सफर - राजीव रंजन प्रसाद

Friday, May 30, 2008

तालाब नहीं भाते हैं..

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मुझे तालाब नहीं भाते हैं ठहर जाते हैं और तुम इसीलिये उदास करती हो मुझे.. तुममें अपनी परछाई देखता हुआ खीज कर फेंकता हूँ पत्थर भँवरें मुझतक आत...
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Monday, May 26, 2008

बस्तर का हूँ इस लिये चुप रहूँ - साभार मोहल्ला।

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संस्मरण (कडी-1) जगदलपुर का सीरासार चौक, शाम के करीब सात बजे होंगे। अचानक एक जनसैलाब उमडा और चौंक से उस बेहद संकरी सडक में जैसे उमडता ...
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Saturday, May 24, 2008

राजस्थान की आग पर...पधारो म्हारे देस...

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केसरिया बालमवा ..पधारो म्हारे देस... आदम ढूंढो, आदिम पाओ रक्त पिपासु, प्यास बुझाओ मेरी माँगें, तेरी माँगें खींचें इसकी उसकी टाँगें मेरा परि...
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Friday, May 23, 2008

सागर से पूछो, दरिया कहाँ है..

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पुरबा बता दे, कहाँ की हवा है सागर से पूछो, दरिया कहाँ है.. लहू जिसका पानी, है एसी जवानी जो आँसू बिकेंगे, उन्ही में कहानी जिसे दिखता सूरज, वो...
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Wednesday, May 21, 2008

अपनी शादी की सालगिरह पर..एक रचना दिल से...

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दिन खास है तो सोचा दिल के करीब की कोई रचना प्रस्तुत करूं। जैसे डायरी में कोई पुराना गुलाब सहेज कर रखा जाता है बिलकुल वैसे ही सहेज कर रखी थी ...
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तुम सिमट आतीं मेरे करीब....

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काला जादू.. जब कि बादल नहीं होते जी करता है खींच लूं चोटी तुम्हारी और तुम झटक कर सिर आँखों को तितलियाँ कर लो अब कि जब मेरी हथेलियों में तुम्...
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Tuesday, May 20, 2008

चरित्र और चेहरे..

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एकांत ध्यानमग्न बगुला एकदम से ताल के ठहरे पानी पर झपटा पानी भवरें बनानें लगा उसकी परछाई लहरानें लगी वह शांत हुआ पंजे में कुछ न था मछली या कि...
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Saturday, May 17, 2008

मैं कभी ज़िंदा नहीं था..(कहानी)

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रोज देखता था उस लडकी को। सुबह हुई नहीं कि हाँस्टल की पिछली दीवार से लगे कूडे के ढेर में जानें क्या खोजती, ढूंढ़ती, बीनती मिलती। उसके घुटनों स...
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Friday, May 16, 2008

मेरे कतरे कतरे को चाहा था..

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उसने मुझको छोड मेरे कतरे कतरे को चाहा था उसने कतरा कतरा ले कर मुझको छोड दिया जीने.. मैं कहता हूँ सागर से मुझमे डूब मरो कम्बख्त कलेजा भर जाये...
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Thursday, May 15, 2008

समाजवाद बबुआ.. (तिब्बत की पराधीनता क्या लाल-झंडा बरदारों का असली चेहरा नहीं है?)

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ल्हासा लाल हो गया है साम्यवाद नें खीसें निपोड कर कहा है ’धम्मम शरणम गच्छामि’ और पकड पकड कर तिब्बतियों के फोडे जा रहे हैं सर कील लगे बूटों के...
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Wednesday, May 14, 2008

जयपुर में मौत के तांडव पर एक श्रद्धांजलि - मर गये आदमी, एक खबर बन गयी

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मर गये आदमी, एक खबर बन गयी जल गयी लाश थी कोई पत्थर हुआ क्या संभाले उसे, क्या करेंगे दुआ ज़िंदगी आँख में रुक गयी काँच बन और हाँथों की हर फूटती...
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Tuesday, May 13, 2008

ज़ुल्फ और क्षणिकायें

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ज़ुल्फ -१ उसनें कहा था हवाओं में खुश्बू भरी होगी मुझसे दूर मेरे ज़ुल्फों के खत पुरबा सुनायेगी तुम्हे ये क्या कि ज़हर घुला है हवाओं में एक तो जु...
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Monday, May 12, 2008

मछली की आँखें

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मेरी अमावस्या इस लिये है कि मेरा चाँद मेरी आँखों की बाहों में लिपट गया है और कुछ दीख नहीं पडता सिर्फ मछली की आँखें.. *** राजीव रंजन प्रसाद २...
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Sunday, May 11, 2008

माँ तुम्हारा खत

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(यह रचना छात्रावास के दिनों में मैंने लिखी थी और आज भी पढता हूँ तो हर शब्द सामयिक पाता हूँ। तस्वीर मेरी पूजनीय माताजी की है अपनी पोती के सा...
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Saturday, May 10, 2008

बम

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उसे भूख लग आयी थी..और जब भूख लगी होती है, तो ज़िन्दा होता है सिर्फ पेट। रोज़ रोज़ यह देश जाने कितने ज़िन्दा पेटों वाले मुर्दे ढोता है और आहिस्ता...
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Friday, May 09, 2008

क्या उपहार दूँ तुम्हें...

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सोचता रहा क्या उपहार दूं तुम्हें तुमने मुझे इतना कुछ दिया है जिंदगी दी है और शाम का गुलाबी आसमान सूरज चाँद, धूप और चाँदनी नदी और पंछी, गुंजन...
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Thursday, May 08, 2008

या मुरली मुरलीधर की, अधरा न धरी, अधरा न धरौंगी..

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कोमल श्वेत हाँथ पग मेरे, मैं सिमटी उस उदर अंधेरे अभिमन्यु को चक्रव्यूह था, मुझको तू तू तेरे मेरे माँ तूने तस्वीर निकाली, फिर की तय, टूटेगी ड...
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Wednesday, May 07, 2008

तुमसे मोहब्बत होगी....

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और भी लोग है जिन्हे तुमसे मोहब्बत होगी और भी दिल है, जिन्हे तेरा दर्द भाता है और भी आह तेरे ज़ख्म से उभरती है और भी टीस तुझे देख कर उतरती है....
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Tuesday, May 06, 2008

तुम्हारा खत पढा...

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तुम्हारा खत पढा फिर पढा कितने ही टुकडे चाक कलेजे के मुँह को आ पडे थामा ज़िगर को और बिलकुल बन चुका मोती भी चूने न दिया फिर पढा तुमहारा खत और श...
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Monday, May 05, 2008

अस्तित्व..

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कितनी शरारती आँखें बना कर तुमनें पूछा था मुझसे कितना प्यार करते हो मुझसे? और अपनी बाहें पूरी फैला कर तुमने पूछा था क्या इतना? और मैं मुस्कुर...
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राजीव रंजन प्रसाद
बचेली (दंतेवाडा), छत्तीसगढ), India
स्वयं से अपरिचित हूँ, अपनी तलाश जारी है.
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