Tuesday, March 26, 2013

प्रवीरचन्द्र भंजदेव – बस्तर के आदिवासियो का शापित नायक



आज 23 मार्च को प्रवीर की सैंतालीसवी पुण्यतिथि है। इसी अवसर पर एक आलेख उनके जीवन संघर्ष पर केन्द्रित - 

रियासत काल के अंतिम शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव आधुनिक बस्तर को दिशा प्रदान करने वाले पहले युगपुरुषों में से एक हैं। महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी तथा प्रफुल्ल चन्द्र भंजदेव की द्वितीय संतान प्रवीरचन्द्र भंजदेव का जन्म शिलांग में 12.6.1929 को हुआ था। उनकी माता तथा बस्तर की महिला शासिका महारानी प्रफुलकुमारी देवी के असमय और रहस्यमय निधन के पश्चात लंदन में ही ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधियों ने अंत्येष्टि से पहले उनके छ: वर्षीय ज्येष्ठ पुत्र प्रवीरचन्द्र भंजदेव (19361947 ई.) का औपचारिक राजतिलक कर दिया। प्रवीर अट्ठारह वर्ष के हुए और जुलाई 1947 में उन्हें पूर्ण राज्याधिकार दे दिये गये। 15.12.1947 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में छत्तीसगढ़ की सभी चौदह रियासतों के शासकों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने के आग्रह के साथ आमंत्रित किया। महाराजा प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने अपनी रियासत के विलयन की स्वीकृति देते हुए स्टेटमेंट ऑफ सबसेशन पर हस्ताक्षर कर दिये। बस्तर रियासत को इसके साथ ही भारतीय संघ का हिस्सा बनाये जाने की स्वीकृति हो गयी। 15.08.1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तथा 1.01.1948 को बस्तर रियासत का भारतीय संघ में औपचारिक विलय हो गया। 9.01.1948 को यह क्षेत्र मध्यप्रांत में मिला लिया गया।

यह स्वाभाविक था कि सत्ता छिन जाने तथा महाराजा से प्रजा हो जाने की पीडा उनकी वृत्तियों से झांकती रही तथा इसकी खीझ वे एश्वर्य प्रदर्शनों, लोगों में पैसे बाटने जैसे कार्यों से निकालते भी रहे। तथापि उम्र के साथ आती परिपक्वता तथा राजनीति के थपेडों नें उन्हें एक संघर्षशील इंसान भी बनाया तथा धीरे धीरे वे अंचल में आदिम समाज के वास्तविक स्वर और प्रतिनिधि बन कर भी उभरे। उनके जनसंघर्षों की यदि बानगी देखी जाये तो यह समय शुरु होता है जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी थी। प्रवीर नें 1955 में “बस्तर जिला आदिवासी किसान मजदूर सेवा संघ” की स्थापना की थी। 1957 में प्रवीर बस्तर जिला काँग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए; आमचुनाव के बाद भारी मतो से विजयी हो कर विधानसभा भी पहुँचे। 1959 को प्रवीर ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। मालिक मकबूजा की लूट आधुनिक बस्तर में हुए सबसे बडे भ्रष्टाचारों में से एक है जिसकी बारीकियों को सबसे पहले उजागर तथा उसका विरोध भी प्रवीर ने ही किया था। 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों के आरोप में प्रवीर धनपूँजी गाँव में गिरफ्तार कर लिये गये। इसके तुरंत बाद फरवरी-1961 में “प्रिवेंटिव डिटेंशन एक्ट” के तहत प्रवीर को गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से 12.02.1961 को प्रवीर के बस्तर के भूतपूर्व शासक होने की मान्यता समाप्त कर दी गयी इसके साथ ही प्रवीर के छोटे भाई विजयचन्द्र भंजदेव को भूतपूर्व शासक होने के अधिकर दिये गये। इसके विरोध में लौहण्डीगुडा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा व्यापक प्रदर्शन किया गया था। जिला प्रशासन की जिद और प्रवीर पर हो रही ज्यादतियों का परिणाम 31.03.1961 का लौहंडीगुड़ा गोली काण्ड़ था, जहाँ बीस हजार की संख्या में उपस्थित विरोध कर रहे आदिवासियों पर निर्ममता से गोली चलाई गयी थी। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; ये कुछ नाम हैं जो लौहण्डीगुड़ा गोलीकाण्ड के शिकार बने।

फरवरी 1962 को कांकेर तथा बीजापुर को छोड पर सम्पूर्ण बस्तर में महाराजा पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे तथा यह तत्कालीन सरकार को प्रवीर का लोकतांत्रिक उत्तर था। 30 जुलाई 1963 को प्रवीर की सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स से मुक्त कर दी गयी। प्रवीर पर बहुधा बस्तर को नागालैंड बनाने तथा हिंसक प्रवृत्तियों को भडकाने के आरोप लगते रहे हैं तथापि गंभीर विवेचना करने पर ज्ञात होता है कि उनके अधिकतम आन्दोलन शांतिप्रिय तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परिधि में ही थे। 1964 ई. में प्रवीर ने पीपुल्स वेल्फेयर एसोशियेशन की स्थापना की। 12 जनवरी 1965 को प्रवीर ने बस्तर की समस्याओं को ले कर दिल्ली के शांतिवन में अनशन किया था। गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा द्वारा समस्याओं का निराकरण करने के आश्वासन के बाद ही प्रवीर ने अपना अनशन तोडा था। 6 नवम्बर 1965 को आदिवासी महिलाओं द्वारा कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया गया जहाँ उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके विरोध में प्रवीर, विजय भवन में धरने पर बैठ गये। 16 दिसम्बर 1965 को आयुक्त वीरभद्र ने जब उनकी माँगों को माने जाने का आश्वासन दिया तब जा कर यह अनशन टूट सका। 8 फरवरी 1966 को पुन: जबरन लेव्ही वसूलने की समस्या को ले कर प्रवीर द्वारा विजय भवन में अनशन किया गया। 12 मार्च 1966 को नारायणपुर इलाके में भुखमरी और इलाज की कमी को ले कर प्रवीर द्वारा पुन: अनशन किया गया। प्रवीर के आन्दोलन व्यवस्था के लिये प्रश्नचिन्ह बने हुए थे जिनका दमन करने के लिये आदिवासी और भूतपूर्व राजा के बीच के बंध को तोडना आवश्यक था।

