Monday, July 15, 2013

गलत पहचान - यह विष्णु प्रतिमा नहीं है

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित

नैनो दर्शन पत्रिका में प्रकाशित
[बारसूर (दंतेवाड़ा) के सिंगराज तालाब में अवस्थित प्रतिमा पर एक विश्लेषण] 
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आप बारसूर पहुँचते हैं तो अनेक दर्शनीय स्थलों की भीड़ में आपको जानकारी प्राप्त होती है सिंगराज तालाब में कंठ अवस्था तक जलमग्न एक विष्णु प्रतिमा की। लगभग पाँच फीट आकार वाली यह प्रतिमा भव्य है, दर्शनीय है तथा दुर्लभ है। सौभाग्य से इस बार जब मैं इस प्रतिमा के निकट पहुँचा तो भगवान विष्णु की प्रतिमा वाली ही अवधारणा मेरे मन में भी थी। तालाब के दूसरी ओर खड़े हो कर अपने कैमरे में जूम करते हुए इस प्रतिमा की तस्वीर कैद करने के पश्चात वहाँ अधिक रुकने का कोई कारण नहीं बनता था। लगभग सभी किताबों में, सरकारी बुकलेट तथा बारसूर महोत्सव की प्रचार सामग्रियाँ सभी इस प्रतिमा को विष्णु की घोषित कर चुकी हैं अत: मेरा यह अनुमान था कि निश्चित ही यह शेष शायी विष्णु की ही प्रतिमा होगी। मेरे साथ मित्र चन्द्रा मण्डा तथा संतोश बढई भी थे। मैं किनारे पर ही खडा रहा और चन्द्रा भाई से निवेदन किया कि वे निकट जा कर इस प्रतिमा की एक तस्वीर खीच लें। एकाएक न्यूटन वाला सेव जैसे मेरे सामने ही आ गिरा और मुझे खडी अवस्था में देख कर इसके विष्णु प्रतिमा होने में संदेह हुआ। गर्मी भयानक पड़ी थी इस वर्ष अत: एक गड्ढे में सिमट कर रह गया था। मैं प्रतिमा के सम्मुख आ पहुँचा और कोशिश करने लगा कि समझ सकूं कि यदि यह विष्णु प्रतिमा है तो क्यों है? और यदि मेरी छठी इन्द्री इस तथ्य को नकार रही है तो किस लिये?

कई मोटे मोटे संदेह मेरे सामने थे प्रतिमा के सिर पर पंचमुखी नाग अथवा शेष नाग होने तक तो ठीक है लेकिन उसके बगल में छठा नाग शीष आखिर क्यों है? विष्णु तो नाग धारण नहीं करते? इस छठे नाग की पूँछ पीछे से हो कर प्रतिमा के दूसरे हाथ तक पहुँच रही है। प्रतिमा के दो ही हाथ नज़र आ रहे हैं तथा शंख, हक्र, गदा, पद्म जैसे अन्य पहचान चिन्ह भी नदारद हैं जो किसी विष्णु प्रतिमा की पहचान होते हैं। मैं चूंकि पुरातत्व का जानकार नहीं हूँ अत: इन बहुत सारे सवालों के साथ मैने प्रतिमा की विभिन्न कोणों से फोटोग्राफी की और उन्हें प्रभात सिंह जी के पास भेज दिया। प्रभात सिंह जी पुरातत्वविद हैं तथा सिरपुर के उत्खनन में उनका महति योगदान है। उनसे मेरी मुलाकात भी सिरपुर में हुई थी जहाँ उनकी मेधा तथा उनके द्वारा प्रतिमाओं के बारीक विश्लेषण सुन कर मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था। प्रभात जी से मुझे दो अलग अलग ई-मेल प्राप्त हुए। पहले ई-मेल में उन्होंने मेरी शंकाओं का बहुत हद तक समाधान किया था और यह समझने में सहायता की कि प्रतिमा विष्णु की क्यों नही है। 

प्रभात जी ने बताया कि “सर्पफणों के पीछे प्रभावली की विद्यमानता प्रथम दृष्टया इसे देव प्रतिमा के रूप में रेखांकित करती है। यदि इसकी सिरोभूशा का अवलोकन करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह विष्णु प्रतिमा नहीं हो सकती है क्योंकि वे किरीट मुकुट धारण करते हैं जबकि इस उदाहरण में जटामुकुट का प्रदर्शन है जो कि शिव प्रतिमा का एक अनिवार्य अभिलक्षण है। प्रतिमा द्विभुजी है और संभवतः (क्योंकि प्रतिमा का अधोभाग चित्र में उपलब्ध नहीं है) दोनो हाथ खण्डित हैं। दाहिने हाथ के अवशिष्ट भाग को देखकर अनुमान होता है कि इसकी हथेली अभय मुद्रा में रही होगी। वहीं बांया हाथ देह के समानान्तर लटकता हुआ दिखाई दे रहा है। नीचे का हिस्सा उपलब्ध न होने के कारण हस्तमुद्रा अथवा उसमें धारित आयुध के विषय में निष्चित रूप से कह पाना अभी संभव नहीं है। सिरोभाग के ऊपर पाँच फणयुक्त सर्प का छत्र है। शिव प्रतिमा के साथ सर्प का संयोजन सर्वविदित है किन्तु आम तौर पर शिव प्रतिमा में इस प्रकार सर्पफण के छत्र का अंकन नही मिलता है। वहीं इस प्रतिमा में पृथक से एक सर्प एकदम दाहिनी ओर अंकित किया गया है जिसका पष्चभाग अर्थात पूंछ एकदम बांयी ओर देवता के कंधे से हाथ तक समानान्तर लटकती हुई देखी जा सकती है। इस प्रकार यहाँ दो सर्प उपस्थित हैं। देवता के कर्णाभूषण, वक्षाभूषण और वस्त्र का भी शिव प्रतिमा से सामंजस्य स्थापित नहीं होता। यह भी उल्लेखनीय है कि सर्प का प्रदर्शन जल के देवता वरूण के साथ भी होता है किन्तु जटामुकुट नहीं होना चाहिए। वहीं इस प्रतिमा की योगस्थानक मुद्रा नागपुरूष की प्रतिमा का अभिलक्षण स्वीकार नहीं किया जा सकता है”। 

मैने प्रभात जी को प्रतिमा के पृष्ठ भाग सहित आस पास की कई अन्य तस्वीरें भी भेजीं। अब यह स्पष्ट होने के पश्चात कि यह विष्णु प्रतिमा नहीं है जिस नाम से बहुत लम्बे समय से इसे जाना जा रहा है तब इसको नयी पहचान भी प्रदान किया जाना आवश्यक है। प्रभात जी ने विस्तृत अध्ययन के पश्चात मिझे बता कि “आपके द्वारा प्रेषित छायाचित्रों से उक्त प्रतिमा के अभिज्ञान के सम्बन्ध में कुछ लाभ अवष्य प्राप्त हुआ है तथापि अतिम निष्कर्श देना जल्दबाजी हो सकती है। आपके द्वारा भेजे गये छायाचित्र में प्रतिमा के बांये हाथ में धारित वस्तु स्पष्ट दिखलाई पड़ रही है। यह वस्तु वृत्ताकार है और मध्य में गहरा है जो प्याले जैसा पात्र प्रतीत हो रहा है। दाहिना हाथ जैसा की मैने पूर्व में उल्लेख किया है अभय मुद्रा में होना चाहिए। जे. वोगेल ने अपनी कृति (Indian Serpent Lore or the Nagas in Hindu legend and art) में कुकरगम से प्राप्त ऐसी ही एक प्रतिमा का जिक्र किया है जिसका दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और बांये हथेली में प्याला पकडे़ हुए है तथा पृश्ठभाग में सर्पफणों का छत्र है। उसे उन्होनें नागदेवता का मानुषी रूपाभिव्यक्ति माना है। इस प्रतिमा के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए जे. एन. बनर्जी (The Development of Hindu Iconography, 2002, p. 349) आगे लिखते हैं कि “The type in a modified form was similar to Baldeva, one of whose aspect is based on a trait of this primitive folk cult” ज्ञात रहे कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण में निर्दिश्ट अनंतनाग का प्रतिमालक्षण, बलराम के प्रतिमालक्षण से भी मेल खाता है। अंततः यही कहा जा सकता है कि यह बलराम अथवा नागदेवता की प्रतिमा हो सकती है। किंतु छठे सर्प की तार्किक व्याख्या का आधार अभी भी उपलब्ध नहीं हो सका है। एक छायाचित्र में प्रस्तर स्तंभ भी दिखलाई दे रहा है। प्रतिमा के इर्द-गिर्द बिखरे प्रस्तर खण्डों में जो छिद्र बने हैं वो गिट्टक (Iron Dowel) के प्रयोग की सूचना दे रहे हैं। इन स्थापत्य खण्डों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यहाँ पर लगभग 10वीं-11वीं सदी ईस्वी में छिंदक नागवंशीयों के समय का मंदिर रहा होगा और उक्त प्रतिमा संभवतः गर्भगृह में स्थापित रही होगी।“ 

बस्तर की प्रतिमाओं के बहुत बारीक विष्लेशण की आवश्यकता है अन्यथा हम उनके निहितार्थ नहीं पकड़ सकेंगे। छठे नाग की तार्किक व्याख्या उपलब्ध न होने के बाद भी यह स्पष्ट है कि यह किसी नागदेवता की प्रतिमा हो सकती है, यह प्रतिमा बलराम की भी हो सकती है जिन्हें स्वयं शेषावतार कहा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो सामने आती है कि यह प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह में रही होगी। इस दृष्टिकोण से इसका महत्व अधिक बढ जाता है। इस प्रतिमा के आस-पास प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं जो इतिहास की विरासत हैं। बारसूर केवल बत्तीसा, चन्द्रादित्य मंदिर या कि गणेश प्रतिमा ही नहीं है यहाँ छिपा हुआ है कई हजार सालका इतिहास। हमारी हर गलत व्याख्या हमे सच्चाई से परे करती है और बस्तर उतना ही अबूझ होता जाता है। वर्तमान में यदि इंस क्षेत्रों में उत्खनन संभव न भी हों तो भी विषय-विशेषज्ञों को यहाँ आ कर एसी अनेक प्रतिमाओं की समुचित तथा तार्किक व्याख्या कर देनी चाहिये। सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह असाधारण प्रतिमा है तथा इसका प्राथमिकता के साथ संरक्षण किये जाने की आवश्यकता है। स्थानीय प्रशासन से मेरी विनम्र अपील है कि इस प्रतिमा को तालाब के किनारे ही संरक्षित करने की व्यवस्था की जाये जिससे कि पर्यटकों के लिये इस प्रतिमा का आकर्षण बना रहे। यदि एसा करना संभव न हो तो इस प्रतिमा को यथाशीघ्र संग्रहालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। पानी से इस प्रतिमा का तेजी से क्षरण हो रहा है और हमारी यह अमूल्य विरासत मिटती जा रही है। 

Wednesday, July 10, 2013

लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!


[बस्तर की दरभा घाटी की लाल-आतंकवादी घटना पर एक और दृष्टिकोण] 
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 28 मई 2013 की सुबह; सड़क एकदम सूनसान थी। बचेली से बारसूर की तरफ बढ़ते हुए बार बार ध्यान सड़क के दोनो ओर गिराये गये पेड़ों की तरफ जा रहा था। 25 मई को बस्तर की दरभा घाटी में हुई लाल-आतंकवादी घटना समय ही सुकमा से बचेली और गीदम पहुचने वाले दोनो ओर के मार्गों पर बड़े बड़े पेड़ काट कर गिराये गये थे। सरसरी निगाह से देखने पर ही यह समझा जा सकता है कि दरभा घाटी में हुआ मौत का भयानक ताण्डव अगर वहाँ नहीं होता तो भी टलता नहीं। कॉग्रेस की परिवर्तन यात्रा के जाने के प्रत्येक मार्ग अवरुद्ध किये गये थे और पेडों को महेन्द्र कर्मा के गृहनगर ‘फरसपाल पहुँच मार्ग’ से कहीं आगे तक काट काट कर गिराया गया था जिससे कि वारदात के समय गाडियों के चक्के जाम रहें। जैसे ही हम कुछ और आगे बढे एक पेड पर चिपाकाया गया पोस्टर नज़र आया। पोस्टर में महेन्द्र कर्मा की नृशंस हत्या के बाद अब सलवा जुडुम के नेताओं को जान से मारने की धमकी दी गयी थी साथ ही ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिये मुर्दाबाद था। ऑपरेशन लाल हंट वालों को हर तरफ से अपने ही हंट की चिंता है यह बात इस पोस्टर की विवेचना से स्पष्ट है। सलवा जुडुम भले ही अब समाप्त हो गया हो लेकिन उसके नेताओं से बदला लिया जाना है जिससे कि आदिवासी कभी भी माओवादियों के खिलाफ सिर न उठा सकें और दूसरी बात कि उनके खिलाफ चलाया जा रहा तथाकथित अभियान बंद हो जिससे कि वे निष्कंटक अपना आधार इलाका बढा सकें और समूचे बस्तर को सुरसा मुख में निमग्न कर उसका लाल-सलाम कर दें। हमारे यहाँ दिल्ली से नौटंकीबाज समाजसेवियों की खूब सुनी जाती है तो चलिये उनकी ही जनपक्षधरता के नारों का ग्राउंड जीरो में खोखलापन देखें। दंतेवाड़ा को बचेली से जोड़ने वाला शंखिनी नदी पर अवस्थित एक पुल दोनो ओर से चार स्थानों से लगभग काट दिया गया था जिससे कि आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाये। वाम डिक्शनरी से अर्थ निकाल कर इस बात को सामान्य करार देते हैं चूंकि सड़क तो केवल पूंजीपति और मध्यमवर्तीय लोगों की थाती है आम आदिवासी तो सड़क का उपयोग ही नहीं करता होगा? हो सकता है दिल्ली से एसा ही दिखता हो तो परे कीजिये इस बात को और यहाँ से कुछ सौ मीटर और आगे बढते हैं जहाँ माओवादियों के घटना के एन दिन एक वनोपज जांच नाका गिरा दिया था। दिल्ली सही चीखती है कि वन अधिकारी शोषक हैं इस लिये माओवादियों ने न्याय किया होगा। लेकिन सड़क के दूसरी ओर जहाँ बरसात-धूप से बचने के लिये यात्री शेड बना हुआ था उसे क्यों ध्वस्त किया गया? कोई नवीन जिन्दल उसके नीचे नहीं रुकता, कोई मध्यमवर्गीय व्यापारी, सेठ या किसी शरीर में आत्मा घुसा कर कोई जमींदार भी पुनर्जीवित हो यहाँ नहीं ठहरता। यह तो बस्तर की दो अलग अलग घाटियों को जोडने वाला स्थान था और यहाँ आगे जाने वाले यात्री वाहन की प्रतीक्षा करने के लिये आदिवासी ही विपरीत मौसमों में ठहरते थे। इस क्षेत्र में जो भी इमारते थी, संकेत चिन्ह थे, तथा होल्डिंग्स लगे थे सभी को जैसे चूर चूर कर दिया गया है। किसी बात की खीझ निकाली जा रही हो या गुस्सा प्रदर्शित किया जा रहा हो संभवत: एसा ही कुछ वहाँ देखा जा सकता था। 

