Wednesday, May 31, 2017

विलुप्त होता जीवजगत, खतरे में इंसान भी


प्रकृति जिन जीवों को अपने सुचारू संचालन में अनुपयुक्त पाती है उनसे पीछा छुडा लेती है। उदाहरण के लिए डायनासोर जो एक समय धरती पर व्यापकता से प्रसारित थे, आज विलुप्त प्राणी हैं। पृथ्वी पर बड़ी संख्या में विलुप्तताओं के पांच काल रहे हैं ये 4,400 लाख, 3,700 लाख, 2,500 लाख, 2,100 लाख एवं 650 लाख वर्ष पूर्व हुए थे। ये प्राकृतिक प्रक्रियाएं थीं। यह बात वर्तमान में हो रही विलुप्तताओं पर लागू नहीं होती। आज जीव-वनस्पतियाँ बहुत तेजी से और अस्वाभाविक प्रक्रियाओं के फलीभूत विलुप्त होती जा रही हैं। आज होने वाली विलुप्तताओं के लिये जीवजगत का वह प्राणी सबसे अधिक जिम्मेदार है जो इसके शीर्ष पर होने का दम्भ रखता है- अर्थात मनुष्य। यह समझने योग्य बात है कि स्वाभाविक विलुप्तीकरण की प्रक्रिया में खतरा प्राय: उन अधिक सफल प्रजातियों पर होता है जो कम सफल प्रजातियों पर अपनी उपस्थिति फैला लेते हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इंसानों को इसी दृष्टोकोण से किसी टाईमबम पर खड़ा देखा जाना चाहिये।

आज हम विलुप्तता के छठे काल में चल रहे हैं और यहाँ जैव-विविधता के नष्ट होने का कारण प्रकृति नहीं अपितु स्वयं मनुष्य है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजनर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) 2000 की रिपोर्ट में कहा कि, विश्व में जीव-जंतुओं की 47677 प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियाँ यानी 7291 प्रजातियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। आईयूसीएन की रेड लिस्ट के अनुसार स्तनधारियों की 21 फीसदी, उभयचरों की 30 फीसदी और पक्षियों की 12 फीसदी प्रजातियाँ विलुप्ति की कगार पर हैं। वनस्पतियों की 70 फीसदी प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरिसृपों की 37 फीसदी प्रजातियों और 1147 प्रकार की मछलियों पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में 800 से ज्यादा प्रजातियाँ सिर्फ एक ही स्थान पर पाई जाती हैं। अगर इन्हें संरक्षित नहीं किया गया तो कई विलुप्त हो जाएंगी। 

कालिदास का वर्णन मिलता है जो उसी डाल को काट रहा था जिस पर स्वयं बैठा हुआ था। परिणाम स्पष्ट है कि उसे धरातल पर गिरना ही था। अपनी ही तादाद बे लगाम तरीके से बढने वाला मनुष्य वस्तुत: कालिदास की तरह ही व्यवहार कर रहा है। देखा जाये तो दुनिया की जनसंख्या इस समय छ: अरब से अधिक है जिसके वर्ष 2050 तक दस अरब तक पहुंचने के अनुमान व्यक्त किए गए हैं। तेजी से बढ़ती इस जनसंख्या से दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्रों और प्रजातियों पर अतिरिक्त दबाव तो पड़ना ही है जो जैव-विविधता को घटाने में उत्प्रेरक का कार्य करता रहेगा। जब मनुष्यों को स्वयं के रहने के लिये आज आवास की समस्या का सामना करना पड रहा है तो उनसे कैसे उम्मीद करेंगे कि वे धरती के अन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों के प्रति चिंतित रहेंगे। सन् 1000 से 2000 के मध्य हुए प्रजातीय विलुप्तताओं में से अधिकांश मानवीय गतिविधियों के चलते प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण हुई हैं। 

मोटे तौर पर देखा जाये तो जनसंख्या, वनों का कटाव, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा संदूषण एवं ग्लोबल वार्मिंग आदि कारक जैव विविधता को नष्ट करने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। हम लापरवाह कौम हैं तथा केवल अपने भोजन के प्रति ही सजग रहते हैं तथा अपनी किसी भी गतिविधि में अन्य जीवों का किसी तरह खयाल नहीं रखते। यह सही है कि कृषि आवश्यक है किंतु जब हम फसल उगाने के लिए वनों को काटते हैं तब भी जैव विविधता को दरकिनार कर देते हैं। एसा ही एक उदाहरण पैसेन्जर कबूतर (एक्टोपिस्टेस माइग्रेटोरियस) से जुडा हुआ है। एक समय में ये कबूतर धरती पर बहुतायत में पाए जाते थे किंतु आज ये विलुप्त हो गये हैं। मानवीय सनक देखिये कि सन् 1878 में, अमेरिका के मिशीगन शहर में हर रोज लगभग 50,000 पैसेन्जर कबूतर पक्षियों को मारा जाता था और मौत का ये तांडव लगभग पांच माह चला। इस तरह के क्रूरता के पश्चात तो इस प्रजाति का विलुप्त होना स्वाभाविक ही था। 
जैवविविधता के लिये एक बडा खतरा किसी क्षेत्र विशेष में बाहर से लाये गये जीवो-वनस्पतियों की बसाहट भी है। कुछ उदाहरण महत्वपूर्ण हैं। हवाई द्वीप में, इस प्रकार की एक मैना प्रजाति है। इसे गन्ने के कीटों के नियंत्रण के लिए प्रवेश कराया गया था परन्तु यह लैन्टाना कैमारा नामक खरपतवार के बीजों के प्रसारक का काम करने लगी। द्वितीय विश्व युद्ध के फौरन बाद सर्प युक्त गुवाम में एक भूरा वृक्षवासी सांप दुर्घटनावश प्रवेश करा दिया गया। सांप की संख्या नाटकीय ढंग से अत्यधिक बढ़ गई और क्षेत्रीय प्राणी समूह  नीचे दब गए। गुवाम में मूल रूप से पाई जाने वाली जंगली चिडि़या की 13 प्रजातियों में से अब मात्रा 3 जीवित हैं और छिपकली की 12 मूल प्रजातियों में से भी अब मात्रा 3 ही जीवित हैं। ये सांप खम्बों पर चढ़कर बिजली के तारों को फंसा देते हैं और वह इलाका अंधेरे में डूब जाता है। गैलेपागोस द्वीपों की कहानी इसका एक अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण है। गैलेपागोस द्वीप समूह इक्वाडोर का ही एक भाग हैं। यह 13 प्रमुख ज्वालामुखी द्वीपों 6 छोटे द्वीपों और 107 चट्टानों और द्वीपिकाओं से मिलकर बना है। इसका सबसे पहला द्वीप 50 लाख से 1 करोड़ वर्ष पहले निर्मित हुआ था। सबसे युवा द्वीप, ईसाबेला और फर्नेन्डिना, अभी भी निर्माण के दौर में हैं और इनमें आखिरी ज्वालामुखी उद्गार 2005 में हुआ था। ये द्वीप अपनी मूल प्रजातियों की बहुत बड़ी संख्या के लिए प्रसिद्ध हैं। चाल्र्स डार्विन ने अपने अध्ययन यहीं पर किए और प्राकृतिक चयन द्वारा विकासवाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया। यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। 2005 में लगभग 1,26,000 लोगों ने पर्यटक के रूप में गैलेपागोस द्वीपसमूह का भ्रमण किया। इससे न सिर्फ द्वीपों पर मौजूद साधनों को खामियाजा भुगतना पड़ा बल्कि पर्यटकों की बहुत बड़ी संख्या ने यहाँ के वन्यजीवन को भी प्रभावित किया है। 

पारिस्थितिकी तंत्र बहुत सी ऐसी सूक्ष्म सेवाएं भी हमें प्रदान करता है जिन्हें अनुमोदित करना तो दूर, हम उन्हें पहचान भी नहीं पाते हैं। उदाहरण के लिए, जीवाण एवं मिट्टी के जीव कूड़े-कचरे को अपघटित कर उर्वर भूमि का निर्माण करते हैं। पौधों में परागण क्रिया के वाहक, जैसे चमगादड़ और मधुमक्खी, यह सुनिश्चित करते हैं कि साल दर साल हमारी फसलें अंकुरित हो सकने वाले बीज पैदा करती रहें। अन्य प्राणि, जैसे लेडीबग और मेंढक फसलों के कीटाणुओं को सीमित रखने में सहायक होते हैं। इन कार्यों के प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं जैसे मिट्टी की उर्वरता, कूड़े-कचरे का अपघटन आदि और साथ ही हवा एवं पानी की शुद्धता, जलवायवीय नियमन एवं बाढ़/सूखा आदि को भी यह कार्य प्रभावित करते हैं। एक पारिस्थितिकी तंत्र में जितनी अधिक विविधताएं होंगी, उतना ही अधिक ये पर्यावरण संबंधी दबाव को सहने में सक्षम होगा। वातावरण में उपस्थित विभिन्न गैसों के बीच संतुलन जैव विविधता के कारण ही होता है। यह जाहिर सत्य है कि जिस बेदर्दी से हमने अपने वृक्षों को समाप्त किया है उसने हमारे वातावरण मे नकारात्मक बदलाव के बीज बो दिये हैं। हानिकारक किरणों से बचाने वाली ओजोन परत में छिद्र होने से ले कर आज जिस ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का हम सामना कर रहे हैं उसके पीछे का प्रमुख कारण अपने पर्यावरण का भली प्रकार संरक्षण नहीं करना है। हमने यह बुनियादी समझ ही नहीं रखी कि जैव-विविधतता सीधे हमारे अस्तित्व से जुडा हुआ मसला है।  

- राजीव रंजन प्रसाद 
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Tuesday, May 30, 2017

जैव विविधता संवर्धन ही पर्यावरण संरक्षण है


यह धरती हमारे सौरमण्डल का सबसे सुन्दर ग्रह है। इसे विशिष्ठ और अद्भुत बनाता है इसका पर्यावरण; इसमें उपस्थित जलवायु और यहाँ का जीव जगत। जीव-जगत भी यहाँ इतना विविध है कि वनस्पतियों के लाखों प्रकार, मत्स्यों के लाखों प्रकार, स्तनधारी जीवों के लाखों प्रकार, पक्षियों के लाखों प्रकार इतना ही नहीं किट-पतंगों और तितलियों की भी अनगिनत भांतियाँ। इसे दृष्टिगत रखते हुए यह कहा जा सकता है कि जैव विविधता वस्तुत: किसी दिये गये पारिस्थितिकी तंत्र, किसी बायोम अथवा एक पूरे ग्रह में जीवन के रूपों की विभिन्नता का परिमाण है। हमारी पृथ्वी पर जीवन आज लाखों विशिष्ट जैविक प्रजातियों के रूप में उपस्थित हैं। समूचे विश्व में 2 लाख 40 हजार किस्म के पौधे 10 लाख 50 हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। केवल भारत में ही जंगलों, आर्द्रभूमियों और समुद्री क्षेत्रों में कई तरह की जैव विविधता पाई जाती है। विश्व के बारह चिन्हित मेगा बायोडाइवर्सिटी केन्द्रों में से भारत एक है। विश्व के 18 चिन्हित बायोलाजिकल हाट स्पाट में से भारत में दो पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाट हैं। 

देश में 45 हजार से अधिक वानस्पतिक प्रजातियाँ अनुमानित हैं, जो समूची दुनियॉ की पादप प्रजातियों का 7 फीसदी हैं; इन्हें 15 हजार पुष्पीय पौधों सहित कई वर्गिकीय प्रभागों में बांटा जाता है। करीब 64 जिम्नोस्पर्म 2843 ब्रायोफाइट, 1012 टेरिडोफाइट, 1040 लाइकेन, 12480 एल्गी तथा 23 हजार फंजाई की प्रजातियाँ लोवर प्लांट के अंतर्गत् अनुमानित हैं। पुष्पीय पौधों की करीब 4900 प्रजातियाँ देश की स्थानिक हैं। करीब 1500 प्रजातियाँ विभिन्न स्तर के खतरों के कारण संकटापन्न हैं। भारत खेती वाले पौधों के विश्व के 12 उद्भव केन्द्रों में से एक है। भारत में समृध्द जर्म प्लाज्म संसाधनों में खाद्यान्नों की 51 प्रजातियाँ, फलों की 104 प्रजातियाँ, मसालों की व कोन्डीमेंट्स की 27 प्रजातियाँ, दालों एवं सब्जियों की 55 प्रजातियाँ, तिलहनों की 12 प्रजातियाँ तथा चाय, काफी, तम्बाकू एवं गन्ने की विविध जंगली नस्लें शामिल हैं। देश में प्राणी सम्पदा भी उतनी विविध है। विश्व की 6.4 प्रतिशत प्राणी सम्पदा का प्रतिनिधित्व करती भारतीय प्राणियों की 81 हजार प्रजातियाँ अनुमानित हैं। भारतीय प्राणी विविधता में 5000 से अधिक मोलास्क और 57 हजार इनसेक्ट के अतिरिक्त अन्य इनवार्टिब्रेट्स शामिल हैं। मछलियों की 2546, उभयचरों की 204, सरीसृपों की 428, चिड़ियों की 1228 एवं स्तनधारियों की 327 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। भारतीय प्राणी प्रजातियों में स्थानिकता या देशज प्रजातियों का प्रतिशत काफी अधिक है, जो लगभग 62 फीसदी है।