इस बीच एक बडी घटना घट गयी। तारीख 18.03.66, शाम के साढे तीन बजे थे। चैत पूजा के लिये लकड़ी का बड़ा सा सिन्दूर-तिलक लगा हुआ लठ्ठा महल के भीतर ले जाया जा रहा था। कंकालिन गुड़ी के सामने परम्परानुसार इस स्तम्भ को लगाया जाना था। इस समय कहीं किसी तरह की अशांति नहीं और न ही कोई उत्तेजना। महिलाओं की संख्या चार सौ से अधिक होंगी; इस समूह में पुरुष भी थे, पूरी तरह नि:शस्त्र, जो संख्या में डेढ़ सौ से अधिक नहीं थे। महिलाओं में अधिकांश के वदन पर नीली साड़ी थी और पुरुषों के सिर नीली पगडियाँ; यह भूषा प्रवीर नें अपने समर्थकों को दी थी जिन्हें वे मेम्बर तथा मेम्ब्रीन कहते थे; इस समय इस समूह का प्रवीर से केवल इतना ही सम्बन्ध भर था। यह जुलूस महल के प्रमुख प्रवेश सिंह द्वार के निकट पहुँचा ही था कि एकाएक उस पर लाठीचार्ज हो गया। इसके बाद स्थिति विस्फोटक हो गयी तथा उत्तेजित ग्रामीणों नें तीर-कमान निकाल लिये थे। इस अप्रिय स्थिति को प्रवीर के हस्तक्षेप के बाद ही टाला जा सका था। स्थिति यही नहीं थमी। 25 मार्च 1966 के दिन राजमहल में सामने का मैदान आदिम परिवारों से अटा पड़ा था। कोंटा, उसूर, सुकमा, छिंदगढ, कटे कल्याण, बीजापुर, भोपालपटनम, कुँआकोंडा, भैरमगढ, गीदम, दंतेवाडा, बास्तानार, दरभा, बकावण्ड, तोकापाल लौहण्डीगुडा, बस्तर, जगदलपुर, कोण्डागाँव, माकडी, फरसगाँव, नारायनपुर.....जिले के कोने कोने से या कहें कि विलुप्त हो गयी बस्तर रियासत के हर हिस्से से लोग अपनी समस्या, पीड़ा और उपज के साथ महल के भीतर आ कर बैठे हुए थे। भीड़ की इतनी बड़ी संख्या का एक कारण यह भी था कि अनेकों गाँवों के माझी आखेट की स्वीकृतिअपने राजा से लेने आये थे। चैत की नवदुर्गा में आदिवासी कुछ बीज राजा को देते और फिर वही बीज उनसे ले कर अपने खेतों में बो देते थे। चैत और बैसाख महीनों में आदिवासी शिकार के लिये निकलते हैं जिसके लिये राजाज्ञा लेने की परम्परा रही है। यह भी एक कारण था कि भीड़ में धनुष-वाण बहुत बड़ी संख्या में दिखाई पड़ रहे थे, यद्यपि वाणों को युद्ध करने के लिये नहीं बनाया गया था। ज्यादातर वाण वो थे जिनसे चिडिया मारने का काम लिया जाना था। इसी बीच आदिवासियों और पुलिस में एक विचाराधीन कैदी को जेल ले जाते समय झड़प हुई जिसमे एक सूबेदार सरदार अवतार सिंह की मौत हो गयी। इसके बाद पुलिस नें आनन-फानन में राजमहल परिसर को घेर लिया; आँसूगैस छोडी गयी तथा फिर बिना चेतावनी के ही फायरिंग होने लगी। दोपहर बारह बजे तक अधिकतम आदिवासी मैदानों से हट कर महल के भीतर शरण ले चुके थे। धनुषों पर वाण चढ़ गये और जहाँ-तहाँ से गोलियों का जवाब भी दिया जाने लगा। दोपहर के दो बजे गोलियों की आवाज़े कुछ थमीं। सिपाहियों के लिये खाने का पैकेट पहुँचाया गया था। छुटपुट धमाके फिर भी जारी रहे। कोई सिर या छाती नजर आयी नहीं कि बंदूखें गरजने लगती थीं। दोपहर के ढ़ाई बजे; लाउडस्पीकर से घोषणा की गयी – “ सभी आदिवासी महल से बाहर आ कर आत्मसमर्पण कर दें। जो लोग निहत्थे होंगे उनपर गोलियाँ नहीं चलायी जायेंगी।प्रवीर ने औरतों और बच्चों को आत्मसमर्पण करने के लिये प्रेरित किया। लगभग डेढ़ सौ औरतें अपने बच्चों के साथ बाहर आयीं। जैसे ही वे सिंहद्वार की ओर आत्मसमर्पण के लिये बढीं, मैदान में सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया। यह जुनून था अथवा आदेश...बेदर्दी से लाठियाँ बरसाई जाने लगीं। क्या इसके बाद किसी की हिम्मत हो सकती थी कि वो आत्मसमर्पण करे? शाम साढे चार बजे एक काले रंग की कार प्रवीर के निवास महल के निकट पहुँची। प्रवीर और उसके आश्रितों को आत्मसमर्पण के लिये आवाज़ दी गयी। आवाज सुन कर प्रवीर पोर्चे से लगे बरामदे तक आये किंतु अचानक ही उनपर गोली चला दी गयी, गोली जांघ में जा धँसी थी। इसके बाद महल के भीतरी हिस्सों में जहाँ तहाँ से गोली चलने की आवाज़े आने लगी थीं। आदिम वाणों ने बहुत वीरता से देर तक गोलियों को अपने देवता के शयनकक्ष तक पहुँचने से रोके रखा। एक प्रत्यक्षदर्शी अर्दली के अनुसार बहुत से सिपाही राजा के कमरे के भीतर घुस आये थे। जब वह सीढियों से नीचे उतर कर भाग रहा था उसे गोलियाँ चलने की कई आवाजें सुनाई दीं...वह जान गया था कि उनके महाराज प्रवीर चंद्र भंजदेव मार डाले गये हैं। शाम के साढे चार बजे इस आदिवासी ईश्वर का अवसान हो गया था। प्रवीर की मृत्यु के साथ ही राजमहल की चारदीवारी के भीतर चल रहे संघर्ष ने उग्र रूप ले लिया। अब यह प्रतिक्रिया का युद्ध था जिसमें मरने या मारने का जुनून सन्निहित था। रात्रि के लगभग 11.30 तक निरंतर संघर्ष जारी रहा और गोली चलाने की आवाजें भी लगातार महल की ओर से आती रहीं थीं। इसके बाद रुक रुक कर गोली चलाये जाने का सिलसिला अलगे दिन की सुबह चार बजे तक जारी रहा। 26.03.1966; सुबह के ग्यारह बजे; जिलाधीश तथा अनेकों पुलिस अधिकारी महल के भीतर प्रविष्ठ हो सके। इसी शाम प्रवीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। प्रवीर बस्तर की आत्मा थे वे नष्ट नहीं किये जा सके। आज भी वे बस्तर के लगभग हर घर में और हर दिल मे उपस्थित हैं।
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Friday, March 01, 2013

गोबर के भीतर पडा देवता [प्रसंग: बस्तर में धार्मिक मान्यतायें]



यह पंक्ति गहरी है – “सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा। जनजातीय समाज में देवता इतनी विनम्रता की अपेक्षा नहीं रखते। देवता वह जो बात सुने; देवता वह जो माँग पूरी करे; देवता वह भी जिसकी डिमांड पूरी की जाये लेकिन सशर्त। यह बात कांकेर के निकट रिसेवाड़ा गाँव के पास की है। कांकेर से मेरे मार्गदर्शक थे पत्रकार-मित्र कमल शुक्ला हमने दो ग्रामीणों से रिसेवाड़ा के निकट सहायता माँगी थी और वे भी हमारे साथ चल पड़े थे। यहाँ की रिसेदेवी से भी आपका परिचय जल्दी ही कराउंगा तथा इस स्थल के कई चौकांने वाले तथ्यों से भी। आज बात भीमा देवता की। वस्तुत: रिसेदेवी की गुफा देख कर आगे बढते हुए एक जगह ग्रामीणों ने हमे छोडा और एक पेड के नीचे नत मस्तक हो गये। मैं जिज्ञासा वश वहाँ चला गया। छोटा सा पेड पौधों का झुरमुट जहाँ दो गोबर के थप्पे रखे हुए थे। 

यह क्या है?” मैने जिज्ञासा वश पूछा।

भीमादेव हैएक ग्रामीण ने बताया।

भीमादेव क्या गोबर की थप्पियाँ हैं? यह बात और जिज्ञासा से भर रही थी। भीमादेव तो पानी का देवता है न?” मैने अपना ज्ञान बघारा। हम तथाकथित सभ्य लोग हैं ज्ञान बघारना हमारा अधिकार है।

हौ पानी का देवता है।ग्रामीण ने अपनी सादगी से कहा।

.....लेकिन गोबर की थप्पिया? भीमादेवता की मेरी कल्पना बडी भव्य थी। भीमा साधारण देवता हर्गिज नहीं है; प्रचलित कहावत है कि नांगर धरला भीम पानी देला इन्दर। मैं बात आगे बढाने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि बस्तर का जनजातीय समाज उस चश्मे से देखा पढा ही नहीं जा सकता जिसका कि हम देश के अन्य भाग से तुलनात्मक सूत्र जोड सकें। बहुत से लोग आईसोलेशन थ्योरीकी वकालत करते हैं जिसके दुष्परिणाम समझने के लिये बस्तर सबसे बेहतरीन जगह है। 1324 में अन्नमदेव ने बस्तर राज्य के विधिवत गठन के बाद उसने अपनी सीमाओं को लगभग सील कर दिया था; भीतर और बाहर में कोई संवाद नहीं। यदि अंग्रेज जासूस ब्लंट की डायरी कोई पढे तो यह समझ सकता है कि तत्कालीन बस्तर की निकटवर्ती रियासत कांकेर और बस्तर के बीच भी अबोले-अबूझे की स्थिति थी। इसका परिणाम हुआ कि यहाँ शासक-शासित; मूल संस्कृति/परंपरायें तथा आयातित; विद्यमान देवी देवता तथा आयातित सभी आपस में घुल मिल गये। कभी जनजातीय समाज का चलन शाशक वर्ग नें ओढ लिया तो कभी शासकों की मान्यतायें शासित वर्ग नें अपना लीं। इसे बिना किसी विद्वेश के हुआ सामाजिक-धार्मिक बदलाव भी कहा जा सकता है और फिर शेष दुनिया से कटे रहने के कारण नये तर्क बस्तर की सीमाओं के भीतर आसानी से प्रविष्ठ नहीं हो सकते थे अत: उपलब्ध विकल्प ही गुत्थम-गुत्था हो गये। आईसोलेशन थ्योरी के कारण बाहर से आने वाले बंजारों को शोषण करने व वनोपज की लूट का अवसर प्राप्त हुआ। (स्वतंत्रता पश्चात भी एक ब्यूरोक्रेट नें अबूझमाड को आईसोलेशन के अभिशाप से ग्रसित कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप नक्सलवाद नें इन क्षेत्रो में सहजता से पैर जमाये।)। यह लम्बी चर्चा का विषय है अत: न भटकते हुए गोबर की थप्पियों पर लौटते हैं।

