Monday, November 29, 2010

अच्छा तो तुम वामपंथी नहीं हो? यानी कि दक्षिण पंथी हो? - राजीव रंजन प्रसाद



इस बात को साल भर से अधिक हो गया। मैंने बस्तर में जारी नक्सलवाद के खिलाफ किसी लेख में टिप्पणी की थी। उस दिन मेरे नाम को इंगित करते हुए एक पोस्ट “मोहल्ला” ब्लॉग पर डाली जिसका शीर्षक था – “बस्तर के हो तो क्या कुछ भी कहोगे?” और लिंक - http://mohalla.blogspot.com/2008/05/blog-post_24.html इस पोस्ट नें मुझे झकझोर दिया। मैं माओवाद को ले कर हो रहे प्रचार की ताकत जानता हूँ और चूंकि मेरा अपना घर जल रहा हैं इस लिये आतंकवाद और क्रांति जैसे शब्दों के मायने भी समझने लगा हूँ। मैंनें निश्चित किया कि बस्तर का एक और चेहरा है जो माओवाद और सलवाजुडुम की धाय धमक में कहीं छुप गया है। बस्तर की और भी तस्वीरें हैं जो लाल नहीं हैं और बस्तर वैसा तो हर्गिज नहीं जो अरुन्धति के आउटलुक से दिखाया गया। अपनी मातृभूमि बस्तर के लिये कहानियाँ, आलेख और संस्मरण लिखते हुए अचानक ही एक उपन्यास लिखने का विचार कौंधा। बस्तर के इतिहास और वर्तमान पर काम करने का फिर मुझमें जुनून सा सवार हुआ। मैंने केवल शोध के कार्य के लिये बस्तर भर की कई यात्रायें कीं और उन जगहों पर विशेष रूप से गया जहाँ जाना इन दिनों दुस्साहस कहा जाता है। यानि कि हम अपने ही घर, अपनी ही मिट्टी में निर्भीक नहीं घूम सकते?

मेरे बस्तर विषयक आलेख जब पत्र-पत्रिकाओं और ब्ळोग में प्रकाशित होने लगे तो मेरा दो तरह के स्वर से सामना हुआ। पहला स्वर जो मुझसे सहमत था और दूसरा जो असहमत। असहमति भी स्वाभाविक है, मैं उम्मीद नहीं कर सकता कि मेरी तरह ही सभी सोचें। सब एक तरह ही सोचते तो भी समाजवाद होता? लेकिन जो बात सबसे अधिक विचारणीय है वह है सोच की खेमेबाजी, सोच का रंग और सोच का झंडा। कोई तर्क करे तो समझ में आता है, कोई विचार रखे और उद्धरण दे तो भी समझ में आता है यहाँ तक कि किसी के अनुभव सामने आयें वह विरोधाभासी भी हों तो भी सोच को जमीन देते हैं। लेकिन “खास तरह के खेमेबाजों का” एक मजेदार विश्लेषण है – आप वामपंथी नहीं हो तो आप संघी हो या दक्षिणपंथी हो?

मैं बहुत सोचता हूँ कि आखिर क्या हूँ मैं? उम्र के पन्द्रह साल से ले कर लगभग सत्ताईस साल तक अपने नाम के आगे कामरेड सुनना अच्छा लगता था। इप्टा से जुड कर में नुक्कड भी किये, गली गली जनगीत भी गाये,  हल्ला भी बोला इतना ही नहीं उस दौर के लिखे हुए मेरे अनेकों नाटक लाल सुबह ही उगाते हैं जिनमें प्रमुख हैं – किसके हाँथ लगाम, खबरदार एक दिन, और सुबह हो गयी आदि आदि। किसके हाँथ लगाम की एक प्रस्तुति ‘भारत-भवन’ में तथा मेरे नाटकों की कई प्रस्तुतियाँ भोपाल के रवीन्द्र भवन में भी हुई हैं। तब की लिखी मेरी कहानियों के अंत में हमेशा ही लाल सुबह होती रही थी। लेकिन बहुत कुछ तब दरका जब तू चल मैं आया वाले प्रधानमंत्रियों का दौर आया और वामपंथी दलों की अवसरवादिता नें मेरे सिद्धांतों की कट्टरता को झकझोर दिया। धर्म को जनता की अफीम मानने वाले एक दिवंगत कामरेड की पहचान हमेशा उनकी पगडी से ही रही। पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लडने वाले कई छत्रप अपने बेटों के लिये लाल कालीन की जुगाड में ही दिखे। उनका श्रम भी रंग लाया और कुछ फैक्ट्री मालिक है तो कुछ सी.ई.ओ। मैं धीरे धीरे प्रायोजित विरोध और स्वाभाविक विरोध के अंतर को समझने लगा हूँ।

एसे ही एक दिन जब मैं अपने घर बचेली पहुँचा तो अपनी डायरी ले कर जंगल जाने लगा। जंगल में सिम्प्लेक्स नाले पर एक पत्थर मेरी टेबल-कुर्सी दसियों साल से ‘था’। यहाँ पानी में पैर डाले घंटों अपनी किताबों के साथ मैं समय गुजारा करता था। दसवी और बारहवी में अपने प्रिपरेशन लीव के दौरान भी मैं यहीं सारे सारे दिन बैठ कर पढा करता था। यहीं मैने कई वो कहानियाँ और नाटक भी लिखे जिनके अंत में मुक्के तन जाने के बाद धरती समतल हो गयी और एक सी धूप फैल गयी। इस बार जब मम्मी नें जंगल में उस ओर जाने से रोक दिया। कारण था नक्सलवाद। एसा प्रतीत हुआ जैसे किसी नें मुझे मेरे ही घर में घुसने से रोक दिया। उस दिन मैने गहरे सोचा कि एसा क्यों है कि मैं उदास हूँ? मुझे तो खुश होना चाहिये था कि वैसा ही हो रहा है जैसा मेरी कहानियों में होता था कि क्रांतिकारी बंदूख ले कर उग आये हैं और ढकेल कर लाल सवेरा के कर आने ही वाले हैं? मैंने अपनी कहानियों को टटोला लेकिन उनमें कहीं बारूदी सुरंग फाड कर सुकारू और हिडमाओं की ही लाशों के अनगिनत टुकडे किये जाने की कल्पना नहीं थी। मैंने जब भी क्रांतिकारी सोचे तो वो भगतसिंह थे। उनकी नैतिकता एसी थी कि असेम्बली में भी बम फेंके तो यह देख कर कि कोई आहत न हो लेकिन बात पहुँच जाये। बस्तर के इन जंगलों में जो धमाके रात दिन हो रहे हैं क्या ये बहरों को सुनाने के लिये हैं? नहीं ये अंधों की लगायी आग है और दावानल बन गयी हैं। ये सब कुछ जला देगी खेत-खलिहान भी, महुआ-सागवान भी, आदिम किसान भी।              
                           
नहीं मैं लाल नहीं सोचता, हरा नहीं सोचता, भगवा नहीं सोचता, नीला पीला या काला कुछ नहीं सोचता। मेरी सोच को मेरी लिये बख्श दो भाई। चूल्हे में जायें सारे झंडे और सारे नारे। तुम उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम, साम, दाम, वाम जो भी हो मुझे ये गालिया न दो। मैने बहुत सी कहानिया जला दी हैं बहुत से नाटक अलमारी में दफन कर दिये हैं और अब मैं वही लिखता हूँ जो मैं खुद सोचता हूँ अपने बस्तर के लिये।  

Thursday, October 28, 2010

घने जंगल में खूबसूरत फूल: चंद्रू [एक संस्मरण, बस्तर के जंगलों से] – राजीव रंजन प्रसाद



बात कोई तेरह -चौदह वर्ष पुरानी है। उस रात जब केवल मेरे कमरे में आया तो उसके चेहरे में एक चमक थी। पत्रकारों को किसी नई कहानी के मिलने का एसा ही सुकून होता है जैसा ताजी कविता लिखी जाने के बाद पहले श्रोता को उसे सुना दिये जाने का। चन्द्रू आज उसकी कहानी था। नारायणपुर के जंगलों से थके हारे होने की थकान कहीं नहीं दिखती थी बल्कि वह अपनी उपलब्धि के एक एक पल और वाकये से मुझे अवगत करा देना चाहता था।

केवल अपने यायावर स्वभावानुकूल उन दिनों “दण्डकारण्य समाचार” छोड कर देशबंधु से जुड गया था। देशबंधु अखबार ने ही “हाईवे चैनल” नाम के सान्ध्य अखबार का आरंभ किया था जिसके स्थानीय अंक का कार्यभार देखने के उद्देश्य से केवल उन दिनों जगदलपुर में ही था।