इन आंकडों को सामने रखते हुए यह स्पष्ट परिभाषा आवश्यक है कि वस्तुत: जैव विविधता है क्या? संरक्षण जीवविज्ञानी थॉमस यूजीन लवजॉय ने 1980 में ‘बायोलोजिकल’ और ‘डायवर्सिटी’ शब्दों को मिलाकर ‘बायोलॉजिकल डायवर्सिटी’ या जैविक विविधता शब्द प्रस्तुत किया। 1985 मं  डब्ल्यू.जी.रोसेन ने ‘बायोडायवर्सिटी’ या जैव विविधता शब्द की खोज की; यह शब्द छोटा तथा सुग्राह होने के कारण शीघ्र प्रचलन में आ गया तथा इसे वैश्विक स्वीकार्यता प्राप्त हो गयी। डब्ल्यू.जी.रोसेन ने ‘बायोडायवर्सिटी’ शब्द को पारिभाषित करते हुए कहा है कि “पादपों, जंतुओं, एवं सूक्ष्मजीवों के विविध प्रकार और उनमें विभिन्नता ही जैव-विविधता है”। सामान्य अर्थों में इस जगत में विविध प्रकार के लोगों के साथ, इस जीव परिमंडल में भी भौगोलिक रचना के अनुसार अलग-अलग नैसर्गिक भूरचना, वर्षा, तापमान एवं जलवायु के कारण वनस्पति एवं प्राणी सृष्टि में जैव विविधता हमें प्राप्य है। 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी सम्मेलन में जैव विविधता की मानक परिभाषा दी गयी जिसके अनुसार “समस्त स्रोतों, यथा अन्तर्क्षेत्रीय, स्थलीय, समुद्री एवं अन्य जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों के जीवों के मध्य अन्तर और साथ ही उन सभी पारिस्थितिकी समूह, जिनके ये भाग हैं, में पाई जाने वाली विविधताएं; इसमें एक प्रजाति के अन्दर पाई जाने वाली विविधताएं, विभिन्न जातियों के मध्य विविधताएं एवं पारिस्थितिकी तंत्रों की विविधताएं सम्मिलित रूप से जैव-विविधता कहलाती हैं”। संयुक्त राष्ट्र जैविक विविधता सभा द्वारा अनुसंशा के पश्चात सम्पूर्ण विश्व ने इसी को जैव-विविधता की मानक परिभाषा के रूप में अपना लिया है; यद्यपि कुछ देश जिनमें एन्डोरा, ब्रुनेई, दार-अस-सलाम, होली सी, ईराक, सोमालिया, तिमोर-लेस्ते और संयुक्त राज्य अमेरिका सम्मिलित हैं, ने इस परिभाषा को मान्यता नहीं दी है। यही नहीं दुनिया भर में अनेक देशों ने अपने-अपने संविधान के मुताबिक जैव विविधता को संरक्षित और विकसित करने के कानून बनाये है। 

जैवविविधता की परिभाषा केवल राष्ट्रों की राजनीति में ही नहीं उलझती वरन बारीकी से विवेचना की जाये तो विज्ञान के अलग अलग कोष्टकों में जाते हुए इस शब्द की परिभाषा भी बदलने लगती है। यद्यपि जैव विविधता की सबसे स्पष्ट परिभाषा होगी “जैविक संगठन के सभी स्तरों पर पाई जाने वाली विविधताएं ही जैव विविधता है” तथापि एक जीव विज्ञानी जैव-विविधता को जीवों एवं प्रजातियों तथा उनके मध्य प्रभावों के वर्णक्रम की तरह देखता है। जीवविज्ञानी के लिये यह दृष्टिकोण आवश्यक है कि पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई, उनका विस्तार कैसे हुआ, उनके विविध प्रकार कैसे हुए, इन प्रकारों में भेद-विभेद क्या हैं, किस प्रकार वे विभिन्न प्रकार विलुप्त हो रहे हैं आदि आदि। यही दृष्टिकोण किसी परिस्थितिविज्ञानी के लिए बदल जाता है उसके लिये जैव विविधता केवल प्रजातियों के संदर्भ तक सिकुड जाती है; चूंकि यह स्थापित सत्य है कि प्रत्येक पारिस्थितिकी तंत्र में उपस्थित जीव न सिर्फ अन्य जीवों से अपितु अपने चारों ओर मौजूद वायु, जल और मिट्टी से भी परस्पर प्रभावित होते हैं। आनुवंशिकी विज्ञानियों का मानना है कि जैव विविधता जीनिक विविधता पर निर्भर करती है। यहाँ जैव-विविधता का दृष्टिकोण म्यूटेशन (उत्परिवर्तन), जीन-विनिमय एवं डीएनए के स्तर पर होने वाली परिवर्तनात्मक सक्रियता आदि से प्राप्त किया जाता है।

जैव विविधता जीवन की सहजता के लिए जरूरी है। प्रकृति का नियामक चक्र जैव विविधता की बदौलत दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वनस्पति, खाद्यान्न, जीव-जंतुओं की अनुपस्थिति से कितना नुकसान हो सकता है। वैज्ञानिक भी इसका आंकलन नहीं कर सकते। मिट्ट में पाये जाने वाला केंचुआ दिखने में साधारण है पर प्रकृति सन्तुलन में इसका भी बहुत बड़ा योगदान है। एक केंचुआ छ: माह की अवधि में बीस पौड़ पोषक कार्बनिक पदार्थ तैयार करके मिट्टी में मिला देता है। यह खेत की जमनी को पोला व भुरभूरा भी बनाता है इनकी जातियां यदि नष्ट न हों तो वे मिट्टी में दस वर्ष में एक इंच सतह को बढ़ा सकते हैं, जो अत्यन्त उपजाऊ होती है। केंचुए यदि नष्ट हो जाएं तो यह कार्य करनें में प्रकिति को पाँच सौ वर्ष लग जाएंगे। धरती अगिनत, अमूल्य धरोहर संजोए हुए, जीवन को जीवन्त बनाए हुए हैं। गीता का एक श्लोक है- ‘जीव जीवनस्य भोजनम।’ यह प्राकृतिक और जीवन क्रम के लिए जरूरी है। हवा, जल, मिट्टी जीवन के आधारभूत तत्व हैं। प्राकृतिक रूप से इनका सामंजस्य सतत् जीवन का द्योतक है। जैव विविधता अरबों वर्षों के विकास का परिणाम है। धरती की जैव विविधता को वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत पर ही संरक्षित किया जा सकता है। प्रकृति, जीव-जंतु और मनुष्य के बीच सामंजस्य कायम रहेगा, तब तक विविधता रंग बने रहेंगे। 

- राजीव रंजन प्रसाद 
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नक्सलवाद से लड़ती सड़कें


एक यायावर लेखक सड़कों से ही अपनी बात आरम्भ कर सकता है। इस बार दंतेवाड़ा - अरनपुर मार्ग में बदला हुआ वातावरण था। शहादत की अनेक कहानियाँ इस सड़क निर्माण के साथ जुड़ी हुई हैं। कतिपय स्थानों पर किनारे उन वाहनों को भी देखा जा सकता है जिन्हें सडक निर्माण का विरोध करते हुए नक्सलियों ने जला दिया था। ग्रामीण बताते हैं कि बिछाई गयी बारूद को तलाश तलाश कर और भविष्य में मौत देने की तैयारियों के लिये लगाये गये सैंकड़ों विस्फोटकों को डिफ्यूज करते हुए डामर बिछाया गया है। अब दंतेवाड़ा जिले की आखिरी सीमा अर्थात अरनपुर पहुँचना सहज हो गया है। इसके आगे अभी संघर्ष जारी है और जगरगुण्डा तक सड़क को पहुँचाने में एड़ी-चोटी का जोर लगने वाला है। मैंने संभावना तलाशी कि यथासंभव जगरगुण्डा तक पहुँचने का प्रयास किया जाये और गाड़ी कच्चे रास्ते में उतार दी। जगरगुण्डा संभवत: सात किलोमीटर रह गया होगा जहाँ से हमें अपनी गाड़ी को वापस लेना पड़ा लेकिन यह स्पष्ट था कि न केवल इस मार्ग में कदम कदम पर लैण्डमाईंस का खतरा है अपितु भूगोल भी ऐसा है कि वह माओवादियों को प्रत्याक्रमण के लिये बेहतर स्थिति प्रदान करता है। इस रास्ते से आगे बढते हुए सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जगरगुण्डा में राशन और आवश्यक सामान पहुँचाने के लिये क्यों पंद्रह सौ जवानों को जान पर खेल कर यह संभव बनाना पड़ता है।  दोरनापाल से जगरगुंडा,  दंतेवाड़ा से जगरगुंडा और बासागुड़ा से जगरगुंडा तीनो ही पहुँच मार्ग इस तरह माओवादियों द्वारा अवरोधित किये गये हैं कि जगरगुण्डा एक द्वीप में तब्दील हो गया है जहाँ सघन सुरक्षा में किसी खुली जेल की तरह ही जन- जीवन चल रहा है। 

वापस लौटते हुए अरनपुर कैम्प में जवानों से मुलाकात हुई और लम्बी चर्चा भी। मैं केवल यह नहीं जानना चाहता था कि सड़कों के निर्माण में आने वाली बाधायें क्या हैं अपितु यह समझना आवश्यक था कि नक्सलगढ तक आ पहुँची सड़कों से क्या बदलाव आ रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि सड़कें बहुत धीमी गति से नक्सलगढ की छाती पर सवार हो रही हैं और परिवेश बदल रहा है। भय का वातावरण सडकों के आसपास से कम होने लगा है। रणनीतिक रूप से पहले एक कैम्प तैनात किया जाता है जिसे केंद्र में रख कर पहले आस-पास के गाँवों में पकड़ को स्थापित किया जाता है। आदर्श स्थिति निर्मित होते ही फिर अगले पाँच किलोमीटर पर एक और कैम्प स्थापित कर दिया जाता है। इस तरह जैसे जैसे फोर्स आगे बढ रही है, वह अपने प्रभाव क्षेत्र में सड़कों की पुनर्स्थापना के लिये मजबूती से कार्य भी कर रही है। एक जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र में केवल ग्यारह सड़कें दो सौ पैंतीस टुकड़ों में तैयार की जा रही हैं। 

हमारी सशस्त्र ताकतें आरोपों के निरंतर घेरे में काम करती हैं। एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया गया है कि नक्सलवाद से लडने वाला प्रत्येक जवान या तो बलात्कारी है अथवा हत्यारा। इस कहन को इतनी चतुराई के साथ वैश्विक मंचो पर प्रस्तुत किया जाता है कि अनेक बार मैं दिवंगत आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा के मेरे द्वारा लिये गये आखिरी साक्षात्कार की इन पंक्तियों से सहमत हो जाता हूँ कि नक्सलवाद के विरुद्ध मैदानों में पायी गयी जीत को बहुत आसानी से दिल्ली में बैठ कर केवल पावरपोईंट प्रेजेंटेशन से पराजित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये ताडमेटला में हुई घटना पर कानून अपना काम निर्पेक्षता से कर रहा है  और बस्तर में लाल-आतंकवाद को पोषित करने वाली धारायें आक्रामकता से। दिल्ली के एक सरकारी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका पर ग्रामीणों को नक्सलवाद के पक्ष में भडकाने के आरोप लगे तब पूरी बहस को केंद्रीय सरकार के कार्मिकों की नियमावली से भटका कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर केंद्रित कर दिया गया था। हाल में पुलिस के जवाने ने नक्सल समर्थन के विरोध में कतिपय पुतले जलाये तो अब बहस अभिव्यक्ति के तरीके पर नहीं अपितु केंद्रीय सरकार की नियमावली पर हो रही है। दोनो ही घटनायें लगभग एक जैसी हैं, ऐसा नहीं कि सरकार के लिये कार्य कर रहे प्राध्यापकों के और सुरक्षा कर्मियों के कर्तव्यों में और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मानकों में संविधान ने अंतर की रेखा खींच रखी हो? थोडा पुराने पन्नों को पलटने पर याद किया जा सकता है कि नक्सलवाद से लडाई के एक समय के अगुवा पुलिस अधिकारी विश्वरंजन को वैश्विक स्तर पर आलोचना का पात्र योजनाबद्धता के साथ बनाया गया था, यहाँ तक कि दिल्ली में एक साहित्यिक कार्यक्रम में लेखिका अरुंधति राय ने उनके साथ मंच साझा करने से इनकार कर दिया था। जैसे जैसे नक्सलवाद के विरुद्ध जमीनी लडाईयाँ तेज होंगी बहुत शातिरता के साथ सुरक्षाबल और उसके अगुवा लोगों को विलेन बनाने की साजिशें भी बल पकड़ेंगी क्योंकि बस्तर में लडाई केवल हथियारों से नहीं बल्कि मानसिकता और मनोविज्ञान के हर स्तर पर लडी जा रही है, जो पक्ष कमजोर हुआ धराशायी हो जायेगा। इस सबका दु:खांत पहलू यह है कि बस्तर से बहस के लिये चुनी गयी घटनाओं की दिशायें तय हैं इसीलिये पूरा देश हर बस्तरिया के चेहरे पर उसी तरह नक्सलवादी देखने लगा है जैसे कश्मीरियों के चेहरे पर आतंकवादी तलाशा जाता है। 

बातों बातों में इसी वर्ष अगस्त में अरनपुर के सरपंचपारा की एक घटना से परिचित हुआ। यहाँ गाँव से मुख्य सड़क तक पहुँचना लगभग असंभव था चूंकि माओवादियों द्वारा सभी पहुँच मार्गों को काट कर अलग-थलग कर दिया गया था। इसी मध्य एक ग्रामीण महिला को प्रसव पीड़ा उठी और उसके लिये स्थिति विकराल हो गयी। लगभग दो दिवस तक असह्य वेदना झेलने के पश्चात भी प्रसव नहीं हुआ, अपितु महिला के जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा हो गया। सीआरपीएफ की 111वीं बटालियन के जवानों ने लगभग तीस किलोमीटर पैदल ही स्ट्रेचर थामे दर्द से कराहती महिला को सुरक्षा प्रदान करते हुए बाहर निकाला और अस्पताल पहुँचाया। इस घटना में कमी है कि यह सुरक्षा बलों के मानवीय पक्ष को प्रस्तुत करती है जो शायद हमारी तल्ख या प्रायोजित बहसों के बीच सबसे वृथा विषय है।

सुरक्षा बलों के साथ समय गुजारते हुए मैंने उनके द्वारा अपने कार्यक्षेत्र की परिधि में किये जा रहे सामाजिक-आर्थिक कार्यों का जायजा लिया। स्वास्थ्य सुविधा, साईकिल वितरण अन्य आवश्यक सामानों की आपूर्ति जैसे अनेक कार्य नक्सलियों से मोर्चा लेने के साथ साथ समानान्तर रूप से सिविक एक्शन के तहत किये जा रहे हैं। मैंने यह महसूस किया कि ग्रामीणों को जैसे जैसे सुरक्षा का अहसास हो रहा है उन्होंने माओवाद के स्थान पर मुख्यधारा को अपने पहले विकल्प के तौर पर चुना है। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि सड़कें बेहतर तरीके से माओवाद के विरुद्ध लड़ाई में अपना योगदान दे रही हैं। मेरी यह अवधारणा इसलिये भी प्रबल हो जाती है चूंकि कटेकल्याण-दंतेवाड़ा सडक जो बहुत कठिनाई से निर्मित हो सकी किंतु इसपर यात्रा करते हुए मुझे महसूस हुआ कि अब जन-आवागमन बहुत सहज हो गया है तथा वातावरण में भयमुक्तता व्याप्त है।     