यहाँ भीमा और इन्दर हमें भ्रमित करते हैं। इन्द्र पूजा को हिन्दू समाज में वर्षा से जोडा जाता है अत: यह भ्रम स्वाभाविक भी है। डॉ. के के झा नें चर्चा के दौरान इसी विषय पर अपनी थीसिस मुझे दिखाई थी जहाँ वे जनजातीय समाज की धार्मिक मान्यताओं में इतिहास की समय समय पर हुई दखलंदाजी की पूरी व्याख्या करते हुए इस अवगुण्ठन की क्रमबद्धता तथा कारणों पर बात करते हैं। डॉ. झा एसा साधिकार इस लिये कह पाते हैं चूंकि बस्तरिया जीवन को इस इतिहासकार नें इसी मिट्टी में जी कर समझा है। वरना तो दिल्ली में बैठे कई विचारक इन बदलावों को कॉफी पीते पीते ही खारिज कर देते हैं; एक आध तो गुडसा उसेंडी के अवतार वाले गुण्डाधुरकी तलाश करने वाले आगंतुक शोधार्थी बस्तरिया देवी दंतेश्वरी को शोषकबता कर अपनी थीसिस पूरी भी कर लेते हैं। भीमादेव को गोबर में लिपटा देख कर मेरा ठिठकना स्वाभाविक था चूंकि प्रचलित मान्यता के अनुसार - भीमादेव बस्तर के खेतीहर देवता हैं। भीमादेव को मनाने के लिये देवगुड़ी में पूजापाठ होता है, मन्नत माँगी जाती है। भीमादेव का पूरा श्रंगार साँप ही हैं। उनके सिर पर महामण्डलसाँप की पगड़ी बँधी है। टोकी-बोंडकीसाँप का जनेऊ पहना हुआ है। दूध-नागसाँप का कौपीन और बंदूक-मानासाँप का कमरपट्टा पहनते हैं। सुपलीसाँप भीमादेव के पैरों के कडे हैं।

बस्तर की जनजातीय मान्यताओं का यह भीमादेव हिन्दू मान्यता के किसी भी प्रचलन से साम्यता नहीं रखता तथापि जनजीवन में नल-नाग-काकतीय शासनकाल की मान्यताओं का प्रभाव ही न पडा हो क्या यह संभव था? आज कुछ देवगुडियों की जगह पक्के मंदिरो की भी झलक मिलती है यह भी समय का लाया परिवर्तन ही तो है। पूरे बस्तर में शिव-गणेश की असंख्य प्रतिमायें बिखरी मिलती हैं वह चाहे कोंटा हो, बीजापुर हो, भोपालपट्टनम हो, नारायणपुर हो या कि कांकेर। शिव के मान्य स्वरूप की हल्की सी झलख भीमादेव के स्वरूप में भी दिखाई पडती है। इन्ही नाम साम्यो के कारण जान बूझ कर विचारधारा-विशेष के द्वारा वैमनस्य प्रसारित करने की कोशिश है, या कहें सामाजिक खाई जो कि इन अवगुण्ठनों को अलग अलग करना चाहती है वह भी बिना इसके अतीत का पक्ष समझे हुए।

देवता वह नहीं जिसके आगे सिर झुका कर रहो और प्रतीक्षा करो कि वह तुम्हारी बात कभी सुनेगा। ग्रामीणों से चर्चा के दौरान ही मैं देवता और भक्त के बीच पुजारी या ओझा के माध्यम से होने वाली बातचीत या मोलभाव के मायने समझने का यत्न कर रहा था। यहाँ देवता बात करता है चाहे माध्यम कोई भी बने। देवता बात माने जाने से पहले अपने चढावे को ले कर भक्त और पुजारी से मोलभाव भी करता है कि पिछली बार तूने मुर्गा दिया था इस बार बकरा लूंगा। लेकिन भक्त के पास भी छूट है वह भी अपने देवता से उसी तरह झगड सकता है कि नहीं मैं तो मुर्गा ही दूंगा लेना हो तो लो वरना जाओ। इतना ही नहीं नाराज होने का अधिकार केवल देवता को ही नहीं है याचक या भक्त हो भी है। देवता के साथ झूमा झटकी भी हो सकती है और देवता को बैरंग लौटाया भी जा सकता है। इतना ही नहीं देवता बदल भी दिये जाते है, उपेक्षित भी कर दिये जाते हैं तथा मृत भी घोषित किये जाते हैं। बस्तर के देवी-देवता अकड नहीं सकते और सर्वे सर्वा नहीं बन पाते क्योंकि वे जन आवश्यकता से पनपते हैं उनकी सोच के अनुसार आकार लेते हैं उनकी जीवन शैली के अनुसार खाते पीते हैं और उसी प्रकार पूजे भी जाते हैं। इस विषय को अभी विस्तार न दे कर बात पुन: भीमादेव की।

ये गोबर जो रखा है उसीको आप भीमादेव मानते हो?” मुझे सही शब्द नहीं मिल रहे थे। काम करते हुए मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे मुख से निकले किसी भी शब्द से किसी की भी मान्यता आहत न हो। मुझे जो उत्तर मिला संभवत: धर्म और आस्था को ले कर बडी बडी बहसों के लिये सीख हो सकता है।

मुझे बताया गया कि बारिश नहीं हो रही थी बुआई नजदीक थी अत: ग्रामीण नें भीमादेव से प्रार्थना की। अब देवता है तो उसे सुख-दुख का साथी बनना ही पडेगा। अगर ग्रामीण की क्षमता के भीतर देवता की कोई माँग है तो पूरी भी की जाती है लेकिन जब देवता से कहा गया है कि बारिश कराओ तो बारिश होनी चाहिये। किस बात का देवता अगर माँग पूरी न करे? किस बात का देवता अगर इस तरह से नाराज हो जाये कि भक्त तकलीफ में आ जाये? नहीं इतना अधिकार देवता को नहीं दिया गया है कि वह अपनी अकड दिखा सके या हेकडी में रहे। यहाँ देवता से झगडा भी किया जाता है उसे गालियाँ भी दी जाती हैं इतना ही नहीं बात न मानने पर हश्र और भी बुरा हो सकता है जो उदाहरण मेरे सामने था। भीमादेव नें बार बार कहने पर भी बात नहीं मानी तो अब देवता महोदय भुगतो। ग्रामीण नें अपना गुस्सा इजहार करते हुए देवता के उपर गोबर पटक दिया कि पडे रहो भीतर। बात मानोगे तो निकालूंगा बाहर नहीं तो होगे देवता मुझे क्या

कमल भैया नें पूछा कि क्या गोबर के नीचे रखी भीमादेव की मूर्ति को हम देख सकते हैं? यह स्वाभाविक प्रश्न था और हम यह उत्तर मान कर चल रहे थे कि हमे ना में उत्तर मिलेगा। हो सकता है हमे कहा जाये कि एसा करने पर देवता नुकसान पहुँचा सकता है....। अपेक्षा से विपरीत ग्रामीण ने कहा कि देवता है तो नुकसान क्यों पहुँचायेगा। यद्यपि हमने जानबूझ कर मूर्ति देखने की तत्परता नहीं दिखाई। मैं भाविक व्यक्ति हूँ और गोबर के भीतर पडे देवता ने मुझे अभिभूत कर दिया है।
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Thursday, February 14, 2013

