सफर - राजीव रंजन प्रसाद

Monday, November 29, 2010

अच्छा तो तुम वामपंथी नहीं हो? यानी कि दक्षिण पंथी हो? - राजीव रंजन प्रसाद

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इस बात को साल भर से अधिक हो गया। मैंने बस्तर में जारी नक्सलवाद के खिलाफ किसी लेख में टिप्पणी की थी। उस दिन मेरे नाम को इंगित करते हुए एक प...
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Thursday, October 28, 2010

घने जंगल में खूबसूरत फूल: चंद्रू [एक संस्मरण, बस्तर के जंगलों से] – राजीव रंजन प्रसाद

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बात कोई तेरह -चौदह वर्ष पुरानी है। उस रात जब केवल मेरे कमरे में आया तो उसके चेहरे में एक चमक थी। पत्रकारों को किसी नई कहानी के मिलने का एस...
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Tuesday, February 23, 2010

माओवादियों का “सीजफायर” और दिनकर की “शक्ति और क्षमा”

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रात जब संचार माध्यमों नें चीखना आरंभ किया कि माओवादियों नें बहत्तर दिनों के सीजफायर का एलान किया है तो जिज्ञासा इस बात की थी कि उनकी शर्ते क...
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Friday, February 19, 2010

नक्सलवादी, आतंकवादी और भगत सिंह

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कुहु बिटिया अब हाथी-घोडे की कहानियों से आगे आ गयी है, क्यों न हो वह अब कक्षा दूसरी में जो जाने वाली है। आज मैंने भगत सिंह से उसका परिचय कराय...
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Tuesday, February 16, 2010

बंगाल में हुए नक्सली हमले पर खामोश मीडिया, मानवादिकारवादी और लेखक [श्रद्धांजलि आलेख]

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कोई आश्चर्य नहीं कि चौबीस घंटे भी नहीं बीते और पश्चिम बंगाल में नक्सली हमले की खबर मीडिया के सर से सींग की तरह गायब हो गयी। देश और दुनियाँ म...
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Tuesday, February 02, 2010

भूमिपुत्र [मुम्बई को जागीर समझने वालों पर मेरा विरोध]

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बहुत से जानवर इलाका बनाते हैं अपना जिसके भीतर ही भौंकते-किचकिचाते हैं, थूकते-चाटते हैं, और कोने किनारे पाये जाते हैं टाँग टेढी किये। मजाल है...
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Wednesday, January 20, 2010

मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ [वसंत पंचमी पर - वंदना]

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वीणा के तार से गीत बजें मैं गा लूँ जग की पीड़ा माँ मेरे आँसू, मेरी आहें, मेरे अपने हैं रहने दो पलकों के गुल पर ठहर कभी बहते हैं, बहने दो सुख...
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Wednesday, February 04, 2009

हजार पच्यासीवें का बाप [बस्तर में जारी नक्सलवाद के समर्थकों के खिलाफ] - राजीव रंजन प्रसाद

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दिल्ली में बैठा हूँ और सुबह सुबह एक प्रतिष्ठित अखबार भौंक गया है, बस्तर के जंगलों में क्रांति हो रही है। लेखिका पोथी पढ पढ कर पंडित हैं, कलक...
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Thursday, September 18, 2008

कुछ तो बोलो...

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अधकाच्ची अधपक्की भाषा कैसी भी हो कुछ तो बोलो.. खामोशी की भाषा में कुछ बातें ठहरी रह जाती हैं आँखों के भीतर गुमसुम हो गहरी गहरी रह जाती हैं म...
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Tuesday, September 02, 2008

मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल...

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नन्हे-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है? मुट्ठी में एक तमंचा है अंकल मैंने इससे ही कत्ल किया है!! सुनता हूँ, गाना नये दौर का है सागर से द...
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Monday, September 01, 2008

सादापन तुम्हारा है तो मेरी भी कहानी है..

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सिर्फ सादगी और तुम.. महज इस लिये रंगीन है दुनिया कि बादल हर रंगों को आँखों में पिरोते हैं कि बादल तेरे दामन से मेरी आँखों में खोते हैं कि सा...
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Sunday, August 31, 2008

मौत जब सनसनीखेज हो जाये

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मेरे क्षेत्र में भूख से कोई मर नहीं सकता मीडिया के आरोपों से सांसद महोदय तैश में थे मानो घर के आगे उन्होंने लंगर खोल रखा हो। आंकडे "नेत...
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Wednesday, August 27, 2008

पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ...

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मुझको बरसात में सुर मिले री सखी पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ , कुछ कहूँ .. एक कूँवे में दुनियाँ थी, दुनियाँ में मैं गोल है, कितना ग...
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Tuesday, August 26, 2008

इतना सख्त भी नहीं पहाड

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पहाडों के आगे बैठा हुआ मैं सोचता हूँ अगर तुम्हारा गम न रहा होता तो आज कितना बौना पाता मैं अपनें आप को और अब देखता हूँ इतना सख्त...
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Wednesday, August 20, 2008

गुनगुनाते हुए कुछ ही पल..

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धूप भरी ज़िन्दगी में निर्झर में पैर डाले गुनगुनाते हुए कुछ ही पल एसे नहीं हैं क्या जैसे भू...
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Tuesday, August 19, 2008

युगों तक खमोश दो बुत..

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नारज़गी हद से बढी और हो गयी पर्बत आँखों से पिघल गया ग्लेशियर जैसे मोम नदी हो जाता है पत्...
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Sunday, August 17, 2008

जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..

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जैसे इकलौता गुल खिल कर, काँटों को बेमोल बना दे सीपी क्या है एक खोल है, मोती हो अनमोल बना दे.. तुम होते हो खो जाता हूं, फिर अपनी पहचान साथ है...
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Friday, August 15, 2008

सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।

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गाँधी की नये फ्रेम में तस्वीर सजायें , सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।। हमने भी गिरेबाँ के बटन खोल दिये हैं थी शर्म, कबाड़ी ने...
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Wednesday, August 13, 2008

मेरे साये..

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जैसे ही आईना देखा , चौंक गया , मेरा चेहरा कहीं नहीं था , कहीं नहीं.. सिर धुनता दीवारों पर मैं चीख उठा खंडहर पर बैठे चमगादड़ उड़ कर ...
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Tuesday, August 12, 2008

धर्म और राजनीति..

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अशांत थे भीष्म मन के हिमखंडों से पिघल-पिघल पड़े, गंगा से विचार.. कि कृष्ण! यदि आज तुम प्रहार कर देते तो क्या इतिहास फिर भी तुम्हें ईश्वर कह...
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राजीव रंजन प्रसाद
बचेली (दंतेवाडा), छत्तीसगढ), India
स्वयं से अपरिचित हूँ, अपनी तलाश जारी है.
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