- राजीव रंजन प्रसाद 
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पर्यावरण की बुनियादी समझ आवश्यक है




पर्यावरण शब्द न केवल बहु-आयामी है अपितु अनेको विषयों पर अध्येता की समझ विकसित होने की मांग करता है। इस शब्द की सार्थक विवेचना के पीछे की सबसे बड़ी अडचन यह है कि ‘पर्यावरण और विकास’ को साथ में रख कर समझने की बहुधा कोशिश की जाती रही है और हर बार दो धारायें बाहर निकल कर भिन्न मार्गों की ओर चली गयी हैं। विकास का विरोधाभासी शब्द विनाश है न कि पर्यावरण; इस तथ्य को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। यह ध्यान मे रखना होगा कि उपभोक्ता संस्कृति और वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया है। जीवन स्तर उँचा उठाने के लिये संघर्ष करते लोग और साथ ही साथ असामान्य रूप से बढती जनसंख्या के दबाव ने प्राकृतिक असंतुलन पैदा कर दिया है। अवैज्ञानिक तरीके से जारी विकास की दौड मे उद्योगों ने प्रकृति को अनदेखा कर दिया। यही नहीं जनसंख्या का दबाव झेलने के लिये बनायी जा रही नीतियों ने खाद्यान्न उत्पादन बढाने के लिये कृषि में रासायनो का उपयोग बढाया तो इससे भूमि, पानी, हवा के साथ अन्न भी जहरीला होने लगा। जनसंख्या के विस्फोट ने शहरो की संख्या को बढाया। शहरों मे वाहनो की संख्या बढी तो वहाँ की हवा सांस लेने के लिये अनुपयुक्त होने लगी। यह एक सरल विमर्श है यह समझाने के लिये कि पर्यावरण के साथ हुए नुकसान का खामियाजा पूरी दुनिया को किसी न किसी रूप में भुगतना पड रहा है। इस असतुलित विकास की दिशा ने विनाश की आमद का मार्ग प्रशस्त किया। भूकम्प, जवालामुखी, टॉरनेडो, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदा निरंतर हो गयी हैं तथा जन-धन को समाप्त कर रही है। प्राकृतिक प्रकोप बढने का मुख्य कारण संसाधनों का तीव्रतम दोहन है तो समूची अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर रहा है। निहितार्थ यह है कि पर्यावरण की परिधि में हम और हमारा परिवेश उसकी सम्पूर्णता के साथ आता है अत: विकास और विनाश जैसी बहसों को उसके निष्कर्षों तक पहुँचाने के लिये इसे परिभाषित किया जाना अत्यधिक आवश्यक है। यह विमर्श हमें सोचने पर बाध्य हरता है कि कहीं हमारे व्यवहारशास्त्र में कोई बडी कमी है अथवा हमने अपने पर्यावरण के निहितार्थ को सही प्रकार से ग्रहण नहीं किया है। 

हम कैसे समझें कि पर्यावरण क्या है? एक बडी ही रुचिकर परिभाषा है कि “व्यक्ति गर्भावस्था से लेकर मृत्यु पर्यन्त अपने आस-पास से जो भी उत्तेजनाएं ग्रहण करता है उनके समुच्चय का मान ही पर्यावरण है” (बैरिंग, लैंगफील्ड और बेल्ड)। इस परिभाषा की चीरफाड करें तो निष्कर्ष निकलता है कि व्यक्ति को केन्द्र में रखते हुए उसके जीवन तथा व्यवहार को प्रभावित करने वाले सभी कारक सम्मिलित रूप से उसका पर्यावरण हैं। इन प्रभावकारी कारकों को मनुष्य की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति से भी जोडा जा सकता है तथा भौतिक परिदृश्य से भी। मोटे तौर पर वह सब कुछ पर्यावरण है जो हमे हमारे चारो ओर की सजीव तथा निर्जीव वस्तुओं से जोडता है। संधिविच्छेद करने पर पर्यावरण शब्द से ‘परि (चारो ओर) तथा ‘आवरण’ (घेरा) बाहर निकलते हैं; अर्थात सम्मिलित रूप से पर्यावरण का हिस्सा हैं - हमारे वृक्ष-पादप, पक्षी-जंतु जगत, हमारी नदियाँ, हमारी वायु, हमारा आकाश यहाँ तक कि अंतरिक्ष भी। कुछ अन्य परिभाषायें पर्यावरण शब्द की सुन्दर व्याख्या करती हैं जैसे रॉस के अनुसार “पर्यावरण वह बाह्य शक्ति है जो प्रभावित करती है”। हार्कोविट्ज के अनुसार “पर्यावरण सभी बाह्य दशाओं एवं प्रभावों का सम्पूर्ण योग है जो जीवों के कार्यों एवं विकास को प्रभावित करता है”। टेंसले के अनुसार “प्रभावकारी दशाओं का सम्पूर्ण योग जिसमे जीव रहते हैं, पर्यावरण कहलाता है”। फिटिंग के अनुसार “जीव के परिवेशीय कारकों का योग पर्यावरण है”। सरलीकरण करने के लिये आप प्रत्येक जीव या समूह के लिये परिभाषा दे सकते हैं कि वे समस्त जैविक, भौतिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ जिसमे कोई जीव निवास करता है उसका अपना पर्यावरण है। घिरा होना यहाँ महत्वपूर्ण है जिसके लिये फ्रांसीसी शब्द है “एन्वाईरोनियर” इसी भावार्थ को पकड कर पर्यावरण के लिये अंग्रेजी शब्द की सृष्टि हुई है – एंवायरन्मेंट।

प्राथमिक समझ तो हमारी प्राचीन पुस्तकें ही करा देती हैं जहाँ वे शरीर को जिन पाँच तत्वों की समिष्टि बताती हैं अर्थात धरती, जल, अग्नि, आकाश तथा वायु; वस्तुत: ये सभी तत्व सम्मिलित रूप से पर्यावरण शब्द की सही परिभाषा निर्मित करते हैं और यह भी बताते हैं कि शरीर की कोशिका जैसे सूक्ष्म तत्व से ले कर अंतरिक्ष की विराटता तक सब कुछ पर्यावरण शब्द के भीतर समिष्ठ हो जाता है। अथर्ववेद मे कहा गया है कि भूमि हमारी माता है। हम पृथ्वी के पुत्र हैं। मेघ हमारे पिता हैं, वे हमें पवित्र करते हुए पुष्ट करें -  मात्य भूमि पुत्रो अहम पृथिव्या। पर्जन्य पिता स उ ना पिपर्तुम। (12.1.12) 

ऋग्वेद में कहा गया है कि पृथ्वी, अंतरिक्ष एवं द्युलोक अखंडित तथा अविनाशी हैं। जगत का उत्पादक परमात्मा एवं उसके द्वारा उत्पन्न यह जीव जगत भी कभी नष्ट न होने वाला है। विश्व की समस्त देवशक्तियाँ अविनाशी हैं। पाँच तत्वों से निर्मित यह सृष्टि अविनाशी है। जो कुछ उत्पन्न हो चुका है अथवा जो कुछ उत्पन्न होने वाला है वह भी अपने कारण रूप से कभी नष्ट नहीं होता है - 
अदितिधौर्रदितिर न्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्र:। 
विश्वे देवाअ अदिति: प न्चजनाअदितिर्जात मदितिर्जनित्वम॥ 

हमारे आसपास की प्रत्येक वस्तु जड़, चेतन, प्राणी, हमारा रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति विचार आदि सभी कुछ पर्यावरण के ही अंग है। ‘जल बिन मीन’ के अस्तितिव की कल्पना कीजिये। जल मछली का पर्यावरण है वह जीवित ही नहीं रह सकती यदि उसे पानी से बाहर निकाल दिया जाये। मछली तब भी जीवित नहीं रह सकती यदि जिस पानी में उसका जीवन है वह विषैला हो जाये अथवा उसमे ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगे। यही उदाहरण वृहद हो कर पर्यावरण की सम्पूर्ण परिभाषा बन जाता है। इस आधार पर यह स्पष्ट है कि जीवन के लिए एक परिपूर्ण व्यवस्था बनाने वाले जैविक तथा अजैविक तत्व मिल कर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। “किसी भी जीव जन्तु में समस्त कार्बनिक व अकार्बनिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों को पर्यावरण कहेंगे” यह परिभाषा  जर्मन वैज्ञानिक अरनेस्ट हैकन ने दी है। इसी उदाहरण पर आगे बढते हुए हम यह समझ सकते हैं कि प्रत्येक प्राणी भिन्न पर्यावरण में निवास करता है। जो मछली के लिये पर्यावरण सही है वह हाथी  के लिये अनुपयुक्त, यही उनके भिन्न भिन्न निवास स्थल होने का कारण भी है। अत: एक विशेष जीव समूह के योग्य पर्यावरण में उसका निवास स्थल अथात हेबिटाट (Habitat) बनता है। हेबिटाट शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द हैबिटेयर (Habitare) से हुई है। बुनियादी तौर पर देखा जाये तो हेबिटाट और पर्यावरण शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची प्रतीत होते हैं किंतु इनमें बुनियादी अंतर व्यापकता का है। जहाँ हैबिटाट शब्द किसी परिवेश के स्थानीय घटकों तक संकुचित है वहीं पर्यावरण व्यापकता में परिवेश के अनेकों घटकों को स्वयं में सहामित करता है। किसी छोटे क्षेत्र में एक जीव विशेष से जुडे परिवेश को उसका अपना सूक्ष्म वातावरण (Micro Climate) कहा जा सकता है।

पर्यावरण की बुनियादी समझ आवश्यक है। हम संरक्षण का अर्थ केवल पौधारोपण समझते हैं और यह मान कर चलते हैं कि इतने ही से अपने कर्तव्यों की इतिश्री हो गयी है। वस्तुत: जबतक कम अपने कार्यकलापों से सूक्ष्म वातावरण में पढने वाले प्रभावों तक की विवेचना में सक्षम नहीं होंगे हमारा लीपा-पोती और नारों वाला पर्यावरण संरक्षण जारी रहेगा जिसका कोई अधिक मायना नहीं। हर जीव समूह, उसका हेबीटाट और जीवन शैली किसी न किसी तरह से मनुष्य के जीवन को भी प्रभावित करती है एवं किसी वातावरण से एक के विलुप्ति भी मानव अस्तितिव पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाती चलती है। प्रकृति ने डायनासोर को भी अपने अत्यधिक दोहन के लिये क्षमा नहीं किया, वह मनुष्यों को भी नहीं करेगी। 

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Friday, August 28, 2015

रक्षाबन्धन और बस्तर का दफ़्न इतिहास


रक्षाबन्धन पर बहुत सी कहानियाँ हमारे सम्मुख हैं। अधिकतम कहानियाँ पौराणिक आख्यान हैं तो कुछ भारत के गौरवशाली इतिहास में सद्भावना वाले पन्नों से भी जुड़ी हुई हैं। भविष्य पुराण में इन्द्राणी द्वारा देव-असुर संग्राम के दौरान रक्षा की कामना से इन्द्र को रक्षासूत्र बाँधने का उल्लेख मिलता है। स्कंधपुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में देवी लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को रक्षा सूत्र बाँधने का उल्लेख मिलता है। महाभारत का वह प्रसंग जहाँ भरी सभा में दु:शासन द्वारा साड़ी खींचे जाने से द्रौपदी की रक्षा श्री कृष्ण करते हैं उसके परोक्ष में भी एक कथा है जहाँ कृष्ण के जख्मी हाथों में द्रौपदी द्वारा कपडे का टुकडा बाँधे जाने का उल्लेख मिलता है। यह सिलसिला प्राचीन कृतियों और महाकाव्यों से बाहर निकल कर इतिहास की दहलीज पर पहुँचता है। कहा जाता है कि सिकन्दर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी बाँध कर अपने पति की रक्षा का वचन लिया था। एक अन्य आख्यान जहाँ यह उल्लेख मिलता है कि मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने रक्षासूत्र भेज कर मुगल बादशाह हुमायूं से सहायता माँगी, आक्रांता बहादुरशाह के विरुद्ध मेवाड़ की रक्षा के लिये यह सहायता की गयी थी।
रक्षाबन्धन के पर्व की महत्ता जितनी अधिक है यदि इतिहास टटोला जाये तो उससे जुडे अनेक ऐसे प्रसंग और भी हैं जिन्हें यदि दस्तावेजबद्ध किया जाये तो आने वाली पीढी को अपनी संस्कृति व अतीत को सही तरह से समझने में सहायता मिल सकती है। इसी तरह की एक कहानी सत्रहवीं सदी के बस्तर राज्य से जुडी हुई है। राजशाही का सबसे क्रूरतम पहलू यह हुआ करता था कि शासक बाहरी शत्रुओं से अधिक अपने परिजनों से ही भयभीत रहा करता था। सिंहासन के लिये पिता की हत्या पुत्रों ने, भाई की हत्या भाई ने यहाँ तक कि माताओं ने पुत्रों की भी हत्या करवायी है। वह बस्तर शासन के लिये ऐसा ही कठिन समय था।

बस्तर के राजा राजपालदेव (1709 – 1721 ई.) की दो रानियाँ थी – रुद्रकुँवरि बघेलिन तथा रामकुँवरि चंदेलिन। रानी रुद्रकुँवरि से दलपत देव तथा प्रताप सिंह राजकुमारों का जन्म हुआ तथा रानी रामकुँवरि के पुत्र दखिन सिंह थे। रानी रामकुँवरि अपने पुत्र दखिन सिंह को अगला राजा बनाना चाहती थी। रामकुँवरि की साजिश के अनुसार राजकुमार दलपत देव को कोटपाड़ परगने तथा प्रतापसिंह को अंतागढ़ मुकासा का अधिपति बना कर राजधानी से बाहर भेज दिया गया। इससे वयोवृद्ध राजा के स्वर्गवास के बाद दखिन सिंह को सिंहासन पर बैठाने में आसानी होती। कहते हैं कि बुरी नीयत से देखे गये सपने सच नहीं होते। दखिन सिंह भयंकर रूप से बीमार पड़ गये। उनके बचने की सारी उम्मीद जाती रही। आखिरी कोशिश दंतेश्वरी माँ के दरबार में की गयी। मृत्यु से बचाने के लिये राजा ने अपने बीमार बेटे को दंतेश्वरी माँ की मूर्ति के साथ बाँध दिया। दखिन सिंह स्वर्ग सिधार गये। लाश के बोझ से रस्सियाँ टूट गयी। माँ दंतेश्वरी के चरणों में राजकुमार का मस्तक पड़ा था। राजा यह सदमा सह नहीं कर सके। एक वर्ष के भीतर ही सन 1721 ई. में स्वर्ग सिधार गये।