नागयुगीन बस्तर (760 - 1324 ई.) का समाज और वर्तमान का वैचारिक प्रदूषण



अभी हिन्दी दिवस के अवसर पर एक चर्चा से सामना हुआ। मूल रूप से यह कहे जाने की कोशिश थी कि हिन्दी एक सामंतवादी भाषा है तथा हमें अपनी स्थानीयताओं के स्तर पर उतरना चाहिये अथवा निज मातृभाषा को ही प्रबलता से अपना चाहिये। बस्तर क्षेत्र के अतीत में तो एसी आवाज़ कभी नहीं उठी किंतु पिछले कुछ वर्षों से वाम विचारधारा नें गोंडी का प्रश्न आगे किया है तथा माओवादी स्त्रोतों से एवं कुछ बस्तर के भ्रमणार्थी लेखकों/समाजशास्त्रियों/पत्रकारों नें यही बात बारम्बार राष्ट्रीय मंचों से आगे की है। किसी नें कहा शिक्षा का माध्यम गोंडी होना चाहिये तो कोई बताता है कि जंगल के भीतर माओवादी एसी पाठ्यपुस्तकें तैयार कर रहे हैं जो मूल गोण्डी में ही हैं। केवल गोण्डी ही क्यों बस्तर की अन्य अकेकानेक बोलियाँ भी समान आदरणीय हैं तथा मुझे लगता है कि भाषा-बोली का प्रश्न एक पंक्ति में विश्लेषित होने वाला नहीं है। नाग कालीन बस्तर के समाजशास्त्र पर चर्चा को इसी विन्दु के प्रारंभ करने के पीछे मेरा मंतव्य उस साजिश को उजागर करना है जिसके परोक्ष में जनजातियों को अलग थलग करने की कोशिश पुन: होने लगी है। बस्तर रियासत के अंतिम काकतीय राजा प्रवीरचंद्र भंजदेव नें मध्य प्रादेशिक हिन्दी साहिय्त सम्मेलन (1950 ई.) के अवसर पर भाषा-बोली के सवालों को उठाते हुए अपने वक्तव्य में नागयुगीन इतिहास को कुरेदते हुए भाषा के सवाल को उठाया था - शिलालेखों से यह भली भाँति सिद्ध होता है कि गोंडों की अवनति लड़ाई में हार जाने के कारण नहीं हुई है परंतु प्रस्तुत प्रश्न के प्रति उदासीनता दिखाने के कारण हुई है। एक ही समय में जब उन्हें मुसलमान और आन्ध्र राजाओं से खतरा मालूम हुआ तो वे अपने अपने जंगलों में जा कर रहने लगे और शेष संसार से स्वयं को अलग कर लिया। संसार की कोई भी जाति अपने को अलग कर के उन्नति नहीं कर सकती।.....अमेरिका के रेड़ इंडियनों का समूल नाश गोलियों से नहीं हुआ। पर उनको रिजर्व यानि बाकी संसार से पृथक रखने से हुआ। हमारे देश के आदिवासी यदि पृथक रखे गये तो उनकी जाति ही नष्ट नहीं हो जायेगी पर उनका नैतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी विकास भी नहीं हो पायेगा। महाराजा प्रवीर नें एक बहु-भाषी अध्यापन का सिद्धांत दिया था व कहा था कि हिन्दी में पढाने के लिये हमारी प्रारंभिक पाठ्य पुस्तकें बेकार हैं, उनके स्थान पर हमें चित्रों की आवश्यकता है। जिसमें प्रत्येक अक्षर को एक जानवर की तस्वीर दिखा कर समझाया जाये और उस जानवर का नाम हिन्दी, हलबी और गोंडी में लिख दिया जाये। यह प्रवीर ही थे जिन्होंने सबसे पहले आदिवासी आईसोलेशन के खतरे को भांपा और इसे रोकने के लिये एक एक्टिविस्ट की तरह प्रयास भी किये उन्होंने अजेर (हल्बी बोली में अजेर का अर्थ है उजाला) नाम का पत्र निकाला जो हिन्दी भाषा तथा आदिवासी बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होता था। लाला जगदलपुरी नें भी बाद में इस बात की अहमियत को समझते हुए हिन्दी भाषा व जनजाति बोलियों में संयुक्त रूप से प्रकाशित होने वाला पत्र बस्तरियाप्रारंभ किया था जिनमें वे देश के ख्यातिनाम साहित्यकारों की रचनाओं का जनजातीय बोलियों में अनुवाद प्रस्तुत कर एक पुल बनाने का कार्य कर रहे थे। शायद यही सर्वश्रेष्ठ तरीका है समन्वय का क्योंकि जब आप बस्तर के जनजातीय क्षेत्रों की बात करते हैं तो केवल गोंडी कह कर स्पष्ट विभाजन नहीं किया जा सकता लेकिन इस सवाल पर उनका आईसोलेशन अवश्य किया जा सकता है चूंकि भाषा-बोली के सौहार्द वाले इस जनजाति क्षेत्र में तीस से अधिक बोलियाँ अवस्थित हैं। हलबी बोली नें सभी जनजातियों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य नागयुगीन बस्तर से ही आरंभ कर दिया था यही कारण है कि यहाँ दो गोंड जनजातियाँ आपस में बात करते हुए अपनी अपनी बोली में जब गूंगी हो जाती हैं तो हल्बी उनकी ज़ुबान बनती रही है।

आलेख के उपसंहार में इस विषय पर पुन: लौटेंगे पहले नागयुगीन जनजातिगत जटिलताओं पर दृष्टिपात करते हैं। इतिहासकार डॉ. हीरालाल शुक्ल बहुत बारीकी से जनजातियों की संरचना का वर्गीकरण करते हैं। उन्होंने दो स्पष्ट विभेद किये हैं। हलबा प्रजाति (यूरोपाईट) जिनका उद्भव आर्य जातियों से हुआ वे नाग युग में पुरोहित, व्यवसायी एवं कृषक तीनों वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे। जब कि नाग प्रजाति (वेद्दोआउड) का स्पष्ट विभाजन उनकी कनिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक मधुरांतक देव) के आधार पर धुरवा जनजाति (धुरवा, परजा) तथा वरिष्ठ शाखा (प्रतिनिधि शासक सोमेश्वर देव) के आधार पर गोंड जनजाति (दोर्ला, माड़िया) आदि में हुआ है। नाग प्रजाति प्रशासन से जुड़ कर योद्धा बन गयी जबकि हलबा - हलवाहक।

नागयुग में पितृसत्तात्मक परिवारों का उदय होने लगा। संयुक्त परिवार चलन में थे एवं ग्राम संरचना इस तरह थी कि दूर के सम्बन्धी भी एक पक्ति में बने मकानों में रहा करते थे। स्त्री को अब तक प्राप्त अधिकार सीमित होने लगे थे; तथापि धनाड्य परिवारों में स्त्रियाँ बराबरी का हक रखती थी तथा पर्दा प्रथा विद्यमान नहीं थी। नवसाहसांकचरित ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि स्त्रियाँ पुरुषों से हाँथ मिलाती थीं – “रुक्मागतं करग्राहसौहाद्रे पात्रतां नयततथा पुरुषों के साथ मदिरापान भी करती थीं – “मधु कापि पाटलकपोतलरलकलधौतकुण्डला। लोलनिजमुखतुषारकरबिम्बगर्भमधिकार्पिते। जगदलपुर के निकट चपका ग्राम से प्राप्त टेमरा सती अभिलेख तद्युगीन व्याप्त सतिप्रथा की ओर भी इशारा करता है। इस अभिलेख के अनुसार माणिक्यदेवी अपने पति नागराजा हरिश्चंददेव की चिता पर सति हो गयी थी। अब तक प्राप्त किसी भी अभिलेख व साहित्य से जनजातियों की वेषभूषा पर जानकारी नहीं मिलती किंतु उस युग में एलीट क्लास के पुरुष उत्तरीय व अंकुश पहनते थे, गले में हार, मणिकुण्डल तथा यज्ञोपवीत भी धारण करते थे। स्त्रियो के श्रंगारप्रिय होने की जानकारी मिलती है तथा वे अनेक प्रकार की केश-सज्जायें के साथ कण्ठ मे हार, कानो में रक्तकुण्डल व कर्णपुर, हाँथों में मणिकंकण,केयुर, नूपुर, मेखला और रत्नजटित पादुकाओं को धारण करती थीं। श्रंगार प्रसाधन के रूप में आखों में अंजन, होठों में लाली, शरीर में चन्दनलेप तथा पैरों में आलता लगाने के अनेक विवरण नवसाहसांकचरित ग्रंथ से प्राप्त होते हैं। विवाह को ले कर जनजातियों के बीच नीयम जटिल नहीं थे और तब पाँच प्रकार के विवाह प्रचलित थे आर्ष विवाह (वर से शुल्क लिया जाता था), आसुर विवाह (वर कन्या के माता पिता को धन दे कर कन्या को खरीदता है), राक्षस विवाह (वधू का अपहरण किया जाता है), पैशाच विवाह (बलात पतित्व का अधिकार पाया जाता है) तथा गान्धर्व विवाह (माता पिता की अनुमति से प्रेम विवाह)। एक ही गोत्र में विवाह करना निषिद्ध था। उपरोक्त में से बहुतायत विवाह प्रकार बदले हुए स्वरूपों में आज भी चलन में हैं।

