को दोनों हाँथों से तत्पर है, आपको पुरस्कारों से नवाजा जाना तय है, आपको महान लेखक सिद्ध करने के लिये आपकी किताबों पर अनेक चारणों द्वारा “जगदीश हरे” गाया जाना तय है। यह सच्चाई है और बेहद कडुवी कि इस देश में हिन्दी का लेखक कलम का नही छपास का पुजारी है। कुछ एसे प्रकाशन और कुछ एसी पत्रिकायें (नाम लेने की आवश्यकता मैं नहीं समझता) जो इसी तरह के “गिव एण्ड टेक” पर चलती हैं उनमें जिन्दा रहने ले लिये लाल-घसीटी करनी ही पडती है वर्ना खेमे से बाहर। तो मजाल है कि माननीय नक्सलवादियों से विमुख वे कुछ कह गुजरे....बाप रे बाप, लेखक कहलाये जाने पर लात पड़ जायेगी।

तो इस सारे जहाँ से अच्छा में कुछ माननीय पत्रकार, अनेकों विख्यात मानवाधिकार वादी और महान लेखक जिस आतंकवाद के समर्थक हों वहाँ कुछ पुलिस वालों की मौत पर श्रद्धांजलि भी क्या होगी? मैं मोममत्ती ले कर नहीं खडा हूँ बस पूरी विनम्रता से अपनी श्रद्धा उन पुलिस वालों की शहादत को अर्पित करता हूँ। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे और आपके परिवार को यह दुख सहन करने की शक्ति दे।