राजा के दोनों बेटे उनकी मौत के समय राजधानी से बाहर थे। रानी रामकुँवरि अभी भी षडयंत्र कर रही थीं। मौका पा कर बस्तर का सिंहासन रानी रामकुँवरि के भाई (1721-1731 ई.) ने हथिया लिया। असली वारिस खदेड़ दिये गये। राजकुमार प्रतापसिंह रीवा चले गये और दलपतदेव ने जैपोर राज्य में शरण ली। जैपोर के राजा की सहायता से दलपतदेव ने कोटपाड़ परगना पर अधिकार कर लिया। अब वे बस्तर राज्य के दरबारियों से गुपचुप संबंध स्थापित करने लगे। एक वृहद योजना को आकार दिया जाने लगा और इसके प्रतिपादन का दिन निश्चित किया गया – रक्षाबन्धन। दलपतदेव ने मामा को संदेश भिजवाया कि उन्हें आधीनता स्वीकार्य है तथा वे राखी के दिन मिल कर गिले-शिकवे दूर करना चाहते हैं। संधि का प्रस्ताव पा कर मामा की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। इस संधि से उसका शासन निष्कंटक हो जाने वाला था। वर्ष 1731 को रक्षाबन्धन के दिन दलपतदेव नेग ले कर दरबार में उपस्थित हुए। मामा-भाँजे का मिलन नाटकीय था। भाँजे ने सोचने का अवसर भी नहीं दिया। निकट आते ही अपनी तलवार खींच ली और सिंहासन पर बैठे मामा का वध कर दिया (दि ब्रेत, 1909)। इस तरह दस साल भटकने के बाद दलपत देव (1731-1774 ई.) ने अपना वास्तविक अधिकार रक्षाबन्धन के दिन ही प्राप्त किया था।

रक्षाबन्धन के दिन अपना राज्याधिकार योग्यता, युक्ति, साहस तथा रणनीति के बल पर हासिल करने वाले राजा दलपत देव के नाम पर की जगदलपुर राजमहल की पृष्ठभूमि में अवस्थित दलपतसागर ताल है जिसे बाहरी आक्रांताओं से राजधानी को सुरक्षित रखने के लिये उन्होंने ही खुदवाया था। राज-पाट की कहानियाँ एक तरफ लेकिन रक्षाबन्धन से जुडी इस कहानी से पर्व की महत्ता और बढ जाती है। रक्षाबन्धन का यह प्रसंग बस्तर के इतिहास का गर्व से भरा पन्ना भी है।
 -दैनिक छ्त्तीसगढ में प्रकाशित 

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Sunday, August 02, 2015

मीनाकुमारी, सारथी - पासवान और बुद्ध का रास्ता

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“मीना कुमारी हमको बहुत पसंद है सर इसलिये अपनी घोड़ी का नाम भी यही रख दिये हैं”। सुरेन्द्र पासवान, जो राजगीर में मेरे सारथी थे, कुछ मुस्कुराकर और थोड़ी उँची आवाज में बोले।

मौसम मनोनुकूल था, बादल छाये हुए थे और हवा की सामान्य से कुछ तेज गति होने के कारण ‘टमटम’ से परिभ्रमण आनंददायी हो गया। यथानाम तथा गुण, मीनाकुमारी की सधी हुई चाल थी उसपर गले में लगे पट्टे पर से एक ही धुन में बजते घुंघरु…..। मसीही कैलेंडर में जहाँ से शून्य शुरु होता है उससे भी कई हजार साल पीछे जाने पर ही राजगीर (राजगृह) के वैभव की कल्पना संभव है। उस महाराज जरासंध की राजधानी थी यह मगध भूमि जिन्हें परास्त करने के लिये कौटिल्य के आगमन से बहुत पहले ही कृष्ण को कुटिलता की दीक्षा भीम को प्रदान करनी पडी थी जिसके फलस्वरूप विलक्षण वरदान से सुरक्षित उस महाप्रतापी नरेश की मलयुद्ध में हत्या हो गयी। नन्दों के उत्थान और पतन, अनेकों राजवंशों की गौरवपूर्ण राजधानी रहने, समकालीन दो महानतम दिव्यात्माओं – भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के द्वारा पवित्र की हुई यह भूमि पाँच पहाडों से घिरी और हरी भरी है।

एसा क्यों है कि हम भारतवासियों को अपने वास्तविक इतिहास को उकेरने, खोजने तथा उसके वैज्ञानिक प्रामाणिकरण में बहुत रुचि नहीं है। दु:ख है कि हमारा इतिहास भी जातिवादी-वर्गवादी तथा विचारधारावादी है। एक ही स्थान पर अलग अलग सोच वाले लेखक उपलब्ध जानकारियों को अपनी सोच के अनुरूप मोड़ते और घुमाते रहते है। नालंदा अंग्रेजों ने खोज दिया, जमीन से आपके लिये निकाल दिया वरना तो हम भूल ही बैठे थे। अभी 10% भी खुदाई पूरी नहीं हुई है लेकिन लगता है हमे ही कोई जल्दीबाजी नहीं है एक मुहावरा कहता भी है अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम…..लेकिन मेरे टमटम में लगी घोड़ी मीनाकुमारी न तो अजगर थी और न ही पंछी इस लिये पर्वतीय चढ़ाईयों में उसकी गति बदल जाया करती थी।

वेणुवन अर्थात भगवान बुद्ध का वर्षा प्रवास स्थल जो सौभाग्य से अभी भी हरा भरा है, वहाँ से गुजरते हुए मैने पासवान जी से पूछा कि कितनी कमाई हो जाती है दिन भर मे? उन्होंने अपनी व्यथाकथा की शुरुआत मीनाकुमारी के चारे से की। बोले – “सर कमाई हो या नहीं हो दो सौ रुपिया का चारा तो आपको चाहिये ही। ऑफ सीजन में तो चारा ही निकलता रहे, थोड़ी बहुत खेती बाड़ी से घर चल जाता है। सीजन में कमाई हो जाती है। अभी आप अकेला आदमी टमटम रिजर्व करा कर जितना में घूम रहे हैं उतना तब दो सवारी से ही निकल जाता है”।

“अच्छा है चार महीना जम कर काम कीजिये और बाकी दिन आराम भी मिल जाता है”। मैंने कहा।

“आराम करना कौन चाहता है सर!! सवारी से ही रोजी रोटी है। लेकिन अब बहुत मुश्किल आ गया है”। पासवान जी की आवाज दबी हुई थी।

“क्या हुआ?” मेरी जिज्ञासा बढी।

“सर अब टैक्सी आ गया है, कार आ गया है एसे में टमटम को लोग भूलते जा रहे हैं। आदमी पटना से आता है तो वहीं से कार करके चला आता है। लोकल में भी खूब टैक्सी वाला सब हो गया है। आगे ये टमटम चलेगा नहीं, खतम हो जायेगा।“

बात तो सही है। पर्यटन केवल मौजमस्ती नहीं है। आप जब घूमने निकलते हैं तो महसूस कीजिये कि उससे बहुत से रोजगार आपकी ओर इस उम्मीद से देख रहे हैं कि अगर हमारी उपयोगिता आपने ही नहीं समझी तो मिट ही जायेंगे हम।

“कौन चीज हमेसा रही है सर!! इसी जगह बड़े बड़े राजा थे आज कोई भी नहीं बचा, उनकी पीढी भी खतम हो गयी।“ अपनी रौ में पासवान जी बोल रहे थे और मै महसूस कर रहा था कि सचमुच क्या टमटम के आनंद का टैक्सी कभी विकल्प बन सकती है? आखिर क्यों विलुप्त हो जायें ये सवारियाँ? केवल इस लिये कि हमारी सोच को आधुनिक होने का अहंकार हो गया है? विचार का क्रम टूटा बगल से एक ट्रैक्टर गुजर रहा था जिसमे कोई गीत बहुत तेज बज रहा था। गानें में मैं केवल दो ही शब्द समझ सका ‘भौजाई’ और ‘देवरवा’।

“पहले हमारे टमटम में भी म्यूझिक सिस्टम था सर, प्रसासन नें हटवा दिया” पासवान जी नें बुझे स्वर में कहा।

“ट्रैफिक में डिस्टर्ब होता होगा।“ मैं उनके चेहरे के मनोभाव देख मुस्कुरा दिया।

“ट्रैक्टर में काहे लगा है? कार में और टैक्सी में भी लगा है, बस वाला भी लगा के रखा है। बहुत सा सवारी आता है और डिमांड करता है”। अबकि पासवान जी बिदक गये और स्वर भी तेज हो उठा था।

मैं मौन हो गया, या कहूँ कि निरुत्तर। अजीब बाजारवाद है जिसमे मरती हुई चीज ही मारी जाती है? हम भी जाने दो, चलता है और यस बॉस के युग में जी रहे है शायद इन बातों से फर्क ही नहीं पड़ता हमें। सुरेन्द्र पासवान के सरोकार हमारे अपने सरोकार क्यों नहीं बन पाते? मैं अभी भी नाउम्मीद नहीं हुआ था पूछ ही बैठा “आप लोगों की यूनियन वगैरह नहीं है क्या?”

“है सर। सीटू से जुड़े हैं हम लोग। यहाँ कुछ भी बात होती है तो दिल्ली तक जाती है और वहीं फैसला होता है।“ पासवान ने बताया।

“मन के अनुसार परिणाम मिल जाते हैं आपको? काम हो जाता है?” मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी।

“हम लोगों का बात दिल्ली में कौन सुनता है सर? जब जरूरत पड़ता है और बंद कराना है या हड़ताल कराना है तब तो टमटम वाला सबका याद पड़ जाता है लेकिन उसके बाद कौन जानता है कि घोड़ा को दाना मिलता है कि नहीं?” पासवान जी की वेदना उनकी ज़ुबान पर थी।

टमटम वालों की समस्याओं जैसे नितांत स्थानीय सरोकार भी अगर समाधान के लिये दिल्ली का मुँह ताकते हैं तो मुझे यह कहने में गुरेज नहीं कि कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा। अगर मजदूर और किसान नेता जमीनी लड़ाईयाँ छोड़ कर यह महसूस करते हैं कि दिल्ली से जुड़ कर उनकी शान बढ़ती है तो मान लीजिये कि आप केवल इस्तेमाल की वस्तु हैं। शायद आम आदमी के वास्तविक सरोकारों का किसी कोल्हू में घुमा घुमा कर तेल निकाल दिया गया है इसीलिये न तो अब सही मायने लिये मजदूर किसान आन्दोलन ही जीवित बचे न ही वैसे जीवट नेता जिनकी मुट्ठिया तन जायें तो हजारों हाँथ एक साथ इंकलाब उद्घोष करते उपर उठें। सरोकार बस्तर से ले कर राजगीर तक रूप बदल बदल कर भी एक जैसे हैं लेकिन उन्हें सुनने वाले कानों की जगह दिल्ली नें खरीद ली है कुछ मोमबत्तियाँ।…..और मैं केवल कुछ पंक्तियाँ लिख कर अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। यह वायदा है मीनाकुमारी और उसके सारथी से कि अब किसी भी स्थान पर घूमने जाउंगा तो सबसे पहले तलाश करूंगा वहाँ की स्थानीय सवारी की, वह घोड़ा हो, उँट हो या रिक्शा ही क्यों न हो। आभार! आज से पहले मैने इस तरह कभी सोचा न था।
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(पुरस्कृत कृति "मौन मगध में" से एक अंश)

Wednesday, July 15, 2015

किशोर कुमार का पैतृक आवास और उपेक्षायें





जब कलाकार आसमान को अपनी बाँहों में भर लेता है तो ज़मीन से उसका रिश्ता टूटने लगता है। किशोर अलग ही मिट्टी के थे, जीवन भर जन्मभूमि के बने रहे। किशोर कुमार के साथ “खण्डवा वाले” उनके हर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उपनाम की तरह उद्घोषित होता रहा। एक पुराना शहर किशोर की आवाज का इस तरह पर्याय बन गया कि आज भी खण्डवा की हवा में गुनगुनाहट है, मीठापन है। यहाँ के लोग इस कलाकार से जिस तरह गुथे हुए हैं इसके कई उदाहरण मेरे सामने आये। मैं एक चाट वाले के ठेले के पास रुका जो तनमयता से किशोर दा के गाने गुनगुना कर अपने काम में लगा हुआ था। मैने उसकी आवाज़ की तारीफ क्या की उसने किशोर के गानों से शुरुआत की फिर उनसे जुडे संस्मरणों पर उतर आया। उसने कब किशोर को देखा, आज उनके परिवार में कब कौन खण्डवा आता है, जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर किस तरह के कार्यक्रम होते हैं आदि।

“साहब आपने किशोर दा का मकान देखा है?” अनायास उस चाट वाले ने मुझसे पूछा।

“नहीं, लेकिन देखना है मुझे” 

“मत देखना साहब दु:ख होगा आपको” उसने भारी आवाज़ में कहा।

“क्यों, क्या किराये पर लगा है मकान?” 

“नहीं वीरान है, उनके परिवार वाले ही बेचना चाहते हैं।”

“बेचना चाहते हैं, क्यों?” 

“मकान है तो उनके परिवारवालों की प्रापर्टी। करोडों की सम्पत्ति है आज नहीं तो कल बिक ही जायेगी” 

“किशोर के नाम पर स्मारक या संग्रहालय क्यों नहीं बना देते इस मकान को?” 