“मुझे आलोक पुतुल नें फोन कर के बताया कि बस्तर में किसी आदिवासी लडके पर फिल्म बनी है और उस पर स्टोरी करनी चाहिये। मुझे मालूम था कि ये असंभव सा काम है। मुझे आगे पीछे की कोई जानकारी नहीं थी। न फिल्म का नाम पता था न किसने बनाई है वो जानकारी थी।” केवल के स्वर में अपनी खोज को पूरी किये जाने का उत्साह साफ देखा जा सकता था।

“अबे ‘बस्तर एक खोज’ तू स्टोरी तक भी पहुँचेगा कि सडक ही नापता रहेगा।”  मैंने स्वभाव वश उसे छेड दिया था।

“तू पहले पूरी बात सुन लिया कर।...। मैं अपना ‘क्लू’ ले कर बसंत अवस्थी जी के पास गया उन्होंने मुझे किन्ही इकबाल से मिलने के लिये कहा जो आसना में रहते हैं। उनसे इतना तो पता चला कि नारायणपुर के किसी आदिवासी पर एसी फिल्म बनी है। तुरंत ही मैनें “नारायणपुर विशेष” लिखने के नाम पर अपना टूर बनाया लेकिन दिमाग में यही कहानी चल रही थी। नारायणपुर पहुँच कर बहुत कोशिशों के बाद मुझे चन्द्रू के विषय में जानकारी मिली”

“आखिरकार तेरी सडक कहीं पहुँची तो..” मैने मुस्कुरा कर कहा। हालांकि मैं जिज्ञासु हो गया था कि यह चंद्रू कौन है? कैसा है? उसपर फिल्म क्यों बनी?

“ये अंतराष्ट्रीय फिल्म का हीरो चन्द्रू उस समय घर पर नहीं था जब मैं गढबंगाल में उसके घर पर पहुँचा। वो झाड-फूंक करने पडोस के किसी गाँव गया हुआ था” केवल नें बताया।

“कैसा था चंद्रू का घर” मैंने अनायास ही बचकाना सवाल रख दिया। मेरी उत्कंठा बढ गयी थी।

“जैसा बस्तरिया माडिया का होता है। तुझे क्या मैं शरलॉक होम्स की स्टोरी सुना रहा हूँ? वही मिट्टी का मकान, वही गोबर से लिपी जमीन, वही बाँस की बाडी।...। मुझे वहाँ बहुत देर तक उसका इंतजार करना पडा।“

“मुलाकात हुई?” यह प्रश्न जानने की जल्दबाजी के कारण मैंने किया था।

“मुलाकात!!! उसे अब न फिल्म में अपने काम की याद थी न फिल्म बनाने वालों की। उसके लिये फिल्म एक घट गयी घटना की तरह थी जिसके बाद वह लौट आया और फिर आम बस्तरिया हो गया। उसकी जीवन शैली में कोई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म का हीरो नहीं था यहाँ तक कि उसकी स्मृतियों या हावभाव में भी एसा कुछ किये जाने का दर्प या आभास नहीं था....”

“कितनी अजीब बात है न?”

“अजीब यह भी था कि उसके पास अपने किये गये काम की कोई जानकारी या तस्वीर भी नहीं थी। बहुत ढूंढ कर उसने एक किताब निकाल कर दिखाई और बताया कि इसमें उसकी फिल्म की तस्वीर है। वह इतनी बुरी हालत में थी कि उसे किताब नहीं कह सकते थे। अंग्रेजी की इस पुस्तक को मैने जानकारी मिलने की अपेक्षा में उससे माँग लिया।“

“वो क्यों देगा? उसके पास वही आखिरी निशानी रही होगी अपने काम की?”

“वही तो आश्चर्य है। उसने बडे ही सहजता से पुस्तक मुझे दे दी। मैं उसे लौटा लाने का वादा कर के उसे ले आया हूँ। किताब को अभी सिलने और बाईंड कराने के लिये दे कर आ रहा हूँ।”
केवल नें चंद्रू का एक चित्र सा खींच दिया था। मेरी कल्पना में वह “मोगली” या “टारजन”जैसा ही था। चंद्रू को सचमुच क्या मालूम होता कि उसने क्या काम किया है या कि उसने केवल को जो पुस्तक दी है खुद उसके लिये कितने मायने रखता है। जंगल से अधिक उसके लिये शायद ही कुछ मायने रखता होगा?

केवल से मैं उसकी इस कहानी के विषय में जानने की कोशिश करता रहा। उसने कहानी अलोक पुतुल को देशबंधु कार्यालय भेज दी थी। आलोक नें उस कहानी में श्रम कर तथा उसमें अपने दृष्टिकोण को भी जोड कर संवारा और फिर यह देशबंधु  के अवकाश अंक में प्रकाशित भी हुआ। चंद्रू को चर्चा मिली और यह भी तय है कि अपनी इस उपलब्धि और चर्चा से भी वह नावाकिफ अपनी दुनिया में अपनी सल्फी के साथ मस्त रहा होगा। उन ही दिनों इस स्टोरी पर चर्चा के दौरान ही केवल नें मुझे बताया था कि संपादक ललित सुरजन अवकाश अंक पर इस स्टोरी के ट्रीटमेंट से खुश नहीं थे और उनकी अपेक्षा इस अनुपम कहानी के ‘और बेहतर’ प्रस्तुतिकरण की थी। यद्यपि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। न तो केवल की और न ही चन्द्रू की।

केवल के साथ मैं धरमपुरा में दादू की दुकान पर चाय पी रहा था। केवल की आवाज में आज चन्द्रू की बात करते हुए वह उत्साह नहीं था।

“तूने चन्द्रू को किताब वापस कर दी?” मैने बात आगे बढाई।


“हाँ, मैं किताब और अखबार की रिपोर्ट के साथ नारायणपुर जा रहा था। कांकेर में कमल शुक्ला से मिलने के लिये रुक गया। वही एक और पत्रकार साथी हरीश भाई मिले। स्टोरी को पढने के बाद वो इतने भावुक हो गये कि उसे ले कर कही चले गये...जब लौटे तो उनके हाथ में एक फोटोफ्रेम था जिसमें यह खबर लगी हुई थी।“

“फिर तू चन्द्रू से मिला?”

“मैं जब गढबंगाल पहुँचा तो चन्द्रू घर पर नहीं था। घर के बाहर ही चन्द्रू की माँ मिल गयी जो अहाते को गोबर से लीपने में लगी हुई थी।“

“तूने इंतजार नहीं किया?”

“नहीं मैं देर शाम को ही पहुँचा था और मुझे लौटना भी था। जब मैने अपने आने का कारण चन्द्रू की माँ को बताया और उसे जिल्द चढी किताब के साथ फोटो फ्रेम में मढी खबर दी...”

“खुश हो गयी होगी?”

“नहीं। उसने जो सवाल किया मैं उसी को सोचता हुआ उलझा हुआ हूँ”

“तू भी पहेलियों में बात करता है”

“चन्द्रू की माँ ने कुछ देर फोटो फ्रेम को उलटा-पलटा। अपने बेटे की तसवीर को भी देखने की जैसे कोई जिज्ञासा उसमें दिखी नहीं..फिर उसने मुझसे कहा – ‘तुम लोग तो ये खबर छाप के पैसा कमा लोगे? कुछ हमको भी दोगे?”

“फिर?” मुझे एकाएक झटका सा लगा।

“पहले पहल ये शब्द मुझे अपने कान में जहर की तरह लगे। फिर मुझे इन शब्दों के अर्थ दिखने लगे। मैने शायद पचास या साठ रुपये जो मेरे पास थे उन्हे दे दिये थे और अपने साथ यही सवाल के कर लौट आया हूँ कि ‘हमको क्या मिला?’...” केवल नें गहरी सांस ली थी।

आज बहुत सालों बाद चन्द्रू फिर चर्चा में है। जी-टीवी का चन्द्रू पर बनाया गया फीचर ‘छत्तीसगढ़ के मोगली’ को राज्योत्सव में सम्मानित किया जा रहा है। मैं स्तब्ध हूँ कि चन्द्रू को खोज निकालने वाला केवलकृष्ण, उसे ढूंढ निकालने की सोच वाला आलोक पुतुल...कोई भी तो याद नहीं किया जा रहा। मैं आज फिर चन्द्रू की माँ के उसी प्रश्न को भी देख रहा हूँ जो कि पुरस्कार और उत्सव बीच निरुत्तर भटक रहा है – “हमें क्या मिला?”