नागयुग तक जैन धर्म-बौद्ध धर्म की पैठ चक्रकोट्य (बस्तर) में बनी हुई थी। यही वह समय है जब हिन्दू मान्यताओं और पूजा-परम्पराओं नें जनजातिगत मान्यतों के भीतर भी जगह बनाना आरंभ किया। शिव एक प्रमुख आराध्य देवता के रूप में उभरने लगे तथा तंत्रमंत्र के माहौल में शाक्त देवियों व सप्तमातृकाओं की भी आराधना व्यापक रूप से की जाने लगी। नागराजाओं की कुलदेवी माणिकेश्वरी थीं। नागयुगीन मंदिरों नें नृत्य-संगीत को समुचित प्राश्रय दिया तथा राजा सोमेश्वर देव के गढिया अभिलेख के अनुसार नृत्यांगनाओं को समुचित दान की वयवस्था शासन की ओर से थी।

नागयुग के शिल्पकार स्तुत्य हैं जिन्होंने एसी अनुपम धरोहरें बस्तर को सौंप दी हैं जो अलगी कई शताब्दियों तक इतिहास को जीवित रखेंगी। नारायणपाल का विष्णु मंदिर, बस्तर का शिव मंदिर, कुरुषपाल, भैरमगढ, चित्रकोट, गढधनोरा, केसरपाल, चपका, मटनार, छोटे-डोंगर, दंतेवाड़ा, कोईलीबेड़ा, कटगाव आदि में अवस्थित मंदिर तथा भग्नावशेष नागयुगीन वास्तुकला की आज भी गवाही देते हैं। बारसूर का बत्तीस स्तम्भों वाला मंदिर तो अनुपम है। अंग्रेज प्रशासक दि ब्रेत (1909) नें उल्लेख किया है कि एक ज़माने में बारसूर के मंदिर अपनी मिथुन मूर्तियों के कारण खजुराहो के मंदिरों से भी भव्य थे। किंतु अज्ञानता के कारण राजा महिपाल देव नें उन्नीसवीं सदी में इन्हें नष्ट करवा दिया था। आज भी मूर्तियों का बारीक अन्वेषण उनमें छिपे आदिम अभिव्यक्ति के छिपे कई दृश्य सामने लाता है जिसमें कहीं आदिवासी जीवन की पीडा है तो कहीं प्रेम भी है।

अब पुन: भाषा से प्रारंभ हुई चर्चा पर लौटते हैं। डॉ. हीरालाल शुक्ल नें अपनी पुस्तक चक्रकोट के छिन्दक नाग में उल्लेख किया है कि उन्होंने नागयुगीन बस्तर के कुल तैतीस अभिलेखों की खोज की है जिसमें से 16 अभिलेख तेलिगु में एवं 17 अभिलेख संस्कृत में हैं। डॉ. शुक्ल का मंतव्य है कि इन्द्रावती नदी एक स्पष्ट विभाज्य देखा है जिसके उत्तर का क्षेत्र संकर संस्कृत का तथा दक्षिण का अंचल संकर तेलुगु का रहा है। नागयुगीन राजा भाषा को ले कर स्पष्ट सोच रखते थे तथा समय समय पर उन्होंने एक भाषा नीति बनायी थी। नागयुगीन बस्तर की प्रथम राजभाषा (925-1062 ई.) तेलुगु थी चूंकि तब नाग दक्षिण से बस्तर आ कर स्थापित हुए थे एवं स्वयं का विस्तार करने के लिये अपनी भाषा को माध्यम बनाना उन्हें उचित लगा होगा। मधुरांतक देव (1062-1069 ई.) नें भाषानीति को बदल कर संस्कृत को राजभाषा घोषित किया। संभवत: इसका कारण सोमवंशी, कलचुरी, ओडिशा तथा चोल शासकों से सहसम्बन्ध बढाना रहा होगा। इसके बाद तीसरी राजभाषा नीति का काल 1069-1218 के मध्य का है जहाँ तेलुगू एवं संस्कृत दोनो को ही राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। सोमेश्वर देव (1069-1111ई.) नें कुल नौ आज्ञा पत्र जारी किये जिनमें से पाँच संस्कृत में तथा चार तेलुगु में थे। इस अवधि के विषय में डॉ. शुक्ल लिखते हैं कि भाषा-बोलियों का सम्मिश्रण जनजातियों में इसी प्रकार नागयुग में होता रहा। आन्ध्र के प्रभाव वाले क्षेत्रों में तेलुगु नें माड़िया तथा धुर्वी के साथ मिल कर द्विभाषिकता की स्थिति को निर्मित किया तथा हलबाओं के संपर्क में ओडिया भाषा आई। अबूझमाडिया कबीले तब शक्तिशाली थे तथा एकभाषीय बने रहे। कालांतर में द्विभाषी स्थिति तो यथावत बनी रही लेकिन एकलिपि (1218 -1224 ई.) का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया। इस काल में संस्कृत तथा तेलुगु दोनो ही भाषाओं के अभिलेख नागरी लिपि में लिखे जाने लगे। शनै: शनै: तेलुगु भाषा की परम्परा समाप्त हो गयी तथा संकर संस्कृत (1224-1324 ई.) का विकास हुआ जिसमें स्थानीयता का तेजी से सम्मिश्रण भी होने लगा। एक एसी भाषा में संस्कृत बदलने लगी जिसके बहुत निकट आज की हलबी प्रतीत होती है। इस कारण को प्रमुखता से पहडना होगा कि क्यों हलबी सभी जनजातियों के बीच बोली जाती है जाहे वे गोंड हो या हलबा।

नागयुग में विभिन्न जनजातियों का सहसंयोजन भी हुआ तथा जिन जनजातियों की शासन में सहभागिता नहीं रही वे उपेक्षित व पिछडते भी चले गये। नाग शासन में जनजातियों के बीच आपसी संघर्ष के कोई दस्तावेज़ अथवा प्रमाण नहीं मिलते साथ ही यह सु:खद प्रतीति होती है कि बस्तर में अनेक धर्म, अनेक जातियाँ, अनेक बोली-भाषा बोध के बाद भी आधुनिक तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा विद्वेष फैलाये जाने की साजिश से पहले तक कभी भी इन सवालों पर अनेकता या अलगाववाद की स्थितियाँ निर्मित नहीं हुई हैं। अत: वही दोषी हैं जो बस्तरिया समाज को इस दृष्टि से देख रहे हैं, प्रदूषक-विचारों का विरोध अवश्य होना चाहिये।
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Wednesday, February 13, 2013

नागयुगीन बस्तर की स्त्री प्रशासक – मासकदेवी।


लाला जगदलपुरी जी अपनी किताब बस्तर इतिहास एवं संस्कृतिमें मासकदेवी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं दंतेवाड़ा में एक शिलालेख मिलता है जिसके अनुसार बस्तर के छिन्दक नाग कुल में एक बड़ा प्रतापी नरेश हो गया है, जिसकी एक विदुषी बहिन थी। उसका नाम मासकदेवी था। उसने तत्कालीन वातावरण में नारीचेतना, प्रजा-प्रेम, सेवा-भाव, कृषि उत्थान आदि प्रवृत्तियों के विकास के लिये प्रसंशनीय कदम उठाया था। शिलालेख का समय अज्ञात है किंतु उसमें सर्व-साधारण को यह सूचित किया गया था कि राज्य अधिकारी कर उगाहने में कृषक जनता को कष्ट पहुँचाते हैं। अनीयमित रूप से कर वसूलते हैं। अतएव प्रजा के हितचिंतन की दृष्टि से पाँच महासभाओं और किसानों के प्रतिनिधियों नें मिल कर यह नीयम बना दिया है कि राज्याभिषेक के अवसर पर जिन गाँवों से कर वसूल किया जाता है, उनमें ही एसे नागरिकों से वसूली की जाये, जो गाँव में अधिक समय से रहते आये हों। जो इस नीयम का पालन नहीं करेंगे वे चक्रकोट के शासक और मासकदेवी के विद्रोही समझे जायेंगे। शिलालेख में दर्शायी गयी राजाज्ञा में राजा की बहिन का हाथ है जो प्रजाकल्याण की भावना से तत्कालीन हुकूमत पर हस्तक्षेप करती है और शासक तथा शासित के बीच प्रेम और सौहार्द स्थापित करने की पहल करती है

मासकदेवी पर विमर्श को उनकी ही कुछ पंक्तियों से आगे बढाते हैं

एसे पथराव चल गये लोगो
भाव कोमल कुचल गये लोगो।
भीड में अर्थ खा रहे धक्के,
शब्द आगे निकल गये लोगो। 