“खण्डवा वाले तो यही चाहते हैं”

मैने किशोर दा के मकान को इसी क्षण देखने का निर्णय लिया और बताई गयी दिशा में रेल्वेस्टेशन की और बढ चला। वहीं मोड़ पर मुझे बताया गया था कि बाम्बे बाजार में स्टेट बैंक के एटीएम के बगल में उनका पुश्तैनी मकान है। मैने आसपास के दूकानदारों से पूछा और वे जिस ओर इशारा कर रहे थे वहाँ मुझे कोई मकान नजर ही नहीं आया। आखिरकार एक इलेक्ट्रिकल समान की दूकान से सरदार जी बाहर आये और साथ ले चल कर किशोर दा के मकान के सामने मुझे खड़ा कर दिया। मुख्य सड़क पर होने के बाद भी दूकानों की भीड़, अतिक्रमण और प्लास्टिक के लम्बे लम्बे खिंचे तिरपालों के कारण मकान का मुख्य द्वार आसानी से दिखाई नहीं पड़ता। पुरानी फिल्मों में खण्डहर हवेलियों के चौकीदारों की तरह ही एक वृद्ध केयर टेकर सीताराम से मेरी इस मकान में मुलाकात हुई। आरम्भ में तो उसके चेहरे पर उपेक्षा का ही भाव था और वह मुख्यद्वार के भीतर सामने एक टूटी फूटी खटिया डाल कर उस पर बैठा हुआ था। उसने बताया कि कमरों में ताले लगा दिये गये हैं और अंदर से मकान देखने-दिखाने की इजाजत नहीं है।

मैं स्वयं ही आगे बढा और मकान का चारो और से मुआयना करने लगा। मकान के हर कोने से आती कराह सुनी जा सकती थी कि “कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन”। ब्रिटिशकालीन इमारतों का यह सजीव उदाहरण है जो यद्यपि खण्डहर में बदलता जा रहा है किंतु बडे बडे गोलाकार स्तम्भों और काष्ठ से बनी छत की संरचनाओं के आज भी पूर्ववत होने के कारण विशेष दर्शनीय है। यह मकान लगभग 7600 वर्गफीट में फैला हुआ है जिसके आगे की और कई दूकाने भी निर्मित हैं जिनका किराया प्राप्त जानकारी के अनुसार किशोर दा के परिजनों के पास जाता है; साथ ही एक दूकान के किराये से मकान के केयरटेकर सीताराम को सेलरी दी जाती है। मुझे बताया गया कि किशोर दा का पैतृक निवास अब अनूप कुमार के बेटे अर्जुन कुमार के नाम पर है। पारिवारिक सम्पत्ति के बंटवारे में यह सम्पत्ति किशोर कुमार के छोटे भाई अनूपकुमार को मिली, जिसमें लीना चंदावरकर और अमित कुमार भी हिस्सेदार थे, लेकिन किशोर दा की इच्छा को देख कर लीना चंदावरकर और अमित कुमार ने अपना हिस्सा अनूप कुमार के नाम कर दिया था।

मुझे किशोर समाधि के पास “प्रिंस मेलोडी मेकर्स ऑरकेस्ट्रा, खण्डवा” की ओर से लगाये गये कुछ पोस्टर दिखाई दिये थे जिनमें किशोर दा के पैतृक निवास को संग्रहालय में बदले जाने की अपील की गयी थी। जन-भावना जो भी हो यह सम्पत्ति किसी भी तौर पर वर्तमान बाजार दर के अनुरूप पंद्रह से बीस करोड की है इसलिये परिजनों द्वारा इसको बेचे जाने की कोशिश किये जाने सम्बन्धी खबरें निरंतर अखबारों में आती रहती हैं। निजी सम्पत्ति होने के कारण निश्चित ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने का सर्वाधिकार किशोर दा के पोते अर्जुन के पास है। किसी समय इस भवन के सम्बन्ध में कोई न कोई निर्णय लिया ही जायेगा और फिर धीरे धीरे तेजी से बढता शहर भूल जायेगा कि इस गली में एक इमारत थी जिसके मुख्य द्वार पर गौरी कुंज अंकित था और सगर्व सामने के गेट पर गांगुली हाउस लिखा हुआ था। किंवदंतिकयाँ रह जायेंगी कि बाँबे बाजार कहे जाने वाले खण्डवा के एक क्षेत्र में 4 अगस्त 1929 को गांगुली हाउस में एक वकील कुंजीलाल के घर किसी आभास कुमार गांगुली का जन्म हुआ था जिसे सारी दुनिया ने किशोर कुमार के नाम से जाना और धीरे धीरे एक शहर ही दुनिया भर में उसकी मखमली, दर्द से भीगी हुई, मस्ती भरी आवाज के कारण पहचाना गया।

किशोर दा को उनका काम, उनके गीत ही अमर रखेंगे; इसके बाद भी क्या यह सही नहीं कि ऐसी स्मृतियाँ आने वाली पीढी के लिये सहेजी जानी चाहिये? आवास के केयरटेकर सीताराम ने संभवत: मेरी अभिरुचि को देख कर अपना बक्सा खोला और उसमें से किशोर दा के कुछ पुराने और दुर्लभ चित्र मुझे दिखाये। वैसे तो मकान में सामने ही एक फोटोफ्रेम में कुछ ब्लैक एण्ड व्हाईट तस्वीरें बेतरतीब सी इस तरह डिस्प्ले पर लगायी गयी हैं जैसे रस्म अदायगी होती है। शाम हो चुकी थी और जब मैं मकान के पिछले हिस्से की ओर गया तो देखा छत के पीछे ही सूरज डूब रहा था। मेरी संवेदनायें तब और सिहर उठीं जब मैंने देखा कि मकान में उपर की ओर पीपल के पेड़ ने अच्छा खासा आकार ले लिया है और उसकी जड़े किसी पैने नाखून की तरह दरारों को खरोंच रहीं हैं, चौड़ा कर रही हैं। शायद यह जान बूझ कर किया जा रहा है कि फिर समय को ही दोष दिया जा सकेगा कि किशोर दा की खण्डवा शहर में स्थित वह आखिरी निशानी खुद ब खुद ढह गयी। यह भवन वाकिफ है कि किशोर ने ही गाया था वह अमरगीत – आने वाला पल जाने वाला है।
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Tuesday, July 07, 2015

बस्तरनामा की समीक्षा उम्मीद में

मेरी कृति बस्तरनामा की पत्रिका उम्मीद में प्रकाशित समीक्षा -





Wednesday, June 10, 2015

बस्तर के वन, वन-उत्पाद और वन-औषधियाँ




जंगल बस्तर की राजनीति का केन्द्र रहा है चाहे वह "कोई आन्दोलन" हो जो कि एक पेड़ के बदले एक सिर की अवधारणा पर आधारित था, अथवा कुख्यात मालिक मकबूजा काण्ड। बस्तर की आत्मा यहाँ की हरीतिमा है। सदियों तक यहाँ सभ्यतायें आबाद रहीं और उन्हें संरक्षण वनों ने दिया है। नल और नाग शासक तो प्रकृति पूजक थे ही काकतीय/चालुक्य शासक अन्नमदेव ने जिस बस्तर राज्य की नीव रखी उसे यहाँ पाये जाने वाले बाँस से ही नाम मिला है। बस्तर संभाग वन संपदा से भरपूर है, यहाँ अनेक दुर्लभतम वृक्ष हैं तो कहीं न पायी जाने वाली वन-औषधियाँ भी। यहाँ विलुप्त हो चुके जंगली भैंसे की कहानियाँ आज भी गूंजती हैं तो आदमी की आवाज़ की हू-बहू नकल कर सकने वाली जंगली मैना एक अजूबा है। इसी तरह दुर्लभ पक्षी भीमराज, अबूझमाड़ पर्वतों की शोभा है जिसका आकार प्रकार नीलकंठ की तरह होता है साथ ही वह अपने रंग-बिरंगे पंखों की वजह से जाना जाता है। साल वनों की अधिकता के कारण यह अंचल सालवनों का द्वीप भी कहा जाता है। इसी नाम की अपनी कृति से बस्तर अंचल के प्रसिद्ध साहित्यकार गुलशेर अहमद खां शानी ने बस्तर को देश-विदेश तक चर्चित किया था। 

रियासत काल में वनों का प्रबन्धन जमींदारों तथा राजाओं के द्वारा होता था। वनों से ही उन्हें अधिकतम राजस्व प्राप्त होता था। उस दौर में खरीददार को वन क्षेत्र में कहीं से भी परिपक्व गोलाई के वृक्ष काटने की छूट थी। इस काटी गयी लकड़ी पर रायल्टी ली जाती थी। रियासत काल में वन प्रबन्धन को ले कर कोई ठोस नीति अंग्रेजों के इस क्षेत्र में आगमन तक नहीं बन सकी। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अंग्रेज बस्तर में यहाँ के वनोत्पादों का अपने अनुसार दोहन करने के लिये ही आये थे अत: उनकी वन नीति भी साम्राज्यवादिता का एक पैना नाखून सिद्ध हुई, जिसने यहाँ की हरीतिमा का शोषण भी किया और आदिवासियों को उनके नैसर्गिक आवासों से दूर भी कर दिया। रियासतकालीन बस्तर में ग्यारह आन्दोलन हुए और सभी किसी न किसी तरह वन और आदिवासियों के अधिकारों से जुड़ते हैं। इसके दृष्टिगत ब्रिटिशकालीन वन-संरक्षण के कानून जंगलों के संरक्षण के लिये नहीं अपितु सुनियोजित दोहन के लिये बनाये गये थे।

आज़ादी के बाद भी स्थितियों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। मालिक मकबूजा प्रकरण बहुचर्चित रहा जिसने वनों के दोहन और आदिवासी शोषण की जो कहानियाँ लिखीं वे कलंक निरूपित की जायेंगी। मालिक मकबूजा काण्ड को समझने के लिये हमें पुन: रियासती काल में लौटना होगा; सन 1940 में एक कानून लागू हुआ था कि आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता। इस कानून में कई अगर और मगर लगा दिये गये। अगर किसी आदिवासी को शादी व्याह जैसे जरूरी काम के लिये पैसा चाहिये तो वह अपनी जमीन गैर आदिवासी को बेच सकता है मगर उसे राज्य के सक्षम अधिकारी से लिखित अनुमति प्राप्त करनी होगी। आजादी के बाद नयी सरकार ने नया कानून बनाया जिसे ‘सेंट्रल प्रॉविंसेज स्टेट्स लैंड़ एण्ड ट्रेनर ऑर्डर -1949’ कहा गया जिसमें काश्तकारों को उनकी अधिग्रहीत भूमि पर अधिकार हस्तांतरित कर दिये गये। इस आदेश ने भी किसानों को उनकी भूमि पर लगे वृक्षो का स्वामित्व नहीं दिया था अत: कमोबेश यथास्थिति बनी रही, चूंकि पुराने कानून में भी पेड़ शासन की सम्पत्ति माने गये थे। ‘सी.पी एवं बरार’ से पृथक हो कर मध्यप्रदेश राज्य बनने के बाद नयी सरकार ने पुन: नयी सक्रियता दिखाई और ‘भूराजस्व संहिता कानून-1955’ के तहत भू-स्वामियों को उनकी भूमि पर खड़े वृक्षों पर भी स्वामित्व अर्थात मालिक-मकबूजा हक हासिल हो गया। उपरी तौर पर देखने से यही लगता है कि सरकार ने आदिवासियों का हित किया है लेकिन यह अदूरदर्शी कानून सिद्ध होने लगा। सागवान के लुटेरे भारत के कोने कोने से बस्तर की ओर दौड़ पड़े। कौड़ियों के मोल सागवान के जंगल साफ होने लगे। कभी शराब की एक बोतल के दाम तो कभी पाँच से पंद्रह रुपये के बीच पेड़ और जमीनों के पट्टे बेचे जाते रहे। 

सर्वदा हुए निर्मम दोहन के पश्चात भी आज बस्तर संभाग का सत्तर प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वन है। इन उपलब्ध वनों का पुन: वर्गीकरण किया जाये तो इन्हे प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से दो वन वृत्तों – उत्तर बस्तर वन वृत्त तथा दक्षिण बस्तर वन वृत्त में बाँटा गया है। पुन: इन दो वन वृत्तों को सात वन मण्डलों एवं 43 परिक्षेत्रों में विभक्त किया गया है। भूगोल को आधार बनाया जाये तो इस अंचल का मध्यपूर्वी अथवा पठारी क्षेत्र मुख्य रूप से साल वनों से घिरा हुआ है जबकि उत्तर पश्चिम एवं दक्षिणी क्षेत्रों में मिश्रित वन हैं। चैम्पियन तथा सेठ (1968) ने बस्तर के वनों को पाँच प्रकारों में विभाजित किया है 

अ) आर्द्र प्रायद्वीपीय साल के वन (केशकाल तथा कोण्डागाँव का उत्तर-पूर्वी भाग)
ब) दक्षिणी आर्द्र मिश्रित पतझड़ वाले वन (संभाग के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में नदियों, घाटियों, ढ़लानों, आर्द्र तथा उपार्द्र क्षेत्रों में विस्तारित जंगल) 
स) आर्द्र सागौन के वन (कोण्टा से दक्षिण पश्चिम की पहाड़ियाँ व भोपालपट्टनम के क्षेत्र) 
द) शुष्क सागौन के वन (इन क्षेत्रों में बाँस नहीं पाये जाते) 
ई) दक्षिणी शुष्क मिश्रित पतझर वन (संभाग के उत्तरी भाग में इस प्रकार के वनों का विस्तार मिलता है)। 

बस्तर के जंगलों में मुख्य रूप से साज, हल्दू, सेमल, बीजा, हर्रा आदि कीमती प्रजातियाँ पायी जाती हैं। पठार को छोड़ कर शेष हिस्सों में बाँस प्रमुखता से पाया जाता है। प्रमुख प्रजातियों को सूचीबद्ध किया जाये तो बीजा, शीशम, साजा, अमलतास, घनबहार, तेन्दू, चार, महुआ, जर्रा, कुसुम, धावड़ा, खैर, कालामोखा, धामन, जामुन, हर्रा, सल्फी, ताड़, छींदकराट, सूरासिंहाड़ी, इमली, आम, अंजन, केकड़, कारम, कोचिला, नीम, बेर, डूमर, बड़, कैंठ, पीपल, पलाश, सेन्दुरी, ककई, घोंट, बेहड़ा, भैलवा, केला, नीबू, चकोत्तरा, नारियल, पपीता, कटहल, गूलर, कदम्ब, भिर्रा, बबूल, काजू, वन मोंगरा, सियाड़ी, भूलन, अगिया, आदि वृक्ष-वनस्पतियाँ बस्तर में प्रचुरता से पाये जाते हैं। बस्तर संभाग में प्रमुख वनोपज के रूप में तिखुर, सालबीज, हर्रा, आँवला, तेन्दुपत्ता, गोंद, फूलबाहरी, शहद, टोरा, कुसुमबीज, बगईघास, महुआफूल, अमचूर, कोसाफल, बेंत, धूप व काजू सहित अनेक प्रकार की जलाऊ लकड़ी उपलब्ध है। पशु पक्षियों में तेन्दुआ, जंगली कुत्ता, कोटरी, लमहा, चीतल, साम्भर, जंगली भैंसा, नीलगाय, जंगली सूअर, भालू, गौर, जंगली मैना, मोर, तीतर, वनमुर्गी, लावा, मंजूर, भृंगराज, सुरिया, तोता, कोयल आदि यहाँ की जैव विविधता के आधार स्तम्भ हैं। बाघ और जंगली भैसे को बस्तर से विपुप्त मान लिया गया था किंतु इन्हीं दिनों अखबारों के माध्यम से कुछ उत्साहवर्धक जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं। इंद्रावती टाइगर रिजर्व के चिल्लामरका इलाके में एक बाघ को उसके दो शावकों के साथ कैमरे में कैद किया गया है। इसी तरह छह वन भैंसों का एक झुंड भी सेंड्रा इलाके में देखा गया है।