Tuesday, February 23, 2010

माओवादियों का “सीजफायर” और दिनकर की “शक्ति और क्षमा”

रात जब संचार माध्यमों नें चीखना आरंभ किया कि माओवादियों नें बहत्तर दिनों के सीजफायर का एलान किया है तो जिज्ञासा इस बात की थी कि उनकी शर्ते क्या हैं? हम महान देश के वासी हैं, हमसे आतंकवादी भी अपनी शर्तों पर बात करते हैं। शर्त स्पष्ट है – ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद होना चाहिये। लाल-आतंक के लम्बरदार किशन नें जब यह शर्त सार्वजनिक की तो तुरंत ही मेरा ध्यान दिनकर की प्रसिद्ध कविता “शक्ति और क्षमा” की ओर गया। कविता की एक एक पंक्ति इस घटना से भी जुडती है आईये प्रसंग और संदर्भ के साथ इसकी व्याख्या करें।

अनेकों बारूदी सुरंग विस्फ़ोट हुए, हजारों करोड की सरकारी संपत्ति स्वाहा कर दी गयी, अनेकों अपहरण, फिरौतियाँ और कत्लेआम भी जारी रहे किंतु गणतंत्र की साठवी वर्षगांठ बनाने वाले हम खामोश ही रहे। हमें पाकिस्तान की चिंता थी चूंकि उनके घर की आग में हाथ सेकते हमे मजा आ रहा था। हम रस ले कर सुनते रहे कि कैसे तालिबानी निर्ममता से हत्यायें करते हैं, कैसे बम-बंदूखों के तकिये पर सोते हैं। ठीक इसी वक्त लाल-आतंक तालिबानियों की ही रणनीति पर देश के जंगलों की आड में पनपा। उनकी हर गुस्ताखी पर हमनें कंधे झटके और अपने साहसी सैनिकों की शहादत पर कुछ घडियाली आँसुवों को बहाने के सिवा कुछ भी नहीं किया। दिनकर नें चेताया भी था कि -

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे, कहो, कहाँ कब हारा ?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष, तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको, कायर समझा उतना ही।

सहनशीलता एक सीमा से अधिक दुर्गुण है। लाल आतंक के डैने फैलते रहे और हम उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के दिखाये सब्ज बाग की हरी भरी सब्जियाँ खाते रहे कि एक दिन क्रांति हो जायेगी और व्यवस्था बदलेगी। सवाल यह कि जिन्हे व्यवस्था से शिकायत है वो सडक पर आयें अपने ठोस सिद्धांतों और वाद-विचार के साथ जनता के बीच जायें, उन्हे जागृत करें तथा मुख्यधारा ही उन्हे एसे बदलाव का रास्ता देती है जहाँ आपके साथ अगर जनता हो तो परिवर्तन अवश्यंभावी है। बंदूख ले कर मासूम आदिवासियों और नीरीह ग्रामीणों की हत्याओं से हिंसा फैला कर क्रांति की आशा भी बेमानी है और वास्तविकता में यह लुटेरापना है।

हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकानें “लाल” माध्यमों से चलती हैं। इस वाद के कर्ता-धर्ता इकट्ठा होने में बेहद यकीन रखते हैं। एक जैसी बात बोलेंगे, एक जैसा लिखेंगे, एक दूसरे की पीठ खुजायेंगे और केवल एक दूसरे को ही पढेंगे। यकीन नहीं होता तो आज किसी भी स्कूल में किसी भी कक्षा में जा कर समकालीन कवियों/लेखकों का नाम ले कर पूछिये उन्हें जानने वालों में किसी के हाथ शायद ही कभी उठते हैं लेकिन साहित्य के ठेकेदारों के पास जाईये तब पता चलता है कि भईया आज कल फलां-फलां समकालीन हैं। खैर फिर वही बात कि जिनकी लेखनी में इतना गूदा भी नहीं कि जन-जागृति करा सकें वे बंदूख से क्रांति के लिये अखबारों के कॉलम और टीवी के फीचर रचते हैं। देखिये हमारी सहनशीलता कि हम इन्हे बर्दाश्त भी करते हैं और नपुंसकों की तरह इनकी न समझ में आने वाली कविताओं/रचनाओं पर तालियाँ भी पीटते हैं। लाल आतंक इसी तरह की बुद्धिजीविता की आड में पनपा और हम इन्हे धिक्कारने की बजाये खामोश और सहनशील रहे। दिनकर कहते हैं -

अत्याचार सहन करने का, कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज, कोमल होकर खोता है।

मैं बस्तर की बात करूंगा। जब आदिवासी आंदोलित हुए और नक्सलवादियों के खिलाफ हथियार उठा लिया तब एक बडी क्रांति हुई। लाल-आतंक और उनके प्रचारक लेखकों को पहले तो यह समझ ही नहीं आया कि आखिर आम आदमी इस तरह अपने मामूली तीर धनुष और नंगा-चौडा सीना लिये नक्सलियों की इम्पोर्टेड बंदूखों के आगे कैसे खडा हो गया। बाद में लाल-प्रचारकों नें आम आदिमों की इस दिलेरी को सरकार-प्रायोजित बता दिया और मीडिया/पुस्तके/अखबार रंग दिये। नक्सलियों के मानव अधिकार पर ए.सी कमरों में कॉकटेल पार्टियाँ हुईं तथा लोगों को गुमराह करने का अभियान जारी रहा। इनकी फंतासी का खैर जवाब भी नहीं लेकिन यह देश इन्हे हर बार क्षमा ही करता रहा....आखिर कब तक। दिनकर कहते हैं -

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ।

नक्सलियों को हाथी के दाँत दिखा कर काबू में नहीं किया जा सकता था। आतंकवाद से लडने के लिये शास्त्रार्थ से काम चलेगा भी नहीं वर्ना तो बहुत सी महान समाजसेविका टाईप लेखिकायें/लेखक हैं जो इसके लिये विदेशी पैसे से बडे बडे प्रेस कॉंफ्रेंस करती है, भूख हडताल-वडताल करती/करते और करवाती/करवाते हैं। उनसे मीडिया अपने हर कार्यक्रम में बैठा कर संवाद अदायगी करवाता रहता है। खैर मीडिया के काम में बोलने वाले हम कौन? लोकतंत्र का पाँचवा खंबा है जो कि सबसे अधिक पॉलिश्ड है, यहाँ तक कि उसे भीतर लगी दीमक दिखती नहीं है।

सरकारी तंत्र हाँथ जोडे नक्सलियों के आगे पीछे दशकों से घूमता रहा कि “मान जाओ भईया-दादा” लेकिन हाल वैसा ही जैसे सागर नहीं माना था और राम तीन दिवस तक रास्ता ही माँगते रहे। रास्ता तब बताया गया जब राम नें धनुष को अपने कंधे से उतार कर संधान किया -

तीन दिवस तक पंथ मांगते, रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द, अनुनय के प्यारे-प्यारे ।
उत्तर में जब एक नाद भी, उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की, आग राम के शर से ।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि, करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की, बँधा मूढ़ बन्धन में।

ऑपरेशन ग्रीन हंट का नक्सलवाद समर्थक बुद्धिजीवियों/पत्रकारों/मीडिया कर्मियों और लालबुझक्कडों नें खुल कर विरोध किया, लेकिन देखिये राम नें धनुष में अभी प्रत्यंचा ही तो चढाई है, वार्ता की टेबल माओवादियों ने सजा ली है। वे जानते हैं कि जब लिट्टे नहीं रहा जब तालिबान नप गये तो इनकी भी वो सुबह आ ही जायेगी। वार्ता की पेशकश वस्तुस्थिति में ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता पर मुहर है। नक्सलवाद से निर्णायक मुक्ति का समय आ गया है। वार्ता माओवादियों की शर्तों पर नहीं सरकार की शर्तों पर होनी चाहिये साथ ही नक्सल समर्थी बुद्धिजीवी सारी परिस्थिति पर पानी फेर देंगे इस लिये सीधे माओवादी और सरकार ही सीधे बात करे तब शायद किसी दिशा पर पहुँचा जा सकेगा। यहाँ भी यह सजगता आवश्यक है कि इस सीजफायर की नौटंकी का माओवादी कहीं अपनी ताकत बढानें में इस्तेमाल न करें। दिनकर नें रास्ता बताया है –

सच पूछो , तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की ।
सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है।

Friday, February 19, 2010

नक्सलवादी, आतंकवादी और भगत सिंह

कुहु बिटिया अब हाथी-घोडे की कहानियों से आगे आ गयी है, क्यों न हो वह अब कक्षा दूसरी में जो जाने वाली है। आज मैंने भगत सिंह से उसका परिचय कराया।

“बेटा भगत सिंह नें संसद के भीतर बम और आजादी के पर्चे फेंके” मैं कहानी सुना रहा था।

”लेकिन पापा बम क्यों फेंका इससे तो कितने लोग मर गये होंगे न?” कुहू नें बहुत मासूम सवाल किया।

”नहीं बेटा वो क्रांतिकारी थे, उनका मक्सद किसी को मारना नहीं था। बस जैसे पटाखे जोर से आवाज करते हैं न वैसी ही आवाज वो संसद के भीतर पैदा कर के अपनी माँगों की तरफ कानून बनाने वाले लोगों का ध्यान खींचना चाहते थे”।

“फिर क्या हुआ पापा”

”बेटा अंग्रेजों को उनका यह कदम इतना गुस्से से भर गया कि उन्होंने भगत सिंह को फाँसी पर लट्का दिया?”