वस्तुत: बस्तर को समझने के विमर्श में आम तौर पर लोग मासकदेवी को लांघ कर निकल जाते हैं; संभवत: इसी लिये इस महत्वपूर्ण स्त्रीविमर्श के अर्थ से अबूझ रहते हैं। इस अभिलेख के कुछ शब्दों पर ठहरना होगा वे हैं महासभा, किसानों के प्रतिनिधि तथा कर। जब तक महासभा के कार्य, किसानों के प्रतिनिधियों को हासिल अधिकार तथा कर प्रणाली की विवेचना न हो इस शिलालेख के आधे अधूरे मायने ही समझे जा सकते हैं। संभवत: यह महासभा पंचायतों का समूह रही होंगी जिनके बीच बैठ कर मासकदेवी नें समस्याओं को सुना, किसानों नें गाँव गाँव से वहाँ पहुँच कर अपना दुखदर्द बाँटा होगा। इस तर्क के पीछे गंग युग तक वैदिक सभ्यता की कुछ लोकतांत्रिक परम्पराओं का पाया जाना है। 

विरथ, सभा-समीति आदि पूर्ववैदिक काल से ही चली आ रही वे लोकतांत्रिक संस्थायें थीं जो विचार-विमर्श, सैनिक तथा धार्मिक कार्यों का सम्पादन आदि करती थी। ऋग्वेद में इस प्रकार की संस्थायें यथा- सभा, समीति, विरथ तथा गण का उल्लेख मिलता है। आज भी किसी न किसी बदले हुए रूप में ये सभी संस्थायें देखी जा सकती हैं। अथर्ववेद में उल्लेख है कि सभा च मा समिति-श्चावतां प्रजापतेदुहितरौ संविदानेअर्थात सभा तथा समिति प्रजापति की दो पुत्रियाँ हैं। डॉ. कीथ नें समीति को जनसभा बताया है जबकि सभा को श्रेष्ठ जनों की बैठक से जोड दिया है। इस दृष्टि से मासक देवी के शिलालेख में उल्लेखित पाँच- महासभा के मायने व्यापक हो जाते हैं। नाग युगीन शासन प्रबंध पाँच-प्रधान की बात करता है। सोनारपाल अभिलेख (1224 ई.) में इनमें से चार प्रधानों के नाम हैं महाप्रधान (मंत्री), पडिवाल (दौरावारिक), चामरकुमार (युवराज) तथा सर्ववादी (पुरोहित)। डॉ. हीरालाल शुक्ल समकालीन आन्ध्रप्रदेश के चालुक्य राज नरेन्द्र के नन्दमपुडी दानपत्र से उद्धरण लेते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि पंचप्रधान में उपरोक्त चार के अलावा पाँचवा पद सेनापति का रहा होगा। समग्रता से उपरोक्त उदाहरणों को देखा जाये तो प्रतीत होता है कि ग्रामीण सभायें आपस में जुडी होती थी जो पंच-प्रधानकी उपस्थिति के बाद महासभा कही जाती थी। इस सभा को शासन द्वारा नितिगत निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गयी होगी जिस आधार पर मासकदेवी नें अपनी अध्यक्षता में ग्रामीणों और किसानों की बातों को सुन कर न केवल समुचित निर्णय लिया अपितु शिलालेख बद्ध भी कर दिया। शिलालेख का अंतिम वाक्य मासकदेवीको मिले अधिकारों की व्याख्या करता है जिसमे लिखा है - जो इस नीयम का पालन नहीं करेंगे वे चक्रकोट के शासक और मासकदेवी के विद्रोही समझे जायेंगे

मासकदेवी एक उदाहरण है जिनको केन्द्र में रख कर प्राचीन बस्तर के स्त्री-विमर्श और शासकों व शासितों के अंतर्सम्बन्धों पर विवेचना संभव है। यह जानकारी तो मिलती ही है कि लगान वसूल करने में बहुत सी अनीयमिततायें थी। साथ ही सुखद अहसास होता है कि तत्कालीन प्रजा के पास एसी ग्रामीण संस्थायें थी जो शासन द्वारा निर्मित समीतियों से भी सीधे जुडी थी। प्रतिपादन की निरंकुशता पर लगाम लगाने का कार्य महासभाओं में होता था तथा नाग युग यह उदाहरण भी प्रस्तुत करता है कि अवसर दिये जाने पर स्त्री हर युग में एक बेहतर प्रशासक सिद्ध हुई है।
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Thursday, January 24, 2013

सलवा जुडुम को दुष्प्रचार ने मारा है – महेन्द्र कर्मा [साक्षात्कार]




बस्तर में माओवादी हिंसा और सलवाजुडुम दोनो के ही अपने पक्ष-विपक्ष हैं। माओवादी हिंसा तो अभी जारी है लेकिन सलवाजुडुम अभियान की अब कमर टूट चुकी है। बस्तर की राजनीति में महेन्द्र कर्मा एक जाना पहचाना नाम हैं तथा भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के कार्यकर्ता से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने के बाद इन दिनो वे कांग्रेस के बडे आदिवासी नेताओं में गिने जाते हैं। उनका एक परिचय यह भी है कि सलवा जुडुम अभियान का उन्होंने अग्रिम पंक्ति में खड़े हो कर नेतृत्व किया था। महेन्द्र कर्मा प्रखर वक्ता भी हैं तथा बस्तर पर अपने विचार वे दृढता और आत्मविश्वास के साथ रखते हैं। बस्तर पर किये जा रहे अपने अध्ययन के दौरान महेन्द्र कर्मा से मेरी मुलाकात दंतेवाड़ा में हुई थी। मैने उनका साक्षात्कार रिकॉर्ड किया था जिसमें बिना अपना मत-मंतव्य जोडे शब्दश: प्रस्तुत कर रहा हूँ -  


राजीव रंजन: कर्मा जी, महाराजा प्रवीर का समय और आज का बस्तर; दोनों समयों मे आप कैसा परिवर्तन महसूस करते है?

महेन्द्र कर्मा: देखिए प्रवीर का पूरा समय राजतंत्र और लोकतंत्र के बीच फसा हुआ समय था। प्रवीर राजतंत्र की अन्तिम कड़ी होने के साथ-साथ बहुत अच्छे विधायक थे। उन्होंन राजतंत्र के मानकों को उभारा जिसके परिणाम में 1966 का गोलीकाण्ड हुआ। प्रवीर बस्तरवासियों के बीच में बहुत ही लोकप्रिय थे तथा अपने समय के डेमोक्रेटिक सेटअप में एक अच्छे लीडर हो सकते थे। उन्होंने लीडर बनने की बजाय एक राजा होने की भूमिका ज्यादा निभाई।.....मैं समझता हूँ कि बस्तर ही नहीं पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर, परिवर्तन और विकास की आहट बहुत कम सुनाई दी है। जो भी डेवलेप्टमेन्ट; जो भी चेंजेज़ आए हैं वे बहुत ही स्लो हैं, धीमी प्रोसेज में आये हैं। बस्तर की जहाँ तक बात है, अचानक 1967 - 68 के उपरान्त जैसे ही यहाँ बैलाडिला प्रोजेक्ट आया तो वह यहाँ के शान्त माहौल में हलचल की तरह आया या कहिये एक शान्त झील में कोई बड़ा सा पत्थर फेंकने के बाद उठी लहरों का अहसास यहां के लोगों ने किया है। बैलाडिला के लिए भी यहाँ के लोग तैयार नहीं थें। अगर सरकार थोड़ा भी यहाँ के लोगों को इस बड़े और प्रभावित करने वाले अध्याय से जोड़ती, यहाँ के लोगों को इससे सीधे जोड पाती, यहाँ के शिक्षित लोगों के लिये यह एक अवसर की तरह आता तो मैं समझता हूँ कि इसका स्वागत भी होता और इसके दूरगामी परिणाम कुछ और बेहतर हो सकते थे, जो नही हुआ।

राजीव रंजन:  बैलाडिला तो आ गया लेकिन उस बीच में बस्तर में बोधघाट परियोजना बन्द हो गई या नगरनार प्रोजेक्ट बन्द हो गया। जिन्हें हम विकास परियोजनाएं कहते हैं वे बस्तर अंचल से एक-एक करके खत्म होती चली गई....?