बस्तर अपनी जड़ी बूटियों के लिये भी जाना जाता है। यहाँ मुख्य रूप से पाये जाने वाली वन-औषधियाँ हैं - डिस्कोरिया, कालीमूसली, सफेद मूसली, वन तुलसी, आँवला, अरंड, रसना, घीववार, पीली कटेरी, चिरायता, अकरकरा, नीम, नीलगिरि, भटाकटेरी, धतूरा, सर्पगंधा, रानीजाड़ा, नीबूघास, कुनाईन, तुलसी, बेलाडोना, हड़जोड़, बच, सेमल, अर्जुन, कचनार, पुत्रजीवा, हर्रा, वैसिका, लाजवंती आदि। आदिवासी इन औषधियों की गहन जानकारी रखते हैं। उदाहरण के लिये चिरायता को आदिवासी गठ्ठों में भर कर बाजार में बेचते हैं। यह औषधि बुखार तथा रक्त शुद्धि के लिये बहुत उपयोगी मानी गयी है। इसी तरह आदिवासी परिवार नियोजन के लिये काली जीरी (वर्नोनिया एंथेरिंटिका) बीज का उपयोग करते हैं। गरुड़ की लकड़ी दिखा कर साँप को निस्तेज किया जाता है तथा इसकी फली व लकड़ी का प्रयोग साँप का जहर उतारने के लिये किया जाता है। इसी तरह विचित्र लता (एनटाडा स्केंडेंस) भी बस्तर में पायी जाती है जिसके फूल को फल बनने में लगभग दो वर्ष लग जाते हैं। इसकी फली भी लगभग एक से डेढ़ मीटर की लम्बाई लिये हुए होती है और बीज भी बड़े आकार के होते हैं; साँप का जहर उतारने में ये बीज काम मे आते हैं। यहाँ प्राप्त होने वाली ज्योतिष्मती बूटी के तैल का आयुर्वेद में अनेक असाध्य रोगों में प्रयोग बताया गया है। बैचांदी और तेखुर तो बस्तर से देश भर में जाता ही है। 

यदि कृषि परिदृश्य पर एक दृष्टि डाली जाये तो इसे बहुत उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता। बस्तर में सिंचित क्षेत्र नहीं के बराबर है अत: मनसूस पर ही यहाँ की खेती पूरी तरह से निर्भर है। यही कारण है कि बस्तर से प्राप्त होने वाली पन्चानबे प्रतिशत से अधिक फसलें खरीफ की हैं। धान यहाँ की प्रमुख फसल है जिसके आतिरिक्त कोदो कुटकी की फसल भी ली जाती है। खरीफ की फसल संभाग के केवल 3.8 प्रतिशत फसली क्षेत्र से ही ली जा रही है जिसमें कि चना, तुअर, गेंहूँ, अलसी, सरसों, उड़द, मूंग आदि की फसलें प्रमुख हैं।

Friday, March 13, 2015

बस्तर के घोटुल - राजीव रंजन प्रसाद



घोटुल को ले कर अनेक धारणायें हैं, अनेक तरह के विवाद भी हैं। अस्सी के दशक में बीबीसी ने घोटुल पर एक अश्लील वीडियो बना कर इन्हें जिस तरह से दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया वह विभत्स था। हाल के दिनो में हंस पत्रिका में एक वामपंथी लेखक ने घोटुलों को यौनाचार स्थल के रूप में निरूपित किया था तब यह समझने में सहूलियत हुई कि आज के लेखको का अध्ययन कम होता जा रहा है लेकिन जनजातीय विषयों पर वे बड़बोले भी उतने ही प्रतीत होते हैं। विषय में उतरने से पहले बस्तर के तुलसीदास कहे जाने वाले लेखक-पत्रकार श्री रामसिंह ठाकुर के दण्डकारण्य समाचार (3.05.1985) में प्रकाशित आलेख "बस्तर के घोटुल और विदेशी कैमरों की आँख" के कुछ अंश प्रस्तुत है – "यह सर्वविदित है कि इस दल (बीबीसी) का नेतृत्व एक महिला कर रही थी जो इस क्षेत्र में भाषा व जीवन शैली पर थीसिस लिखने के बहाने वर्षों रही। इस भारतीय महिला ने एक विदेशी से व्याह रचाया और फिर धनोपार्जन के उद्देश्य से बस्तर के मूल निवासियों की मूल संस्कृति से खिलवाड़ करने के लिये विदेशियों को ले आयी।" इसी बात को आगे बढ़ाते हुए रामसिंह ठाकुर जी आगे लिखते हैं - "विदेशियों ने भारत को गुलाम बना कर तब जो लिया सो लिया। क्या अब भारत में योग्य फिल्म युनिट या कैमरामैन नहीं हैं? या अब भी हम अपनी संस्कृति के प्रति अनभिज्ञ रहेंगे?......जैसा कि बताया गया है घोटुल कुटीर के हर क्षेत्र में विद्युत लाईन बिछा कर, मदिरा पिला कर इस फिल्मों को बनाया गया है....यह सब भारतीय होने के नाते हम कैसे बरदाश्त करें; क्या यही शेष रह गया है?"

यह सही है कि घोटुलों का तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज ने अपनी तरह से विश्लेषण किया तथा दुरुपयोग भी। लेकिन इसके बाद भी आदिवासी समाज को कमतर समझने अथवा उन्हे जागरूक न मानने वाले हम कौन होते कौन हैं? आदिवासी समाज ने स्वयं अपनी प्रथाओं को कभी जटिल तो कभी लचीला बनाया है। घोटुल पर बाहरी दबावों से बचने के लिये इसके परम्परागत स्वरूपों को भी बदला गया तथा नीयमों को भी दिशा देने का काम किया गया। रामसिह ठाकुर इस सम्बन्ध में उजागर करते हैं कि "लगभग ढ़ाई सौ वर्ष पूर्व घोटुल व्यवस्था के दूषित (आंग्ल-मराठा/ मुसलमान/अंग्रेज दखल के बाद) हो जाने पर गोत्रकुल (घोटुल) की व्यवस्था छिन्न भिन्न हो गयी थी तब देवी देवता की शरण मान कर पुन: नये विधान से इसे प्रारंभ किया गया। आदिवासी दण्डविधान का सहारा ले कर भविष्य को तथा अपने अस्तित्व को एक सूत्र में बाँध रखने में सफल हुए हैं"। रामसिंह जी ने इस आलेख में कुछ सम्बन्धित परम्पराओं का भी उल्लेख किया है। वे लिखते हैं "आज भी इस समाज में "गाता पखना" गाड़ने का आयोजन होता है। गाता पखना, एक कुल का एक ही गाँव में निर्धारित स्थल पर ही गाडा जाता है; जो कि एक पीढ़ी में एक बार ही सम्पन्न किया जाता है। अर्थात मनुष्य मृत्योपरांत अपने गोत्र कुल का अधिकार बनाये हुए है। गाता पखना गाड़ते समय घोटुल-पाटा गाया जाता है, जिसमे गाने वाले सम्बन्धित वंशावली पाते हैं।...अभी तो विदेशियों ने जो हास्यास्पद रूप तैयार किया है उस स्वरूप प्रदर्शन से वे हमारी हँसी उडायेंगे, तालियाँ बजायेंगे और हम भारतवासी प्रसाशनिक अधिकारियों की चहलकदमी के धोखे में रह कर आने वाली पीढ़ी के लिये शर्मनाक इतिहास छोड़ सकेंगे.....?" रामसिंह जी ने अपने आलेख के अंत में लिखा था कि "उचित तो यही होगा कि बीबीसी द्वारा बनाये गये फिल्म प्रदर्शन पर विश्वस्तरीय रोक लगा दी जाये और फिल्म को भारत ला कर पूर्णत: नष्ट कर दिया जाये।" रामसिंह ठाकुर जी के आलेख के ये अंश मैने घोटुल पर चर्चा के उन हिस्सों पर बात को आगे बढ़ाने के लिये किया है जो कभी चर्चा का हिस्सा नहीं बनते।

यह समझने वाली बात है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी दो दशक तक घोटुल अपने स्वरूप को बचाये हुए थे। यद्यपि घोटुल की प्रासंगिकता पर अस्सी के दशक से ही विस्तार से चर्चा होने लगी थी। वर्ष 1983 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित एक विवरण के अनुसार उसी वर्ष नारायणपुर से लगभग नौ किलो मीटर दूर, बिजली गाँव में बाईस आदिवासी गाँवों के मुखियाओं की एक बैठक में प्रस्ताव लाया गया गया गया था कि घोटुल समाप्त कर दिए जायें। इस प्रस्ताव पर कुल पाँच गाँवों की सहमति प्राप्त हुयी शेष सत्रह गाँवों की ओर से इसका विरोध किया गया। इस प्रस्ताव पर इतनी तीखी प्रतिक्रया हुयी कि इसे पेश करने वाले मांझी रूप सिंह को अपना पद- त्याग करना पड़ा था। यह तो हाल के दिनो में माओवादियों की सख्ती के बाद बहुत बेमन से आदिवासियों द्वारा घोटुलों को बंद किया गया है। प्रश्न यह कि घोटुल को बंद करवाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या घोटुल जैसे सामाजिक संगठनों के रहते माओवादियों को अपने अस्तित्व में खतरा महसूस हो रहा था? घोटुल के स्वरूप में जनजातीय समाज स्वयं परिवर्तन करता रहा है तथा करता रहता किंतु मुखर हो कर और योजना बना कर इस सामाजिक संस्था का ध्वंस किया गया। शायद इसलिये कि अगर ये सामाजिक संगठन जीवित रहते तो आदिवासी समाज के आपस में एकात्रित होने, संगठित रहने, विमर्श करने, विरोध करने जैसे परम्परागत स्थल भी बने रहते। ऐसे में कोई विचारधारा इन्हें बरगला नहीं सकती थी। घोटुल का दुष्प्रचार और उसे यौनाचार स्थल मात्र घोषित करने की प्रवृत्ति के पीछे जिनकी बौद्धिक विलासिता काम कर रही है उसे करीब से समझना आवश्यक है। आज घोटुल नहीं बचे हैं। नक्सलवादियों द्वारा पत्रकारों की हत्या के विरोध में अबूझमाड़ की पदयात्रा पर गये कुछ पत्रकारों के अनुसार माड़ में कुछ घुटुलनुमा संरचनायें बची है जिसे माओवादियों ने अपने दिशानिर्देशों के अनुरूप परिवर्तित किया हुआ है। संक्षेप में जानने की कोशिश करते हैं कि वस्तुत: घोटुल क्या थे?

घोटुल आम तौर पर गाँव के एक छोर पर कभी कभी मध्य में निर्मित हुआ करता है। घोटुल की संरचना में तीन मुख्य भाग होते हैं। पहला आँगन का भाग जिसके बीचोबीच लकड़ी का खंबा गड़ा होता है और समूची जगह नाचने गाने के लिये खुली हुई। दूसरा ‘परछी’ वाला हिस्सा जहाँ अलाव जलाया जाता है, आम तौर पर यहीं समूहों में बैठ कर ‘प्रेमी युवक – चेलक’ और ‘युवती प्रेमिकायें – मोटियारियाँ’ आपस में परिचित होते हैं; किस्से कहानियाँ गढ़ते, कहते और सुनते हैं; या सुख दुख बाटते हैं। घोटुल की ‘परछी’ और ‘कमरों’ की दीवारें - लकड़ी, बाँस के खूँटे और बाड़ी नुमा ढ़ाँचे को बना कर, फिर उनमें मिट्टी छाप कर तैयार की जाती हैं। इस तरह बनी दीवारों को चूने या ‘छुई-मिट्टी’ से लीप दिया जाता है। छत लकड़ी की मजबूत बीम पर टिका हुआ और खपरेल, घास फूस या सागवान के पत्तों से ढ़का होता है। इसी छत पर घोटुल के सदस्य अपने हथियार, फरसा, टंगिया, हँसिया, खंता, कुल्हाड़ी, सब्बल, टोकनी, सूपा, टुकना....और भी चीजें रखते हैं। घोटुल गाँव की सम्पत्ति होता है - गाँव की परिधि से बाहर बना सामाजिक-सांस्कृतिक केन्द्र।

घोटुल में आपसी संवाद, किस्से कहानियों, विमर्श, नृत्य-गीत आदि का सिलसिला चलता है जब तक कि चाँद और "सात तारे या कि ग्वालझुमका" सिर पर नहीं आ जाते। जब यह सभा विसर्जित होती है तो कम आयु के चेलिक और मोटियारियाँ अलग अलग हो कर परछी में ही, अथवा बड़े से हॉल नुमा कमरे में, जो कि घोटुल का ही तीसरा हिस्सा होता है, वहाँ जा कर सो जाते हैं।....और फिर यह भी होता है कि एक दूसरे के हो चुके चेलक और मोटियारियाँ आधी रात के बाद अपनी अपनी गीकी में बँध जाते हैं। गीकी वह चटाई होती है, जो खजूर या ताड़ी के पत्ते से गूंथ कर घोटुल की मुटियारी, बड़े ही जतन से अपने चेलक के लिये बनाती है। बड़े कमरे के एक हिस्से में केवल वे चेलिक और मोटियारियाँ ही साथ साथ सोते हैं जिनका प्रेम, बंधनों की परिभाषा से आजाद हो गया हो। यहाँ उन्हें एक होने की स्वाधीनता है।

