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Thursday, December 12, 2013

बस्तर में वामपंथ की अवस्थिति पर एक बहस

बहस तो आवश्यक है किंतु वामपंथी नेता संजय पराते ने इसे व्यक्तिगत बना दिया। तथापि; मैं मूल आलेख जिसपर यह बहस आधारित है; उस आलेख पर संजय पराते का जवाब और फिर संजय पराते को मेरा जवाब एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आलेख पढते हुए साथ में प्रस्तुत किये गये आंकडे तालिका पर भी दृष्टि डाली जा सकती है। पहले पढे मेरा जवाब और फिर इसी श्रंखला में अन्य आलेख भी  - 

विफलताओं को छिपाने का श्रेष्ठ बहाना यही है “संजय पराते” जी 
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वामपंथ की बस्तर में जमीन नहीं यह बात तो चुनावी आंकडे सिद्ध कर रहे हैं लेकिन क्यों नहीं है इस बात के लिये आप आईना ले कर उन कथित नेताओं, विचारकों या प्रवक्ताओं के सामने आईये तो; गालिया दे दे कर आपका थोबडा न सुजा दें तो कहियेगा। क्या यही वामपंथ की जमीनी लडाई है और इसी व्यक्तिगत हमलों-झमलों के दम पर इन्हें सारी दुनियाँ चाहिये? इतनी तल्ख शुरूआत क्यों? यह इसलिये क्योंकि मैं व्यक्तिगत हमलों को सोचने समझने और विचारने के दिशा में बाधा मानता हूँ। व्यक्तिगत हमले करने वाले व्यक्तियों से आप जिन्दा विमर्शों की बात सोच ही नहीं सकते उनसे क्या व्यवस्था और अवस्था पर चर्चा होगी? संजय पराते को मैं नहीं जानता। कमल शुक्ला के माध्यम से ज्ञात हुआ था कि वे वामपंथी नेता हैं और बस्तर के चुनावों पर जो मैने आंकडे प्रस्तुत किये हैं उस पर अपनी बात रखेंगे। बात रखी भी गयी लेकिन जो मतदाता ने आईना दिखाया है उस पर नहीं बल्कि हकीकत को सामने लाने के कारण मुझ पर छीटा-कशी। ओह मेचारे मुक्तिबोध..छोडिये मुद्दों पर आते हैं। 

पहले व्यक्तिगत हमलों का जवाब दूंगा फिर तथ्य की बातें। वामपंथी नेता पराते लिखते हैं कि “अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृष्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं”। आभार पराते जी क्योंकि हम जैसे गिद्ध उस गंदगी को साफ कर रहे हैं जो समाज में घोषित “विचारधारायें” फैला रही हैं यह भी तो सही है न? आप फिर लिखते हैं कि “राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है”। यह आपने मेरे लेख को पढे बिना लिखा है या आप “झूठ” जान बूझ कर लिख रहे हैं। मेरा कहना है कि जमीनी वामपंथ कमजोर पडा है जबकि उसे मुखर और मजबूत होना चाहिये। मैं जमीनी लडाईयों का प्रखर समर्थक हूँ और इसीलिये अपने ही एक लेख में मैने टिप्पणी की थी कि मनीष कुंजाम की हार का मुझे दुख़ हुआ है। पर यह भी सच है कि मनीष कुंजाम केवल अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे थे। बस्तर में सभी जगह वामदल अपना दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। इस स्वीकारोक्ति से बचने के लिये अनावश्यक तेज आवाज क्यों? नेता होने का मतलब तो आप समझते हैं लेकिन क्या लेखक होने के मायने ज्ञात हैं आपको? मजेदार बात यह है कि बस्तर के कला-संस्कृति-समाज आदि आदि विषयों पर मैं लिखता रहा हूँ तो किसी को आपत्ति नहीं लेकिन जब जब राजनीतिक सच्चाईयों पर कलम चलाओं तो कई कलेजे सुलग जाते है। खैर, व्यक्तिगत हमले पर इतना ही अब तथ्य पर बात करते हैं। 

वामपंथ अपनी सतह खोता गया क्योंकि उसने लेखक तो पैदा किये, विचारक भी पैदा किये लेकिन जमीनी कार्यकर्ता कहाँ हैं? जमीनी कार्यकर्ता बस्तर में चुनावी अभियान के समय कहाँ थे? माना कि कॉग्रेस और भाजपा ने अपने धनबल से बडी बडी रैलियाँ की और परिवर्तन तथा विकास यात्रा के नाम पर चुनाव प्रचार किया लेकिन जनबल का दावा तो आपका है। कहाँ थी वे रैलियाँ? वे मुद्दे बाहर क्यों नहीं आये जिनको सामने रख कर जमीनी वामपंथ कहता कि हम ही विकल्प हैं काँग्रेस और भाजपा के? आपके देखते देखते “आम आदमी पार्टी” ने दिल्ली में वह कर दिखाया जिसकी अपेक्षा वामपंथियों से की जाती रही है। पराते जी आप लिखते हैं कि “वामपंथ पूरे देश में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है”। मेरा सवाल है कि अलग मुद्दा क्यों है? वाम की केरल पर हाल में भी चर्चा होनी चाहिये, वाम के बंगाल पराजय पर भी बात होनी चाहिये और तो और नेपाल का गढ ढहने पर भे विमर्श होना चाहिये और बस्तर की हार पर भी चर्चा होनी चाहिये। तिरुपति से पशुपति तक है क्या असलियत; केवल त्रिपुरा ही तो? इसका अर्थ यही है कि वाम राजनीति केवल कुछ एनजीओ और पत्र-पत्रिकाओं से चल रही है; जमीन पर आप हैं ही नहीं; इसलिये दिखते भी नहीं और जब कोई आईना दिखाता है तो फिर आपकी मुखरता के क्या कहने? 

आप लिखते हैं वामपंथी वैकल्पिक ताकत का निर्माण करना चाहते हैं मेरा प्रश्न है कि 1947 से 2013 आ गया और इस बीच मुख्य सत्ताधारी दल के कई विकल्प आ गये किंतु वामपंथी इस पंक्ति में कभी क्यों नहीं थे? मुद्दे की बात हो तो अरविन्द केजरेवाल भी शीला दीक्षित को हरा सकता है तो फिर टटोलिये न कहाँ हैं मुद्दे? या फिर कोई मुद्दे हैं ही नहीं हवा हवाई बहसे ही हैं? और काम हम जैसे अदना लेखकों को गरिया कर ही निकाला जा रहा है? मैने अपने आलेख में बस्तर से बात की थी और वही ले जाता हूँ अविभाजित मध्यप्रदेश से ले कर छत्तीसगढ-2013 तक बस्तर में जितने भी चुनाव हुए अधिकतम 5% से अधिक मत सम्मिलित रूप से बस्तर में कभी प्राप्त नहीं हुए क्यों? वह इस लिये क्योंकि वामपंथी जमीन बनाने की कोशिश ही नहीं करते पाये गये। जमीनी वामपंथ से बडी दुनिया तो बंदूखी-वामपंथ ने खडी कर ली और आप देखते रह गये? कभी आत्ममंथन नहीं हुआ, कभी दुबारा आन्दोलन खडा करने की कोशिश नहीं की गयी यहाँ तक कि मनीष कुंजाम को छोड कर कोई ठीक ठाक नेता भी बस्तर को वामपंथ ने अब तक नहीं दिया है। 

मुझे यह कहने में गुरेज नहीं है कि बस्तर का आदिवासी दो पाटों में पिस रहा है। यह बात मैने अपनी कवितओं-लेखों के माध्यम से कई बार कहीं हैं। किंतु इससे वामदलों की सक्रियता नहीं सिद्ध होती। वामपंथी राजनेता पूरे पाँच वर्ष परिदृश्य से बाहर रहते हैं और फिर चुनावों में उनसे अपेक्षा की जाये तो वही परिणाम होंगे जिसका की आंकडा मैने प्रस्तुत किया है। भाजपा और कांग्रेस को आप दोष इस लिये दे रहे हैं क्योंकि यह सबसे आसान तरीका है अपनी अवस्थिति छिपाने का। वामदल एक राजनैतिक पार्टी की हैसियत रखते हैं तो उसने अपेक्षायें भी उसी तरह की होंगी? या जो आपने कॉग्रेस-भाजपा पर टिप्पणी की है वही वामपंथियों की भी सच्चाई है अर्थात – हमप्याले, हमनिवाले?

आप लिखते हैं कि इस चुनाव में “वामपंथियों के पास वैकल्पिक नीतियाँ थीं, अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी” हो सकता है रही होंगी लेकिन न तो वे आपकी सभाओं से बाहर आयीं न ही आपके मुद्दों ने आन्दोलन का कोई रूप लिया। अगर इतना ही प्रभाव था जिसका कि आप दावा कर रहे हैं तो “नोटा” में पडे वोटों से भी दयनीय हालत आपकी पार्टी की क्यों हुई? जवाब में चाहें तो आप मुझे फिर दो चार गालियाँ दे सकते हैं क्योंकि न तो आत्ममंथन वामपंथियों का स्वभाव रहा है न ही अपने छद्म गुरूर से बाहर यह राजनैतिक दल आसानी से आयेगा। आप फिर लिखते हैं कि “चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है”। इस कथन पर क्या टिप्पणी करूं आप बस्तर के चुनाव परिणाम में वामदलों की हैसियत देखें, जनता को आप बेवकूफ समझते हैं तब तो कोई बात नहीं अन्यथा तो आप 365 दिन छोडिये 1950 के पहले चुनाव से अब तक केवल तीन सीट ही निकाल सके हैं। 

संजय पराते जी, आपकी मुझ पर नाराजगी उचित ही है क्योंकि यही वामपंथी दलों को बस्तर के चुनाव में मिली विफलताओं को छुपाने का श्रेष्ठ और सुलभ बहाना है। शुभकामनायें। 

-राजीव रंजन प्रसाद 

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पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? 
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[यह आलेख मेरे उस आलेख पर वामपंथी नेता श्री संजय पराते का मुझको जवाब है जिसे मैने इसी आलेख के नीचे हू-बहू प्रस्तुत किया है।] 


जब-जब वामपंथ पर हमले होंगे, हमलावरों को मुक्तिबोध के सवाल का जवाब देना ही होगा कि -‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’ अपने आपको पॉलिटिक्स से परे घोषित करना इस दौर की सबसे बड़ी पॉलिटिक्स है- राजीव रंजन प्रसाद भी इससे परे नहीं हैं। उनका राजनैतिक दृश्टिकोंण विचारधारा को बेडि़यां समझता है, वे केवल विचारते हैं, इससे उनकी सोच को पंख मिलते हैं। लेकिन गिद्धों के भी पंख होते हैं। उनकी उड़ान गिद्धों की है- और आम जनता को जो गिद्ध-दृश्टि से देखते हैं, इस उड़ान में वे उन्हीं के सहभागी हैं। ‘विचारधारा विहीन विचार’ आज की सबसे बड़ी विचारधारा है, क्योंकि प्रतिक्रियावादियों को ऐसे ही विचार रास आते हैं, जो मानवीय संवेदना से बहुत-बहुत दूर हो। ऐसे विचार किस विचारधारा की पुष्टि करते हैं, इसे बताने की जरूरत नहीं हैं।

कुछ लोग होते हैं (और ऐसे सनकी-पागल लोग बहुत कम होते हैं) जो पहले अपनी विचारधारा और राजनीति तय करते हैं और बाद में वे इसे स्थापित करने का कठिन कार्य करते हैं। लेकिन ऐसे ’चतुर सयानों’ की कोई कमी नहीं होती, जो ‘स्थापित राजनीति’ के साथ चलने में ही अपनी भलाई देखते हैं। राजीव रंजन प्रसाद ‘स्थापित राजनीति’ के साथ हैं- यही कारण है कि उनका पहला वोट मनीष  कुंजाम को पड़ा होगा, तो अब वे उन्हें नक्सलियों/माओवादियों के साथ जोड़कर देखना पसंद करते हैं- ‘स्थापित राजनीति’ भी यही चाहती है। इस राजनीति में ही भाजपा का भला है और कांग्रेस का भी.....और राजीव रंजन का भी! तो राजीव रंजन से और तमाम मित्रों से मेरा पहला अनुरोध यही है कि संसदीय वामपंथ (भाकपा-माकपा) को नक्सलियों/माओवादियों से अलग करके देखें। ऐसा इसलिए कि संसदीय वामपंथ पूरे देश  में ही नक्सलवाद के निशाने पर रहा है....इसीलिए उत्तर बस्तर में भी रहा है और दक्षिण में भी। कारण स्पष्ट है--यदि संसदीय वामपंथ प्रगति करेगा, तो माओवादी कमजोर होंगे। संसदीय वामपंथ को माओवादी तो बढ़ते हुए देखना ही नहीं चाहते, देश  और प्रदेश  की दोनों प्रमुख पार्टियां-- कांग्रेस और भाजपा-- भी नहीं चाहतीं। आखिर संसदीय वामपंथ ही तो कांग्रेस-भाजपा की नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ तनकर खड़ा है-- और एक वैकल्पिक नीतियों को सामने रखकर। वैष्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की जिन नीतियों पर कांग्रेस-भाजपा के बीच व्यापक सहमति है (चुनावी नूरा-कुष्ती को छोड़ दें तो), उनको तेजी से लागू करने के खिलाफ रोड़ा तो वामपंथ ही है। वही पूरे देश  में अभियान चला रहा है, प्रदर्षन/धरना/हड़तालें आयोजित कर रहा है, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के खेल को कड़ी टक्कर दे रहा है। इस संघर्ष में बस्तर, छत्तीसगढ़ और पूरे देश  में वह कितनी सफल हो पाती है, और उसकी असफलता के क्या कारण हो सकते हैं, यह एक अलग मुद्दा है। निष्चित ही वामपंथ के शुभचिंतकों और ‘स्थापित राजनीति’ के सहचरों का विश्लेषण अलग-अलग ही होगा। 