 इस दृश्य पर ठहर कर दरभा घाटी की घटना की विवेचना करते हैं। कुछ दिनों पहले एक खबर नारायणपुर से आयी थी जिसमे बताया गया था कि माओवादियों ने ग्रामीणों पर पेड काटने के लिये जुर्माना लगाया है। यह बात कही गयी थी कि इस तरह जंगल बचेंगे। वस्तुत: हम एक घटना का दूसरी घटना से तार कभी जोडते ही नहीं। मेरी बात को सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर तीनो ही मार्गों पर जाने वाले लोग आसानी से समझ सकते हैं। सड़क को अवरोधित करने के लिये माओवादियों द्वारा पेड़ काट कर गिराया जाना एक आम घटना है। उल्लेखित सड़कों के किनारे किनारे आपको सैंकडो काटे गये पेडों के ढूंठ नज़र आ सकते हैं। मुझे आशंका है कि मार्ग अवरुद्ध करने के लिये पेड़ काटा जाना कोई क्रांतिकारी गतिविधि नहीं अपितु आदिवासियों के संसाधनों की लूट का एक नये तरह का जरिया है। दरभा घाटी की घटना के दिन अकेले ही सौ से अधिक बडे बडे पेड काट कर मार्ग में बिछा दिये गये थे। मुझे अधिकतम पेड सागवान के लग रहे थे। अंचल के एक वरिष्ठ पत्रकार से जब मैने इसकी तस्दीक की तो ज्ञात हुआ कि चुन चुन कर सागवान के ही पेडों को काटा गया था। इतना ही नहीं दूसरे दिन किसी चमत्कार की तरह काटे गये पेडों के मुख्य हिस्से सड़क से गायब भी हो गये। मुझे किसी की आई क्यू पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना है आप चाहें तो इस सच्चाई के पीछे के खेल को नजरंदाज कर जनपक्षधरता की तकरीरे जारी रख सकते हैं। 

‘पर्यावरण और माओवादी’ बडा ही मजेदार विषय है जिसे बस्तर में होने वाली “मौतों पर जाम टकराने वाले एक विश्वविद्यालय” के विशेषज्ञों द्वारा बार बार दुहाई की तरह उठाया जाता है। मैने कई बार आदिवासियों से इस बात को जानने की कोशिश की है और अपुष्ट सूत्रों से यह बता सकता हूँ कि बस्तर के कई दुर्लभ पक्षी बाशिंदे निरंतर भूने खाये जा रहे हैं। आपको आदिवासियों के शिकार पर आपत्ति है और भीतर कई निरीह प्राणी इस महान सो-काल्ड साईंटिफिक सोच वाली लाल-सेना के कैम्प फायर की शोभा होते हैं। एक कश्मीरी पंडित लेखक ने फौरी बस्तर भ्रमण (माओवादियों से मिल कर उनसे सोने-जागने-धोने-नहाने पर किताबें लिखने वाला परिभ्रमण) के बाद लिखा कि किस तरह माओवादी कैम्प के बाहर एक सांप दिखा और उसे तुरंत मार दिया गया। मुझे एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि बस्तर की कई महत्वपूर्ण खदाने जो कि कोरंडम, टिन जैसे बहुमूल्य संसाधनों की है उनपर अब लाल-आतंकवादियों का कब्जा है और मैं उन पर स्मग्लिंग का आरोप लगाउं- तौबा तौबा, आप तो यूं कहिये कि आदिवासियों के लाल-हंट के लिये बस्तर के ये संसाधन अब साधन जुटाने का काम कर रहे हैं। ये सभी वे कहानियाँ हैं जिन पर आपको कोई युनिवर्सिटी बात करती नजर नहीं आयेगी, कोई लेखक अपनी किताब में छाप कर चर्चा नहीं करेगा, कोई जनपक्षधर लाल-सलामी लेखक इन तथ्यों पर निगाह भी नहीं डालेगा। बस्तर मरता है तो मरे इससे किसको सरोकार? 

सच्चाई तो यही है कि जब 75 जवान मरे थे तब भी दिल्ली में खिलखिलाहट थी और जब 31 जनप्रतिनिधि मारे गये तब भी दिल्ली के कई बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग इसे तरह तरह से जस्टीफाई करने में लगे हैं। एक कविता कहती है कि जब नाजी कम्युनिष्टों के पीछे आये तब कोई नहीं बोला; तो बाद में सारे कम्युनिष्ट ही बंदूखें पकड कर बस्तर के जंगलों में नाजी बन गये; और खबरदार अब कोई मत बोलना? लाल-आतंकवादियों को साम्राज्यवादी कहने के पीछे मेरा तर्क वृथा भी नहीं है। यह बात तो सर्व-विदित है कि दरभा घाटी की घटना के पीछे आन्ध्र-ओडिशा-महाराष्ट्र-झारखण्ड के आतंकवादियों का हाथ था। एयरपोर्ट में मिलने वाला मंहगा पानी गटकने वाले आतंकवादी बस्तर को कैसा रखना चाहते हैं यदि इस बात को कोई प्रमाण के साथ समझना चाहता है तो आपको केवल इतना करना है कि सुकमा-कोण्टा मार्ग से हैदराबाद जाने वाली बस में बैठ जाईये। जबतक बस्तर है तब तक आपकी बस हिचकोले खाती हुई जायेगी। माओवादियों ने इस सड़क को इतनी जगह से काटा है कि अब गिनती करना मुमकिन नहीं है। लेकिन जैसे ही कोण्टा की सीमा समाप्त होती है और आन्ध्र लगता है तो चमत्कार नजर आता है। भाई यह भी तो माओवादी इलाका ही है लेकिन यहाँ की सड़क इतनी बढिया और फोर लेन? मैं जानता हूँ कि मेरी बात को कोई नहीं बूझ सकता - “लालबुझक्कड बूझगे और न बूझे कोय!!”

Saturday, July 06, 2013

दैनिक 'छत्तीसगढ' में राजेन्द्र यादव के हंस में प्रकाशित सम्पादकीय पर बहस

दैनिक 'छत्तीसगढ' में राजेन्द्र यादव के हंस में प्रकाशित सम्पादकीय पर बहस
[प्रतिवाद में मेरा आलेख भी पढें – “नक्सली हिंसा हिंसा न भवति”
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मित्रों, आज सांध्य दैनिक छत्तीसगढ में दो आलेख आमने – सामने की तर्ज पर प्रकाशित हुए हैं। एक आलेख है सम्पादक तथा वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव का जिन्होंने हंस पत्रिका के जुलाई अंक में “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” शीर्षक से साक्षात्कार शैली में सम्पादकीय प्रकाशित किया है। इस आलेख की मूल भावना मुझे छत्तीसगढ में हाल ही में हुए दुर्दांत और दु:खद नक्सली वारदात को सही ठहराती हुई प्रतीत हुई। राजेन्द्र यादव के आलेख के प्रतिवाद में मेरा आलेख प्रकाशित भी हुआ है - “नक्सली हिंसा हिंसा न भवति”। मेरे इस आलेख को प्रवक्ता तथा भडास4मीडिया ने भी प्रकाशित कर विरोध के स्वर को वेबमंच प्रदान किया था। आप छत्तीसगढ में प्रकाशित इस आलेख को छत्तीसगढ अखबार के ई-संस्करण से भी पढ सकते हैं।

यदि इस आलेख को प्रस्तुत पेपर कटिंग से न पढा जा सके तो निम्न लिखित लिंक में से किसी एक पर जा कर आप पढ सकते हैं -

दैनिक छत्तीसगढ (6 जुलाई का अंक पृष्ठ 8 पर मूल आलेख शेष भाग पृष्ठ 6 व 7 पर) -http://www.dailychhattisgarh.com/

प्रवक्ता वेब मंच - http://www.pravakta.com/rajendra-yadav-and-maoist-violence

भड़ास4मीडिया वेब मंच - http://www.bhadas4media.com/vividh/12772-2013-07-04-07-35-21.html

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राजीव रंजन प्रसाद का आलेख -

राजीव रंजन प्रसाद के आलेख का शेष भाग -


राजेन्द्र यादव का आलेख -

राजेन्द्र यादव के आलेख का शेष भाग -



“नक्सली हिंसा हिंसा न भवति” इति वदति “राजेन्द्र यादव” महोदय: – सही है सलमा नाचेगी। 
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हंस का जुलाई अंक पढा। संपादकीय पढने के बाद लगा कि रिटायरमेंट की एक उम्र तय होनी चाहिये। छोडिये, सचिन ही कब रिटायर होना चाहते हैं तो राजेन्द्र यादव की पारी भी जारी रहे। चर्चा पर उतरने से पहले राजेन्द्र यादव के बस्तर विषयक ज्ञान की गहरायी को उनके ही शब्दों में बयान करते हैं – “विडम्बना यह है कि हम यहाँ दिल्ली में एक एयरकंडीशनर कमरे में बैठ कर उनके बारे में बात कर रहे हैं जिनसे हमारा सीधा सम्बन्ध नहीं रहा। आज वहाँ के हालात की जमीनी जानकारी हमें नहीं है इसलिये हमारे लिये यह बैद्धिक और वैचारिक विमर्श है”। जी महोदय तो हाथी का कौन सा अंग दिखा सींग पकड़ में आयी या खुर देखे? यह ठीक है कि राजेन्द्र यादव माओवाद के समर्थक हैं और इस लिये वे बस्तर के दरभा में हुए हत्याकाण्ड को जस्टीफाई करना चाहते हैं लेकिन घडियाली ही सही दो आँसू अपने सम्पादकीय में उनके लिये भी बहा लेते जो निर्दोष मारे गये। राजेन्द्र यादव लिखते हैं तो सर्वज्ञ की तरह जबकि वे स्वीकारते हैं कि जमीनी हकीकत में टांय टांय फिश हैं लेकिन दावा देखिये निर्णायक स्टेटमेंट – “सलमा जुडुम को कभी आदिवासियों का समर्थन नहीं मिला, कर्मा और विश्वरंजन इसके मेन इंजीनियर थे”। कर्मा और विश्वरंजन की बात बाद में करते हैं पहले यह तो बतायें राजेंद्र जी आपके जुडुम में यह “सलमा” कौन है? हमने बस्तर में सलमा जुडुम जैसा कुछ सुना नहीं अलबत्ता सलवा जुडुम अवश्य सक्रिय रहा था। पहले “सलमा” पर ही बात हो जाये क्योंकि वास्तविक तथ्य सामने रखे नहीं कि आप कहेंगे अरे यह मामला था, हमने समझा कि वहाँ का कोई लोकल जलसा होगा और नचनिया सलमा को यूपी से बुलवाये रहे होंगे। 

राजेन्द्र यादव बस्तर में हुई दरभा घाटी की घटना पर इंटरव्यू शैली में आँखों देखा हाल धकेल मारते हैं और साफ करते हुए लिखते हैं कि “कर्मा इस हमले का टारगेट था क्योंकि उसने सलमा जुडुम चलाया था। एक और बात दिखाई देती है कि छत्तीसगढ सरकार नें इस दल का रूट बदलवाया था; बदले हुए रूट की जानकारी कहाँ से निकली है?......मारे गये लोगों में तीस लोग बताये जाते हैं जिसमे पाँच-छ: कांग्रेस के बडे नेता हैं। इनमे कुछ सुरक्षा गार्ड भी जरूर हताहत हुए होंगे”। पहली बात कि “मारे गये होंगे” का क्या मतलब है? देश भर में पढी जाने वाली पत्रिका के सम्पादक हैं आप, तो जिम्मेदारी से कोई तथ्य प्रस्तुत करते दिक्कत क्यों है? इस लिये कि सुरक्षा कर्मियों को गाली देते-देते तो प्रगतिशील राजनीति बीत गयी अब वो मारे भी गये तो क्या? किसी छोटे से छोटे अखबार को भी उठा कर एयरकंडीशनर ऑन करने के बाद पढने की जहमत उठाते तो विस्तार से जानकारी मिल जाती। मेरा प्रश्न इससे बड़ा है। क्या राजेन्द्र यादव जानते हैं कि परिवर्तन यात्रा अगर दूसरे मार्ग से निकली होती तब भी उस पर हमला हुआ होता और शायद और भी भयावह तरीके से? लगभग सौ सागवान के पेड़ राजेन्द्र यादव जी के पर्यावरण प्रिय क्रांतिकारियों ने काट कर इस दूसरे रास्ते में एन घटना के समय गिरा दिये गये थे। इस रास्ते में भी एम्बुश लगाया गया था और दंतेवाडा तथा जगदलपुर को जोडने वाले मार्ग पर एक महत्वपूर्ण पुल को दोनो ओर से आधा आधा काट कर रखा गया था जिससे यदि यात्रा इस मार्ग से भी गुजरे तो उसका वही हश्र हो जो दरभा घाटी में हुआ था। ये सभी जानकारियाँ तो सार्वजनिक हैं लेकिन राजेन्द्र जी के घर अखबार कौन सा आता है पता नहीं; हो सकता है कोई “जनचेतना का प्रगतिशील समाचार दैनिक” हो कि जो हमको हो पसंद वही न्यूज छपेगी। 