महेन्द्र कर्मा: बस्तर में इस सम्बन्ध में दो प्रकार की विचारधारा हैं। एक विचारधारा वो, जो ऑर्थोडॉक्स है; वो लोग यहां के समाज, संस्कृति, धर्म जैसे बातों का भय दिखा कर बस्तर के विकास को रोक रहे हैं। दूसरी विचारधारा है जो यहाँ के संसाधनों पर आधारित हैं, यहाँ के लोगों के लिये विकास की पहल कर रही हैं। इसमें हम लोग भी हैं।....बस्तर में काम पैदा होना चाहिये, जितना सही तरह से संभव हो उद्योग धंधे भी लगने चाहिए, इस बात के हम लोग शुरू से सर्मथक रहे हैं। हमारा कहना है कि यहाँ के संसाधन सिर्फ ग्लोबल नहीं होने चाहिए, उन पर कहीं न कही इस जमीन का पहले हक है। पर वेल्यूऐटेड डेवलपमेंट होना चाहिए। वेल्युएडिशन की स्थिति में यहा एम्प्लॉयमेंट बढ जायेगा। आज जो बस्तर का आदमी है वह भी बदल गया है। उसके लिये अब बिलकुल एक नया युग हैं। उसकी सोच ही अलग हैं। वह बदलती दुनिया के साथ अपने आप को एडजेस्ट करना चाहता हैं। अभी इस तरह की तमाम चीजों पर बाते एक ब्लास्टिंग मोड में हैं....नए अवसर खुल सकते हैं। हम जो उनको नही दे पा रहे, इसका कोई तुक नहीं है। मेरा मानना है कि डिसाईजिव स्थिति में रहने के बाद भी, साधन सम्पन्नता के बाद भी हम यहाँ के लोगों के लिये विकास से सही अवसर खोल पाने में अब तक असफल ही रहे हैं।

राजीव रंजन: कर्मा जी, अपने बहुत खुलकर एक बात की है। इसी से जुड़ा हुआ एक प्रश्न करना चाहता हूँ कि जिन दिनों ब्रह्मदेव शर्मा बस्तर में रहें, दो महत्वपूर्ण काम हुए। पहला तो प्रशासक के तौर पर उनके प्रयासों द्वारा अबूझमाड़ क्षेत्र को आम दुनिया से काट दिया गया और उसे एक आईसोलेटेड क्षेत्र बना दिया गया। दूसरा एक एक्टिविस्ट के तौर पर उन्होंने मावलीभाटा के पास बनने वाले स्टील प्लांट का विरोध किया; हालाकि बाद में उसका विरोध भी ब्रम्हदेव शर्मा को झेलना पड़ा था, दूसरे तरीके से। इन उदाहरणों से जुडा मेरा प्रश्न है कि क्या आप भी आदिवासी आईसोलेशन की प्रक्रिया को सही मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: दुनिया में जो भी विकास हुआ हैं, कुछ एक उदाहरणों को छोड दें तो आजादी के पहले से अब तक का जो पूरा हिन्दुस्तानी इतिहास हैं, वो सब संपर्कों पर आधारित इतिहास रहा  हैं।...कितने सारे आक्रमणों का दौर आया, मुगलो का युग आया और फिर अंग्रेज....अंग्रेज हमे कोई एज्युकेट करने नहीं आए थे। वो लोग तो भारत में अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिए आये थे। वह तो जो भी लोग उनके सम्पर्को में आये, उन लोगों ने सम्पर्को का फायदा उठाया। संपर्क तो एक कैरियर है, एक वाहक है। दूसरी बात जिसका उदाहरण आपने स्वयं दिया- ब्रम्हदेव शर्मा; जो कि एक ऑर्थोडॉक्स आईडियोलॉजी का प्रतीक है। ये तमाम बस्तर की परियोजनाओं के विरोध करने वाले लोग कहीं न कही इसी आईडियोलॉजी के फॉलोअर लोग हैं। आदिवासी आईसोलेशन सही नहीं है।

राजीव रंजन: कर्मा जी, क्या आदिवासी आईसोलेशन की प्रक्रिया भी बस्तर में नक्सलिज्म का एक कारण हो सकता है? 

महेन्द्र कर्मा: जी हाँ बिलकुल। आजादी के बाद, जैसे मैंने कहा कि यहाँ संपर्कों का अभाव बना दिया गया जिससे इस आदिवासी क्षेत्र में समस्यायें पैदा हुई। हमारा डेवलपमेंट कॉंसेप्ट बहुत ज्यादा त्रुटिपूर्ण है। हम शहरों से गाँवो की ओर धीरे-धीरे चले; हमको गांवों से शहरों की और चलना चाहिए। यह जो नक्सलवाद जिसे आप कह रहे हैं इसी का खामियाजा है। नक्सलवादियों नें भी तो उन्हीं क्षेत्रों को को आईसोलेटेड थे, जहाँ प्रशासन की पहुँच नहीं थी, जहाँ विकास की रोशनी नहीं पहुँचाई गयी; उसी क्षेत्र को अपना आधार इलाका बनाया है। और अब ये सभी क्षेत्र और अधिक आईसोलेट और विचलित हो गये हैं। आईसोलेशन तो सीधे सीधे कूपमण्डूकता हैं, समझ गए आइसोलेशन मतलब?.....अगर आज के दौर में हम किसी भी समाज को या एक समूह विशेष को पृथक रखने का, या आईसोलेट करने का कोई भी काम करते है तो हम एक बार फिर उन्हे अभिशप्त  जिन्दगी जीने को प्रेरित और बाध्य दोनो ही कर रहे हैं।

राजीव रंजन: कर्मा जी इतिहास पलट कर देखा जाये तो हम पाते हैं कि बस्तर के आदिवासी हमेशा से जुझारू रहे है तथा अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम रहे हैंक्या कारण रहा की उनकी लड़ाई लड़ने के लिए बाहर से लोगों को आना पड़ा जिनका दावा हैं कि वे बस्तर के आदिवासियों की लड़ाई लड़ रहे हैं; मेरा इशारा नक्सलियों की तरफ हैं?

महेन्द्र कर्मा: असल में तो नक्सली अपनी आईडियोलॉजी यहाँ के लोगों पर थोप रहे हैं इसके बाद भी वे यही सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं कि ये मूवमेंट उनका नहीं, आदिवासियों का हैं जबकि नक्सलवाद से आदिवासियों का कोई सम्बन्ध नही है, वो इसीलिए नही भी नहीं हैं, क्योंकि  आदिवासियों नें आजतक अपनी समस्याओं का निदान संविधान के दायरे से बाहर जा कर नहीं खोजा। वो संविधान के दायरे मे ही रहकर लोकतांत्रिक तरीके से, शांतिपूर्ण तरीके से, अपनी बात कहता रहा है। इसके साथ ही यह भी कहना चाहिये कि वो गूंगा भी नहीं है। उसकी अभिव्यक्ति के तथा अपनी बात को कहने के तरीके अलग हैं; इस तरह की हिंसा का उसका चहरा या तरीका नहीं है।

राजीव रंजन: इसी बात को आगे बढाते हुए मैं आपसे सलवा जुडुम की भी बात करना चाहूंगा। कर्मा जी मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि सलवा जुडुम का इतिहास क्या है तथा इसके आरंभ होने की क्या परिस्थिति थी?