“पर पापा फिर बम फेंक कर आवाज करने से तो कोई फायदा नहीं हुआ?”

”बेटा यह आवाज बहुत असर करने वाली थी, इससे पूरे देश में जोश और क्रांति की लहर दौड गयी। इतना विरोध बढ गया कि अंग्रेजों को भारत छोड कर जाना पडा, इस तरह अपना बलिदान दे कर इस क्रांतिकारी नें असंभव काम कर दिखाया”

”पापा तब तो नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते न” कुहू नें अपना मासूम सवाल मुझसे आँखों में आँखें डाल कर किया। मैं बेहद आश्चर्य से भर उठा चूंकि इस उम्र के मासूम बच्चे से इस तरह के प्रश्न की उम्मीद की नहीं जा सकती थी।

“तुम्हे नक्सलवादी कैसे पता बेटा” मैंने कुहु को गोद में उठा लिया था।

“पापा मैंने टीवी में देखा था वो लोग बम फोडते हैं और क्रांति करते हैं” बिटिया नें बेहद सहजता से उत्तर दिया।

“तो फिर तुम्हे क्यों लगा कि नक्सलवादी क्रांतिकारी नहीं होते?”

“क्योंकि पापा वो तो कितने सारे लोगों को मार देते हैं”

इस उत्तर से मैं सिहर गया था। पिछले दो दिनों से टीवी पर मिदनापुर के नक्सली हमले में चौबीस मौतें, सहरसा के नक्सली हमले में ग्यारह मौतें ब्रेकिंग न्यूज थी। फिर मैंने महसूस किया कि बच्ची नें क्रांति का बुनियादी अर्थ तो जान ही लिया है।

“तो फिर नक्सलवादी कौन होते हैं पापा?”

“आतंकवादी” मैंने कहा।

Tuesday, February 16, 2010

बंगाल में हुए नक्सली हमले पर खामोश मीडिया, मानवादिकारवादी और लेखक [श्रद्धांजलि आलेख]

कोई आश्चर्य नहीं कि चौबीस घंटे भी नहीं बीते और पश्चिम बंगाल में नक्सली हमले की खबर मीडिया के सर से सींग की तरह गायब हो गयी। देश और दुनियाँ में बहुत सी खबरे हैं जिसके लिये हमारे देसी जेम्स बॉंड जुटे हुए है और बहुत सक्रिय हैं। कोई महानायक को महानालायक सिद्ध करने में तुला है तो कोई मुम्बई हमलों के पीछे की कफन खसोटी को बेनकाब कर देना चाहता है। जाहिर है आतंकवाद के हिन्दुकरण और मुसलमानी करण से टी. आर. पी की रोटी बहुत आसानी से सेकी जा सकती है लेकिन आतंकवाद के तालिबानीकरण यानि कि नक्सलवाद से किसी को कोई वास्ता नहीं। मेरे क्षोभ को शब्द बनने तक चौबीस पुलिस वाले शहीद हो गये थे और जाने कितने लापता, मैं अब जानने लगा हूँ कि इस क्रांति के लम्बरदारों के झंडे लाल क्यों हैं, आखिर लहू उन्हे कितनी सहजता से सुलभ है।

मारे गये पुलिस वाले चार्ल्स डार्विन की इजाद किस प्रजाति के थे पता नहीं चूंकि इस देश का मानवाधिकार उन्हे हासिल ही नहीं। व्यवस्था पर चोट के नाम पर कभी बारूदी सुरंग में चिथडे हो जाते हैं कभी विदेशी हथियारों के आगे बेबस उनकी पुरानी रायफलें उन पर कफन धर देती हैं। मोमबत्तियों उन घरों में भी जलो जहाँ उजाला करने की हिम्मत अब किसी सूरज के बाप में भी नहीं है। क्रांति में सब जायज है तो फिर इन चौबीस-पच्चीस विधवाओं और सौ-पचास अनाथों से क्या वास्ता। एक दिन जब भूत बसेंगे तो इनका समाजवाद होगा।

एसी घटनाओं के बाद माननीय लेखक गण कुछ दिन अपनी दुम किसी बिल में घुसाये रखते हैं फिर फिजा के शांत होते ही उनकी क्रांतिकारी खुजास उजागर होने लगती है। हुजूर आपकी तो सुबह ही सुबह है फिर किस सबेरे को आवाज देते हो? आपकी लाल लॉबी आपकी पीठ खुजाने को दोनों हाँथों से तत्पर है, आपको पुरस्कारों से नवाजा जाना तय है, आपको महान लेखक सिद्ध करने के लिये आपकी किताबों पर अनेक चारणों द्वारा “जगदीश हरे” गाया जाना तय है। यह सच्चाई है और बेहद कडुवी कि इस देश में हिन्दी का लेखक कलम का नही छपास का पुजारी है। कुछ एसे प्रकाशन और कुछ एसी पत्रिकायें (नाम लेने की आवश्यकता मैं नहीं समझता) जो इसी तरह के “गिव एण्ड टेक” पर चलती हैं उनमें जिन्दा रहने ले लिये लाल-घसीटी करनी ही पडती है वर्ना खेमे से बाहर। तो मजाल है कि माननीय नक्सलवादियों से विमुख वे कुछ कह गुजरे....बाप रे बाप, लेखक कहलाये जाने पर लात पड़ जायेगी।

तो इस सारे जहाँ से अच्छा में कुछ माननीय पत्रकार, अनेकों विख्यात मानवाधिकार वादी और महान लेखक जिस आतंकवाद के समर्थक हों वहाँ कुछ पुलिस वालों की मौत पर श्रद्धांजलि भी क्या होगी? मैं मोममत्ती ले कर नहीं खडा हूँ बस पूरी विनम्रता से अपनी श्रद्धा उन पुलिस वालों की शहादत को अर्पित करता हूँ। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति प्रदान करे और आपके परिवार को यह दुख सहन करने की शक्ति दे।

Tuesday, February 02, 2010

भूमिपुत्र [मुम्बई को जागीर समझने वालों पर मेरा विरोध]


बहुत से जानवर
इलाका बनाते हैं अपना
जिसके भीतर ही
भौंकते-किचकिचाते हैं,
थूकते-चाटते हैं,
और कोने किनारे पाये जाते हैं
टाँग टेढी किये।
मजाल है घुस जाये कोई?
वो मानते हैं कि हम
अपनी गली के शेर
बखिया उधेड सकते हैं
कभी भी-किसी की भी
इलाका अपना है....

एक आदमी, एक रोज
जा रहा था कहीं
काट खाया उसे उसकी ही गली के
किसी सिरफिरे “कुक्कुरश्री” नें
बस तभी से हाल है
खुजलियाँ हो गयीं
काट खाने को फिरता है देखे जिसे
हो मजूरा कि हो टैक्सी ड्राईवर
उसके चश्में में हो आदमी अजनबी।

पंजाब से उसको गेहूँ मिले
धान उसका बिहारी है पर क्या करें?
संतरे से ही गर पेट भरता तो फिर
उसको कश्मीर के सेब क्योंकर मिलें?
उसका सूरज अलग/उसका चंदा अलग
काश होता तो राहत से सोता तो वो
सबका खाता है और ‘मल’ किये जा रहा
और मलमल में मचला के कहता है वो
गाल बजता है और थाल में छेद है
टूट होगी जहाँ से वही सूत्र हूँ
भूमिपुत्र हूँ।

Wednesday, January 20, 2010

मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ [वसंत पंचमी पर - वंदना]


वीणा के तार से गीत बजें
मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ


मेरे आँसू, मेरी आहें,
मेरे अपने हैं रहने दो
पलकों के गुल पर ठहर
कभी बहते हैं, बहने दो

सुख की थाती का क्या करना
करने दो दुख को क्रीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीडा माँ

देखो बिखरी है भूख वहाँ,
परती हैं खेत बारूद भरे
हर लाश है मेरी, कत्ल हुई
मेरे ही नयना झरे झरे

पीड़ा पीड़ा की क्रीड़ा है
हर लूँ, मुझको दो बीड़ा माँ
वीणा के तार से गीत बजे
मैं गा लूं जग की पीड़ा माँ

(विद्यालय काल के एक मित्र के अनुरोध पर यह रचना पाठको के सम्मुख रख रहा हूँ। रचना लगभग 18 वर्ष पुरानी है, तथापि अपेक्षा है पाठक निराश नहीं होंगे)

Wednesday, February 04, 2009

हजार पच्यासीवें का बाप [बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ] - राजीव रंजन प्रसाद