अब आते हैं उन तथ्यों पर जिसे राजेन्द्र यादव विमर्श कह रहे हैं। वे लिखते हैं कि “जहाँ अन्याय होगा और कहीं सुनवाई नहीं होगी तो लोग बंदूख उठायेंगे ही” इस ब्लाईंड स्टेटमेंट के जस्टीफिकेशन में वे लिखते हैं “इसे अराजक कहना ठीक नहीं। उनकी हिंसा में एक अनुशासन है। आज अगर अनुशासन नहीं होता तो वो इतना बढ नहीं सकते थे। अरुन्धति राय, गौतम नवलखा बहुत अंदर तक उनके साथ गये हैं और कई दिन तक उनके बीच रहे हैं; उन्होंने उनके बीच देखे जिस अनुशासन की प्रसंशा की है उसके बिना शायद इतने बडे कदम उठाये ही नहीं जा सकते थे”। सही है राजेन्द्र जी आपकी बात का मायना मैं निकालता हूँ कि हंस के सम्पादक के अनुसार अनुशासित नक्सलियों ने विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा, (नंद कुमार पटेल और उनके बेटे) आदि आदि कांग्रेसी नेताओं की हत्या का प्रसंशनीय बडा कदम उठाया। आपके छोडे ‘फिल इन द ब्लैंक’ का तो यही मायना निकलता है। कई प्रगतिशील, मुख्यधारा में बहने वाले लेखकों ने भी सोशल मीडिया से ले कर अखबारों तक लगातार हत्या का कारण महेन्द्र कर्मा के लिये सलवाजुडुम को और विद्याचरण शुक्ल को इमरजेंसी का अपराधी बता कर जस्टीफाई करते रहे (पटेल और उनके बेटे की हत्या को गोल कर गये।)। राजेन्द्र जी बस्तर बढिया पिकनिक स्पॉट भी है, घूम आते एक-आध बार। क्या बार बार अरुन्धति राय और गौतम नवलखा के लिखे की धौंस जमाते रहते हैं। क्या आपने वेरीफाई किया है उनकी जानकारियों को? अच्छा लिखा हैं उन्होंने खास कर अरुन्धति का वाकिंग विद द कॉमरेड्स। बारीक जानकारी है कि नक्सली क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, कहाँ सोते हैं, कहाँ धोते हैं आदि आदि। सम्पादक महोदय जरा इन किताबों को फिर से पलटिये और तलाशिये तो कि बस्तर के आदिवासी कैसे जी रहे हैं, किस तरह घुट घुट कर मर रहे हैं अगर कहीं दिख ही जाये आपको। आप भी तो जानें कि नक्सली और आदिवासी दो अलग अलग बाते हैं और इन्हें आप जैसे लोगों की फंतासियाँ ही एक इकाई प्रचारित करने में लगी हुई हैं। 

आपको व्यवस्था से शिकायत है तो हमे भी है लेकिन हमें नक्सलियों से भी शिकायत है और आप उनके सिद्ध हिमायती हैं इसलिये मुझे आपके लिखे को इतिहास ज्ञान के साथ टटोलना ही होगा। राजेन्द्र जी लिखते हैं कि आदिवासी-इलाकों से निकाले जाने वाले खनिजों के लिये करोडो अरबों का को लेन देन होता है, उसमे आदिवसियों का किसी तरह से भी कोई लेना देना नहीं होता। एक सौ प्रतिशत सत्य (राजेन्द्र जी सही कहें तो सहमत होना फर्ज है मेरा)। आपका संपादकीय दरभा घाटी की घटना पर केन्द्रित है अत: मैं बस्तर से इतर बात नहीं करूंगा। वहाँ बैलाडिला आईरन ओर परियोजना है जिसकी नींव तो अंग्रेजों के समय ही रखी गयी थी लेकिन प्रारंभ हुई 1968 से। इस परियोजना का मुख्यालय हैदराबाद बनाया गया अर्थात तत्कालीन नक्सलगढ आन्ध्रप्रदेश के हृदय क्षेत्र में; हमने तो इसके खिलाफ उनकी कोई हूक तब नहीं सुनी? 1966 में बस्तर के मान्य जनप्रतिनिधि प्रवीर चन्द्र भंजदेव की हत्या हुई, हमे कोई जानकारी नहीं कि तब वारंगल को अपना गढ बना चुके नक्सलियों ने प्रतिरोध का स्वर भी बुलंद किया था। सत्तर के दशक में बस्तर मे किरंदुल गोलीकांड हुआ और बैलाडिला में कार्यरत सैंकडो मजदूरों पर गोली चालन किया गया; कोई जानकारी हो नक्सलियों की ओर से प्रतिरोध की तो साझा कीजिये? अस्सी का दशक आने से पहले अबूझमाड़ को ले कर बस्तर के तत्कालीन कलेक्टर ब्रम्हदेव शर्मा नें निर्णय लिया कि इसे जिन्दा मानव संग्रहालय में बदल दिया जाये। न कोई भीतर जायेगा न बाहर आयेगा। उन्हें जीने दो उनकी जिन्दगी। ठीक है बहुत से प्रगतिशीलों को उनका निर्णय सही लगता होगा लेकिन फिर आन्ध्र प्रदेश में जब नक्सलियों के खिलाफ दमनात्मक कार्यवाईयाँ आरंभ हुई और वहाँ से कैडर अबूझमाड मे छिपने-भरने लगे तब आपके विरोध के स्वर कहाँ थे? क्यों यह आवाज़ नहीं आई कि मानव संग्रहालय है क्रांतिकारी महोदयो इसे छोड कर भी बहुत सी जगह खाली है बस्तर में? बस्तरिया हूँ इस लिये मेरी मत पढिये अरुन्धति की ही पढिये, नन्दिनी सुन्दर की ही पढिये और तभी भी यही आप जानेंगे कि कोंडापल्ली सीतारमैया नें पीपुल्स वार ग्रुप के गुरिल्लों को बस्तर इस लिये नहीं भेजा था कि “वीर गुरिल्लाओं वहाँ बहुत शोषण और अत्याचार है चलो उनके लिये लडते हैं”। यहाँ नक्सली इसलिये घुसे क्योंकि वे सुरक्षित पनाह चाहते थे जिसकी आधारशिला अबूझमाड में उनके स्वागत के लिये ही रखी गयी थी। 

छोडिये इतिहास में क्या रखा है? राजेन्द्र यादव जी कह रहे हैं तो बस्तर में चार-पाँच सौ खदाने तो जरूर होंगी? नहीं!! तो सौ पचास तो पक्का? इतनी भी नहीं? तो फिर? बैलाडिला तो दुनिया जानती है, रावघाट रिजर्व ओर है लेकिन अभी उत्पादन नहीं हुआ इसलिये अगले संपादकीय तक इसे भी छोडिये। अब मुझे केरल राज्य से भी बडे क्षेत्र बस्तर संभाग की खदाने गिनवाईये। ग्रेनाईट और लाईमस्टोन की कुछ गिनती की क्वेरिया अवश्य हैं लेकिन हमने तो यहाँ से नहीं सुना कि डिन, बॉक्साईत, हीरा, जस्ता अथवा यूरेनियम निकाला जा रहा हो। यह सब कुछ है बस्तर की धरती में। बोधघाट परियोजना अर्थात इन्द्रावती पर बांध बनने वाला था वह भी कुछ गैर सरकारी संगठनो और पर्यावरणवादियों के विरोध के कारण बंद हुआ और इसमे भी नक्सलियों की कोई भूमिका नहीं थी (आज जरूर वे नहीं बनने देंगे जैसे नारे लगाते पाये जाते हैं)। एक महोदय ने लिखा कि टाटा के साथ एमओयू हुआ इस कारण नक्सलवाद प्रबल हुआ। महाज्ञानी आन्ध्रप्रदेश में उसी समय चन्द्रबाबू नायडू के चलाये जा रहे अभियान को भूल जाते हैं जिसके दबाव में बहुत बडी संख्या में वहाँ के कैडर लाल-आतंकवाद की बनाई सुरक्षित पनाहगाह अबूझमाड में प्रविष्ठ हुए। राजेन्द्र जी बस्तर के भीतर भी उसकी अपनी आवाज़ जिन्दा है और वहाँ से भी शोषण, दमन और कॉरपोरेट दखल के खिलाफ आवाज़े उठती रही हैं लेकिन शस्त्र उठाने की नौबत क्यों? अगर टाटा बस्तर में काम नहीं कर पा रहा तो इसके लिये स्थानीय दबाव को धत्ता बता कर पूरा श्रेय आप नक्सलियों को दे देंगे; हद है? 

क्या आप जानते हैं कि सलवा जुडुम को ले कर बस्तर के भीतर भी कई स्वर पनप रहे थे। यह भी सच है कि सलवा जुडुम शुरु पहले हुआ और उसका नेतृत्व महेन्द्र कर्मा ने लपक लिया और बाद में प्रदेश की सरकार का भी समर्थन इसे प्राप्त हुआ। इस समय एक धडा अगर महेन्द्र कर्मा के साथ था तो दूसरा खिलाफ भी। इनकार नहीं कि सलवा जुडुम की परिकल्पना आदिवासियों की नक्सलियों के खिलाफ लामबंदी थी लेकिन विभीषिका यह कि दोनो ओर से आदिवासी ही एक दूसरे को मार काट रहे थे जिसका तमाशा नक्सलियों ने और व्यवस्था ने खूब देखा (राजेन्द्र जी इन समयों में आपके संपादकीयों की कमी बडी खली कहाँ गायब रहे?)। सलवा जुडुम और नक्सलवाद दोनो ओर से हुई हत्याओं का विस्तार से वर्णन करने के लिये तो यह आलेख छोटा है लेकिन यह भी आप जाने कि सलवा जुडुम के खिलाफ जो लडाई मुखर हुई है वह उन स्थानीय पत्रकारों के द्वारा लाये निकाले गये समाचारों के कारण ही हुई जिसने इस आन्दोलन कहे जाने वाली आदिवासी लामबंदी के राजनीतिक और अराजक पक्षों से सभी को परिचित कराया। एसी घटनायें हाथो हाथ अखबारों की सुर्खियाँ बनी और कई प्रगतिशील मासिकों ने इन्हें खूब प्रसारित किया। राजेन्द्र जी उन्हीं पत्रकारों ने नक्सलियों की करतूतो को भी अनेको बार सामने लाने का कार्य किया। कैसे हर घर से बच्चों को शामिल किया गया, महिलाओं की क्या स्थिति है, आदिवासियों के कैसे उन्होंने घर जलाये, किस तरह जन अदालतों में सजा देने के नाम पर जन-भय व्याप्त करने के लिये नृशंसता से गले काटे गये। ये वो खबरे थी जो दिल्ली में एयरकंडीशनर में विमर्श करने वालों के लिये मायने नहीं रखती थीं और उसपर प्रगतिशील फतबाधारी कि जागते रहो सब ठीक चल रहा है। राजेन्द्र यादव किस आधार पर लिखते हैं यह तो पता नहीं लेकिन उनके अनुसार “नक्सली जिन क्षेत्रों पर कब्जा करते हैं वहाँ विकास, शिक्षा, संगठन उनकी प्राथमिकता होती है”। जी सर जी समझ गये हम; आपने सुदूर संवेदन तकनीक से यह जान लिया होगा या हमे जानकारी नहीं मिली होगी और कभी आप “टेरर टूरिज्म” पर हो ही आये होंगे बस्तर। आपकी मासूमियत का तो मैं कायल हो गया, कितनी सफेदपोशी से आप नक्सली हिंसा को जस्टीफाई करते हुए लिखते हैं – “नक्सलियों के लिये यह अधिकारों और सिद्धांतो की लडाई है। लडाई कैसी भी हो इसमे मारे तो मासूम और निरीह भी जाते हैं”। राजेन्द्र जी कमाल की आईडियोलॉजी है न मौतो को जस्तीफाई करने वाली? पुलिसिया कार्यवाई में भी निरीह और मासूम मारे जा रहे हैं और उसकी हम पुरजोर भर्तसना करते हैं और हम एसा कर पाते हैं क्योंकि हम नक्सली हत्याओं की भी भर्त्सना करते हैं। वैसे आप ही सही हैं, कहते हैं पुराना चावल स्वादिष्ट होता है, रसीला भी होता ही होगा। आप अपने संपादकीय में मानते हैं कि इसी देश का एक वर्ग दूसरे हिस्से में चल रही जमीनी लडाईयों के बारे में कुछ भी नहीं जानता” और फिर आप ही सार्टिफिकेट भी बाँटते हैं कि “नक्सलियों की लडाई जल, जंगल और जमीन की सामूहिक लडाई है”। राजेन्द्र जी यह वाक्यांश सुनने में बडा ही ओजस्वी लगता है (काश एसा ही होता)। आपने कुछ और लडाईयाँ नहीं सुनी जैसे माओवादियों का ओडिसा कैडर, आन्ध्र कैडर से असंतुष्ट है या एमसीसी और पीडब्ल्युजी जैसे खांचे अभी भी मजबूत हैं। छोडिये आप साहित्यकार हैं इसलिये किताब ही पढिये। इसी कोलकाता पुस्तक मेले में शोभा मांडी नाम की एक पूर्व नक्सली महिला की पुस्तक “एक नक्सली की डायरी” सामने आयी थी; पढिये इसे भी, बलात्कार और शोषण की परिभाषा फिर चाहे नयी गढ लीजियेगा। फस्ट हैंड इंफॉर्मेशन है।.....और अगला संपादकीय भी बस्तर पर ही लिखिये; चाहें तो तरुण भटनागर जैसे किसी युवा कहानीकार की रचनात्मकता का गला दबाईये अगर वह जंगल के भीतर का कोई सच लिख लाये (पिछले साल का सपादकीय आपका ही)। कोई “जुडुम” महफिल सजाईये राजेन्द्र जी और जरा जोर से बजवाईये - सज रही देखो “सलमा” चुनर गोटे में पर ध्यान से, ढोल फट न जाये, पोल खुल न पाये। सही ही मानते हैं आप कि “नक्सली हिंसा हिंसा न भवति”। 