पूंजीवाद शोषण पर आधारित व्यवस्था है। यह व्यवस्था पहले अस्तित्व में आती है--शोशक वर्ग के लिए इस व्यवस्था को बनाये रखने का औचित्य प्रतिपादित करने वाली विचारधारा का विस्तार बाद में होता है। यह काम आज भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। साम्यवाद उस विचारधारा को प्रतिपादित करती है, जो शोषण पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेती है। यहां विचारधारा पहले स्थापित होती है, व्यवस्था निर्माण का काम बाद में। इस विचारधारा के विस्तार का काम आसान नहीं है, लेकिन वामपंथ ने अपनी विचारधारा और राजनीति तय करली है और इस राजनीति को स्थापित करने के काम में वे अनथक/अविचल लगे हुए हैं। इस काम में कहीं वे जमते हैं, तो कहीं जमी-जमायी जगह से उखड़ते भी हैं। लेकिन वामपंथ के इस जमने-उखड़ने की तुलना कांग्रेस-भाजपा की हार-जीत की तरह नहीं की जा सकती। आखिर पूंजीवादी व्यवस्था का विकल्प षोशणहीन, वर्गहीन समाज व्यवस्था ही हो सकती है-- आखिर ऐसी व्यवस्था में ही समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा के बुनियादी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। और सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ नहीं है, तो फिर वे मानवता के बुनियादी लक्ष्यों के साथ कैसे हो सकते हैं? 

तो वामपंथी ताकतें वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहती हैं, वो इसके लिए वैकल्पिक नीतियां पेष कर रही है, उन ताकतों की प्रगति कौन चाहेगा? सही वामपंथ को कुचलने के लिए कांग्रेस-भाजपा को छद्म वामपंथ से भी हाथ मिलाने में कभी गुरेज नहीं रहा। कौन नहीं जानता कि बस्तर में भाकपा-माकपा के नेता/कार्यकर्ता ही नक्सलियों/माओवादियों के सबसे ज्यादा षिकार हुए हैं। कौन नहीं जानता कि इन माओवादियों के लिए आर्थिक संसाधन इनके नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों, ठेकेदारों की दहलीजों से ही निकलते हैं और कौन नहीं जानता कि चुनाव में लेन-देन करके इन्हीं छद्म वामपंथियों का उपयोग कांग्रेस-भाजपा अपने हित में करती है। तो कांग्रेस-भाजपा वाकई चाहेगी कि माओवाद/नक्सलवाद खत्म हो, इनको कुचलने के नाम से आ रहे आर्थिक संसाधनों में भ्रष्टाचार खत्म हो और ‘स्थापित राजनीति’ के खिलाफ सही वामपंथ को पनपने का मौका मिले? इन दोनों पार्टियों इनकी सरकारों ने नक्सलियों को कुचलने के नाम पर वामपंथी कार्यकर्ताओं को ही अपने दमन का षिकार बनाया है। नक्सलियों/माओवादियों की ‘अघोषित/असंवैधानिक’ सप्ताह को स्थापित करने का काम इन दोनों पार्टियों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से किया है। 

वामपंथी ताकतों ने इस देष में आजादी की लड़ाई लड़ी है। आज भी वे साम्राज्यावदी संघर्षों  और विचारों की वाहक है। अमेरिका के नेतृत्व में साम्राज्यवाद आज भी अपनी लूट-खसोट की नीति को जारी रखना चाहता है और इसके लिए नये-नये उपनिवेष स्थापित करना चाहता है। इसके लिए विष्व-अर्थव्यवस्था पर वह अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। उदारीकरण-निजीकरण-वैष्वीकरण की नीतियां इसी लूट-खसोट और शोषण की मुहिम का ही अंग है। स्पश्ट है कि जो इन नीतियों के साथ है, वह आम जनता का दुष्मन है। उसे अमेरिकी हितों और पूंजीपतियों के स्वार्थों की तो चिंता सताती है, लेकिन आम जनता के दुख-दर्दों से वह न केवल आंखें मूंदे रहता है, बल्कि उसके बुनियादी मानवीय अधिकारों को भी कुचलने में भी उसे कोई हिचक नहीं होती। 

राजीव रंजन जी, आप भी जानते हैं कि मानव विकास सूचकांक के पैमानों पर छत्तीसगढ़ की क्या स्थिति है? चुनावी दावों और प्रतिदावों को छोड़ दिया जाये तो सरकारी हकीकत यही है कि छत्तीसगढ़ देष के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। तो छत्तीसगढ़ के सबसे पिछड़े इलाके बस्तर की स्थिति का अनुमान सहज लगाया जा सकता है। पूरी दुनिया में प्राकृतिक संसाधनों की लूट का सबसे निर्मम शिकार वंचित वर्ग हो रहा है और छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासियों पर ही इन नीतियों की बर्बर मार पड़ रही है। बस्तर देशी -विदेशी  कंपनियों की ‘लूट का चारागाह’ बन गया है। नागरिकों को उनके घरों में सुरक्षा देने की संवैधानिक जिम्मेदारी सरकारों की है, लेकिन बस्तर के आदिवासियों को इससे महरुम कर दिया गया। नक्सलियों/माओवादियों से तो निपटने में इन सरकारों की नानी मरती है, लेकिन राज्य प्रायोजित सलवा जुडूम (ध्यान रहे, सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया है) के नाम पर घरों को जलाने, महिलाओं से बलात्कार करने, उनकी हत्यायें करने और उन्हें गांव से विस्थापित करने और एसपीओ के नाम पर अवयस्क बच्चे के हाथों में बंदूकें थमाने का ‘बहादुरीपूर्ण’ काम ये करते रहे हैं। आदिवासियों को कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचलने में इन्हें जरा भी शर्म महसूस नहीं होती। ऐसा करते हुए ‘राज्य’ नामक संवैधानिक सत्ता को मानवाधिकारों की कभी याद नहीं आयी।

नक्सलियों/माओवादियों का तो मानवाधिकारों से कोई लेना-देना ही नहीं है, लेकिन ‘राज्य के संवैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन का अधिकार’ भाजपा सरकार को किसने दिया? माओवादियों द्वारा राज्य के कानूनों का उल्लंघन किसी भी आपराधिक कार्य की तरह निष्चित ही निंदनीय और दण्डनीय है, लेकिन भाजपा द्वारा संचालित ‘राज्य की संवैधानिक सत्ता’ को किसने ये अधिकार दिया है कि वह सोनी सोरी नामक नक्सली महिला (यदि वह नक्सली है!- और याद रखें, इस महिला पर सरकार के तमाम आरोप फर्जी साबित हो रहे हैं) के गुप्तांगों में पत्थर भर दें (मेडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो चुका है) और ऐसी बहादुरी के लिए संबंधित पुलिस अधिकारी को राश्ट्रपति के ‘वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाये? राजीव रंजन जी, लिंगा कोड़ोपी की पत्रकारिता को आपकी पत्रकारिता की तरह भाजपा सरकार ने सामान्य दृश्टि से न देखकर ‘खतरनाक’ क्यों माना और नक्सली करार दे दिया? हिमांशु कुमार के दंतेवाड़ा के आश्रम को गैर कानूनी रुप से ध्वस्त करने का अधिकार भाजपा सरकार को किस संविधान ने दिया था? असलियत यही है कि आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन नक्सली भी कर रहे हैं और भाजपा सरकार भी। 

लेकिन आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन कोई आज की बात नहीं है। मध्यप्रदेष में कांग्रेस राज में भी यही सब हो रहा था। कांकेर के आमाबेड़ा थाने में मेहतरराम नामक आदिवासी को नक्सली कहकर मार दिया गया। अंतागढ़ थाने में मोहन गोंड नामक आदिवासी को नक्सली वर्दी पहनाकर फोटो खींची गयी और कांकेर थाने में कई दिनों तक उसे बंधक बनाकर रखा गया। केशकाल के पास धनोरा थाने में एक आदिवासी अविवाहित युवती को नक्सली कहकर कई दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया, उसके साथ बलात्कार किया गया और हाथ पैरों में जंजीर बांधकर ‘नक्सलियों को पहचानने’ के लिए बाजार में घुमवाया गया। ये सब इस गरीब बस्तर के गरीब आदिवासियों की ‘सत्यकथायें’ हैं। ये नक्सली थे कि नहीं, यह तय करने काम अदालतों की जगह पुलिस को किसने दिया?-- और यदि ये नक्सली थे भी, तो इनके मानवाधिकारों के हनन का अधिकार पुलिस और राज्य सरकार को किसने दे दिया था? ये सभी मामले माकपा नेता की हैसियत से मैंने स्वयं मानवाधिकार आयोग में दर्ज कराये थे। मानवाधिकार आयोग ने इन मामलों की छानबीन का आदेश  भी दिया था। तत्कालीन एसडीएम संजीव बख्शी की अदालत में तमाम पीडि़तों और संबंधित गवाहों को मयशपथ पत्र मैंने पेश  किया था-- पुलिस द्वारा एनकाउंटर करने की धमकी की परवाह न करते हुए भी। लेकिन पूरा आयोग इसके बाद चुप बैठ गया। इतनी कसरत करवाने के बाद आयोग ने इन मामलों में फैसला देने की जहमत नहीं उठायी। आयोग की आलमारियों के किसी अंधेरे कोने में पड़े ये दस्तावेज आज भी सड़ रहे होंगे। पार्टनर, आपकी पहुंच तो काफी है- थोड़ा इन दस्तावेजों को सामने लाने की उठा-पटक करोगे? थोड़ा पता करोगे कि मानवाधिकार आयोग के अधिकारों का हनन करने में किसकी दिलचस्पी थी? थोड़ा पता करोगे कि बस्तर के तत्कालीन कमिष्नर सुदीप बैनर्जी ने नक्सलवाद से निपटने के लिए जो रिपोर्ट मध्यप्रदेश सरकार को दी थी और जिसे विधानसभा के पटल पर रखा गया था, उस सार्वजनिक रिपोर्ट का क्या हुआ? ‘सूचना का अधिकार’ के तहत मांगने पर सरकार ने उसे गुप्त (?) दस्तावेज बताते हुए मुझे देने से इंकार कर दिया है। इसे हासिल करने में आप मेरी मदद करोगे? 