दिल्ली में बैठा हूँ और सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित अखबार भौंक गया है, बस्तर के जंगलों में क्रांति हो रही है। लेखिका पोथी पढ पढ कर पंडित हैं, कलकत्ता से बस्तर देखती हैं। दिख भी सकता है, गिद्ध की दृष्टि प्रसिद्ध है, कुछ भी देख लेते हैं। वैसे लाशों और गिद्धों का एक संबंध है और कुछ लेखक इस विषय पर शौकिया लिखते हैं। 

दुनियाँ वैसे भी छोटी हो गयी है, रुदालियाँ किराये पर चुटकियों में उपलब्ध हैं। कुछ एक रुदालियाँ अपने बाँध-फोबिया के कारण जगत प्रसिद्ध हैं, जा कर उनके कान में मंतर भर फूँकना है कि फलाँ जगह बाँध बनना है पूरे दलबल के साथ रोने के लिये हाजिर। रोती भी इतनी चिंघाड चिंघाड कर हैं कि दिल्ली में बाकी काम बाद में निबटाये जाते हैं पहले इनके मुख में निप्पल डालने का इंतजाम जरूरी हो जाता है। एक आध रुदालियाँ तो लिपस्टिक पाउडर लगा कर कुछ भी बोलने के लिये खडी हैं, कैमरे में कुब्बत होनी चाहिये इन्हे बर्दाश्त कर पाने की। हाल ही में बक गयी कि कश्मीर को आजाद कर दो, जैसे इनकी बनायी चपाती है कश्मीर। डेमोक्रेसी है यानी जो जी में आया बको, न बक सको तो लिखो, न लिख सको तो किराये के पोस्टर उठाओ और शुरु हो जाओ ‘दाहिने’ ‘बायें’ थम। 

वह बुदरू का बाप था। “हजार पच्च्यासीवे का बाप” लिखूँगा तो थोडा फैशनेबल लगेगा। हो सकता है कोई बिचारे पर तरस खा कर पिच्चर-विच्चर भी बना दे। मौत तो कई गुना ज्यादा हुई हैं और कहीं अधिक बरबर, फिर भी आँकडे रखने अच्छे होते हैं। आँकडे मुआवजों से जुडते हैं, आँकडे हों तो मानव अधिकार की बाते ए.सी कॉंफ्रेस हॉल में आराम से बैठ कर न्यूयॉर्क में की जा सकती हैं। हजार पच्च्यासीवें का बाप सरकारी रिकार्ड में इसी नम्बर की लाश का बाप था। वह इस देश में चल रही क्रांति के मसीहाओं के हाँथों मारा गया एक आदिम भर तो था। उसके मरने पर कौन कम्बख्त बैठ कर उपन्यास लिखेगा? 

उपन्यास लिखने के लिये बुदरू को कम से कम मिडिल क्लास का होना चाहिये, वैसे यह आवश्यक शर्त नहीं है। आवश्यक शर्त है उसका चक्कर वक्कर चलना चाहिये। रेस्टॉरेंट में बैठ कर पिज्जा गटकते हुए उसे लकडी, हथौडा, पत्थर, मजदूर, यूनियन, मार्क्स और लेनिन पर सिगरेट के छल्ले उडाते हुए डिस्कशन करना आना चाहिये। ‘केरेक्टर’ के पास होनी चाहिये एक माँ, जमाने की सतायी हुई। आधी विक्षिप्त टाईप, जिसके चश्मे का नम्बर एसा होना चाहिये कि चींटी देखो तो हाँथी दिखायी पडे। उसकी माँ का एक हस्बैंड होना चाहिये, एकदम मॉडर्न। हस्बैंड का कैरेक्टरलैस होना सबसे जरूरी शर्त है। उसकी बहन वहन हो तो उसका प्री-मैरिटल या आफ्टर मैरिटल अफैयर होना आवश्यक है। उपन्यास इससे रीयलिस्टिक लगता है।.....। एसे घरों के बच्चे सनकी या रिबेल नहीं होगें क्या? यह सवाल उपन्यासकार/कारा से नहीं पूछा जाना चाहिये चूंकि कई “लेखक यूनियनों” द्वारा श्री श्री पुरस्कृत हैं इसलिये जो लिख जायें वह ‘क्लास’। अर्थात एसे महान घरों से क्रांतिकारी जन्म लेते हैं। अपने बाप के खिलाफ बोलते जिनकी पतलून गीली होती रही वे इस देश को बदलेंगे। अच्छा है, हममें तो इतना गूदा नहीं कि एसे प्लॉट्स को बकवास कह सकें। इस लिये बिचारा हजार पच्च्यासीवे का बाप किसी उपन्यास का विषय नही बन सकता यह तो तय हो गया। लेकिन यह तो किसी नें नहीं कहा कि बाप पत्थर दिल होते हैं, फिर बुदरू का मुडी हुई टाँगों वाला, केवल एक गमछे में अपने वदन को ढके हुए इस तरह पत्थर बना क्यों खडा है?

यह हजार पच्च्यासीवी लाश अदना पुलिस के सिपाही की है। पुलिस का सिपाही यानी कि सिस्टम का हिस्सा। जंगल में दुबके ‘क्रांतिकारियों’ का फिर तो हक बनता है कि इसकी लाश एसी बना दें कि बुदरू की धड में सुकारू का हाथ मिले और सोमारू की गर्दन। खोज खोज कर भी तीन चौथाई ही बटोरा जा सका था वह। पर इस बात के लिये सहानुभूति क्यों? बुदरू का बाप अपने बेटे की लाश पहचाने से इनकार नहीं करता, शर्मिन्दा नहीं होता केवल खोज रहा है उसे पसरी हुई बोटियों में। बुदरु बिचारे की तो कोई तस्वीर भी नहीं और इस हजार पच्च्यासीवें के बाप के पास एसी कोई पक्की दीवाल भी नहीं थी जिस पर तस्वीर जैसी कोई चीज लगती। बुदरु पर लिखने के लिये कोई अखबार तैयार भी नहीं और कोई अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का हराम का पैसा उसकी शोक शभा आयोजित करने में लगा भी नहीं है। वह कोई खुजेली दाढी वाला नहीं कि गिरफ्तार भी होता तो अमरीका से श्वेतपत्र जारी होता, चीन आँसू बहाता, कलकता में राईटर्स लिखते और दिल्ली में कठपुललियाँ नाचतीं। उस पर आंन्दोलित होने वाली कोई रुदाली भी नहीं, वे निर्जज्ज कफन खसोंट हैं, व्यापारी हैं, आतंकवाद समर्थक हैं और बददिमाग भी। हजार पच्च्यासी तो कहिये ज्ञात आँकडा हुआ, लेकिन अनगिनत मौते, लाशे जिनका कोई हिसाब नहीं उनके लिये किसका स्वर बुलंद हुआ है इस एक अरब की आबादी वाले देश में? कहाँ से होगा बुलंद, दुनिया जानती है कि आज आवाज उठाने वाले “पेड” हैं, तनखा पाते हैं इस बात की, जोंक हैं.....काहे की लडाई, कौन सा आंदोलन, कैसी क्रांति? कौन सा व्यवस्था परिवर्तन? बस्तर के आदिमों की लाश पर दिल्ली की सरकार बदल जायेगी, हास्यास्पद। और यह कोई बताये कि दिल्ली, कलकता, चेन्नई, मुम्बई में क्या समाजवाद है, वहाँ शायद एसी लडाईयों की आवश्यकता ही नहीं? वहाँ कोई शोषण नहीं, कोई वर्गविभेद नहीं कोई सामाजिक असमानता नहीं राम राज्य है (साम्प्रदायिक स्टेटमेंट न माना जाये)। लडो भाई, क्रांति करो, भगत सिंह नें कब बस्तर के जंगल में बम फोडा? चंद्रशेखर आज़ाद कब दंडकारण्य में छिप कर लडते रहे? सुभाष नें कब दंतेवाडा चलो का नारा दिया? बटुकेश्वर दत्त को कब आई.एस.आई या कि लिट्टे से हथियार मिले? इनके समर्थन में तो को डाक्टर भी अपनी पोटली ले कर नहीं उतरा न ही रुदालियों नें सिर पीटा, इन महान क्रांतिकारियों पर तो लिखने वालों के कलेजे ही दूसरी मिट्टी के बने थे। खैर तब लेखक यूनियनों में किसी पार्टी-वार्टी के कब्जे भी नहीं होते होंगे कि कुछ भी लिखो पीठ खुजाया जाना तय है। लाल-पीले छंडे की विचारधारा पोषित करते रहो, किताबों के अंबार लगवाओ, रायलटी की बोटी चूसो। इस फिक्सड रैकेट में लेखन कहाँ है? 