Wednesday, July 03, 2013

यहाँ कहाँ आ गये पागल [आकाश नगर से लौट कर]


जब मैं स्कूल में था उन दिनो बचेली नगर के लिये आकाशनगर एसा ही था जैसे कि देहरादून के लिये मसूरी। मैदानी नगर से लग कर अचानक उँचाई लेती हुई दो समानांतर पहाडियाँ जिनके बीचोबीच विभाजनकारी रेखा की तरह बहता है गली नाला। यह बैलाडिला पर्वत श्रंखला है जो स्वयं में समाहित विश्व के सर्वश्रेष्ठ स्तर के लौह अयस्क के लिये जानी जाती है। यही वह पर्वत श्रंखला है जिसके लिये एक समय में जमशेद जी टाटा ने रुचि दिखाई थी तथा सर्वप्रथम उनके भूवैज्ञानिक पी एन बोस ने प्राथमिक सर्वे पूरा किया था। जैसे ही इस लौह-अयस्क की जानकारी तत्कालीन अग्रेजी शासकों को मिली तुरंत ही भूवैज्ञानिक क्रूकशैंक के नेतृत्व में इस क्षेत्र का भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने विस्तृत सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के अनुसार लौह के चौदह भण्डारों को चिन्हित किया गया। बस्तर अचानक एक अत्यंत गरीब से बेहद अमीर रियासत हो गयी तथा यहाँ के शासकों पर दबाव बनाया जाने लगा कि बैलाडिला पर्वत श्रंखलाओं वाले क्षेत्र को हैदराबाद के निजाम को सौंप दिया जाये। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनथिनगो ने तब बस्तर की शासिका रही महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी से इस सम्बन्ध में मुलाकात भी की थी। कहते हैं महारानी अपने पति प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव से प्रभावित थी जो कि राष्ट्रीयता की भावना से भरे हुए थे, उनकी ही सलाह पर महारानी ने बैलाडिला पर अपनी असहमति जाहिर कर दी थी। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी की मौत स्वाभाविक नहीं थी अपितु उनकी हत्या अंग्रेजों के द्वारा बैलाड़िला को हथियाने की दृष्टि से की गयी थी। बाद में यही दबाव प्रवीर पर भी बनाया जाने लगा और स्वतंत्रता प्राप्ति के एन पहले प्रवीर को सभी राज्याधिकार केवल इसी लिये प्रदान किये गये थे जिससे कि वे निजाम के हाथों इन खदानो वाले क्षेत्रों को सौंप सकें। यह प्रवीर की समझ थी कि उन्होंने एसा नहीं किया यद्यपि खदानों के कुछ हिस्सों को वे सशर्त लीज पर निजाम को देने के लिये तैयार हो गये थे। यह सारी रस्साकशी केवल इसलिये हो रही थी चूंकि हैदराबाद का निजाम स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संघ में नहीं रहना चाहता था और एक स्वतंत्र देश की संकल्पना कर रहा था। बैलाडिला की इन खदानों पर भारत सरकार द्वारा वर्ष 1968 से कार्यारंभ किया गया। वैसे इतिहास मे रुचि रखने वालों के लिये यह जानकारी महत्व की हो सकती है कि यहाँ से लौह उत्खनन पहली बार नहीं किया गया अपितु 1065 ई में चोलवंश के राजा कुलुतुन्द ने यहाँ लोहे को गला कर अस्त्र शस्त्र बनाने का कारखाना लगाया था। यहाँ बने हथियारों को तंजाउर भेजा जाता था।

बस्तर क्षेत्र में आज यही एक मात्र ऑरगेनाईज्ड माईनिंग है इसके अलावा किसी भी खदान में कोई काम नहीं हो रहा। असंगठित खदानों के रूप में ग्रेनाईट और लाईमस्टोन क्रशिंग और माईनिंग कई स्थानों पर सक्रिय है। संभावित खदानों में रावघाट परियोजना हो सकती है जिसका भविष्य अधर में ही लटका हुआ है। केरल राज्य से भी बडे इस संभाग में इससे अधिक कोई माईनिग कहीं भी नहीं हो रही है यद्यपि यहाँ खनिजों के अपार भण्डार उपस्थित हैं। तोकापाल के पास ही एक बडे किम्बरलाईट पाईप को खोजा गया था जहाँ से हीरे उत्खनित करने की अभी कोई योजना नहीं है। हालाकि सारी बहसें जो दिल्ली में बैठ कर बस्तर के नाम पर हो रही हैं वे खदानों को ही केन्द्र में रख कर हो रही हैं। कभी कभी मैं दिल्ली के अखबार पढ कर हँसता हूँ कि क्या समाचार बिना जमीनी जानकारी के लिखे अथवा तैयार किये जाते हैं? बैलाडिला खदानो के अपने फायदे और नुकसान हैं साथ ही अन्य खदाने अगर अस्तित्व में आयीं निश्चित ही उनके अपने फायदे-नुकसान सन्निहित होंगे। तथापि दक्षिण बस्तर में एसा कोई परियोजना मेरी जानकारी में नहीं है जिसके हाल में अस्तित्व में आने की संभावना भी दूर दूर तक है। रावघाट पहाडियों से भी उत्खनन इतनी आसानी से संभव हो सकेगा मुझे नहीं लगता। 

आज इस लेख में मेरा उद्देश्य बस्तर के खनिजों को ले कर कोई बहस खडी करने का नहीं है। इस पर तथ्यों के साथ विस्तृत परिचर्चा फिर कभी। आज बात उजडे आकाश नगर की। यह पूरा नगर अब बचेली ला कर बसा दिया गया है। कभी घुमावदार सड़कों से हो कर आकाश नगर पहुँचने का आनंद और उसकी नैसर्गिकता ही अब समाप्त नहीं हो गयी अपितु लाल-आतंक के साये में यह पूरा इलाका गहरी गहरी सांस लेता प्रतीत होता है। आकाश नगर में मुट्ठी भर सिपाही सुरक्षा के नाम पर तैनात हैं लेकिन उन्हें सारा जोर स्वयं को ही सुरक्षित रखने पर लगाना होता है। वह आकाश नगर जो मानसून आते ही बादलों के स्पर्श से मुस्कुराता था आज खामोशी और दहशत यहाँ की पीड़ा है। जिन रास्तों से हो कर कभी हम एतिहासिक राजा बंगला जाते थे वहाँ कदम रखने की भी अघोषित मनाही है, किस कदम पर क्या हो जाये कहा नहीं जा सकता। ऊँचाई पर खडा हो कर मैं देख रहा था एक ओर घना जंगल जिसके भीतर भीतर आ घुसा नक्सलगढ। दूर दूर तक दिखने वाला एक व्यक्ति भी नहीं। कहीं कोई जिन्दादिली नहीं। हवा भी सहम कर कहती है कि यहाँ कहाँ आ गये पागल!! जल्दी निकलो यहाँ से।   
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नक्सलवाद से आदिवासियों का कोई सम्बन्ध नहीं है [महेन्द्र कर्मा से बातचीत]

यह साक्षात्कार 25.05.2013 को दैनिक छत्तीसगढ में प्रकाशित हुआ था -

साक्षात्कार का शेष भाग -




Tuesday, April 30, 2013

पुरुषोत्तमदेव, रथयात्रा तथा बस्तर का समाजशास्त्र



जनजातीय विकास के विभिन्न चरणों को वहाँ की राजनीति के क्रमबद्ध अध्ययन के बिना समझना कठिन प्रतीत होता है। जैसे बस्तर में अपने समय के साम्राज्यवादी शासकों की छाया पड़ी, धार्मिक आन्दोलनों का असर हुआ वैसे ही हर शासन व्यवस्था के उत्थान और पतन के साथ जनजातिगत समीकरणों में भी नई युतियाँ अथवा नव-समावेश देखे गये। यहाँ तक कि जब एक नया शासक वर्ग उदित हुआ तो दूसरे शासक वर्ग के वंशजो ने वनों के भीतर पलायन कर स्वयं को सुरक्षित करना उचित समझा। निश्चित ही यह प्रक्रिया नये तरीके के सांस्कृतिक समन्वयों को गढ़ती रही तथा नवीन परम्पराओं का भी समुद्भव होता रहा। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी किंतु राजा पुरुषोत्तम देव के शासन काल में बस्तर में नये सामाजिक समीकरण बने। इस संदर्भ को समझने के लिये काकतीय/चालुक्य नरेश पुरुषोत्तमदेव के शासन काल की कुछ प्रमुख विशेषताओं का अवलोकन किया जाना आवश्यक है। पुरुषोत्तमदेव के पूर्ववर्ती शासक भैरवदेव (1410-1468) के शासन काल के सम्बन्ध में ओड़िशा की प्राचीन साहित्यिक कृतियों में उल्लेख मिलता है कि उनके पिता हमीर देव (1369-1410) को पाटणा की सत्ता से युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई। भैरवदेव पर निश्चित ही पाटणा नरेश का दामाद होने के पश्चात भी गंग शासकों का दबाव बना रहा होगा। यद्यपि बस्तर में उपलब्ध राजवंशावलियाँ ओड़िशा के इस दावे को पुख्ता नहीं करती। यहाँ उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार भैरमदेव का शासनकाल यद्यपि उथल-पुथल भरा रहा किंतु यह गंग शासकों का उपनिवेश हर्गिज नहीं था। भैरवदेव की दो रानियाँ थीं मेघई अरिचकेलिन तथा जानकी कुँवर। रानी मेघई शिकार की शौकीन थीं। उनकी कालबान नाम की बंदूख देखने योग्य है। इसे दो व्यक्ति मिल कर भी उठाने की क्षमता नहीं रखते हैं। मेघई अरिचकेलिन एक वीरांगना थी जिन्होंने स्वयं नाग सरदारों के विद्रोह का दमन कर बस्तर शासन को स्थायित्व व शांति प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। प्रो. वल्र्यानी तथा साहसी ने अपनी पुस्तक बस्तर का राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहासमें लिखा है कि भैराजदेव नाम मात्र के शासक थे। उनके शासन का संचालन मेघावती द्वारा किया जाता था। रानी मेघावती (मेघई अरिचकेलिन) के शिकार की कथायें सदियों से चित्रकोट अंकल में प्रसिद्ध हैं। आगे चल कर रानी मेघावती की कालवान बंदूख को दशहरा अवसर पर अस्त्र-शस्त्र पूजा में सम्मिलित किया गया। कालवान बन्दूख की नली इस समय बची हुई है। यह भी माना जाता है कि एक समय प्रचलित चित्रकोट के मंधोता में गाड़ी में बैठ कर शिकार खेलने की परम्परा की जनक रानी मेघई अरिचकेलिन ही थीं। यही नहीं माना जाता है कि दंतेवाड़ा मंदिर की मेघी साड़ीभी मेघई रानी ने ही देवी को अर्पित की थी। इतनी विवेचना के पश्चात यह लिखना उचित ही होगा कि मेघई रानी वस्तुत: कोषकुण्ड (वर्तमान कुआकोण्डा) के महामेघवंशी जमीन्दार की पुत्री रही हैं। यदि बस्तर को चौहानो अथवा गंगो का उपनिवेश न भी स्वीकार किया जाये तब भी यह मानना ही होगा कि भैरवदेव का समय नाग-विद्रोहों के दमन का गंगो-चौहानों के दबावों से भरा तथा यदा-कदा रेड्डियों के आक्रमण का भी सामना करना पड़ा है। आर सुब्रमण्यम ने दि सूर्यवंशी गजपतिज ऑफ ओड़िशामें जिक्र किया है कि ओड़िशा के गजपति राजा कपिलेन्द्र (1435-1468 ई) से भैरवदेव का इन्द्रावती तथा गोदावरी के मध्य की उर्वरा भूमि पर स्वामित्व को ले कर संघर्ष हुआ जिसमें राजा भैरवदेव मारे गये। यह सूत्र भी बस्तर वंशावली गाथाओं से पुष्ट नहीं होता।

भैरवदेव के बाद बस्तर पर शासन करने वाले चौथे राजा हुए - पुरुषोत्तम देव (14681534 ई.)। राजा ने रायपुर के कलचुरी शासकों पर चढ़ाई कर दी। दुर्भाग्यवश पराजित हो गये। इधर बस्तर सेना ने रायपुर पर आक्रमण किया, उधर कलचुरी राजा ब्रम्हदेव ने रतनपुर रियासत से सहायता माँगी। रतनपुर के राजा जगन्नाथ सिंह ने सेना भेज दी। संयुक्त सेनाओं ने चौतरफा आक्रमण किया। भगदड़ मच गयी। राजा पुरुषोत्तम देव अपने हाथी को युद्धभूमि से भगा ले गये। कलचुरियों की सेना पीछे लगी हुई थी। इससे पहले कि पुरुषोत्तम देव शत्रु सैनिकों द्वारा पकड़े जाते, एक सेनापति ने अपने वस्त्र राजा को पहना दिये। राजा उस सेनापति के घोड़े पर सवार बस्तरकी ओर भाग निकले। इतिहासकार डॉ. के के झा बताते हैं कि प्रतिवर्ष सम्पन्न बस्तर दशहरा में रथ के उपर खड़े हो कर एक व्यक्ति द्वारा वस्त्र खण्ड को लगातार हाँथ से दूर करने तथा समेटने की जो क्रिया सम्पन्न की जाती है वह इसी घटना की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिये है। यहाँ यह भी जोड़ना आवश्यक होगा कि पुरुषोत्तम देव के पलायन के पश्चात भी कलचुरियों ने पलट कर बस्तर भूमि पर आक्रमण नहीं किया। जिससे यह सिद्ध होता है कि भले ही विजय अभियान असफल हो गया हो तथापि पुरुषोत्तम देव शक्तिशाली शासक थे। उनके शासनकाल में ही राजधानी को मंधोता से हटा कर बस्तर लाया गया था। 