तो राजीव जी, माकपा-भाकपा पर सरकार और दोनों पार्टियों के हमलों की तुलना भाजपा राज में कांग्रेस पर दमन से न करें। कांग्रेस ने यदि सशक्त विपक्ष की भूमिका निभायी होती, तो आज वह सत्ता से दूर नहीं रहती और यदि उस पर वर्गीय दमन होता, तो वह इतनी सीटें नहीं ले पाती। सत्ता पर कब्जा किसका रहे और मलाई का हिस्सा ज्यादा किसको मिले, इसे तय करने के लिए दमन-दमन का खेल खेला जाता है। मत भूलिये कि जोगीराज में भाजपा भी ऐसे ही कांग्रेसी दमन का शिकार होती थी। लेकिन रात के अंधेरे में हम-प्याले, हम-निवाले। 

वामपंथ की कमजोरी यही है कि अपनी सही वैकल्पिक राजनीति को आम जनता के बीच स्थापित नहीं कर पायी। इस दिषा में उसे एक लंबा रास्ता तय करना है इस विकल्प के अभाव में कांग्रेस-भाजपा के बीच ही धु्रवीकरण बना हुआ है। नीतिगत रुप से दोनों पार्टियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यही कारण है कि दोनों पार्टियों के बीच वोटों का प्रतिषत अंतर सिमटकर 0.77 प्रतिशत  रह गया है। पिछले बार यह पौने दो प्रतिशत से अधिक था। यदि भाजपा की नीतियां छत्तीसगढ़ की गरीब जनता के जीवन को सकारात्मक रुप से प्रभावित करती, तो यह अंतर बढ़ता--लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नोटा के रुप में तीन प्रतिशत  से अधिक-- 4 लाख से ऊपर-- मतदाताओं ने निर्णायक रुप से दोनों ही पार्टियों को ठुकराया है। यदि इनके पास तीसरे विकल्प के रुप में वामपंथी-जनवादी विकल्प होता, तो न भाजपा को सत्ता मिलती, न कांग्रेस को बहुमत।

चुनाव में वामपंथ के पास लाल झंडा था, तो उसने अपना झंडा लहराया-- ठीक वैसे ही जैसे भाजपा ने भगवा और कांग्रेस ने बहुरंगा झंडा लहराया। लेकिन वामपंथ के पास वैकल्पिक नीतियां थीं-- अपने चुनाव प्रचार में वह इन नीतियों को लेकर आम जनता के बीच में गयी। उसने कांग्रेस-भाजपा की कथनी-करनी और लफ्फाजियों को पर्दाफाष भी किया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली, रोजगार गांरटी, वनाधिकार कानून, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, महंगाई, बेरोजगार, भ्रश्टाचार, प्रदेष का पिछड़ापन.........सभी मुद्दों पर वामंपथ ने आम जनता के बीच अपनी बातों को रखने का प्रयास किया। अवश्य ही साधन सीमित थे। चुनाव आयोग द्वारा गठित ‘गणमान्य’ व्यक्तियों की स्क्रीनिंग कमेटी ने आकाश वाणी और दूरदर्षन से प्रसारित होने वाले मेरे पार्टी संबोधन को दिशा -निर्देष और आचार संहिता के नाम पर मनमाने तरीके से कांट-छांट की कोशीश  की। भाजपा सरकार की तरह ही इन बेचारों का जिंदल प्रेम अपने पूरे उफान पर था। माकपा ने उनकी हर कोशीश को नाकाम करते हुए अपनी नीतिगत बातें रखीं प्रदेश  में प्राकृतिक संसाधनों की हो रही लूट के मामलों में माकपा ने हीं जिंदल को निषाने पर रखा-- कांग्रेस-भाजपाईयों की तो घिग्घी बंधी थी! वामपंथ ने अपना पूरा चुनाव प्रचार नीतियों पर केन्द्रित किया। 

लेकिन क्या कांग्रेस-भाजपा ने भी ऐसा ही किया? दोनों के पास केवल लोकलुभावन घोशणाएं हीं थीं। नीतियों पर तो उन्हें बहस से ही परहेज है। कांग्रेस के पास धान का समर्थन मूल्य 2 हजार रुपये क्ंिवटल देने तथा राषन दुकानों से मुफ्त अनाज देने का वादा था (क्या इसके लिए राज्य में कांग्रेस सरकार की जरूरत है?) , तो भाजपा के अपनी तथाकथित उपलब्धियों की भरमार। लेकिन वादों और उपलब्धियों के बावजूद सच्चाई क्या है? कांग्रेस के मौजूदा 35 विधायकों में से नेता प्रतिपक्ष सहित 27 हार गये। भाजपा के 5 धाकड़ मंत्री सहित विधानसभा अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और 5 संसदीय सचिव तथा 18 विधायक हार गये। और ये इसके बावजूद हुआ है कि दोनों ही पार्टियों ने खुलकर षराब, मुर्गा, पैसा, साड़ी, कंबल का सहारा लिया। तो क्या आम जनता ने कांग्रेस-भाजपा की नीतियों व उनकी कथनी-करनी पर टिप्पणी नहीं की हैं? यदि इनकी उपलब्धियां और कथनी-करनी सकारात्मक होती, तो इन पार्टियों को लोकतंत्र को स्वाहा करने की जरूरत नहीं पड़ती। 

इसलिए चुनाव के समय टिड्डियों के दल की तरह कांग्रेस-भाजपा निकलती है, वामदल नहीं। वामपंथ साल के 365 दिन और चैबीसों घंटे जन संघर्शों को गढ़ने और रचने में जुटा है। आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने की टाटा की नीति के खिलाफ भाकपा ही आगे रही है, कांग्रेस नहीं। आदिवासियों के मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ वामपंथ ही लड़ाई लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। वनाधिकार कानून व रोजगार गारंटी कानून के क्रियान्वयन के लिए वामपंथ ही लड़ रही है, कांग्रेस नहीं। यही कारण है कि भले ही वामपंथ अपने संघर्शों व प्रभावों को सीटों में बदलने में सफल न हो पा रहा हो, लेकिन वामपंथ की मारक शक्ति से इस देष की राजनीति में उसकी प्रभावषाली भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि अलेक्स पाल मेनन के अपहरण के मामले में मनीष कुंजाम मध्यस्थ के रुप में स्वीकार किये जाते हैं। वे सरकार और माओवादी दोनों के बीच मध्यस्थ थे और भाजपा सरकार ने ही उन्हें हेलिकाप्टर उपलब्ध करवाया था। लेकिन इस मामले से आदिवासियों पर मुकदमों की समीक्षा के लिए जो समिति गठित की गयी, उसका काम फिसड्डी साबित हुआ तो इसमें भाजपा सरकार दोशी नहीं है? निदोश आदिवासी आज भी जेलों में हैं। तो मानवाधिकारों का हनन कौन कर रहा है? असलियत तो यही है कि नक्सल समस्या को बढ़ाने में भाजपा सरकार का बड़ा हाथ है। यदि नक्सली नहीं रहेंगे, तो भाजपा कहां रहेगी? 

राजीव रंजन को वेब पोर्टल और फेसबुक पर कांग्रेस-भाजपा का प्रचार नहीं दिखता, लेकिन उन्हें यहां वामपंथ का ‘हवाई’ प्रचार जरूर दिख गया। वामपंथ को इस मीडिया पर आने के लिए क्या षर्मिंदा होना चाहिए? सभी जानते हैं कि कांग्रेस-भाजपा राज की कृपा मीडियाकर्मियों पर भले ही न हुयी हो, लेकिन मीडिया माफिया पर यह कृपा जमकर बरस रही है। मीडिया में चाटुकार पत्रकारों की एक ऐसी फौज तैयार हो गयी है, जो सच्चाई लाने के बजाय सत्ता पक्ष की बगलगीर रहने में अपनी भलाई देखती है। सत्ता की पक्षधरता अपना प्रभाव बढ़ाने और सुविधायें जुटाने का साधन बन गयी है। सामान्य मीडियाकर्मियों को उचित वेतनमान भी नहीं मिलेगा। साईं रेड्डी की नक्सली हत्या करेंगे, तो कमल शुक्ल को सत्ता जनसुरक्षा कानून की धौंस दिखायेगी। राजीव रंजन जी, अपने मित्रों के लिए कुछ तो कीजिए।

तो पार्टनर, वामपंथ अपनी जमीन तलाषने की कोषिष कर रहा है, इस तलाष में उसकी राजनीति की दिषा स्पश्ट है। यदि आप वामपंथ को गरियाना चाहते हैं तो उसके लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन जब हम बहस कर रहे हैं, तो आपको यह जवाब तो देना ही होगा--‘‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?’’

---संजय पराते

मूल आलेख जिस पर केन्द्रित है बहस: 

बस्तर में वामपंथ की कोई जमीन है भी? 
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बस्तर पर सर्वाधिक चर्चा वामपंथी ही करते हैं। माओवाद की आलोचना करने पर सबसे तल्ख प्रतिवाद वामपंथियों से ही प्राप्त होता है। बस्तर क्षेत्र में इस बार हुए चुनाव यह तो स्पष्ट कर रहे हैं कि माओवाद अपनी जमीन खो चुका और अधिकाधिक मतदाताओं ने बाहर आ कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। अब उस वामपंथ पर बात की जाये जिसने बैलेट से अपना शक्तिप्रदर्शन किया है। चुनावों से पहले ही कोण्टा, दंतेवाडा और बीजापुर सीट पर वामपंथी उम्मीदवारों के विजय की भविष्य़वाणी अनेको अतिउत्साही वाम-विचारधारापरक पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों में की जा रही थीं। यह समझने के लिये मैने स्थानीय पत्रकार दोस्तों से लगातार यह जानने की कोशिश की कि विशेषरूप से दक्षिण बस्तर में वामपंथी दल किन मुद्दों के साथ बाहर आये हैं, उनकी घोषणायें क्या हैं, तथा चुनावस प्रचार में अपनी बात किस तरह रख रहे हैं। अधिकतर जानकारियाँ यही प्रतीत हुईं कि कोण्टा में मनीष कुंजाम अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे हैं लेकिन सभी जगह वामदल अपनी दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। 

चुनाव परिणाम वामदलों के दिवास्वप्नों पर कुठाराघात था। यह ठीक है कि पूरा चुनाव ही दो बडी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच का हो गया था लेकिन वामदल तो हमेशा ही अपनी उपस्थिति और प्रभाव का बस्तर में दावा करते रहे हैं। आज यह सवाल उठता ही है कि पिछले पाँच सालों में वाम दलों ने कितनी बार जमीनी मुद्दों को सडक तक लाने का श्रम किया? मनीष कुंजाम भी चार साल की गुमनामी बिता कर एकाएक चुनाव के समय सक्रिय हुए। यह बस्तर हो या दिल्ली जमीन पर अपनी ठोस उपस्थिति दिखाये बिना आप एक सीट पर भी अपनी जीत का दावा नहीं रख सकते। बस्तर वाम दलों ने खुल कर कभी वाम चरमपंथ का विरोध भी नहीं किया तथा स्पष्ट रूप से उनसे अपनी दूरी भी दिखाने मे वे नाकामयाब रहे हैं। जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण किया गया था तब मनीष कुंजाम का माओवादियों द्वारा नाम मध्यस्त के रूप में आगे किया जाना उनके खिलाफ ही गया लगता है। वामपंथी दल बस्तर की बारह में से नौं सीटों पर लडे और उन्हें तीसरे से ले कर दसवे स्थान तक की प्राप्ति हुई और वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं थे। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सडक पर भी अपनी ठोस उपस्थिति नहीं दर्ज कराई बल्कि उनके जमीनी प्रचार से अधिक हवाई प्रचार तो बेवपोर्टल और फेसबुक पर सक्रिय वामपंथी करते दिखे। 

तो बस्तर में जमीनी वामपंथ की क्या हैसियत है इसपर बात करने के लिये नतीजों पर एक दृष्टि डालते है। कोंटा में कवासी लकमा फिर एक बार अपनी सीट समुचित बहुमत से निकाल ले गये जबकि दूसरा स्थान भाजपा को मिला है। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे वामपंथी इस बार पुन: मनीष कुंजाम के नेतृत्व में थे किंतु तीसरे स्थान पर खिसक गये और हार भी लगभग आठ हजार मतो से हुई है। दंतेवाडा (12954) और चित्रकोट (11099) छोड कर वामदलों को अन्य सभी सीटों में गिनती के वोट ही हासिल हुए हैं। अधिकतम सीटों पर तो इस वैकल्पिक राजनीतिक दल से अधिक मत बस्तर के मतदाताओं नें “नोटा” को दिया है। वामदल एकता के साथ भी नहीं लडे यहाँ तक कि जगदलपुर में तो सीपीआई और सीपीआई (एम-एल) एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड रही थी और दोनो को मिलाकर भी गिनती के वोट (3321) मिले। वाम दलों को न्यूनतम 655 मत (जगदलपुर में शंभु प्रसाद सोनी) तो अधिकतम 19384 मत (कोण्टा में मनीष कुंजाम) को प्राप्त हुए जो इस दल की क्षेत्र में बेहद पतली हालत का प्रदर्शन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वामपंथ अब बस्तर में कोई जमीनी हैसियत नहीं रखता। 

-राजीव रंजन प्रसाद

बस्तर में वामपंथ की कोई जमीन है भी?

