Thursday, October 04, 2012

ह्वेनसांग की दक्षिणापथ यात्रा और सातवाहन साम्राज्य

रायपुर से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक -  ट्रू सोल्जर में दिनांक 3.10.2012 को प्रकाशित 

प्राचीन बस्तर क्षेत्र में सातवाहनों (72 ई-350 ई तक) की सत्ता का उल्लेख ह्वेनसांग द्वारा अपने यात्रा वृतांत में किया गया है। चीनी यात्री की यह यात्रा यद्यपि 629 से ले कर 645 ई तक ठहरती है। यात्रावृतांत का सूक्षमता से अध्ययन करने पर इसमें तत्कालीन बस्तर का इतिहास ही नहीं मिलता अपितु ह्वेनसांग नें अनेकों निकटवर्ती शासनों के क्षेत्रफल, भूगोल, जनश्रुतियों, मिथकों, आदि; सभी कुछ को उल्लेखित किया है। बौद्ध साहित्य तथा उनके समकालीन एवं पूर्ववर्ती विचारकों व उनसे जुडे साक्ष्यों को वे अतीत से भी खोज निकालते हैं तथा उनका विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। इस यात्रावृतांत में बस्तर के लिये पो-लो-मो-लो-कि-ली; कलिंग के लिये कई-लिंग-किया; कोशल क्षेत्र के लिये क्यि-वस-लो तथा आन्ध्र के लिये अन-त-लो नाम का प्रयोग ह्वेनसांग द्वारा किया गया है। एस एन राजगुरु (आई ओ, खण्ड-4 भुवनेश्वर, 1966) के अनुसार पो-लो-मो-लो-कि-ली बस्तर के अभिलेखों में वर्णित भ्रमरकोट्य मण्डल है। उनके अनुसार यह पर्वत कालाहाण्डी तथा बस्तर की सीमा पर अवस्थित है। एन के साहू अपनी पुस्तक बुद्धिज्म इन ओडिशा में पो-लो-मो-लो-कि-ली को परिमल गिरि मानते हुए इसे सम्बलपुर एवं बालंगीर की सीमा पर स्थित गंधमर्दन पर्वत निरूपित करते हैं। इन सभी क्षेत्रों की जानकारियों को सामूहिक रूप में देखने पर ही प्राचीन बस्तर की तत्कालीन अवस्था का अनुमान लगाया जा सकता है। 

ह्वेनसांग के अनुसार बौद्ध महायान शाखा के महान दार्शनिक ‘नागार्जुन’ ईसा की दूसरी शताब्दी में पो-लो-मो-लो-कि-ली के मठ में रहते थे जो दक्षिण कोसल की राजधानी से दक्षिण-पश्चिम में 300 ली की दूरी पर अवस्थित था। इस क्षेत्र के स्वामी सो-तो-पो-हो (सातवाहन) थे और वही इस मठ के संरक्षक थे। यह विवरण ह्वेनसांग द्वारा कोशल तथा बस्तर क्षेत्र में महान दार्शनिक नागार्जुन के सम्बन्ध में जानकारी एकत्रीकरण की कोशिश के रूप में ही दिया गया है; नागार्जुन और ह्वेनसांग समकालीन नहीं थे। इस दृष्टि से यह समझना भी आवश्यक हो जाता है कि बौद्ध साहित्य तथा सिद्धांतों की खोज में ह्वेनसांग केवल वर्तमान की परिधियाँ ही नहीं नाप रहे थे अपितु बहुत सूक्षमता से उन्होंने अपने समय से पहले के इतिहास का अंवेषण भी किया है। ह्वेनसांग कलिंग में प्रवेश से पहले प्राचीन बस्तर क्षेत्र का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि “हम एक भारी निर्जन वन में पहुँचे जिसके चारो ओर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष सूर्य की आड़ लिये हुए आकाश से बातें करते थे”। कलिंग और उसके सीमांत क्षेत्रों जिसमें स्वाभाविकत: बस्तर का क्षेत्र भी सम्मिलित हो जाता है के विषय में ह्वेनसांग बताते हैं कि “जंगल-झाडी सैंकडो कोस तक लगातार चली गयी है। यहाँ पर कुछ हरापन लिये हुए नीले हाँथी मिलते हैं जो निकटवर्ती सूबों में बडे दाम पर बिकते हैं। मनुष्य का स्वभाव उग्र है परंतु वे अपने वचन का पालन करने वाले विश्वसनीय लोग हैं। बहुत थोडे लोग बुद्ध धर्म पर विश्वास करते हैं, अधिकतम लोग विरुद्ध धर्मावलम्बी ही हैं”। प्रकृति के अलावा भी यदि ह्वेनसांग द्वारा प्रस्तुत तथ्य का विश्लेषण किया जाये तो अंग्रेजों के समय तक हाँथी जयपोर (वर्तमान में ओडिशा में अवस्थित) एवं बस्तर रियासत में प्रमुखता से पाये जाते थे। अंग्रेज अधिकारी मैक्जॉर्ज जो कि बस्तर में 1876 के विद्रोह के दौरान प्रशासक था, नें हाथी और उससे जुडी तत्कालीन राजनीति पर एक रोचक उल्लेख अपने एक प्रतिवेदन में किया है – “रियासतों में छोटी छोटी बातों के लिये झगडे होते थे। जैपोर और बस्तर के राजाओं के बीच झगड़े की जड़ था एक हाँथी। जैपोर स्टेट ने बस्तर के जंगलों से चोरी छुपे हाँथी पकड़वाये। इसके लिये वे हथिनियों का इस्तेमाल करते थे। उनकी इसी काम के लिये भेजी गयी कोई हथिनी बस्तर के अधिकारियों ने पकड़ ली। यह बड़ा डिस्प्यूट हो गया। अंतत: अंग्रेज आधिकारियों को इस हथिनी के झगड़े में बीच बचाव करना पड़ा। हथिनी को सिरोंचा यह कह कर मंगवा लिया गया कि बस्तर स्टेट को वापस कर दिया जायेगा लेकिन फिर उसे जैपोर को सौंप दिया गया”। वर्तमान में बस्तर में हाथी नहीं मिलते हैं अत: इस उद्धरण को यहाँ उल्लेखित करने के पीछे मेरा मंतव्य ह्वेनसांग के उल्लेखों और प्राचीन बस्तर में अंतर्सम्बन्ध दर्शाना है। 

कलिंग से जोड कर ह्वेनसांग नें एक मिथक कथा को उल्लेखित किया है जिसके अनुसार “एक समय यह क्षेत्र बहुत घना बसा हुआ था। इतना घना कि रथो के पहियों के धुरे एक दूसरे से रगड खाते थे। एक महात्मा जिन्हें पाँचों सिद्धियाँ प्राप्त थी वे एक उँचे पर्वत पर निवास करते थे। किसी कारण उनकी शक्तियों का ह्रास हो गया तथा लज्जित हो कर उन्होंने श्राप दे दिया जिससे वृद्ध-युवा, मूर्ख-विद्वान, सब के सब समान रूप से मरने लगे, यहाँ तक कि सम्पूर्ण जनपद का नाश हो गया”। इस कथा का सम्बन्ध मैने कलिंग के एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ह्वेनसांग पूर्व की घटनाओं, उद्धरणों और जनश्रुतियों आदि से करने की कोशिश की किंतु हर बार मेरा ध्यान बस्तर से जुडी राजा दण्ड की उस कथा की ओर ही गया जहाँ शुक्राचार्य के अभिशाप से पूरा दण्डकारण्य जनपद नष्ट हो गया था। उल्लेखनीय है कि कलिंगारण्य तथा दण्डकारण्य समानांतर हैं एवं इन दोनों ही क्षेत्रों के इतिहास को जुडवा भाईयों की कहानी की तरह ही देखना उचित प्रतीत होता है। 

ह्वेनसांग कलिंग से दण्डकारण्य होते हुए कोशल तक पहुँचते हैं। अंग्रेज इतिहासकार कनिंघम इस कोशल क्षेत्र की सीमा के भीतर प्राचीन बस्तर, वर्तमान छत्तीसगढ के उत्तरी हिस्सों (कोशल और सन्निकट के क्षेत्र), बरार और बहुतायत गोण्डवाना को सम्मिलित कर लेते हैं एवं राजधानी चाँदा, नागपुर अथवा अमरावती को मानते हैं। फगुर्सन नें ह्वेनसांग द्वारा दिये गये माप ‘ली’ (अर्थात छ: ली का एक मील) को आधार बना कर बैरागढ को कोसल की राजधानी बताया है। महायान सम्प्रदाय की सार्वभौमिकता ही ह्वेनसांग की यात्रा कालीन दक्षिणापथ को एक साथ जोडती प्रतीत होती है तथा राजधानी के स्पष्ट नामोल्लेख न होने के कारण इस विवाद को इतिहासकारों की झोली में डालते हुए हम उस विवरण की ओर लौटते हैं जहाँ ह्वेनसांग कहते हैं कि “विधर्मी तथा बौद्ध दोनो यहाँ पर हैं जो उच्च कोटि के बुद्धिमान और विद्याध्ययन में परिश्रमी हैं। कोई सौ संघाराम और दस हजार से कुछ ही कम साधु हैं जो सब के सब महायान सम्प्रदाय का अनुशीलन करते हैं”। यह कथन निस्संदेह सिरपुर से जुडता है किसकी वर्तमान में अवस्थिति रायपुर से 85 किलोमीटर की दूरी पर है। कभी श्रीपुर कहलाने वाला सिरपुर सोमवंशी राजाओं के समय में कोशल की राजधानी भी रहने का गौरव प्राप्त कर चुका है। इस क्षेत्र में निरंतर जारी खुदाई से इतिहास शनै: शनै: सजीव होने लगा है तथा यह तथ्य सामने आ रहा है कि नालंदा और तक्षशिला से भी प्राचीन शिक्षा-केन्द्र था सिरपुर। सिरपुर में उत्खनन कार्य करा रहे पुरातत्ववेत्ता डॉ अरुण कुमार शर्मा के अनुसार खुदाई में प्राप्त एक स्तूप का सम्बन्ध सीधे ही भगवान बुद्ध से है। यह स्तूप सांची के स्तूप से अलग है और पत्थरों से निर्मित है। पत्थर के स्तूपों के बारे में कहा जाता है कि ऐसे स्तूप भगवान बुद्ध के निर्देशन में ही बनते थे। बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि बुद्ध ईसा पूर्व छठीं सदी में सिरपुर आए थे; तब यहां बौद्ध विहारों की स्थापना शुरू हुई। ईसा-पूर्व तीसरी शताब्दी में सम्राट अशोक ने भी इस क्षेत्र में कई स्तूपों का निर्माण कराया। सिरपुर के आलोक में महायान सम्प्रदाय के महान विचारक नागार्जुन की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। 

नागार्जुन दूसरी सदी में न केवल नालंदा में विद्यार्थी थे अपितु बाद में बहुत समय तक वहाँ के प्रधान भिक्षु के रूप में भी कार्यरत रहे। नागार्जुन का सम्बन्ध प्राचीन बस्तर और कोसल से रहा है तथा उनका अनुमानित जीवनकाल 150 ई – 250 ई के मध्य माना जाता है। नागार्जुन माध्यमिक (मध्य मार्ग) मत के संस्थापक थे जिनकी ‘शून्यता’ (ख़ालीपन) की अवधारणा के स्पष्टीकरण को उच्चकोटि की बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धि माना जाता है। प्राचीन बस्तर में नागार्जुन की अवस्थिति का एक प्रमाण उनका तत्कालीन सातवाहन वंश के राजा {संभवत: यज्ञश्री (173-202)} को लिखा एक पत्र (सुहारिल्लेख, ‘मैत्रिपूर्ण पत्र’) भी है। तथापि ह्वेनसांग नें नागार्जुन के दर्शन और उनकी महानता का वर्णन करने में कोताही नहीं की है। ह्वेनसांग बताते हैं कि नगर के दक्षिण में एक संघाराम है जिसमें नागार्जुन रहा करते थे। एक बार लंका निवासी देव-बिधिसत्व शास्त्रार्थ के लिये आया। द्वारपाल के माध्यम से मिलने से पूर्व नागार्जुन नें आगंतुक की प्रतिष्ठा में एक पात्र में जल भर कर दिया। देव-बोधिसत्व पहले तो जल को देख कर चुप हो गये फिर एक सूई निकाल कर उसमें डाल दी। यह पात्र पुन: नागार्जुन तक पहुँचा तो वे उत्साहित हो कर बोले यह व्यक्ति सूक्ष्म ज्ञान से भरा हुआ है जिसे हृदयंगम करने का सुअवसर हैं इन्हें भीतर बुलाया जाये। नागार्जुन में इसके पश्चात अपने शिष्यों को दो महाविद्वानों के बीच हुए इस मौन वार्तालाप के विषय में बताया कि वस्तुत: उन्होंने ज्ञान की निर्मलता और ग्राह्यता का संदेश जल-पात्र के रूप में भेजा था जिसके प्रत्युत्तर में अपने सूक्ष्म संदेहों की बात देव-बोधिसत्व द्वारा की गयी। ह्वेनसांग बाद में देव-बोधिसत्व में ज्ञान के अहंकार और उसका नागार्जुन द्वारा किये गये निराकरण का भी जिक्र अपने वृतांतों में करते हैं। नागार्जुन से सम्बन्धित कई पुरा-स्थलों को प्राचीन बस्तर में खोजा जाना शेष है। ह्वेनसांग का यह विवरण देखें – “लगभग 300 ली दक्षिण पश्चिम चल कर हम ब्रम्हगिरि नामक पहाड पर पहुँचे। इस पहाड की सूनसान चोटी सबसे ऊँची है। इस स्थान पर सद्वह राजा नें नागार्जुन बोधिसत्व के लिये चट्टान खोद कर उसके भीतर मध्य-मार्ग में एक संघाराम बनवाया था। इस संघाराम के नष्ट किये जाने का उल्लेख भी ह्वेनसांग करते हैं तथापि इसके आकार प्रकार के विवरण से यह प्रतीत होता है कि इस स्थल की खोज एक बडे एतिहासिक धरोहर से हमें परिचित करायेगी। 

प्राचीन बस्तर की जानकारी सीमांत आन्ध्र की उपलब्ध जानकारियों के विश्लेषण के बिना पूरी नहीं होती। ह्वेनसांग लिखते हैं कि दक्षिण दिशा में एक घने जंगल मे जा कर कोई 900 मील चल कर हम ‘अन-त-लो’ (आन्ध्र) देश में पहुँचे। यहाँ की प्रकृति गर्म तथा मनुष्य साहसी होते हैं। वाक्य विन्यास एवं भाषा मध्य भारत से भिन्न है। यह स्थान भी आंशिक रूप से भगवान बुद्ध के प्रभाव में आया एवं एक शून्य पहाड का जिक्र ह्वेनसांग करते हैं जिस स्थान पर जिन-बोधिसत्व नाम के विद्वान द्वारा हेतुविद्या शास्त्र की निर्मिति का उल्लेख मिलता है। उपरोक्त विवरणों से ह्वेनसांग की दक्षिणापथ यात्रा के दौरान बस्तर भी आने का स्पष्ट उल्लेख है तथा कई राज्यों के मध्य की कडी के रूप में एक घना वन प्रदेश भी यह जान पडता है। ह्वेनसांग के माध्यम से यह भी निरूपित करने में हमे सहायता मिलती है कि महान विद्वान नागार्जुन प्राचीन बस्तर से ही सम्बद्ध थे तथा उन दिनों यह क्षेत्र सातवाहनों द्वारा शासित था। नागार्जुन का इतना अधिक सम्मान था कि उनकी सुरक्षा के लिये शासन द्वारा अंगरक्षक भी प्रदान किये गये थे।  

