सफर - राजीव रंजन प्रसाद

Sunday, August 31, 2008

मौत जब सनसनीखेज हो जाये

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मेरे क्षेत्र में भूख से कोई मर नहीं सकता मीडिया के आरोपों से सांसद महोदय तैश में थे मानो घर के आगे उन्होंने लंगर खोल रखा हो। आंकडे "नेत...
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Wednesday, August 27, 2008

पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ, कुछ कहूँ...

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मुझको बरसात में सुर मिले री सखी पेट दुखता है मैं कुछ कहूँ , कुछ कहूँ .. एक कूँवे में दुनियाँ थी, दुनियाँ में मैं गोल है, कितना ग...
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Tuesday, August 26, 2008

इतना सख्त भी नहीं पहाड

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पहाडों के आगे बैठा हुआ मैं सोचता हूँ अगर तुम्हारा गम न रहा होता तो आज कितना बौना पाता मैं अपनें आप को और अब देखता हूँ इतना सख्त...
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Wednesday, August 20, 2008

गुनगुनाते हुए कुछ ही पल..

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धूप भरी ज़िन्दगी में निर्झर में पैर डाले गुनगुनाते हुए कुछ ही पल एसे नहीं हैं क्या जैसे भू...
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Tuesday, August 19, 2008

युगों तक खमोश दो बुत..

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नारज़गी हद से बढी और हो गयी पर्बत आँखों से पिघल गया ग्लेशियर जैसे मोम नदी हो जाता है पत्...
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Sunday, August 17, 2008

जैसे कोई मर्तबान में, जल-चीनी का घोल बना दे..

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जैसे इकलौता गुल खिल कर, काँटों को बेमोल बना दे सीपी क्या है एक खोल है, मोती हो अनमोल बना दे.. तुम होते हो खो जाता हूं, फिर अपनी पहचान साथ है...
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Friday, August 15, 2008

सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।

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गाँधी की नये फ्रेम में तस्वीर सजायें , सठिया गया है देश चलो जश्न मनायें।। हमने भी गिरेबाँ के बटन खोल दिये हैं थी शर्म, कबाड़ी ने...
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Wednesday, August 13, 2008

मेरे साये..

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जैसे ही आईना देखा , चौंक गया , मेरा चेहरा कहीं नहीं था , कहीं नहीं.. सिर धुनता दीवारों पर मैं चीख उठा खंडहर पर बैठे चमगादड़ उड़ कर ...
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Tuesday, August 12, 2008

धर्म और राजनीति..

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अशांत थे भीष्म मन के हिमखंडों से पिघल-पिघल पड़े, गंगा से विचार.. कि कृष्ण! यदि आज तुम प्रहार कर देते तो क्या इतिहास फिर भी तुम्हें ईश्वर कह...
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Sunday, August 10, 2008

सचमुच तरक्की भी क्या चीज है..

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सभ्यता व्यंग्य से मुस्कुराती है जंगल के आदिम जब "मांदर" की थाप पर लय में थिरकते हैं जूड़े में जंगल की बेला महकती है हँसते हैं, गुच...
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Friday, August 08, 2008

बडा स्कूल.

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स्कूल बहुत बडा है डिजाईनर दीवारें हैं हर कमरे में ए.सी है एयरकंडीश्नर बसें आपके बच्चों को घर से उठायेंगी यंग मिस्ट्रेस नयी टेकनीक से उन्हे प...
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Thursday, August 07, 2008

टुकडॆ अस्तित्व के..

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मन का अपक्षय आहिस्ता आहिस्ता मुझको अनगिनत करता जाता है नदी मेरे अस्तित्व से नाखुश है और मुझे महज इतना ही अचरज है इतना तप्त मैं टूटता हूं पुन...
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Wednesday, August 06, 2008

ज़ुल्फें..

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बांध कर न रखा करो ज़ुल्फें अपनी नदी पर का बाँध ढहता है तबाही मचा देता है एसा ही होता है जब तुम एकाएक झटकती हो खोल कर ज़ुल्फें.....
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Tuesday, August 05, 2008

आ कर कहीं से तुम तभी...

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आप तो जाते रहे फिर नींद भी जाती रही आसमां की चांदनी हमको जलाती भी रही वो एक ख्वाब जो आँखें खुले देखा किये हम रात भर जलती रही अ...
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Sunday, August 03, 2008

अंधियारा चप्पल उतार कर मन के आँगन में आता है।

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अंधियारा चप्पल उतार कर मन के आँगन में आता है। तुमने मेरी गुडिया तोडी, मैनें बालू का घर तोडा तुमने मेरा दामन छोडा, मैंने अपना दामन छोडा तुम म...
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Tuesday, July 29, 2008

कितनी कठोरता जानम..

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पहाड से टकरा कर लौट आता है तुम्हारा नाम तुम से टकरा कर लौट लौट आती है मेरी धडकन कितनी कठोरता जानम कि पर्बत हो गयी हो.. ...
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Thursday, July 17, 2008

कैसे मेरा दिल धडकने लगा है...

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मेरे बगीचे के गुलाब मुस्कुराते नहीं थे हवा मुझे छू कर गुनगुनाती नहीं थी परिंदों नें मुझको चिढाया नहीं था मेरे साथ मेरा ही साया नहीं था तुम्ह...
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Monday, July 14, 2008

नक्सलवाद और महाराज प्रबीर चंद भंजदेव की हत्या: थोडा आज, कुछ इतिहास (“बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ” आलेख श्रंखला)

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“ आई प्रबीर-द आदिवासी गॉड ” देर रात तक इस पुस्तक पर आँखें गडाये रहा, कब नींद आ गयी पता ही नहीं लगा। सीने पर पडी किताब से एक सपना आँखों ...
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Sunday, July 13, 2008

मै, नींद, रात और चांद

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रात और चांद का एक रिश्ता है नींद और चांद का एक रिश्ता है मेरा और चांद का एक रिश्ता है मै , नींद , रात और चांद जब इकट्ठे होते हैं ...
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राजीव रंजन प्रसाद
बचेली (दंतेवाडा), छत्तीसगढ), India
स्वयं से अपरिचित हूँ, अपनी तलाश जारी है.
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