बस्तर पर सर्वाधिक चर्चा वामपंथी ही करते हैं। माओवाद की आलोचना करने पर सबसे तल्ख प्रतिवाद वामपंथियों से ही प्राप्त होता है। बस्तर क्षेत्र में इस बार हुए चुनाव यह तो स्पष्ट कर रहे हैं कि माओवाद अपनी जमीन खो चुका और अधिकाधिक मतदाताओं ने बाहर आ कर लोकतंत्र के पक्ष में मतदान किया है। अब उस वामपंथ पर बात की जाये जिसने बैलेट से अपना शक्तिप्रदर्शन किया है। चुनावों से पहले ही कोण्टा, दंतेवाडा और बीजापुर सीट पर वामपंथी उम्मीदवारों के विजय की भविष्य़वाणी अनेको अतिउत्साही वाम-विचारधारापरक पत्रिकाओं और वेबपोर्टलों में की जा रही थीं। यह समझने के लिये मैने स्थानीय पत्रकार दोस्तों से लगातार यह जानने की कोशिश की कि विशेषरूप से दक्षिण बस्तर में वामपंथी दल किन मुद्दों के साथ बाहर आये हैं, उनकी घोषणायें क्या हैं, तथा चुनावस प्रचार में अपनी बात किस तरह रख रहे हैं। अधिकतर जानकारियाँ यही प्रतीत हुईं कि कोण्टा में मनीष कुंजाम अपनी फेस-वेल्यु पर लड रहे हैं लेकिन सभी जगह वामदल अपनी दृष्टिकोण नहीं केवल लाल झंडा ही आदिवासी मतदाताओं के सामने रख सके हैं। 

चुनाव परिणाम वामदलों के दिवास्वप्नों पर कुठाराघात था। यह ठीक है कि पूरा चुनाव ही दो बडी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच का हो गया था लेकिन वामदल तो हमेशा ही अपनी उपस्थिति और प्रभाव का बस्तर में दावा करते रहे हैं। आज यह सवाल उठता ही है कि पिछले पाँच सालों में वाम दलों ने कितनी बार जमीनी मुद्दों को सडक तक लाने का श्रम किया? मनीष कुंजाम भी चार साल की गुमनामी बिता कर एकाएक चुनाव के समय सक्रिय हुए। यह बस्तर हो या दिल्ली जमीन पर अपनी ठोस उपस्थिति दिखाये बिना आप एक सीट पर भी अपनी जीत का दावा नहीं रख सकते। बस्तर वाम दलों ने खुल कर कभी वाम चरमपंथ का विरोध भी नहीं किया तथा स्पष्ट रूप से उनसे अपनी दूरी भी दिखाने मे वे नाकामयाब रहे हैं। जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण किया गया था तब मनीष कुंजाम का माओवादियों द्वारा नाम मध्यस्त के रूप में आगे किया जाना उनके खिलाफ ही गया लगता है। वामपंथी दल बस्तर की बारह में से नौं सीटों पर लडे और उन्हें तीसरे से ले कर दसवे स्थान तक की प्राप्ति हुई और वे कहीं भी मुख्य मुकाबले में नहीं थे। उन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सडक पर भी अपनी ठोस उपस्थिति नहीं दर्ज कराई बल्कि उनके जमीनी प्रचार से अधिक हवाई प्रचार तो बेवपोर्टल और फेसबुक पर सक्रिय वामपंथी करते दिखे। 

तो बस्तर में जमीनी वामपंथ की क्या हैसियत है इसपर बात करने के लिये नतीजों पर एक दृष्टि डालते है। कोंटा में कवासी लकमा फिर एक बार अपनी सीट समुचित बहुमत से निकाल ले गये जबकि दूसरा स्थान भाजपा को मिला है। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे वामपंथी इस बार पुन: मनीष कुंजाम के नेतृत्व में थे किंतु तीसरे स्थान पर खिसक गये और हार भी लगभग आठ हजार मतो से हुई है। दंतेवाडा (12954) और चित्रकोट (11099) छोड कर वामदलों को अन्य सभी सीटों में गिनती के वोट ही हासिल हुए हैं। अधिकतम सीटों पर तो इस वैकल्पिक राजनीतिक दल से अधिक मत बस्तर के मतदाताओं नें “नोटा” को दिया है। वामदल एकता के साथ भी नहीं लडे यहाँ तक कि जगदलपुर में तो सीपीआई और सीपीआई (एम-एल) एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड रही थी और दोनो को मिलाकर भी गिनती के वोट (3321) मिले। वाम दलों को न्यूनतम 655 मत (जगदलपुर में शंभु प्रसाद सोनी) तो अधिकतम 19384 मत (कोण्टा में मनीष कुंजाम) को प्राप्त हुए जो इस दल की क्षेत्र में बेहद पतली हालत का प्रदर्शन है और यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि वामपंथ अब बस्तर में कोई जमीनी हैसियत नहीं रखता।

-राजीव रंजन प्रसाद 

नोटा ने कईयों के अरमानो को लूटा – संदर्भ बस्तर

बहुत हद तक यह लग रहा था कि बस्तर इस बार भारतीय जनता पार्टी के लिये विपरीत परिणाम देने वसला है। जानकारों ने कोंटा और दंतेवाड़ा पर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के पक्ष में अपने अनुमान (एग्जिट पोल) व्यक्त किये थे जबकि यह माना जा रहा था कि सात सीट कॉग्रेस को, तीन भाजपा और दो कम्युनिष्ट पार्टियों को मिलेंगे। परिणाम चार सीट भाजपा तथा आठ कॉग्रेस के पक्ष मे था। वामपंथी प्रत्याशियों की करारी हार यह बताती है कि बंदूख के साये से यदि वे बाहर न आये तो उनकी जमीनी लडाईयाँ भी असरकारक नहीं होंगी। सभी विश्लेषकों ने महेन्द्र कर्मा फैक्टर को बहुत हल्के में लिया और देवती कर्मा को कम कर के आंका गया। यह स्पष्ट है कि बस्तर में महेन्द्र कर्मा के प्रति सहानुभूति थी दंतेवाड़ा विधाससभा सीट पर 77% मतदान के रूप में आदिवासियों ने अभिव्यक्त भी कर दी। यह इतना बड़ा मतप्रतिशत है जितना कि देश के सभ्यतम माने जाने वाले क्षेत्रों में वोट भी नहीं पड़ते।

आज बात करते हैं नोटा पर। पूरे छत्तीसगढ में 3% लोगों ने नोटा का बटन दबाया और किसी भी पार्टी के पक्ष में मतदान नहीं किया। यह इतना बड़ा वोटों का हिस्सा था जिसने निश्चित ही कहीं कॉग्रेस का गणित बिगाड़ा तो कहीं भाजपा का। आश्चर्य की बात यह कि देर शाम तक नोटा के जो आंकडे बस्तर की बारह सीटों में सामने आये वह बताते हैं कि यह दोनो ही राजनीतिक पार्टियों के लिये खतरे की घंटी है और बहुतायत आदिवासी जनता ने लोकतंत्र पर तो भरोसा दिखाया किंतु प्रत्याशियों को नकार दिया। यदि नोटा मे पडे मत प्रत्याशियों के साथ जुडे होते तो परिणामों में और भी उठापटक देखी जा सकती थी। कांकेर (5208 मत), कोण्डागाँव (6773 मत), भानुप्रतापपुर (5680 मत), केशकाल (8381 मत), नारायणपुर (6731 मत), जगदलपुर (3469 मत), चित्रकोट (10848 मत), अंतागढ (4710 मत), बस्तर (5529 मत), दंतेवाडा (9677 मत), कोण्टा (4001 मत), बीजापुर (7179 मत) में नोटा का बटन बहुत अच्छी मात्रा में दबाया गया। इसका अर्थ यह है कि बस्तर में नोटा के लिये न्यूनतम 3469 मत (जगदलपुर) से ले कर अधिकतम 10848 मत (चित्रकोट) प्राप्त हुए। मतप्रतिशत के हिसाब से अधिकतम बीजापुर मे 10.15% मतदाताओं ने अपने 7179% मतो का प्रयोग नोटा के रूप में किया। अनेक प्रत्याशियों की जीत का अंतर भी नोटा में पडे मतों से कम था (नोट: अंतिम आंकडे अभी विश्लेषित किये जाने हैं।)। नोटा यह बताता है कि बस्तर का जागरूक मतदाता यह जानता है कि उसे किसको वोट देना है और अगर किसी को भी नहीं देना तो भी लोकतंत्र को बचाने का अपना दायित्व उसने निर्वहन किया है; इस तरह प्रत्याशियों से नाराजगी भी दिखाई गयी और नक्सलियों को अंगूठा भी।

-राजीव रंजन प्रसाद 


Saturday, November 16, 2013

बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है


-पिछले पृष्ठ से आगे - 

बस्तर में विधानसभा चुनावों के सम्पन्न होते ही गहरी गहरी स्वांसों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। सुरक्षाबलों के अपना एक सिपाही श्री पी. डी. जोसेफ़ को खोया तो कुछ ग्रामीण भी घायल हुए किंतु यह सब वर्ष 2008 में इस क्षेत्र में हुए मतदान के समय हुई नक्सली हिंसा जिसमे बयालिस से अधिक शहादत दर्ज हुई थी, उसके समकक्ष राहत भरी खबर बन कर आया है। क्षेत्र में चुनाव विश्लेषणों का समय अब उबर गया है तथा नारे और झंडे अब उत्तरी छत्तीसगढ की ओर केन्द्रित होने लगे हैं। अब गहरी खामोशी है, सुरक्षा बलों के मतदान केन्द्रों के छोडते ही कुछ खम्बे नोचे गये और दिन भर कई बम विस्फोट तो कई विस्फोटक बरामद होने की खबरें आती रहीं। इस बीच बस्तर के भीतर बैलेट और बुलेट की जय पराजय पर चर्चायें होने लगी हैं। यह चर्चा न केवल बस्तर अपितु दिल्ली से भी जारी है चूंकि विचारधारा की युद्धभूमि होने के कारण व्यापक दृष्टि से यहाँ हुए चुनावों के प्रत्येक कदम की विवेचना हुई और यह जानने की कोशिश की जाती रही कि क्या वास्तव में बैलेट से बुलेट पराजित हुआ है?

इस दृष्टिकोण को समझने से पहले इस बार चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका की सराहना करनी आवश्यक है। भारी मात्रा में सुरक्षाबल की तैनाती और सभी प्राप्त जानकारियों के अनुरूप समुचित निर्णय ले कर इन चुनावों को त्रासदी बनने से रोक दिया गया। यदि एसा न हुआ होता तो आज हम रक्तपात के अनुपात पर विमर्श कर रहे होते, मृतक अवशेषों पर मेनहीर गड़ रहे होते और यह मान लिया जाता कि समानांतर सरकार चलाने का दावा वास्तव में एक सच्चाई है। एसा नहीं था कि प्रयास नहीं हुए अथवा जंगल के भीतर से लोकतंत्र के इन महापर्व को धमाके सुनाये जाने की तैयारी नहीं थी। बीजापुर के अनेक क्षेत्रों से रह रह कर नक्सली फायरिंग तथा सुरक्षा बलों द्वारा उत्तर दिये जाने की सूचनायें आती रहीं, करकेली में जहाँ गोली चला कर नक्सली भाग निकले तो मंकेली बूथ पर उन्होने गोली चालन किया। बीजापुर चुनावी परिक्षेत्र के आवांपल्ली में दस किलोग्राम का एक शक्तिशाली बम भी बरामद किया गया था। दंतेवाड़ा में इससे भी भयावह तैयारियाँ थीं तथा पैंतीस और चालीस किलोग्राम के दो बम यहाँ भी बरामद हुए जबकि धानीरका बूथ के पास से दो टिफिन बम भी मौके पर नष्ट किये गये। यही नहीं बरसोल क्षेत्र में छ: आईडी बमो की बरामदगी हुई तो स्थान स्थान पर पोलिंग पार्टी पर नक्सली हमला होने की खबरे पूरे दिन आम थीं। कोण्टा विधानसभा क्षेत्र में हालात इतने खराब थे कि सुकमा के मुरतुण्डा बूथ पर जा रही पोलिंग पार्टी को ही वापस बुला लिया गया। कमोमेश यह स्थिति बस्तर में सभी सीटों पर देखी गयी थी। ओरछा मे दो बम जिन्दा बम मिले, नारायणपुर के आकाबेडा में पच्चीस किलोग्राम का बम बरामद हुआ था तो दरभा के कोलांग मतदान केन्द्र पर गोलीबारी हुई थी। कांकेर की भी यही स्थिति थी जहाँ दुर्गापल्ली के पास एक बम मिला तो पखाञुर मे शक्तिशाली बम विस्फोट के कारण बीएसएफ का एक जवान घायल हो गया, जिसे एयर-एम्बुलेंस से तत्काल ही अस्पताल पहुँचाया गया। ये सभी घटनायें सिद्ध करती हैं कि आतंकवाद ने अपनी ओर से तैयारियों में कोई कमी नही रखी थी। बस्तर समेत जिन अठारह सीटों के लिये छत्तीसगढ में मतदान हुआ वहाँ संवेदनशील मतदान केन्द्रों की संख्या 1517 थी जबकि लगभग इतनी ही अर्थात 1311 संख्या अतिसंवेदनशील मतदान केन्द्रों की थी। इन परिस्थितियों ने लोहा लेना कोई आसान कार्य नहीं था और इसे संभव कर दिखाने में लगी सभी संस्थाओं की सराहना इस लिये भी होनी चाहिये कि बुलेट को यदि योजनाबद्ध रूप से नहीं रोका जाता तो बैलेट की कभी जीत नहीं हो सकती थी। यहाँ जोडना चाहूंगा कि ये सभी तैयारियाँ केवल सुरक्षाबलों के विरुद्ध नहीं थी अपितु उस आम आम मतदाता पर सीधा हमला करने के लिये भी थीं जो अपने क्षेत्र में पसंद की सरकार चुनने के लिये प्रतिबद्ध हो कर साहस जुटा कर मतदान केन्द्रों तक पहुँचा था।       