हजार पच्च्यासीवीं लाश को गठरी में संभालता वह बाप जानता था कि वह अकेला है, अकेला ही रोयेगा और अकेला ही रह जायेगा। उसके बेटे के कोई मानवाधिकार नहीं, उसका बेटा मानव था भी नहीं, या कभी समझा नहीं गया। उसका बेटा खबर बनने लायक भी नहीं था चूंकि अखबार लिखता है “जंगल में बारूदी सुरंग फटी- आठ मरे”। यह हजार पच्च्यासीवी लाश उन्हीं आठ अभागों में से एक की थी, जिन्हे कुत्तों की तरह मारे जाते देख कर भी रायपुर में सम्मेलन होते हैं फलां सेन को रिहा करो, फलां फलां जगह सरकारी दमन है, फलाँ फलाँ शिविरों में घपले हैं...यहाँ एक विश्वप्रसिद्ध रुदाली की बात करनी आवश्यक है। माननीया को “बाँध-फोबिया” की प्रसिद्ध बीमारी है। पार्ट टाईम में किसी भी पंडाल में लेक्चराती नजर आती हैं, समस्या उन्हे समझ आये तब भी, न समझ आये तब भी, वे खुद वहाँ समस्या हों तब भी। कोई विकास कार्य हो रिहेबिलिटेशन और रिसेटिलमेंट (पुनर्स्थापन और पुनर्वास) पर इनकी थ्योरियाँ सुनी जा सकती हैं। पिछले कई सालों, विशेषकर पिछले पाँच सालों में ही नक्सली हिंसा (महोदया द्वारा मानकीकृत क्रांति) में हजारो हजार आदिवासी अपने घर, जमीन, संस्कृति और शांति खो कर सरकारी रहम पर जी रहे हैं। माननीया आपकी दृष्टि इनपर पडती भी कैसे? इनके बारे में सोच कर किसी फंड का जुगाड शायद नहीं था? खैर आपकी विवशता समझी जा सकती है, आप जगतप्रसिद्ध विकास विरोधी ठहरीं, यहाँ आपके मन का ही तो काम जारी है। इन महान क्रांतिकारियों के फलस्वरूप सडकें नहीं बनती, बिजली बंद है, स्कूलों में ताले हैं बस्तियाँ खाली हैं....जय हो, आपका मोटिव तो सॉल्व है। रही आर एण्ड आर की बात तो जंगल से बेहतर आपके क्रांतिकारी कहाँ सुरक्षित थे तो आदिवासियों के सबकुछ लूटे जाने का सार्वजनिक समर्थन कीजिये। वैसे भी बस्तर आपकी समझ आने से रहा, आपकी कुछ भी समझ आने से रहा। यह विक्षिप्ति की दशा में बहुदा होता है.... 

हजार पच्च्यासीवे का बाप सब कुछ लुटा चुका है। बेटा पढ लिख गया, शायद इसी लिये “रुदाली-कम्युनिटी” को खटक गया। उसे व्यवस्था का हिस्सा मान लिया गया। आदिम तो जानवर ठहरे इन कलमघसीटों की निगाहों में? बस्तर बहुतों को मानव संग्रहालय बना ही ठीक लगता है, इन आदिवासी युवकों को कोई अधिकार नहीं कि मुख्य धारा में आयें। किन परिस्थितियों से निकल कर बुदरू मुख्यधारा में जुडा कोई नहीं जानता। बीमारी उसकी माँ को लील गयी चूंकि गाँव में अस्पताल नहीं (अब बनेंगे भी नहीं, यहाँ क्या डाक्टर मरने को आयेंगे? सुना है क्रांतिकारियों को अवश्य कुछ प्राईवेट डाक्टरों की सेवायें मानव अधिकार सेवा के तहत प्राप्त हैं/थीं/होंगी)। उसके पिता को अब जंगल निषेध है, अपनी जमीन, अपने ही घर गया तो पुलिस का मुखबिर घोषित कर मारा जायेगा, क्रांतिकारियों का इंसाफ है भाई। महान लेखिकायें कहती हैं कि क्रांतिकारी बहुत इंसाफ पसंद होते हैं, अपनी अदालतें लगवाते हैं, खुद ही जज और जनाब खुद ही वकील और सजा भी क्रांतिकारी। तालिबान शरमा जाये, एसी सजायें....। मारो, इस हजार पच्यासीवी लाश के बाप को भी मारो।...। मर तो यह तब ही गया था जब इसकी बेटी महान क्रांतिकारियों के हवस का शिकार हुई, फिर अपहृत भी, अब एसा समझा जाता है कि अब किसी समूह में क्रांतिकारियों के जिस्म की आग को अपनी आहूति देती है। क्रांतिकारियों के जिस्म नहीं होते क्या? उनकी भी तो भूख है, प्यास है फिर इसमें गलत क्या है? ये कोई भगत सिंह तो नहीं कि शादी इस लिये नहीं की कि जीवन देश को कुर्बान। अब जमाना बदल गया है, अब भगत सिंह बन कर तो नहीं रहा जा सकता न? जंगल में पुलिस का डर नहीं और डर के मारे आधे पेट खाने वाले ग्रामीण भी इनके लिये अपने मुर्गे, बकरे खून के आँसू पी पी कर काट रहे है, एक क्रांति के लिये सारी खुराक उपलब्ध है भीतर। और क्या चाहिये?

हजार पच्यासीवे का बाप मीडिया की नजरों में नहीं आयेगा। बिक नहीं सकेगा। वह सनसनी खेज कहानी नहीं बन सकता। वह केवल एक लाश का बाप भर तो है और इस प्रकार की मौत कोई बडी घटना नहीं होती। बडी घटना होती है किसी नक्सली के पकडे जाने पर उससे पूछताछ, एसा करने पर मानवाधिकार का हनन होता है और विश्व बाईनाकुलर लगा कर जंगल में झांकने लगता है। मर भाई बुदरू, तेरा और तेरे जैसों का क्या? तू तो सिस्टम है, तुझे ही तो मिटाना है, तभी क्रांति की पुखता जमीन तैयार होगी। न रहेंगे आदिम जंगल में, न रहेंगे मुखबिर, न होगी एश में खलल। तुम्हारा तो एसा “लाल सलाम” कर दिया कि कोई और बुदरू वर्दी पहने तो रूह काँप उठे।...। जलाओ इस हजार पच्चीसवी लाश की गठरी को और एक और कहानी का खामोश अंत हो जाने दो। 

हजार पच्च्यासीवी लाश के इस बाप का एपेंडिक्स नहीं फटेगा। कहानी का एसा अंत उसके नसीब में नहीं। उसकी किसमत में सलीब है।...। वह तो जानता भी नहीं कि व्यवस्था का हिस्सा उसका बेटा समाज और इंसानियत का इतना बडा दुश्मन था कि उसके खिलाफ बडे बडे बुद्धिजीवी और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी लामबंद है। काश वह देख पाता यह सब कुछ, काश वह जान पाता, काश वह सोच पाता, काश वह लड पाता...।....। एक लडाई आरंभ तो हुई थी। सलवा जुडुम एक आन्दोलन बन कर खडा भी हुआ था लेकिन इस अभियान के पैर भी एक साजिश के तहत तोड दिये गये। बस्तर को औकात में रह कर जीना सीखना ही होगा, वह कोई होटल ताज नहीं कि उसके जख्म देश भर को दिखाई पडें और फिर यहाँ तो कातिल नहीं होते, आतंकवादी नहीं, यहाँ खालिस क्रंतिकारी पाये जाते हैं। जोंक, कम्बख्त.....
******************* 

Thursday, September 18, 2008

कुछ तो बोलो...


अधकाच्ची अधपक्की
भाषा कैसी भी हो
कुछ तो बोलो..


खामोशी की भाषा में
कुछ बातें ठहरी रह जाती हैं
आँखों के भीतर गुमसुम हो
गहरी गहरी रह जाती हैं
मैं कब कहता हूँ मेरे जीवन में
उपवन बन जाओ
मैं कब कहता हूँ तुम मेरे
सपनों का सच बन ही जाओ?

लेकिन अपने मन के भीतर
की दीवारों की कैद तोड कर
शिकवे कर लो, लड लो
या रुसवा हो लो
कुछ तो बोलो..

मैनें अपने सपनों में तुमको
अपनों से अपना माना है
तुम भूल कहो
मैने बस अंधों की तरह
मन की हर तसवीर
बताओ सही मान ली
देखो मन अंधों का हाथी
हँस लो मुझ पर..
मैने केवल देखा है
ताजे गुलाब से गूंथ गूथ कर
बना हुआ एक नन्हा सा घर
तुम उसे तोड दो

लेकिन प्रिय
यह खामोशी खा जायेगी
मेरी बला से, मरो जियो
यह ही बोलो
कुछ तो बोलो..