राजा पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी की तीर्थयात्रा पेट के बल सरकते हुए की थी। जगन्नाथपुरी के राजा ने उनका भरपूर स्वागत किया तथा वहाँ उन्हें रथपतिकी उपाधि से विभूषित किया गया। पुरी के राजा ने मंदिर के पुजारी के माध्यम से 16 पहियों का रथ प्रदान किया। रथ के साथ सथ भगवान जगन्नाथ तथा सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियाँ भी बस्तर लायी गयीं। राजा ने बस्तर लौट कर दशहरे के अवसर पर रथयात्रा निकालने की परम्परा आरंभ की। राजा की जगन्नाथपुरी यात्रा की स्मृति को जीवित रखने के लिये बस्तर में गोंचापर्व भी मनाया जाता है। स्थानीय ग्रामीण बाँस की छोटी छोटी नलियाँ बनाती हैं। ये यह नलियाँ तुपकीकहलाती है। इसमें मालकांगनी का फल रख कर बाँस की लकड़ी के दबाव से गोली की तरह चलाया जाता हैं।

पुरुषोत्तमदेव के समय की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना है कालापहाड़ का आक्रमण। कालापहाड़ के सम्बन्ध में केदारनाथ ठाकुर ने विस्तार से जानकारी दी है कि काला पहाड़ का वास्तविक नाम संभवत: कालचन्द्र रहा होगा जो कि बंगाल के पठान सुल्तान बाबेकशाह की सेना में उच्च पद पर कार्यरत था। उसे सुल्तान की कन्या दुलीमा से प्रेम हो गया। अनेक अडचनों के बाद दुलीमा से उसका निकाह तो सम्पन्न हो गया किंतु तत्कालीम पंडितों ने उसे हिन्दू धर्म से बहिष्कृत कर दिया। एक सम्पन्न ब्राम्हण कुल में जन्मे तथा उच्च सैनिक पद पर आसीन इस व्यक्ति ने बहिष्कार को अपना घोर अपमान करार दिया। उसने इस्लाम ग्रहण किया तथा अपना नाम मोहम्मद कामूली रख लिया। दिल्ली के शासक बहलोल लोदी (1451-1488) से भी उसकी मित्रता थी अत: एक बड़ी सेना संग्रह कर वह अपने अपमान को क्रूरता से सहलाने लगा। उसने हजारो विधर्मियों का कत्लेआम किया; अनेक मंदिर व देव प्रतिमाओं को नष्ट किया।  उसके कुकृत्यो व दहशत ने उसे प्रचलित नाम दिया काला पहाड़। काला पहाड़ ने ओड़िशा, आन्ध्र, कामरूप, दीनाजपुर, रंगपुर, कूचबिहार, जौनपुर तथा देवबनारस के साथ साथ बस्तर पर भी आक्रमण किया था।       

डॉ. हीरालाल शुक्ल मानते हैं कि कलचुरियों से युद्ध में 1534 ई. में राजा पुरुषोत्तमदेव की मृत्यु हुई। यद्यपि कलचुरियों के बस्तर पर शासन करने अथवा किसी अन्य प्रकार के हस्तक्षेप की कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं होती। 1534 ई. में राजा पुरुषोत्तम देव मृत्यु के बाद जयसिंहदेव ने चौबीस वर्ष और फिर नरसिंह देव ने 1558 ई. से शासन किया। इन दोनों ही राजाओं के शासन आम तौर पर शांतिपूर्ण थे। यदि हम राजा पुरुषोत्तम देव के समय की महत्वपूर्ण घटनाओं की विवेचना करते हैं तो उनके समय की कई गतिविधियों, निर्णयों व कार्यों का आज भी असर पाते हैं। क्या बस्तर ग्राम एवं राजधानी को ले कर आना ही काकतीयों/चालिक्यों के शासित क्षेत्र का नाम बस्तर कर देता है? यह भी एक प्रबल संभावना है। बस्तर दशहरा की प्रसिद्ध रथयात्रा व कृष्ण-बलराम-सुभद्रा पूजन जैसी अन्य परम्परायें भी उनकी ही देन हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पुरुषोत्तम देव अपने साथ पुरी से अनेक ब्राम्हण, पंड़ा, शिक्षाशास्त्री तथा सबरा जाति के लोगों को ले कर लौटे थे जो बस्तर में ही बस गये। इतना ही नहीं राजा पुरुषोत्तमदेव की जगन्नाथपुरी यात्रा में उनके साथ बस्तर से जो आदिवासी गये थे उन्हें लौट कर राजा ने भद्र कह कर संबोधित किया तब से ही वे आदिवासी और उनके वंशज भतरा कहलाने लगे। जनजातीय समाज में ये बड़ी घटनायें थी जिनपर किसी समाजशास्त्री ने विवेचना प्रस्तुत नहीं की है। यह आगमन किसी आक्रांता का नहीं था। ये लोग जो राजा के साथ आये थे अपने साथ बिलकुल ही भिन्न सामाजिक परिवेश की पहचान ले कर पहुँचे थे। वे अपने साथ पूजा-पाठ-कर्म-काण्ड-पोथी-पतरी थामे हुए बस्तर पहुचे थे तथा उन्हे सीधे राजाश्रय भी प्राप्त हो गया था। इस दृष्टि से जनसंख्या में भले ही यह एक बहुत ही छोटा समूह जुड़ा किंतु प्रभाव की दृष्टि से एक वृहत घटना माना जाना चाहिये। यदि केवल दशहरा के ही पूजा अनुष्ठानों को ध्यान दे देखा जाये तो इसमे आदिवासी परम्पराओं और ब्राम्हण परम्पराओं का जबरदस्त घालमेल है। यहाँ पुजारी भी हैं तो सिरहा भी है; यहाँ अनुष्ठान हैं तो बलि भी है; यहाँ दंतेश्वरी और मावली माता हैं तो काछनदेवी भी है। एक आदिवासी समाज को भद्र कहे जाने और फिर भतरा के रूप में उन्हें एक पहचान मिलने की घटना के भी अनेक समाजशास्त्रीय दृष्टि से विवेच्य दूरगामी परिणाम हुए। पुरुषोत्तमदेव का समय बस्तर के समाज में बदलाव का एक बड़ा पड़ाव है जिसकी विस्तृत विवेचना से बस्तरिया सामाजिक संगठन की अनेक परतें खोली जा सकती हैं। समाजशास्त्र को भी इतिहास मे झांकना होगा अगर बस्तर की अबूझियत को पढ़ने की कोई इच्छाशक्ति किसी में है।      
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Thursday, April 25, 2013

अन्नमदेव एक किंवदंतियाँ अनेक

दिनांक 23.04.2013 को सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित 

यह समझने की कोशिश करनी चाहिये कि अन्नमदेव की उस व्यापक युद्ध विजय का क्या रहस्य था जिसमे वे प्रत्येक चरण पर सफलता का ध्वज बुलन्द करते जा रहे थे। भोपालपट्टनम में इन्द्रावती तथा गोदावरी नदी के पावन संगम पर अपना युद्धाभियान आरंभ करने से पूर्व अन्नमदेव के द्वारा शिव पूजा किये जाने का उल्लेख प्राप्त होता है जिसके पश्चात उसका विजय अभियान चक्रकोट मे अंतिम रूप से छिन्दक नाग राजा हरिश्चंददेव को पराजित किये जाने तक जारी रहता है। इतने शांतिपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का उदाहरण भारतीय इतिहास में तलाश करने से भी नहीं मिलेगा जहाँ धीरे धीरे आक्रांता ही प्रजाप्रिय होता गया और छ: सौ सालों से शासक रहे नाग सत्ताच्युत हो कर स्थानीय जनजातियों के भीतर ही अपने अस्तित्व को घुला बैठे। अन्नमदेव के पास वारंगल जैसे बडे राज्य के अधिपति का भाई होने के कारण वृहद प्रशासकीय अनुभव होना स्वाभाविक था जिसका कि लम्बे समय से विकेन्द्रित होते जा रहे छिन्दक नागों में अभाव होने लगा था। अन्नमदेव पतन देख कर आ रहे थे अत: पतनोमुख नागों की मनोवृति तथा अनेकता के दुष्परिणामों से भी वे वाकिफ थे।

क्या आरंभ से ही उन्होंने बस्तर की आत्मा को समझने का प्रयास किया था? देखा जाये तो एक केन्द्रीय सत्ता की स्थापना 1324 ई के लगभग हो जाती है लेकिन नाग शासकों द्वारा चले आ रहे सामंतवादी ढाँचे से आरंभ में बहुत ही कम छेड छाड की गयी। बस्तर राज वंशावली (अप्रकाशित; रिकॉर्ड रूम जगदलपुर; लोकनाथ ठाकुर 1853) के अनुसार अन्नमदेव के वे अस्त्र-शस्त्र दिव्य थे जिससे उसने बस्तर राज्य पर विजय पायी तथा राजा को दिल्लीश्वरी, भुवनेश्वरी, मणिकेश्वरी तथा दंतेश्वरी देवियों का आशीष प्राप्त था – “दिल्लीश्वरी श्री भुवनेश्वरी च, मणुक्यदेवी शुभदंतिकेश्वरी। बाणं त्रिशूलं त्वथ शक्तिखड़्गे, क्रमेण देव्या: प्रददुनृरपाय। युद्ध में पराजित होने वाले राजाओं के साथ कठोर व्यवहार का उल्लेख किसी इतिहासकार ने नहीं किया है अपितु सत्ता परिवर्तन के दौर में अधिकतम या तो स्वत: पलायन कर गये अथवा संधि के मार्ग पर चल निकले या कि आत्मसमर्पण कर दिया। अन्नमदेव नें व्यवस्था बनाने रखने के लिये स्थान स्थान पर तेलगा और हलबा जाति के सैनिकों की चौकियाँ स्थापित की एवं मध्यवर्ती क्षेत्रों की जमीनदारी अपने विश्वासपात्रों को ही प्रदान की जैसे नाहर सिंह पामभोई को उन्होंने भोपालपट्टनम का जमीन्दार बनाया तो कुटरू की जमीन्दारी सामंत शाह को प्रदान की। एसे कुछ उदाहरणों के अतिरिक्त अन्नमदेव नें स्थानीयता का बेहद गहरे जा कर सम्मान किया तथा यहाँ की परम्पराओं के भीतर ही स्वयं को प्रतिस्थापित करने की कोशिश की। यही कारण है कि उनकी प्रसंशा में जो कुछ अतीत में लिखा जाता रहा वह उन्हें अद्भुत सिद्ध करता है।

स्वयं को सर्व-मान्य बनाने के लिये अन्नमदेव नें न केवल जनजातीय संतुलन को ध्यान में रखा अपितु अनेक धार्मिक मान्यताओं को राजकीय बना दिया। यह जानबूझ कर हुआ अथवा उनकी अविश्वसनीय विजय के फलस्वरूप हुआ किंतु वे स्वयं भी उन मिथकों का हिस्सा बन गये तो आज भी जनश्रुतियाँ है। वस्तुत: मणिकेश्वरी देवी तथा दंतेश्वरी देवी को ले कर इतिहासकारों में भ्रम की स्थिति आज भी है। डॉ. हीरालाल शुक्ल अपनी पुस्तक बस्तर के चालुक्य और गिरिजन में लिखते हैं कि कुछ लोगों का कहना है कि दंतेश्वरी की प्रतिमा दंतेवाड़ा में पहले से ही स्थापित थी तथा अन्नमदेव मणिकेश्वरी को वारंगल से ले कर आया था ( रसेल, 1908; दिब्रेट 1909)। स्मरणीय है कि नागवंशीय नरेशों की ईष्टदेवी भी मणिकेश्वरी थीं। एसा अनुमान किया जा सकता है कि कालांतर में मणिकेश्वरी देवी ही दंतेश्वरी नाम से परिणत हो गयीं।इसी बात को लाला जगदलुरी भाषा साम्यता से जोडते हुए आगे बढाते हैं। लाला जगदलपुरी लिखते हैं अन्नमदेव जब चक्रकोट की सीमा में प्रविष्ट हुए थे, तब उन दिनों छिन्दक नागवंशी राजाओं का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया था। अंतिम नागवंशी नदेश हरिश्चंद देव को अन्नमदेव ने पराजित किया और बीजापुर, भैरमगढ तथा बारसूर पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। थोडे समय तक बारसूर मे रह कर दंतेवाडा की ओर चल पड़े। दंतेवाड़ा में अन्नमदेव ने कुछ समय तक अपनी राजधानी चलाई। दंतेवाड़ा को उन दिनो तारलागुडा कहते थे। बारसूर की प्राचीन दंतेश्वरी गुडी को नागो के समय पेदाअम्मागुडी कहा करते थे। तेलुगू में बडी माँ को पेदाअम्मा कहा जाता है। तेलुगु भाषा नागवंशी नरेशों की मातृभाषा थी। वे दक्षिण भारतीय थे। बारसूर की पेदाअम्मागुडी से अन्नमदेव ने पेदाअम्मा को दंतेवाड़ा ले जा कर मंदिर में स्थापित कर दिया। तारलागुड़ा में जब देवी दन्तावला अपने मंदिर में स्थापित हो गयी तब तारलागुडा का नाम बदल कर दंतावाड़ा हो गया। उसे लोग दंतेवाडा भी कहने लगे” (बस्तर- लोक कला संस्कृति प्रसंग; लाला जगदलपुरी; 2003)