भय और साहस के बीच संघर्ष की अनेक लोमहर्षक कथायें इस चुनाव में सामने आयीं। यह भी हुआ है कि दंतेवाड़ा, कोण्टा और बीजापुर के अनेक मतदान केन्द्रों में एक भी मतदाता नहीं पहुँचा जबकि इस बार प्रत्येक बूथ में 70-80 सुरक्षा कर्मी तैनात थे यहाँ तक कि हर बूथ में विभिन्न राज्यों से आयी महिला पुलिस कर्मी और कमाण्डों को भी ड्यूटी पर तैनात किया गया था। किंतु एसा भी हुआ है कि पैरों से लाचार मतदाता दोनों हाथों में जूते ठूसे कंटकाकीर्ण पगडंडियों पर घिसटता हुआ बूथ तक पहुँचा। एसे भी दृश्य है जहाँ चलने से लाचार बूढे की लाठी बन कर कोई बुढिया मतदान केन्द्र तक उसे ले आई थी। मतदाताओं को बूथों तक न पहुँचने देने के लिये नक्सलियों ने अनेक स्थानों पर सड़क काट दी तो कहीं नावों-डोंगियों को डुबो दिया था। ग्रामीण इस परिस्थिति से भी लडे और देखने में आया कि मुचनार के परिवर्तित मतदान केन्द्रों में उन्होंने अपनी व्यवस्था से छोटी डोंगियों से नदी पार की और मतदान किया। कई गाँवों के मतदाता चौबीस से अठाईस किलोमीटर पैदल चल कर वोट डालने पहुँचे जिसे अदम्य साहस संज्ञापित किया जाना चाहिये। बैलेट की जीत यदि हुई है तो इसी साहस के कारण संभव हुई है जहाँ आम आदिवासी ने यह बताया है कि उसकी आस्था तो अपनी व्यवस्था पर अब भी है और यदि यह तथ्य हमारे लोकतंत्र की बुनियादी समझ बन सके तो बस्तर ही बदल जाये।   

इन्ही परिस्थितियों के दृष्टिगत आखिरी समयों में अनेक मतदान केन्द्रों के बदले जाने को ले कर चुनाव आयोग की तीखी आलोचना भी देखी गयी। सुरक्षा कारणों से इसे सही भी माना जाये तो भी यदि आवश्यकता से अधिक दूर मतदान केंन्द्र होंगे, गाँवों से असहज दूरी और दुर्गम रास्तों से हो कर उन्हें वोट डालने के लिये बाध्य होना पडेगा तो निश्चित है कि औसत मतदान में गिरावट देखी जायेगी। नदी के उसपार के मतदाताओं को इसपार आने के लिये अपनी व्यवस्था से अगर नावों और अन्य संसाधनों का सहारा लेना पडा तो इन बदले गये बूथों पर मतदान होने का श्रेय ग्रामीणों के साहस को ही जाता है तथा इसके बदले जाने के विपक्ष में खडे तर्क मान्य प्रतीत होते हैं। इस सभी बातों को देखते हुए यदि छत्तीसगढ राज्य में पिछले दो चुनावों के साथ वर्तमान मतदान के प्रतिशत की एक विवेचना की जाये तो क्षेत्रवार जो चित्र उभरता है वह गहरा विमर्श मांगता है। 

इस बार हुए रिकॉर्ड मतदान के कारण यह माना जा रहा है कि चुनावों के नतीजे विविध होंगे जिसके कारण अटकलों का बाजार गर्म है। जगदलपुर, कांकेर, कोण्डागाँव, केशकाल चित्रकोट, नारायणपुर तथा दंतेवाडा में जहाँ पिछले चुनावों के मुकाबले बढत देखी गयी किंतु 2003 के आंकडों को भी सामने रखा जाये तो इन सभी सीटों में उतार चढाव भरा मतदान होने की परम्परा रही है साथ ही साथ भानुप्रतापपुर तथा नारायणपुर जैसी सीटों में यथास्थितिवाद दृष्टिगोचर हो रहा है। नक्सल प्रभावित दक्षिण बस्तर में दंतेवाडा के आंकडे चौंकाने वाले हैं यहाँ 67% मतदान का होना कई तथ्य को विवेच्य बनाता है। महेन्द्र कर्मा के निधन को एक कारण मान कर यदि हालिया घटनाओं के देखा जाये तो नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार की अपील के पश्चात दंतेवाडा के कमलनार में पंद्रह गावों के प्रतिनिधियों ने बैठक की और वोट डालने का निश्चय किया। इसके पश्चात हुआ भारी मात्रा में मतदान होना वस्तुत: क्या सिद्ध करता है इसके लिये तो चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करनी ही होगी। तथापि कोण्टा और बीजापुर में मतदान का प्रतिशत गिरा है। कोण्टा में 2008 के मुकाबले 12% के लगभग मत प्रतिशत में कमी आना तथा 2003 के स्तर से भी इसका नीचे चला जाना क्या यह इशारा करता है कि यहाँ नक्सली धमकी का खासा असर देखा गया है। बीजापुर सीट में भी रिकॉर्ड गिरावट के साथ केवल 24% मतदान हुआ जबकि यह 2008 में 37% एवं 2003 में 29% रहा है। अंतागढ में भी गिरावट दर्ज की गयी है किंतु 58% मतदान होना संतोषप्रद ही कहा जायेगा।   

 यह इस दिशा की ओर भी इशारा करता है कि दक्षिण बस्तर से केवल वे वोटर ही बाहर निकले हैं जो किसी न किसी पार्टी का निर्धारित वोट बैंक हैं। क्या दक्षिण बस्तर मे कम मतदान का होना कोण्टा और बीजापुर में वाम संभावनाओं को क्षीण करता है यह भी देखना होगा। वाम अतिवाद ने यहाँ वाम दलों की जमीनी लडाईयों को कमजोर ही किया है तथा मनीष कुंजाम जैसे नेता अपनी “फेस वेल्यु” के कारण ही मुख्य पार्टियों को टक्कर दे पाते हैं। 

आंकडे चाहे जो कहते हों किंतु यह कहना होगा कि इस बार सारे चुनावी पंडित मौन हैं तथा यकीनी तौर पर कोई नहीं कह सकता है कि बस्तर की बारह सीटो पर किस राजनीतिक दल का पक्ष बंधा हुआ है। जो भी बातें सामने आ रही हैं वे केवल अनुमान भर हैं। चुनाव आयोग ने बहुत अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निर्वहन किया है और एक भयानक खून-खराबा भरा दिन देखने से हम बच गये हैं। आम मतदाताओं ने चुनाव के महति पर्व को अपने साहस के सफल बनाया है तथा भारी मात्रा में बस्तरियों ने लोकतंत्र के प्रति आस्था जताई है। ये चुनाव लाल-आतंकवाद के सूत्रधारों को बैठ कर सोचने के लिये भी बाध्य करेगा कि क्या बाहरी दहशत के भीतर उनकी जमीन पतली तो नहीं होती जा रही? चुनाव आयोग ने व्यवस्था को भी एक मार्ग दिखाया है कि समुचित इच्छाशक्ति के दम पर नक्सलवाद से निर्णायक लडाई लडी जा सकती है। बस्तर में सम्पन्न हुए इस सुनाव का उपसंहार यही है कि बस्तर में लोकतंत्र अभी सांसे ले रहा है।  

-राजीव रंजन प्रसाद
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Saturday, November 09, 2013

बस्तर - जहाँ गिरवी है लोकतंत्र

[बस्तर में विधान सभा चुनाव-2013 पर विशेष आलेख]  

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यहाँ लोकतंत्र गिरवी है। सन्नाटे चुनाव प्रचार कर रहे हैं और दहशत ही प्रत्याशी है। कहने को तो सभी राजनीतिक दलों ने अपने अपने उम्मीदवार उतारे हैं जिनके भाग्य का फैसला अंतत: यह तय करेगा कि राज्य में ऊँट किस करवट बैठने वाला है। इसमे कोई संदेह नहीं कि छत्तीसगढ राज्य बनने के पश्चात हुए पिछले दो चुनावों में बस्तर की लगभग सभी सीटों पर कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी रही हैं तथापि कम्युनिष्ट पार्टियों, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी की भी उल्लेखनीय उपस्थिति इन चुनावों मे देखी गयी है। यह बड़ा सवाल है कि नवम्बर-2013 के आगामी विधानसभा चुनावों में बस्तर की बारह सीटों में कैसे समीकरण होने जा रहे हैं?

दक्षिण बस्तर इस समय भयावह स्थितियों से गुजर रहा है। जिन भी प्रत्याशियों की स्थिति का आंकलन करने की कोशिश होती है वहाँ से अंदरूनी इलाको में जा कर अपनी बात न रख पाने की चिंता प्राथमिकता से उजागर होती है। प्रत्याशी और उनके समर्थक केवल उन स्थानो तक ही पहुँच रहे हैं जहाँ उन्हें जीवन सुरक्षित जान पडता है। जितनी राजनैतिक पोस्टरों की संख्या है उतनी ही तादाद में लाल बैनर भी उन क्षेत्रों का सीमांकन कर रहे हैं जहाँ माओवादियों की घोषित उपस्थिति है। वस्तुत: विकास यात्रा और परिवर्तन यात्रा के साथ ही बस्तर में चुनावी बिगुल फूंक दिया गया था और माओवादी पक्ष ने अपनी मजबूत उपस्थिति झीरमघाटी की घटना को अंजाम दे कर सिद्ध कर दी थी। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए हमले को महज एक आतंकवादी वारदात कह कर नजरंदाज नही किया जा सकता क्योंकि उसके स्पष्ट राजनैतिक मायने हैं और घटना के बाद हुई खींचतान का भी वर्तमान चुनावों पर निश्चित ही असर पडने वाला है। वस्तुत: राजनीति भांति भांति के गणित पर आधारित होती है।

उदाहरण के लिये वर्ष-2008 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अनेक नये चेहरों को टिकट दिया था और उसके सकारात्मक परिणाम उन्हे प्राप्त भी हुए थे; इस बार यही फारम्यूला कॉग्रेस ने आजमाया है। एसा नहीं कि गणित बिलकुल सीधा है क्योंकि जिनका टिकट कटा वे कितना भितरघात करने की क्षमता रखते हैं यह गुणा-भाग भी घोषित प्रत्याशियों की जीत-हार तय करता है। भाजपा के लिये जहाँ लगातार दस साल तक सत्ता में काबिज रहने के कारण एंटी इनकम्बेंसी का प्रभाव भी परिणामों पर अपनी जगह बना सकता है वहीं अनेको पुराने चेहरों पर फिर से विश्वास दिखाने की उनकी नीति क्या सही सिद्ध होगी यह तो परिणाम ही तय कर सकते हैं।

जिन अवस्थाओं में चुनाव हो रहे हैं, वे जब लोकतंत्र की उपस्थिति पर ही प्रश्न खड़ा कर रहे हैं, एसे में एग्जिटपोल और ओपीनियन पोल की बहुत अधिक सार्थकता बस्तर के संदर्भ में दृष्टिगोचर नहीं होती। यहाँ हर सीट अपने आप में खास है तथा परिणामों पर - खडे होने वाले प्रत्याशियों की संख्या, वोटिंग प्रतिशत, पोलिंग बूथ की अवस्थिति, माओवादियों का क्षेत्र में प्रभाव आदि आदि बहुत मायने रखते हैं। राज्य बनने के पश्चात हुए दो चुनावों में डाले गये मतों के प्रतिशत के आधार पर यदि बस्तर की अलग अलग सीटों पर एक दृष्टि डाली जाये तो यह कहना होगा कि यहाँ क्षेत्रवार वोटिंग पैटर्न भी अपनी ही कहानी कहते हैं तथा उन्हें भी विजय की संभावनाओं का एक घटक मानना ही होगा। 