प्राचीन बस्तर में सत्ता का केन्द्र मौर्य सामाज्य के पतन के बाद से ही बदलने लगा था। 72 ई. पूर्व से ले कर 200 ई. तक का समय इस क्षेत्र में दक्षिण भारत के बढते हुए प्रभावों का समय रहा। सातवाहन राजवंश का केन्द्रीय दक्षिण भारत पर अधिकार था। 22 ई. पूर्व में राजा सातकर्णी प्रथम की मृत्यु के बाद सातवाहन निर्बल होते चले गये। सातवाहनों का पुनरुत्थान 106 ई. के बाद, तब हुआ जब, गौतमपुत्र सातकर्णी सिंहासन पर बैठे। 'शक-यवन-पल्हवों' को पराजित कर राजा सातकर्णी ने अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया। अवन्ति, अश्मक, सौराष्ट्र आदि पर विजय प्राप्त करते हुए राजा गौतमीपुत्र सातकर्णि ने कौशल, कलिंग तथा दण्ड़कारण्य के दुर्बल शासक ‘चेदि महामेघवाहन’ को पराजित किया। 350 ई. तक यहाँ सातवाहनों की समाप्ति हो गयी थी। इस समय इक्ष्वाकुओं ने दण्ड़कारण्य के पूर्वीभाग पर अपनी संप्रभुता स्थापित की तो उत्तरी भाग में वाकाटकों का प्रभुत्व हुआ। वाकाटक शब्द का प्रयोग प्राचीन भारत के उस राजवंश के लिए किया जाता है जिसने तीसरी सदी के मध्य से छठी सदी तक शासन किया था। तीसरी शताब्दि के मध्य तक वाकाटक संप्रभुता सम्पन्न हो गये थे। 

Tuesday, September 11, 2012

ईसा-पूर्व के साम्राज्य और गौरवशाली बस्तर


सान्ध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 11.09.12 को प्रकाशित 
बौद्ध और जैन मतों का प्रादुर्भाव भारतीय समाजशास्त्र, राजनीति तथा इतिहास की दृष्टि से क्रांतिकारक रहा है। भगवान बुद्ध और महावीर दोनो ही समकालीन थे तथा इस दौर में उत्तरापथ के मगध क्षेत्र पर विशाल साम्राज्यों के निर्माण की रूप रेखा भी चल रही थी। महाकाव्यों के युग से यदि ज्ञात इतिहास का कोई अंतर्सम्बन्ध जुडता है तो उसके लिये हमें प्राचीन मगध (वर्तमान बिहार में अवस्थित) की राजधानी राजगृह तक पहुँचना होगा। 

प्राचीन भारतीय इतिहास से प्राप्त उद्धरणों के अनुसार मगध के एक साम्राज्य बनने की कथा का प्रारम्भ होता है जब कुरुवंशी राजा वसु नें इस क्षेत्र को विजित किया था। उनके निधन के पश्चात बार्हद्रथ सत्तासीन हुए जिनके नाम पर ही बार्हद्रथ वंश पडा तथा मगध की वास्तविक सत्ता और गौरव का प्रारंभिक इतिहास यही से ज्ञात होता है। जरासंध इसी वंश में उत्पन्न प्रतापी तथा शक्तिशाली शासक थे एवं महाभारत कालीन इतिहास इसकी पुष्टि करता है। अंधक-वृष्णि-संघ के राजा श्रीकृष्ण नें पाण्डवों की सहायता से जरासंध का अपनी कूटनीति से वध करवा दिया था। इस राजनीतिक हत्या के बाद बार्हद्रथ वंश का विनाश होने लगा। इस वंश के अंतिम शासक थे - रिपुंजय जिनका उसके ही मंत्री पुलिक नें वध कर दिया था। पुलिक की सत्ता नें अभी पहला कदम भी नहीं रखा था कि भट्टिय नाम के महत्वाकांक्षी सामंत नें विद्रोह कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनके पंद्रह वर्षीय पुत्र बिम्बिसार को 543 ईसा पूर्व में सत्ता हासिल हुई। बिम्बिसार नें हर्यंक वंश की नींव रखी; वे भगवान बुद्ध के जीवन काल में मगध के शासक थे। कहते हैं उन्होंने तत्कालीन प्रचलित परिपाटी के उलट एक स्थायी सेना रखी हुई थी जिसनें उनकी शक्ति को अपराजेय बना दिया था। बिम्बिसार की आस्था भगवान बुद्ध पर थी जो उनके समकालीन भी थे तथापि उनका शासन सही मायनों में धर्मनिर्पेक्ष माना जायेगा चूंकि जैन मत के अनुसार भी उन्हें सम्मान प्राप्त है और यह भी उल्लेख मिलता है कि वे ब्राम्हणों को भूमिदान आदि भी करते रहते थे। बिम्बिसार की हत्या उनके ही पुत्र अजातशत्रु नें की तत्पश्चात राजगृह से मगध की सत्ता संभाली। अजातशत्रु भी बौद्ध और जैन धर्म का समान आदर करते थे। उन्होंने एक बौद्ध स्तूप का भी निर्माण करवाया था। उनके ही शासनकाल में प्रथम बौद्ध संगिति राजगृह के निकट सप्तपर्णी गुफा में हुई थी। अजातशत्रु की हत्या उनके पुत्र उदायिन (460 – 444 ईसा पूर्व) नें की तथा सत्ता संभाली। उदायिन नें ही राजधानी को राजगृह से गंगा तथा सोन नदी के संगमस्थल पर पाटलीपुत्र के निकट स्थानांतरित कर दिया था। 

यही वह समय भी था जब भारत की राजनीति जनपदो में बँटी हुई थी। इस काल में बाईस महाजनपदों (बौद्ध साहित्य में 16 जनपदों का उल्लेख करता है तथा जैन साहित्यों में भी 16 ही महाजनपदों का उल्लेख है। जैन ग्रंथों के उल्लेख बौद्ध ग्रंथों से बाद के हैं जिसमें दक्षिणभारत के कुछ जनपद अतिरिक्त सम्मिलित हैं। पाणिनी के अष्टाध्यायी में 22 महाजनपद बताये गये हैं।) का उल्लेख मिलता है। यदि शासन प्रणाली की बात की जाये तो बहुतायत महाजनपदों पर किसी न किसी राजा का एकतंत्रात्मक शासन था। ‘गण’ और ‘संघ’ नाम से प्रसिद्ध राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था। इस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। कुछ राज्यों में भूमि सहित अर्थिक स्रोतों पर ‘राजा’ और ‘गण’ सामूहिक नियंत्रण रखते थे। हर महाजनपद की राजधानी को क़िले से घेर कर सुरक्षित किया जाता था। दण्ड़कारण्य का क्षेत्र उन दिनों विंध्य पर्वत के दक्षिण में स्थित अश्मक महाजनपद (600 – 321 ईसा पूर्व) का हिस्सा था, जिसकी राजधानी पोतलि थी। बौद्ध साहित्य में इस प्रदेश का, जो गोदावरी तट पर स्थित था, कई स्थानों पर उल्लेख मिलता है। 'महागोविन्दसूत्तन्त' में  अस्सक के राजा ब्रह्मदत्त का उल्लेख है। सुत्तनिपात में अस्सक को गोदावरी-तट पर बताया गया है। इसकी राजधानी पोतन, पौदन्य या पैठान (प्रतिष्ठानपुर) में थी। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में भी अश्मकों का उल्लेख किया है। बुद्ध को अपने धर्म का प्रचार करने के लिये अश्मक जनपद से सहायता मिलती रही।

मगध क्षेत्र में अगला शासन शैशुनाग वंश का था, जिसके संस्थापक शिशुनाग माने जाते हैं; इसका काल लगभग पाँचवीं से चौथी शताब्दी ई. पू. के मध्य तक का रहा है। अवंति जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी, की शक्ति को तोड देना उनकी सबसे बडी उपलब्धि थी जिसके बाद बहुतायत मध्य क्षेत्र मगध का हिस्सा बने। शिशुनाग के उत्तराधिकारी कालाशोक के द्वारा कलिंग विजय का उल्लेख मिलता है तथापि दण्डक क्षेत्र के उनके आधीन होने की जानकारी नहीं मिलती। बौद्ध धर्म की दृष्टि से यह समय इस लिये भी उल्लेखनीय है क्योंकि द्वितीय बौद्ध संगति इसी काल में बुलाई गयी थी जिसमें कि वैशाली के भिक्षुओं को संघ से बहिष्कृत कर दिया गया था। शैशुनाग वंश की समाप्ति महापद्मनंद के उदित होने के साथ साथ हुई। महापद्मनंद के द्वारा अपने समकालीन जिन राज्यों पर अधिकार कर विशाल साम्राज्य का निर्माण करने का उल्लेख मिलता है उनमें इक्ष्वाकु, पांचाल, काशी, हैहय, कलिंग, अश्मक, कुरु, मैथिलि, शूरसेन तथा वीतिहोत्र राज्य प्रमुख हैं। अर्थात महापद्मनंद के आधीन वह अश्मक जनपद भी हो गया था जिसका हिस्सा प्राचीन बस्तर रहा है। आधीनस्त क्षेत्र होने के बाद भी नंदयुगीन मगध की राजनीति नें सीधे तौर पर दण्डकारण्य को प्रभावित किया हो यह उल्लेख तो नहीं मिलता तथापि बौद्ध तथा जैन दोनों ही मतो के प्रचारकों का प्रादुर्भाव दक्षिणापथ की ओर समय-समय पर होता रहा। जैन धर्म धीरे-धीरे दक्षिण भारत तथा पश्चिम भारत में प्रसारित हुआ जहाँ ब्राम्हणवादिता की जडे तब तक मजबूत नहीं हुई थीं। जैन धर्म के दक्षिण में पुष्पित पल्लवित होने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण समझ में आता है कि महावीर के निर्वाण के 200 वर्ष पश्चात मगध में भारी सूखे की स्थिति आ गयी थी। यह अकाल लगभग बारह वर्षों तक रहा तथा इस समय बाहुभद्र के नेतृत्व में जैन सम्प्रदाय का एक धड़ा दक्षिणापथ की ओर पलायन कर गया। इसके साथ ही जैन धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार दक्षिणी भारत के क्षेत्रों में हुआ जिसका हिस्सा दण्डकारण्य (प्राचीन बस्तर) क्षेत्र भी था। दक्षिण की ओर पलायन कर गये इसी जैन संप्रदाय को बाद में दिगम्बर भी कहा गया है जब कि अकाल के समय स्थलबाहु के नेतृत्व में मगध में ही रह गये जन मतावलम्बी कालांतर में श्वेताम्बर के रूप में वर्गीकृत हुए। 

महापद्मनंद के स्थापित साम्राज्य का अंतिम राजा था धनानंद जिसे चाणक्य की सहायता से पराजित कर चन्द्रगुप्त (322 - 298 ईसा पूर्व) नें मौर्य वंश की नींव रखी थी। आश्चर्य किंतु सत्य यह था कि जिस मौर्य के एकतंत्र-साम्राज्य का हिमालय से ले कर मैसूर तक विस्तार हो गया था, वह आटविक जनपद शासित दण्ड़क और कलिंग क्षेत्र नहीं हथिया सका। मौर्य कालीन प्राचीन बस्तर उस ‘आटविक जनपद’ का हिस्सा था जो स्वतंत्र शासित प्रदेश बन गया था। कौटिल्य का अर्थशास्त्र “अटवि” सेना के महत्व को प्रतिपादित करता है जिससे यह पुष्टि होती है कि सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने बस्तर क्षेत्र की जनजातियों के सम्मिलन्न से एक टुकडी का गठन कर उसे अपनी सेना का हिस्सा बनाया था। कालांतर में मौर्य शासक अशोक ने कलिंग़ (261 ईसा पूर्व) को जीतने के लिये भयानक युद्ध किया। एक लाख सैनिक मारे गये, डेढ़ लाख सैनिक कैद किये गये। कलिंग ने अशोक की आधीनता स्वीकार कर ली। अशोक नें जब आक्रमण किया तो उसके प्रतिरोध में दण्डक के योद्धा भी कलिंग के समर्थन में आ गये। यद्यपि कलिंग नें तो अशोक की आधीनता स्वीकार कर ली किंतु आटविक जनपद के दण्ड़क क्षेत्र पर ‘मौर्य-ध्वज’ स्वप्न ही रहा। अपनी इस विफलता को सम्राट अशोक ने स्वीकार करते हुए पत्थर पर खुदवाया – ‘अंतानं अविजितानं; आटविक जन अविजित पड़ोसी है’। इसके साथ ही अशोक नें आटविक जनता को उसकी ओर से चिंतिन न होने एवं स्वयं को स्वतंत्र समझने के निर्देश स्वयं दिये थे – “एतका वा मे इच्छा अंतेषु पापुनेयु; लाजा हर्बं इच्छति अनिविगिन हेयू; ममियाये अखसेयु च में सुखमेव च; हेयू ममते तो दु:ख”। तथापि गंभारतापूर्वक अशोक के शिलालेखों का अध्ययन करने पर मुझे यह प्रतीत होता है कि आटविक क्षेत्र की स्वतंत्रता अशोक को प्रिय नहीं रही थी साथ ही यहाँ की जनजातियों की ओर से अशोक के साम्राज्य को यदा-कदा चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा होगा। इस सम्बन्ध में अशोक का तेरहवा शिलालेख उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि अविजित आटविक जन किसी प्रकार की अराजकता करते हैं तो वह उनका समुचित उत्तर देने के लिये भी तैयार है। यह कथन इस लिये भी महत्व का है क्योंकि इससे उस सम्राट की बौखलाहट झलकती है जो विशाल साम्राज्यों को रौंद कर उनपर मौर्य ध्वज लहरा चुका था लेकिन आटविक क्षेत्र के आदिवासी जन उसकी सत्ता और आदेश की परिधि से बाहर थे। इसी शिलालेख में अशोक नें आदिम समाज को दी हुई अपनी धमकी पर धार्मिक कम्बल भी ओढाया है और वे आगे लिखवाते हैं कि “देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी वनवासी लोगों पर दयादृष्टि रखते हैं तथा उन्हें धर्म में लाने का यत्न करते हैं।“ यहाँ उल्लेख करना होगा कि मौर्ययुगीन बस्तर क्षेत्र को तब सम्यता से दूर मानना सही व्याख्या नहीं होगी। निश्चित ही सम्राट अशोक नें आटविक क्षेत्रों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार की कोशिश की होगी तथा उनसे पूर्ववर्ती शासकों द्वारा भी एसा किया गया होगा। जनपदकाल से ले कर अशोक तक प्राचीन बस्तर में बौद्ध धर्म को ले कर भ्रम व अस्पष्टता की स्थिति होने का मूल कारण है कि इस समय तक यह धर्म अपने हीनयानी सिद्धांतों व नीतियों पर आधारित था जिसमें मूर्तिपूजा का कोई स्थान नहीं था। आज बस्तर क्षेत्र से बौद्ध धर्म तथा भगवान बुद्ध से सम्बन्धित जो भी शिल्प-अवशेष प्राप्त होते हैं वे बहुतायत अशोक एवं उसके बाद के ही हैं। यहाँ की तत्कालीन सभ्यता उच्च कोटि की रही होगी जिसका कि प्रमाण खुदाई में प्राप्त इस युग के पॉलिशयुक्त पात्रों के माध्यम से हो जाता है।     

अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर पड़ गया था। इसका लाभ उठा कर कलिंग ने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। कलिंग में महामेघवंश (186 – 72 ईसा पूर्व) का उदय हुआ। कलिंग के जैन राजा 'खारवेल' को आर्य महाराज, महामेघवाहन, कलिंगाधिपति, लेमराज, धर्मराज महाविजय राज आदि सम्बोधन प्राप्त थे। उसने मौर्य शासकों के ‘मगध’ को कलिंग साम्राज्य का एक प्रांत बना दिया। राजा खारवेल की आधीनता में आटविक राज्य के अधिकांश क्षेत्र आ गये थे। यह उल्लेख मिलता है कि खारवेल नें आटविक जनों की सहायता से ही पश्चिम में भोजक (विदर्भ) तथा रठिक (महाराष्ट्र) राज्यों को परास्त किया था। इस पश्चिम विजय की जानकारी खारवेल के प्रसिद्ध हाथीगुंफा अभिलेख से होती है तथा इसमें बस्तर क्षेत्र के लिये ‘अपराजेय विद्याधराधिवास’ का प्रयोग किया गया है। इसी अभिलेख से यह भी जानकारी मिलती है कि इसी विद्याधराधिवास क्षेत्र (प्राचीन बस्तर) से खारवेल नें अपने शासन के चौथे वर्ष में रत्न तथा बहुमूल्य सामग्रियाँ छीन ली थीं। यह उल्लेख तत्कालीन बस्तर के दीन हीन नहीं अपितु एक सम्पन्न क्षेत्र होने का आभास दिलाता है। महामेघवाहन-राज्य की स्थापना के साथ दण्ड़कारण्य में जैन-धर्म का भरपूर प्रचार-प्रसार हुआ। बस्तर तथा इसके निकटवर्ती ओडिशा क्षेत्रों से अनेक जैन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिनका निर्माणकाल खारवेल के शासन के समकक्ष पहुँचता है। जैपोर में एसी ही प्राप्त जैन मूर्तियों को रखा गया है जिनमें अधिकतम दिगम्बर प्रतिमायें हैं; सप्तमुखी सर्प की छाया में ध्यानस्त एक दिगम्बर जैन मूर्ति विशेष ध्यान खींचती है। एक उल्लेख (एच.टी.डब्ल्यु; 27.06.1976) अतिमहत्वपूर्ण है जिसके अनुसार बोरिगुम्मा खण्ड के निकट के गाँवों में जैन मंदिर होने के प्रमाण व अवशेष मिलते हैं जिनमें पकनीगुडा तथा कोठारगुडा प्रमुख हैं। स्थानीय आदिवासियों नें यहाँ प्राप्त जैन मूर्तियों को अपना देवता निरूपित कर पूजा आरंभ कर दी है तथा इन्न मूर्तियों के आगे पशु-बलि भी दी जाती है। जैन मतावलम्बियों के प्रभाव में बस्तर का क्षेत्र बहुत लम्बे समय तक रहा है जिसके साक्ष्य के लिये नागयुगीन बस्तर की धरण महादेवी का खुदवाया शिलालेख (1069 ई.) देखा जा सकता है जिसमें महापरिव्राजक पण्डित सोम, साधु सोमन तथा जिणग्राम आदि की चर्चा है। इन्हें अपने शासन के छठवे वर्ष में राजा खारवेल ने राज्य में करमुक्त व्यवस्था लागू कर दी थी। 

सातवाहन राजवंश (72 ईसा पूर्व से 202 ई.) का केन्द्रीय दक्षिण भारत पर अधिकार था। ईसा के जन्म से 22 वर्ष पूर्व, राजा सातकर्णी प्रथम की मृत्यु के बाद सातवाहन निर्बल होते चले गये। सातवाहनों का पुनरुत्थान ईसा के जन्म के 106 वर्ष बाद, तब हुआ जब, गौतमपुत्र सातकर्णी सिंहासन पर बैठे। 'शक-यवन-पल्हवों' को पराजित कर राजा सातकर्णी ने अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया। अवन्ति, अश्मक, सौराष्ट्र  आदि पर विजय प्राप्त करते हुए राजा गौतमीपुत्र सातकर्णि ने कौशल, कलिंग तथा दण्ड़कारण्य के दुर्बल शासक ‘चेदि महामेघवाहन’ को पराजित किया। सातवाहनों की पूर्णरूपेण समाप्ति 350 ई. तक हो गयी थी। सातवाहनों के प्राचीन बस्तर क्षेत्र के लिये किये गये कार्यों का अधिक उल्लेख दे पाने में इतिहास अभी भी मौन साधे हुए है। 

यह उल्लेख करना उचित होगा कि ईसापूर्व का बस्तर घने जंगलों नें तथा दुर्गमतम प्राकृतिक परिस्थितियों के बाद भी एक प्रगतिशील क्षेत्र था। तत्कालीन सभी बडे साम्राज्यों नें इस क्षेत्र पर अधिकार करने अथवा उससे समझौता कर अपने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित रखने को आवश्यक समझा। भगवान बुद्ध तथा महावीर के मतो का यहाँ भी समुचित प्रचार-प्रसार हुआ। ये उदाहरण यह भी विचार प्रस्तुत करते हैं कि ईसापूर्व में जब प्राचीन बस्तर क्षेत्र प्रगति तथा गौरव का इतिहास रच रहा था वह अचानक गुमनामी के अंधेरे में कैसे गुम हो गया? इसके लिये इतिहास के आगे के पन्ने पलटने होंगे। 

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Thursday, September 06, 2012

राजेन्द्र यादव के हंस-महल में बस्तर के युवा कहानीकार तरुण भटनागर की सेंधमारी


राजेन्द्र यादव के उस दुस्साहस की सराहना अवश्य करूंगा जहाँ उन्होंने युवा कथाकार तरुण भटनागर के साथ हुए अपने संवादों के पत्र ‘हंस के सितम्बर-2012 अंक’ का सम्पादकीय बना कर प्रस्तुत किये हैं। राजेन्द्र यादव बेनकाब हुए हैं और तरुण ने निर्भीक और गैर-समझौतावादी लेखन की अद्वितीय परिभाषा गढी है। 

पहले चर्चा हंस में ही प्रकाशित तरुण भटनागर की कहानी “चाँद चाहता था कि धरती रुक जाये” की करते हैं। यह बस्तर के परिवेश पर केन्द्रित एक गैर राजनीतिक कहानी है; आदि से अंत तक इसमें अगर कुछ है तो उस समाज की पीडा है जिससे उसकी परम्पराओं-मान्यताओं, जीने के तरीकों और मुस्कुराहटों को संगीनों की नोक पर छीन लिया गया है। तरुण अबूझमाड़ी मिथक-कथाओं से अंधेरे का समाजशास्त्र गढ़ते हुए अपनी कहानी का प्रारंभ करते हैं। वे बस्तर के अंधेरे को दिल्ली के एक प्रतिष्ठित विद्यालय के एंथ्रोपोलोजी विभाग के किसी रटंत छात्र की कॉपी तक खीँच कर लाये हैं जिसके भीतर उन्होंने घोटुल का पूरा चित्र बनाया है। जहाँ आवश्यक हुआ तरुण समाजशास्त्र से काव्यशास्त्र की ओर भी बढे हैं और अपनी बात किसी कविता की तरह कहते प्रतीत होते हैं “....मैंने एक बार उन्हें बेतरह देखा था और बाद में दुनिया घूमते हुए बहुत सी जगह उन्हें तलाशता रहा, रियो-डी-जेनिरो के समुद्री किनारों से ले कर यूरोप के मादक स्ट्रिपटीज तक। एसी फड़फडाती देहें कहीं और देखने को नहीं मिली फिर। मिट्टी और अंधेरे की देह। सूत दर सूत तराशी गयी देह, जिसका जरा सा भी माँस इधर से उधर हो कर दैवीय रेखाओं का अतिक्रमण नहीं कर सकता”। इसके बाद कहानी उन बाहरी आदमियों की तरफ बढ़ती है जो क्रांति करने अबूझमाड में घुस आये हैं। निश्चित ही ‘बाहरी आदमी’ एक व्यापक शब्द है तथा साफगोई से लिखा गया। नये लेखकों को छद्म प्रगतिशीलता के प्रतिमानों को तोडना आना ही चाहिये अगर वे स्पष्ट नहीं लेखेंगे तो समकालीन कही जाने वाली उसी तालाब की मछली बन कर रह जायेंगे जहाँ पानी भी सडा हुआ है और खाने के लिये भी एक मछली के पास विकल्प दूसरी मछली ही है। तरुण सीधे सीधे लिखते हैं “बाहरी आदमी पिछले बीस सालों से यही सब इन लोगों को समझा रहा है। पर लोग समझ नहीं पा रहे हैं। उसकी बात एक अजीब सी बात पर पहुँचकर खत्म होती है”। कुछ और उद्धरण देखिये “तुम....(उसने एक भद्दी सी गाली दी) शताब्दियों से एक-सा काम करते आए हो, तुम क्या समझोगे विचार। जब कुछ नया करने का जतन जी नहीं, सलीका ही नहीं तो तुम...(उसने फिर एक भद्दी सी गाली दी) खाक समझोगे इसे”। कहानी पढ़ते हुए जिस अंश पर बाध्य हो कर मुझे रुकना पडा वह उस पीडा का प्रस्तुतिकरण थी जहाँ थमायी गयी बंदूख को ले कर आम आदिवासी की मन: स्थिति सामने आती है। कहानी का अंश देखें - “’किसको मारना है?’ उसको इस तरह से पूछना बड़ा अजीब लगा। जब मारने की वजह न हो तो यह कितना तो अजीब होता है। कितना कितना तो आत्मग्लान। कितना तो पीड़ित। ‘अबे मारना नहीं है। क्रांति क्रांति’....क्रांति फिर अबूझ शब्द”। तरुण ने घोटुल को माओवादियों द्वारा बंद कराये जाने की कोशिशों का आदिवासियों द्वारा किये गये प्रतिरोध और फिर उन पर की गयी जबरदस्ती का साफगोई से वर्णन किया है “लडके चले गये। जब लौटे तो उनके हाँथ में वे चार बंदूखें थी, जो उस आदमी ने उन्हें दी थी। आदमी खडा था। वे चारो आदमी के पास आये और उनके सामने वे बंदूकें जमीन पर पटक दी। आदमी उन सभी पर लाल पीला होता वहाँ से चला गया। कह गया कि अबकी बार  आएगा उसके साथ और भी साथी होंगे और तब कोई भी हथियार नहीं पटकेगा। तब सबको मानना पडेगा कि घोटुल निरर्थक है। घोटुल को बंद करना समतामूलक समाज के लिये निहायत ही जरूरी है”। तरुण जब जब एंथ्रोपोलॉजी का जिक्र करते हैं उनकी भाषा कटाक्षपूर्ण प्रतीत होती है, वे संभवत: जान बूझकर वहाँ अंग्रेजी के संवाद गढ़ते हैं। इसके साथ ही जंगल के समाजशास्त्र की अनुपम बानगी भी प्रस्तुत करते हैं जो किसी भी वैज्ञानिक विश्लेषण से परे है, जिसे कोई रटंत-विद्या आत्मसात नहीं कर सकती। घोटुल में जीवन साथी के चयन को ले कर आदिवासी कन्या के पास अपना स्त्रीविमर्श उपलब्ध है, अपना नैसर्गिक अधिकार “उसे नाज़ है, वह लडकी है। उसे नाज है कि सिर्फ वही तय कर सकती है। उसके भीतर से हूक उठेगी और वह नाम, वह देह, वह आत्मा उसकी हो जायेगी। उसे उसकी होना पडेगा। लडकी का तय किया जंगल का उसूल”। कहानी उस भय की सत्ता का भाग बनती है जहाँ - ”बुजुर्ग ने वादा किया कि आग अब कभी नहीं जलेगी। रात को घोटुल के सामने अँधेरे, वीराने और सन्नाटे की जिम्मेदारी उसे लेनी पडी....फिर भी घोटुल एकदम से वीरान नहीं हो पाया था। वे लोग रात को वहाँ आ जाते। आग नहीं जलती थी। शराब के मिट्टी के पात्र तोड डाले गये थे। वाद्य यंत्र जला दिये गये थे। कुछ लोग बायसन के हॉर्न और कौड़ियाँ बचा लाए थे। उन्हें उन्होंने इन आदिम झोंपडियों में छिपा लिया था, जिन्हें बरसों पहले उन्होंने छोडा था।” मैने जब कहानी पहली बार पढी तो इसके अंत तक पहुँचते पहुँचते मेरी आँख नम हो गयी। शायद इसलिये कि बस्तर को जीने और देखने का सौभाग्य मिला है मुझे। अनेक जीवंत कहानियाँ मैने अपने आदिवासी साथियों से सुनी हैं व उन आदिम सांस्कृतिक-सामुदायिक स्थलों को देखा है जिसे कभी घोटुल कहते थे। मर्मस्पर्शी शब्दों में तरुण ने वह सब लिखा है कि बस्तर को देखने जानने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भीतर की सिसक जाग उठेगी “कहते हैं बस्तर के कुछ युवा आज भी जाने किस उम्मीद में रात के जंगल में किसी रिक्त स्थान पर इकट्ठा होना चाहते हैं। जाने क्यों चाँद आज भी मुँह फेरने से पहले उस अंधेरी जगह को ताकता है। जाने क्यों तो....घोटुल की जगह अब बंदूख थी। उन्माद और प्यार की जगह गुस्सा था। जंगल ने कभी किसी लडकी को रात को उस अंधेरी खाली जगह पर सिसकते सुना था। धडकनों की जगह अब एक शुष्क सी आग थी। वे कई दिनों तक जलते रहे। फिर एक दिन सबसे पहले एक युवा सामने आया। उसने बंदूख अपने हाथ में उठा ली और उस बाहरी आदमी से कहा – बताओ किसको मारना है”। दिल्ली विश्वविद्यालय के एंथ्रोपोलॉजी की कक्षा के उस विद्यार्थी से कहानी का उपसंहार गढा गया है जिसकी चर्चा से कहानी की भूमिका आरंभ हुई थी। वह बस्तर में बड़ा अधिकारी हो कर आया है तथा घोटुल बंद हो जाने की खबरों को अपनी किताबी ज्ञान से मूल्यांकित कर इन्हे बचाने की योजना बनाता है। हथियार को खदेडने के लिये हथियार की सोच के साथ उसकी योजना खत्म होती है; वह सोच जो अपनी की तरह के एंथ्रोपोलॉजिकल अध्ययन ने उसे थमाई है। तरुण कहानी के अंत में लिखते हैं “जंगल में घात लग चुकी है। जंगल की घात संसार की एकमात्र घात है, जो टूटती नहीं, जो बडे इत्मीनान से बीत जाने देती हैं शताब्दियाँ”। 