इस एक होने की स्वतंत्रता को किसी समझदार आदमी ने अराजकता कहा तो किसी ने यौन विकृति। क्लबों और सोनागाछियों को ढ़ोने वाले कथित सभ्य समाज से इससे बेहतर टिप्पणी की उम्मीद किसे है? घोटुल एक सामाजिक संस्था है, जिसमें समुचित कार्य विभाजन है। झरिया, घोटुल की सफाई करता है, लकड़ियाँ इकठ्ठी करता है, रात होने पर आग जलाता है। मुसवान घोटुल की साज-सज्जा का कार्य सम्पन्न करते हैं जिसमें दीवालों की लिपाई-पुताई, भित्तिचित्र आदि रचना सम्मिलित है। उनके कार्य में रानियाँ हाथ बटाती हैं। रानी वस्तुत: घोटुल में लड़कियों को दिया जाने वाला एक पद है और इसके साथ निर्वहित किये जाने वाला दायित्व है घोटुल के भित्तिचित्र बनाना, दोने तैयार करना आदि। चालकी घोटुल सदस्यों को तम्बाकू बाँटता है तो बैद उपचार करने, प्रेत बाधा आदि दूर करने के लिये नियत होता है। घोटुल एक व्यवस्था के तहत कार्य करता है अत: कई पद भी निर्धारित किये गये हैं और उन्हें संचालन से ले कर दण्डित करने तक की जिम्मेदारी भी सौंपी गयी है। पदनाम भी राज-वयवस्था से बहुत हद तक प्रभावित हैं जैसे दीवान, जिसका कार्य सदस्यों की निगरानी करना और उन्हें दण्डित करना है; कोटवार, जिसका कार्य घोटुल में सदस्यों की उपस्थिति और अनुपस्थिति को जाँचना है। लगभग आठ वर्ष की आयु के पश्चात विवाह होने तक सभी लड़के-लड़कियों को घोटुल आना अनिवार्य होता है, अनुपस्थित रहने पर वे दण्ड के भागी होते हैं। अस्वस्थ सदस्य अथवा मासिक धर्म के समय ही युवतियों को घोटुल न आने की छूट होती है; सिपाही, जिनका कार्य गश्त लगाना, सुरक्षा प्रदान करना आदि है। घोटुल तो सारगुतियों की चुहल से ही आबाद होता है। सारगुतियाँ वस्तुत: सहेलीयों के लिये प्रयुक्त होने वाला शब्द है जो सम्बोधन घोटुल मे आने वाली हर लड़की के लिये नियत किया गया है। अंत में बात चेलक और मोटियारियों की जो क्रमश: प्रेमी-प्रेमिका के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले शब्द हैं, ये घोटुल संस्था की आत्मा हैं।
घोटुल क्यों नष्ट हुए यह तो चर्चा के केन्द्र में है ही लेकिन इसे समझने के लिये यह जानना भी आवश्यक है कि घोटुल आखिर क्यों और कैसे बने। एक मान्यता कहती है कि घोटुलों के निर्माण का कारण राजनैतिक भी है और यह ग्रामीण सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। किसी संभावित खतरे से निबटने के लिये गाँव की युवा शक्ति एक ही स्थान पर एकत्रित रहा करती थी। गेन्द सिंह से ले कर गुण्डाधुर तक सभी आदिवासी नेताओं ने युवा शक्ति को घोटुलों में संपर्क कर ही संग्रहीत किया था और क्रांति संभव हुई थी। इसके सामाजिक कारणों में यह कि माता-पिता का अपने बच्चों के साथ शयन करना उचित नहीं माना जाता और इसीलिये सयाने होते ही उन्हें जीवन की स्वाभाविक दीक्षा के लिये घोटुल अनिवार्य रूप से भेज दिया जाता है। घोटुल निर्माण का धार्मिक कारण आदिवासियों के सर्वमान्य देवता लिंगो पेन से जुडा हुआ है। लिंगो की कहानी पर इस पुस्तक में चर्चा की गयी है। चूंकि घोटुल लिंगो से जुड़े हुए स्थान हैं अत: माना जाता है कि यहाँ आने वाले सदस्यों पर काला जादू असर नहीं करता, प्रेत बाधा उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाती। घोटुल में पूजे जाने वाले अन्य देवी देवता हैं करेदंगल, नारायनदेव, वनदेव, बूढ़ादेव, ईराडदेव, मर्कादेव, दंतेश्वरी देवी, कोरी देवी आदि। बस्तर राज्य में काकतीय/चालुक्य वंश के संस्थापक अन्नमदेव की भी पूजा कतिपय घोटुलों में की जाती है। 

घोटुल प्रत्येक सदस्य का आजीवन साथ रहने वाला अनुभव होता है। यहाँ आने वाले प्रत्येक सदस्य को नया नाम दिया जाता है। सदस्य इस नाम का प्रयोग घोटुल मे एक दूसरे को सम्बोधित करने के लिये करते हैं किंतु इसकी गोपनीयता को वे बनाये भी रखते हैं। यदि किसी युवक-युवती को उसका सदस्य नाम नहीं दिया गया है तो यह समझा जाना चाहिये कि वह पूर्णकालिक सदस्य नहीं है। घोटुल में लड़कों के लिये नाम लाहर सिंह, मलयार सिंह, कलिंगसाय, सुलुक साय आदि तथा लड़कियों के लिये बोलोसा, दुलोसा, लाहरी, सुलयारो, मलयारो, सायको आदि रखे जाते थे।

यह गलतफहमी है या घोटुलों को बदनाम करने की नियोजित साजिश कहा नहीं जा सकता कि इसे अपने कामसूत्र पर देश-विदेश में इठलाने वाले देश ने यौन संस्था भर कह कर उसकी पहचान पर यही ठप्पा लगा दिया है। इस बात से आँख मूंद ली गयी है कि यह एक दौर में व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था भी हुआ करती थी। स्वच्छता, शिकार, पूर्वजों का सम्मान, परम्पराओं की जानकारियाँ, अनुशासन, मनोरंजन सभी कुछ यहाँ प्रसारित होता था। घोटुल सदस्य कितने सामाजिक दायित्वों से बंधे होते है यह जानने के लिये किसी बुजुर्ग आदिवासी के साथ बैठ कर चर्चा कीजिये तब वह बतायेगा कि किस तरह गाँव में होने वाली छठी, शादी व्याह, मृत्यु अथवा मेले-मड़ई आदि में कार्यों, आयोजनो, सफाई, भोजन व्यवस्था, नृत्य आदि का दायित्व घोटुल सदस्यों को ही उठाना पड़ता था। इतना ही नहीं सदस्य किसानों को निंदाई-गुड़ाई में भी सहयोग देते थे जिसके एवज में उन्हें भाता दिया जाता था। भाता ले कर घोटुल सदस्य मिल कर किसी भी किसान के यहाँ वर्ष में एक दिन सहयोग-श्रमदान किया करते थे। यदि कोई गरीब किसान है तो सदस्य बिना भाता लिये श्रमदान किया करते थे। घोटुल के साज संवार के लिये लगने वाले धन को भी सदस्य मजदूरी कर के अर्जित करते थे। सदस्यों द्वारा अर्जित मजदूरी को गाँव के ही किसी सम्मानित व्यक्ति के पास सुरक्षित रखा जाता था और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग भी किया जाता था।

यह भी सोचने वाली बात है कि आज आदिवासी कला और नृत्य संगीत जिस तेजी से नष्ट हो रहा है वह कदाचित नहीं होता अगर घोटुल साँस ले रहे होते। कितने ही अद्भुत गीत हैं जो घोटुलों के समाप्त होते ही मायना हीन हो गये, कितने ही अद्भुत रिवाज हैं जो अब कभी नहीं निभाये जायेंगे। सींग माड़िया नृत्य (गौर सींग लगा कर मांदर की थाप और तिरहुड्डियों की छनक के साथ किया जाने वाला नृत्य), गौर नृत्य (गौर सींग बंधे नर्तक गोलाकार नृत्य करते हैं), हुलकी नृत्य (लड़के और लड़कियाँ अलग अलग दल बना कर नृत्य करते हैं। जब लड़कियाँ आगे की ओर झुकती हैं तो लड़के पीछे की ओर इस तरह कमल की पंखुड़िया खोलने जैसा दृश्य बनता है), गेड़ी नृत्य (लकड़ी या बाँस के दो डंडों पर चढ़ कर किया जाने वाला नृत्य), करमा नृत्य (करमा कहानी की याद में करमा वृक्ष की टहनी शरीर पर बाँध कर उस पेड़ के आसपास गोलाकार में नृत्य), रेवा नृत्य (यह उछल-कूद भरा आकर्षक नृत्य होता है), सेला नृत्य (छोटे छोटे डंडो की ताल पर यह नृत्य होता है जिसमें लड़के छेर छेरा और लड़कियाँ कोयल की आवाज निकालती हैं), रीना नृत्य (यह एक धीमा नृत्य है जो सेला की तरह ही होता है), गिरदा नृत्य (जब घोटुल के चेलक किसी अन्य गाँव में नृत्य करते हैं), सुआ नृत्य (घोटुल की मोटियारियाँ आस पास के गाँवों में जा कर नृत्य करती हैं) आदि सब अब विलुप्त होने लगे हैं। भित्ति चित्र कला को अब किसी तरह कलाकार बचाये हुए हैं अन्यथा किसी समय घोटुल की दीवारों पर बिछू, टोकनी, आदमी, औरत, हाथ के छापे, टोकनी, तूम्बा, देवता, पक्षी, घोड़ा, हाथी आदि सुन्दरता से अंकित किये जाते थे। घोटुल में सुनाई जाने वाली कहानियों को कोई सुने तो स्वयं महसूस करेगा कि कितने सजीव माध्यम से समाज अपने युवको को शिक्षा प्रदान किया करता था।

किसी सदस्य का विवाह होते ही घोटुल से उसकी सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाया करती थी। विवाह में सभी घोटुल सदस्य बढ़ चढ़ कर हिस्सा तो लेते ही थे, यह उनके लिये बहुत भावुक क्षण भी होता था। विवाह के पश्चात नव दम्पत्ति को घोटुल स्वयं समारोह पूर्वक विदायी देता था। उनसे गेवड़े अर्थात गाँव की सीमा की पूजा करवायी जाती थी। आँटे की लकीर खींच कर चौंक बनाया जाता था जिस पर लोहे के छल्ले रख दिये जाते थे। नवदम्पत्ति को एक दूसरे की कमर में हाँथ ड़ाल कर बिना पीछे देखे छल्ले को पार करने के लिये कहा जाता था। इसके साथ ही सारी रस्मे सम्पन्न हो जाया करती थीं। बिदाई के बाद गम से भरे घोटुल में कोई और कार्यक्रम नहीं होता था। घोटुल का बंद होना नितांत दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस तरह कथित सभ्य समाज ने इस महान परम्परा को मटियामेट होते न केवल देखा बल्कि उसमे सहयोग भी किया, इसके लिये आने वाला समय उन्हें अपराधी ही निरूपित करेगा। 
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(मेरी पुस्तक - बस्तरनामा से अंश)

Monday, December 01, 2014

असहमतियों के बीच साहित्य


कला अस्त नहीं होती, कभी मर नहीं सकते जयदेव बघेल!!





राजतंत्र के पहिये दरक गये थे। लोकतंत्र को यह दीख नहीं पड़ता था कि बस्तर की पहचान उसके आदिवासी हैं। उन दिनों पूर्वी-पाकिस्तान से भारत की ओर विस्थापन और पलायन के लम्बे दौर जारी थे। किसी ने किसी से भी नहीं पूछा कि हजारो-लाखो की संख्या मे आ रहे विस्थापितों को कहाँ बसाया जाना है। यह मान लिया गया कि आदिवासी तो अस्तितिवहीन आबादी होते हैं, उनकी भूमि में जगह जगह तम्बू तान दिये गये। तय कर लिया गया कि यहाँ एक नयी बसाहट, नयी सभ्यता, नयी कश्मकश और नये बदलाव की आधारशिला रखी जानी है। दिल्ली और कोलकाता मे बैठे कुछ लोग अचानक बस्तर भाग्यविधाता हो गये। एक परियोजना गढ़ी गयी जिसे दण्डकारण्य प्रोजेक्ट नाम दिया गया। इस परियोजना का मूल काम बंगाली विस्थापितों को बस्तर मे बसाना और उनके लिये जीवनयापन के तौर तरीके विकसित करना था। दण्डकारण्य परियोजना मे बस्तर और उसका आदिवासी कहीं भी नहीं था। हर घटना का प्रतिफल और परिणाम जो भी हों इतिहास उसे कालांतर मे मूल्यांकित करता है, किंतु उसके द्वितीयक परिणाम भी होते है। दण्डकारण्य परियोजना संभवत: बस्तर की घडवा कला और उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुँचने के दौर में अनायास ही एक कड़ी सिद्ध हुई। 

उत्तर बस्तर के कोण्डागाँव मे दण्डकारण्य परियोजना का कार्यालय खुला था। परियोजना के अंतर्गत बस्तर की उपलब्ध लोककलाओं के द्वारा आजीविका के अवसर निर्मित करने के प्रयासों की शुरुआत हुई। इस क्रम मे स्थानीय कलाकार सिमरन बघेल को घडवा शिल्पकार और कला प्रशिक्षक के रूप मे चुना गया। श्रीमति सरोजनी नायडू वर्ष 1962 में दण्डकारण्य परियोजना के तहत एक कार्यक्रम का उद्घाटन करने बस्तर आयी थीं तो उन्होंने सिमरन बघेल का सम्मान भी किया था। घडवा कला को पहचान दिलाने का सूत्रपात करने वाले सिमरन बघेल वस्तुत: उस वृक्ष के बीज अर्थात पिता हैं जो बाद में इस कला का सबसे बडा नाम बना और जिसे आज हम जयदेव बघेल के रूप मे जानते हैं।

पिता ही जिस बालक का गुरु हो उसके भीतर की कलात्मकता को आकार विस्तार लेना ही था। तथापि सिमरन बघेल की समानांतर पीढी से सुखचंद बघेल भी उन दिनों घडवा कला मे इतिहास रच रहे थे, वे जयदेव बघेल के रिश्तेदार अर्थात उनके मामा थे। सुखचंद बघेल को वर्ष 1970 में जब राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया उन दिनो जयदेव बघेल की उम्र केवल सत्रह-अठारह वर्ष रही होगी। जयदेव तब दण्डकारण्य परियोजना के अंतर्गत कोण्डागाँव कार्यालय मे ही चौकीदार के पद पर कार्य कर रहे थे। मामा के साथ दिल्ली पहुँचने पर जयदेव की अनेक महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात हुई जो कला की कद्र करते थे अथवा कलकारों के कार्यों की प्रदर्शनियों के प्रायोजक थे। सबसे प्रमुख नाम तो जसलीन धमीजा का ही था जिनके बंगले में ये मामा-भांजा ठहरे हुए थे। इसके अतिरिक्त वहाँ सुमन बेनेगल से उनकी मुलाकात हुई जो हैंडीक्राफ्ट हैंडलूम एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन की जनरल मेनेजर थी। इन दोनो ही महिलाओं ने जिस तरह घडवा कलाकृतियों की बारीकियों को परखा उसे जयदेव ध्यान से देख-समझ रहे थे। महिलाओं ने इन कलाकृतियों को खरीदा और उस दौर में तीन सौ रुपये का लाभ कलाकारों को प्राप्त हुआ। जयदेव बघेल की आँखें खुल गयीं। चौकीदार की नौकरी में महीने भर की पगार मिलती थी कुल पचहत्तर रुपये; इन कलाकृतियों से कई गुना अधिक राशि मिलती साथ ही समाज में सम्मान भी हासिल हो सकता था। घडवा कला उनका परम्परागत  कार्य था अत: जयदेव बघेल भी अपने पिता और मामा की राह पर निकल गये, उन्होंने अपनी नौकरी छोड दी। 