तालिका – 1: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणाम विश्लेषण वर्ष – 2003

यदि 2003 के चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि डाली जाये तो दक्षिण बस्तर पर कांग्रेस का कब्जा था। दंतेवाड़ा, कोण्टा तथा बीजापुर की सीटे उनके द्वारा जीती गयी थीं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भाजपा के मुकाबले मतों के अंतर का प्रतिशत दंतेवाडा (16.84%) तथा कोण्टा (34.74%) में बहुत बडा था जबकि बीजापुर में भी कॉग्रेस 8.49% मतो के अच्छे अंतर से विजयी रही थी। दंतेवाड़ा तथा कोण्टा में भाजपा तीसरे नम्बर पर रही थी जबकि यहाँ कम्युनिष्ट पार्टियों ने कॉग्रेस को ठीक ठाक टक्कर देते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। इसके ठीक उलट मध्य एवं उत्तर बस्तर में भारतीय जनता पार्टी ने जो जीत हासिल की वहाँ भी उसने एक बडे अंतर से कॉग्रेस को शिकस्त दी थी जिसमे कि सबसे सबसे उल्लेखनीय हैं – केशलूर (30.86%),  जगदलपुर (28.36%) तथा कांकेर (28.34%)। भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक संघर्ष के साथ इस चुनाव में भानुप्रतापपुर की सीट हासिल हुई थी जहाँ दोनो प्रमुख पार्टियों के बीच जीत का अंतर केवल 1.33% था। इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से एनसीपी का प्रदर्शन माकपा/भाकपा  के समकक्ष रहा था व चार विधानसभा सीटों पर उसने तीसरा स्थान प्राप्त किया था। इस चुनाव में बहुजन समाजपार्टी का विशेष प्रभाव तो नहीं देखा गया किंतु उसने अपनी मामूली उपस्थिति जगदलपुर (2.40%), चित्रकोट(3.21%), भानपुरी (3.21%) तथा केशलूर (2.99%) क्षेत्रों में दर्ज करायी थी।

तालिका – 2: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणाम विश्लेषण - वर्ष 2008 

वे परिस्थितियाँ क्या रहीं कि वर्ष-2008 के विचारसभा चुनाव में दक्षिण बस्तर में भी कॉग्रेस कोण्टा को छोड कर कोई भी सीट नहीं बचा सकी। कोण्टा की सीट को भी कांटे की टक्कर ही कहना होगा चूंकि यह पूरी तरह से त्रिकोणीय मुकाबला सिद्ध हुआ जिसमे आश्चर्यजनक रूप से भाजपा को दूसरा (31.12%) तथा माकपा को तीसरा (30.12%) स्थान हासिल हुआ जबकि केवल 0.28% मतो की बढत के साथ कॉग्रेस के कवासी लकमा ने पहला (31.40%) स्थान प्राप्त किया था। इसी तरह दंतेवाडा का मुकाबला यद्यपि भाजपा ने बडे अंतर (12.99%) से जीता तथापि भाकपा ने दूसरा स्थान प्राप्त किया था। दंतेवाडा सीट पर शिवसेना की उपस्थिति भी 6.14% वोटो के साथ महत्वपूर्ण थी। निर्दलीय प्रत्याशियों का भी शानदार संघर्ष इस चुनाव की विशेषता थी;  कांकेर से निर्दलीय प्रत्याशी चन्द्रप्रकाश ठाकुर ने 10.52% वोट हासिल किये थे जबकि भानुप्रतापपुर से निर्दलीय प्रत्याशी मनोज मंडावी को 24.07 प्रतिशत वोट मिले थे और उन्होंने क्षेत्र में कॉग्रेस को तीसरे नम्बर की पार्टी बना दिया था। मुख्य मुकाबले से एक कदम पीछे चलते हैं और बस्तर मे तीसरे प्रमुख दल अर्थात वामदलों के चुनावी प्रदर्शन तथा संभावनाओं पर एक दृष्टि डालते हैं।

चित्र -1: वामदलों का वर्ष 2003 के चुनावों में प्रदर्शन

वर्ष 2003 के चुनावों में कोण्टा और दंतेवाड़ा को छोड कर शेष सभी सीटों पर वालदल लगभग अनुपस्थित रहे अर्थात उन्हें 15% मत भी प्राप्त नहीं हुए थे।  कांकेर एवं कोण्डागांव में वामदलों का खाता भी नहीं खुला था।   

चित्र -2: वामदलों का वर्ष 2008 के चुनावों में प्रदर्शन

वामदलो की हालत को वर्ष 2008 के चुनाव और भी पतला कर देते हैं जहाँ कि वे अधिकतम सीटों पर 5% से भी कम वोट शेयर के साथ दिखाई पडते हैं तो अंतागढ, केशकाल, भानुप्रतापपुर और कोण्डागाँव में पूरी तरह अनुपस्थित हो जाते हैं। संभवत: अपनी इस दयनीय हालत की भरपाई उन्होंने दक्षिण बस्तर में अपना वोटशेयर बढा कर की थी जो कि लगभग 25 से 30% तक उनके हिस्से में गया था। इस तरह वे कोई सीट भले ही न निकाल पाये हों किंतु यह सिद्ध करने में कामयाब रहे थे कि इस बार भी दक्षिण बस्तर में चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय ही होगा। 

उपरोक्त विवेचना को सही सिद्ध करते हुए कोण्टा विधानसभा सीट में त्रिकोणीय मुकाबला स्पष्ट्त: देखा जा रहा है। कम्युनिष्ट पार्टी के उम्मीदवार मनीष कुंजाम इस बार अच्छी स्थिति में नजर आ रहे हैं किंतु कवासी लकमा को और दरभाघाटी के कारण कांग्रेस के पक्ष में जाती संवेदनाओं को भी कमतर नहीं समझा जा सकता। इस सीट पर सीधी रेस है और देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोण्टा सीट जीत कर इस बार वामदल अपना खाता खोल पाते हैं? दक्षिण बस्तर की दंतेवाड़ा सीट पर मुकाबला कॉग्रेस और भाजपा के बीच अधिक नज़र आता है। बैलाडिला में मजदूर संगठनों में कई फाड हो गये हैं; अब ये मजदूर संगठन वाम राजनीति को सीधे प्रभावित करने की स्थिति में नहीं रह गये हैं। महेन्द्र कर्मा इस बार दंतेवाड़ा सीट से मजबूत नजर आ रहे थे किंतु माओवादियों द्वारा उनकी हत्या के पश्चात इस क्षेत्र में उभरी सहानुभूति क्या कॉंग्रेस को यह सीट दिला पायेगी, यह देखना दिलचस्प होगा? बीजापुर से महेश गागडा भरतीय जनता पार्टी के युवा प्रत्याशी हैं जिसपर पार्टी द्वारा पुन: भरोसा जताया गया है। बीजापुर में मतदान हमेशा से एक चुनौती रहा है पिछले दोनो चुनावों में यह क्रमश: 37.07% तथा 29.20% ही रहा है। एसी स्थिति में मतदान का कम होना अथवा अधिक होना भी प्रत्याशियों की सांस उपर-नीचे करता रहेगा। कॉग्रेस के उम्मीदवार विक्रम मण्डावी पिछले चुनाव के 24.11% के मत अंतर को काटने के लिये श्रम करते दिखाई पड रहे हैं किंतु यहाँ उनकी ही पार्टी के एक अन्य असंतुष्ट टिकिटार्थी द्वारा भितरघात की बाते भी कही जा रही हैं। 

चित्रकोट, जगदलपुर, बस्तर तीनो ही मध्य बस्तर के विधानसभा क्षेत्रों में इस बार भी द्विपक्षीय मुकाबले की ही संभावना है। चित्रकोट से भाजपा के उम्मीदवार बैदूराम कश्यप चुनाव के मुकाबले कॉग्रेस के प्रत्याशी दीपक वैज एक नया चेहरा हैं जिनका प्रयोग संभवत: मौजूदा विधायक के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी की भावना को वोटो में तब्दील करने के लिये किया गया है। चित्रकोट विधानसभा में माकपा की भी सशक्त उपस्थिति है (18.51%), जिसे कोई भी राजनैतिक दल हल्के में नहीं ले सकता। जगदलपुर में कॉग्रेस ने सामान्य विचानसभा सीट होने के बाद भी आदिवासी कार्ड खेलने का यत्न किया है। यहाँ से कॉग्रेस के शामू कश्यप भाजपा के मौजूदा विधायक संतोष बाफना के खिलाफ लड रहे हैं। बीजापुर से टिकट न मिलने से नाराज भाजपा के नेता राजाराम तोडेम ने पार्टी छोड कर स्वाभिमान मंच से लडना निश्चित किया है। यह एक तरह का भितरघात है जो संतोष बाफना के खिलाफ जा सकता है। यदि पिछले चुनाव में भाजपा की जीत का अंतर देखा जाये तो यह 15.32% थी जिसे पाटना कॉग्रेस के लिये वास्तविक चुनौती है। जगदलपुर तथा मध्य बस्तर की अन्य सीटों से प्रत्याशी बडी मात्रा में खडे होते हैं तथा उनके द्वारा वोटों का बटवारा भी सीधे जीत-हार के गणित को प्रभावित करता है। बस्तर सीट की बात करें तो यहाँ पिछले चुनावों में डॉ. सुबाहू कश्यप (भाजपा) और लखेश्वर बघेल (कॉग्रेस) के बीच हारजीत केवल 1.23% वोटो के अंतर से तय हुई थी। मध्य बस्तर चुनाव के लिहाज से अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र है अत: प्रत्याशियों की हलचल और चुनाव के दंगल का नज़ारा यहाँ बखूबी देखा जा सकता है; शहरी और मैदानी क्षेत्रों के लिये चुनाव वैसे भी उत्सव ही बन जाते हैं।  

उत्तर बस्तर की ओर आते ही स्थितियाँ पुन: संघर्ष की जान पडती हैं। नारायणपुर सीट पर केदार कश्यप मजबूत प्रत्याशी हैं। प्रतिद्वंद्वी से पिछले चुनावी नतीजों में 24.47% वोट अंतर के कारण नारायणपुर सीट भाजपा के पक्ष में जाती प्रतीत होती है। यह स्थिति अंतागढ में उलट जाती है; विक्रम उसेंडी को अपनी ही पार्टी से अलग हुए भोजराक नाग का न केवल विरोध झेलना है जो उनके वोट काट सकते हैं अपितु कॉग्रेस के उम्मीदवार मंगतूराम पवार भी एक मजबूत प्रत्याशी हैं। इस क्षेत्र में खास कर पखांजूर और आसपास, दण्डकारण्य परियोजना के तहत विस्थापित हो कर आये बंगाली शरणार्थियों (नामशूदों) का वर्चस्व है। इन शरणार्थियों की बडी तादाद संगठित हो कर वोट देती है और उन्होंने प्रमुखता से स्वयं को अनुसूचित जाति में सम्मिलित किये जाने की माँग उठाई हुई है। यह देखना होगा कि किस प्रत्याशी का आश्वासन से विस्थापित बंगाली समाज लपक लेता है और उसकी जीत में अपनी भूमिका निभाता है। अंतागढ में 2008 के चुनावों में भाजपा की जीत का अंतर केवल 0.03% था अर्थात केवल 109 वोट से विक्रम उसेंडी जीत हासिल कर सके थे अत: यह दिलचस्प सीट सिद्ध होने जा रही है। केशकाल विधानसभा सीट में निर्दलीय उम्मीदवार ही यदि त्रिपक्षीय मुकाबला खडा कर सकें तभी चुनाव रोचक होगा अन्यथा तो भाजपा के सेवकराम नेताम और कॉग्रेस से संतराम नेताम आमने सामने भिडने वाले हैं। पिछले चुनाव में जीत का अंतर दोंनो प्रमुख पार्टियों के बीच महज 7.73% था जो सुरक्षित दूरी किसी लिहाज से नहीं है। यही स्थिति कमोबेश कोण्डागाँव में भी है जहाँ वर्तमान में भाजपा की विधायक लता उसेंडी चुनाव लड रही हैं। केवल 2.62% मतो के अंतर से भाजपा ने पिछले चुनाव में कोण्डागाँव सीट पर जीत दर्ज की थी। यहाँ कॉग्रेस की अंदरूनी लडाई के कारण उनके लिये अंगूर खट्टे भी हो सकते हैं। मोहन मरकाम को फिर से कॉग्रेसी उम्मीदवार बनाने से नाराज शंकर सोढी (भूतपूर्व सांसद मानकू राम सोढी के बेटे) के निर्दलीय लडने से त्रिपक्षीय समीकरण बनने लगे हैं। यद्यपि शंकर सोढी 2008 में भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में केशकाल से लडे थे और उन्हें केवल 4627 (4.36%) मत ही प्राप्त हुए थे। कांकेर विधानसभा सीट पर भाजपा ने वर्तमान विधायक की टिकट काट दी है तथा नये उम्मीदवार के रूप में संजय कोडोपी को मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में भाजपा ने बडे अंतर (16.78%) से कॉग्रेस को हराया था अत: प्रश्न सामने हैं कि क्या कॉग्रेस के उमीदवार शंकर धुर्वा मतो की यह खाई पाट सकते हैं? यह ध्यान देने योग्य बात है कि तीसरा पक्ष वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में लगभग नगण्य था; यहाँ से 2.95% वोट कम्युनिष्ट दल के हिस्से तो महज 4.12% वोट बसपा के खाते में दर्ज हुए थे। बिलकुल कांकेर वाली स्थिति भानुप्रतापपुर की भी है जहाँ मौजूदा विधायक का टिकट काट कर भाजपा ने रुक्मिणी ठाकुर को मैदान में उतारा है। कॉग्रेस के प्रत्याशी मनोज मण्डावी को पिछले चुनावों के 15.83% मतों के अंतर से जूझना होगा।