तरुण की कहानी नितांत सफल कही जायेगी चूंकि राजेन्द्र यादव जैसे पुराने मठाधीश अपने पत्र में इतने तिलमिलाये प्रतीत होते हैं कि कहानी को खारिज करने के लिये उन्हें झूठ का सहारा लेना पडता है। हंस पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र यादव कहानी को अस्वीकृत करने का कारण बताते हुए पहले पत्र में कहानी का सार लिखते हैं -  “कुछ मेधावी विद्यार्थी मार्क्सवाद का सहारा ले कर उन्हें लडाकू ही नहीं बनाना चाहते, इस घोटुल संस्कृति को समाप्त भी कर देना चाहते हैं। वे आदिवासी युवाओं को बंदूख थाम कर लडने के लिये उकसाते हैं”। पहली बात कि “मेधावी छात्र” राजेन्द्र जी का अपना जुमला है क्योंकि लेखक ने “बाहरी व्यक्ति” शब्द का पूरी कहानी में इस्तेमाल किया है। मेधावी छात्र का इशारा अगर कहीं इस कहानी से मिलता है वह दिल्ली विश्वविद्यालय के उस एंथ्रोपोलोजी के छात्र के लिये व्यंग्य रूप में दिखाई पडता है जो बाद में बस्तर में अधिकारी बन कर आता है तथा अपनी ही तरह से स्थिति की व्याख्या करता है एवं निर्णय लेता है। अब जब कहानी के मूल तत्व में दिक्कत नहीं तो यह खारिज क्यों की जा रही थी। इसे राजेन्द्र जी तर्कपूर्वक कहते हैं कि “यह नहीं बताया गया है कि जिनके खिलाफ वे आदिवासियों को लामबंद कर रहे हैं, वे कौन हैं? बडे कॉरपोरेट संस्थान, जो सरकारों को खरीद रहे हैं, जमीन की खुदाई कर के हजारो करोड के प्लेटिनम, सोना, चाँदी लाद कर विदेशों मे पहुँचा रहे हैं, जंगलों को काट रहे हैं, पानी पर एकाधिकार किये हुए है – वे आदिवासियों को ही खत्म कर देना चाहते हैं”। राजेन्द्र जी का यह तर्क हो सकता है कि आन्द्रप्रदेश, बंगाल या झारखण्ड के विषय में सही हो लेकिन सपाट टिप्पणियों से पहले बस्तर को उन्हें जानना-पढ़ना पडेगा। पहली बात कि बस्तर में राजेन्द्र जी के ये “मेधावी” छात्र आन्ध्रप्रदेश के मुलुगु जंगलों के आदिवासियों द्वारा अस्वीकृत हो जाने की अपनी असफलताओं के कारण 80 के दशक में प्रविष्ठ हुए और इस लिये भी कि महाराष्ट्र, ओडिशा तथा आन्ध्र से सीमायें मिलल्ने के कारण अबूझमाड की स्वर्गतुल्य धरती बेहतर पनाहगार बन सकती थी। इस दौर तथा इसके बाद भी साधारण आन्दोलनों के बाद ही बस्तर की बोधघाट तथा मावली भाटा जैसी परियोजनाओं पर ताले लग गये। वर्तमान में भी बैलाडिला को छोड कर कोई अन्य खदान बस्तर के सात जिलों की परिधि में नही है। अब कुछ घोषित स्टील निर्माण की परियोजनायें अवश्य है जिनपर विवाद और संघर्ष जारी है किंतु इन सबसे माओवाद का कोई लेनादेना नही है। साठ और सत्तर के दशक में एक बड़ा आन्दोलन कर चुकी बस्तर की आदिवासी जनता को “तथाकथित मेधावियों” द्वारा जागरूक करने की बात हास्यास्पद है। माओवादी उस बस्तर को क्या संगठित करेंगे जो अनेको बार केवल घुमाई जाने वाली आम की डाल या मिर्च से ही एकत्रित और आन्दोलित हो उठा था। इन मेधावियों ने केवल स्थापित जनजातीय संतुलन को ध्वस्त किया है और परम्पाराओं का लहू ठीक उसी तरह सोखा है जैसा कि तरुण की कहानी में कहा गया है। बस्तरिये चिर-आन्दोलनकारी हैं; अतीत के अन्य ग्यारह सशस्त्र विद्रोह और उनके कारणों वाले इतिहास के पन्नों को उलटिये; जब-जब खुद उठ खडे हुए, बदलाव आया है। पनाहगार हमेशा बाहरी व्यक्ति होता है अत: तर्क, तरुण की सोच के अधिक करीब पहुँचता है। कहानी में अबूझमाड में वैचारिक आन्दोलन के कारण वहाँ के समाजशास्त्र पर हुए बदलावों की विवेचना मात्र है जिसमें कहीं भी लेखक किसी धारा-विचारधारा की आड लेता नहीं दिखता लेकिन सम्पादक का विरोध शायद इसी बात को ले कर है? तरुण का राजेन्द्र यादव को दिया गया तर्क बस्तर-विमर्श की नयी अंतर्दृष्टि देता है – “लोग दुनिया को दो तरह की धारणाओं से ही समझते हैं या समझना चाहते हैं – पूंजीवाद और मार्क्सवाद, पर जनजातीय समाज के मामले में एक और बात है जो इन दोनो के दायरे में नहीं आती। ये दोनो विचार पूँजी से उत्पन्न विचार हैं। अगर संसार में पूँजी न होती तो मार्क्स की दरकार नहीं होती। पर उस समाज का क्या जिसमें पूँजी की दरकार ही न हो? या जिसकी उत्पत्ति होने और चरित्र में पूँजी का होना न हो?” तरुण ने आगे लिखा है “जनजातीय समाज में आज जो अन्याय, अत्याचार हमे दिखता है, वह एक पूँजीविहीन समाज को पूँजी के दो विपरीत विचारों में घसीटने की त्रासदी है”। राजेन्द्र यादव ने पहले पत्र में लिखा है कि “कहानी बहुत इकहरा और घातक संदेश देती है। आपने अरुन्धति राय, गौतम नवलखा और डॉ. विनायक सेन के लेख पढे होंगे?” यह पढ़ कर समझ नहीं आता कि सिर पीटा जाये या बस हँस कर रह जाये? ये लिये गये नाम इकहरे हैं और एक ही विचारधारा के द्योतक हैं जो स्वयं राजेन्द्र यादव की भी है। राजेन्द्र जी उस दकियानूसियत के शिकार हैं जहाँ “बौद्धिक अंधविश्वास” जमीनी हकीकत से रूबरू ही नहीं होने देता। बस्तर पर कई लेखकों के उद्धरण लिये जा सकते हैं लेकिन मैं एक निर्विवाद नाम लेता हूँ जो बस्तर की आत्मा लाला जगदलपुरी का है (पता नहीं राजेन्द्र जी नाम भी जानते हैं या नहीं?)। माओवादी गतिविधियो पर उनकी यह पंक्ति निचोड है कि “यदि नक्सली भी मनुष्य हैं तो उन्हें मनुष्यता का मार्ग अपनाना चाहिये”। इस मनुष्यता शब्द का दायरा बड़ा किया जाना चाहिये और इसमें लाल-हत्या के अंध-समर्थकों को भी शामिल किये जाने की आवश्यकता है। ‘सरकारी’, ‘सत्ता’ ‘विश्वरंजन जैसों की निगाह’ आदि लिख कर राजेन्द्र यादव ने एक साहित्यकार की नहीं एक राजनीतिक की भाषा प्रयोग की है तथा उनकी इच्छा थी कि तरुण की अभिव्यक्ति को मार डाला जाये। यह तो लेखक का दुस्साहस कहिये कि ‘हंस में छपने के सार्टिफिकेट’ का मोह त्याग कर तरुण केवल सच्चे तर्क; हिम्मत के साथ रखते रहे। हंस का यह अंक जिसके पिछले पन्ने पर पूरे एक पेज में मध्य-प्रदेश की भाजपा सरकार का विज्ञापन छपा है उसका सम्पादक अपने लेखक को सरकारी प्रवृत्ति, सरकारी दृष्टि, सरकारी मदद आदि जुमलों से डराये तो थोथा लगता है। तरुण ने राजेन्द्र यादव को जो पैना जवाब दिया है मैं उसका कायल हो गया – “शब्द हमारी सबसे क्रूर इजादों में से एक हैं शायद। गाँधी ने इस पर लिखा है। उन्होंने इसे वाक् हिंसा कहा; शब्द जो हिंसक हो कर अपराध करते हैं। शब्द जो हिंसा तक कर सकते हैं”। अपने दूसरे पत्र में राजेन्द्र यादव ने कहानी को “मान कर लिखा गया” का आरोप लगाते हुए सवाल उठाया है कि ”उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिये क्या हम उन्हें वैसा ही छोड दे, जैसा वे हजारों सालों से हैं? या क्या उन्हें शेर चीतों की तरह उनके स्वाभाविक जीवन और परिवेश में सुरक्षित और संरक्षित रख कर दूर से ही पर्यटकों को इन अभयारण्यों में उनके दर्शन का तमाशा बनाये रखना बहुत मानवीय है?“ वे आगे लिखते हैं कि “आपने जवाब नहीं दिया कि क्यों अच्छे खासे ब्रिलियेंट नौजवान अपनी जान की बाजी लगा कर उन्हें अपने आधिकारों के प्रति जागरूक कर रहे हैं?” राजेन्द्र जी ने इस पत्र में बस्तर के बारे में बोलने के लिये कुछ लोगों को ही ऑथेंटिक मान कर उन का नाम बार-बार लिया है और तरेर पर प्रश्न लपेट कर तरुण को मारा है कि इन समाजसेवियों की यात्राओं/लेखों के जिक्र पर आप क्यों चुप है? राजेन्द्र जी मुझे लगता है कि या तो आपने कहानी ठीक से नहीं पढी या बस्तर के बारे में कुछ नहीं जानते। यह ब्रम्हदेव शर्मा ही थे जो आपकी सवाल वाली सूची में भी शामिल हैं, जिन्होंने 70 के दशक में बिलकुल उसी तरह एक्ट किया जैसा तरुण की कहानी का “मेधावी प्रशासक” अपनी समझ आदिम समाज पर आरोपित करने के यत्न में करता है। आदिवासियों को संरक्षित क्यों रखा जाये, क्यों वहाँ सडकें न बने, स्कूल तोड दिये जायें, नहरें न हों आदि आदि ब्रम्हदेव शर्मा से पूछिये क्योंकि अबूझमाड को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने का विचार उनका ही था। इसका पालन इतनी कडाई से करवाया गया कि वहाँ जाने के लिये कलेक्ट्रेट से अनुमति लेनी पडती थी। आखिरकार मुख्यधारा से काट कर यह क्षेत्र राजेन्द्र जी के “मेधावियों” का स्वर्ग बना दिया गया। 

कहानी कहीं भी ‘एसा होना चाहिये’ या ‘एसा नहीं किया जाये’ आदि नहीं कहती। तरुण भटनागर की कहानी घटनाओं का भावुक प्रस्तुतिकरण है जो पाठकों को वस्तुस्थिति समझने का दृष्टिकोण प्रदान करती है। इस कहानी से आरंभ कर आप चाहे अरुन्धति को पढे या गौतम को किसने रोका है? क्यों एक लेखक कहानी को वैसे ही लिखे जैसा कि परिपाटी है या जैसा सम्पादक चाहता है। खारिज कीजिये लेकिन जायज कारणों पर; अन्यथा पत्रिकाओं को यह साफ-साफ लिखना चाहिये कि वे “वाम राजनीतिक विचारधारा की प्रचार पुस्तिकायें” हैं, इससे निर्पेक्ष लेखकों को सुविधा रहेगी कि वे अपनी रचनाओ को कहाँ भेजें। दूसरी बात राजेन्द्र जी ये सरकारी, संघी, सत्ता-वत्ता वाली गालियाँ देने की बजाय प्रस्तुत कथानकों पर अच्छी चर्चायें तो तो बेहतर रहेगा अन्यथा पत्रिकाओं की हालत आप जाते ही हैं। यह एसी ही वृत्तियों का नतीजा है कि पाठक प्रकाशित एकमत – एकसुर और एकनिश्कर्ष से उकता गया है। यह हिन्दी, सम्पादकों की ही मारी बिचारी है। अंत में इस बात के लिये राजेन्द्र यादव की सराहना करूंगा कि उन्होंने तरुण के साथ अपने पत्राचार को प्रकाशित किया और उनकी कहानी भी छाप दी। क्या तरुण से पत्रोत्तर पाने के बाद कहानी से ‘सरकारी’ होने का दाग धुल गया था अथवा हंस के सम्पादक की आँखें खुल गयी थीं; यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। 

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Thursday, August 30, 2012

नेताजी सुभाष के साथी क्रांतिकारी मोहन लहरी पंचतत्व में विलीन [संस्मरण तथा अंतिम यात्रा की तस्वीरें]

दैनिक छत्तीसगढ (रायपुर) में प्रकाशित संस्मरण 

दैनिक छत्तीसगढ - दिनांक 30 अगस्त 2012 (पृष्ठ - 8)

पृष्ठ 8 से आगे----
दैनिक छत्तीसगढ - दिनांक 30 अगस्त 2012 (पृष्ठ - 11)

सान्ध्य दैनिक - ट्रू सोल्जर (रायपुर) में प्रकाशित संस्मरण
सान्ध्य दैनिक ट्रू सोल्जर (30.08.2012)
दिनांक 30.08.2012 की सुबह महान क्रांतिकारी तथा नेताजी सुभाष के साथी श्री मोहन लहरी का देहावसान हो गया। 
पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंतिम यात्रा कांकेर शहर के मुख्य मार्गों से हो कर निकाली गयी। 
 जिला प्रशासन के सहयोग से कांकेर के गणमान्य नागरिकों एवं कुछ पत्रकारों की उपस्थ्ति में उन्हें अंतिम प्रस्थान स्थल तक पहुँचाया गया। 
गार्ड ऑफ ऑनर देने के पश्चात उनके पार्थिव शरीर को अग्नि प्रदान की गयी। 
मोहन लहरी अमर हो गये। वे बस्तर की धरती को यह सौभाग्य दे गये कि इसकी मिट्टी में एक सच्चा सपूत आज मिल कर एकाकार हो गया। 
चित्र सौजन्य कांकेर से पत्रकार मित्र तामेश्वर सिन्हा। 

Thursday, August 23, 2012

बस्तर, प्राचीन स्त्रीराज्य की विरासत है – संदर्भ: महाभारत काल

सान्ध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 23.08.2012 को प्रकाशित 

स्त्री नें हमेशा बराबरी और सम्मान की लडाई लडी है। भारत भर में एसे उदाहरण कम ही देखने को मिले हैं जहाँ उसने यह अधिकार पाया है। इस आधी आबादी के पास अगर कोई उदाहरण है तो वह पाषाणकालीन अतीत की ओर इशारा करता है जब मातृसत्तात्मक जीवन शैलियों का चलन था। प्राचीन बस्तर क्षेत्र जिसे रामायण काल में “दण्डकारण्य”, महाभारत काल में “कांतार” तथा गुप्त काल में “महाकांतार” कहा गया एक एसे इतिहास की ओर इशारा करता है जहाँ लगभग तेरहवी शताब्दी के पूर्वार्ध (1335 ई.) तक स्त्रीसत्ता का ही प्रमुखता से उल्लेख प्राप्त होता है। महाभारतकालीन वीरांगना प्रमिला से आरंभ हो कर यही विशिष्ठता नागकालीन राजकुमारी मासक देवी तक पहुँचती है; यद्यपि कालांतर में भी “रानी चो रिस (1878-1882 ई.)” जिसमें कि तत्कालीन रानी जुगराज कुँअर नें अपने ही पति राजा भैरमदेव के विरुद्ध सशस्त्र आन्दोलन का संचालन किया था; राजमाता सुबरन कुँअर जो कि 1910 के महान भूमकाल के सूत्रधारों में थीं तथा महारानी प्रफुल्लकुमारी देवी (1921-1936 ई.) जिन्होंने बैलाडिला की खदानों को निजाम के हाँथो जाने से बचाने के लिये प्राणों की आहूति दे दी जैसे उदाहरण मिलते हैं। क्या एक लम्बे समय तक युद्ध में उलझ जाने और उसके पश्चात शांतिकाल में प्राचीन दण्डकारण्य एक स्त्री-शासित प्रदेश बन गया था? इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन बस्तर में रामायणकाल को दो संस्कृतियों के संघर्ष, मैत्री तथा सम्मिश्रण का समय माना जायेगा। इसके बाद का समय अपेक्षाकृत स्थायित्व दर्शाता है; बडी सभ्यताओं नें अपनी अपनी सुविधा के क्षेत्रों पर अब तक कब्जा हासिल कर लिया है तथा प्राचीन बस्तर अंचल पुन: अपने आप में सिमटता जाता प्रतीत होता है। 

इस काल खण्ड तथा इसकी विशेषताओं पर चर्चा करने से पूर्व उन तथ्यों पर बात करते हैं जो मूल महाभारत कथा के साथ “कांतार” अर्थात प्राचीन बस्तर का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। उत्तरापथ में आर्यों का समुचित विस्तार हो गया था अत: महाभारत की मूल कथा वहीं से अपना अधिक सम्बन्ध रखती है तथापि पाण्डवों के वनवास के कुछ प्रसंग कांतार की भूमि में घटित हुए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि वर्तमान बस्तर के कई गाँवों के नाम महाभारत में वर्णित पात्रों पर आधारित हैं, उदाहरण के लिये गीदम के समीप नकुलनार, नलनार; भोपालपट्टनम के समीप अर्जुन नली, पुजारी; कांकेर के पास धर्मराज गुडी; दंतेवाड़ा में पाण्डव गुडी नामक स्थलों प्रमुख हैं। कई आदिवासी देवता भी इस कालखण्ड का पुरातत्व अपने नामों में छुपाये हुए हैं जिनमें प्रमुख हैं -  भीमुलदेव, पाण्डुरों, पाण्डुराजा आदि। बस्तर की परजा (घुरवा) जनजाति अपनी उत्पत्ति का सम्बन्ध पाण्डवों से जोड़ती है। बस्तर भूषण (1908) में पं केदारनाथ ठाकुर नें उसूर के पास किसी पहाड़ का उल्लेख किया है जिसमें एक सुरंग पायी गयी है। माना जाता है कि वनवास काल में पाण्डवों का यहाँ कुछ समय तक निवास रहा है। इस पहाड के उपर पाण्डवों के मंदिर हैं तथा धनुष-वाण आदि हथियार रखे हुए हैं जिनका पूजन किया जाता है। महाभारत के आदिपर्व में उल्लेख है कि बकासुर नाम का नरभक्षी राक्षस एकचक्रा नगरी से दो कोस की दूरी पर मंदाकिनी के किनारे वेत्रवन नामक घने जंगल की सँकरी गुफा में रहता था। वेत्रवन आज भी बकावण्ड क्षेत्र में मिलते हैं तथा यह नाम बकासुर से साम्यता दर्शाता भी प्रतीत होता है; अत: यही प्राचीन एकचक्रा नगरी अनुमानित की जा सकती है। बकासुर भीम युद्ध की कथा अत्यधिक चर्चित है जिसके अनुसार एकचक्रा नगर के लोगों नें बकासुर के प्रकोप से बचने के लिये नगर से प्रतिदिन एक व्यक्ति तथा भोजन देना निश्चित किया। जिस दिन उस गृहस्वामी की बारी आई जिनके घर पर पाण्डव वेश बदल कर माता कुंती के साथ छिपे हुए थे तब भीम नें स्वयं बकासुर का भोजन बनना स्वीकार किया। भीम-बकासुर का संग्राम हुआ अंतत: भीम नें उसे मार डाला। महाभारत में वर्णित सहदेव की दक्षिण यात्रा भी प्राचीन बस्तर से जुडती है। दो तथ्य रुचिकर लग सकते हैं पहला कि भीम शब्द का सम्बन्ध बस्तर क्षेत्र के अनेक देवताओं से जुडना सिद्ध होने के बाद भी विष्णु पुराण में यह उल्लेख मिलता है कि कांतार निवासी, कौरवों की ओर से महाभारत महा-समर में सम्मिलित हुए थे। द्रौपदी के लिये सम्मान का भी जनजातियों में अभाव दिखता है विशेषरूप से दण्डामि माडिया ‘बोली’ में ‘पांचाली’ एक अपशब्द है।