यद्यपि दंतेश्वरी देवी के मिथकों का अन्नमदेव के विजय अभियान के साथ जुडा होना एतिहासिक तथ्यों को किसी अंतिम निष्कर्श पर नहीं पहुँचने देता कि वास्तव में दंतेश्वरी देवी वारंगल से बस्तर लायी गयीं अथवा वे मणिकेश्वरी देवी का ही बदला हुआ स्वरूप है अथवा मे बस्तर में पहले से ही स्थापित रही कोई देवी हैं जिसे अन्नमदेव नें अपने विजय अभियान के साथ जोड कर स्वयं को इसी धरती का प्रतिनिधि बनाने की सफल कोशिश की। इस सम्बन्ध में एक ज्ञात विवरण है कि उस समय दंतेश्वरी माई नें उन्हें एक उत्तम वस्त्र दिया और आशीर्वाद दिया कि इस वस्त्र को पहनने से तू विजयी होगा।....इसी वस्त्र से मालूम होता है राज्य का नाम बस्तर पड़ा हो” (बस्तर भूषण, केदार नाथ ठाकुर; 1908)। इसी बात को अपने शब्दों में अंतिम काकतीय नरेश प्रवीर चन्द्र भंजदेव नें भी शब्द दिये हैं – “अन्नमदेव अपने बचपन में प्रतिदिन कागज में कुछ लिख कर देवी दंतेश्वरी को चढाते थे। देवी नें प्रसन्न हो कर उन्हें कोई वर माँगने को कहा। अन्नमदेव ने अपने पिता से पूछ कर देवी से राज्य की याचना की। देवी ने कहा राजा आगे आगे चले और देवी पीछे पीछे। राजा जहाँ तक पीछे मुड़ कर नहीं देखेगा, उसका राज्य वहाँ तक विस्तृत होगा। राजा आगे बढता गया किंतु पैरी नदी की रेत मे देवी के पैर धँस जाने पर पायल की आवाज़ रुक गयी। कौतूहलवश राजा ने पीछे मुड़ कर देख लिया (राजिम के निकट)। अत: राजा के राज्य की सीमा वहीं समाप्त हो गयी” (लौहण्डीगुड़ा तरंगिणी; प्रवीर चन्द्र भंजदेव; 1963)

वस्तुत: जनजीवन को उसकी नब्ज के साथ ही थामा जा सकता है इस दृष्टि से अन्नमदेव आक्रांता हो कर भी नायक बन गये। वारंगल से आ कर सत्ता स्थापित करने के बाद भी अन्नमदेव को आक्रांता की दृष्टि से कम और एक देवी-उपासक के रूप में अधिक देखा गया। उनकी विजय को स्वाभाविक मान लिया गया क्योंकि यही प्रचारित था कि विजय तो देवी की कृपा से प्राप्त हुई है तथा जहाँ जहाँ तक देवी के वस्त्र को फैलना अथवा बिना पीछे मुडे राजा को चलना था वहाँ तक स्वत: अन्नमदेव का अधिकार हो ही जाना था। जन श्रुतियों, जन परम्पराओं तथा लोक कथाओं का हिस्सा बनते बनते अन्नमदेव आसानी से एक जननायक बन गये जिसने बस्तर के इतिहास को एक नया आकार प्रदान किया। उपसंहार में एक लोकगीत (डॉ. हीरालाल शुक्ल की कृति बस्तर के चालुक्य और गिरिजन में संकलित) जिसका संबंध बस्तर के प्रथम काकतीय नरेश अन्नमदेव से है तथा जिसे आज भी दशहरा पर्व के अवसर पर सुना जा सकता है -

वरंगा हस्तना ले उतरै महाराज
मंधोता में डेरा लिहिन आज
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

आधा गढ, मंधोता, टीकागढ, डोंगर
छलेगढ, कोटपाड़, गुरुघर, माझीपाल
किलाघर बस्तर तुम्हार
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

गुड़ी दरबारा एबे बैठे महाराज
रंगीन के माहला लागै
आज होरे दरबार लागै
आज हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

नेगी असा बैठे, जोगी असा बैठे
बैठे सैदार बैदार वहाँ
बैठे नेगी कपडदार
हुजूर प्रभु बाना बाँधे।

यह गीत केवल अन्नमदेव के विजय की ही गाथा प्रस्तुत नहीं करता अपितु बाद में स्थापित राजकीय व्यवस्था और सामाजिक ताने बाने को अपने साथ जोडने की अन्नमदेव की वृत्ति को भी अपनी अंतिम पंक्तियों में प्रस्तुत करता है। किंवदंतिया केवल पढ कर भूल जाने के लिये नहीं होती अपितु अन्नमदेव के उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि इनका प्रयोग किसी राजनीति को भी सफल कर सकता है, कोई इतना गहरे जुडे तो।

Thursday, April 11, 2013

वीरांगना चमेली बावी: एक अविस्मरणीय समर गाथा

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 9.04.2013 को प्रकाशित

रात बहुत हो चुकी थी लेकिन अन्नमदेव अभी सोये नहीं थे। उनकी आँखों के आगे रह रह कर उस वीरांगना की छवि उभर रही थी जिसनें आज के युद्ध का स्वयं नेतृत्व किया। नीले रंग का उत्तरीयांचल पहने हुए वह वीरांगना शरीर पर सभी युद्ध-आभूषण कसे हुए थी जिसमें भारी भरकम कवच एवं वह लौह मुकुट भी सम्मिलित था जिसमें शत्रु के तलवारों के प्रहार से बचने के लिये लोहे की ही अनेकों कडिया कंधे तक झूल रही थीं। वीरांगना नें अपने केश खुले छोड दिये थे तथा उसकी प्रत्येक हुंकार दर्शा रही थी जैसे साक्षात महाकाली ही युद्ध के मैदान में आज उपस्थित हुई हैं। अन्नमदेव हतप्रभ थे; वे तो आज ही अपनी विजय तय मान कर चल रहे थे फिर यह कैसा सुन्दर व्यवधान? उन्हें बताया गया था कि यह राजकन्या चमेली बावी है जो नाग राजा हरीश्चंद देव की पुत्री है। अन्नमदेव पुन: उस दृश्य को आँखों के आगे सजीव करने लगे जब युद्धक्षेत्र में राजकुमारी चमेली बावी अपनी दो अन्य सहयोगिनियों झालरमती नायकीन तथा घोघिया नायिका के साथ काकतीय सेना पर टूट पडी थीं। इतना सुव्यवस्थित युद्ध संचालन कि अपनी विजय को तय मान चुकी सेना घंटे भर के संघर्ष में ही तितर-बितर हो गयी और स्वयं अन्नमदेव पराजित तथा सैनिक सहायता के लिये प्रतीक्षारत तम्बू में ठहरे हुए यह प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब बारसूर और किलेपाल से उनके सरदार अपनी अपनी सैन्य टुकडियों के साथ पहुँचे और पुन: एक जबरदस्त हमला चक्रकोटय के अंतिम नाग दुर्ग पर किया जा सके।

अगले दिन की सुबह का समय और विचित्र स्थिति थी। आक्रांता सेना अपने तम्बुओं में सिमटी हुई थी जबकि वीरांगना चमेली बावी अपने शस्त्र चमकाते हुए अपनी सेना के साथ आर या पार के संघर्ष के लिये आतुर दिख रही थी। वह अन्नमदेव जिसने अब तक गोदावरी से महानदी तक का अधिकांश भाग जीत लिया था एक वृक्ष की आड से मंत्रमुग्ध इस राजकन्या को देख रहा था। चक्रकोट्य में आश्चर्य की स्थिति निर्मित हो गयी चूंकि इस तरह काकतीय पलायन कर जायेगे सोचा नहीं जा सकता था। तभी एक घुडसवार सफेद ध्वज बुलंद किये तेजी से आता दिखाई दिया। उसे किले के मुख्यद्वार पर ही रोक लिया गया। यह दूत था जो कि अन्नमदेव के एक पत्र के साथ राजा हरिश्चन्द देव से मिलना चाहता था। राजा घायल थे अत: दूत को उनके विश्रामकक्ष में ही उपस्थित किया गया। चूंकि सेना का नेतृत्व स्वयं चमेली बावी कर रही थी अत: वे भी अपनी सहायिकाओं के साथ महल के भीतर आ गयी।

बाहर अन्नमदेव के दिन की धड़कने बढी हुई थीं। वे प्रेम-पाश में बँध गये थे। सारी रात हाँथ में तलवार चमकाती हुई चमेली बावी का वह आक्रामक-मोहक स्वरूप सामने आता रहा और वे बेचैन हो उठते। यह युवति ही उनकी नायिका होने के योग्य है....। केवल रूप ही क्यों वीरता एसी अप्रतिम कि जिस ओर तलवार लिये उनका अश्व बढ जाता मानो रक्त की होली खेली जा रही होती। राजकुमारी चमेली नें कई बार अन्नमदेव की ओर बढने का प्रयास भी किया था किंतु काकतीय सरदारों नें इसे विफल बना दिया। तथापि एक अवसर पर वे अन्नमदेव के अत्यधिक निकट पहुँच गयी थी। अन्नमदेव नें तलवार का वार रोकते हुए वीरांगना की आँखों में प्रसंशा भाव से क्या देखा कि बस उसी के हो कर रह गये। काजल लगी हुई जो बडी-बडी आखें आग्नेय हो गयी थीं वे अब बहुत देर तक अपलक ही रह गये अन्नमदेव की आखों का स्वप्न बन गयी थी।

महाराज! दूत आने की आज्ञा चाहता है।द्वारपाल नें तेलुगू में तेज स्वर से उद्घोषणा की। अन्नमदेव के शिविर से दूत को भीतर भेजने का ध्वनि संकेत दिया गया। अन्नमदेव आश्वस्त थे कि वे जो चाहते हैं वही होगा। हरिश्चंददेव के अधिकार मे केवल गढिया, धाराउर, करेकोट और गढचन्देला के इलाके ही रह गये थे; यह अवश्य था कि भ्रामरकोट मण्डल के जिनमें मरदापाल, मंधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजगढ, भेजरीपदर आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं; से कई पराजित नाग सरदार अपनी शेष सन्य क्षमताओं के साथ हरीश्चंद देव से मिल गये थे तथापि अब बराबरी की क्षमताओं का युद्ध नहीं रह गया था।

क्यों मौन हो पत्रवाहक?” अन्नमदेव नें बेचैनी से कहा। वे अपने मन का उत्तर सुनना चाहते थे आखिर प्रस्ताव ही मनमोहक बना कर भेजा गया था। हरिश्चंददेव से संधि की आकांक्षा के साथ अन्नमदेव नें कहलवाया था कि बस्तर राज्य की सीमा चक्रकोट से पहले ही समाप्त हो जायेगी तथा आपको काकतीय शासकों की ओर से हमेशा अभय प्राप्त होगा। चक्रकोट पर हुए किसी भी आक्रमण की स्थिति में भी आपको बस्तर राज्य से सहायता प्रदान की जायेगी.....राजा हरिश्चंददेव के साथ संधि की केवल एक शर्त है कि वे अपनी पुत्री राजकुमारी चमेली बावी का विवाह हमारे साथ करने के लिये सहमत हो जायें

क्या कहा राजा हरिश्चंद नें?” अन्नमदेव नें इस बार स्वर को उँचा कर बेचैन होते हुए पूछा।
जी राजा नें कहा कि अपनी बेटी के बदले उन्हें किसी राज्य की या जीवन की कामना नहीं है। पत्रवाहक नें दबे स्वर में कहा।

और कोई विशेष बात?” अन्नमदेव आवाक थे।

जी राजकुमारी नें अभद्रता का व्यवहार किया।

क्या कहा उन्होंने?”

“.....उन्होंने कहा कि स्त्री को संधि की वस्तु समझने वाले अन्नमदेव का विवाह प्रस्ताव मैं ठुकराती हूँ

ओहअन्नमदेव के केवल इतना ही कहा और मौन हो गये। यह तो एक कपोत का बाज को ललकारने भरा स्वर था; नागराजा का इतना दुस्साहस कि जली हुई रस्सी के बल पर अकड रहा है? “....और यह राजकुमारी स्वयं को आखिर क्या समझती हैं? अब आक्रमण होगा। विजय के चिन्ह स्वरूप बलात हरण किया जायेगा और मैं उस मृगनयनी-खड़्गधारिणी से विवाह करूंगा। अन्नमदेव की भँवे तनने लगीं थी।

सुबह होते ही युद्ध की दुंदुभि बजने लगी। दोनों ओर की सेनायें सुसजित खडी थीं। हरिश्चंददेव घायल होने के बाद भी अपने हाथी पर बैठ कर धनुष थामे अपने साथियों सैनिको का उत्साह बढा रहे थे। चमेली बावी नें सीधे उस सैन्यदल पर धावा बोलने का निश्चिय किया था किस ओर आक्रांता अन्नमदेव होंगे। यद्यपि आक्रांताओं नें भी भीषण तैयारी कर रखी थी। हरिश्चंद देव की कुल सैन्य क्षमता से कई गुना अधिक सैनिकों नें बारसूर, किलापाल और करंजकोट की ओर से चक्रकोट्य को चेर लिया था। भीषण संग्राम हुआ; नाग आहूतियाँ देते रहे और अन्नमदेव बेचैनी के साथ युद्ध के परिणाम तक पहुँचने की प्रतीक्षा करता रहा। आज कई बार आमने सामने के युद्ध में चमेली बावी नें उसे अपने तलवार चालन कौशल का परिचय दिया था। एसी प्रत्येक घटना अन्नमदेव के भीतर राजकुमारी चमेली के प्रति उसकी आसक्ति को बलवति करती जा रही थी। नहीं; अब युद्ध अधिक नहीं खीचा जाना चाहिये....अन्नमदेव अचूक धनुर्धर थे। धनुष मँगवाया गया तथा अब उन्होंने हरिश्चंददेव को निशाना बनाना आरंभ कर दिया। वाणों के आदान-प्रदान का दौर कुछ देर चला। तभी एक प्राणघातक वाण हरिश्चंद देव की छाती में आ धँसा। अन्नमदेव नें अब कि उस महावत को भी निशाना बनाया जो हरिश्चंद देव का हाथी युद्ध भूमि से लौटाने की कोशिश कर रहा था। नाग सेनाओं में हताशा और भगदड मच गयी। राजकुमारी नें स्थिति का अवलोकन किया और उन्हें पीछे हट कर नयी रणनीति बनाने के लिये बाध्य होना पड़ा। आनन फानन में राजकुमारी चमेली का तिलक कर उन्हें चक्रकोटय जी शासिका घोषित कर दिया गया यद्यपि इस समय केवल गिनती के सैनिक ही जयघोष करने के लिये शेष रह गये थे। बाहर युद्ध जारी था तथा अनेको वीर नाग सरदार अपनी नयी रानी तक अन्नमदेव की पहुँच को असंभव किये हुए थे। अपनी मनोकामना की पूर्ति में इस विलम्ब से कुपित अन्नमदेव नाग नें नाग सरदारो के पीछे अपने सैनिकों के कई कई जत्थे छोड़ दिये। भगदड मच गयी और अनेक सरदार व नाग सैनिक अबूझमाड़ की ओर खदेड दिये गये।

अब अन्नमदेव की विजयश्री का क्षण था। पत्थर निर्मित किले की पहले ही ढहा दी गयी दीवार से भीतर वे सज-धज कर तथा हाथी में बैठ कर प्रविष्ठ हुए। चारो ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। नगरवासी मौन आँखों से अपने नये शासक को देख रहे थे। सैनिक तेजी से आगे बढते हुए एक एक भवन और प्रतिष्ठान पर कब्जा करते जा रहे थे। राजकुमारी को गिरफ्तार कर प्रस्तुत करने के लिये एक दल को आगे भेजा गया था। अन्नमदेव चाहते थे कि राजकन्या का दर्पदमन किया जाये और तब वे उसके साथ सबके सम्मुख इसी समय विवाह करें।

क्या हुआ सामंत शाह, लौट आये?...कहाँ हैं राजकुमारी चमेली?”