चित्र -3: चुनावों में जीत का अंतर (प्रतिशत में)


चुनावी गणित में मतो के अंतर अवश्य मायने रखते हैं किंतु मतदान कितना हुआ इस पर सभी राजनीतिक दलों की निगाह रहती है। सुरक्षा कारणों से निर्वाचन आयोग ने अनेक मतदान केन्द्रों को अस्थाई रूप से स्थानांतरित कर दिया है। उदाहरण के लिये अंतागढ के सोलह मतदान केन्द्रों को दूसरे स्थानों पर ले जाया गया है। इस कदम के अपने पक्ष-विपक्ष हैं तथा यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जिन गावों में नक्सली भय से लोग मतदान के लिये बाहर ही नहीं आते वे नये बूथों तक पहुँचेंगे? जिन बूथों से गावों की दूरी कई किलोमीटर बढ गयी है क्या वह मतदान प्रतिशत में गिरावट का एक कारण नहीं सिद्ध होगी? कई पत्रकार मित्रों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चुनाव की स्थिति को ले कर अपने अनुभव मुझसे साझा किये हैं। जो बात बाहर निकल कर आयी है वह सु:खद आश्चर्य पैदा करती है चूंकि आदिवासी मतदान में भाग लेना चाहते हैं। कई ग्रामीणों ने खुल कर कहा कि वे अगर वोट नहीं डालेंगे तो सडक, बिजली पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं पर उनका हक समाप्त हो जायेगा। वस्तुत: सबसे बडा लोकतंत्र विवश है चूंकि आज भी एसे तंत्र विकसित नहीं हो सके जिससे कि हर इच्छुक मतदाता अपनी राय जाहिर करने के लिये उपस्थित हो सके भले ही वह “इनमे से कोई नहीं” वाले बटन को चटखा कर चला आये। चुनावों को प्रभावित करने वाला एक बडा पक्ष है बस्तर के अंदरूनी क्षेत्रों से विस्थापन। सलवा जुडुम की समाप्ति के साथ ही हजारों विस्थापित आदिवासी परिवारों के साथ अपनी पुनर्स्थापना की दिक्कते आने लगीं। यह भी समझने योग्य बात है कि नक्सलवाद भी बडे पैमाने पर विस्थापन को जन्म देता है तथा परिवार के परिवार भय से अथवा मुखबिर करार दिये जाने के बाद अपनी जमीन छोड देने के लिये बाध्य हो जाते हैं। यह एक बडा आंकडा है जो मतदाताओं की सूची के बहुतायत उपस्थित नामों को केन्द्रों से गायब पाता है। हमारे चुनाव विश्लेषण इन विस्थापितों के महत्व को हमेशा ही नजरंदाज कर देते हैं। एक सही चुनाव के लिये वास्तविक मतदाता और सही मतप्रतिशत की आवश्यकता है अन्यथा विजय खोखली ही है। प्रस्तुत आंकडे बस्तर के चुनाव की जो भी दिशा-दशा बताते हों इनमे विस्तापित आदिवासी अनुपस्थित हैं। यही कारण है कि इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता कि क्या हमारे चुनाव वास्तविक लोकतंत्र के प्रतिनिधि हैं? 

-राजीव रंजन प्रसाद 
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Friday, November 01, 2013

बस्तर के आदिवासी जानते हैं अपने वोट की कीमत


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[बस्तर में विधान सभा चुनाव के इतिहास पर विशेष आलेख]

छत्तीसगढ राज्य के स्पष्ट भैगोलिक विभाजन क्षेत्र बस्तर की अपनी पहचान तथा राजनीतिक समझ रही है। हाल के दिनो में दिल्ली के बड़े बड़े अखबारों ने बस्तर के पिछडेपन और अबूझियत पर पन्ने काले किये हैं, एक दृश्य उभारा गया है जिसके अनुसार इस क्षेत्र की आदिवासी जनता राजनैतिक समझ नहीं रखती। अब फिर चुनाव सामने हैं और बस्तर ही छत्तीसगढ की राजनीति के केन्द्र में अवस्थित है। रायपुर में वही अपनी सरकार का दावा प्रस्तुत कर सकता है जिसने बस्तर को साध लिया। कोशिश करते हैं यह समझने की कि क्या बस्तर के आदिवासी अपने वोट की कीमत जानते हैं; अथवा दिल्ली के टेलीस्कोप की तस्वीर साफ साफ है? 

बस्तर के चुनावी संघर्षो पर बात करने से पूर्व मैं वर्ष 1957 से ले कर वर्ष 2008 तक के परिणामों पर एक वहंगम दृष्टि डालना चाहूंगा। मोटे तौर पर हमें राजनीतिक परिस्थितियो को तीन भागों में विभाजित करना होगा। पहला भाग आरंभ होता है जब स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ बस्तर और कांकेर रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ और वृहत बस्तर जिला अस्तित्व में आया। इस क्षेत्र की राजनीति को दोनो ही रियासतों के पूर्व शासक किसी न किसी तरह से प्रभावित करते रहे तथा 1957 से 1972 तक के चुनाव परिणामों में लोकतंत्र के शैशव काल का अस्त हो चुके राजतंत्र के साथ संघर्ष स्पष्ट देखा जा सकता है। बदलाव का समय अर्थात दूसरा भाग परिलक्षित होता है वर्ष 1977 के चुनाव परिणामों के साथ जो किसी न किसी तरह छत्तीसगढ राज्य की स्थापना तक राजनैतिक दशा दिशा को अपने नियंत्रण में बनाये रखता है। यह समझना भी आवश्यक है कि बस्तर और कांकर के राजपरिवारों का जैसे ही वर्चस्व समाप्त हुआ यह क्षेत्र नेतृत्व शून्यता के दौर से गुजरा। बस्तर की राजनीति का तीसरा भाग अर्थात छत्तीसगढ राज्य बनने के साथ साथ माओवाद और सलवाजुडुम जैसी गतिविधियों ने बस्तर की राजनीति को बुरी तरह प्रभावित किया। इसके बाद भी वाम दल पूरी तरह हाशिये पर चले गये और चुनावी नूराकुश्ती केवल दो दलों कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच ही सिमट कर रह गयी। किसी न किसी तौर पर माओवादी बस्तर की सभी बारह सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं परंतु यह भी सत्य है कि उनकी गतिविधियों का चरमकाल वर्ष-2003 और वर्ष-2008 के विधान सभा चुनाव का दौर था जबकि इन समयों में वाल दलों की उपस्थिति बस्तर से नगण्य हो गयी।

चुनावों की तीन अलग अलग परिस्थितियो का विवेचन करते हैं। मुझे यह लिखने में कत्तई संकोच नहीं कि बस्तर की आम जनता अत्यधिक जागरूक है तथा वह राजनैतिक समझ रखती है। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की अपनी ही सोच थी जिसमे कभी वे गहरे सामंतवादी प्रतीत होते थे तो कभी प्रखर बुद्धिजीवी। बस्तर क्षेत्र में हुए पहले चुनाव में राष्ट्रीय भावना हावी थी किंतु उम्मीदवारों के चयन में प्रवीर फैक्टर का बडा असर रहा। यह सब कुछ प्रारंभ हुआ था जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी। 1957 में प्रवीर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजित हो कर विधानसभा पहुँचे; 1959 को उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप में प्रवीर धनपूँजी गाँव में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके तुरंत बाद फरवरी-1961 में “प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट” के तहत प्रवीर को गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से 12.02.1961 को प्रवीर के बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त कर दी गयी। यही परिस्थिति 1961 के कुख्यात काण्ड का कारण बनी जहाँ प्रवीर की गिरफ्तारी का विरोध कर रहे आदिवासियों को घेर कर लौहण्डीगुडा में गोली चलाई गयी। बस्तर की जनता ने इस बात का लोकतांत्रिक जवाब दिया। फरवरी 1962 को कांकेर तथा बीजापुर को छोड पर सम्पूर्ण बस्तर में महाराजा पार्टी के निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे तथा यह तत्कालीन सरकार को प्रवीर का लोकतांत्रिक उत्तर था। इस चुनाव का एक और रोचक पक्ष है। कहते हैं कि राजनैतिक साजिश के तहत तत्कालीन जगदलपुर सीट को आरक्षित घोषित कर दिया गया जिससे कि प्रवीर बस्तर में स्वयं कहीं से भी चुनाव न लड़ सकें। उन्होंने कांकेर से पर्चा भरा और हार गये। कांकेर से वहाँ की रियासतकाल के भूतपूर्व महाराजा भानुप्रताप देव विजयी रहे थे। 

बस्तर जिले की सभी सीटों पर प्रवीर की जबरदस्त पकड के कारण राजनैतिक साजिशों के लम्बे दौर चले। अंतिम परिणति हुई 1966 में महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव की उनके ही महल में गोलीबारी के दौरान नृशंस हत्या। इसके अगले ही वर्ष चुनाव हुए; बस्तर की जनता ने फिर जवाब दिया। कांकेर, चित्रकोट और कोण्टा सीट को छोड कर कॉग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। अंतत: राजनैतिक पासे बाबा बिहारी दास की आड़ में खेले गये। उस दौर में स्वयं को प्रवीर का अवतार घोषित कर बाबा बिहारीदास ने जबरदस्त ख्याति पूरे बस्तर में अर्जित कर ली थी अत: वर्ष 1972 का चुनाव भी प्रवीर फैक्टर के साथ ही लडा गया। बाबा बिहारी दास ने कॉग्रेस के पक्ष में प्रचार किया। बिहारीदास ने चित्रकोट, बकावंड, कोंड़ागाँव, दंतेवाड़ा, केशकाल, नारायनपुर और जगदलपुर विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार किया। इन सभी सीटों पर कॉग्रेस वर्ष-1967 का चुनाव हार गयी थी; अप्रत्याशित रूप से इस बार सभी सीटों पर कॉग्रेस की जीत हुई। लोकतांत्रिक बस्तर के इन आरंभिक चुनावों से यह ज्ञात होता है कि दौर एक एसे नायक का था जिसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था। अपने जीवनकाल तथा मृत्यु के पश्चात के दो चुनावों तक उसने बस्तर संभाग की राजनीति को अपने अनुरूप बनाये रखा। एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी यह कि वर्ष 1967 के चुनावों में जनसंघ ने भी दो सीटे जीती थी और यही परिणाम उसने 1972 के चुनावों में भी दिखाया।  

तालिका – 1: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1957 – 1972 तक)


प्रवीर के अवसान के साथ ही बस्तर नायक विहीनता के अंधकार में जाता हुआ प्रतीत होता है। यदि बस्तर की आदिवासी जनता में चुनावी समझ नहीं होती तो वर्ष 1977 के चुनाव में क्षेत्रवार भिन्न भिन्न परिणाम आने चाहिये थे। यह बस्तर में संकर काल था जो व्यक्ति आधारित राजनीति से बाहर आ कर नयी दिशायें तलाश रहा था। अब आंचलिक समस्याओं के लिये मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य की राजधानी भोपाल तक बस्तरियो का पहुँचना वैसा ही था जितना कि दिल्ली दूर थी। इसी कारण क्या बस्तर देश की राजनीति से सीधे प्रभावित हो रहा था? 