कृष्ण का आगमन भी कांतार भूमि मे हुआ है। कांकेर (व धमतरी) के निकट सिहावा के सुदूर दक्षिण में मेचका (गंधमर्दन) पर्वत को मुचकुन्द ऋषि की तपस्या भूमि माना गया है। मुचकुन्द एक प्रतापी राजा माने गये हैं व उल्लेख मिलता है कि देव-असुर संग्राम में उन्होंने देवताओं की सहायता की। उन्हें समाधि निद्रा का वरदान प्राप्त हो गया अर्थात जो भी समाधि में बाधा पहुँचायेगा वह उनके नेत्रों की अग्नि से भस्म हो जायेगा। मुचकुन्द मेचका पर्वत पर एक गुफा में समाधि निन्द्रा में थे। इसी दौरान का कालयवन और कृष्ण का युद्ध चर्चित है। कृष्ण कालयवन को पीठ दिखा कर भाग खडे होते हैं जो कि उनकी योजना थी। कालयवन से बचने का स्वांग करते हुए वे उसी गुफा में प्रविष्ठ होते हैं तथा मुचकुन्द के उपर अपना पीताम्बर डाल कर छुप जाते हैं। कालयवन पीताम्बर से भ्रमित हो कर तथा कृष्ण समझ कर मुचकुन्द ऋषि के साथ धृष्टता कर बैठता है जिससे उनकी निद्राभंग हो जाती है। कालयवन भस्म हो जाता है। यही नहीं, कृष्ण के साथ बस्तर अंचल से जुडी एक अन्य प्रमुख कथा है जिसमें वे स्यमंतक मणि की तलाश में यहाँ आते हैं। ऋक्षराज से युद्ध कर वे न केवल मणि प्राप्त करते हैं अपितु उनकी पुत्री जाम्बवती से विवाह भी करते हैं।    

महाभारत में दक्षिण क्षेत्र के माल जनपद का उल्लेख मिलता है। कालिदास नें भी मेघदूत में माल क्षेत्र के भूगोल की विस्तृत व्याख्या की है जो इसे रामगिरि (ओडिशा) से  उत्तर पश्चिम का क्षेत्र (कांतार) घोषित करते हैं। महाभारत में माल क्षेत्र को शाल वन से घिरा हुआ बताया गया है। इस आधार पर माल जनपद की मालदा अथवा मालवा के पठार से की जाने वाली तुलना तर्कपूर्ण नहीं प्रतीत होती व इसे कोरापुट तक विस्तृत प्राचीन बस्तर का क्षेत्र ही माना जाना चाहिये। बस्तर का वर्तमान में बहुचर्चित क्षेत्र माड़ वस्तुत: माल जनपद के अपभ्रंश के रूप में आज भी जाना जाता है एवं यहाँ के निवासी माडिया कहे जाते है।    

एक रोचक कथा का उल्लेख मिलता है। युधिष्ठिर नें जब अश्वमेध यज्ञ का घोडा छोडा था, तब उस घोडे की रक्षा में स्वयं अर्जुन सेना के साथ चला था। दक्षिण की ओर चलते चलते युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ का घोडा “स्त्री राज्य” में पहुँच गया। - “उवाच ताम महावीरान वयं स्त्रीमण्डले स्थिता:” (जैमिनी पुराण)। स्त्री राज्य (कांतार) की शासिका का नाम प्रमिला था। उल्लेखों से ज्ञात होता है वह बड़ी वीरांगना थी। प्रमिला देवी के आदेश से अश्वमेध यज्ञ के घोडे को बाँध कर रख लिया गया। घोडे को छुडाने के लिये अर्जुन नें रानी प्रमिला तथा उनकी सेना से घनघोर युद्ध किया; किन्तु आश्चर्य कि अर्जुन की सेना लगातार हारती चली गयी। स्त्रियाँ युद्ध कर रही थीं इसका अर्थ यह नहीं कि वे साधन सम्पन्न नहीं थी जैमिनी पुराण से ही यह उल्लेख देखिये कि किस तरह स्त्रियाँ रथों और हाँथियों पर सवार हो कर युद्धरत थीं – “रथमारुद्य नारीणाम लक्षम च पारित: स्थितम। गजकुम्भस्थितानाम हि लक्षेणापि वृता बभौ॥“; इसके बाद युद्ध का जो वर्णन है वह प्रमिला का रणकौशल बयान करता है। प्रमिला नें अपने वाणों से अर्जुन को घायल कर दिया। अब अर्जुन नें छ: वाण छोडे जिन्हें प्रमिला नें नष्ट कर दिया। विवश हो कर अर्जुन को ‘मोहनास्त्र’ का प्रयोग करना पड़ा जिसे प्रमिला नें अपने तीन सधे हुए वाणों से काट दिया। अब प्रमिला अर्जुन को ललकारते हुए बोली – “मूर्ख! तुझे इस छोटी सी लडाई में भी दिव्यास्त्रों का अपव्यय करना पड़ गया?” – [प्रमीला मोहनास्त्रं तत सगुणम सायकैस्त्रिभि:। छित्वा प्राहार्जुनं मूढ! मोहनास्त्रम न भाति ते॥]  इस उलाहने नें अर्जुन के भीतर ग्लानि भर दी। अर्जुन नें रानी प्रमिला के समक्ष विनम्रता का परिचय दिया एवं संधि कर ली। इसके बाद ही यज्ञ के घोडे को मुक्त किया गया। 

अपने आलेख का प्रारंभ मैने स्त्री अस्मिता तथा उसके प्रतिमानों के उदाहरणों के तौर पर प्राचीन बस्तर को सामने रख कर किया था। इस कथन की पुष्टि मार्कण्डेयपुराण, वात्स्यायन के कामसूत्र, वाराहमिहिर की वृहत्संहिता तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों में वर्णित उल्लेखों से भी होती है। वस्तुत: कांतार के स्त्रीराज्य होने का विवरण सर्वप्रथम महाभारत में ही मिलता है जहाँ शांति पर्व में उल्लेख है कि कलिंग के राजा की पुत्री चित्रांगदा के स्वयंवर के अवसर पर स्त्री राज्य के अधिपति सुग्गल भी आये थे -  सुग्गलश्च महाराज: स्त्री राज्याधिपतिश्च य:। यह स्त्री राज्य एक बडे विमर्श की पृष्ठभूमि बनता है। कौटिल्य नें जिस तरह से कांतार में स्त्री राज्य का उल्लेख किया है उसके अनुसार यह प्रतीत होता है कि दक्षिण से उत्तर की ओर लाये जाने वाले माणिक्यों को इस राज्य से हो कर गुजरना पडता था। साथ ही इस क्षेत्र के खनिजों की जानकारी व महत्ता का विवरण भी चाणक्य उपस्थित करते हैं। महाभारत काल से आगे बढ कर नाग युग के आगमन तथा उसके बहुत बाद भी स्त्री ही सामाजिक व्यवस्था की धुरी बनी रही है। वात्स्यायन का कामसूत्र स्त्री राज्य के अंत:पुर में पुरुषों के होने की व्यवस्था का वर्णन करता हैं – ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च युवानांअंतपुरसधर्माणा एकैकस्या: परिग्रहभूता:। वस्तुत: रामायणकाल तथा महाभारत काल के उल्लेख कालांतर में घटित हुई परिस्थितियों की भूमिका बने हैं। वर्तमान समय के स्त्री विमर्श को भी पुरा अतीत की पृष्ठभूमि में ही समझना होगा तभी हम आधुनिक सामाजिक संगठनों को समझ सकते हैं।    
   
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प्रस्तुत दीवार चित्र प्राचीन बस्तर के महाभारत काल से सम्बन्धित उस कथा से जुडा है जब कृष्ण चतुराई से कालयवन का वध करते हैं। 

Tuesday, August 07, 2012

दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी {प्राचीन बस्तर का समाजशास्त्र [संदर्भ: - रामायण काल]}

सांध्य दैनिक ट्रू-सोल्जर (रायपुर) से दिनांक 7.08.2012 को प्रकाशित
बस्तर पर जानकारी एकत्रीकरण के लिये आर्य-द्रविड अंतर्सम्बन्धों को बारीकी से समझना आवश्यक है। वस्तुत: हमारे पूर्वाग्रह गहरे हैं तथा हम अपनी-अपनी पहचान की मानसिकताओं के साथ इतने अधकचरे तरीके से जुडे हुए हैं कि यह मानते ही नहीं कि वह सब कुछ जो भारत भूमि से जुडा हुआ है, हमारा ही है; आर्य भी हम हैं और द्रविड भी हम। अपनी ही चार पीढी से उपर के पूर्वजों का नाम जानने में दिमाग पर बल लग जाते हैं फिर किस काम का वह छ्द्म गौरव जो हमारी मानसिकताओं को वर्ण और रक्त की श्रेष्ठताओं जैसी अनावश्यक बहसों में उलझाता है। रामधारी सिंह दिनकर की कृति “संस्कृति के चार अध्याय” एक उत्कृष्ट रचना है जो एसी सभी बहसों को अपने तार्कित उत्तर से संतुष्ट करती है। “मूल निवासी कौन?” इस झगडे का निबटारा तो शायद वह पहली कोषिका भी नहीं कर सकती जिसके विभाजन नें ही यह सम्पूर्ण जीवजगत पैदा किया है। जब यह धरती सबकी एक समान रही होगी तब हर रंग, हर रूप तथा हर नस्ल का मानव यहाँ यायावरी करता हुआ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र भटकता रहा होगा। इस भूमि पर कई घूमंतू मानव प्रजातियों ने कदम रखे; जब द्रविड इस देश में आये यहाँ आग्नेय जाति (अनुमानित मूल स्थान - यूरोप के अग्निकोण) वालों की प्रधानता थी और कुछ नीग्रो जाति (अनुमानित मूल स्थान - अफ्रीका) के लोग भी विद्यमान थे। अत: अनुमान किया जा सकता है कि नीग्रो और आग्नेय लोगों की बहुत सी बातें पहले द्रविड सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान पश्चिम एशिया) में आयीं और पीछे द्रविड-आर्य मिलन होने पर आर्य सभ्यता (अनुमानित मूल स्थान मध्य एशिया) में भी। वर्तमान भारत क्षेत्र में रहने वाले प्राचीन निवासियों के मूल स्थानों के लिये मैने इतिहास की कई पुस्तकों में भी झांका लेकिन अधिकांश में पूर्वाग्रह ही अधिक नजर आता है। अत: दिनकर की ही पुस्तक के उद्धरण मुझे उचित जान पडते हैं जो “अंडा पहले आया कि मुर्गी” वाली बहस को अधिक तूल न दे कर समरस्ता के मर्म की बात करते हैं। 

 प्राचीन बस्तर रामायणकाल में दक्षिणा पथ की बहुतायत गतिविधियों का केन्द्र रहा होगा तथा इस सब का प्रारंभ महर्षि अगस्त्य के विन्ध्य पर्वत पार करने की रोचक कथा के साथ होता है। कथा नें कविता तत्व की मोटी गिलाफ ओढी हुई है। कथा कहती है कि विन्ध्य अपना आकार निरंतर बढा रहा था जिस कारण सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर पहुँचनी बन्द हो गई। इससे निजात पाने के लिये महर्षि ने विंध्याचल पर्वत से कहा कि उन्हें तप करने हेतु दक्षिण में जाना है अतः मार्ग दे। विंध्याचल महर्षि के चरणों में झुक गया। अगस्त्य ने कहा कि विन्ध्य उनके वापस आने तक झुका ही रहे तथा वे पर्वत को लाँघकर दक्षिण को चले गये। उसके पश्चात वहीं आश्रम बनाकर तप किया तथा रहने लगे। यह दक्षिण की महत्ता तथा विन्ध्य की दो संस्कृतियों के बीच दीवाल की तरह खडे होने की पुष्टि करती हुई कथा है। प्राचीन आश्रम संस्कृति तथा शिक्षा प्रणालियों का अध्ययन करने पर यह समझ विकसित होती है कि अगस्त्य एक पूरी संस्था की तरह कार्य कर रहे थे तथा वे उत्तर दक्षिण को एक सूत्र में बाँधने की प्रथम ज्ञात कडी हैं। हमनें उनका एक अध्यापक, एक उपदेशक, एक ज्ञानी, एक यायावर, एक दिव्यास्त्र निर्माता तथा योजनाकार का रूप तो जाना है लेकिन उनकी वास्तविक उपलब्धि कम ही लोग जानते हैं कि महर्षि अगस्त्य नें ही तमिल भाषा के आदि व्याकरण “अगस्त्यम” की रचना की है। यह रचना सिद्ध करती है कि अगस्त्य केवल दण्डकारण्य तक ही सीमित नहीं रहे अपितु सुदूर दक्षिण तक उन्होंने यात्रा की व वहाँ का जन जीवन यहाँ तक कि भाषा को भी एक व्यवस्था प्रदान करने का यत्न किया। 

दण्डकारण्य के प्राचीन समाजशास्त्र का आज भी महत्व विद्यमान है। दक्षिणापथ का उत्तरी भाग था दण्डकारण्य; यहाँ राक्षस जाति के निवास की जगह उनके आक्रमणों का ही विवरण अधिक मिलता है। प्राचीन विवरणों के आधार पर उन जनजातियों को जिन्हें राक्षस कहा गया है, उनका निवास दक्षिण के बस्तरेतर क्षेत्र अर्थात आन्ध्र व उस से लग कर सुदूर दक्षिण तक प्रतीत होते हैं। यह भी ज्ञात होता है कि लम्बे समय तक क्षेत्र में किसी समाजसेवी की तरह कार्य करते हुए अगस्त्य नें दण्डकारण्य क्षेत्र में निवासरत अनेक जनजातियों के मध्य समन्वय का वातावरण उत्पन्न कर लिया था। महर्षि अगस्त्य का आश्रम क्षेत्र वर्तमान बस्तर के भीतर ही था जो इस दिशा में किये गये श्री सूर्य कुमार वर्मा के 1906 में सरस्वति पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख द्वारा भली प्रकार सिद्ध किया गया है। राम के वनवास से पहले तक अगस्त्य मुनि का आश्रम ही दो संस्कृतियों का समंवय स्थल बन गया था जिसका स्थानीय जनजातियों के सहयोग और योगदान के बिना संचालित होना संभव प्रतीत नहीं होता। राम के वनागमन से पूर्व इस क्षेत्र में निवासरत जनजातियों पर राक्षसों के कुछ हमलों का जिक्र होता है; उदाहरण के लिये लंका को हस्तगत करने के बाद रावण दक्षिण विजय के लिये निकला जिसका कि उल्लेख वाल्मीकी रामायण में मिलता है – युद्धं मे दीयतामिति निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत [वह दक्षिण में एक नगर से दूसरे नगर पहुँचता और चुनौती देता कि या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो]। वानर जनजाति का नेतृत्व कर रहे बालि नें रावण को न केवल युद्ध में पराजित कर दिया अपितु बंदी भी बना लिया। इस प्रसंग का अंत होता है जब रावण-बालि संधि हो जाती है। रावण नें बालि के अलावा मांधाता (बस्तर का वर्तमान मंधोता ग्राम) के जनजातियों के सरदारों से भी समझौते कर लिये और लंका लौटने से पहले दण्डकारण्य क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि खर-दूषण के रूप में किसी निगरानी चौकी या सत्ता प्रतीक की तरह छोड दिये थे। उल्लेख मिलता है कि उनके साथ चौदह हजार राक्षसों की एक टुकडी भी थी जिसका कार्य आतंक प्रसारित कर रावण की सत्ता का भय बनाये रखना था। यह कथा आगे बढती है जब राम का वनागमन होता है। पं केदारनाथ ठाकुर अपनी कृति बस्तर भूषण (1908) में उल्लेख करते हैं कि “राम पहले भारद्वाज आश्रम से होते हुए रत्नगिरि में आये। रत्नगिरि से चल कर बस्तर राज्य तथा कांकेर राज्य की पश्चिमी सीमा से होते हुए वे गोदावरी तक आये, वहाँ से गोदावरी के बहाव की ओर कुछ दिन घूमते रहे तत्पश्चात पर्णशाला में आ कर निवास किया। यहीं पर सीता हरण हुआ। रामचन्द्र जी सीता को गोदावरी नदी के पूर्व तथा इशान में ढूंढने लगे। यही पर उनकी शिवरी भीलनी (शबरी) से भेंट हुई। शिवरी नदी (शबरी नदी) के पूर्व तथा जैपुर राज्य में एक पर्वत है जिसे आज रामगिरि के नाम से जाना जाता है उसके चारो ओर असंख्य छोटी बडी पहाडियाँ हैं, इसी समूह में उत्तर की ओर रंफा पहाड है जिसे जैपुर स्टेट के लोग किष्किंधा पहाड़ कहते हैं। इन पहाडों पर वर्तमान समय में रेड्डी लोग वास करते हैं जो स्वयं को वानर का वंशज मानते हैं”।