ठहरी ठहरी बातों में चाहे
कोई बेबूझ पहेली हो
या मेरे सपनों का सच हो
या मेरे दिल पर नश्तर हो
जो कुछ भी हो बातें होंगी
तो पल पल तिल तिल मरनें का
मेरा टूटेगा चक्रव्यूह
या मन को आँख मिलेगी प्रिय
या आँखों को एक आसमान

तुम मत सोचो मेरे मन पर
बिजली गिर कर
क्या खो जायेगा
तुम बोलो प्रिय
कुछ तो बोलो
अधकच्ची अधपक्की
भाषा कैसी भी हो..

*** राजीव रंजन प्रसाद
२८.०५.१९९७

Tuesday, September 02, 2008

मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल...


नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है?
मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल
मैंने इससे ही कत्ल किया है!!

सुनता हूँ, गाना नये दौर का है
सागर से दरिया पहाड़ों की ओर
बहता चला है, कहता चला है
पश्चिम से सूरज निकलना तय है
बिल्ली ने अपने गले ही में घंटी
बाँधी है और नाचती है छमा-छम
चूहा नशे में वहीं झूमता है।
जंगल का भी एक कानून है
शेर जियेगा, मारेगा सांभर
फिर वो दहाड़ेगा, राजा है आखिर?
लेकिन नहीं लाज आती है आदम
जो तुम जानवर बन के कॉलर उछालो
बनाते हो जो भेड़िया अपनी पीढ़ी
अभी भी समय है, संभल लो संभालो।

बच्चे नहीं बीज पैदा करो तुम
सही खाद पानी उन्हें चाहिये फिर
पानी में जलकुम्भियाँ ही उगेंगी
नहीं तो नीम की शाख ही पर
करेला चढ़ेगा, कडुवा बकेगा
ये वो दौर है जिसमें है सोच सूखी
पैसा बहुत, आत्मा किंतु भूखी
हम बन के इक डायनासोर सारे
तरक्की के बम पर बैठे हुए हैं
जडें कट गयीं, फिर भी एठे हुए हैं
मगर फूल गुलदान में एक दिन के।
तूफान ही में उखड़ते हैं बरगद
जो बचते हैं हम उनको कहते हैं तिनके।

तो आओ मेरे देश बच्चे बचाओ
उन्हें चाहिये प्यार और वो किताबें
जिनपर कि मैकाले का शाप ना हो
ये सच है कि ईस्कूल हैं अब दुकानें
“गुरूर-ब्रम्हा” के बीते जमाने
शिक्षा बराबर हो अधिकार हो
किस लिये बाल-बच्चों में दीवार हो
बंद कमरे न दो, दो खुला आंगन
झकझोर दो, गर न चेते है शासन
बादल न होंगे न बरसेगा सावन
तो एक आग सागर जला कर सवेरा
लायेगी, पूरा यकीं गर बढ़ोगे
वरना जो कीचड़ से खुश हो, कमल है
पानी घटेगा तो केवल सड़ोगे
मोबाइलों को, एसी बसों को
किनारे करो, ऐसा माहौल दो
घर से बुनियाद पाये जो बच्चा बढ़े
विद्या के मंदिर में दीपक जलें

*** राजीव रंजन प्रसाद
16.12.2007

Monday, September 01, 2008

सादापन तुम्हारा है तो मेरी भी कहानी है..

सिर्फ सादगी और तुम..
महज इस लिये रंगीन है दुनिया
कि बादल हर रंगों को आँखों में पिरोते हैं
कि बादल तेरे दामन से मेरी आँखों में खोते हैं
कि सादापन तुम्हारा है तो मौसम में रवानी है
कि सादापन तुम्हारा है तो मेरी भी कहानी है
कि सादापन लहर बन कर मुझको डुबोता है कभी
कि सादापन जहर बन कर मुझे ज़िन्दा जलाता भी
कि सादेपन में एक बेहोश सी हसरत पनपती है
कि सादेपन में एक खामोश सी चाहत पनपती है
कि सादापन मुझे मैकश बनाता है कभी या फिर
कि सादपन मुझे मुझ ही में रह जानें नहीं देता
कि सादापन अगर चाहे तो दुनिया ही बदल डाले
कयामत आ के रह जाये
कि आ जाये कोइ विप्लव
कि सारे पल ठहर जायें..

*** राजीव रंजन प्रसाद
१.०४.१९९७

Sunday, August 31, 2008

मौत जब सनसनीखेज हो जाये


मेरे क्षेत्र में
भूख से कोई मर नहीं सकता
मीडिया के आरोपों से सांसद महोदय तैश में थे
मानो घर के आगे उन्होंने लंगर खोल रखा हो।
आंकडे "नेताईयत " की आत्मा हैं
मगर कम्बखत परमात्मा तो वही नंगा है
जो मर कर जी का जंजाल हो गया है...

नेता जी गुरगुराये, माईकों के बीच मुस्कुराये
पिछले साल सौ में से सैंतालीस मौतें मलेरिया से
तिरालिस डाईरिया से, चार कैंसर से, छ: निमोनिया से..
सरकारी आँकडों की गवाही है
कीटाणुओं तक के पेट भरे हैं
आदमी की क्या दुहाई है?
सरकारी योजनाओं में हर हाँथ कमाई है,
निकम्मे हैं, इसी लिये नंगाई है..
फसले झुलसती हैं, मुआवजा मिलता है
दुर्घटना, बीमारी या बेरोजगारी सबके हैं भत्ते
थुलथुल गालों के बीच मूँछें मुस्कुरायीं

सवाल मौन हो गये, गौण हो गये...

और दूर उस गाँव में जो मौत बबाल हो गयी थी
उसके तन की दुर्गंध फैलने लगी थी
उसके भैंस की खाल सी
काली, मोटी, सिकुडी चमडी
जैसे पानी की बूँद देखे, बीती हों सदियाँ..
जाँच करने वाले डाक्टर
नाक में रूमाल रख कर, विश्लेषण में मग्न थे
पुलिसिये लट्ठ लिये खाली बर्तन ठोक रहे थे
मौत जब सनसनीखेज हो जाये
कितनों की परेशानी बन जाती है..

अचानक कुछ आँखों में चमक सा
घर के एक कोने में, पत्ते के दोने में
आधा खाया हुआ प्याज, थोडा नमक था....।

मौत भूख से नहीं हुई है
पेट की बीमारी है
जाँच पूरी है, रिपोर्ट सरकारी है...

*** राजीव रंजन प्रसाद
30.04.2007

Wednesday, August 27, 2008

पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ...


मुझको बरसात में सुर मिले री सखी
पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ..

एक कूँवे में दुनियाँ थी, दुनियाँ में मैं
गोल है, कितना गहरा पता था मुझे
हाय री बाल्टी, मैने डुबकी जो ली
फिर धरातल में उझला गया था मुझे
मेरी दुनिया लुटी, ये कहाँ आ गया
छुपता फिरता हूँ कैसी सजा पा गया
मेघ देखा तो राहत मिली है मुझे
जी मचलता है मैं अब बहूँ तब बहूँ..
मुझको बरसात में सुर मिले री सखी
पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ..

मेढकी मेरी जाँ, तू वहाँ, मैं यहाँ
तेरे चारों तरफ ईंट का वो समाँ
मैं मरा जा रहा, ये खुला आसमाँ
तैरने का मज़ा इस फुदक में कहाँ
राह दरिया मिली, जो बहा ले गयी
और सागर पटक कर परे हो गया
टरटराकर के मुख में भरे गालियाँ
सोचता हूँ, पिटूंगा नहीं तो बकूं ?
मुझको बरसात में सुर मिले री सखी
पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ..

एक ज्ञानी था जब पानी पानी था मैं
हर मछरिया के डर की कहानी था मैं
आज सोचा कि खुल के ज़रा साँस लूँ
बाज देखा तो की याद नानी था मैं
कींचडों में पडा मन से कितना लडा
हाय कूँवे में खुद अपना सानी था मैं
संग तेरे दिवारों की काई सनम
जी मचलता है मैं अब चखूँ तब चखूँ
मुझको बरसात में सुर मिले री सखी
पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ..

थम गयी है हवा जम के बरसात हो
औ छिपें चील कोटर में जा जानेमन
शोर जब कुछ थमें साँप बिल में जमें
तुमको आवाज़ दूंगा मैं गा जानेमन
मेरे अंबर जो सर पर हो तब देखना
सोने दूंगा न जंगल को सब देखना
हाय मुश्किल में आवाज खुलती नहीं
भोर होगी तो मैं फिर से एक मौन हूँ
मुझको बरसात में सुर मिले री सखी
पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ..

*** राजीव रंजन प्रसाद
12.04.2008

Tuesday, August 26, 2008

इतना सख्त भी नहीं पहाड


पहाडों के आगे

बैठा हुआ मैं सोचता हूँ

अगर तुम्हारा गम न रहा होता

तो आज

कितना बौना पाता मैं अपनें आप को


और अब देखता हूँ

इतना सख्त भी नहीं पहाड

जितना मेरा दिल हो गया है..