“.....”

सबको साँप क्यों सूंघ गया है?क्या हुआ?” अन्नमदेव नें अपने सरदार सामंत शाह और उसके साथी सैनिकों के चेहरे के मनोभावों को पढने की कोशिश करते हुए कहा। 

“...जौहर राजा साहब। राजकुमारी अपनी दोनो मुख्य सहेलियों झालरमती और घोगिया के साथ मेरे सामने ही आग में कूद पडी और अपने प्राण दे दिये

तो तुमने बचाने की कोशिश नहीं की.....।बेचैनी में शब्दों नें अन्नमदेव का साथ छोड दिया था।

“...राजकुमारी आग में प्रवेश करने से पहले शांत थी, वे मुस्कुरा रही थीं। उन्होंने मुझे सम्बोधित किया और कहा कि मैं जा कर अपने राजा से कह दूं कि आक्रमणकारी बल से किसी की जमीन तो हथिया सकते हैं लेकिन मन और प्रेम हथियारों से हासिल नहीं होते....।

हाथी अब उस ओर मोड दिया गया जिस ओर से धुँआ उठ रहा था। राजा की नम आँखे कोई नहीं देख सका। एसी पराजय की कल्पना भी अन्नमदेव ने नहीं की थी।

रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं, मना लो माँ दंतेश्वरी

आलेख दिनांक 2.04.2013 को सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में प्रकाशित

कांकेर से कुछ ही दूर छोटा सा ग्रामीण परिवेश है सिदेसर। नाम से स्पष्ट है कि सिद्धेश्वर का नाम कालांतर में बदल कर सिदेसर हो गया है। यहाँ ग्रामीणों की सहायता से मैं और भाई कमल शुक्ला प्राचीन शिव मंदिर के अवलोकनार्थ पहुँचे थे। इस स्थल से आगे बढते हुए हम एक अन्य गाँव रिसेवाडा पहुँचे। रिसेवाडा नाम के भी दो भाग है जो रिस अर्थात क्रोध तथा वाडा अर्थात ग्राम का अर्थ बोधक है। जैसे ही हम वाडा की बात करते हैं हमें नाग युगीन प्रशासनिक व्यवस्था का अवलोकन करना आवश्यक हो जाता है जहाँ उनकी सम्पूर्ण शासित भूमि राष्ट्र अथवा देश कोट (राज्य) कहलाती थी। कोट के प्रशासनिक विभाजन थे नाडु (संभाग) तथा नाडु के वाडि (जिला)। वाडि के अंतर्गत नागरिक बसाहट के आधार पर महानगर, पुर तथा ग्राम हुआ करते थे। यदि हम केवल ग्रामीण व्यवस्था को ही बारीकी से समझने की कोशिश करें तो उसके भी दो प्रमुख प्रकार थे वाड़ा तथा नाड़ुया (नार)। समझने की दृष्टि से वाडा तथा नार का प्रमुख अंतर बसाहट के तरीकों में अंतर्निहित था। एसे सुनियोजित गाँव जहाँ घर पंक्तिबद्ध रूप में अवस्थित हों उन्हें वाडाकहा जाता था जबकि अव्यवस्थित बसाहट वाले गाँव नाग युग में नारकहलाते थे। बस्तर के नगरों गाँवों में कई गमावाडा अथवा नकुलनार जैसे नाम आज भी नागयुगीन प्रशासनिक व्यवस्था की स्मृतियाँ हैं। इसी प्रकाश में पुन: बात रिसेवाडा की।

रिसेवाडा निश्चित ही एक समय में सुनियोजित रूप से बसा ग्रामीण क्षेत्र रहा होगा जिसके बहुत ही निकट सिद्धेश्वर मंदिर की अपनी ख्याति रही होगी। सिद्धेश्वर मंदिर के पास से हमें एक बडा सा थानप्राप्त हुआ है जिसका आकार ही बताता है कि इससे बडी मात्रा में औषधि का निर्माण होता रहा होगा। यह पूरा क्षेत्र कई प्रकार की औषधि पादपों से पटा पडा है। पूरे रास्ते हमारे मार्गदर्शक ग्रामीण नें कई तरह के औषधि पादपों से हमारा परिचय भी कराया। मैं इन कडियों को जोड़ता हूँ तो लगता है कि इस प्राचीन सिद्ध क्षेत्र का महत्व ही पीडितों की व्याधि हरने के कारण रहा होगा तथा यहाँ न केवल धार्मिक कर्मकाण्ड, तांत्रिक विधियाँ ही पूरी जी जाती रही हैं जैसा कि सिद्धेश्वर मंदिर के सम्मुख माँ काली की प्रतिमा, भरवी की युद्ध मुद्रा में प्रतिमा आदि से ज्ञात होता है साथ ही यहाँ एक प्राचीन औषधालय भी रहा निश्चित रूप से रहा होगा। रिसेवाडा अब एक उपेक्षित गाँव है। सारे रास्ते ग्रामीण भीतरी स्थलों के लिये सड़क की आवश्यकता पर चर्चा करते रहे। दूर दूर तक जंगल और मध्यवर्ती क्षेत्रों में खेतिहर भूमि की लम्बी कतारें इसके साथ ही चारो ओर खिले मुस्कुराते भांति भांति के जंगली फूल यहाँ तक उबड-खाबड रास्ते से पहुँचने की सारी थकान को रह रह कर हवा कर देते थे।

एक प्राकृतिक गुफा के निकट पहुँच कर ग्रामीण नें बताया कि यह रिसेदेवी का स्थान है। यह तो समझ में आ गया कि रिसेवाडा और रिसेदेवी का आपस में क्या संबंध है तथापि जिज्ञासा बढ गयी थी। एक पहाडी नुमा स्थान जिसमे एक विशाल पत्थर को प्रकृति नें इस तरह लिटा दिया है कि उसके नीचे गुफानुमा संरचना बन गयी है। ग्रामीण नें बताया कि भीतर रिसेदेवी का निवास है। वस्तुत: रिसे देवी दंतेवाड़ा में अवस्थित माँ दंतेश्वरी की छोटी बहन हैं। दोनो बहनों में किसी बात पर झगडा हो गया और छोती बहन रूठ कर यहाँ चली आयी हैं। इसी लिये देवी का नाम रिसेदेवी हो गया। मुझे जनजातीय समाज के एसे देवी देवता भावुक कर देते हैं जो बिलकुल हमारे जैसे हैं। हमारी तरह झगडते हैं, रूठते हैं, मनाते हैं। ये देवी देवता आसमान पर नहीं उडते बल्कि जमीन के हैं....जमीन से जुडे। रिसेदेवी की गुफा में प्रवेश करने के पश्चात मुझे वहाँ एक छोटी की पाषाण प्रतिमा....नहीं प्रतिमा नहीं कहूँगा क्योंकि किसी तरह का मानुषिक आकार मैं तलाश नहीं सका तथापि बहुत सारे तिलक भभूत से लिप्त इस प्रस्तराकृति को ही रिसेदेवी का प्रतीक माना गया होगा यही समझ सका। आसपास मिट्टी के घोडे, दीपक तथा अनेको कुम्हार निर्मित आकृतियाँ। किसी तरह का कोई ताम-झाम नहीं कोई पाखण्ड नहीं। एक अत्यंत मनोरम स्थल जहाँ पहुँच कर स्वत: आपके भीतर की प्रवित्रतम भावनायें उभर आयेंगी और स्वत: आपको अपूर्व शांति का अनुभव होगा। यहाँ चमक दमक नहीं है, यहाँ पुजारी पंडे नहीं हैं, यहाँ कोई भव्य इमारत या चमचमाती प्रतिमा नहीं है। यहाँ महसूस होता है इतिहास; यहाँ महसूस होता है अपना पिछडा जा रहा वर्तमान और यहाँ मुझमे एक कोमल अनुभूति भी प्रार्थना कर उठती है कि रिसेदेवी अब भी रूठी हुई हैं मना लो माँ दंतेश्वरी।

Wednesday, April 03, 2013

अन्नमदेव की बस्तर विजय।



व्यवस्था परिवर्तन कभी भी अ-कारण नहीं होता। शासक और शासित के बीच दूरियाँ जितनी बढती जाती हैं असंतोष का लावा मार्ग बनाने लगता है। एसे में कभी जनता ही आक्रामक हो उठती है तो कभी आक्रांता बेधड़क चला आता है और उसका कोई प्रतिवाद नहीं होता। छिंदक नाग शासकों नें प्राचीन बस्तर क्षेत्र पर लगभग 564 वर्ष (760 – 1324 ई. तक) तक शासन किया और उनकी अनेक उपलब्धियाँ रहीं जिससे इनकार नहीं किया जा सकता; तथापि धीरे धीरे केन्द्रीय शक्ति के अभाव में यह पूरा क्षेत्र अनेक नाग-शासकों/सरदारो व शक्तिशाली सामंतो नें हथिया लिया। प्रभाव क्षेत्र पाँच या दस कोस लेकिन उपाधि राजा। कुछ मजबूत गढ अवश्य थे किंतु आपसी लडाईयों के कारण उन्हें अब सुरक्षित नहीं कहा जा सकता था। अन्नमदेव का बस्तर प्रवेश परिस्थितिजन्य था न कि योजनाबद्ध। मुट्ठी भर सामंतो और गिनती के सैनिकों के साथ वारंगल से पलायन करने वाला एक सरदार एक वृहत जानजातीय आबादी वाले एसे भूभाग को बडी ही सहजता से अधिकृत कर लेता है जहाँ की प्रजा ही विद्रोही प्रवृत्ति की मानी जाती हो तो विषद विवेचना आवश्यक है। चक्रकोटय (प्राचीन बस्तर) में अनुकूल परिस्थितियाँ थीं; यह क्षेत्र नाग राजाओं और उनके सामंतो की आपसी लड़ाईयों से टूट चुका था। इतिहासकार नर्मदाप्रसाद श्रीवास्तव अपने एक आलेख में विवेचना करते हुए लिखते हैं कि नाग - एक एक गाँव, बगीचा या तालाब के लिये लड़ मरने वाले पंच कोसीराजा रह गये थे। प्रजा इनके आपसी विवादों से त्रस्त थी। वस्तुत: एसे में आम जन की साँप छुछुन्दर वाली गति हो जाती थी....किस सामंत का साथ दें और किसका न दें। यही हालात अन्नदेव के लिये लाभकारी हुए। स्थानीय ही उनके सहायक और मुखबिर बनते गये।

बस्तर पर कार्य करने वाले आरंभिक सभी इतिहासकारों नें अन्नमदेव तथा उसके वंशजों को काकतीयवर्गीकृत किया है जिनमे जेकिंसन (1827), इलियट (1856), टेम्पल (1862), ग्लसफर्ड (1862), रसेल (1908), दि ब्रेट (1909), ग्रिग्सन (1938) तथा एल्विन (1947) आदि प्रमुख हैं। यहाँ तक कि राजवंश के अंतिम शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव (1936-1947 ई.) भी राजवंशावली को काकतीयही निरूपित करते हैं जबकि डॉ. हीरालाल शुक्ल सहित अनेक इतिहासकारों नें नयी व्याख्या प्रस्तुत की है जिसके आधार पर बस्तर पर 1324 ई. से शासन करने वाले राजपरिवार को चालुक्यमाना गया है। चालुक्य मानने के पीछे के तथ्य वारंगल से प्राप्त होते हैं। वारंगल के काकतीय राजा गणपति (1199-1261 ई.) की दो पुत्रियाँ थीं रुद्राम्बा और गणपाम्बा। उनके देहावसान के बाद उनकी बड़ी पुत्री रुद्राम्बा ने सत्ता संभाली। चालुक्य राजा वीरभद्रेश्वर से महारानी रुद्राम्बा का विवाह हुआ था। इस दम्पत्ति को कोई पुत्र नहीं था। उनकी एक मात्र संतति थी - पुत्री मम्मड़म्बा। राजकुमारी मम्मड़म्बा को विवाह के पश्चात दो पुत्र हुए - प्रतापरुद्र तथा अन्नमदेव। [यही विवाह सम्बन्ध इतिहासकारों को चालुक्य वंश के साथ अंतर्सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा देता है। इस विवाद में न पडते हुए प्रचलित मान्यता काकतीयको ही प्रस्तुत आलेख में लिया गया है।] तकनीकी रूप से तथा पितृसत्तात्मक समाज की व्याख्याओं के अनुरूत यह सत्य स्थापित होता है कि चालुक्य राजा से विवाह के पश्चात महारानी रुद्राम्बा का पिता की वंशावलि पर अधिकार समाप्त हो गया। तथापि भावनात्मक रूप से अथवा स्त्री अधिकारों पर विमर्श के तौर पर मुझे यह तथ्य रुचिकर प्रतीत होता है कि काकतीय वंशावली के रूप में यह राजवंश अधिक प्रमुखता से जाना गया है। यहाँ तक कि महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी (1921 - 1936 ई.) जिनका विवाह भंज वंश से जुडे राजकुमार से किया गया था; तत्पश्चात के सभी वंशजों नें अपने नाम के साथ भंज अवश्य जोडा किंतु अंतिम महाराजा प्रवीर स्वयं को प्रवीर चंद्र भंजदेव काकतीयकहलाना ही पसंद करते थे। यह परम्परा मुझे स्तुत्य, महत्वपूर्ण तथा एक अनुकरणीय उदाहरण प्रतीत होती है। वंशावलियाँ और रक्तशुद्धतायें महज प्रतीक है तथा यह एक आवरण है जो पृथक्करण करता है। यहाँ वह कहावत उचित प्रतीत होती है कि नाम में क्या रखा है?’ साथ ही यह भी कि पिता और माता यदि सत्तायें न हो कर समान अधिकारी होते तो वंशावलियों पर पाथापच्चियों की आवश्यकता नहीं रही होती। अगर दत्तकपुत्र वंश परम्पराओं को जीवित रखते थे तो पुत्रियों के शासन से विभाजक रेखायें क्यों खींची जाये? अत: यह इतिहासकारों की बहस का विषय होगा कि प्रतापरुद्र एवं अन्नमदेव काकतीय थे अथवा चालुक्य; एक लेखक के तौर पर मुझे काकतीय ही इस राजवंश की अधिक सटीक पहचान लगती है। प्रतापरुद्र (1290 – 1324 ई.) ने दक्षिण के बड़े क्षेत्र को अपने आक्रामक सैन्य अभियान से वारंगल का हिस्सा बना लिया था। इन दिनों मुसलमान आक्रांताओं की गिद्धदृष्टि समृद्ध दक्षिण भारत पर थी। वारंगल पर लगातार हो रहे हमलों के बीच प्रतापरुद्र के छोटे भाई अन्नमदेव नें चक्रकोट्य का रुख किया जहाँ बिखरा हुआ नाग राजवंश आखिरी साँसे ले रहा था।