बहुत अधिक कार्य अब तक इस दिशा में नहीं हुए हैं जो इतिहास प्रदत्त प्रमाणों का बारीकी से विश्लेषण करें। ब्रिटिश शासक ग्रिग्सन नें 1937 ई. में इस काल के प्रमाणों को एकत्र करने व दस्तावेजबद्ध करने के लिये कैप्टन गिब्सन को नियुक्त किया था। कहा जाता है कि गिब्सन नें बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित भी कर ली थी। उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड गया। गिब्सन सारी एकत्र सामग्री व जानकारी को ले कर इंग्लैंण्ड चले गये व वहीं युद्ध में मारे गये। इसके बाद स्वतंत्र भारत के किसी शासक, नेता या जिलाधीश नें इस तरह का कार्य करने की जहमत नहीं उठायी। अगला प्रामाणिक कार्य उपलब्ध होता है डॉ. हीरालाल शुक्ल का जिनकी किताब “लंका की खोज” एवं “रामायण का पुरातत्व” अद्वितीय दस्तावेज हैं। डॉ. शुक्ल नें बस्तर क्षेत्र में उपस्थित रामायणकालीन जनजातियों की वर्तमान जनजातियों से तुलना व साम्यता को विस्तार से प्रस्तुत करने का यत्न किया है। उनके अनुसार रामायण युगीन वनेचर प्रजातियों में आग्नेय परिवार से सम्बद्ध जनजातियाँ हैं - निषाद, गृद्ध तथा शबर; अगर मध्यवर्ती द्रविड परिवार की बात की जाये तो उससे सम्बद्ध प्रजातियाँ हैं – वानर तथा राक्षस। 

रामायण में चिन्हित आग्नेय परिवार की जनजातियों नें आर्यों से शीघ्र निकटता तथा मैत्री कर ली थी। निषाद प्रजाति का उल्लेख मूल रूप से उत्तरप्रदेश के संदर्भों में प्राप्त होता है। राम को गंगा पार कराना एवं राम-निषाद मैत्री का बडा ही मर्मस्पर्शी वर्णन रामायण में प्राप्त होता है। बस्तर के ‘कुण्डुक’ स्वयं को निषाद वंश का मानते हैं तथा इस जनजाति का विश्वास है कि वे त्रेता युग में राम के साथ ही गंगातट से दण्डक तक आये। यह प्रजाति आज भी नाविक ही है एवं इनकी उपस्थिति चित्रकूट के निकटवर्ती क्षेत्रों में सीमित रह गयी है। रामायण में वर्णित दूसरी प्रजाती है गृद्ध। गोदावरी की पार्श्ववर्ती पर्वतमालाओं पर इनका निवास माना गया है। गिद्ध इन जनजातियों का प्रतीक रहा होगा। इनके प्रमुख नायक सम्पाति तथा जटायु का आर्य जनजातियों से तालमेल प्रतीत होता है। रामायण में पंख कटने के बाद जिस प्रस्त्रवण पर्वत (बैलाडिला) के निकट जटायु के दम तोडने का वर्णन है उस स्थल को आज गीदम के नाम से जाना जा रहा है। जगदलपुर के जाटम ग्राम में अब भी गदबा जनजाति के घर हैं जिनका सम्बन्ध गृद्ध प्रजाति से जोड कर देखा जाता है। बस्तर की गदबा प्रजाति प्रतीक पूजक है तथा गृद्ध आज भी इनके यहाँ “टोटेम” है। जिस प्रकार बस्तर में हल प्रतीक के वाहकों को हलबा कहा गया उसी प्रकार गृद्ध प्रतीक के वाहक गदबा कहलाने लगे। यह प्रजाति आज विलुप्ति पर पहुँच गयी है। लोग कृषक अथवा मजदूर हैं तथा अब इन्हें पहचानना कठिन होता जा रहा है। राम-शबरी मिलन और शबरी के प्रेम से खिलाये गये जूठे बेर एक महान प्रेरक प्रसंग है। इसी कथा नें शबर जनजाति की पहचान को उसकी प्राचीनता से जोडा है। ऐतरेय ब्राम्हण में शबरों को आर्य देश की सीमा पर स्थित बताया गया है अत: यह क्षेत्र निश्चित ही दण्डकारण्य है। साक्ष्यों के आधार पर एवं पुरा-भूगोल पर किये गये विश्लेषण के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि शबरी का आश्रम शबरी तथा गोदावरी नदी के संगम पर स्थित था। डब्ल्यु जी ग्रिफिथ नें मध्य भारत की कोल प्रजाति को शबर माना है (क़ोल ट्राईब्स ऑफ सेंट्रल इंडिया, 1946)। डॉ. हीरालाल शुक्ल भी इन्हें ओडिशा और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में चिन्हित करते हैं। शबर जनजाति के लोग गोंड अथवा खोंड की तुलना में भिन्न होते हैं। इनकी स्त्रियाँ नासिका तथा हनु में गुदना करती हैं एवं कपोलों में भी गहरी रेखायें गुदवाती हैं। कर्ण-आभूषण दर्शनीय होते हैं व कान में चौदह तक छेद कराने का चलन पाया गया है। प्राचीन ग्रंथों के आधार पर शबरों के दो विभेद पाये गये हैं – पर्ण शबर तथ नग्न शबर। नग्न शबर प्रजाति आर्यों के निकट नहीं आ पायी थी व अपनी मूलावस्था में रहने के कारण यह नामांकरण हुआ है। बंडा परजा जनजाति ही नग्न शबर मानी जाती है। 

मध्यवर्ती द्रविड परिवार की वानर तथा राक्षस जातियाँ एक समय में ताकतवर तथा सक्रियतम रही हैं। यह तो पहचान ही लिया गया है कि काकिनाडु (पूर्वी गोदावरी) सहित कोरापुट व कालाहाँडी के आंशिक क्षेत्र किष्किन्धा जनपद के अंतर्गत आते थे। रामायण में किष्किन्धा के निवासियों के लिये वानर पहचान का प्रयोग है। वानरो की जो प्रजातिगत विशेषतायें कही जाती हैं उसके अनुसार वे भावुक, चपल, ताम्रवदना अथवा कनकप्रभ उल्लेखित होने के कारण सोने जैसे वर्ण के होते थे। आज भी खम्माम, बस्तर, कोरापुट तथा कालाहाण्डी की आदिम प्रजातियाँ (इन क्षेत्रों में निवास करने वाली कंध जनजातियों को विद्वानों नें वानर माना है) बालि का स्मरण करती हैं। बस्तर में बालिजात्रा धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। कंध प्रजाति का गोत्र चिन्ह वानर है तथा वंशों के नाम सुग्री, जाम्ब तथा हनु आदि मिलते हैं। नृत्य आदि अवसरों पर कंध लोग आज भी पूँछ धारण करते हैं। कन्ध के अन्य पर्यायवाची खोंड, कोडा, कुई तथा कुवि हैं जो इन्हें कोयतुर (गोंड) जनजातियों के निकट सिद्ध करते हैं। प्रकृति की दृष्टि से ये लोग दण्डामि माडिया के भी निकट नजर आते हैं। रामायण में जिसे राक्षस कहा गया है वैदिक साहित्य नें उन्हें दस्यु सम्बोधित किया है। यह जनजाति प्रखर योद्धा रही है तथा इन्होंने आर्यों की आधीनता को अस्वीकार कर सर्वदा युद्ध का मार्गानुसरण किया है। राक्षसों के लिये ऋग्वेद में क्रव्याद: अर्थात कच्चा मांसाहार करने वाले; मृघ्रवाच: अर्थात जिनकी भाषा न समझ आये; अदेवयु: अर्थात देवताओं को न मानने वाले; अनास अर्थात जिनकी नाक छोटी व उठी हुई हो; शिश्नदेवा: अर्थात लिंगोपासक कहा गया है। इनमें गर्धर्व विवाह का प्रचलन था तथा बलात् विवाह करने की वृत्ति को भी बाद में राक्षस विवाह नामांकरण से जाना गया। राक्षसों के भी तीन विभेद बताये गये हैं - विराध (असुर), दनु (दानव) तथा रक्ष (राक्षस)। ये तीनों सैद्धांतिक रूप से एक साथ रावण की सत्ता में प्रतीत होती हैं किंतु रावण के घायल होने पर विराध (असुर) शाखा का प्रसन्नता व्यक्त करना (वाल्मीकी रामायण 6.59.115-6) यह बताता है कि ये आपसी मतभेद के भी शिकार थे। विराध शाखा की उपस्थिति दण्डकारण्य के दक्षिणी अंचल में मानी जाती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण नें इन्द्रावती व गोदावरी के मध्य के अनेक दानवों (दनु शाखा) का वध किया था – हंतारं दानवेन्द्राणाम। राक्षसों (रक्ष शाखा) की मूल उपस्थिति को आन्ध्रप्रदेश से माना जा सकता है।

रामायण कालीन बस्तर के जटिल समाजशास्त्र को समझने के लिये उपरोक्त सभी विवरणों को एक साथ देखना होगा। दण्डकारण्य की अपनी ही तरह की संस्कृति थी जिसमें गंगाजमुनी सम्मिश्रण होने लगा तब भी उसनें इन्द्रावती का वेग और गोदावरी की विराटता को मजबूती से थामे रखा। यह दो संस्कृतियों के मध्य का क्षेत्र होने के कारण कई अनेकताओं का समागम स्थल है। यह ज्ञात होता है कि कई जनजातियाँ जैसी अवस्था में रामायण काल में रहती होंगी अब भी उनमें बहुत कुछ नहीं बदला है। यहाँ के समाजशास्त्र नें दक्षिण से उसकी पहचान अलग रखी व उत्तर से भी स्वयं को मिलने नहीं दिया। यहाँ से जुडे केवल आर्य-द्रविड युद्ध के ही प्रसंग नहीं हैं अपितु कई द्रविड प्रजातियों के आपसी संघर्ष का भी यह क्षेत्र रहा है जहाँ समय समय पर शक्तिशाली आर्य व रक्ष प्रजातियों ने कभी मैत्री तो कभी युद्ध द्वारा अपनी शक्ति व सत्ता के केन्द्र स्थापित किये। यह अनोखा स्थल है जहाँ आश्रम संस्कृति भी पूरे चरम पर थी तो उसका विरोध भी पूरी निर्ममता से होता रहा। मेरा मानना है कि प्राचीन ग्रंथों से मिल रहे सूत्रों को जब तक इतिहासकार बारीकी से नहीं पकडेंगे वे बस्तर के अतीत की न्यायपूर्ण व्याख्या नहीं कर सकेंगे। वर्तमान में दण्डकारण्य क्षेत्र पुन: युद्धभूमि बना हुआ है तथा आन्ध्र ओडिशा महाराष्ट्र से भीतर घुस कर खास विचारधारा के बुद्धिजीवियों नें इसे अपना उपनिवेश बना लिया है। युद्धरत दिखने वाले लोग बस्तर की वही जनजातियाँ हैं जिनमें से प्रत्येक अपनी पुरातन परम्पराओं की थाती सम्भाले अतीत का जीवत प्रमाण है। दुर्भाग्य!! बस्तर से यह विरासत मिट जायेगी।

[यह तस्वीर मित्र राकेश सिंह जी के संकलन से]
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Friday, August 03, 2012

बस्तर के भौगोलिक परिवेश पर विमर्श - रामायण काल से वर्तमान तक

सांध्य दैनिक ट्रू सोल्जर में दिनांक 3.08.2012 को प्रकाशित

मैं इन्द्रवती नदी के बूँद-बूँद को, अपने दृगजल की भाँति जानता आया हूँ। 
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प्राचीन बस्तर अथवा दण्डकारण्य के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की आवश्यकता है। कितना जटिल था वह समाज अथवा कितना उनमुक्त? कितना बटा हुआ था अथवा कितना मिलनसार? यह समाज जिस भौगोलिक दायरे में बंधा हुआ था वह मायने रखता है। यदि हम वर्तमान की जनजातियों और उसकी प्राचीन बस्तर से किसी तरह की साम्यता देखने वाली अंतर्दृष्टि चाहते हैं तो प्राचीन पुस्तकें दिशा निर्देश देती हैं। वाल्मीकी  रामायण, महाभारत, वायु पुराण, मत्स्य पुराण, वामन पुराण, पद्म पुराण, मारकण्डेय पुराण, कालिदास रचित रघुवंश, भवभूति रचित उत्तर रामचरित, कथा सरितसागर आदि ग्रंथों में प्राप्त विवरणों के आधार पर प्राचीन बस्तर के भूगोल पर एक दृष्टि डाली जा सकती है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुरातनता में भारत भूमि के दो मोटे विभाजन उत्तरापथ तथा दक्षिणापथ के रूप में किये जा सकते थे तथा लम्बे समय तक इस स्पष्ट विभाजन की सीमा रेखा विन्ध्य पर्वत ही बना रहा है। रामायण काल से प्रारंभ हो कर लगभग तेरहवी शताब्दी तक दण्डकारण्य क्षेत्र की सीमा के अंतर्गत प्राचीन बस्तर राज्य, जयपुर जमीन्दारी, गोदावरी के उत्तर का कुछ क्षेत्र तथा चाँदा जमीन्दारी का क्षेत्र सम्मिलित था। यह भी उल्लेखनीय है कि दण्डकारण्य की स्वतंत्र पहचान रही है एवं इसकी उपस्थिति को कलिंगारण्य के समानांतर माना गया था। 

बस्तर क्षेत्र (दण्डकारण्य) का भौगोलिक अध्ययन सर्वप्रथम भवभूति नें किया था। रियासतकालीन बस्तर तथा उसके भूगोल का स-विस्तार वर्णन पं. केदारनाथ ठाकुर नें अपनी पुस्तक “बस्तर भूषण” (1908) में किया है। महाराजा प्रवीरचन्द्र नें अपनी पुस्तक “आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड” (1966) में तत्कालीन बस्तर रियासत के भूगोल की बानगी प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “प्रमुखत: यह कहा जा सकता है कि यह रियासती भूखण्ड उत्तरी सीमा से शनै:-शनै: ढलवा होता जाता है और दक्षिण सीमा गोदावरी तक निरंतर नीचा होता गया है”।  

लाला जगदलपुरी नें अपनी पुस्तक “बस्तर इतिहास एवं संस्कृति” में बस्तर क्षेत्र को चार प्राकृतिक विभागों में बाँटा है – 
अ) उत्तर की निचली भूमि जो छत्तीसगढ के मैदान का सिलसिला है। 
ब) उत्तरपूर्वी पठार – यह केशकाल की तेलिन घाटी से आरंभ हो कर जगदलपुर के दक्षिण में तुलसी डोंगरी तक गया है। 
स) अबूझमाड़ का क्षेत्र 
द) दंतेवाडा घाटी जिसके पूर्व में विशाल पठार उत्तर में अबूझमाड तथा पश्चिम में बैलाडिला की पहाडियाँ हैं। 