महेन्द्र कर्मा: आपको याद होगा कि सलवा जुडुम से पहले एक जन जागरण अभियान भी चला था 89 से 91 लगभग दो सालों तक; बिल्कुल वैसे ही, ये भी चला था। घटना यह हुई कि एक गांव में...गाँव का नाम नहीं ले रहा हूँ नहीं तो उस गांव के लोगों को नक्सली मार देंगे। तो एक गाँव में नक्सलियों की बैठक चल रही थी; बिल्कुल रोड़ किनारे यह सब चल रहा था। फोर्स का राशन जा रहा था, ड्राइवर नक्सलियों से मिला हुआ था; अचानक वो रोड छोड़ कर गाँव की ओर मुड़ गया। बिल्कुल बगल मे ही नक्सली लोग मीटिंग कर रहे थे तो फोर्स वाले जो दो जो ऊपर बैठे थे वो भाग के आ गए और राशन को उनके हैण्डओवर कर दिया। नक्सली वो राशन को लूट लाट कर ले गए। दूसरे दिन फोर्स जाकर गांव के कुछ लोगों को उठा कर थाना ले आई। थाने में बैठे लोगों नें विचार किया कि एक गलत आदमी की वजह से गांव के सियाने लोगों को पुलिस क्यों बिठाएगी? तो उन लोगों नें पुलिस से कहा कि एक आदमी की वजह से गाँव के सभी बडे सियाने क्यों परेशान हों। वो लोग गाँव गये और दोषी को पकडकर ले आये और पुलिस के हवाले कर दिया। पकड के तो ले आये लेकिन फिर गाँव वालों में डर भी जगा कि अब अगर हमने लोगों को हमारे साथ नही जोड़ा तो नक्सली आकार हमारे गांव को तो भून देंगेइस प्रकार से वहाँ के नक्सलियों के खिलाफ डर से शुरु हो कर सलवाजुडुम एक प्रतिष्ठा की लड़ाई, स्वाभिमान की लड़ाई, आन-बान की लड़ाई बनता गया। यह घटना तो बस शुरूआत थी। वहाँ के लोगों ने तब दस गाँव के लोंगों कों बुलाया। कहते है, बड़े आन्दोलन की शुरूआत या एक बड़े विद्रोह की शुरूआत छोटे कारणों से होती रही हैं। इतिहास इस बात का गवाह है।....अपने समय के समकालीन लोग किसी ईवेंट को कैसे देखते हैं; किसी घटना को किस तरह लेते हैं; हम लोगों नें इसे वैसे ही देखा हैं। ये मई की घटना थी, 18-19 जून को मैं दिल्ली में था। वहाँ मै पेपर पढ कर इस घटना को देख-समझ रहा था, फिर मुझे लगा, वहाँ तुरंत जाना चाहिए, ऐसी जगह पर जहाँ लोग तो अपने आप आन्दोलन करने के लिये इकट्ठा हो रहे हैं लेकिन उनके लिये लीडरशीप का पता नही हैं। मेरे वहाँ पहुँचते-पहुँचते 26 तारीख लग गई। वहाँ पहुँचने के बाद मैने इसे सिस्टमेटिक ढंग से चलाने की कोशिश की है। सलवा जुडुम के उपर जो हत्या बलात्कार के आरोप जगाये गये हैं वो दुष्प्रचार है; जो भी नक्सलियों के खिलाफ कोई आन्दोलन खडा करने की कोशिश करेगा उसको इसी प्रकार से दबाने का षडयंत्र किया जाता है। सच यह है कि हम लोग न तो अपने ही लोगों को मार सकते हैं न उनका बलात्कार कर सकते हैं।       

राजीव रंजन: सलवा जुडुम को क्या आप एक सशस्त्र आंदोलन के खिलाफ एक दूसरा सशस्त्र  आंदोलन मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नही। ऐसा था ही नहीं। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी समस्या का समाधान मास-मूमेंट होता है और यह हमारा मास-मूमेंट था। वह सशस्त्र था ही नहीं। हम हजारो लोग जब विलेज टू विलेज मूव कर रहे तो हमारी सुरक्षा में एक फोर्स था। फोर्स को अपनी भूमिका निभानी होती है; आज कोई भी जंगल जाएगा कोई जाँच कमीटी भी जाएगी तो उसके लिए भी फार्स लगायी जायेगी; हम तो फिर भी नक्सलियों के खिलाफ में लड़ रहे थे। यह बिल्कुल सशस्त्र मूवमेन्ट नहीं था....बहुत ज्यादा हुआ तो हमने अपने परम्परागत हथियार को जिनमे टंगिया, कुल्हाडी, तीर-धनुष को अपने साथ रखा। सभी जानते हैं कि यह हमारे परम्परागत हथियार हैं; कुछ लोंगों ने इसे ही फोर्स अटैक बताया; जैसे हम सशस्त्र लड़ाई लड़ रहे हैं।

राजीव रंजन: सलवाजुडुम के समाप्त होने में आप किसकी भूमिका मानते हैं?

महेन्द्र कर्मा: नक्सलियों के खिलाफ जब भी कोई बात या मूमेंट या बहस फ्लोर पर होती है तो उसे बहुत योजनाबद्ध तरीके से डिफ्यूज किया जाता है; और एसा करने वाले बहुत अच्छी तरह इसे करने में अब तक सफल रहे है... समझ गए। इन दिनो एक रूझान सा देखने को मिल रहा हैं...एंटी सिस्टम बाते करना आम हो गया हैं। मुझे लगता है इस मामले को हम लोग सही तरह से उठा नहीं पाये; हम अपना सही प्रेजेंटेशन नहीं दे पाये; सही पूछिये तो हमने उसकी जरूरत भी नहीं समझी। जमीन पर तो हम अपना पक्ष रोज रख रहे थे, लेकिन दिल्ली, भोपाल तक हम लोग अपना प्रजेन्टेशन नहीं दे पाये...... हम इस बात की जरूरत नहीं समझ रहे थे। जब हम जंगल में जमीनी लड़ाई लड़ रहे हैं तो हमे क्या जरूरत है कि दिल्ली और भोपाल में जाकर अपना पक्ष रखें। जो हमारी खिलाफत करने वाले लोग है वो प्रेजेंटेशन दिल्ली भोपाल में लगातार देते रहे।....इसी से हम हार गये। बहुत जबरदस्त धक्का लगा हमारे मूमेंट को। इतने बडे पब्लिक मूमेंट में ठहराव आ गया है, आन्दोलन खत्म हो गया है....यही चाह रहे थे नक्सली और वे सफल रहे; हम लोग हार गए।

राजीव रंजन: तो आपको अफसोस है?

महेन्द्र कर्मा: बहुत ज्यादा, और वो अफसोस तब तक रहेगा जब तक नक्सलवादी रहेगें। ये अफसोस बना रहेगा जब तक हमें फिर नई शुरूआत कोई नयी लड़ाई नहीं मिल जाती।

राजीव रंजन: कर्मा जी तो अब प्रश्न उठता है कि इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है?

महेन्द्र कर्मा: अब तो ऐसा है कि यह बात सिर्फ बस्तर की ही नहीं रह गयी है; अब तो यह पूरे देश की बात है। इसका समाधान पब्लिक के पास हैं; सरकार के पास है; फोर्सेज के पास है और कहीं न कहीं इन सभी को कलेक्टिवली सामने आना ही पडे़गा। एक बड़े सपोर्ट के साथ में; एक बड़े वॉल्यूम के साथ में। आज हम लोग कहां हैं?...और वो लोग कितना जबरदस्त दबाव बनाते हैं, गाँव के मुखिया से ले कर, एक सरपंच से लेकर परम्परिक जो हमारे रूरल ट्रैडिशनल सिस्टम हैं इन सभी को क्रश कर के रख दिया  है।  न गायता हैं, न पुजारी, न कोतवाल है, न पटेल है,  न सरपंच है। गांव में अब कोई भी नहीं है। जो भी है वो उनका आदमी है; वो हमारे ट्रेडिशन सेटअप को रिलीजियस सिस्टम को टारगेट करता हैं....देखिये कि जो ट्राइबल है वह नेचर के साथ रहने वाला आदमी है; प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा है और उसका अपना एक डैली रूटीन भी है। वो अपने कस्टम-सिस्टम के साथ जीने वाला आदमी हैं। लेकिन नक्सलवादी ये चाहता है कि ट्राइबल उसका अपना जो कुछ है उसको छोड दे; अपने जीने का तरीका बदल दे; कस्टम-सिस्टम छोड दे। उसी बात को वह अब कहीं बोल नही सकता, कहीं सही तरह से अभिव्यक्त नही कर पाता। इसी लिये उसके अन्दर एक गुस्सा है; इसी बात से वह लड़नें के लिए ललायित है; यही एक फैक्टर है जो उसको टैम्पर कर रहा हैं.......... वो अपनी बेसिक पहचान खो रहा हैं। समाधान इस लिये नहीं हो रहा है कि बडी पॉलिटिकल विल चाहिये। जब तक किसी सरकार में  कुर्बानी देने के माद्दा नहीं आयेगा तब तक....। हमने पंजाब में देखा है, हमने नार्थईस्ट में देखा है कि सरकारों को आतंकवाद नें निगला है। अगर एसा ही रहा तो मुझे लगता है बहुत जल्दी इस देश मे वभी नेपाल की स्थिति बन सकती हैं क्योंकि इस आतंकवाद को कोई रोक ही नही रहा हैं।

राजीव रंजन: आदिवासी नेता छत्तीसगढ़ की राजनीती में कहाँ है?

महेन्द्र कर्मा: अब करवट ले रहा हैंआदिवासी नेतृत्व आगे आ रहा है। उसे अब आप रोक भी नहीं सकते। इतने बर्निंग प्वाईंट पर आदमी यहाँ पर स्ट्रगल कर रहा है, ऐसे आदमी की आवाज को ज्यादा रोका नहीं जा सकता है।

राजीव रंजन:  आपसे बहुत सी बाते हुईं; बहुत-बहुत धन्यवाद आपका!!!

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