अन्नमदेव जब बस्तर की ओर बढ रहे होंगे तो बहुत सा मंथन उनका विमर्श बना होगा। अब तक वे दक्षिण भारत के उस राजवंश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो समृद्ध था, शक्तिशाली था और इसी कारण से तुगलकों नें उन्हें रौंद दिया। हाथियों, घोड़ों व ऊंटों पर लाद कर वारंगल का खजाना दिल्ली ले जाया गया। कहते हैं कोहिनूर हीरा इसी लूट का हिस्सा था जिसे नुमाईश के बाद सुलतान को भेट किया गया। एक धनी राज्य क्या सुरक्षित नहीं हैं? इस दौर में प्रत्येक धनाड्य व शक्तिशाली साम्राज्यों पर मुसलमान आक्रांताओं की दृष्टि थी तथा अन्नम देव के बड़े भाई प्रतापरुद्र की सत्ता का वारंगल में पतन इन्ही कारणों से हुआ था। इतिहासकार नर्मदा प्रसाद श्रीवास्तव नें नाग-काकतीय संघर्ष की जो बानगी अपने आलेखों के द्वारा प्रस्तुत की है उससे बेहतर विवरण इस सम्बन्ध में किसी इतिहासकार नें प्रस्तुत नहीं किया है। उनके आलेखों (बस्तर एक अध्ययन; 1992) के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अपनी बिखरी हुई शक्ति का संचय कर अन्नमदेव नें लगभग 1330 ई. के आसपास गोदावरी एवं इन्द्रावती नदियों के संगम पर भद्रकाली के निकट अपना पड़ाव डाला।

अन्नमदेव का विजय अभियान भोपालपट्टनम से आरंभ हुआ। अन-अपेक्षित आक्रमण से घबरा कर भोपालपट्टनम का राजा बिना लडे ही पलायन कर गया। नाहरसिंह पामभोई को अन्नमदेव नें यहाँ का सामंत नियुक्त किया तथा यहाँ से वे बीजापुर की ओर बढ गये; थोडे से ही संघर्ष के बाद यह क्षेत्र भी हथिया लिया गया। ठीक इसी समय अन्नमदेव के एक अन्य वफादार सामंत सन्यासी शाह नें महाराष्ट्र के अहेरी-सूरजगढ की ओर से चक्रकोटय के पश्चिमी भाग पर आक्रमण किया तथा कांडला पर्ती के नाग राजा को पराजित कर उसने पासेबाड़ा, फरसेगढ, गुदमा, तोयनार आदि गढ हथिया लिये। इसी सम्बन्ध में अतीत से एक रोचक कथा का उल्लेख प्राप्त होता है। संयासी शाह नें कांडला पर्ती के स्थान पर कुटरू को अपनी राजधानी के तौर पर चुना। कहते हैं कि विजयोपरांत वह एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था और वहाँ निरंतर किसी पक्षी का मोहक स्वर कुट-कुट-कुटरसुनाई पड़ रहा था। इस ध्वनि से संयासी शाह इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपने विजित राज्य का नाम ही कुटरू रख दिया। संयासी शाह नें इन विजित क्षेत्रों को अन्नमदेव को समर्पित कर दिया। कहते हैं कि वारंगल में तुलगकों से मिली पराजय से हताश सामंत एक एक कर अन्नम देव से अपने सैनिकों-संसाधनो सहित इसी प्रकार मिलते रहे जिससे उनका विजय अभियान सफलताओं के साथ संचालित होता रहे। एसे ही कुछ सामंतो नें चेरला की ओर से बीजापुर तथा निकटवर्ती क्षेत्रों कोतापल्ली, पामेड़, फोतकेल तथा गंगालूरपर अधिकार कर ये इलाके नाग राजाओं से हथिया लिये और इन्हें अपने नेता अन्नमदेव को समर्पित कर दिया। कोतापल्ली और पामेड़ में गोंड जाति के सामंत तथा फोतकेल में राउत जाति का सामंत नियुक्त कर प्रशासन को जनजातिगत प्रतिनिधित्व देने और किसी भी स्थिति मे जन-असंतोष न पनपने देने की वृत्ति सम्मिलित थी। दंतेवाडा के भी नाग राजाओं नें अल्पकालिक प्रतिरोध के पश्चात अन्नमदेव को अपना राजा मान लिया। इसके साथ ही गढमिरी कटेकल्याण तथा किलेपाल पर अधिकार हो गया। वहाँ के नाग शासकों को ही सामंत घोषित कर दिया गया। अन्नमदेव नें इन क्षेत्रों से पुन: किसी युद्ध की संभावना को टालने के लिये तेलंगा और हलबा जाति के सैनिक नियुक्त किये थे। यहाँ से विजय अभियान हमीरगढ पहुँचा; इस समय तक अन्नमदेव एक बडे क्षेत्र के शासित तथा समुचित रूप से शक्तिशाली हो गये थे। मौके की नज़ाकत को समझते हुए हमीरगढ के राजा रामचन्द्र देव नें तीरथगढ, चन्द्ररगिरि, मुण्डागढ, छिंदगढ तथा सुकमा के अपने मित्र राजाओं के साथ मिल कर अन्नमदेव का स्वागत किया व उनकी आधीनता स्वीकार कर ली। एसी स्थिति में किसी तरह की नयी व्यवस्था को थोपने की आवश्यकता नहीं रह गयी थी; तथापि अपने एक सम्बन्धी को सुकमा का सामंत नियुक्त कर सभी गढ यथावत रहने दिये गये। स्थान स्थान पर प्रबंधन को कसने की दृष्टि से इन क्षेत्रों में धुरवा जाति के सैनिकों की चौकियाँ स्थापित की गयीं। केशलूर के अंतर्गत एर्राकोट, पाराकोट, मठकोट, रैकोट और मुरुमगढ आते थे जिनपर अधिकार करने के लिये किसी युद्ध की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। माडपाडगढ तथा बागराउडगढ विजय अभियान के अगले हिस्से थे जिनपर अधिकार कर उन्हें कोरामी जाति के सरदारों को सौंप दिया गया। कोटपाड़ (वर्तमान ओडिशा में सम्मिलित) इलाके के लिये सैन्य अभियान चलाया गया तथा वहाँ के राजा विक्रमदेव को ही पराजय स्वीकार करने के पश्चात कुछ शर्तों के साथ सामंत का दर्जा दे दिया गया। छुटपुट संघर्ष तो पोड़ागढ, शालमीगढ, उमरकोट रायगढा में भी हुए किंतु अन्नमदेव के विजय अभियान को रोका जाना संभव नहीं हो सका था। अन्नमदेव के राज्य की उत्तरी सीमा पैरी नदी नें निर्धारित की इधर कांकेर के राजाओं से भी संधि हो गयी थी एवं उनसे अन्नमदेव को देव-डोंगरी परगना भेंट स्वरूप प्राप्त हुआ था। कांकेर से लगा दादरगढ इलाका भी बिना युद्ध के ही अन्नमदेव के राज्य विस्तार का हिस्सा बन गया। अब अन्नमदेव के लिये अपने अभियान को एक राज्य का स्वरूप देने का समय आ गया था। बडे-डोंगर को उन्होंने अपनी पहली राजधानी बनाया। यहाँ अन्नमदेव नें अपनी आराध्य देवी माँ दंतेश्वरी का मंदिर बनवाया तथा राजधानी में 147 तालाब भी खुदवाये थे। इसी मंदिर के सम्मुख एक पत्थर पर बैठ कर अपना उन्होंने अपना विधिवत राजतिलक सम्पन्न करवाया। स्वाभाविक है कि इस समय उनके पास न राजमहल रहा होगा न ही सिंहासन। डोंगर के इसी पत्थर पर राजतिलक एक परम्परा बन गयी जिसका निर्वाह अंतिम शासक प्रवीर तक निरंतर होता रहा एवं इस प्रथा को पखनागादी कहा जाता था। अन्नमदेव के राज्य का नाम बस्तर प्रचलित हुआ।

राजतिलक के पश्चात भी अन्नमदेव का युद्धाभियान समाप्त नहीं हुआ था। उनकी शासन परिधि के भीतर अब भी अनेक नाग शासित क्षेत्र थे जिनमें से भ्रमरकोट तथा चक्रकोट शक्तिशाली सत्तायें थीं। भ्रमरकोट को हासिल करने में बड़ा युद्ध नहीं करना पडा अपितु शीघ्र ही इसके आधीन मरदापाल, मधोता, राजपुर, मांदला, मुण्डागढ, बोदरापाल, केशरपाल, कोटगढ, राजनगर, भेजरीपदर, भ्रामरकोट आदि पर अन्नमदेव का अधिकार हो गया। गढिया, धाराउर, करेकोट, गढ-चंदेला आदि चक्रकोट के आधीन क्षेत्र थे जिन पर नाग राजा हरिश्चंद देव का शासन था। भीषण युद्ध हुआ और प्रथम चरण में अन्नमदेव को पीछे हटना पड गया। बारसूर तथा किलेपाल से सैनिक सहायता मँगा कर पुन: धावा बोला गया जिसमें हरिश्चंददेव वीरगति को प्राप्त हुए एवं इसके साथ ही अन्नमदेव का सैनिक अभियान पूरा हो सका। इस तरह काकतीय/चालुक्य शासित बस्तर राज्य 1324 में अस्तित्व में आया। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल के अनुसार (बस्तर के चालुक्य एवं गिरिजन, 2007) अन्नमदेव के राज्य में बारह जमींदारियाँ, अढ़तालीस गढ़, बारह मुकासा, बत्तीस चालकी और चौरासी परगने थे। जिन प्रमुख गढ़ों या किलों पर अधिकार कर बस्तर राज्य की स्थापना की गयी वो हैं - मांधोता, राजपुर, गढ़-बोदरा, करेकोट, गढ़-चन्देला, चितरकोट, धाराउर, गढ़िया, मुण्डागढ़, माड़पालगढ़, केसरपाल, राजनगर, चीतापुर, किलेपाल, केशलूर, पाराकोट, रेकोट, हमीरगढ़, तीरथगढ़, छिन्दगढ़, कटेकल्याण, गढ़मीरी, कुँआकोण्ड़ा, दंतेवाड़ा, बाल-सूर्य गढ़, भैरमगढ़, कुटरू, गंगालूर, कोटापल्ली, पामेंड, फोतकेल, भोपालपट्टनम, तारलागुड़ा, सुकमा, माकड़ी, उदयगढ़, चेरला, बंगरू, राकापल्ली, आलबाका, तारलागुड़ा, जगरगुण्ड़ा, उमरकोट, रायगड़ा, पोटगुड़ा, शालिनीगढ़, चुरचुंगागढ़, कोटपाड़.......।

सभी विवरणों को गंभीरता पूर्वक देखने पर यह महसूस होता है कि नाग युगीन बस्तर एक विभाजित सत्ताओं का केन्द्र था तथा आपसी मतभेद इतने अधिक व्यापक थे कि एक जुट हो कर आक्रांता से लडने का प्रयास ही नहीं किया गया। अन्नमदेव जिस दिशा में गये वहाँ की सत्ता जैसे झोली में आ गिरी। स्थानीय जनजातियों का भी कोई विरोध न होना यह स्पष्ट करता है कि शासक और जनता के बीच के संबंध मधुर नहीं थे। इसके साथ ही अन्नमदेव समझदारी के साथ अधिकृत क्षेत्रों पर वैसे सामंतो की ही नियुक्ति कर रहे थे जिनसे स्थानीय समर्थन बना रहे एवं युद्धकाल में नये मोर्चे न खुलें। यह वारंगल के शासकों का शासनानुभव था जिसके फलस्वरूप युद्ध और विजित क्षेत्रों में प्रशासन प्रबंधन साथ साथ किया जाता रहा। अन्नमदेव की दूरदर्शिता इस मायने में प्रसंशनीय कही जायेगी कि उन्होंने जहाँ तक संभव हुआ प्राचीन स्थापनाओं को मजबूत ही किया तथा स्थानीयता को उसी स्वरूप में मान्यता देने की कोशिश की। किसी क्रूर आक्रांता होने के स्थान पर वे सहिष्णु विजेता की छवि प्रस्तुत कर रहे थे तहाअधिकतम पुराने सामंतो अथवा जनजाति के सरदारों को ही प्रशासन में ओहदे प्रदान करते चल रहे थे। बस्तर का जो वर्तमान स्वरूप है उसे बहुत हद तक प्रशासन के नीचे आकार देने का श्रेय अन्नमदेव को ही जाता है।