प्रो. जे. आर वर्ल्यानी तथा प्रो. व्ही डी साहसी नें अपनी पुस्तक “बस्तर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास” में इस वर्गीकरण को अधिक सरल करते हुए प्राकृतिक दृष्टि से बस्तर को छ: भागों में बाँटा है - 
अ) उत्तर का निम्न या मैदानी भाग – इसका विस्तार उत्तर बस्तर, परलकोट, प्रतापपुर, कोयलीबेड़ा, और अंतागढ़ तक है। 
ब) केशकाल की घाटी – यह घाटी तेलिन सती घाटी से प्रारंभ हो कर जगदलपुर के दक्षिण में स्थित तुलसी डोंगरी तक लगभग 160 वर्गमील क्षेत्र में विस्तृत है। 
स) अबूझमाड़ – यह क्षेत्र बस्तर के मध्य में स्थित है। इसके उत्तरपूर्व में रावघाट पहाडी घोडे की नाल की तरह फैली है। यहाँ कच्चे लोहे के विशाल भंडार हैं। 
द) उत्तरपूर्वी पठार- यह पठार कोंडागाँव और जगदलपुर में फैला है। पठार का ढाल तीव्र है। 
ई) दक्षिण का पहाडी क्षेत्र – इसके अंतर्गत दंतेवाडा, बीजापुर व कोंटा के उत्तरी क्षेत्र आते हैं। 
फ) दक्षिणी निम्न भूमि – इसके अंतर्गत कोंटा क्षेत्र का संपूर्ण भाग तथा बीजापुर क्षेत्र का दक्षिणी भाग आता है। 

भूगोल एक लम्बे कालखण्ड तक अपरिवर्तनशील रहता है जब तक कि बडे भू-वैज्ञानिक बदलाव न हों। अत: बस्तर क्षेत्र के वर्तमान भूगोल को ही प्राचीन पुस्तकों में शब्दश: चित्रित पाया जा सकता है कि यहाँ की मनोरम हरित वसना धरती पहाड़ों, पठारों और मैदानों में विभाजित है। दंतेवाड़ा की तराइयों, बीजापुर की उँचाईयों और केशकाल घाटी की खाईयों ने बस्तर को विविधता, विचित्रता और उन्मुक्तता दी है तो रहस्य और रोमांच भी। यहाँ खुले मैदान और सघन वन; उर्वरा खेत और बंजर पथरीली भूमि; नदियाँ, झरने, ताल-तलाब तो सूखे फटे पानी पानी चीखते टीले-टपरे; बेहिसाब गर्मी से बिबाईयाँ होते मैदान तो महीनों तक जम कर बरसने वाली बरसातें जसी स्पष्ट विविधतायें विद्यमान हैं। 

इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल नें पुरा-भूगोल पर अपनी पैनी दृष्टि डाली है तथा उन्होंने बस्तर की अनेक पर्वत श्रंखलाओं का सम्बन्ध प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त विवरणों के आधार पर बस्तर क्षेत्र से स्थापित किया है। उनके विवरणों का ही संक्षेपीकरण अन्य विद्वानों के विचारों की सहमतियों से मिलाते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ। पं. सुन्दरलाल त्रिपाठी, पं केदारनाथ ठाकुर, महाराजा प्रवीर, लाला जगदलपुरी, प्रो. वर्लयानी, प्रो. साहसी तथा डॉ. हीरालाल शुक्ल के विवरणों को जोड कर यह तस्वीर मिलती है कि प्राचीन बस्तर की उत्तरपूर्वी सीमा है शुक्तिमान/शुक्तिमत पर्वत [कनिंघम; आर्कियोलॉजिकल सर्वे रिपोर्ट, XIII, 24-26]। शुक्तिमान पर्वत वस्तुत: बस्तर को शेष छतीसगढ से पृथक करने वाली सिहावा तथा कांकेर के दक्षिण में स्थित पहाडियाँ हैं। शुक्तिमत पर्वत दण्डकारण्य की उत्तरपूर्वी सीमा है जो पूर्व में ओडोशा में अवस्थित महेन्द्र पर्वत से मिल जाती है। आधुनिक बस्तर की मातला दोंगरी, रावघाट, तेलिनघाटी तथा सिहावा पहाड़ की शाखाओं को प्राचीन शुक्तिमान पर्वत माना जा सकता है जो उत्तर बस्तर को घेरे हुए हैं। इस शाखा की प्रमुख प्रशाखा परलकोट, परलकोट-परतापपुर-कोईलीबेडा-अंतागढ-कांकेर-सिहावा तक फैली हुई है। रामायण में उत्तरवर्ती पर्वत श्रंखलाओं के अंतर्गत चित्रकोट एवं अयोमुख पर्वतों का उल्लेख मिलता है। इन्हें वर्तमान के साथ निम्न तरह से समझा जा सकता है – अ) चित्रकूट पर्वत: - रामायण के अयोध्याकाण्ड के अनुसार चित्रकोट में मंदाकिनी (इन्द्रावती) तथा मालिनी (नारंगी) नामक दो नदियाँ थी। वाल्मीकी रामायण में चित्रकोत को शालवनों से घिरा हुआ माना गया है। ब) अयोमुख पर्वत:- इस पर्वत की ओर सीतांवेषण के लिये सुग्रीव नें अंगद को भेजा था। संस्कृत में अयस का अर्थ है लोहा तथा अयोमुख एसा पर्वत प्रतीत होता है जिसके मुख में लोहा हो। गोंडी में मेटा का अर्थ पर्वत है तथा लोहे के लिये कच्च या कच्चा प्रयोग में आता है। इस आधार पर पश्चिमोत्तर बस्तर में (रावघाट तथा अबूझमाड से संलग्न क्षेत्रों में) कई पहाडियाँ कच्चामेटा के नाम से जानी गयी हैं। 

मध्यवर्ती पर्वत श्रंखलाओं के लिये विशेष रूप से प्रस्त्रवण पर्वत का उल्लेख मिलता है। प्रस्त्रवण को आधुनिक बस्तर से आन्ध्र के खम्माम तक विस्तृत माना जा सकता है। बस्तर की बैलाडिला पर्वत श्रंखला, विनता, टिकनपल्ली, अरनपुर, गोलापल्ली, किलेपल्ली, गोगोण्डा तथा उसूर की पहाडियों के लिये प्रस्त्रवण प्रयुक्त होता है।  

बस्तर क्षेत्र की पूर्ववर्ती पर्वत श्रंखलाओं का सीधा सम्बन्ध महेन्द्र पर्वत से स्थापित होता है। महेन्द्र पर्वत वर्तमान ओडिशा में महानदी के दक्षिण में गंजाम जिले व उसके पार्श्व में व्याप्त है। समुद्र तल से इसकी उँचाई 5000 फीट है। बस्तर से महेन्द्र पर्वत का सम्बन्ध जोडने वाली श्रंखलायें हैं – अ) माल्यवान पर्वत: - माल्यवान को प्रस्त्रवण पर्वत के एक शिखर के रूप में निरूपित किया गया है। बस्तर में तुलसी डोंगरी पहाडी माल्यवान कही जा सकती है। ब) क्रौंचगिरि:- यह पहाडी कोरापुट जिले में अवस्थित है तथा शबरी नदी इससे लग कर प्रवाहित होती है। रामायण के अरण्य़ काण्ड में उल्लेख “क्रौंचारण्यमतिक्रम्य मतंगस्याश्रमंतरे” के अनुरूप यहीं पर मतंग मुनि का आश्रम होना माना जा सकता है। स) ऋष्यमूक पर्वत:- रामायण में उल्लेखित विवरणों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किन्धा राज्य के बीच बहुत दूरी नहीं थी एवं मलय पर्वत भी निकट ही था। इस आधार पर इसकी उपस्थिति शबरी नदी के निकट ओडिशा में ही सिद्ध होती है। इसी क्षेत्र में बाली-सुग्रीव नाम के एक पर्वत की उपस्थिति है जिससे लग कर गोदावरी के तट पर उत्तर की ओर किष्किन्धा पर्वत है। यही ऋष्यमूक पर्वत है जिसका विस्तार कालाहाण्डी से कोरापुट तक व्याप्त है। 

दक्षिणवर्ती पर्वत श्रंखलाओं की बस्तर में स्थिति को जानने के लिये मलय पर्वत के विस्तार को समझना आवश्यक है। मलय पर्वत वर्तमान पूर्वीघाट पर्वत श्रंखलाओं के लिये प्रयोग में आता है। लगभग 2000 फीट की उँचाई वाली पर्वत श्रंखलायें समुद्रतट से समानांत स्थित हैं। मलय पर्वत श्रंखला के अंतर्गत ही दक्षिण बस्तर व उससे जुडी आन्ध्रप्रदेश की पहाडियाँ आती हैं। सुकमा की गोलापल्ली (दक्षिण पश्चिम में कोण्टा तक विस्तार), उसूर (कोटपल्ली से भोपालपट्टनम), बरहा डोंगरी (दंतेवाडा तथा बीजापुर के मार्ग में) जिसकी एक शाखा दक्षिणोन्मुख हो कर चिंतलनार, फोतकेल तथा कोण्टा को घेरे हुए है मलय पर्वत की उप-शाखायें हैं। इसकी एक अन्य उप-शाखा बीजापुर से होती हुई उसूर की पहाडियों से मिल कर भोपालपट्टनम की ओर चली गयी हैं। प्राचीन बस्तर के इतिहास में इसी श्रंखला के रामगिरि पर्वत का अत्यधिक वर्णन प्राप्त होता है। आन्ध्रप्रदेश के खम्माम जिले के अंतर्गत भद्राचलम तालुका में रामगिरि पर्वत की अवस्थिति मानी जा सकती है जिसका वर्णन कालिदास नें भी मेघदूत में विभिन्न आयामों से किया है। 

पश्चिमी घाट से जुडे पर्वतों को पुराणों में सह्य पर्वत माना गया है। गोदावरी नदी को सह्यपर्वत से ही निकला बताया गया है। इस अतिविस्तृत पर्वत श्रंखला की एक उपशाखा कुञवान पर्वत की पहचान बस्तर क्षेत्र में होती है। कुञवान पर्वत पर कबन्ध नामक राक्षस का निवास बताया जाता है। प्राचीन काव्यकृतियों में इसे इन्द्रावती तथा गोदावरी के मध्य का क्षेत्र बताया गया है इस आधार पर अबूझमाड ही कुञवान प्रतीत होता है। अबूझमाड विविध पहाडियों के समूह के रूप में परलकोट/कुटरू से प्रारंभ हो कर नारायणपुर तथा छोटे डोंगर तक फैला हुआ है। यह सम्पूर्ण क्षेत्र प्राकृतिक अवरोधों से घिरा हुआ है। अबूझमाड क्षेत्र में ही राकसमेटा (राक्षस पर्वत) नाम की कई पहाडियाँ हैं। एक छोटी पहाडी राक्षस पडेका (राक्षस हड्डी) कही जाती है जिसके पीछे मान्यता है कि यह अस्थियों के ढेर लगने के कारण निर्मित हुई हैं। एक रोचक पहाडी कोईलीबेडा के जीमरतराई गाँव के निकट है जिसके पत्थर अस्थियों जैसे गुणधर्म रखते हैं। इन्हें जलाने पर हड्डियों जैसी गंध आती है।  

वर्णित प्रकार की पर्वत श्रंखलायें बस्तर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और भैगिलिक विविधता के लिये ही नहीं विशिष्ठ जैव-विविधताओं के लिये भी जानी जाती हैं। प्रत्येक प्राकृतिक विभाग प्राचीन काल से मानव विकास के आयामों को अपनी परिधियों के भीतर गढता रहा तथा हर परिधि नें अपने आँचल में अनन्य प्रकार की जनजातियों को संरक्षण दिया है। नदियों के विस्तार को समख कर ही उसके कारण बने भैगोलिक क्षेत्रों और उत्पन्न हुई विविधताओं को समझा जा सकता है। विश्वेसर पाण्डेय के ग्रंथमन्दार मंजरी (वाराणसी, 1955) में वर्गीकरण मिलता है कि रामायण और परवत्री साहित्य के आधार पर दण्डकारण्य क्षेत्र प्राचीन काल से ही दो प्राकृतिक भागों में बँटा था तथा इन्द्रावती नदी इसको विभाजित करने का कार्य करती थी। इस आधार पर उत्तरी भाग को शुक्तिमत क्षेत्र तथा दक्षिणी भाग को सप्तगोदावरी क्षेत्र या गौतमी प्रदेश कहा गया है। बस्तर क्षेत्र की नदी-प्रणालियाँ दो वृहत सरिताओं का जलागम क्षेत्र निर्मित करती हैं। ये नदियाँ हैं महानदी तथा गोदावरी। 

महानदी ओडिशा की सबसे विशाल नदी है जो प्राचीन बस्तर के सिहावा की पहाडियों से निकलती है। यह सिहावा से प्रवाहित हो कर कांकेर जिले की ओर बढती है तत्पश्चात बिलासपुर तथा रायगढ होते हुए सम्बलपुर (ओडिशा) में प्रवेश करती है। यहाँ से दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रवाहित होती हुई महानदी कटक शहर से गुजर कर बंगाल की खाडी में विसर्जित होती है। बस्तर के उत्तर पूर्व में केशकाल के निकट तेलिनघाटी की पहाडियों से उत्तर की ओर प्रवाहित होने वाली कुछ नदियाँ महानदी सरितप्रणाली के अंततर्गत आती हैं एवं उसके जलागमक्षेत्र का हिस्सा हैं। इनमें सेन्दर, चिनार, दूध, हतकुल, दूरी, तेन्दुला (इसपर तेन्दुला बांध भी बना हुआ है), कांकेर तथा तेलनदी प्रमुख हैं। 

गोदावरी नदी का जलागम बस्तर की धरती का बहुत वृहत क्षेत्र है। बस्तर तथा आन्ध्रप्रदेश से गुजरते हुए गोदावरी के प्रवाह में दस सहायक नदियाँ बायीं ओर से तथा ग्यारह दाहिनी ओर से मिलती हैं। पूर्णा, कदम, प्राणहिता तथा इन्द्रावाती बायीं ओरकी महत्वपूर्न नदियाँ हैं जबकि दायीं ओर की नदियों में मंजरी, सिन्दकना, मनेर और किनरसिनी हैं। प्राचीनकाल में (1320 तक) गोदावरी बस्तर की दक्षिणपूर्वी सीमा बनाने का कार्य करती थी। अब बस्तर के अनेक क्षेत्रों के महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश व ओडिशा में चले जाने के कारण गोदावरी अब बस्तर के मात्र दस मील क्षेत्र में ही प्रवाहमान है व भद्रकाली के निकट बस्तर की सीमा बनाती है। बस्तर स्थित गोदावरी की सहायक नदियों में इन्द्रावती, शबरी, तालपियर, गुब्बेक, उसूर प्रमुख हैं। 

इन्द्रावती और उसकी सहायक नदियो पर चर्चा इस लिये भी आवश्यक है कि यही बस्तर की प्रमुख नदी प्रणाली है जो संभाग के मध्यभाग से प्रवाहित होती है। रामायण में वर्णित मंदाकिनी नदी वर्तमान इन्द्रावती ही है। यह बस्तर क्षेत्र की 240 मील की यात्रा कर इसे दो भागों में विभक्त कर देती है। इन्द्रावती ओडिशा प्रांत के कालाहांडी के पास रामपुर घुमल नामक स्थान से उत्पन्न होती है जहाँ से तीस मील तक दक्षिण-पश्चिमोन्मुख होती हुई कालाहाण्डी व कोरापुट जिले की परिधियों से होते हुए बस्तर की सीमा में प्रवेश करती है। इन्द्रावती नदी ही जगदलपुर के निकट चित्रकोट जलप्रपात का निर्माण करती है। चित्रकोट के निकट ही नारंगी नदी इन्द्रावती से मिलती है तथा लगभग दस मील और आगे चलने पर भँवरडिंग नदी आ कर मिल जाती है। यहाँ से आगे बढते ही इन्द्रावती नदी अबूझमाड की दक्षिणी सीमा बन जाती है तथा भोपालपट्टनम के निकट आ कर गोदावरी से मिल जाती है। इन्द्रावती नदी के किनारे जगदलपुर, चित्रकोट, बारसूर तथा तिम्मेड़ एतिहासिक स्थान हैं। इन्द्रावती नदी की अनेको सहायक नदियाँ हैं जिनमें कांकेर, काकडीघाट, केंदा, कोतरी, कोमरा, कोयर, खण्डी, गुडरा, गोंईन्देर, चारगाँव, चिंतावागु, डंकिनी, दंतेवाडा, दहकोंगा, दुर्ग, नारंगी, बेरुडी, गुरियाबहार, बोरोदा, भँवरडिंग, माड़िन, माडी, मातलाघाट, मान्देर, माकडी, रायकेरा, रावघाट, वड़ी, वालेर, संकिनी, ताडुकी, तथा सिंगार बहार।  