*** राजीव रंजन प्रसाद

Wednesday, August 20, 2008

गुनगुनाते हुए कुछ ही पल..



धूप भरी ज़िन्दगी में
निर्झर में पैर डाले
गुनगुनाते हुए कुछ ही पल
एसे नहीं हैं क्या
जैसे भूले हुए लम्हों में
बीती हुई बातों की चीरफाड
और छोटी छोटी बातों पर घंटों की उलझन
जैसे आपस में गुथे हुए हम...

फिर फिर याद आओगे आप हमें
स्मृतियों में महकेंगे ये पल
और डूब डूब जायेंगे हम
हल्के से मुस्कायेंगे
जैसे कि डूबी शाम में
दूर कहीं बज उठी "जगजीत" की गज़ल..

*** राजीव रंजन प्रसाद
२७.११.१९९५

Tuesday, August 19, 2008

युगों तक खमोश दो बुत..



नारज़गी हद से बढी
और हो गयी पर्बत
आँखों से पिघल गया ग्लेशियर
जैसे मोम नदी हो जाता है
पत्थर की तरह पिघल पिघल कर..

पीठ से पीठ किये
युगों तक खमोश दो बुत
इस तरह बैठै रहे
तोड तोड कर चबाते हुए घास के तिनके
जैसे गरमी की दोपहर ढलती नहीं..

और जब नदी न रही
पिघल चुका पत्थर
बुत "मै" और "तुम" हो गये
बहुत सोच कर भी
याद न रहा, न रहा
कि मुह फुलाये ठहर गये कितने ही पल
...कारण क्या था?

*** राजीव रंजन प्रसाद
२३.११.१९९५

Sunday, August 17, 2008

जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..


जैसे इकलौता गुल खिल कर, काँटों को बेमोल बना दे
सीपी क्या है एक खोल है, मोती हो अनमोल बना दे..

तुम होते हो खो जाता हूं, फिर अपनी पहचान साथ है
जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..

मन के भीतर की आवाज़ें, आँखों से सुन लेता हूँ,
साथ हमारा एसा जो, खामोशी को भी बोल बना दे..

तुम को खो कर हालत मेरी, उस बच्चे के इम्तिहान सी
टीचर उसकी काँपी में, कुछ अंक नहीं दे गोल बना दे..

चार दीवारें, आँखों में छत, तनहाई "राजीव" रही
जैसे गम दुनिया निचोड कर इतना ही भूगोल बना दे..

*** राजीव रंजन प्रसाद
१२.११.२०००

Friday, August 15, 2008

सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।



गाँधी की नये फ्रेम में तस्वीर सजायें,
सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।।

हमने भी गिरेबाँ के बटन खोल दिये हैं
थी शर्म, कबाड़ी ने रद्दी में खरीदी है
बीड़ी जला रहे हैं अपने जिगर से यारों
ये पूँछ खुदा ने जो सीधी ही नहीं दी है
हम अपनी जवानी में वो आग लगाते हैं
कुत्तों को, सियारों को जो राह दिखाते हैं

मौसम है उत्सव का, लेकर मशाल आओ
हम पर जो उठ रहे हैं, वो प्रश्न जलायें।
सठिया गया है देश, चलो जश्न मनायें।।

आज़ाद का मतलब, सड़कों पे पिघल जाओ
आज़ाद का मतलब है, बस - रेल जलाओ
आज़ाद का मतलब है, एक चक्रवात हो लो
आज़ाद का मतलब है पश्चिम की बात बोलो
सब रॉक-रोल हो कर चरसो-अफीम में गुम
हो कर कलर आये, फिर से सलीम में गुम

आज़ाद ख्याली हैं, दिल फेंक मवाली हैं
सपने न हमसे देखो, उम्मीद भाड़ जाये।
सठिया गया है देश, चलो जश्न मनायें।।

पूछा था जवानी ने, हमसे सवाल क्यों है
बुड्ढे जो तख्तो-ताज पे उनको तो घेरिये
बच्चे कल की आशा, उनकी बदलो भाषा
"मुट्ठी में क्या है पूछें", सर हाँथ फेरिये
टैटू भी गुदाना है, बालों को रंगाना है
कानों में नयी बाली, हम नहीं हैं खाली

मत बजाओ थाली, बच्चों बजाओ ताली
सुननी नहीं हो गाली तो राय न लायें।
सठिया गया है देश, चलो जश्न मनायें॥

ले कर कलम खड़ा था, मैं भूमि में गड़ा था
हँसने लगा वो पागल, जो पास ही खड़ा था
बोला कि अपने घर को, घर का चराग फूँके
वो आईने के अक्स पर, हर शख्स आज थूके
भटके हुए जहाज को आजाद नहीं कहते
लश्कर के ठिकानों को आबाद नहीं कहते

तुम अपनी कलम घिस्सो, दीपक ही जलाओ
वो गीत लिखो जिसको, बहरों को सुनायें
सठिया गया है देश चलो, जश्न मनायें॥

*** राजीव रंजन प्रसाद
9.08.2007

Wednesday, August 13, 2008

मेरे साये..


जैसे ही आईना देखा, चौंक गया,
मेरा चेहरा कहीं नहीं था, कहीं नहीं..
सिर धुनता दीवारों पर मैं चीख उठा
खंडहर पर बैठे चमगादड़ उड़ कर भागे
डर कर मकड़ी धागे पर कुछ और चढ़ी
आँखें मिच-मिच करते उल्लू अलसाये
खिल-खिल कर के हँसी गहनतम खामोशी
कितने फैल गये देखो मेरे साये..


*** राजीव रंजन प्रसाद

९.११.१९९५

Tuesday, August 12, 2008

धर्म और राजनीति..

अशांत थे भीष्म
मन के हिमखंडों से
पिघल-पिघल पड़े, गंगा से विचार..
कि कृष्ण! यदि आज तुम प्रहार कर देते
तो क्या इतिहास फिर भी तुम्हें ईश्वर कहता?
रथ का वह पहिया उठा कर, बेबस मानव से तुम
धर्म-अधर्म की व्याख्याओं से परे
यह क्या करने को आतुर थे?
स्तंभ नोचती बिल्ली के सदृश्य?

तुम जानते थे कि अर्जुन का वध मैं नहीं करूंगा
तुम्हारा गीताज्ञान आत्मसात करने के बावजूद..
तुम यह भी जानते थे कि दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर
ऐसी किसी भी प्रतिज्ञा से बाध्य नहीं था
तब मेरे अनन्यतम आराध्य
तुम्हारी अपनी ही व्याख्याओं पर प्रश्नचिन्ह क्यों?

मैं विजेता था उस क्षण
मेरे किसी वाण के उत्तर अर्जुन के तरकश में नहीं थे
तुम्हारा रथ और ध्वज भी मैनें क्षत-विक्षत किया था
और मेरा कोई भी वार धर्मसम्मत युद्ध की परिभाषाओं से परे नहीं था।
फिर किस लिए केशव तुमने मुझे महानता का वह क्षण दिया
जहाँ मैं तुमसे उँचा, तुम्हारे ही सम्मुख “करबद्ध” था?
मैंने तुम्हें बचाया है कृष्ण और व्यथित हूँ
धर्म अब मेरी समझ के परे है
अब सोचता हूँ कि दुर्योधन ने तुम्हें माँगा होता, न कि तुम्हारी सेना
तो क्या द्वेष के इस महायुद्ध का खलनायक युधिष्ठिर होता?

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:..
तब तुम ही आते हो न धर्म की पुनर्स्थापना के लिये?
तो क्या किसी भी कीमत पर विजय, धर्म है?
तुम क्या स्थापित करने चले हो यशोदा-नंदन
सोचो कि तुमने मुझे वह चक्र दे मारा होता
और मैने हर्षित हो वरण किया होता मृत्यु का
स्वेच्छा से..
तो भगवन, सिर्फ एक राजा कहलाते तुम
और इतिहास अर्जुन को दिये तुम्हारे उपदेशों पर से
रक्त से धब्बे नहीं धोता।
तुम्हारी इस धरती को आवश्यकता है कृष्ण
पुनर्निमाण को हमेशा भगवान चाहिये
और इसके लिये इनसान बलिदान चाहिये

अब तुमने जीवन की इच्छा हर ली है
शिखंडी का रहस्य फिर तुम्हारे मित्र को सर्वश्रेष्ठ कर देगा
मुझे मुक्ति, लम्बा सफर देगा
मन का यह बोझ सालता रहेगा फिर भी
कि धर्म और राजनीति क्या चेहरे हैं दो
चरित्र एक ही?

*** राजीव रंजन प्रसाद
22.04.2007