कहना होगा कि जयदेव बघेल की कला यात्रा असाधारण रही है। इसे समझने के लिये पहले घडवा अथवा ढोकरा अथवा बेलमेटल कला को जानना भी आवश्यक है। मिट्टी, मोम और धातु की सम्मिलित है यह कला साधना, जिसमे आकृति तो धातु की बनती है लेकिन कलाकार उसे मोम में साधता है और मिट्टी जीवन फूंकें जाने तक उसे अपने सांचे में धारण करती है। बस्तर में मुख्य रूप से से घसिया जनजाति ने घडवा कला को साधा और शिखर तक पहुँचाया। घसिया के रूप में इस जनजाति को पहचान रियासतकाल में उनके कार्य को ले कर हुई चूंकि ये लोग उन दिनो घोडों के लिये घास काटने का कार्य किया करते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि घडवा कला को किसी काल विशेष से जोड कर नहीं देखा जा सकता चूंकि मोहनजोदाडो में ईसा से तीन हजार साल पहले प्राप्त एक नृत्य करती लडकी की प्रतिमा लगभग उसी तकनीक पर आधारित है जिसपर बस्तर का घडवा शिल्प आज कार्य कर रहा है। 

अपने एक आलेख में जयदेव बघेल ने लिखा है कि बस्तर में इस कला के प्रारंभ के लिये जो मिथक कथा है उसका सम्बन्ध आदिमानव और उसकी जिज्ञासाओं से है। यदि उनके द्वारा प्रदत्त विवरणों को अपने शब्दों में प्रस्तुत करूं तो यह बात तब की है जब आदिमानव जंगल में विचरण करता था और शिकार पर आश्रित अपना जीवन निर्वहन किया करता था। इन्ही में से एक आदिमानव की यह कहानी है जो अपने माता-पिता से बिछड कर किसी गुफा में रह रहा था। एक दिन उसने पहाड पर आग लगी देखी। आग से निकलने वाले रंग तथा चिंगारिया उसे भिन्न प्रतीत हुईं और वह जिज्ञासा वश उस दावानल के निकट चला गया। अब तक आग स्थिर होने लगी थी। वहीं निकट ही उसे एक ठोस आकृति दिखाई पडी जो किसी धातु के पिघल कर प्रकृति प्रदत्त किसी गह्वर अथवा सांचे में प्रवेश कर जम जाने के पश्चात निर्मित हुई होगी। यह आकृति उसे अलग सी और आकर्षित करने वाली लगी और उसे उठा कर आदिमानव अपने घर ले आया। उसने इस प्रतिमा के लिये घर का एक हिस्सा साफ किया और इसे सजा कर रखा। इस प्रतिमा के लिये उसका आकर्षण इतना अधिक था कि नित्य ही वह इसे साफ करता और धीरे धीरे इससे प्रतिमा में चमक आने लगी। कहते हैं इसी चमक से प्रभावित हो कर वह स्वयं को भी चमकाने लगा अर्थात नित्य स्नानादि कर श्रंगार पूर्वक रहने लगा। यह धातु और वह मानव जैसे एक दूसरे के पूरक हो गये थे और समय के साथ दोनो में ही वैशिष्ठता की दमक उभरने लगी थी जिसे ग्रामीणों ने महसूस किया। जब कारण पूछा गया तो इस आदिमानव ने ग्रामीणों को वह जगह दिखाई जहाँ से उसे धातु का यह प्रकृति द्वारा गढा गया टुकडा प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर सभी ने पाया कि एक दीमक का टीला है जिसमे कि धातु-द्रव्य प्रवेश कर गया था और उसने वही आकार ले लिया था। उसी स्थल पर मधुमक्खी का छत्ता भी पाया गया जिससे मोम, सांचा और धातु को कलात्मकता देने का आरंभिक ज्ञान उन ग्रामीणों को हुआ होगा। उस आदि-कलाकार ने तब ग्रामीणों से कहा कि मैने इस धातु के टुकडे को अपनी माँ माना है और इसी तरह इससे प्रेम किया है। तुम भी इस कला और अपने निर्माण को माँ की तरह ही मानो। कहते हैं कि उस आदिकलाकार ने सबसे पहले अपनी माँ की आकृति बनाने का यत्न किया और धीरे धीरे वह अपने निकटस्थ परिवेश की वस्तुओं और पशु-पक्षियों को भी इस कला के माध्यम से मूर्त रूप देने लगा। 

जयदेव बघेल के अनुसार उस आदिनामव ने इस तरह पहले बाघ, भालू, हिरण, कुत्ता, खरगोश, नाग कछुवा, मछली, पक्षी, गाय, बकरा, बंदर आदि बनाये। धीरे धीरे उसने अपनी माँ के रूप में डोकरी माँ की कलाक़ृति बनाई और कालांतर में डोकरा बाबा के रूप में वह पिता के स्वरूप को गढने लगा। इसी तरह विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ घडवा कला के रूप में परिवर्तित होती रहीं। कर्मकोलातादो, मूलकोलातादो, भैरमदेव, भीमादेव, राजारावदेव, दंतेश्वरीदेवी, माता देवी, परदेसीन माता, हिंग्लाजिन देवी, कंकालिन माता आदि की मूर्तियाँ इस कला के विकास के विभिन्न चरणों में निर्मित की जाने लगी। लाला जगदलपुरी भी अपनी पुस्तक बस्तर इतिहास एवं संस्कृति में उल्लेखित करते हैं कि बस्तर के घड़वा कला कर्मी पहले कुँडरी, कसाँडी, समई, चिमनी और पैंदिया तैयार करते थे। अब ये लोग देवी देवता, स्त्री पुरुष, हरिण, हाथी, अकुम आदि बनाते आ रहे हैं। 

घडवा कला निर्माण प्रकृया में कई प्रकार की मिट्टी लगती है जिसमे दीमक की बाबी की मिट्टी की प्रमुख भूमिका होती है। जयदेव बघेल अपने आलेखों में इस बात को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि मिट्टी के कई प्रकार इस आकृति निर्माण प्रकृया में लगते हैं जिसमे दीमक (डेंगुर) की बाबी की मिट्टी के अलावा काली मिट्टी, नदीतट की मिट्टी, रुई-मिट्टी आदि का उपयोग विभिन्न प्रक्रियाओं में किया जाता है। साथ ही साथ सहायक तत्व के रूप में धान का भूसा तथा रेतीली मिट्टी का भी प्रयोग होता है। मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया के पहले चरण में धान के भूसे को काली मिट्टी के साथ मिला कर अच्छी तरह गूथ लिया जाता है और फिर इससे ही सांचा तैयार किया जाता है। अब सांचे की आकृति को धूप में अथवा आग में तपा कर ठोस कर लिया जाता है। इस सांचे पर गीली मिट्टी की दूसरी परत चढाई जाती है। इस बार मिट्टी के सूखते ही इस सांचे के स्वरूप की घिसाई खपरे अथवा हंडी (मटके) के टुकडे से की जाती है और इसे चिकना बनाया जाता है। अगली प्रक्रिया है उन पौधों की पत्तियों से इस आकृति को घिसना जिनको पीसने पर हरा रंग अधिक मात्रा में निकलता हो। सेम वृक्ष की पत्तियों का विशेषरूप से इस हेतु प्रयोग किया जाता है। इस प्रकृया के पश्चात तैयार ढांचे को पहले सुखा लिया जाता है जिसके पश्चात इस आकृति के उपर कलाकार की कल्पना अपना कार्य आरंभ करती है। मोम की सहायता से इस आकृति के उपर विभिन्न प्रकार की कलात्मक बारीकियों को उभारा जाता है। वस्तुत: इस पूरी प्रकृया के प्राण इसी समय भरे जाते हैं जब मोम के माध्यम से बहुत बारीक बारीक आकृतियाँ और स्वरूप उकेरे जाते हैं, विभिन्न प्रकार की पच्चीकारी की जाती है। इस मिट्टी के स्वरूप का मोम से श्रंगार पूर्ण होते ही छानी हुई खडिया मिट्टी में कोयले के महीन छाने हुए पावडर या गोबर को मिला कर आकृति के उपर हलके हाथो से एक लेप चढाया जाता है। इस लेपन की परत के सूख जाने पर पुन: दीमक की बावी की मिट्टी तथा धान के भूसे को मिला कर एक और लेप कर दिया जाता है। इसी लेपन के दौरान आकृति के सिरे पर धातु (पीतल अथवा कासा) से ढलाई करने के लिये एक छेद छोडा जाता है। अब इस पूरी आकृति को आग में पुन: पकाया जाता है। गर्मी पाते ही सांचे पर लगाया गया मोम उतने ही क्षेत्र में एक रिक्ति अथवा खोखलापन बनाता हुआ वाष्पित हो जाता है। अब पहले से ही छोडे गये छिद्र के माध्यम से पिघली हुई धातु का प्रवेश कराया जाता है। यह धातु उन सभी रिक्त स्थानो में जा कर बैठ जाती है जो कि मोम के पिघल जाने से निर्मित हुई हैं। अर्थात जिस कलात्मकता का निर्माण मोम के माध्यम से कलाकार ने किया वही अब धातु की बन कर तैयार हो जाती है। अब इसे ठोस होने के लिये छोड दिया जाता है। बाद में धीरे धीरे मिट्टी को तोड कर अलग कर लिया जाता है और धातु की कलात्मक प्रतिमा अपना आकार ले लेती है। अद्भुत है यह कला...और अद्भुत है कास्य युग को निहारना, इतिहास को पक कर आकार लेते देखना। 

जयदेव बघेल ने इस साधना को जब अपना व्यवसाय बनाना चाहा तब उन्होंने अपने पिता की एक शिष्या मीरा मुखर्जी से मिलना सुनिश्चित किया। मीरा मुखर्जी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कलाकार थी तथा उन्होंने घडवा कला में कोण्डागाँव मे रह कर प्रशिक्षण प्राप्त किया था। मीरा मुखर्जी के सहयोग से जयदेव बघेल ने पहलेपहल कोलकाता के एक डिजाईन सेंटर मे अपनी कला की प्रदर्शनी लगायी गयी। यह तो बस आरम्भ था जिसके पश्चात से उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान भी मिलने लगी। वर्ष 1976 में उन्हें मध्यप्रदेश राज्य से सम्मान प्राप्त हुआ, इसके अगले वर्ष अर्थात वर्ष 1977 में उन्हें इस कला की साधना के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था। वर्ष 1978 मे जयदेव बघेल के अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी मास्को मे आयोजित की जहाँ उनकी भूरी भूरी प्रसंशा की गयी तथा व्यवसाय की दृष्टि से भी अंतर्राष्ट्रीय मंच प्राप्त हुआ। इसके पश्चात तो जयदेव बघेल ग्लोबल हो गये एवं उन्होंने स्कॉटलैण्ड, इटली, जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, हॉगकॉग, सिंगापुर, बैंकाक आदि में घडवा शिल्प की अनेक सफल प्रदर्शनियाँ लगायीं। इन कार्यों का ही प्रतिफल था कि वर्ष 1982 में उन्हें प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के हाथो शिखर सम्मान प्राप्त हुआ। इसी वर्ष लंदन में आयोजित हुए भारत उत्सव में उन्हे सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ। जयदेव बघेल बहुधा याद करते थे कि उस समय आयोजित प्रदर्शनी मे प्रसिद्ध मूर्तिकार हेनरी मर भी आये हुए थे। उन्होंने न केवल जयदेव बघेल को लंच पर आमंत्रित किया अपितु उनके कार्यो की सराहना भी की। मूर्तिकार हेनरी मर विशालकाय धातु प्रतिमायें बनाते थे। उनकी एक राजा-रानी की प्रतिमा जयदेव बघेल को प्रदर्शनी मे देखने को मिली जो बिलकुल बस्तर शैली की थी। 

हर कलाकार की यह हार्दिक इच्छा होती है कि वह मुम्बई के जहाँगीर आर्ट गैलरी मे अपंजे कार्यों की एकल प्रदर्शनी लगा सके। 22-28 जुलाई 1996 तक उन्होंने अपने इस सपने को सच किया और बस्तर को गौरव प्रदान किया। जयदेव बघेल लगातार काम करते रहे और लगभग पाँच दशक तक वे बस्तर की ढोकरा कला का एकमेव चेहरा बने रहे। वे निरंतर प्रदर्शनियाँ आयोजित करते रहे, नयी पीढी के लिये प्रशिक्षण शिविर लगाते रहे और देश विदेश के नियमित अंतराल पर दौरे भी करते रहे। उन्हें देश विदेश से अनेक पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त हुए साथ ही साथ पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से उन्हें मानद डी.लिट की उपाधि प्राप्त हुई थी। कला का यह सिपाही धीरे धीरे व्याधियों और समय के हाथों बाध्य हो गया। मधुमेह की बीमारी के कारन उनका एक पैर भी काटना पडा था। इन दिनो भी वे लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे तथा डायलिसिस पर थे। 9 नवम्बर 2014 की सुबह 4.00 बजे घड़वा शिल्प के इस महान कलाकार ने रायपुर के रामकृष्ण केयर अस्पताल में अन्तिम साँसें लीं।

कुछ लोग कभी भुलाये नहीं जा सकते, कुछ कार्य कभी नहीं मिटते। पिछले दिनों मुम्बई के ताज होटल में हुए आतंकवादी हमले के बावजूद वहाँ जो बचा रहा उसमे से एक जयदेव बघेल की निर्मित कलाकृति भी थी। आज आतंकवाद से त्रस्त बस्तर में अस्त व्यस्त होते समाज को जब अपनी  पहचान की पुन: आवश्यकता होगी तो यकीनन उसे जयदेव बघेल की मूर्तियाँ मौजूद मिलेंगी। कला कभी कोई युग अस्त नहीं होने देती, और कलाकार कभी मरते नहीं। जयदेव बघेल को विनम्र श्रद्धांजलि। 

-राजीव रंजन प्रसाद
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