शबरी नदी कोरापुट की सिंगारम नामक पहाडी से निकलती है तथा सर्पिल गति से उत्तरपश्चिम में प्रवाहित हो कर कोरापुट के दक्षिण में पाँच मील की दूरी पर आगे बढ जाती है एवं प्राचीन जयपोर राज्य की सीमा में प्रवेश करती है। यहाँ से दक्षिणोन्मुख हो कर यह कोरापुट व बस्तर की सीमा का निर्धारण करती है। पुन: पश्चिम की ओर मुड कर तुलसीडोंगरी से होते हुए शबरी नदी बस्तर में बहने लगती है। सुकमा में कुछ दूर बहने के पश्चात शबरी सुकमा तथा मालकागिरि एवं कोण्टा तथा मालकागिरि के बीच की सीमारेखा बनती हुई प्रवाहित होती है। आगे यह भद्राचलम होते हुए गोदावरी नदी में समाहित हो कर अपनी यात्रा समाप्त करती है। शबरी नदी दोर्ला क्षेत्र की पूर्वी सीमा निर्धारण का कार्य भी करती है। इसके प्रांत भाग में दर्जनों दोर्ला बस्तियाँ हैं; पथा पेंटा, आरगट्टा, मनीकोंटा, बिरला, एर्राबोर, मूलाकिसोली, जगारम, मेट्टागुडा, नँजमगुडा, आसिरगुडा, इंजरम आदि। दक्षिण में शबरी नदी के तटवर्ती क्षेत्र कोण्टा तक दोर्ला जनजाति मिलती है व ढोंढरा इनका सबसे बडा गाँव है। शबरी की प्रमुख सहायिकाओं में पोट्टेरु नदी मलकांगिरि (कोरापुट) में बालीमेरा के पास शबरी से मिलती है; कांगेर नदी टाँगरी डोंगरी से निकल कर अपने उत्तरपूर्व में शबरी से मिलती है जहाँ से यह नदी मालकांगिरि में प्रवेश कर पुन: बस्तर की ओर लौटती है। मालेंगर नदी बैलाडिला की दक्षिणी श्रेणियों से निकल कर सुकमा और दुब्बाटोटा के बीच शबरी से मिलती है। तीरथगढ के निकट मालेंगर नदी 150 फुट की ऊँचाई से गिर कर तन्नामक प्रपात बनाती है। सिलेरू नदी कोण्टा के नीचे शबरी से आ मिलती है। शबरी नदी के तत पर गुप्तेशवर, तिलवर्ती, सुकमा, मिस्सा, ढोंढरा व कोण्टा आदि एतिहासिक गाँव हैं। 

कालिदास के रघुवंश तथा भवभूति के उत्तररामचरित में मुरला नदी का उल्लेख मिलता है जिसको महर्षि अगस्त्य के आश्रम के निकट से हो कर बहना बताया जाता है। इस आधार को बस्तर की तीसरी प्रमुख नदी तालपेरु या तालपियर के साथ जोड कर देखा जाता है। अपने ग्रंथ बस्तर भूषण (1908) में वर्णन करते हुए पं केदारनाथ ठाकुर लिखते हैं कि तालपियर बैलाडिला पहाड की नंदराज गुहा से निकली है; यह नदी बीजापुर, फोतकेल, कोतापाल होती हुई गोदावरी में समाहित हो जाती है। इसके अलावा टिकनपल्ली-गोलापल्ली की पहाडियों से निकलने वाली गुब्बेल नदी कोतापल्ली के नीचे गोदावरी नदी से मिलती है। यह बस्तर के दक्षिणी निम्नभूमि के पश्चिमी भाग को सींचती है। उसूर से निकलने वाली उसूर नदी वारंगल तथा बस्तर की सीमा पर गोदावरी से मिलती है। 

वर्तमान बस्तर और प्राचीन बस्तर की भौगोलिक पहचान को निरूपित करते ही प्राचीन बस्तर का इतिहास साकार हो उठता है। इसी ज्ञात भूगोल आधार ही बस्तर क्षेत्र का प्राचीन गौरव निरूपित होता है एवं प्राचीन काल में इस की सामाजिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर एक समझ विकसित होती है। भूगोल और वर्तमान जनजातियों का अंतर्सम्बन्ध, भूगोल तथा पुरा-ग्रंथों में वर्णित जनजातियों की उपस्थिति के स्थल तथा वर्तमान से साम्यतायें एक अलग विश्लेषण का विषय है जिसपर मैं अगले आलेखों में चर्चा करूंगा। इस आलेख के उपसंहार के लिये मुझे लाला जगदलपुरी के उस यात्रावृतांत से बेहतर कुछ नहीं मिलता जहाँ वे इन्द्रावती नदी के गोदावरी में समाहित हो जाने का वर्णन इन शब्दों में करते हैं – “एक छोर से दूसरे छोर तक पत्थरों का सिलसिला कुछ एसा चला गया है जैसे कि विभिन्न आकार प्रकार की पाषाण मूर्तियाँ वहाँ स्थापित कर दी गयी हों। पानी के हाँथो तराशी गयी इन आकृतियों में आप अपनी मनचाही आकृति तलाश कीजिये, अवश्य मिलेगी। रेत पर कुछ दूर चलने के बाद संगम की दुरंगी धाराओं नें हमें मुग्ध कर दिया। नीली और गेरुई धाराओं नें अपने में समोये रखा, थकान मिटा दी। मानना पडेगा कि इस संगम में गोदावरी को समर्पित हो कर भी इन्द्रावती अपनी पहचान नहीं खोती। उसके पानी का गेहुँआ रंग स्पष्ट दिखाई देता था। इन्द्रावती का गेहुँआ पानी कुछ गर्म लगता था, किंतु गोदावरी का नीला जल काफी ठंडा मालूम होता था।....। इंद्रावती-गोदावरी मिलाप। इधर पहाडियाँ, उधर पहाडियाँ बीच में संगम का बहता बहता दुरंगा पानी। नीला जल, गेरुआ जल। आन्ध्र, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा-रेखायें”। 

बस्तर भूमि की पहचान शास्वत है तथा बनी रहनी चाहिये। इसीलिये ‘बस्तर के भूगोल’ को ‘बस्तर के वर्तमान’ पर अपनी समझ विकसित करने से पहले जानना आवश्यक है। बस्तर की पहचान उसके पर्वत, उसकी मिट्टी उसकी सरितायें और उसके वनवासी हैं। लाला जगदलपुरी जैसे बस्तरियों नें इस भूमि को बूझने के लिये जीवन लगा दिया और बूझा भी क्या खूब कि उनकी ही एक पंक्ति से समझिये - “मैं इन्द्रवती नदी के बूँद-बूँद को/ अपने दृगजल की भाँति जानता आया हूँ”। हाँ यही बस्तर की धरती को जानने का वास्तविक सूत्र है।  
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Tuesday, July 31, 2012

हृषिकेश सुलभ जी नें दुर्लभ तस्वीरों का खजाना हममें बाँट दिया..



हृषिकेश सुलभ जी से मुलाकात और यादें बस्तर की...।
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हृषिकेश जी को यत्र तत्र पढने का मौका मिला है तथा नाटक में रुचि हेने के कारण उनकी इस क्षेत्र में सक्रियता के समाचारों से भी परिचित होता रहा हूँ। साहित्य शिल्पी के लिये मैने एक आलेख भी हृषिकेष जी को शुभकामनायें प्रदान करने के लिये लिखा था जब 2010 में उन्हें इन्दु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त हुआ था। इन सब के बाद भी मुझे जानकारी नहीं थी कि हृषिकेश जी का सम्बन्ध बस्तर से भी है। प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव पर लिखे मेरे आलेख पर जब उन्होंने टिप्पणी की तथा बस्तर से जुडे अपने संस्मरण बाँटे तब उनसे मिलने की प्रबल इच्छा और बलवति हो गयी। पटना आकाशवाणी केन्द्र में वे कार्यरत हैं और वहीं उनसे मुलाकात भी हुई। हृषिकेश जी जितना बडा व्यक्तित्व हैं उतने ही सरल भी हैं, उनसे मिल कर लगा ही नहीं कि यह हमारी पहली मुलाकात है। 

हृषिकेश जी 1980 के दौर में बस्तर में रहे हैं। यह दौर रेडियो का ही था। इस दौर में कार्यक्रम बालवाडी में मेरी कवितायें भी आकाशवाणी जगदलपुर से प्रसारित होती थीं। जगदलपुर में रंगकर्म की पहचान कहे जाने वाले एम ए रहीम मेरे प्रति बहुत स्नेह रखते थे और बालवाणी से युववाणी तक के मेरे सफर में उनके साथ और मार्गदर्शन की अनेको मधुर स्मृतियाँ मेरे पास हैं, जो हृषिकेश जी के साथ बैठ कर जैसे ताजा हो गयीं। हृषिकेश जी बताते हैं कि कैसे जगदलपुर में अपनी नौकरी ज्वाईन करने के लिये वे उत्साह से निकलते हैं लेकिन जब केशकाल की सुन्दर किंतु दुर्गम घाटियों को पार करने लगते हैं तो बस्तर की एक तस्वीर उनके दिमाग में बनने लगती है। जगदलपुर उनके विचार में एक अति पिछडा गाँव प्रतीत होता है और वे नगर में उतरते ही सबसे पहले सामने दिखने वाले राजस्थान लॉज में कमरा ले लेते हैं। तभी उनकी नजर सामने एसटीडी पर पडती है और तब वे अहसास करते हैं कि जिस शहर में आकाशवाणी है वहाँ बुनियादी सुविधायें न होने का प्रश्न ही नहीं। धीरे धीरे जगदलपुर ही नहीं बस्तर नें भी उन्हें अपना बना लिया, इतना अपना कि हृषिकेश जी आज भी जब बस्तर की बात करते हैं तो उनकी आँखों में वहाँ की स्मृतियों में डूब जाने वाला रंग स्पष्ट नजर आता है। हृषिकेश जी बस्तर के गाँव गाँव घूमे तथा लोक जीवन और लोकगीतों को रिकॉर्ड किया है। उन्होंने बताया कि कई दुर्लभ रिकॉर्डिंग्स अभी भी उनके पास हैं तथा उस समय की खीची हुई तस्वीरें भी। हृषिकेश जी उन सौभाग्यशाली बस्तर प्रेमियों में से हैं जिन्हें निश्चिंतता से अबूझमाड घूमने-देखने और अध्ययन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

उनके बताये दो संस्मरण मर्मस्पर्शी हैं। पहला लाला जगदलपुरी जी की सादगी से सम्बन्धित है। उन दिनों मध्यप्रदेश (तब छत्तीसगढ राज्य नहीं बना था) के मुख्यमंत्री थे अर्जुन सिंह। अपने तय कार्यक्रम को अचानक बदलते हुए मुख्यमंत्री नें लाला जगदलपुरी से मिलना तय किया और गाडियों का काफिला डोकरीघाट पारा के लिये मुड गया। लाला जी घर में टीन के डब्बे से लाई निकाल कर खा रहे थे और उन्होंने उसी सादगी से मुख्यमंत्री को भी लाई खिलाई। यह प्रसंग असाधारण है तथा दो व्यक्तित्वों के विषय में बहुत कुछ कहता है। दूसरा प्रसंग है ब्रम्हदेव शर्मा से संबंधित। जिन दिनों ब्रम्हदेव शर्मा कलेक्टर थे उन दिनों उनके फरमान से शोषित मानी गयी आदिवासी युवतियों की उनके शोषक एनएमडीसी के कर्मचारी युवको से शादी करवा दी गयी। यह किसी समस्या का समाधान कैसे हो सकता था? शायद हमारे व्यूरोक्रेट्स स्वयं को सर्वज्ञाता समझने की गफलत में रहते हैं और उसी नजरिये से आदिवासी समाज और उनकी समस्याओं को समझते व समाधान सुझाते हैं। हृषिकेश जी बताते हैं कि जब तक ब्रम्हदेव कलेक्टर थे ये शादियाँ तभी तक टिकीं उसके बाद बहुतायत आदिवासी युवतियाँ परित्यक्तायें हो गयीं। परिणाम इतने घातक हुए कि कुछ युवतियाँ गंगामुण्डा में वेश्यावृत्ति करने के लिये बाध्य हो गयीं थीं। 

हृषिकेश जी नें अपनी स्मृतियों से बहुत पुराने दिन ताजा किये। उन्होंने गायक लोककलाकार याद किये, गाँवों में बिताये दिन याद किये, बस्तर में बनायी जाती तरह तरह की शराब और उसके तरीके याद किये, वहाँ की मस्ती, सादगी, अपनत्व.....बहुत कुछ हमारी घंटे भर की मिलाकार में बाहर आता रहा। उन्होंने आज के हालात के लिये गहरा दु:ख जाहिर किया और बस्तर का जो दुष्प्रचार किया जा रहा है एवं जिस तरह की तस्वीर देश दुनिया के सामने रखी जा रही है उसके प्रति असहमति भी जतायी। हृषिकेश जी नें बस्तर में बिताये अपने दिनों के दौरान 1910 के एक क्रांतिकारी लाल कालेन्द्र सिंह पर केन्द्रित एक नाटक भी लिखा था जिसकी प्रति अब उनके पास नहीं है। मृच्छकटिकम् की पुनर्रचना “माटीगाड़ी” और फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास का नाट्यांतर मैला आँचल लिखने वाले रचनाकार से बस्तर की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के नाट्यरूपांतरण का अनुरोध तो कर ही सकता हूँ। हृषिकेश जी ने मुझे लाल कालेन्द्र पर आलेख पूरा करने के लिये प्रोत्साहित किया है और जल्दी ही मैं यह कार्य पूरा भी करूंगा। हृषिकेश जी एक और अनुरोध कि जो तस्वीरें आपके पास हैं तथा वे बस्तरिया महकते जिन्दा गीत भी जिनकी रिकॉर्डिंग आपके पास हैं उन्हें कृपया हम सब के साथ भी बाँट दीजिये। आपकी निगाह से देखें लोग - तीन दशक पहले का जिन्दा और सांस लेता बस्तर। 
[यह आलेख पटना से हृषिकेश जी से मिलाकात के पश्चात] 
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हृषिकेश जी नें अपना वायदा निभाते हुए 1980-81 के दौर के बस्तर की कुछ जीवंत तस्वीरें साझा की हैं। ये तस्वीरें इतिहास का हिस्सा तो बन ही गयी हैं साथ ही यह समझने में भी सहायक हैं कि लाल-हिंसा के वर्तमान दौर नें इस अंचल से क्या क्या छीन लिया है।  

चित्र-1 - बस्तर की एक आदिवासी युवती।


चित्र - 2 काकसाड़ नाच की तैयारी


चित्र -3 बस्तरिया युगल [चेलक और मोटियारी]


चित्र-4 बालों में पड़िया 


चित्र-5 हाट में पिया को निहारती आँखें


चित्र-6 सोड़ी औरत


चित्र-7 सियाड़ी की लता से रस्सी बनाते हाँथ


चित्र-8 बस्तरिया युवक


चित्र - 9 दोनी और पत्तल बनाती युवती


चित्र-10 हाट जाने की तैयारी


चित्र-11 अचरज भरी आँखें


चित्र-12 जंगल में साथ साथ जीवन 


चित्र-13 तीरथगढ जलप्रपात 


चित्र-14 चित्रकोट जलप्रपात 


चित्र-15 कोटुम्सर की गुफा


चित्र-16 मार्डिन नदी का पथरीला पाट 


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