आपातकाल के बाद चुनावों का दौर आया; बस्तर में भी विधानसभा के चुनाव होने थे। यह समय देश भर में  इन्दिरा गाँधी के विरोध का था। यह जनता पार्टी के उत्थान का काल भी था; कई विचारधाराओं और छोटे-बड़े दलों को जोड़कर यह पार्टी बनी थी। क्या बस्तर की आदिवासी जनता ने भी राष्ट्रीय राजनीति के नायक जयप्रकाश नारायण के साथ अपनी सहभागिता दर्शाई थी? वर्ष 1977 के चुनाव तो यही कहते हैं। कोण्डागाँव को छोड कर शेष बस्तर की सभी सीटे जनता पार्टी के हिस्से में आयी थीं। राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव वाले इस दौर में एनएमडीसी की आमद के साथ ही दंतेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र में मजदूर राजनीति का उद्भव हुआ। जनता पार्टी से देशभर का मोह भंग हो चुका था और कॉग्रेस का नवोत्थान हो गया था। वर्ष 1980 के चुनाव परिणाम पहली बार बस्तर में खिचडी सिद्ध हुए। एक ओर नारायणपुर से जनता पार्टी का उम्मीदवार विजयी रहा तो कांकेर और कोण्टा से निर्दलीय प्रत्याशियों को विजय हासिल हुई। पांच सीटें कॉग्रेस की झोली में गयीं जबकि तीन सीट भारतीय जनता पार्टी के हिस्से में आयी। इस के साथ ही मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी की टिकट से महेन्द्र कर्मा ने दंतेवाडा सीट जीत ली थी। इस जीत के पीछे बैलाडिला लौह अयस्क परियोजना में कार्यरत कम्पनी एनएमडीसी की मजदूर यूनियनों का बहुत बडा योगदान था, साथ ही साथ वर्ष 1978 में हुआ किरन्दुल गोलीकाण्ड भी इस मजदूर बाहुल्य क्षेत्र में वामपंथ की जमीन तैयार करने में मुख्य सहयोगी बना। 

पंजाब में आतंकवाद अपने चरम पर था, इन्दिरागाँधी की राजनैतिक साख आगामी चुनाव में एक बार फिर दाँव पर थी। इसी बीच वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी जिसने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया था; 31 अक्टूबर 1984 को इन्दिरा गाँधी की हत्या कर दी गयी। वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में सहानुभूति की वह लहर चली कि बस्तर क्षेत्र में जनता पार्टी ने  वर्ष 1977 के चुनावों में जो करिश्मा कर दिखाया था वह कॉग्रेस ने दोहरा दिया। भानपुरी की विधानसभा सीट जो कि भारतीय जनता पार्टी ने जीती इसे छोड कर शेष सभी ग्यारह सीटों पर कॉग्रेस का कब्जा हो गया। कॉग्रेस ने बस्तर क्षेत्र में पहली बार एसा वर्चस्व कायम किया था। इन चुनावों के परिणामों से यह बात तो स्पष्ट है कि वृहद मध्यप्रदेश का भाग बस्तर क्षेत्र अपने राज्य का एसा उपेक्षित हिस्सा था जिसकी स्थानीयता ही चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती थी। आश्चर्य की बात यह कि 1977 से ले कर 1993 तक लगभग हर चुनाव परिणाम के पीछे किसी न किसी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य की बडी घटना को देखा जा सकता है। 

इसके साथ ही यह बात इनकार करने योग्य नहीं है कि इन समयो में ही आन्ध्रप्रदेश से चल कर माओवाद ने बस्तर के अबूझमाड में अपने पैर रख दिये थे। यद्यपि वामपंथ की लोकतांत्रिक जमीन भी इसी दौर में फैली और मनीष कुंजाम जैसे जमीन से जुड कर संघर्ष करने वाले नेता लाल झंडे को दंतेवाड़ा के साथ साथ बस्तर के दक्षिणी छोर कोण्टा में भी फहराने में सफल हुए; वाम दलों के लिये सीटों की यह स्थिति वर्ष 1990 और 1993 के चुनावों में बनी रही। नब्बे के दशक में राम मंदिर आन्दोलन बहुत तेजी से देश भर को प्रभावित कर रहा था। आश्चर्य यह कि राष्ट्र की मुख्यधारा का यही मुद्दा बस्तर में भी वोटरों को प्रभावित कर रहा था। बलीराम कश्यप जैसे आदिवासी नेताओं ने बस्तर में भारतीय जनता पार्टी के लिये जमीन तैयार की और वर्ष 1990 के चुनाव में इस दल ने बारह में से आठ सीटो पर अपना कब्जा कर लिया। कॉग्रेस को केवल एक सीट हासिल हुई जबकि भानुप्रतापपुर से निर्दलीय उम्मीदवार झाडूराम रावटे ने जीत हासिल की। यह कहना होगा कि वर्ष 1972 और उसके बाद के चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत लगभग असंभव हो गयी थी यद्यपि इक्का-दुक्का प्रभावी अथवा बागी उम्मीदवार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे। आंकडे यह भी तस्दीक करते हैं कि वर्ष 1980 से ही बस्तर के विधानसभा चुनावों में मुख्य मुकाबला कॉग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच होने लगा था। वर्ष 1993, एक स्थिर राजनीति और लगभग मुद्दाविहीन चुनाव का दौर था। बस्तर में कॉग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी ने पाँच पाँच सीटों पर जीत हासिल की जबकि दो सीटें भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के हिस्से गयीं। 
   
तालिका – 2: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1977 – 1993 तक)


छत्तीसगढ राज्य निर्माण के आश्वासनों के बीच वर्ष 1998 के चुनाव हुए। कॉग्रेस ने वर्ष 1985 के चुनाव परिणामों वाला अपना करिश्मा दोहरा दिया। भारतीय जनता पार्टी को केवल कांकेर सीट से ही संतोष करना पडा जबकि शेष सभी ग्यारह सीटे कॉग्रेस के हिस्से में गयीं। वायदों पर अमल हुआ और 1 नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश से पृथक हो कर छत्तीसगढ राज्य अस्तित्व में आया। राज्य बनने का परिणाम यह हुआ कि बस्तर की राजनीति में स्थानीय मुद्दों की पुन: जगह बनने लगी। छत्तीसगढ राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी बने जबकि विद्याचरण शुक्ल की ताजपोशी तय मानी जा रही थी। सतारूढ कांग्रेस पार्टी के बीच हो रही अनेक तरह की अंदरूनी खीचतानों के बीच अगला विधान सभा का चुनाव वर्ष 2003 में हुआ जिसमे भारतीय जनता पार्टी ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिखाते हुए नौ सीटों पर जीत हासिल कर ली, कॉग्रेस को केवल तीन सीटों से संतोष करना पडा जो कि दक्षिण बस्तर में अवस्थित थीं। 

राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। इस समय तक नक्सलवाद छत्तीसगढ में प्राथमिक समस्या बन कर उभर आया था; क्या इस कारण जमीनी वामपंथ की हत्या हो गयी? यह सवाल आगे और बढता है चूंकि वर्ष 2004 से 2006 के बीच की ही बात है जब कई माओवादी धड़े संगठित हुए। इसी दौरान आन्ध्रप्रदेश में भीषण दमनात्मक कार्यवाईयों के फलस्वरूप अपने काडर के अठारह सौ से भी अधिक कार्यकर्ताओं को माओवादियों ने खो दिया था। अत: यही समय बस्तर के प्रवेश करने तथा स्वयं को संरक्षित करने की दृष्टि से माओवादियों के लिये सबसे मुफीद था। इसी समय अबूझमाड़ माओवादी गतिविधियों का केन्द्रीय स्थल बना। यही वह समय है जब बस्तर में कई विकास परियोजनायें घोषित हुई। यही वह समय है जब सलवा जुडूम आरंभ हुआ। यही वह समय है जब सैंकडों राहत शिविरों में लाखों विस्थापित रहने लगे और गाँवों में सन्नाटों ने बस्तियाँ बसायीं। यही वह समय है जब सलवा जुडुम का जवाब देने के लिये माओवादियों ने ‘कोया भूमकाल मिलीशिया’ का गठन किया और अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों के हजारों आदिवासियों को गृह युद्ध की आहूति बनाया। इस सभी हलचलों के बीच देश-विदेश का मीडिया, मानवाधिकार कार्यकर्ता और एनजीओ बस्तर में सक्रिय हुए। सलवाजुडुम को ले कर देश भर में सरकार विरोधी मुहिम चलाई गयी। नतीजा यह हुआ कि वर्ष-2006 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सलवा जुडुम को गैर-वैधानिक करार दिया गया। 

हालाकि समानांतर रूप से प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम जैसे उपाय ग्रामीण क्षेत्रों से जुडने के लिये तलाश लिये। वर्ष 2008 का विधान सभा चुनाव परिणाम भारतीय जनता पार्टी की बस्तर में सबसे बडी जीत का कारण बना। केवल कोण्टा की सीट जो कि कॉग्रेस के कवासी लकमा के हिस्से आयी थी को छोड कर शेष सभी ग्यारह सीटों में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को जीत हासिल हुई। इस जीत के कई प्रकार के विश्लेषण संभव है लेकिन स्पष्ट तौर पर नक्सली रणनीति और लोकतंत्र को धत्ता बताने के लाल-प्रयासों की पराजय के रूप में भी इसे देखना चाहिये। लोकतंत्र में अनेक खामियाँ है लेकिन वह आम जन का स्वीकार्य तंत्र भी है यदि एसा न होता तो बस्तर के चुनाव परिणाम के पैटर्न बिलकुल विपरीत होते। आदिवासी बस्तर ने झारखण्ड होने जैसी अदूरदर्शिता नहीं दिखाई तथा अपनी सरकार चुनने और बदलने का हक अपने पास रखा है। यही कारण है कि सभी राजनैतिक दल बस्तर की ओर अपेक्षा की निगाह से आज देख रहे हैं। 

तालिका – 3: बस्तर में विधान सभा चुनाव परिणामों पर एक दृष्टि (वर्ष 1998 – 2008 तक)


नया इतिहास बनने का द्वार बस खुलने को है। कई चुनावी सर्वेक्षण यह बता रहे हैं कि राज्य में कांटे का संघर्ष होगा तथा संभावना है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही तीसरी बार भी सत्ता हासिल कर सकेगी। सर्वेक्षणों से इतर यदि देखा जाये तो हाल ही में माओवादियों ने मई 2013 को बस्तर की दरभा घाटी में कॉंग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला कर महेन्द्र कर्मा, नंद कुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल जैसे कद्दावर नेताओं की हत्या कर दी। महेन्द्र कर्मा इस चुनाव को बहुत गंभीरता से ले रहे थे तथा उनका व्यापक चुनाव प्रचार अभियान परिवर्तन यात्रा के बहुत पहले से ही आरंभ हो गया था। उनकी हत्या के पश्चात यह देखना आवश्यक है कि सहानुभूति की जो लहर दंतेवाडा-बीजापुर जैसे क्षेत्रों में विद्यमान है क्या वह कॉग्रेस के पक्ष में वोट बन पाती है? कोण्टा सीट कई सालों से कॉंग्रेस के पास ही है; कवासी लकमा पर उठ रही उंगलियों और मनीष कुंजाम की जबरदस्त सक्रियता के बीच यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कॉग्रेस अपनी यह परम्परागत सीट बचा पाती है? क्या बस्तर के माओवाद प्रभावित क्षेत्रो में ठीक तरीके से मतदान हो पाता है इसपर भी पार्टियों का भविष्य निर्भर करेगा। हालाकि भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में जो बात जाती है वह है पिछले चुनावों में जीत का प्राप्त प्रतिशत को कि सवा ग्यारह के लगभग है। किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिये यह दूरी पाटना बड़े संघर्ष का कार्य है। बस्तर को ले कर कोई भी राजनीतिक दल यह गलतफहमी नहीं पाल सकता कि यहाँ के वोटर राजनैतिक पैतरेबाजी नहीं समझते, यही कारण है कि बस्तर किसी भी एक पार्टी का गढ बन कर नहीं रहा। नक्सलियों की धमकी, चुनाव आयोग की सक्रियता, पोलिंग स्टेशन पर वीडियोग्राफी, कडी सुरक्षा व्यवस्था आदि से संभव है बस्तर के अंदरूनी इलाकों में वोट के प्रतिशत में कमी आये; यह भी चुनाव परिणामों पर असर डालने वाला कारक है। अब चुनाव बहुत दूर नहीं किंतु अभी से कहा जा सकता है कि दिलचस्प होंगे छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव जिसमे बस्तर सरकार बनाने की निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है।   
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